वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

Kumar Shyamयह विडियो राजस्थान के चूना बहुल इलाक़ों में स्थित चूना-फैकिट्रयों में काम करने वाले श्रमिकों के वास्‍तविक हालातों की ग्राऊंड-रिपोर्टिंग है। सीमित संसाधनों से एक यूट्यूबर द्वारा इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी एवं स्‍थानीय मज़दूरों पर होने वाले बेतहाशा शोषण को सामने लाने का प्रयास है। सियासत और मुख्‍यधारा की मीडिया के लिए अरूचिकर हो चुके इन मसलों को इस विडियो में दिखाने की कोशिश की गई… Continue reading

“भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

Sanjay Jothe एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली… Continue reading

नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

Prof Ram Puniyani इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि… Continue reading

देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

Vivek “सामाजिक यायावर”यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है। देश, समाज व मनुष्यनेतृत्वसामाजिक-नेतृत्व– जाति– स्त्री– शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति — स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता– स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता देश, समाज व मनुष्यमनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज… Continue reading

अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

Tribhuvan प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘दॅ आइडिया ऑव जस्टिस’ के ‘दो शब्द’ वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों… Continue reading

चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

Pankaj Mishra क्या पूछना है , तीस बरस की उम्र में हाउस लोन मिल गया …. और तीस ही बरस की क़िस्त , चुकाए जाओ मियाँ , किराए के घर में तो न रहना पड़ेगा , लाइफ में क्वालिटी तो होना ही मांगता है ….चुकाइये ..क्वालिटी !! तो भइये , घर में सब कुछ मोड्यूलर होना चाहिए तब न बात बनेगी , रह तो सब लेते है तो करना कुछ नही… Continue reading

रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

Vidya Bhushan Rawatरजनी तिलक जी का अचानक चले जाना अम्बेडकरवादी महिलावादी आन्दोलन के लिए गहन धक्का है क्योंकि उन्होंने जीवन प्रयत्न इन सवालों पर कोई समझौता नहीं किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए वह संघर्षरत रही. आज ये कठिन दौर में साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरुद्ध सीधे खड़े होने के लिए बहुत वैचारिक निष्ठां चाहिए होती है . रजनी तिलक उन गिने चुने लोगो में थी जो बिना किसी… Continue reading

क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

Tribhuvan इस देश के लोगों की बातें सुनें तो लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इसी धरती पर वास करते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों ने एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने वाले सुप्रीमकोर्ट के एक अवांछित हस्तक्षेप के विरोध को लेकर जिस तरह आंदोलन किया, वह शांतिपूर्ण अांदोलनों की आवाज़ों को नोटिस न करने वाले नेताओं की खोपड़ियों को झकझोरने के लिए काफ़ी है। आज़ादी से… Continue reading

मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

Prof Ram Puniyani, RtdIIT Bombay हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -… Continue reading

हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

Atul Kumar Rai गाँव में सुबह उठते ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है और पता चलता है कि रात का बिछौना सुबह ओढ़ना हो जाए उसे चैत का महीना कहतें हैं। खटिया पर ऊंघते हुए देखता हूँ सात बज रहे हैं। सभी लोग अपने काम में लगे हैं। जैसे एक बहन खाना बना रही है। छोटी वाली पढ़ाई कर रही है। भाभी अंचार सूखा रहीं हैं। बड़का बाबू गाय को… Continue reading