तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

Apoorva Pratap Singh

खूँटे में एक औरत एड़ियों से बंधी पड़ी है। उसके पति ने पैर से उसका गला दबा रखा है और डंडे से पीट रहा है। वो दोनों हाथों से अपना गला छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही है। जब-जब उसके शरीर पर डंडा पड़ता है , उसका शरीर ऐंठ जाता है। गला दबा है तो चीख नहीं पा रही। यही उसका प्रतिरोध है और यही उसकी प्रतिक्रिया।

वहाँ वो अकेली नहीं है। खूँटे के किनारे लोग खाट लगाकर बैठे हैं। तमाशा चल रहा है। हर उम्र के लोग हैं। देख कर लगता है जैसे कोई एडल्ट्री का मामला है। छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह में हैं औरहाथ मे डंडियाँ लिए हुए हैं। औरत का पति पूरी ताकत से वार कर रहा है। जैसे ये उसकी मर्दानगी का इम्तिहान हो। ज़ाहिर करना चाहता है कि वो मजबूत और स्वस्थ है.... तेज 'वार' करता है वो।

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आस-पड़ोस की औरतें मार खा रही औरत को उलाहना दे रही हैं । बाकी लोग उसके पति को उत्साहित कर रहे हैं। अब उस आदमी ने कमर से बेल्ट निकाल ली है। औरत के मुँह पर लगातार बेल्ट मार रहा है। मारते-मारते थक चुका है पर स्वीकार नहीं करना चाहता कि वो 'थकता' भी है।

इसके आगे नहीं देखा। मन नहीं हुआ। पर इतना जरूर समझ आया कि उस तमाशे में सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं से बंधे थे। जितना कठिन उस औरत के लिए पिटाई से बच पाना था , उतना ही कठिन उसके पति के लिए उसको पीटने से बच पाना था। पिटती औरत को उलाहना देने वाली औरतें भी उसको उलाहना देने से नहीं बच सकती थीं।

इस तमाशे की स्क्रिप्ट तैयार होने में हज़ारों साल लगे हैं।

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