तेल और पानी – कहानी

Gourang

रेहाना अपनी अम्मी को लेकर तहसील के अस्पताल पर गई। कोई नया डाक्टर आया है। कुछ लोगों ने बड़ी तारीफ की, लगभग जबरन ही भेजा पड़ोस के आबिदा खाला ने। गोया, 'बड़ा नेक बंदा है, बातें तो इतनी मुहब्बत से करता है कि आधा मर्ज तो वहीं काफ़ुर हो जाता है। जाने किस घर का रौशन चिराग है। दिल से दुआ निकलती है ऐसे बच्चे के लिए। काश कि ये अपना बेटा होता।' आबिदा खाला के जोड़ों की दर्द को अब बहुत आराम था। फिर रुककर कहती, 'वहीदा तेरी बेटी से बोल, कम-अज-कम एक बार दिखा तो ले, शाम को भी अस्पताल में बैठता है। आखिर हर्ज क्या है! नहीं तो फिर बड़े शहर के बड़े अस्पताल तो हैं ही।'

एक तो सरकारी अस्पताल, रेहाना को क्या भरोसा होता। पर तारीफ के इतने लंबे पूल बांधे कि रेहाना के लिए टालना मुश्किल ही हो गया। फिर अम्मी को खाँसी रह रह कर हो रही थी। अब्बू के गुजर जाने के बाद बस अम्मी ही थी, इक सहारा। आखिर आज जल्द ही स्कूल से लौट अम्मी को लेकर निकल पड़ी। रास्ते में वहीदा ने फिर वही पुराना राग अलापना शुरू किया - "निकाह कर लेती तो जिंदगी का सहारा होता।"। "छोड़ो भी अम्मी, फिर वही पुरानी रिकार्ड न बजाया करो।" रेहाना का वही एक ही जवाब होता। "क्यों न बजाऊँ? दुनिया के हर इंसान एक से तो नहीं होते। इरफान से तलाक हो गया तो जिंदगी खत्म तो न हो गई।" वहीदा के समझाने की कोशिश में कोई फर्क न आता। "समझ लो तुम्हारी बेटी में ही ऐब हैं। फिर किस्मत भी एक चीज है। वैसे अगर तुम मुझसे आजिज़ आ गई तो जुदा बात है।" अनमने से रेहाना जवाब देती। यह रोजाना का सबब था। दिन भर में एक बहस इस पर होनी ही थी। दोनों जानते थे, निकल कर कुछ नहीं आता, पर होनी थी। रेहाना ने दूसरी बार निकाह करने से इंकार कर दिया था और अपनी जिद्द पर कायम थी। आबिदा अभिमान से रेहाना को देखी फिर चुप हो गई।

Gourang

रेहाना को अफसोस हुआ, पर बात तो जुबान से निकल गई थी, वापस क्या होना था। धीरे से बोली - "नाराज न हो अम्मी। मैं कोई बच्ची तो नहीं। हो सकता है, तुम सही हो, हर शख्स इरफान नहीं। पर एक दूसरा इरफान मेरी ज़िंदगी में नहीं आयेगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। फिर तुम भी जानती हो, तलाक़शुदा औरतों को मर्दों से वह इज्जत हासिल नहीं होती। बस चैरिटी के लिहाज से ये शादियाँ होती हैं, जैसे कोई खैरात की बात हो। रुतबा गालिब के खातिर किसी लाचार पर जैसे इमदाद की बात हो। फिर सौ बातों की एक बात, मेरी अम्मी को इस उम्र में अकेली छोड़ मैं कहाँ जाऊँ? अल्लाह बड़ा कारसाज़ है कि जिंदगी गुजर की जुगाड़ में टीचरी थमा दिया। इतना ही काफी है। माफ करो, अब मैं यह जुआ खेलने को तैयार नहीं।" "बेटी, कुछ तजुर्बा मेरी भी कहती है कि तू अब भी उस गैर मजहबी को भूल नहीं पाई है। इसलिए अब भी ऐसी दलीलें रखती है। पर जिंदगी को आगे देखना चाहिए, पीछे में कुछ नहीं रखा है।" आबिदा ने फिर समझाया।

रेहाना अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि रिक्सा थम गया। अस्पताल आ गया। ओ पी डी में काफी चहल पहल थी। बीस-पच्चीस लोग कतार में बैठे थे। रिक्सा वाले ने ही बताया, यह नया डाक्टर शाम को भी ओ पी डी में आता है। रेहाना को बड़ा ताज्जुब हुआ, कुछ खुशी भी। रेहाना किसी तरह अम्मी को एक जगह बैठा, नाम लिखाने गई। कंपाउंडर ने बाईस नंबर दिया और कहा, मैडम, आधा घंटा से ऊपर लग जाएगा। पर निराश होने की जरूरत नहीं,वे जरूर देखेंगे।

रेहाना की बड़ी इच्छा हुई कि वह डाक्टर को एक झलक देखे। आगे आ डाक्टर के कमरे में झाँकी। रेहाना का दिल बैठ गया। अल्लाह, इतने दिनों बाद इस तरह फिर वह दिखा!! या रब्बा, तेरी मर्जी क्या है!! बरसों पहले की बात रेहना के दिमाग में घूम गई। उफ, जैसे यादों का सैलाब आ गया। रेहाना लौट गई उन पुराने दिनों में........

"अम्मी, बस एक दिन की ही तो बात है।" रेहाना मनाती हुई अपनी अम्मी से बोली। 
"दिन नहीं, रात की बात है। और फिर अगर बात बन गई तो शहर से बाहर चार-पाँच साल अकेले दिन रात रहने की भी बात है।" वहीदा बोली। 
"सो तो है। कोई यूं ही तो कामयाबी पैरों में पड़ी नहीं मिलती।" रेहाना अपनी अम्मी को पीछे से दोनों हाथों जकड़ती बोली। 
"रहने दे यह लाड़, मुझसे न हो सकेगा।" वहीदा ने सब्जियों को धोते हुए कहा। 
"अम्मी, मेरा वादा है, मैं कामयाब बनकर दिखाऊँगी।" रेहाना अम्मी के पीठ में मुँह रगड़ती बोली। 
"वह लड़का कौन है?" अचानक कुछ खामोशी के बाद ओवेन पर रखी कड़ाही में तेल डालती वहीदा पूछी। 
"कौन?" रेहाना शरमाकर उल्टे पूछी। वहीदा के नजरों में राज उजागर हो गया। वहीदा सोचने लगी और मसाले डाल भूनने लगी। 
"कहीं वही तो नहीं, जिससे उस दिन परीक्षा के टिफिन में मुलाक़ात हुई थी?" कुछ सोचती सी वहीदा पूछी। 
"बहुत ज़हीन है। मंसूबे भी बहुत ऊँचे। मुझे यकीन है, एक दिन बहुत कामयाब होगा।" चहकती हुई रेहाना बोली। 
"तो इसी के सदके तू भी कामयाबी के मंसूबे पाल रही है। भले ज़हीन है पर गैरमजहबी है।" 
"गैरमजहबी होना कोई ऐब है?" 
"ऐब तो नहीं पर बन्दिशें भी जाहिर है।"
"अब तुम्हें कैसे समझाऊँ अम्मी।"
"समझाना क्या? तू समझ ले।" 
"फिर कहने को क्या रह गया। मैं सोचती थी, बचपन में पढ़ने लिखने की बात बस कहने भर को नहीं कही गई थी।" 
"तुझे नहीं लगता कि तेरे अब्बा की मंजूरी भी उतनी ही जरूरी है?" वहीदा पूछी। 
"अम्मी, उस लॉक गेट को ही खोलना है।" 
"कौन सा? पढ़ने जाने का या उसके आगे आने वाले अंजामों का? वहीदा ने सब्जियों को कड़ाही में डाल दिया। 
"एक अच्छी नौकरी। एक मनचाहा जिंदगी। अम्मी, तेरी लाडो के लिए तेरे दिल में ये ख्वाब नहीं पलते?" 
"पलते हैं, पलते है मेरी रानी बिटिया। पर तू मुझे जिस तरफ इशारा कर रही है, वह मुझे खौफ का मंजर दिखाता है।" वहीदा ने सब्जी में नमक डाला। 
"मैं यकीन दिलाती हूँ अम्मी कि हम इतने कामयाब होंगे कि तुम्हारे इज्जत पर कोई हर्फ न आयेगा, और यह डर बेतुका साबित होगा।" वहीदा ने रेहाना के आँखों में चमक देखी। उसे डराया। 
"यह हिंदुस्तान है। यहाँ बातों का बताना बनने में पल भी नहीं लगता। अब इस किस्सा को बंद कर।"
"अम्मी!" 
"बंद कर।" 
"क्या क्या बंद करूँ अम्मी? लड़की हूँ इसलिए? अगर लड़का होती तो यही फख्र की बात हो जाती।"
"तो फिर सुन। मेरी रजा नहीं मिलती। तू दीवार फाँद ले, गर हिम्मत है तो। ताला न खुले।" कलछुल चलाती अम्मी बोली। 
"सिर्फ इसलिए न, कि वह गैर मजहबी है। पर सच तो यह है कि वह ज्यादा भरोसेमंद है।" 
"तुझसे सर्टिफिकेट किसने मांगी?" 
"सर्टिफिकेट? सर्टिफिकेट का क्या? ये जो सब्जी से भीनी खुशबू आ रही है, इसकी कोई सर्टिफिकेट है? खुशबू ही खुद में सर्टिफिकेट है।" 
"और यह खुशबू अभी कितनी दूर तक फैली है?" पैनी नजर रेहाना पर गड़ गई। 
गमगीन हो गई रेहाना। बोल न फूटे। दरवाजा पर पीठ टिकाये खड़ी रही। 
आखिर सब्जी में थोड़ी सी पानी मिला अम्मी बोली - "जिंदगी फिल्म नहीं है, जज़्बातों से नहीं चलती। ऐसे अहमकाना फैसलों को अपने दिमाग से दरकिनार करो।" 
"जिस जिंदगी की दुहाई दे रही हैं, आप वही मुझसे मांग भी रही हैं।" रेहाना अपने पैरों के अँगूठों को देखती धीरे से बुदबुदाई। 
"तकाजा यही है। शरीफ लड़कियाँ अपने वालदैन के लिए दुश्वारी नहीं बनते।" 
"शरीफ? सच में शरीफ?" 
"कहना क्या चाहती हो?" 
"शरीफ बनकर फरेबी बन जाती हैं लड़कियाँ। खुद की नजरों में गिरकर कीमत चुकाती हैं लड़कियाँ। जिंदगी भर ढोती रहती हैं अपने दिल के बोझ को।" 
"बंद कर तेरा किताबी फलसफा। इससे हकीकत की जिंदगी नहीं चलती।" 
"अम्मी मान भी जाओ। आँखें बंद कर लेने से दुनिया बंद नहीं हो जाती।" 
"यह नामुमकिन है।" 
"सोच का फर्क है। समझ का फर्क है। दो जमाना में बड़ा फर्क आ गया है। अब लड़कियाँ खुदमुख्तारी की हिमायती हैं। हद है, आप हमें खुद सोचने कहती हैं, फिर अपने तई फैसले लेने को सीखने के पैरोकार भी हैं और फिर इतनी भी आजादी देने की मंशा नहीं। न पढ़ाया होता को-एड स्कूलों में, मदरसों में निपटा लिया होता।" 
"इसके मतलब ये तो नहीं थे कि अपने दायरे भूल जाओ। मनमानी करने लगो।" वहीदा ने फिर से ढक्कन खोला और कुछ बारीक धनिया पत्तों को खौलते सब्जी में डाल ओवेन बंद कर दिया। 
"अम्मी यह इतना संगीन मसला नहीं है। हजारों लड़कियाँ घर से बाहर पढ़ने के लिए जाती हैं। उनमें से भले कम गिनती के हो पर हममजहब भी जाती ही हैं।" रेहाना ने फिर कोशिश की।
"पढ़ने जाना एक बात है और किसी गैरमजहाबी के साथ बसर के मंसूबे पालना एक जुदा मसला है। तेरे अब्बू इसकी इजाजत कतई नहीं देंगे। फिर दुनियादारी है, रिश्तेदारी है। कुछ समझती भी है?"
"अम्मी!!" 
"देख सब्जी में, तेल अलग तैर रहे हैं, लाख कलछुल चलाने पर भी पानी से नहीं मिलते। मैं महज नहीं कह रही, तजुर्बा कहता है।" वहीदा ने फिर ढक्कन खोल सब्जी में एक बार कलछुल चलाया और कहा। 
"अम्मी यह तेल पानी वाली मिसाल मेरी अक्ल नहीं मानती। मजहब तो दुनिया में बहुत बाद में आया, इंसान का वजूद तो बहुत पहले से ही था। फिर इस रास्ते पर हम दुनिया के पहले इंसान नहीं है और न आखरी होंगे।" रेहाना के आवाज में कुछ तल्खी थी। 
"ऐसी बातें जुबानदराज़ी के मिसाल में आती हैं, इतनी समझ की काबिलियत तो है तेरी।" उससे ज्यादा ही तल्खी से वहीदा ने जवाब दिया। 
रेहाना खामोश तो हो गई पर नाखुशी भी पूरी जाहिर थी। आखिर चंद पल के खामोशी के बाद रेहाना पलटकर चली गई।

तभी रेहाना ने देखा, अम्मी बुला रही थी - "चल नंबर आ गया। कहाँ खो गई?" 
खुद को किसी तरह तैयार कर रेहाना बोली - "हाँ, चलो।" 
अंदर घुसते ही डाक्टर ने सर उठाकर देखा और वह चौंक गया - "तुम?" 
खुद को संभालती मुस्कुराकर ठंडी सी रेहाना बोली - "नमस्ते। अम्मी को खूब खाँसी हुई है।" 
डाक्टर संयत हो गया। इतनी समझ की उम्र थी ही। वहीदा को देखा मुस्कुराया। फिर धीरे और मीठी बातों से डाक्टरी में लग गया।

उधर रेहाना के दिल में तूफान उठे थे। बेचैनी का आलम अंदर में था, बस बाहर जो शांत दिख रही थी। फिर एक बार अम्मी को देखी। अम्मी डाक्टर से बड़ी मुतास्सिर दिखी। वह नब्ज टटोल कर कह रहा था - "इतनी भी गंभीर नहीं है, मेडिसीन दे रहा हूँ। दो तीन दिन में आराम हो जाएगा। फिर पखवाड़ा भर में आप पूरी तरह ठीक हो जाएंगी। मगर इसके बाद मनमानी मत करने लगिएगा। थोड़ा संभलकर रहिएगा, एकदम फिट रहेंगी आप।" कहकर दराज से कुछ दवाईयाँ निकाल कर दिया।

वहीदा खुश होकर बोली - "बेटा आबिदा ठीक ही कहती है, आधी बीमारी तो तुमसे बातें करके ही दूर हो गई। हमारी दुआ है, खुश रहो तुम। तुम्हारे बाल बच्चे भी तुम्हारे ही जैसे हों।"
डाक्टर हँसा। फिर बोला - "बाल बच्चे? वो कैसे हो? हमारी तो शादी ही नहीं हुई।" 
"अरे? आखिर ऐसा क्या हो गया? अच्छा खासा कमाते हो, जवान हो।" वहीदा अचरज से पूछी। 
डाक्टर चोर नजर से एक बार रेहाना को देखा, फिर बोला - "अपनी अपनी किस्मत है। लड़की तो बहुत मिलती है पर मर्जी नहीं होती शादी की।" 
"अरे, तुम नौजवानों को आखिर क्या हो गया है समझ नहीं आता। एक मेरी बेटी है, वह भी शादी से इंकार करती है। तलाक हो गया तो क्या हुआ? लाखों लोग दूसरी जिंदगी शुरू करते हैं, पर ये है कि मानती ही नहीं। अल्लाह जाने, क्या मंसूबे हैं।" आबिदा बड़बड़ाई। 
डाक्टर से रेहाना की नजरें फिर मिली। रेहाना की आँखें डबडबाई। किसी तरह खुद को संभाल वह बोली - "बहुत शुक्रिया आपका। अम्मी ठीक तो हो जाएंगी न! अम्मी के अलावा हमारा और कोई नहीं।" 
"बिलकुल।" डाक्टर बोला। फिर अम्मी की तरफ देख बोला - "आप निश्चिंत रहिए। ईश्वर की इच्छा से आप जल्द ही स्वस्थ हो उठेंगी।"

वापस घर लौट वहीदा चहक रही थी। मुँह से फुलझड़ी झड़ रहे थे। बोली - "क्या हुनरमंद लड़का है! जैसे फरिश्ता है। आबिदा सही कहती थी बेटी, भले घर का रौशन चिराग है। अल्लाह करे उसे ढेरों खुशियाँ मिले। उसकी हर मुरादें पूरी हों।"
धीरे से बिस्तर पर बैठती रेहाना बोली - "इतनी भी खुश मत हो जाओ अम्मी, वह गैर मजहबी है।" 
वहीदा अचरज से रेहाना को देखने लगी।

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