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  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सन् 2014 के लोकसभा चुनावों के लगभग दो वर्षों पहले से लोकतंत्र की गूढ़ समझ रखने वाला लोकतांत्रिक व्यक्ति हो पाना बहुत ही अधिक सरल हो गया है। मोदी जी का विरोध कीजिए, गाली दीजिए या व्हाट्सअप फेसबुक ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर ऐसे संदेशों को कापी पेस्ट फारवर्ड कीजिए। इतना करते ही व्यक्ति लोकतांत्रिक हो जाता है।

    यह बिलकुल वैसा ही है जैसे मोदी जी का समर्थन करते ही व्यक्ति राष्ट्रप्रेमी, हिंदुत्व की असल समझ रखने वाला व कर्मठ हो जाता है।

    इन चरित्रों में अंतर क्या है यह समझ के बाहर है क्योंकि ऊपरी पैकिंग भले ही अलग रंग की हो लेकिन चरित्र तो बिलकुल एक ही है। चरित्र समान होने के कारण क्या फर्क पड़ता है कि मोदी जी के विरोधी हैं या समर्थक हैं क्योंकि पोषित तो समान सामाजिक मूल्य ही किए जा रहे हैं। इन समान चरित्रों में भी अंतर उन लोगों को दिख सकता है जिन्हें यह लगता है कि किसी लोकतांत्रिक देश में किस पार्टी की सरकार है, इस बात से उस देश व समाज के चरित्र का निर्माण होता है।

    यदि ऐसा होता तो किसी लोकतांत्रिक देश में कभी किसी दूसरी पार्टी की सरकार आनी ही नहीं चाहिए। यदि ऐसा होता तो भारत में हमेशा कांग्रेस की ही सरकार देश व प्रत्येक राज्य में लगातार ही बनती रहती। यदि ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश में मायावती जी की सरकार आने के बाद उन्हीं की बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा तो अखिलेश यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा होता तो बिहार में 15 वर्षों तक सरकार रहने के बाद लालू प्रसाद यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी, क्योंकि उनको तो उनके भक्तों/समर्थकों द्वारा सामाजिक न्याय का मसीहा भी कहा जाता है।

    लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि सच यही है कि किसी लोकतांत्रिक देश में सरकारें उस देश व समाज के लोगों की सोच समझ व चरित्र का प्रतिबिंब होतीं हैं। भारतीय समाज, परिवार, नौकरशाही व सरकारों का चरित्र मूल में अलोकतांत्रिक व सामंती है। समाज की इकाई के व्यक्ति के रूप में हमारे जीवन में झूठ, ढोंग व दोहरापन इत्यादि ही हमारे वास्तविक चरित्र हैं। समाज ही नहीं परिवार की इकाई के रूप में भी हम कमोबेश इसी चरित्र के हैं। हमें व्यक्ति, परिवार व समाज के रूप में अपने चरित्र को बदलने की मूलभूत जरूरत है। हमारा ऐसा करना ही वास्तविक क्रांति/परिवर्तन है। वास्तव में यही कर पाना ही क्रांति है। बिना ऐसा किए, रोज सरकारों को बदलते रहिए, रोज सरकारों को दोष दीजिए, रोज सरकारों को गाली दीजिए, रोज क्रांति गढ़िए अपनी पीठ ठोकिए अपने अंदर अहंकार को जीते रहिए। लेकिन ऊपरी पैकिंग के रंगों के अलावा कुछ नहीं बदलेगा।

    चलते-चलते:

    यदि मोदी जी से किसी पार्टी का होने की बजाय देश के लोगों का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा की जाती है जबकि देश का प्रधानमंत्री किसी न किसी पार्टी का प्रतिनिधित्व तो करता ही है वरना कोई प्रधानमंत्री ही नहीं बन सकता। जो लोग जो मोदी जी से देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं। वही लोग देश के पूर्व राष्ट्रपति माननीय प्रणव मुखर्जी जी के द्वारा एक स्वयंसेवी संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आमंत्रण को स्वीकार किए जाने का पानी पी-पी कर विरोध करते हैं। जबकि भारत के संविधान के अनुसार देश का राष्ट्रपति किसी भी पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। मतलब यह कि हम मोदी जी से तो देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं लेकिन प्रणव मुखर्जी जी को देश का राष्ट्रपति होने के कारण बुरा भला कहते हैं। गजब का ढोंग व दोगलापन हममें कूट-कूट कर भरा है।

    राहुल गाँधी जी को मैं लोकतांत्रिक समझ वाला राजनेता मानता आया हूँ, इस मुद्दे पर उनके व्यवहार ने उनके प्रति मेरी मान्यता को पुष्ट ही किया है। उनको धन्यवाद। संघ द्वारा भारत के पूर्व राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। माननीय प्रणव मुखर्जी जी द्वारा आमंत्रण को स्वीकार करने के लिए धन्यवाद। यह घटना एक लोकतांत्रिक घटना थी।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • मीडिया में महिला — Vandana Dave

    मीडिया में महिला — Vandana Dave

    Vandana Dave

    वैसे तो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखना चाहिए कि मीडिया महिला और पुरूष में बँटा हुआ हो। मीडिया का काम लिंगभेद को समाप्त करना है न कि इसको बढ़ावा देना।

    महिलाओं को लेकर विश्वभर में अनेकों पत्र पत्रिकाएँ निकलती हैं। इनके कंटेंट को देखा जाए तो सालों से वही घिसापिटा चला आ रहा है। खूबसूरती, फैशन,पति, परिवार, घर, खाना आदि।

    अखबारों में भी इन्हीं विषयों के इर्द गिर्द नारी परिशिष्ट लगभग हर अखबार निकालता है। 

    अब प्रश्न उठता है कि यदि हम लिंगभेद समाप्त करना चाहते हैं तो क्या महिलाओं की अलग से पत्र पत्रिकाएँ निकालना आवश्यक है ? कोई भी अखबार या पत्रिका पाठको के लिए होना चाहिए। नर या नारी के लिए नहीं। यदि ऐसा होता है तो पुरूष व स्त्री को लेकर जुगुप्सा की भावना भी धीरे धीरे खत्म होती जाएगी। अकसर देखा गया है कि पुरूष स्त्रियों की पत्रिकाएँ बङे चाव से पढ़ते हैं। स्त्रियों से जुङे मुद्दे उनके लिए चटपटे होते हैं। 

    अखबार या पत्रिकाएँ आम पाठक के लिए होंगी तो दोनों के व्यवहार या उनकी समस्या को लेकर समान प्लेटफार्म पर बात होगी। इससे महिला पुरूष के बीच रहस्य की दूरी समाप्त होगी और समाज में सहज और स्वस्थ वातावरण निर्मित होगा।

    स्त्री सौंदर्य के बहुत बङे बाज़ार ने  मीडिया में स्त्री व पुरूष के भेदभाव को बढ़ाया है। वे कभी नहीं चाहते कि औरतें मेकअप की दुनिया से बाहर आकर अपने असली स्वरूप को जाने। इन कम्पनियों से मिलने वाले विज्ञापनों  के कारण मीडिया में स्त्री विशेष पर अलग से सामग्री छापी जाती रही है। मीडिया को स्वहित के बजाय समाज हित में इस सोच को बदलना होगा साथ ही पढ़ी लिखी महिलाओं को भी चाहिए कि वें स्त्रियों पर आधारित ऐसी पत्रिकाएँ लेने से बचें जो सिर्फ पति को खुश कैसे रखें या सास बहू का रिश्ता कैसे अच्छा हो या फिर लिपिस्टिक का कौन सा शेड आपकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देगा जैसी बातों से आपके  प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं। 

    लङकियाँ हर क्षेत्र में दखल दे रही हैं। बाहरी जगत से लगातार जुङती जा रही है ऐसे में इनके लिए जरूरी है कि ससुराल के परम्परागत तौर तरीकों में बदलाव हो। उसे पत्नी, बहू या अन्य रिश्तों में  बाँटकर उसके व्यवहार को परखा न जाए। रिश्ते थोपने का सिलसिला बंद होना चाहिए। यूँ भी पढ़ाई लिखाई हर रिश्ते को निभाने का सलीका देती है न कि ऐसी पत्रिकाओं में छपे आलेख। एक लङकी का जीवन विवाह के बाद प्रभावित न हो। उसे स्वाभाविक जीवन जीने की स्वतंत्रता मिल सके। इस दिशा में  मीडिया की भूमिका ऐसे माहौल को निर्मित करने में काफी कारगर सिद्ध हो सकती है। स्त्री पुरूष से जुङे असली मुद्दों पर समानरूप से चर्चा करनी आवश्यक है।

    आश्चर्यजनकरूप से अखबारों की पौरुष सोच गाहे बगाहे नज़र आती है। पत्रकारों द्वारा महिला हस्ती से किए जाने वाले प्रश्न इस माध्यम की संकीर्ण सोच को दर्शाती है

    यदि हम रोजमर्रा के संचार माध्यमों की नज़र से स्त्री को देखें तो वो कमज़ोर, बेबस, पीङित या उत्पीड़ित ही नज़र आती है

    बङा ताज्जुब होता है इस तरह की खबर पढ़ते हुए की मरने वालों में महिला, बच्चे और बुजुर्ग भी थे। इसका क्या मतलब है ये क्या कहना चाहते हैं। क्या औरतें भी बच्चों और वृद्धों के समान कमज़ोर होती है इसलिए उन्हें इनके साथ रखा जाता है। माना कि महिलाओं की शारीरिक बनावट पुरूष की तुलना में नाजुक प्रकृति की होती है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वें कमज़ोर होती हैं। समय आने पर वें अपनी शारीरिक ताकत का अहसास करा देती है। रानी  लक्ष्मीबाई, दुर्गावती जैसी अनेकों नारियाँ यौद्धा के रूप में इतिहास में दर्ज है।

    पिछले ओलम्पिक में हमारे देश की साक्षी, सिंधु, सानिया ने पुरूष प्रधान खेलों में जीत हासिल कर सबको चकित कर दिया था। स्त्री की सबसे बङी ताकत उसका मनोबल होता है। 

    ऐसे ही एक और खबर अकसर पढ़ने में आती है अकेली महिला पाकर वारदात को अँजाम दिया।

    इस तरह की खबरें पढ़कर हर महिला को अपने स्त्री होने का भय सताने लगता है उसका आत्मविश्वास कमज़ोर होता है। अकेले पुरूष के साथ भी घटना घटित हो सकती है किन्तु अखबारी नजरिया पूर्वाग्रह से ग्रसित होने से महिला के कमजोर होने को सार्वजनिक स्वीकारोक्ति प्रदान करता है। ऐसे में अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं और वे इस प्रकार के शिकार की फिराक में रहते हैं।

    मीडिया को ऐसी खबरें देने से रोकना होगा जो स्त्री को कमज़ोर करती है।

    अब कुछ मीडिया की संकीर्णता के नमूने 

    पिछले दिनों न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री माँ बनी। तब पत्रकारों ने उनसे प्रश्न किया कि आप नवजात बच्चे की माँ होने के साथ प्रधानमंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को कैसे निभाएंगी। इसके जवाब में वहाँ की प्रधानमंत्री ने औरतों में मल्टीटास्किंग जैसी खूबियों की बात कही। ऐसे ही कुछ समय पूर्व  भारत की महिला क्रिकेट की एक पूर्व कप्तान से पत्रकार ने जब यह पूछा कि आप किस पुरूष क्रिकेटर से प्रभावित है तो उसने जवाब दिया आपने कभी किसी पुरूष क्रिकेटर से इस तरह का प्रश्न किया कि वो किस महिला क्रिकेटर से प्रभावित है।

    एक ऐसा ही वाकया इन्दिरा गाँधी के साथ भी हुआ था जब उनसे पत्रकारों ने पूछा एक स्त्री होने के नाते आप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी कैसे निभाएंगी। तब श्रीमती गाँधी ने कहा था हमारे देश में पीएम, सीएम और डीएम होना महत्वपूर्ण हैं। इस पद पर स्त्री है या पुरूष मायने नहीं रखता। कहने का तात्पर्य यह है कि आज का मीडिया भी औरतों  की शीर्ष स्तर पर सामाजिक भागीदारी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा। इनके लिए वे खबरें ही महत्वपूर्ण होती है जिसमें महिला उत्पीड़न हो। ऐसी खबरों की अखबारों में तादाद इतनी ज्यादा होती है कि लगता है समाज में महिला अत्यधिक असुरक्षित है।

    मीडिया को स्त्री के प्रति हिंसा, दुराचार, दुर्व्यवहार के प्रति संवेदनशील होना चाहिए न की इसे सनसनीखेज बनाकर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

    संचार माध्यमों को सामाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए भूमिका तय करनी होगी व लिंगात्मक भेदभाव से मुक्त लेखनी द्वारा समाज को भी इस कोङ से मुक्त करना होगा।

    Vandana Dave

    पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

    फेसबुक पर मुण्डेर पेज संचालित 
    https://www.facebook.com/munderblog/

  • बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

    बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

    Tribhuvan

    इस धरती पर मानवता के ख़िलाफ़ जितने भी घृणित अपराध हैं, उनमें बलात्कार सबसे घिनौना और भयानक है। इसके ख़िलाफ़ अभी भारत सरकार ने जो कानून बनाया है, उसके एक हिस्से को पढ़ें तो लगता है कि हमारी सरकारों में संवेदना नामकी कोई चीज़ ही नहीं है। क्या किसी 30 साल या 40 साल की महिला के लिए बलात्कार 20 साल की उम्र से कुछ कम पीड़ादायी है? बलात्कार बलात्कार है और यह समान रूप से घृणित है। क्यों कानून बनाने वाले हमारे नेता बलात्कार को महिला की उम्र के हिसाब से टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटते हैं? वे क्यों भूल जाते हैं कि सबसे ज्यादा बलात्कार की शिकार महिलाएं 16 से 45 साल की उम्र की होती हैं और आत्मा की कराहों में उम्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बशर्ते नन्हीं बच्चों को अलग रखें।

    ये ठीक है कि हम सुकुमार बच्चियों के मामले में फांसी का प्रावधान करने जा रहे हैं, लेकिन 16 या 20 साल की उम्र के मामले में सज़ा को 10 साल और 20 साल में करने से हमारी सरकार के राजनेताआें और विधिवेत्ताओं की हृदयहीनता और अदूरदर्शिता साफ़ दिखती है। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि बलात्कार की शिकार महिला अपने त्रासद दु:ख को भूलने की कोशिशें करते हुए या तो कोमा में चले जाना पसंद करती है या फिर ऐमनेशिया की शिकार होना। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक बलात्कार पीड़िता निर्णय होेने तक झूठी ही मानी जाती है, जबकि न्यायाधीश के फ़ैसले में अपराधी ठहरा दिए जाने से पहले तक बलात्कार का अपराधी निर्दाेष या फिर आरोपी ही माना जाता है।

    किसी भी महिला के जीवन में यौवन के दिन एक खनकती भोर लेकर आते हैं। लेकिन घृणित मानसिकता वाले अपराधी उसके जीवन के सबसे सुखद क्षणों को रौंद डालते हैं। हमारी संस्कृति में आए दिन बच्चियों को शिक्षाएं दी जाती हैं, लेकिन लड़कों को सुसंस्कारवान बनाने की तरफ़ लोग ध्यान नहीं देते हैं। इसीलिए तो बलात्कार तरह-तरह से होता है। शारीरिक न सही, वह मानसिक भी होता है। हम देखते हैं कि बलात्कारी मानसिकता कभी आंख से, कभी हाथ से, कभी जिह्वा से और कभी कानून और संहिताओं के सहारे से बलात्कार करती है। कभी वह धर्म और जाति का सहारा लेती है तो कभी पद और प्रभाव का।

    कई बार तो यह भी होता है कि महिला को ही दाेषी ठहरा दिया जाता है। वे कहते हैं, आपने पारदर्शी वस्त्र पहन रखे थे। या उन्होंने पी रखी थी या फिर ड्रग्स ले रखी थीं। वे इसलिए रेप का शिकार हो जाती हैं कि वे पर्याप्त सावधानी नहीं बरततीं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि बलात्कार इसलिए होता है, क्योंकि कोई बलात्कारी होता है। यहां तक तर्क दिया जाता है कि यौनाकर्षण वाला सौंदर्य बलात्कार को जन्म देता है। लेकिन पिछले कुछ साल से बालिकाओं से बलात्कार की घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर डाला है। ऐसा लगता है कि हम एक अंधे कुएं पड़े समाज हैं और हमारी संस्कृति और सभ्यता किसी नींद में सोई हुई है। हमारे हौसले पस्त हैं और हमारे दिलोदिमाग़ में खामोश चीखें भर गई हैं। अपराधियों में न शासन का भय है और न ही पुलिस का ख़ौफ़। अपराधी किसी बालिका को निधड़क ले जा सकता है, क्योंकि हम बच्चियों से बचाने से ज़्यादा गाय को ले जा रहे व्यक्ति को मारने में दिलचस्पी रखते हैं और गाय वैसी की वैसी और उतनी ही तादाद में सड़कों पर भूखी रंभाती रहती है।

    यह देश ही ऐसा है। यहां न गाय के लिए कोई ठौर ठिकाना है और न ही बेटियों के लिए। ख़ासकर गु़रबत में जी रहे लोगों की हालत तो एक जैसी है। हमारी सरकारों के होश गुम हैं और बांहों का दम एकदम खत्म है। हम उनींदी आंखों वाले लोग सोए हुए पांवों के साथ कानून बनाते हैं और बलात्कारी को फांसी दिलाने की बातें करते हैं, लेकिन हमारी व्यवस्था की लौ इतनी बुझी हुई है कि बलात्कार के मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती। हमारी राजनीतिक पार्टियां और सरकारें एक नुमाइशी व्यवस्था सजा कर बैठी हैं और ऐसा आभास देती हैं कि वे एक मंतर फूंकेंगी तो सब कुछ बदल जाएगा।

    ये इस पीड़ा को समझने को ही तैयार नहीं है कि बलात्कार के बाद पीड़िता को जिस आंसू, सिसकी, पीड़ा, अवसाद, प्रतिहिंसा और आत्महीनता के मिलेजुले नारकीय लैबरिंथ से निकलना पड़ता है, वह एक बहुत जटिल, मुश्किल और असहनीय प्रक्रिया है। क्या इस पीड़ा के बाद किसी अपराधी को फांसी पर चढ़ा देने से भर से आप किसी महिला या बालिका को वैसा का वैसा जीवन दे सकते हैं? क्या वही हंसी उसके भीतर गूंजेगी? क्या उसकी रगों में दौड़ते लहू में थिरकने की आवाजें उसी तरह आएंगी? क्या वह फिर वैसी चुहल कर पाएगी?

    कई बार तो ऐसा होता है कि सरकारें और व्यवस्थाएं खुद बलात्कारों का आयोजन करती हैं। युद्ध क्या हैं‌? बार-बार सेना और अर्धसैनिक बलों का लगाया जाना क्या है? जहां सेनाएं और अर्धसैनिक बल तैनात होते हैं, क्या वहां बहुत ही सुनियोजित तरीके से बलात्कार नहीं करवाए जाते हैं? क्या इसीलिए स्थानीय समाजों में इन बलों के प्रति प्रतिहिंसा और घृणा के भाव नहीं होते हैं? दुनिया का कौनसा हिस्सा इस तरह के घृणास्पद पापों से बचा है?

    लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि पीड़िताएं चुप रह जाएं? बलात्कार जिस पावर के बल पर होता है, दरअसल यह लड़ाई उस पावर के ही खिलाफ़ है। बलात्कार करके अपराधी भी तो पावर ही दिखाता है। बलात्कारी से तो कोई महिला बचकर भी भाग सकती है, लेकिन जब बल एकत्र होकर सुनियोजित नृशंसता दिखाता है तो यह त्रासद कोरस होता है।

    मेरा प्रश्न इतना सा है कि बलात्कारी को फांसी देने के बजाय उसकी आखिरी सांस तक नारकीय ढंग से सड़ाया जाना चाहिए, क्योंकि किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह किसी अन्य को ऐसी पीड़ा पहुंचाए। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि हमारी सरकार पीड़िता के लिए कोई ऐसी व्यवस्था करे, जिससे वह अपनी पीड़ा और त्रासद अनुभव को विस्मृत कर सके। उससे मुक्त हो सके। वह अवसाद के भंवर से बाहर निकल सके। वह ऐसा जीवन जिए कि कभी भी उसकी यादों की तहों में दर्द का कोई कांटा न उगे। उसे एक खुला और हवादार जीवन मिले। उदासियां उसकी हदों से दूर रहें। वह एक अच्छे जीवन के तारों तले झूम सके और अपनी उमंगों को लहरा सके। वह प्रसन्नताओं के समंदर में डुबकियां लगा सके और जब मन चाहे तो दमकती रेत पर जिजीविषा की रेत में अपनी आत्मा को सेक सके।

    हर पीड़िता को हक़ और अधिकार है कि वह खनकती भोर को अपने भीतर फिर लौटा सके। और इसका एक मात्र तरीका यह है कि उसके जिस्मानी घावों के साथ-साथ उसकी आत्मा पर लगे अनचीन्हे घावों पर प्रेम की मरहम लगा सकें। हम प्रेम की ऊष्मा के बिना यह सब प्राप्त नहीं कर सकते।

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  • प्यारी बर्फ़ तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो

    प्यारी बर्फ़ तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो

    Dharamraj Singh

    कहो धूप
    मैं हूँ जमी बर्फ़
    ठंडी पत्थर सी
    ऊब गई हूँ बिना हिले डुले
    छुपी लुकाई अपनी ही खोह में
    तुम छितराए हो दूर दूर तक
    क्या कोई जीने का और ढंग है
    एक रंग भर जाना मैंने
    क्या मेरा कोई और रंग है
    घेरे रहती मुझको मृत सी चुप्पी
    क्या मेरे कंठ में भी छुपा कोई राग है
    क्षण भर को भी होता क्या खिलना कोई
    किसी स्वाद का इतराना
    प्राणों सा उतरना किसी में
    किसी हृदय को छका पाना
    कहो धूप
    क्या मेरा परिचय मेरे जीवन से
    तुम दे सकते हो

    प्यारी बर्फ़
    तुम्हें जानना है कि तुम कौन हो
    जस की तस तुम्हें
    मेरे सम्मुख रहना होगा
    क्या छिपा है तुम्हारे होने में
    हो जानना
    तो तुम्हें गलकर मिटना होगा
    तुम्हारा आपा जब गल जाएगा
    कुछ होगा
    जिसका तुमको कोई बोध नहीं

    तुम्हारा अपना रंग छिन जाएगा
    पर धान के खेत में तुम धानी होगी
    तुम्हारे अपने गीत न होंगें
    पर तुम्हारे गुज़रने भर से
    घाटियों में कलकल होगी
    बुरुँश के पेड़ों की जड़
    जब तुम छू दोगी
    उनके सुर्ख़ फ़ूल आकाश में खिलेंगें
    भले तुम्हारा अपना स्वाद न हो
    तुमसे सींचे जाने पर ही तो
    कैंथ कसैला होगा
    तुम्हारा अपना ठौर हो न हो
    तुम्हारी बिछाई गीली रेत पर
    मीठे तरबूजों की बेल पसरेगी

    हिरन के बच्चों के प्यासे गलों को तर कर
    जब तुम उनके भीतर जाओगी
    उनकी कुलाँचें बाहर आएँगी
    और शाख़ों से जब चिड़ियाँ भर्र भरेंगी
    उनके डैनों को ताक़त
    उनके पेट में तुम्हारे हिंडोले से आएगी
    कछुआ मछली घड़ियाल
    न जाने कितने जीव जंतु
    तुमसे अनभिज्ञ होकर भी तुममें होंगे
    तुम उनका प्राण रहोगी
    महुए के फूल की मादक रस सुगंध
    महुए के पोरों में बसी तुम्हारी ही छलाँग होगी
    कितने भी सूखे पत्थर हों
    तुम उनको भी गीला कर पाओगी
    तुम्हें अपनी क़ीमत की ख़बर तब सबसे ज़्यादा होगी
    जब तुम इंसान को देखोगी
    जिसकी आँखों के कोरों तक में
    पानी सूख गया है

    अपना पूरा जीवन जीकर एक दिन तुम
    उस महासागर से मिलोगी
    जिसकी तुम्हें अभी ख़बर नहीं
    और कौन जाने
    तुम हवाओं पे सवार बादल बन
    अनंत उड़ान को ही निकल पड़ो
    तुम मानो न मानो मैं देखता हूँ
    तुम्हारा वह जीवन भी है
    जो पूर्णतया मुक्त और अकलुषित है
    बहुत कुछ होगा पर प्यारी बर्फ़
    तुम न होगी

    शिक्षाएँ कहती हैं
    क्या तुम मेरे समक्ष ऐसे हो सकते हो
    बिना व्याख्या
    जैसे होती है बर्फ़ धूप के
    क्या मुझे अनुमति है
    तुम्हारे हृदय में उतरने की
    जैसे उतरती है धूप बर्फ़ में
    मेरी उपस्थिति पर
    तुम्हारे हृदय में उपजी कीमिया
    क्या तुम्हें बूँद मात्र भी द्रवित कर गई हैं
    और तुम्हें अंतर्दृष्टि है
    उस अनपेक्षित महारास की
    जो समूल मिटने पर पसरता है
    यदि तुम सहर्ष तैयार हो मिटने को
    तो तुम्हारी धन्यता की तो कौन कहे
    तुम बड़वानल होगे
    मनुष्य मात्र के दुःख समुद्र का

    Dharamraj Singh

  • क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण  उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    गत 14 अप्रैल को पूरे देश में लगभग सभी राजनैतिक दलों और समूहों ने डॉ भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती जोरशोर से मनाई। परन्तु इस मौके पर भाजपा का उत्साह तो देखते ही बनता था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कांग्रेस, अंबेडकर की विरोधी थी और उसने उन्हें कभी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार ने जितना सम्मान अंबेडकर को दिया है, वैसा किसी और सरकार ने नहीं किया।

    जहाँ तक अंबेडकर पर कब्जा करने के अभियान का सम्बन्ध है, भाजपा, कई स्तरों पर काम कर रही है। पहला, वह यह प्रचार कर रही है कि कांग्रेस, अंबेडकर के विरुद्ध थी और दूसरा, कि भाजपा उनके नाम पर भीम जैसे एप जारी कर और पार्टी  के नेता दलितों के साथ उनके घरों में भोजन कर उन्हें सम्मान दे रहे हैं। इन दिनों अंबेडकर को सम्मान देने की होड़ मची हुई है और इस मामले में भाजपा ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। परन्तु क्या भाजपा की नीतियाँ सचमुच उन सिद्धांतों के अनुरूप हैं, जो अंबेडकर को प्रिय थे? सम्मान का क्या अर्थ है? क्या किसी महान व्यक्ति की प्रशंसा में गीत गाना उसका सम्मान है या उसके सामाजिक व राजनैतिक योगदान को मान्यता देना?

    यह कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जहाँ तक विश्वदृष्टि और विचारधारा का प्रश्न है, भाजपा और अंबेडकर में कोई समानता नहीं है। भाजपा दो जुबानों में बोलने में माहिर है। पार्टी के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस ने अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया। हम सब जानते हैं कि जाति प्रथा की बेड़ियों को काटने के अंबेडकर के संघर्ष से प्रभावित होकर ही महात्मा गांधी ने अपना अछूत प्रथा विरोधी अभियान चलाया था। यह अंबेडकर को सम्मान देने का सही और असली तरीका था। यद्यपि, अंबेडकर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, परंतु फिर भी, उन्हें नेहरू केबिनेट में शामिल किया गया और कानून जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। कांग्रेस ने अंबेडकर के सरोकारों को गंभीरता से लिया और उन्हें संविधानसभा की मसविदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। नेहरू और कांग्रेस, दोनों सामाजिक सुधार के हामी थे और नेहरू के कहने पर ही अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया था, जिसका भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस ने जबरदस्त विरोध किया था।

    भाजपा का अंबेडकर के प्रति दृष्टिकोण क्या था? सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भाजपा, 1980 में अस्तित्व में आई। उसके पहले उसका पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ (1952) और उसका पितृसंगठन आरएसएस (1925), राजनीति में सक्रिय था। इन तीनों ही संगठनो की मूल विचारधारा हिन्दू राष्ट्रवाद की थी। सभी नाजुक मोड़ों पर आरएसएस ने विचारधारा के स्तर पर अंबेडकर का विरोध किया। जब भारतीय संविधान का मसविदा संविधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया, उस समय आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ (30 नवंबर 1949) ने लिखा, ‘‘भारत के नए संविधान में सबसे बुरी बात यह है कि उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है…उसमें भारत की प्राचीन संवैधानिक विधि का एक निशान तक नहीं है। ना ही उसमें प्राचीन भारतीय संस्थाओं, शब्दावली या भाषा के लिए कोई जगह है…उसमें प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की तनिक भी चर्चा नहीं है। मनु के नियम, स्पार्टा के लाईकरगस और फारस के सोलन के बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनु के नियम, जिन्हें मनुस्मृति में प्रतिपादित किया गया है, पूरी दुनिया में प्रशंसा के पात्र हैं और भारत के हिन्दू, स्वतःस्फूर्त ढंग से उनका पालन करते हैं और उनके अनुरूप आचरण करते हैं। परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इस सबका कोई अर्थ ही नहीं है‘।

    इसी तरह जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया, उसके बाद इन संगठनों ने उन पर अत्यंत कटु हमला बोल दिया। आरएसएस मुखिया एमएस गोलवलकर ने इस बिल की कड़ी आलोचना की। अगस्त 1949 में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा कि अंबेडकर जिन सुधारों की बात कर रहे हैं ‘‘उनमें कुछ भी भारतीय नहीं है। भारत में विवाह और तलाक आदि से जुड़े मसले, अमरीकी या ब्रिटिश माडल के आधार पर नहीं सुलझाए जा सकते। हिन्दू संस्कृति और विधि के अनुसार, विवाह एक संस्कार है, जिसे मृत्यु भी नहीं बदल सकती। विवाह एक समझौता नहीं है, जिसे किसी भी समय तोड़ा जा सकता है‘‘। उन्होंने आगे कहा, ‘‘यह सही है कि देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू समाज की नीची जातियों में तलाक का रिवाज है परंतु इस आचरण को ऐसा आदर्श नहीं माना जा सकता, जिसका पालन सभी को करना चाहिए‘‘ (आर्गनाईजर, सितंबर 6, 1949)।

    भाजपा, एनडीए गठबंधन के सहारे सन् 1998 में सत्ता में आई। उस समय एनडीए सरकार की केबिनेट के एक महत्वपूर्ण सदस्य अरूण शौरी ने अंबेडकर की अत्यंत तीखी निंदा की थी।  वर्तमान सरकार के मंत्री यद्यपि अंबेडकर की मूर्तियों और चित्रों पर माला चढ़ाते नहीं थक रहे हैं परंतु एक केन्द्रीय मंत्री अनंतकृष्ण हेगड़े ने खुलेआम यह घोषणा की है कि भाजपा, संविधान को बदलना चाहती है। अंबेडकर, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता के जबरदस्त पक्षधर थे परंतु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा झूठ है। भाजपा की रणनीति यही है कि वह एक ओर बाबासाहेब की शान में कसीदे काढ़ती रहे तो दूसरी ओर जाति और लैंगिक समानता के उनके सिद्धांतों को कमजोर करती रहे। बाबासाहेब के विचार क्या थे, यह इसी से स्पष्ट है कि उन्होंने उस मनुस्मृति का दहन किया था, जिस पर संघ परिवार घोर श्रद्धा रखता है।

    अंबेडकर, जाति के उन्मूलन के हामी थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि जाति, सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इसके विपरीत, आरएसएस,जातियों के बीच समरसता की बात करता है और यही कारण है कि उसने दलितों में काम करने के लिए सामाजिक समरसता मंच गठित किए हैं। जहां तक जाति के उन्मूलन का प्रश्न है, उस पर संघ परिवार मौन धारण किए हुए है।

    भाजपा की राजनीति के केन्द्र में हैं भगवान राम। अगर भाजपा सचमुच अंबेडकर का सम्मान करती होती तो क्या वह भगवान राम को अपनी राजनीति का मुख्य प्रतीक बनाती? भाजपा ने भगवान राम के नाम का प्रयोग कर आम हिन्दुओं को गोलबंद करने का हर संभव प्रयास किया। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या में राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है। आजकल रामनवमी का त्यौहार बहुत उत्साह से मनाया जाने लगा है और इस दौरान हथियारबंद युवा जुलूस निकालते हैं। वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि ये जुलूस मुसलमानों के इलाकों से जरूर गुजरें। अंबेडकर, राम के बारे में क्या सोचते थे? वे अपनी पुस्तक‘रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म‘ में राम की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने शम्बूक को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि वह शुद्र होते हुए भी तपस्या कर रहा था। इसी तरह, राम ने पेड़ के पीछे छुपकर बाली की हत्या की। अंबेडकर, राम की सबसे कटु आलोचना इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया और सालों तक उसकी कोई खोजखबर नहीं ली।

    अंबेडकर के चित्रों और उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण करके अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया जा सकता। उन्हें सम्मान देने के लिए यह जरूरी है कि हम मनुस्मृति की उनकी आलोचना को स्वीकार करें, भारतीय संविधान के मूल्यों को सम्मान दें और समर्पित भाव से धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के लिए काम करें। भाजपा की नीतियों ने दलितों के विरूद्ध पूर्वाग्रह में वृद्धि की है और उनके खिलाफ हिंसा भी बढ़ी है। पिछले चार साल इसके गवाह हैं। गांधी, नेहरू और कांग्रेस, अंबेडकर से उनकी मत विभिन्नता के बावजूद अंबेडकर और उनके सरोकारों का सम्मान करते थे।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध को पता चल चुका था कि उनकी मृत्यु तय हो चुकी है. एक गरीब लोहार के घर जहरीला भोजन खाने से उनके शरीर में जहर फैलने लगा था. गौतम बुद्ध जहर को अपने शरीर में फैलता हुआ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत घोषणा करवाइ कि वे अब विलीन होने वाले हैं और यह गरीब लोहार भाग्यशाली है कि इसके घर अंतिम भोजन करके मैं विलीन हो रहा हूँ.

    यह बात सुनकर वो गरीब लोहार ग्लानी और पश्चाताप से रोने लगा, बुद्ध ने उसे प्यार से समझाते हुए उसकी सुरक्षा के इन्तेजाम किये. साथ में बुद्ध के जो शिष्य थे वे अपने गुरु की इस करुणा और महानता से प्रभावित हुए. जहरीला भोजन कराने वाले व्यक्ति के प्रति भी उनमे इतनी करुणा थी.

    इसी तरह एक बार और बुद्ध अपनी सुरक्षा की चिंता किये बिना एक खूंखार हत्यारे अंगुलिमाल के पास जाते हैं. उन्हें पता है कि वह डाकू उनकी ह्त्या कर सकता है लेकिन वे फिर भी उसे समझाने जाते हैं और अपने प्रेम और करुणा से उसे प्रभावित करके अपने साथ लेकर ही लौटते हैं.

    बुद्ध की मृत्यु के बाद इन जैसी हजारों घटनाओं का पता चलते ही बुद्ध के शिष्यों का नैतिक साहस नई बुलंदी पर पहुँच गया. जो गुरु करुणा की मुद्रा में मौत को गले लगा सकता है उसके शिष्यों में एक ख़ास किस्म की नैतिकता आ ही जाती है. यही नैतिक साहस एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक धर्म को जन्म देता है.

    सदियों बाद डाक्टर अंबेडकर के जीवन में भी इस तरह की चुनौतियाँ और दुःख आते हैं. वे बहुजनों (ओबीसी, SC/ST और स्त्रीयों) की मुक्ति के लिए अकेले लड़ रहे हैं. उनके नवजात बच्चे गरीबी, बीमारी के कारण एक के बाद एक मरते जाते हैं. हालत ये होती है कि अपने बच्चों के कफ़न खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं होते हैं. उनकी पत्नी अपनी साडी के टुकड़े से अपने पुत्र का कफन बनाती हैं.

    डॉ. अंबेडकर और उनकी पत्नी इतनी विपन्नता, अपमान और दुःख के बावजूद न तो झुकते हैं न रुकते हैं और न कोई समझौता करते हैं. वे चाहते तो एक वकील या स्टॉक एक्सचेंज सलाहकार की तरह चुपचाप प्रेक्टिस करके मजे से सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे.

    एक अन्य अवसर पर महाराष्ट्र में कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान डॉ. अंबेडकर अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ खुद भी लाठी खाते हैं, उन पर जानलेवा हमला किया जाता है. इस सबके बीच वे अपने मित्रों अनुयायियों को छोड़कर भागते नहीं हैं. अपने मिशन में एक विराट नैतिक बल और नैतिक साहस लिए आगे बढ़ते हैं. उनके बाद हजारों बहुजन आन्दोलनकारियों को इन कहानियों ने प्रभावित किया और तैयार किया है.

    इसी तरह ओबीसी माली समाज से आने वाले ज्योतिबा फुले हैं, उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले हैं जिन पर हमले होते हैं वे भी भयानक गरीबी में बहुजन मुक्ति के लिए और शुद्रातिशुद्रों और स्त्रीयों की मुक्ति के लिए काम करते थे. वे कभी अपने लोगों को छोड़कर नहीं भागे न ही किसी के आगे झुके.

    * * *

    वहीं दुसरी तरफ अपने शरीर में बुद्ध के अवतरण की घोषणा करने वाले ओशो रजनीश को देखिये.

    ओशो रजनीश एक गाल पर चांटा पड़ने पर के बदले दोनों गाल नोच लेने की शिक्षा देते हैं. भारत की सरकार को आँख दिखाते हैं. अमेरिका को “फक यू” “गो टू हेल” कहकर चुनौती देते हैं. लेकिन जब भारत सरकार और अमेरिकी सरकार से निर्णायक लड़ाई का क्षण आता है तो पहले भारत में रातोरात अपने शिष्यों को अकेला छोड़कर भाग जाते हैं और दुसरी बार अमेरिका में अपने शिष्यों को अकेला मरने के लिए एक रात चुपचाप प्लेन में बैठकर उड़ जाते हैं.

    इस भयानक अंतर पर गौर कीजिये. श्रमण परम्परा के, बहुजन परम्परा के महापुरुष एक नैतिक साहस और इमानदारी के साथ अपने शिष्यों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं. और दुसरी तरफ व्यापारी बुद्धि के ब्राह्मणवादी बाबा लोग सिद्धांतों की जलेबी बनाते हुए अपने ही शिष्यों का शोषण करते हैं और जरूरत पड़ने पर छोड़कर भाग जाते हैं.

    इसीलिये उनके शिष्यों में कोई नैतिक साहस और कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं पैदा होता.

    इस विस्तार में देखने के बाद आप समझ सकेंगे कि क्यों बुद्ध, फूले और अंबेडकर के शिष्यों में एक नैतिक साहस और स्पष्टता होती है और वे सब कुछ सहकर भी अपना आन्दोलन आगे बढाए जाते हैं.

    इससे ये भी समझ में आयेगा कि क्यों साबुन तेल शेम्पू या ध्यान, समाधि बेचने वाले भगोड़े बाबाओं के शिष्यों में एक अवसरवादिता, कायरता और अस्पष्टता होती है, और ऐसे भगोड़े बाबाओं के शिष्य क्यों कुछ नहीं कर पाते हैं. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

    मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

    Tribhuvan

    लोग उसे स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेम नहीं करते, क्योंकि वह विदेशी भाषा में विदेशी लोगों को प्रसन्न करने के लिए विदेशी धरती पर नहीं गया था। उसे जब केशवचंद्र सेन ने कहा कि आप विदेश होकर आ जाएंगे तो भारत में आपको अपार सम्मान मिलेगा तो उसने कहा : पहले मैं अपने घर का अंधेरा दूर कर लूं। समय बचा तो वहां भी जाऊंगा। यह विचित्र साधु कोई और नहीं, दयानंद सरस्वती था। कबीर और मार्टिन लूथर के बाद यही साधु इस धरती पर हुआ, जिसने धार्मिक पाखंडों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। और साबित किया कि किस तरह मंदिर और मूर्तियां देश के पतन का कारण बन रही हैं।

    वह इस देश के कोने-कोने में घूमा। अफ़गानिस्तान के उस किनारे से लेकर बर्मा की सीमा तक वह गया। वह हर धर्म के भीतर तक गया। ज्ञान की थाह ली। वह हर धर्मग्रंथ की थाह लेने की कोशिश करता रहा। उसने मंदिरों में ईश्वर को तलाशने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हर जगह पतन और अंधेरे के दर्शन हुए। यह देखकर उनका खून खौल उठा और उन्होंने ऐसे समय में मंदिरों और मूर्तियों के खिलाफ़ आवाज उठाई जब देश में न आज जैसी चेतना थी और न हालात।

    दयानंद सरस्वती ने 1875 के आसपास ही अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश लिख दिया था। इसके 11वें अध्याय में उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को अध्यात्म के बजाय 16 बुराइयाों का कारण बताया और कहा कि ये विनाशकारी चीज़ें हैं। मंदिरों को उन्होंने भ्रष्टाचार और व्यभिचार का केंद्र बताया। उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर मंदिरों और साधुओं के हालात देखे और समझे थे और उनके बारे में बहुत खुलकर लिखा। हालांकि उनके इन विचारों के कारण ही एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने उन्हें दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया था और उसी से स्वामी जी की मृत्यु हो गई थी। लेकिन आखिरी समय तक दयानंद सरस्वती ने मंदिरों-मूर्तियों के नाम पर चलने वाले गलत चीज़ों पर बहुत मुखर होकर आवाज़ उठाई थी।

    स्वामी जी ने मंदिरों और मूर्तिपूजा की 16 बुराइयां भी गिनाईं, जिनसे देश आज भी दो-चार हो रहा है। उनका कहना था, इससे मन-मस्तिष्क में जड़ता आ जाती है। धन का अपव्यय और दुरुपयोग होता है। मंदिरों में अपार चढ़ावा और धन आने से व्यभिचरण और दुराचरण बेरोकटोक फैलता है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा कि मंदिर-मूर्तियां देश की एकता को खंडित करने का कारण बन सकती हैं, जो कि हम राममंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण में देख ही रहे हैं। उनका तर्क था कि इससे पर्यावरण का भारी विनाश होता है और लोगों के समय, संसाधन और शक्ति का तो यह अपव्यय है ही। सिर्फ़ इसे ही भक्ति का कारण मान लेने से मनुष्य सच्चे आध्यात्मिक मार्ग से दूर हो जाता है और इस तरह वह धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म की राह पकड़ लेता है।

    यह सही है कि मंदिर और मूर्ति के प्रति बहुत से लोगों की आस्थाएं जुड़ी होती हैं और सब मंदिरों में व्यभिचार भी नहीं होते। लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आज से 143 साल पहले जो आशंका व्यक्त की थी, वह आसिफा जैसी सुकुमार बेटी के साथ हुए नृशंस कांड और शंभु की रामनवमी के दिन शोभा यात्रा की घटनाओं से बहुत सच साबित होती है। आखिर आसिफा के पिता ने भी तो सहज ही उत्तर दिया कि वे कितनी ही बार बेटी को ढूंढ़ते हुए मंदिर के पास से निकले, लेकिन यह सोचकर कभी भीतर नहीं गए कि इस पवित्र स्थल पर उसे कोई क्यों लेकर जाएगा! दयानंद का कहना था कि धर्म का उद्देश्य है अहंकारों और सभी तरह की बुराइयों का आत्म विसर्जन। न कि लोगों को लूटना-खसोटना। उनका कहना था कि मंदिरों के निर्माण से बेहतर है कि अाप सुदूर आबादियों में लोगों के भले के लिए ऐसे विद्यालय खोलें, जहां से विवेकी बनने की शिक्षा मिले। सत्यार्थप्रकाश में एक जगह जब कोई सनातन धर्म के सबसे बड़े उदघोष गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु वाला श्लोक पढ़ता है तो वे कहते हैं : गुरु कोई ब्रह्मा-व्रह्मा नहीं होता। गुरु अगर कामी-क्रोधी हो तो उसे समझाना, दंड देना और फिर भी न माने और कामुकता दिखाए तो मृत्युदंड दिलवा देना चाहिए। क्योंकि गुरु एक संस्था है।

    उनके लिए धर्म एक पाखंड मुक्त जीवन जीने की पद्धति है। समस्त संसार से प्रेम करने की एक प्रक्रिया। अपने झूठ और असत्य का परित्याग करने की और सत्य और आलोक को अपने भीतर समेट लेने की। वे ख्याति और मूर्तिस्थापना के बहुत विरोधी थे। इसलिए उन्होंने कहा था कि आप सब मेरे पदचिह्नों पर मत चलो। सच की तलाश करो और उसे आत्मसात करो। उनका कहना था कि जिस तरह बिना मनुष्य ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किए बिना अंधेेरे और अविद्या का शिकार हो जाता है, उसी तरह धर्म के नाम पर मंदिर और मूर्तियां मनुष्य को अंधकार और अविद्या के मार्ग पर ले जाती हैं। उन्होंने अपनी मूर्ति या चित्र प्रकाशित करवाने के लिए भी वर्जनाएं की थी। वह बुरे लोगों और बुराइयों से अंतिम क्षण तक लड़े। काशी में पंडितों को चुनौती दी तो हरिद्वार में पाखंड खंडिनी गाड़ी। लोगों ने उन्हें बहुत चेताया, लेकिन उनका कहना था कि बुराइयों का विरोध करने में तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए। एक भी इंच नहीं। वे अंतिम समय के अंतिम क्षण तक जीवंत बने रहे और मंदिरों-मठों और मूर्तियों को धर्म के विनाश और मानवता के पतन का कारण बताते रहे।

    मैं अपने पिता के पास बैठकर अपने स्कूली दिनों में सोचा करता था कि दयानंद के विचार रात के अंधकार में बिजली की कौंध की तरह हैं और वे भारत को सभी तरह के धार्मिक पापों से मुक्ति दिला देंगे। वे मेरी कच्ची उम्र के दिन थे। मुझे उन दिनों आर्यसमाज मंदिरों में आते साधु और विभिन्न भजनोपदेशक ऐसे बांस के पेड़ लगते थे, जिनसे कुछ दिनों में बांसुरियां बनेंगी और वे चेतना और विवेक की स्वरलहरियों से भारत की धरती को ही नहीं, समूचे विश्व को गुंजायमान बना देंगी। मेरे मानस पटल पर चेतना का आलोक झिलमिलाने लगा था। मुझे लगता था कि अभी कुछ ही समय बाद इस देश के समस्त कोने विवेक से दमक उठेंगे और समस्त शिक्षित लोग अंधेरों से लड़ रहे होंगे। लेकिन अब जब सच का वह स्वप्न भंग हुआ है तो देखता हूं कि जिस साधु ने मंदिरों, मूर्तियाें और सांप्रदायिकता (हिन्दी में यह शब्द सबसे पहले दयानंद सरस्वती ने ही प्रयुक्त किया था) के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी थी, उसी के वनोद्यान के बांस आज मूर्तियों, मंदिरों और सांप्रदायिकों के हाथों की कुल्हाड़ियों के दस्ते बने हुए हैं। वे अगर बांसुरियां बने होते तो शायद आज किसी आसिफा के साथ देश की सबसे पवित्र भूमि के मंदिर में ऐसा न केवल ऐसा नहीं होता। ऐसा करने वालों के समर्थकों का तो तत्काल ही शिरोच्छेन ही कर दिया जाता!



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  • …. और डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए :: अम्बेडकर व गांधी –Prasanna Prabhakar

    …. और डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए :: अम्बेडकर व गांधी –Prasanna Prabhakar

    Prasanna Prabhakar

    गांधी जी की हत्या हो चुकी थी। उसके कुछ समयोपरांत बाबा साहब ने एक ब्राह्मण डॉ सविता कबीर से पुनर्विवाह किया। घटना उसी समय की है।

    डॉ अम्बेडकर ने कर्नाट प्लेस, दिल्ली के खादी भण्डार के पास प्यारेलाल को खड़े देखा। वह कार से उतर गए और सीधा उनके पास पहुंचे। बोले – यदि बापू जीवित होते तो वह जरूर इस विवाह को अपना आशीर्वाद देते। कहते-कहते डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए। हम उन्हें समझ नहीं सके- उन्होंने कहा।

    गांधी जीवित होते तो अम्बेडकर को शायद ही 1952 में रिपब्लिकन पार्टी बनाने नौबत पड़ती। गांधी की हत्या के बाद सामाजिक सुधारों के लिए जमीन पर काम करनेवाला अम्बेडकर के सिवा कोई बड़ा नाम शेष नहीं था।

    6 सितम्बर 1954, शायद अम्बेडकर ने महात्मा को इतनी बड़ी श्रद्धांजलि कभी न दी थी। राज्य सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा – “हम सभी जानते हैं कि दलित उनके निकटतम और प्रियतम थे। ” . (नमक पर कर लगाते हुए, उसे अनटचेबल सोसाइटी फण्ड में डालने की बात थी; संविधान सभा)

    राजनैतिक लाभ हेतु अक्सर विरोधाभासों को हवा दी जाती है। ऐसे में बहुत कुछ छुप जाता है।

    आज़ादी के बाद अम्बेडकर और गांधी, विरोधी नहीं (जैसा दिखाया जाता रहा है), बल्कि एक दूसरे के पूरक थे। असमय हत्या से भारतवर्ष ने बहुत कुछ खो दिया। अम्बेडकर भी कहाँ ज्यादा जी सके।

    अम्बेडकर जी भी बदले और गांधी जी भी। अम्बेडकर ने यह बात इसलिए कही होगी क्योंकि गांधी जी का यह निर्णय था कि वह केवल उसी विवाह को आशीर्वाद देंगें जिसमें एक पक्ष हरिजन हो। स्वर्गीय नारायण देसाई जी के विवाह में इसलिए ही नहीं गए जबकि वह अनन्य सहयोगी श्री महादेव देसाई के पुत्र थे।

    यह अलग बात है कि अपने चुने मार्गों से दोनों ही न डिगे। राजनीति भी पर्दा डालती है। वर्तमान लक्ष्य चुनिंदा बातों को ही उठाते हैं।

    बाकी नफरत की बातों को हवा देने के लिए मटेरियल मिल ही जाता है।

    4 साल पहले एक किताब पढ़ी थी- डॉ डी आर नागराज की द फ्लेमिंग फ़ीट (the flaming feet and other essays)। लेखक कर्नाटक के एक दलित समुदाय से ही सम्बद्ध थे। किताब गांधी-अम्बेडकर से शुरू होकर वर्तमान दलित राजनीति पर खत्म होती है।

    किताब के केंद्र में एक घटना है। पूना पैक्ट के बाद गांधी जी को अनशन तोड़ना है। एक दलित लड़के के हाथ से पानी पीने के बाद प्रतीकात्मक रूप से इस समय का चयन किया गया। वह लड़का नहीं आता है। बाद में पत्र लिखकर क्षमा माँगतें हुए यह बताता है कि वह चाहते हुए भी अपने समुदाय की भावना के विरुद्ध नहीं जा सकता। 
    डॉ नागराज भारत में दलित राजनीति का प्रारंभ यहीं से बताते हैं।

    मुद्दा स्व शुद्धिकरण और आत्मसम्मान के मध्य अटक गया। जरूरी दोनों थे और हैं।

    एक के आरोपों में यह था कि दूसरा केवल स्व शुद्धिकरण की बातें कर रहा है जबकि ऐसा नहीं था। तो दूसरे के अनुयायी केवल साथ खाकर और बैठकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते थे। ऐसे में अम्बेडकर का यह सोंचना सही ही था कि इससे दलित लीडरशिप उभरकर सामने नहीं आती। रिप्रजेंटेशन की बात करना अनायास ही नहीं था।

    अम्बेडकर उस परंपरा से भी परिचित होंगे जो जाति व्यवस्था को आध्यात्मिक रूप से नकारती थी…योगी, साधु, नाथपंथी ..

    मगर यह केवल आध्यात्मिक रूप से सिमटी रह गईं। राजनीति और समाज के दायरे में अधिक प्रभाव नहीं डाल सकी। एक विचार कहता है कि जाति का सुदृढ़ होना उपनिवेशवाद की देन है। यदि यह परंपरा इतनी ही प्रभावी होती तो इस दौरान इसका योगदान क्या रहा? निश्चित रूप से राजनीति हावी थी और राजनीति ही इसका इलाज ढूंढा गया।

    इसलिए यह प्रयोग अभिनव था। अपने को अलग दिखाने की प्रवृति आई। गांधी समझ चुके थे इसलिए संदर्भित समुदाय के आर्थिक स्वालम्बन के लिए तत्पर हो गए। वह भी स्वतंत्रता समर के बीच। स्वराज और स्वतंत्रता , कुछ तो फर्क होगा।

    नागराज आगे लिखते हैं कि दलित मूवमेंट का ओरिजिन दो ध्रुवों के मिलन में था। एक था ट्रान्सेंडैंटल आस्पेक्ट जो कास्ट ईगो से भिड़ता और दूसरा शिक्षा और जॉब में अवसर का मामला।

    अम्बेडकर ने दूसरे को पकड़ा। सिर्फ दूसरे को। गांधी ने हालांकि दोनों पर कोशिश की। लेकिन उनका जोर जॉब को ही सम्माननीय बनाने पर था । उनकी शिक्षा पद्धति में तो सवर्णों के लिए भी यही संदेश रहा। बाद में दोनों एक दूसरे की ओर बढ़े।

    नागराज कहते हैं कि दोनों में कोई भी पूर्ण नहीं हैं। एक दूसरे के पूरक अवश्य हैं। आगे लिखते भी हैं कि आज दलित मूवमेंट सिर्फ दूसरे पर अटक गया है और पहले को दूर ही करता जा रहा है। एक क्लोज्ड सिस्टम बनता जा रहा है जिसके भुक्तभोगी अंततः ये स्वयं होंगे।

    आज वो अवश्य कहते कि पहलेवाले भी सिर्फ स्किल की एकविमीय बातें करते हैं।

    किताब अच्छी है। वर्तमान दौर की कास्ट आधारित राजनीति पर एक अभिनव दृष्टि डालती है।

    Prasanna Prabhakar

  • ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश पर जो नयी डॉक्युमेंट्री आई है उसे गौर से देखिये. शीला एक नादान किशोरी की तरह रजनीश से मिलती है. शीला के पिता रजनीश से प्रभावित हैं. शीला को उनके पिता कहते हैं कि ये व्यक्ति अगर लंबा जी सका तो ये दुसरा बुद्ध साबित होगा.

    हर किशोरी लड़की की तरह शीला भी अपने पिता के इन बाबाजी के प्रति समर्पण से स्वयं भी प्रभावित होती हैं. कुछ मुलाकातों के बाद वो स्वयं भी रजनीश को अपना सर्वस्व समर्पित करके उनके लिए काम करने लगती हैं. बाद में शीला एक नए एम्पायर को खड़ा करने के लिए एक शातिर संगठन की रचना और संचालन करती हैं. ये संगठन अमेरिका में स्थानीय नागरिकों और कानून व्यवस्था के लिए भारी चुनौतियाँ खड़ी करता है.

    अंत में रजनीश को भी कहना पड़ता है कि शीला एक अपराधी हैं और ईर्ष्यालु महिला है, शीला ने जो कुछ किया वह शीला की जिम्मेदारी है मेरी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है. फिर ओशो रजनीश शीला पर लाखों डालर्स के गबन का और हत्याओं के षड्यंत्र का आरोप लगाते हैं और फिर शीला कानूनी पचड़ों से बचने के लिए जर्मनी के जंगलों में शरण लेती हैं.

    आज भी वे स्विट्जरलैंड में ज्यूरिख के पास किसी गाँव में गुमनाम और अपमानित सा जीवन जी रही हैं और ओशो रजनीश के कारनामों का खुलासा करती रहती हैं. अगर ये बाबाजी इनके जीवन में न आये होते तो इनका जीवन अधिक शांतिपूर्ण और सम्मानित हो सकता था.

    यहाँ इस प्रसंग में दो बातों पर गौर कीजियेगा.

    सबसे पहली और बड़ी बात ये कि शीला के पिता और शीला स्वयं ओशो रजनीश को “दुसरे बुद्ध” के रूप में देख रहे हैं. वे असल में ओशो रजनीश से नहीं बल्कि बुद्ध की महिमा से प्रभावित हैं और इसीलिये वे बुद्ध की तरह होने का दावा करने वाले ओशो के निकट आ रहे हैं. बाद में शीला जब ओशो रजनीश की हकीकत जानतीे हैं तब वे आश्चर्यचकित रह जाती हैं.

    दुसरी बात इस उदाहरण में यह दिखाई देती है कि ओशो रजनीश जैसे वेदांती धूर्त बाबा लोग किस तरह देश और दुनिया के प्रतिभाशाली लोगों को पहले बुद्ध और महावीर के निरीश्वरवादी श्रमण दर्शन की व्याख्या करके प्रभावित करते हैं और किस तरह बाद में उनसे पैसे बटोरने और अपराध करवाने का काम लेते हैं. बाद में इन्ही लोगों को दूध में गिरी मक्खी की तरह उठाकर फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कुछ संगठन आजकल भारत के युवाओं को दंगों में इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं.

    ये अध्यात्म बेचने वाले गुरु आजकल के जातीय और राजनीतिक दंगा करवाले वाले सांस्कृतिक संगठनों की चालबाजी से बहुत कुछ मिलते जुलते है. दोनों का तरीका बिलकुल एक जैसा है. किशोर और युवा लड़कों को धर्म संस्कृति और राष्ट्रवाद इत्यादि की बहस से प्रभावित करके उनसे दंगे करवाए जाते हैं शहर जलवाए जाते हैं और चुनाव जीते जाते हैं.

    इन दो बातों का बहुजन समाज के लिए और भारत की स्त्रीयों के लिए विशेष अर्थ है,

    अगर बुद्ध, आंबेडकर और लोहिया की प्रस्तावनाओं को आप अपना भविष्य बनाने के लिए या समाज और देश का भविष्य बनाने के लिए उचित समझते हैं तो आपको ओशो रजनीश जैसे बाबाओं और दंगा करवाने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों से बहुत सावधान रहना चाहिए, आप यहीं फेसबुक पर देख सकते हैं, ओशो रजनीश के अधिकाँश सन्यासी पक्के हिन्दुत्ववादी और ब्राह्मणवादी हैं.

    आजकल के दंगाई जिस तरह मासूम बच्चों को दंगों में झोंकते हैं उसी तरह ये बाबा लोग भी सरल मन के स्त्री पुरुषों को शातिर अपराधियों में बदल डालते हैं. शीला का उदाहरण एकदम आजकल के दंगों में बर्बाद हुए युवकों के उदाहरण से मिलता है.

    ये न सिर्फ व्यक्ति के मनोविज्ञान को तहस नहस कर देते हैं बल्कि एक समाज की नैतिकता और नागरिकता बोध को भी बर्बाद कर डालते हैं.

    एक अन्य बात आप गौर से देखिये, अभी इस देश में कितना शोषण दमन अपराध और षड्यंत्र चला रहा है. और इन जैसे बाबाओं के करोडो “अध्यात्मिक” और “ध्यानी” शिष्य इस देश में हैं. वे इस समाज में हो रहे इन बलात्कारों अपराधों और दंगों के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाते. वे दंगाइयों और बलात्कारियों के साथ खड़े हैं.

    ये “व्यक्तिगत मोक्ष” साधने वाले और ध्यान समाधि और बुद्धत्व का ढोल पीटने वाले लोग भारत के सबसे घिनौने और शातिर लोग हैं. ये अपने गुरुओं और राजनीतिक दलों की ही तरह अवसरवादी धूर्त होते हैं.

    भारत के ओबीसी, दलितों, आदिवासियों और स्त्रीयों (सभी बहुजनों) को इनसे दूर ही रहना चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    पिछले कुछ वर्षों से, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु की विरासत को नज़रंदाज़ और कमज़ोर करने के अनवरत और सघन प्रयास किये जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उनका नाम लेने से बचा जा रहा है और कई स्कूली पाठ्यपुस्तकों में से उन पर केन्द्रित अध्याय हटा दिए गए हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार की भारत छोड़ो आंदोलन पर केन्द्रित प्रदर्शनी में उनका नाम तक नहीं है। सत्ताधारी दल के प्रवक्ता,वर्तमान सरकार की असफलताओं के लिए नेहरू की नीतियों को दोषी ठहरा रहे हैं। सोशल मीडिया में उनके बारे में निहायत घटिया बातें कही जा रही हैं। यह बताया जा रहा है कि वे और उनके पुरखे अत्यंत विलासितापूर्ण जीवन जीते थे। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर, विभाजन और कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोषी ठहराया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि नेहरू ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया था।

    आईए, हम उद्योग, तकनीकी, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में नेहरू के योगदान पर नजर डालें और यह देखें कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनका क्या योगदान था। नेहरू, अंतर्राष्ट्रीय मामलों से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थे। वे पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के विरूद्ध चल रहे संघर्षों के समर्थक थे और नस्लवाद के कड़े विरोधी थे। वे सभी देशों की समानता के पक्षधर थे। जहां तक भारत का प्रश्न है, गांधीजी के जादू से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। कांग्रेस के अध्यक्ष बतौर उन्होंने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने की मांग की। वे केवल खादी पहनते थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और वे कुल मिलाकर 3,269 दिन जेल में रहे। वे एक जिज्ञासु पाठक और प्रतिभाशाली लेखक थे। उनकी आत्मकथा व उनके द्वारा लिखित ‘भारत एक खोज‘ और ‘पिता के पत्र, पुत्री के नाम‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य की अनमोल विरासत हैं। विभाजन का मुद्दा काफी उलझा हुआ था। अंग्रेज, इस देश को दो टुकड़ों में बांटने पर आमादा थे। वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि सावरकर ने काफी पहले द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया था और जिन्ना, अलग इस्लामिक देश की अपनी मांग पर अड़े हुए थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में से पटेल वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें यह अहसास हो गया था कि देश का विभाजन अपरिहार्य है। नेहरू को इस कड़वे सच को स्वीकार करने में कई और महीने लग गए। कश्मीर के मामले में पटेल ने जूनागढ़ में भाषण देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद पर अपना दावा छोड़ दे तो भारत, कश्मीर को उसका हिस्सा बनने देगा। शेख अब्दुल्ला के जोर देने पर नेहरू ने कश्मीर के महाराजा के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवाकर, भारतीय सेना को पाकिस्तानी कबाईलियों से मुकाबला करने कश्मीर भेजा।

    जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है, गांधीजी को देश ने यह अधिकार दिया था कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री को चुनें। गांधीजी को यह अहसास था कि नेहरू को वैश्विक मामलों की बेहतर समझ है और राजनैतिक दृष्टि से वे पटेल की तुलना में उनके अधिक योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध होंगे। जहां तक लोकप्रियता का सवाल है, नेहरू, पटेल से कहीं आगे थे। एक बार एक आम सभा में उमड़ी भारी भीड़ के बारे में पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर पटेल ने कहा कि लोग जवाहर को देखने आए हैं,उन्हें नहीं।

    आज सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने की नेहरू की नीति की आलोचना की जा रही है। यह नीति नेहरू ने अकारण और केवल अपनी इच्छा से नहीं अपनाई थी। बांबे प्लान (1944) के तहत उद्योगपति, सरकार से आधारभूत उद्योगों की स्थापना के लिए सहायता की अपेक्षा कर रहे थे। सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित आधारभूत उद्योगों ने देश की औद्योगिक प्रगति की राह खोली। नोबेल पुरस्कार विजेता पाल कुर्गबेन ने कहा था कि भारत ने तीस साल में जो हासिल किया है, उसे हासिल करने में इंग्लैंड को 150 साल लग गए थे। यह इसलिए हो सका क्योंकि गणतंत्र के शुरुआती वर्षों में नेहरू ने देश को एक मजबूत नींव दी।

    शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में उनकी नीतियों के कारण ही आज हम दुनिया के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं और भारत एक बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ, नेहरू ने शिक्षा और विज्ञान पर भी बहुत जोर दिया। आज अगर हम अपनी तुलना उन देशों से करें, जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए थे, तो हमें पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी के मामले में हम उनसे कहीं आगे हैं। नेहरू और अंबेडकर ने यह सुनिश्चित  किया कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अधीन नागरिकों में वैज्ञानिक समझ का विकास करने की जिम्मेदारी राज्य को सौंपी जाए। नेहरू ने नीति निदेशक तत्वों के इस हिस्से को मूर्त स्वरूप देते हुए आईआईटी, इसरो, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, सीएसआईआर इत्यादि जैसी संस्थाओं की नींव रखी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसी उत्कृष्ट संस्थाओं की स्थापना की गई।

    जब हम स्वाधीन हुए, उस समय देश की साक्षरता दर 14 प्रतिशत और औसत आयु 39 वर्ष थी। आज हम मीलों आगे निकल आए हैं, यद्यपि हमें और आगे जाना है।

    सामाजिक स्तर पर नेहरू बहुवाद के हामी थे और धर्मनिरपेक्षता को राज्य की मूल नीतियों का हिस्सा मानते थे।  अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते, विभाजन के बाद हुए कई दंगों में वे हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए खुली जीप पर सवार हो खून की प्यासी भीड़ों के बीच गए। सन् 1961 के जबलपुर दंगों के बाद, उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया। आज के शासकों के विपरीत, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत सके। उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं जैसे योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को कमजोर या समाप्त किया जा रहा है। आज देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है और कारपोरेट घरानों को लूट की पूरी छूट मिली हुई है।

    क्या उनमें कोई कमियां नहीं थीं? क्या उन्होंने कोई गलती नहीं की? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। उनके हिस्से में असफलताएं और गलतियां भी थीं। उन्होने चीन पर अगाध विश्वास किया और भारत-चीन युद्ध में हम पराजित हुए। बड़े बांधों के संबंध में उनकी नीति में भी कमियां थीं। परंतु कुल मिलाकर उन्होंने न केवल भारत,बल्कि पूरी दुनिया पर अपनी गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ी है।

    क्षुद्र सोच से ग्रस्त आज के शासक, नेहरू के योगदान को नजरअंदाज करना चाहते हैं। वे उसे कम कर बताने की कोशिश कर रहे हैं। नेहरू द्वारा स्थापित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को भंग कर दिया गया है। नेहरू आज विघटनकारी और संकीर्ण विचारधारा के निशाने पर हैं। उनके बारे में अगणित झूठ फैलाए जा रहे हैं। सबसे घृणास्पद यह है कि सुनियोजित तरीके से उनके व्यक्तिगत चरित्र, उनके परिवार और उनके योगदान को बदनाम किया जा रहा है। आज जो लोग सरकार में हैं, उनके विचारधारात्मक पूर्वजों ने कभी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। उनके पास अपना कहने को कोई नायक है ही नहीं। यही कारण है कि वे सरदार पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं। विचारधारा के स्तर पर वे नेहरू को अपनी राह में बड़ा रोड़ा पाते हैं। अगर नेहरू की विचारधारा इस देश में जिंदा रहेगी तो वे अपने संकीर्ण लक्ष्यों को कभी हासिल न कर सकेंगे। यही कारण है कि वे नेहरू पर कीचड़ उछाल रहे हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.