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  • वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    वीडियो रिपोर्ट: राजस्थान में चूना-फैकिट्रयों के श्रमिकों की स्थितियों पर –Kumar Shyam

    Kumar Shyam

    यह विडियो राजस्थान के चूना बहुल इलाक़ों में स्थित चूना-फैकिट्रयों में काम करने वाले श्रमिकों के वास्‍तविक हालातों की ग्राऊंड-रिपोर्टिंग है। सीमित संसाधनों से एक यूट्यूबर द्वारा इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी एवं स्‍थानीय मज़दूरों पर होने वाले बेतहाशा शोषण को सामने लाने का प्रयास है। सियासत और मुख्‍यधारा की मीडिया के लिए अरूचिकर हो चुके इन मसलों को इस विडियो में दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह से इन फैक्ट्रियों में मज़दूरों के स्‍वास्‍थ्‍य से लेकर उनके रहन-सहन की मलभूत आवश्‍यकतओं से वंचित रखा जाता है। पर्यावरणीय प्रदुषण के अलावा स्‍थानीय ग्रामीणों को किस तरह से मुश्किलों को सामना करना पड़ता है।

    Kumar Shyam

  • “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली कांफ्रेंस के लिए आये थे. मैं उनका मेहमान था. कुछ समय बाद भोजन पर बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा कि आप सब पहले से ही इतने स्वस्थ और संतुलित शरीर वाले हैं आज ही आप यात्रा करके पहुंचे हैं आज कसरत न करते तो क्या हो जाएगा?

    स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में मानवशास्त्र और समाजशास्त्र कांफ्रेंस के दौरान इन मित्रों से मुलाक़ात हुई और कांफ्रेंस के दौरान कुछ एक गजब की बातचीत हुई, आज अपने भारतीय मित्रों के लिए यहाँ रख रहा हूँ.

    मेरा प्रश्न सुनकर अफगान प्रोफेसर हंसने लगीं, मैंने मजाक में कहा कि अब आपको इस हंसी के बारे में और अपनी कसरत के औचित्य के बारे में कोई गंभीर एंथ्रोपोलोजिकल या समाजशास्त्रीय व्याख्या देनी ही पड़ेगी. सभी मित्र हंसने लगे सभी मित्र मजाक के मूड में थे, आगे इस मुद्दे पर वे अफ़ग़ान प्रोफेसर बोलने लगीं कि पहले मैं भी ऐसे ही सोचती थी कि एक दो दिन कसरत न की जाए तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन बाद में समझ में आया कि अच्छी आदतों का एक अपना प्रवाह होता है एक सातत्य होता है जो बनाकर रखना जरुरी होता है. न केवल अच्छी या बुरी बातों का व्यक्तिगत चुनाव से रिश्ता होता है बल्कि उनका आपके समाज संस्कृति और धर्म से भी सीधा रिश्ता होता है. 

    ये बात अफगानिस्तान में रहते हुए समझ नहीं आई थी. लेकिन जब अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और यहाँ यूरोप में आकर बसी तब पता चला कि एशिया और यूरोप की संस्कृति और समाज में बुनियादी फर्क क्या है और इस फर्क का इंसानों के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य से क्या रिश्ता है.

    आगे उन्होंने बताया कि असल में अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत नेपाल जैसे मुल्कों में शरीर और मन के स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए कोई इंसेंटिव और कोई व्यवस्था ही नहीं है. वहां सब कुछ मुर्दा और जड़ व्यवस्था में बंधा हुआ है. इसीलिये लोगों के शरीर और मन भी मुर्दा हो गये हैं. व्यक्तिगत जीवन में सृजन और प्रेम न होने के कारण ये मुल्क अपनी सेहत भी ठीक नहीं रख पाते. इसीलिये अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में डाइबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत तो पूरी दुनिया में डाइबिटीज के मामले में पहले नम्बर पर है. 

    पाकिस्तान अफगानिस्तान के नीम हकीमों के इश्तिहार देखिये वे दो ही चीजों को बीमारिया समझते हैं तीसरी कोई बीमारी नहीं उनकी नजर में. ये दो बीमारियाँ हैं – कब्ज और नपुंसकता. ये दोनों  चीजें सीधे सीधे लाइफस्टाइल और समाज के मनोविज्ञान से जुडी हुई हैं. ये कब्ज और नपुंसकता न केवल इन समाजों के इंसानों के शरीर में है बल्कि इनकी संस्कृति में भी है. ये समाज न कुछ पैदा कर पा रहे हैं न पुरानी गंदगी को शरीर से बाहर निकाल पा रहे हैं. ये कहकर वे हंसने लगीं.

    ये बात सुनकर मैं चौंका, मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा विस्तार से बताइए.

    वे आगे बताने लगीं कि वे पेशावर, कराची और दिल्ली में भी रह चुकी हैं, काबुल में पैदा हुई हैं. उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के समाज धर्म और संस्कृति को बहुत करीब से देखा है. भारत और पाकिस्तान में बचपन से ही लोगों को अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कोई प्रेरणा या कारण नहीं दिया जाता. 

    इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहाँ प्रेम करने, दोस्ती, खेलकूद, और औरत मर्द के बीच रिश्ते बनाने की कोई आजादी नहीं है. कबीलों और अमीर गरीब के झगड़े इतने ज्यादा हैं कि आप अपने लिए दोस्त या लड़की या लड़का चुनकर उसे प्रभावित करके अपना दोस्त या जीवनसाथी बनाने की कल्पना ही नहीं कर सकते. आप अपने पडौसी, सहकर्मी, बॉस, या अधीनस्थ को उसकी कबीले वंश इलाके या जाति के गणित लगाये बिना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते.

    भारत पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसे समाजों में लड़का लड़की अपनी मर्जी से अपने साथी नहीं चुन सकते. लेकिन यूरोप में वे अपनी मर्जी से ही जीवन साथी और मित्र चुनते हैं. इसीलिये यूरोपियन लड़के लडकियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और बूढ़े बूढियां भी अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं. मन को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि बेहतर भाषा, बातचीत के ढंग, नये विषयों का ज्ञान, नए हुनर, नई कलाएं संगीत, नृत्य, काव्य इत्यादि सीखकर अपने मित्रों और गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड आदि को प्रभावित कर सकें. 

    इस तरह न केवल वे व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक और मानसिक स्तर पर अनुशासित, स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं बल्कि इसी कारण से वे सामूहिक रूप से एक स्वस्थ, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज का निर्माण भी करते हैं. इसीलिये वे विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, खेलकूद, साहस और शौर्य आदि में बेहतर प्रदर्शन करके दुनिया पे राज करते हैं.

    आगे उन्होंने बताया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत जैसे देशों में मामला एकदम उलटा है. यहाँ लड़की को उसका पति और लडके को उसकी पत्नी, उसके माँ बाप खोजकर देते हैं. उन्हें खुद अपने लिए जीवनसाथी की तलाश का कोई अधिकार नहीं है. इन बदनसीब मुल्कों में अगर कोई लडकी अपने लिए खुद कोई लडका चुन ले तो या तो परिवार और कबीले की नाक कट जाती है या जाति और कुल की नाक कट जाती है. ये लडके लडकियाँ अपनी योग्यता या अपनी खूबियों का प्रदर्शन करके अपने लिए बेहतर जीवनसाथी नहीं चुन सकते. इसीलिये उनके जीवन में अपने शरीर, मन, कैरियर को बेहतरीन हालत में बनाये रखने के लिए एक बहुत स्वाभाविक सी प्राकृतिक प्रेरणा ही जन्म नहीं ले पाती.

    ऐसे में इन मुल्कों के लडके लड़कियों को अच्छी भाषा, बातचीत का ढंग, कला, नृत्य, काव्य, संगीत इत्यादि सीखने की प्रेरणा ही नहीं होती. अगर आप इन सब कलाओं से अपने संभावित जीवनसाथी को प्रभावित और आकर्षित ही न कर सकें तो आपके व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन से सभ्य होने की, संवेदनशील या सृजनात्मक होने की सारी प्रेरणा ही खत्म हो जायेगी.

    पूरे जीव जगत और पेड़ पौधों को देखिये. वहां भी सारी सृजनात्मकता, कला, कौशल, शौर्य, क्षमता और सौन्दर्य का सीधा संबंध अपने लिए बेहतर जीवनसाथी के चुनाव से जुडा हुआ है. जिन समाजों ने इस सच्चाई का सम्मान किया है वे आगे बढ़े हैं और इस सच्चाई को नहीं समझ सके हैं वे बर्बाद हुए हैं.

    अब एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़की के बारे में सोचिये. उसे उसके माँ बाप उसका पति खोजकर देंगे. वो लडकी खुद अपनी मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकती. ऐसे में वो अपने आसपास के हजारों लड़कों में से अपनी पसंद के लडके को प्रभावित या आकर्षित करने के लिए न गीत संगीत या नृत्य सीखना चाहेगी, न कविता या शायरी सीखेगी न अच्छा भोजन बनाना सीखना चाहेगी न ज्ञान विज्ञान सीखेगी, वो सिर्फ और सिर्फ अपने चेहरे को खुबसुरत बनाने पर ध्यान देगी. 

    वो लडकी उतना ही सीखेगी या करेगी जितना कि उसके माँ बाप द्वारा खोजे गये नये परिवार और पति को खुश करने के लिए न्यूनतम रूप से आवश्यक होगा. यही चीज सेक्स और रोमांस के संबंध में उसकी क्षमता या पसंद को भी नियंत्रित करेगी वो कभी भी सेक्स या और्गाज्म का पूरा सुख नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि ऐसा करते ही वो अपने पति की नजर में “गंदी औरत” बन जाएगी.

    इसी तरह एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़का भी अपने संभावित जीवन साथी को चुन नहीं सकता इसलिए वो अपने शरीर को स्वस्थ रखने, मन को सृजनात्मक बनाने, नयी कला, गीत संगीत, काव्य, हुनर आदि सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं होता.

    अन्य मित्र भी इन बातों का समर्थन कर रहे थे. वे भी समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के प्रोफेसर और रिसर्चर थे. किसी एक ने भी इन बातों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अलग अलग अनुभवों से इन बातों का समर्थन ही किया.

    इन बातों के प्रकाश में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समाज संस्कृति और धर्म को ठीक से देखिये.

    इन मुल्कों में शादियाँ, रिश्तेदारी और संबंध प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि घृणा के आधार पर होते हैं. शादी ब्याह में अधिक जोर इस बात पर होता है कि किन जातियों कबीलों या समुदायों को “नहीं” लाना है. किन लोगों जातियों या समुदायों को “लाना” है इस पर जोर लगभग नहीं ही होता है. वहीं यूरोप अमेरिका में अपने जीवन या परिवार में किसे “लाना” है इस बात पर सर्वाधिक जोर होता है. एक बार वे अपनी उम्र, विचार, और समान क्षमता के लोग पसंद कर लेते हैं और हर हालत में उनकी अमीरी गरीबी या कबीले वंश आदि को नकारते हुए उन्हें अपने जीवन या परिवार या समूह में शामिल कर लेते हैं.

    इस तरह यूरोप के प्रेम आधारित समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर मेलजोल और सभ्यता का विकास तेजी से होता है और भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान के घृणा आधारित समाज में सब तरह की सृजनात्मक प्रेरणाओं पर धर्म संस्कृति और भेदभाव का एक बड़ा भारी ताला लगा रहता है.

    भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में “किन लोगों” को “शामिल नहीं करना है”, किन लोगों को “जीने नहीं देना है” किन लोगों को “पढने लिखने नहीं देना है” या “रोजगार नहीं करने देना है” – इसकी बहुत साफ़ साफ़ प्रस्तावनाएँ लिखी गईं हैं. ये प्रस्तावनाएँ ही इन मुल्कों का धर्म और संस्कृति है. मनुस्मृति में तो साफ़ लिखा ही है कि किन वर्णों जातियों को शिक्षा और सम्पत्ति का अधिकार नहीं है. इसीलिये भारत पाकिस्तान जैसे समाज कभी भी प्रेम, बंधुत्व, मित्रता, सहकार, समता, सृजन, आदि के आधार पर न तो व्यक्तिगत जीवन जी पाते हैं न सामाजिक या सामूहिक जीवन का निर्माण ही कर पाते हैं.

    भारत की घृणा आधारित संस्कृति और यूरोप की प्रेम आधारित संस्कृति का विभाजन इसमें देखिए, आप देख सकेंगे कि आज का पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत ऐसा क्यों बन गया है. इन मुल्कों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेलकूद में प्रदर्शन, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डीपन, गरीबी और जहालत इत्यादि को देखिये और आज के यूरोप की बुलंदियों को देखिये. अगर आप वर्तमान यूरोप की संस्कृति और समाज की तुलना भारती पाकिस्तानी समाज से नहीं कर पा रहे हैं तो आप भारत को समर्थ बनाने के संभावित मार्ग की कल्पना भी नहीं कर पायेंगे.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि से उत्तरदेश सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह निर्णय, अंबेडकर को अपना घोषित करने की हिन्दुत्ववादी राजनीति का हिस्सा है। भाजपा के लिए भगवान राम, तारणहार हैं। उनके नाम का इस्तेमाल कर भाजपा ने समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया – फिर चाहे वह राममंदिर का मुद्दा हो, रामसेतु का या रामनवमी की पूर्व संध्या पर जानबूझकर भड़काई गई हिंसा का। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हम भारत में दो विरोधाभासी प्रवृत्तियों का उभार देख रहे हैं। एक ओर दलितों के विरूद्ध अत्याचार बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अंबेडकर की जंयतियां जोर-शोर से मनाई जा रही हैं और हिन्दू राष्ट्रवादी अनवरत अंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे हैं।

    इस सरकार के पिछले लगभग चार वर्षों के कार्यकाल में हमने दलितों के दमन के कई उदाहरण देखे। आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया, रोहित वेम्यूला की संस्थागत हत्या हुई और ऊना में दलितों पर घोर अत्याचार किए गए। मई 2017, जब योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे, में सहारनपुर में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दलितों के घर जला दिए गए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण, जमानत मिलने के बाद भी जेल में हैं क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। दलितों के घरों को आग के हवाले करने की घटना, भाजपा सांसद के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस के बाद हुई जिसमें  ‘‘यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना होगा‘‘ व ‘‘जय श्रीराम‘‘ के नारे लगाए जा रहे थे। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काई गई और जैसा कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, हिंसा भड़काने वालों के मुख्य कर्ताधर्ता भिड़े गुरूजी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा की केन्द्र सरकार में मंत्री व्ही के सिंह ने सन् 2016 में दलितों की तुलना कुत्तों से की थी और हाल में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी ऐसा ही कहा। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में जब योगी आदित्यनाथ मुशहर जाति के लोगों से मिलने जा रहे थे, उसके पूर्व अधिकारियों ने दलितों को साबुन की बट्टियां और शेम्पू बांटे ताकि वे नहा-धोकर साफ-सुथरे लग सकें।

    मोदी-योगी मार्का राजनीति की मूल नीतियों और चुनाव में अपना हित साधने की उसकी आतुरता के कारण यह सब हो रहा है। सच यह है कि मोदी-योगी और अंबेडकर के मूल्यों में मूलभूत अंतर हैं। अंबेडकर, भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। वे जाति का उन्मूलन करना चाहते थे और उनकी यह मान्यता थी कि जाति और अछूत प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रंथों में हैं। इन मूल्यों को नकारने के लिए अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने भारतीय संविधान का निर्माण किया, जो स्वाधीनता संग्राम के वैश्विक मूल्यों पर आधारित था। भारतीय संविधान के आधार थे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य। दूसरी ओर थीं हिन्दू महासभा जैसी संस्थाएं, जिनकी नींव हिन्दू राजाओं और जमींदारों ने रखी थी और जो भारत को उसके ‘गौरवशाली अतीत‘ में वापस ले जाने की बात करती थीं – उस अतीत में जब वर्ण और जाति को ईश्वरीय समझा और माना जाता था। हिन्दुत्ववादी राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्य नस्ल और ब्राम्हणवादी संस्कृति वाले हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। आरएसएस इसी राजनीति का पैरोकार है।

    माधव सदाशिव गोलवलकर व अन्य हिन्दू चिंतकों ने अंबेडकर के विपरीत, हिन्दू धर्मग्रंथों को मान्यता दी। सावरकर का कहना था कि मनुस्मृति ही हिन्दू विधि है। गोलवलकर ने मनु को विश्व का महानतम विधि निर्माता निरूपित किया। उनका कहना था कि पुरूषसूक्त में कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र ब्रम्हा की आंखें हैं और सृष्टि का निर्माण उनकी नाभि से हुआ। ब्रम्हा के सिर से ब्राम्हण उपजे, उनके हाथों से क्षत्रिय, उनकी जंघाओं से वेश्य और उनके पैरों से शूद्र। इसका अर्थ यह है कि वे लोग जिनका समाज इन चार स्तरों में विभाजित है, ही हिन्दू हैं।

    भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने एक संपादकीय में संविधान की घोर निंदा की। आरएसएस, लंबे समय से कहता आ रहा है कि भारतीय संविधान में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। हाल में केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी यही बात कही। जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था, तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ था। दक्षिणपंथी ताकतों ने अंबेडकर की कड़ी निंदा की थी। परंतु अंबेडकर अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें न केवल शास्त्रों को त्यागना चाहिए बल्कि उनकी सत्ता को भी नकारना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। तुम में यह साहस होना चाहिए कि तुम हिन्दुओं को यह बताओ कि उनमें जो गलत है वह उनका धर्म है – वह धर्म, जिसने जाति की पवित्रता की अवधारणा को जन्म दिया है‘‘।

    आज क्या हो रहा है? आज अप्रत्यक्ष रूप से जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाई. सुदर्शन ने हाल में कहा था कि इतिहास में किसी ने जाति प्रथा के विरूद्ध कभी कोई शिकायत नहीं की और इस प्रथा ने हिंदू समाज को स्थायित्व प्रदान किया। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करना और विश्वविद्यालयों में इन वर्गों व ओबीसी के लिए पदों में आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव, सामाजिक न्याय और अंबेडकर की विचारधारा पर सीधा हमला हैं।

    जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद होती जा रही है उसके समक्ष यह समस्या भी उत्पन्न हो रही है कि वह दलितों की सामाजिक न्याय पाने की महत्वाकांक्षा से कैसे निपटे। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जाति और लैंगिक पदक्रम पर आधारित है। इस पदक्रम का समर्थन आरएसएस चिंतक व संघ परिवार के नेता करते आ रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि वे इन वर्गों की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं करना चाहते परंतु चुनावों में उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं। इसी कारण वे एक ओर दलितों के नायक बाबा साहब अंबेडकर को अपना सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर, दलितों को अपने झंडे तले लाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दलित, भगवान राम और पवित्र गाय पर आधारित उनके एजेंडे को स्वीकार करें।

    यह एक अजीबोगरीब दौर है। एक ओर उन सिद्धांतों और मूल्यों की अवहेलना की जा रही है, जिनके लिए अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया तो दूसरी ओर उनकी अभ्यर्थना हो रही है। और अब तो अंबेडकर के नाम का उपयोग भी हिन्दुत्ववादी शक्तियां, राम की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहती हैं।   


    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    देश, समाज, मनुष्य व सामाजिक नेतृत्व :: स्त्री, जाति व सामाजिक विद्रूपता

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    देश, समाज व मनुष्य

    मनुष्य के बिना परिवार, समाज व देश नहीं हो सकता; जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहाँ परिवार, समाज व देश होगा ही होगा। मनुष्य परिवार, समाज व देश से बड़ा है, क्योंकि वह निर्माता है। देश व समाज की सत्ता, जीवन-मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही निर्मित, निर्धारित व परिवर्तित करता है। यही सहज सामाजिक तथ्य है; शेष राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व के लिए  तोड़मरोड़ कर निहित-स्वार्थों के लिए थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं। 

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिए   देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है, जिसका निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़, गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है। देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचना है। इसलिए जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।  परिवार, देश व समाज का निर्माण व विकास करना मनुष्य की जिम्मेदारी है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की पुस्तकों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा। यही वास्तविक व व्यापक परिवर्तन होगा। मानव निर्मित सत्ता तंत्रों को चलाने वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है। 

    नेतृत्व

    “मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के द्वारा व्यापक सामाजिक-परिवर्तन के लिए  सामाजिक-नेतृत्व प्रस्फुटित नहीं होता; सामाजिक-नेतृत्व राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम समाज की मौलिकता व गुणवत्ता से स्वतःस्फूर्त रूप में प्रस्फुटित होता है“

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भी सामाजिक-अवतार नहीं होता। जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्हीं तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जाने का साहस व दृष्टि हो ही नहीं सकती है। इसीलिए तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते हैं। ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह कभी भी मानव समाज का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता। क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह गढ़ी गईं है, जिनमें सबसे नीचे के आधार सबसे चौड़े और सबसे ऊपर की चोटियाँ सबसे नुकीली व सबसे कम चौड़ी होती हैं।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाते हुए, निरंतर दबाए रहते हुए ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिए मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, न ही व्यापक-समाधान की दृष्टि रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिष्ठापित किए गए हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    विश्व में अन-आयुधिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलते हुए ही अस्तित्व में आए हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व

    सामाजिक-परिवर्तन व निर्माण कर पाने में सक्षम नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण मौलिकता, गुणवत्ता, दूरदर्शिता, स्वतः स्फूर्ति के मिथकों के प्रयोजन बिना ही होता है। भारत जैसे बड़े देश व समाज में स्वतः स्फूर्त व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण न हो पाने के प्रमुख कारण जाति-व्यवस्था, ईश्वरीय अवतारों व इन अवतारों का धरती पर ईश्वरीय व्यवस्था के प्रयोजन के कारण अवतरित होने की अवधारणाएं, साहित्यिक काव्यों/ग्रंथों को संपूर्ण ज्ञान व ईश्वरीय मानने की अवधारणा, पोथियाँ, पौराणिक कथाएं व सामंतवादी मानसिकता आदि रहे हैं।

    — जाति

    जाति-व्यवस्था के कारण सामाजिक-नेतृत्व का मूल-आधार पुरुषार्थ, कर्म व क्षमता आदि जैसे तत्व नहीं हो पाये। ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य जाति के लोगों के पास ही सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक नेतृत्व के जन्मजात अधिकार रहे। इसीलिए नेतृत्व की दावेदारी समाज की मौलिकता व गुणवत्ता के बजाय जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के कारण समाज के बहुत ही छोटे हिस्से में संकुचित रही।  जन्मजात नेतृत्व की दावेदारी करने वाले समाज के इस हिस्से की अधिकतर ऊर्जा जाति-व्यवस्था को ईश्वरीय प्रयोजन सिद्ध करते रहने के लिए कपोल कल्पित ईश्वरीय गाथाएं, मिथक व कपोल कल्पित ईश्वरीय अवतार प्रायोजित करने व गढ़ने में ही लगती रही। 

    सामाजिक-नेतृत्व के सतही व अवैज्ञानिक होने, ढोंग व मिथकों आदि के द्वारा प्रायोजित होते रहने के कारण मौलिक, गुणवान् व दृष्टिवान् सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं का भ्रूण भी नहीं पनप पाया।

    सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग की अवधारणा, जन्मजात जाति-व्यवस्था, धर्म का क्षय होने पर धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के द्वारा अवतार लेने की अवधारणा, मंत्रों व ईश्वरीय नाम के जाप द्वारा सुविधा/प्रतिष्ठा/समृद्धि आदि का मनचाहा वरदान या सिद्धि प्राप्त कर पाने की अवधारणा, सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य सत्य में देवतुल्य था; आदि आदि जैसी विभिन्न अवैज्ञानिक अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की भ्रूण-संभावना को ही नष्ट कर दिया और भ्रूण-संभावना का यह नष्टीकरण परंपरा में हजारों वर्षों तक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक मानसिकता आदि के विभिन्न स्तरों में गहरे अनुकूलन को प्रायोजित व स्थापित करने के साथ होता रहा।

    ज्ञान व सामाजिक-नेतृत्व के लिए ब्राह्मण जाति में पैदा होकर पोथियाँ, पुराण, महाकाव्य, काव्य आदि रट कर उनको मुंह से बोलना व उनमें बताए हुए कर्मकांड आदि को करना ही पर्याप्त रहा। मिथकों के प्रायोजन; व प्रायोजित मिथकों पर शाब्दिक व साहित्यिक विशेषज्ञता आदि के आधार पर सामाजिक-नेतृत्व का स्तर व प्रतिष्ठा निर्धारित होती रही। ब्राह्मण वर्ग की अधिकतर ऊर्जा इन्ही सबमें लगती रही और ऐसा करने को ही संस्कृति, संस्कार, पुरुषार्थ, ज्ञान, योग्यता आदि का नाम दे दिया गया।

    भारत की सैकड़ों वर्षों की राजनैतिक गुलामी का सबसे प्रमुख कारण यही रहा कि क्षत्रिय वर्ग को दरबारी भाटों, चाटुकारों व मिथक-साहित्य विशेषज्ञों ने झूठी कहानियाँ व मिथक गढ़ कर ही ईश्वरत्व रूप में जन्मजात पुरुषार्थी, निर्भय, रक्षक, शासक, राजनैतिक दूरदर्शिता व दृष्टिकोण आदि से संपन्न प्रायोजित कर दिया। गढ़े हुए मिथकों की पुष्टि करने के लिए ब्राह्मण वर्ग ने अनेकों पौराणिक कथाएं परंपरा में सत्य कथाओं के रूप में प्रायोजित करके, राजनैतिक सत्ता से अपना संबंध स्थापित करने के लिए क्षत्रिय वर्ग के द्वारा राजनैतिक सत्ता के भोग को ईश्वरीय प्रावधान के दायित्व का निर्वहण प्रायोजित कर दिया।

    यदि पौराणिक कथाओं को संज्ञान में लिया जाए तो मानव समाज की समस्यायें समाधानित करने के लिए, मानव समाज को विकास की ओर गतिमान करने के लिए ईश्वर खुद अवतार के रूप में आवश्यकता पड़ने पर बारंबार सामाजिक-नेतृत्व करने आता रहा। इस प्रकार सामाजिक-नेतृत्व मनुष्य के वास्तविक पुरुषार्थ एवम् समझ की क्षमता से अर्जित न होकर ईश्वरीय योजनाओं के निर्वाहक या परिपूरक के रूप में प्रायोजित व स्थापित रहा। इन मिथकों से भारतीय समाज में अकर्मण्यता प्रतिष्ठित हुई और मौलिक-गुणवत्ता की निरंतर भ्रूणहत्या होती रही।

    समय के साथ अवतारों के बजाय अवतारों की गाथाएं गढ़ने वाले, अवतारों की चर्चा करने वाले, ग्रंथों/महाकाव्यों/काव्यों आदि को रटने वाले, धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकांडों आदि को करने वाले ही सामाजिक-नेतृत्व के रूप में प्रायोजित व स्थापित किए जाने लगे। ब्राह्मण व क्षत्रिय को सिर्फ जाति विशेष में पैदा होने के कारण ही ‘सामाजिक-नेतृत्व’ की मान्यता दी जाती रही। परिणामस्वरूप ‘सामाजिक-नेतृत्व’ भी जन्म के आधार पर प्रायोजित होता रहा।

    भारत में ‘सामाजिक नेतृत्व’ लोगों में ‘आभामंडल-सत्ता’ स्थापित करने का और विभिन्न सत्ताओं द्वारा प्रायोजित होने का ही रहा है, इसीलिये ‘सामाजिक नेतृत्व’ और ‘सत्ताओं’ का आपस में बहुत गहरा व विश्वसनीय रिश्ता रहा है। यही कारण रहा कि भारत में शताब्दियों के बाद आज तक भी भारतीय समाज में स्वत: स्फूर्त ‘सामाजिक नेतृत्व’ आकार नहीं ले पाया।

    चूंकि समाज में जाति-व्यवस्था के कारण स्वतः स्फूर्त, वास्तविक-गुणवान् व मौलिक नेतृत्व विकसित होने की परंपरा नहीं बनने दी गई इसीलिए समाज के लोग धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसरवादी आदि होते चले गए, क्योंकि जाति-व्यवस्था के निरंतर स्थापना-प्रयोजन के लिए यही आधारभूत मूल्य व तत्व होते हैं।  जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज कभी देश व समाज के प्रति ईमानदार व प्रतिबद्ध नहीं हो पाया केवल व्यक्तिगत लिप्साओं, स्वार्थों, भोगों, विलासिताओं, बाजार के उपभोक्तवाद पर आधारित उपभोक्ता बने रहने की व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा आदि स्वार्थ-केंद्रित महात्वाकांक्षाओं के लिए प्रयत्न करना ही जीवन के मायने मान लिया गया।

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व की वास्तविकता समझने के लिए एक कहानी को ही समझना पर्याप्त है। महान् गुरू के रूप में स्थापित द्रोणाचार्य ने अद्वितीय प्रतिभाशाली किशोर एकलव्य के दाहिने हाथ का अगूँठा केवल इसलिए कटवा दिया क्योंकि एकलव्य आदिवासी था और द्रोणाचार्य अपने शिष्य, जो एक बहुत बड़े राज्य का राजकुमार था, को महान् धनुर्धारी के रूप में प्रायोजित करना चाहते थे। यह कहानी उस समाज की है जो गुरू-शिष्य परंपरा की संस्कृति की बात करता है और जिस समाज ने द्रोणाचार्य को महानतम गुरू का स्थान दे रखा है। द्रोणाचार्य बहुत कुशल धनुर्धारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने सामाजिक गुरू होने के मूल्यों का ही पतन किया और भारतीय समाज को एकलव्य जैसे अद्वितीय धनुर्धारी से वंचित कर दिया। भारतीय समाज ने विभिन्न स्तरों व क्षेत्रों में अगणित एकलव्यों के अगूँठे काटे हैं। काश! यदि इन एकलव्यों के अगूँठे नहीं काटे गए होते, काश! विभिन्न स्तरों पर प्रायोजित लोग स्थापित नहीं किए गए होते तो आज भारत को प्राचीन-काल की गाथाएं गाकर खुद को महान् सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, न ही भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहता और न ही आज पिछलग्गू होता।

    — स्त्री

    समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शूद्र-वर्ण में रखा गया, जिसको जीवन के मौलिक अधिकार पशुओं जैसे तक नहीं थे। शूद्र-वर्ण के अतिरिक्त जो वर्ण थे, उन वर्णों की भी लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् स्त्री को पशु और वस्तु की श्रेणी में रख दिया गया। इस प्रकार समाज का पाँच में से चार जैसा बहुत बड़ा हिस्सा परंपरा में अपनी मौलिकता की भ्रूण-हत्या व अघोषित दासता का बर्बर-शोषण ही झेलता रहा। बचा-खुचा एक-पाँचवा हिस्सा परंपरागत मूर्खतापूर्ण सीमा में ही तथाकथित सामाजिक-नेतृत्व देता रहा।

    प्रायोजित सामाजिक-नेतृत्व ने स्त्री, जो जीवंत व चेतनशील मनुष्य है, उसको वस्तु के रूप में प्रायोजित कर दिया। मनुष्य के रूप में स्त्री के अस्तित्व व चेतनशीलता का कोई वजूद ही नहीं रहने दिया गया। स्त्री को पुरुष की अघोषित संपत्ति बना दिया गया। स्त्री जिस पुरुष की संपत्ति है, उस पुरुष के अस्तित्व में ही अपने अस्तित्व को बिना सवाल विलीन करने व ऐसा करने में अपने जीवन का लक्ष्य, सफलता व गौरव मानने के लिए निरंतर अनुकूलित किया जाता रहा।

    जो संस्कृति स्त्री को देवी मानने का दावा करती है उसी के समाज में स्त्री को प्रेम करने से वंचित कर दिया गया, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिए। यहाँ तक कि स्त्री को अपना पति तक चुनने का अधिकार नहीं रहा। जिस स्त्री को देवी कहा गया उसी को पर्दे में धकेल दिया गया, शिक्षा से वंचित रखा गया व संपत्ति में अधिकार नहीं दिए गए ताकि वह सदैव पुरुष की दासी बनी रहे। स्थिति की भयावहता की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि आज भी प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियों की हत्या माता के गर्भ में ही खुद उनके ही माता-पिता द्वारा कर दी जाती है। आज भी हजारों स्त्रियों की हत्या उनके ही माता-पिता व परिवार के द्वारा केवल इसलिए कर दी जाती है, क्योंकि स्त्री अपने माता-पिता व परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा से प्रेम-विवाह करना चाहती है। 

    स्त्री जिसे देवी कहा गया वही स्त्री प्रेम करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पर्दा न करे तो वह चरित्रहीन व कुलटा, वही स्त्री पुरुष की उपस्थिति में खुलकर खिलखिलाकर हँस ले तो वह चरित्रहीन व कुलटा।  स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया लेकिन स्त्री के द्वारा पुरुष के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व देखने को ही उसका देवी होना प्रायोजित कर दिया गया। स्त्री के द्वारा परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष और पुरुष के परिश्रम से अर्जित संपत्ति का मालिक भी पुरुष, फिर भी स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी। स्त्री के गृहस्थ कार्यों को श्रम की श्रेणी में नहीं रखा गया जबकि वह संतान की जननी व पालन पोषण करने वाली भी है। स्त्री की कर्मशीलता को पुरुष के कारण होना मान लिया गया परिणामस्वरूप स्त्री के द्वारा सामाजिक-नेतृत्व की संभावनाओं के भ्रूण की भी संभावना की स्थिति समाप्त हो गई। यही कारण हैं कि बलात्कार होने पर या स्त्री के साथ दुर्व्यवहार होने पर, समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता रहा है। चूंकि स्त्री को मनुष्य माना ही नहीं गया, इसीलिए स्त्री के पहनावे या बोलचाल या व्यवहार के तरीके को बलात्कार का कारण ठहराया जाता है। इसको कुछ इस रूप में देखा जाए जैसे कोई वस्तु यदि रात में घर के बाहर पड़ी है तो कोई भी उसे चुराकर ले जा सकता है, उसी प्रकार स्त्री यदि रात में घर से बाहर है तो कोई भी उसके साथ बलात्कार कर सकता है। कोई महंगी वस्तु यदि छिपाकर न रखी जाए तो उस पर चोरों की नजर पड़ी रहेगी और वे चुराने का प्रयास करेंगे, वैसे ही स्त्री यदि छोटे कपड़े पहने है तो पुरुष स्त्री का स्त्रीत्व चुराएगा। एक समाज जो स्त्री को देवी मानता है, वही समाज स्त्री के बारे में सब कुछ बहुत ही अधिक वीभत्सपूर्ण घिनौनेपन और असंवेदनशीलता से तय करता है, जैसे स्त्री निर्जीव-वस्तु हो।

    — शाब्दिक/कृत्रिम तार्किकता व प्रायोजित विद्वता बनाम कर्मकांड व संस्कृति 

    प्रकृति व ईश्वर को समझने का दावा करके प्रतिपल कर्मकांडों को रचने व महिमामंडित करने वाली संस्कृति वास्तव में केवल दर्शन की शाब्दिक व कृत्रिम तार्किकता की अव्यावहारिक विद्वत्ता ही होकर रह गई। यदि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था नहीं होती, स्त्री को मनुष्य माना गया होता और दर्शन को शाब्दिक तार्किकता व कृत्रिमता आदि से ऊपर उठकर समझने व जीने की चेष्टा की गई होती तो भारतीय समाज एक ढोंगी, कुंठित व पिछलग्गू समाज होने के बजाय विश्व के वास्तविक सर्वश्रेष्ठ समाजों में से होता और वास्तव में ही विश्व को विकास व समृद्धि के सार्थक मायने समझाते हुए समाधानित कर रहा होता। 

    भारतीय समाज में सामाजिक-नेतृत्व आज तक भी मौलिकता, गुणवत्ता व पुरुषार्थ से इतर अवसरवादिता, छद्म, ढोंग, मोहकता व आकर्षण आदि के प्रायोजन से देश, समाज व आने वाली पीढ़ियों की कीमत पर, पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ प्रायोजित किये जाते हैं।

    सामाजिक-नेतृत्व को परंपरा में विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा प्रायोजित व स्थापित करते रहने के कारण भारतीय समाज अपने लिए  ही क्रूरता की हद तक असंवेदनशील समाज के रूप में दृढ़ होता गया। बचपन से ही अपनी कमजोरियों को देखने, उनके कारणों को समझने और उनको दूर करने की चेष्टा करना सिखाए जाने के बजाय ढोंगो व सतही प्रायोजनो से दूसरों को निर्दयता व असंवेदनशीलता पूर्वक अपने से खराब साबित करके खुद को अच्छा एवम् कर्म व पुरुषार्थ साबित करने की तकनीक सिखाई जाती है। यह मानसिकता ही बचपन से ही जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे समाज में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता, क्रूरता व सामंतवादिता के बीज को पोषित करती रहती है। 

    हम यदि खुद के जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि हमारा अपना पूरा का पूरा जीवन ही झूठ और दिखावे का पुलिंदा है।  हमें बचपन से ही दिखावे की पुनरुक्ति के लिए इस तरह का अभ्यास करवाया जाता है कि हम खुद अपने आपको ही भूल जाते हैं और अपने ढोंग, खोखलेपन, निर्दयता, असंवेदनशीलता, अवैज्ञानिक-तर्कशीलता व अतथ्यात्मकता आदि को ही अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकता और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि व उद्देश्य मानने लगते हैं। हमें पता ही नहीं  चलता और हम सड़ने लगते हैं।  जब हमें अपने सड़ने की बदबू आती है, हम बदबू का कारण बाहर खोजते हैं।  हम बदबू का कारण बाहर इसलिए नहीं खोजते क्योंकि हमें बदबू का कारण वास्तव में खोजना होता है।  ढोंगो और प्रायोजन के आदी हम वास्तव में अपने से अधिक बदबूदार को खोजना चाहते हैं ताकि खुद को उसकी तुलना में खुशबूदार साबित करके खुद को बेहतर प्रायोजित कर खुद को महान् मान लें। यही कारण है कि हम दिन-प्रतिदिन और अधिक सड़ते जाते हैं लेकिन फिर भी दूसरों की तुलना में खुद को खुशबूदार मानते हैं। 

    — स्वयं के प्रति असंवेदनशीलता

    यह हमारी स्वयं के प्रति घोर निर्दयता व असंवेदनशीलता ही है कि हम वास्तविक खुशबू में जीने के प्रयास करने के बजाय अपनी सड़ाँध व बदबू को ही खुशबू के रूप में प्रायोजित करने में अपनी ऊर्जाएं लगाते हैं। हम पूरा जीवन नशे व बेहोशी में जीते हैं, और बेहोशी में जीवन जीने को हम जीवन की व्यावहारिकता कहते व साबित करते हैं; जबकि  वास्तव में यह हमारा अपने खुद के प्रति ही और अधिक असंवेदनशील होना ही है। 

    हम स्वयं को विकसित करने के लिये, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए  कर्म, प्रयास या चेष्टा नहीं करना चाहते हैं। स्व-निर्माण की प्रसव पीड़ा नहीं झेलना चाहते हैं।  इसीलिए  हम अपने जीवन के लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए  व देश के लिए  ऐसे सामाजिक-नेतृत्व प्रायोजित करते हैं; जो हमारे जैसे ही हों। सामाजिक-नेतृत्व छोड़िए हमने तो अपने ईश्वर भी अपने ही जैसे बना रखे हैं। 

    सामाजिक-नेतृत्व का प्रस्फुटीकरण वास्तविक कर्म से हुआ करता है। ढोंग व सतहीपन से युक्त विभिन्न स्तरों पर अनुकूलताओं के प्रयोजन से नहीं। भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक-नेतृत्व समाज की बेहतरी के लिए  किए गए पुरुषार्थ, कर्म, सक्रिय चिंतन, जीवंत कर्म-अनुभव आदि मूल्यों के आधार पर नहीं स्वीकृत किए गए हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक विकास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि में बहुत ही पीछे रह गया। शताब्दियों तक राजनैतिक गुलाम रहा और आज भी मानसिक गुलाम है।

    — स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व की आवश्यकता

    भारत सामाजिक रूप से बहुत अधिक विद्रूपताओं और विविधताओं का देश है। इसलिए  भारत का राष्ट्रीय सामाजिक-नेतृत्व वही कर सकता है जो भारत को भारत की विद्रूपता और विविधताओं के साथ स्वीकारे और फिर सबको साथ लेकर चलते हुए बढ़े।  सामाजिक नेतृत्व का सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरा व स्पष्ट संबंध होता है, बिना सामाजिक सरोकारों व सामाजिक संबंधों को समझे कोई भी सामाजिक नेतृत्व नहीं हो सकता है।  भारतीय समाज को शताब्दियों के अनुकूलन से बाहर आकर अपनी वास्तविक स्थिति, गति को स्वीकारते हुए विभिन्न स्तरों पर वास्तविक परिवर्तकों को “सामाजिक-नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।

    शाब्दिक व दार्शनिक तर्कशीलता के मानदंडों में अद्वितीय व विलक्षण संस्कृति वाला समाज व्यावहारिक धरातल की वास्तविकता में बहुत ही अधिक अमानवीयता व खोखलेपन को ही पोषित करता व जीता रहा। दर्शन को व्यवहारिक-जीवंतता के स्थान पर केवल शाब्दिक तर्कशीलता तक ही सीमित किया जाता रहा। वास्तव में भारतीय समाज की सबसे बड़ी ऋणात्मकताएं ढोंग, अमानवीयता व असंवेदनशीलता हैं और ये तत्व ही मूलभूत कारण हैं कि भारतीय समाज बहुत ही वीभत्सता के स्तर तक आंतरिक रूप से सड़ा हुआ है। फिर भी समाज के लोग जो खुद अपने ही जीवन में खोखले होते हैं, रटे-रटाए दर्शन की कृत्रिम शाब्दिक-तार्किकता से अपने को व अपनी संस्कृति को जबरन महान् सिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा लगाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गीता को महान् बताने वाला समाज, कर्म को ही उपेक्षित रखता आया है।

    यदि भारत को वास्तव में आगे बढ़ना है तो पूरी कठोरता व इच्छाशक्ति के साथ बिना लाग-लपेट के सामाजिक-नेतृत्व के प्रायोजनों की परंपरा व अनुकूलता से दृढ़तापूर्वक बाहर निकलकर वास्तविक स्वतः स्फूर्त सामाजिक-नेतृत्व के प्रस्फुटीकरण का बीजारोपण करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं।

    यह लेख “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक का अंश है, जिसमें लेखक “सामाजिक यायावर” सामाजिक-नेतृत्व व सामाजिक-आविष्कारों की बात करता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा  –Tribhuvan

    अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

    Tribhuvan

    प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘दॅ आइडिया ऑव जस्टिस’ के ‘दो शब्द’ वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों बहुत अपमान सहा था। हर आदमी जब अन्याय सहता है तो वह पिप की तरह ही सोचता है। ऐसा नहीं होता कि हम व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण बना ही दें; लेकिन यह उम्मीद और प्रत्याशा हर हृदय में स्पंदित होना स्वाभाविक है कि हमारे चारों तरह जो अन्याय का वातावरण बन गया है, उसे समाप्त किया जाए। यह अन्याय कई बार वास्तविक और कई बार छद्म रूप से तैयार किया जाता है।

    हम जिस देश और समाज में जी रहे हैं, वह बहुत ही अदभुत हैं। उसने हम सबको बहुत ही गिरगिटिया बना दिया है। इसे हम सब आए दिन देखते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। हम आए दिन देखते हैं कि शिड्यूल्ड कास्ट्स और शिड्यूल्ड ट्राइब्स विकराल समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इनका एहसास कथित ऊंची जातियों और उच्च शिक्षित लोगों को नहीं है। आज जिस तरह की डिस्पैरिटीज और जिस तरह के सब्जुगेशंस ये वर्ग भुगत रहे हैं, वह हमें बाहर से सामान्य बात लगती है, लेकिन आप जब इनके हृदय में उतरकर देखेंगे तो वहां आपको एक विकराल झंझावात दिखाई देगा। यह उस मिथकीय रामराज्य का भी कड़वा सच था और यह इस युग के रामराज्य का भी सच है कि यहां वनवासी हनुमान को ही सीना फाड़कर अपने हृदय में बसते राम का ही चेहरा दिखाना होता है। राम राम ही रहते हैं और वनवासी योद्धा हनुमान होकर भी सेवक ही रहता है और राम जी विजय की हुई स्वर्णिम सत्ता विभीषणों को ही सौंपते हैं। भले वह कालकूट विष पीने वाले शिव के आशीर्वाद से ही रची गई हो।

    दुनिया का एक यही देश है, जहां आज भी समाज आदिम तरह से न केवल बंटा हुआ है, बल्कि उसकी भाषिक संवेदनाएं भी आदिकालीन ग्रंथों से अनुप्राणित होती हैं। हमें समझ भी वही आता है। इसलिए वैज्ञानिक सत्य और शोध पर आधारित नई शब्द रचना हमें स्वीकार्य ही नहीं होती। हमारे यहां शिड्यूल्ड कास्ट 16.6 और शिड्यूल्ड ट्राइब 8.6 प्रतिशत हैं। इतना वर्ग इतना सा सरल नहीं है। यह 1108 अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है आैर उनका अपना ऊंच-नीच और छुआछूत है। यह 29 राज्यों में फैला हुआ मानव समाज है। हमारे एसटी 22 राज्यों में फैले हुए हैं और ये 744 तरह के आदिवासी समाज हैं, जिनकी अपनी बहुत समृद्ध और गौरवशाली परंपराएं हैं, लेकिन हमारे विकास की अाधुनिक धारणाओं और कामकाज की शैली ने इन्हें बर्बाद कर दिया है।

    सोशल मीडिया एक तरह का ख़तरनाक़ दर्पण है। यह एक तरह की खुली हुई पैथोलॉजिक लैबोरेट्री है। इसमें हर एक का ब्लड, स्टूल और स्पूटम समुद्र ही तरह से बह रहा है। बायोप्सियों के ढेर लगे हैं। इस विशालकाय पैथोलॉजिकल लैबाेरेटरी से किसी को गंध आ रही है और कोई घृणा में डूबा जा रहा है। कोई मुंह पर कपड़ा बांध रहा है और किसी ने नाक भींच ली है। लेकिन मानव समाज को एक स्वस्थ और विवेकशील समाज के रूप में देखने की कामना करने वाले लोग इसे किसी डॉक्टर की निगाह से देखेंगे। आज के एससी-एसटी वह नहीं हैं जो कल थे। उन्हें शिक्षा और जागरूकता ने सबके बराबर खड़ा कर दिया है। इससे वे कोई विवेकवान या कोई वैज्ञानिक सोच वाले हो गए, यह नहीं है। लेकिन यह सच है कि वे अब उन्हें छोटे-छोटे अन्याय भी उद्वेलित करते हैं। वे एक अब एक ताकत के रूप में गोलबंद हो गए हैं। उनमें सबके सब न तो शंभु हैं कि वे सांप्रदायिक लोगों का गुर्गा बनकर उनकी दमित रक्तपिपासा का शांत कर देे और न ही वे सबके सब प्रतिभा से दिपदिपाते लेखकीय प्रतिभा वाले ऐसे अति संवेदनशील रोहित वेमुल्ला हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय आत्महत्या कर लें।

    अब समय आ गया है कि हम हिंसा की मुखर आलोचना करें, लेकिन यह प्रतिज्ञा भी करें कि हम भारतीय समाज से अन्याय को मिटा देंगे। हम अन्याय को खत्म करके ही न्याय का संवर्धन कर सकते हैं। हम अपने घरों में उनका उसी तरह स्वागत सत्कार करें, जैसा हम अपने रिश्तेदारों से करते हैं। हम अपने घरों के अगवाड़े या पिछवाड़े एक-एक अलग से रखे चाय के कपों को हटा दें। हम अपने घरों के बाहर सफाई करने वाले या गंदे नाले में उतरकर सफाई करने वाले से ऐसा ही सलूक करें, जैसा एक आदर सरहद पर लड़ते किसी सैनिक का करते हैं। हमें अपने शब्दकोशों को बदल डालना चाहिए, जिनमें कथित अछूत जातियों के नामों को गालियों के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। हमें अपनी नैतिकता में आ चुकी कलुषाओं को धोना होगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी बस्तियों में वे लोग वैसे ही सम्मान से रहें, जिस सम्मान से एक स्वाभिमानी को रहना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने दिलो-दिमाग को मानवीय और न्यायशील बनाना होगा। हम ऐसे नहीं हैं, इसीलिए हमें अपनी जाति की हिंसा हिंसा ही प्रतीत नहीं होती और किसी अन्य जाति की हिंसा हिंसा दिखाई देती है। इसीलिए हमें गांधी जैसे महानायक की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आतंकवादी नहीं लगता, लेकिन एक खास इमारत के बाहर गोलियां चला देने वाला देशद्रोही लगने लगता है। हम इमारत के भीतर के देवता की हत्या करने वाले का तो मंदिर भी बनाने लगते हैं, लेकिन इमारत पर बंदूक तानने वाले को फांसी दिए बिना बेचैन हो उठते हैं।

    न्याय की यह पुकार इस महान देश की मिट्‌टी में वैदिक काल से भी शायद सैकडों-हजारों साल पहले की है। हमारी मानवीय चेतना उसी मिट्‌टी से नहाई हुई है। हमें इस धरती पर पल रहे समाज को एक अच्छे मानव समाज का रूप देने के लिए अपनी अपनी संस्कृतियों और अपनी अपनी मानसिकताओं में पल रहे अन्याय को खत्म करना होगा। यह काम हमें ही करना होगा; क्योंकि जिनके भरोसे हमने यह काम छोड़ दिया है, वे बहुत ख़तरनाक़ खेल खेल रहे हैं। वे अपनी सत्ता के लालच में 15 अगस्त 1947 से आज तक बच्चों के हाथों में बासुरियों के बजाय बंदूकें ही शोभित करवाने की संस्कृति को बढा रहे हैं। बच्चे सरदार भगतसिंह ने अंगरेजों को भगाने के लिए खेत में बंदूकें बोई थीं, लेकिन हमें स्वतंत्र भारत में बांसुरियां बोनी चाहिए, न के धनुष और सुदर्शन चक्र! यह राम आैर कृष्ण से भी पहले उन वैदिक ऋषियों का देश है, जिन्होंने मानवता की कोंपलों की रक्षा के लिए अपने आपको होमना सीखा था। यह रक्तपिपासुओं का नहीं, यह ऐसे आम भारतीयों का देश है, जिनके कंठ में राग और विराग पलता है। जहां संतों की वाणियां गूंजती हैं। यह सिर्फ इसी देश को एक परिवार नहीं, पूरी वसुधा को कुटुंब बनाने का स्वप्न रचने वाले लोगों के बच्चों का देश है। यह उन साधुओं और फ़कीरों का वह देश है, जहां एक ऐसे मानव समाज की कल्पना की गई थी, जो निखिल द्यु लोक में प्रेम प्राण, गान गंध और पुलक के झरने की कामना करते हैं। जहां हृदयों में हिंसक भाव नहीं, नीरव आलोक बरसता है। जहां स्वर्णिम उषा की अरुणाई से प्राण आरक्त होते हैं और अलसाई आंखों पर दूर्वादल के आेसकण नव जागृति लाते हैं।

    इसलिए स्वतंत्रता का स्वप्न तभी पूरा होगा जब अन्याय का अंधकार हम सबके हृदयों से हम स्वयं दूर देंगे।

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  • चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    चाय पर चर्चा : क़िस्त है तो जान है, जान है तो जहान है, मेरा भारत महान है –Pankaj Mishra

    Pankaj Mishra

    क्या पूछना है , तीस बरस की उम्र में हाउस लोन मिल गया …. और तीस ही बरस की क़िस्त , चुकाए जाओ मियाँ , किराए के घर में तो न रहना पड़ेगा , लाइफ में क्वालिटी तो होना ही मांगता है ….चुकाइये ..क्वालिटी !! तो भइये , घर में सब कुछ मोड्यूलर होना चाहिए तब न बात बनेगी , रह तो सब लेते है तो करना कुछ नही एक फॉर्म ही तो भरना है , किस्तें टाइमली …. यस बॉस

    अब एक बड़ी गाड़ी तो होनी चाहिए , तो हाज़िर है कल दरवाज़े पर खड़ी हो जायेगी , दस बरस तक लो इंटरेस्ट पर किस्तें भरिये , बिलकुल भरूंगा चाबी दीजिये , थैंक्यू …

    बड़ा वाला टीवी चाहिए , कहां मिलेगा , अरे on line ले लीजिए किस्तो पे , महंगा मोबाइल , फ्रिज ऐसी सब क़िस्त पे मिल तो रहा है , देर किस बात की पट्ठे ले लो , चुकाते रहना …

    इस गर्मी में क्या करूँ , क़िस्त पे इन्वर्टर लिया था तो उससे एसी कहां चलता है , क़िस्त वाला एसी बिजली से चलता है लेकिन अभी बिजली क़िस्त पे नही मिलती , लानत है ऐसे सिस्टम पे ….

    चलो कहीं पहाड़ों पर , गर्मी भर , मिसेज़ त्रिपाठी ठीक कह रही थी , भुवाली में क़िस्त पे फ़्लैट ही ले लिया होता तो अच्छा था , लेकिन कोई बात नही क़िस्त पे टूर पैकेज है न .. अलग अलग डेस्टिनेशन होना चाहिए वरना घूमने का मजा क्या …..

    क्या हुआ बेटा , सेलेक्शन हो गया न , कहता था मैं , कोटा महंगा है तो क्या हुआ … लेकिन IIIIIT ….के लिए बेस्ट है , इंस्टालमेंट में न लेते तो नही पढ़ा पाता … जरा FEE STRUCTURE पे क्लिक करो बेटा …
    बाप रे इत्ती फीस … ये फोटो ज़ूम करो ….थैंक गॉड ….. अच्छा है एजुकेशन लोन की सुविधा कालेज गेट पर ही उस लाल वाले टेंट में है … अरे तो कालेज भी तो एवन है …. कोइ पागल दास महाविद्यालय में , हिस्ट्री जाग्रफी संस्कृत से बीए थोड़ी करने जा रहा है बेटवा ….

    क्या हुआ जी , तुम्हारा मुंह क्यों टेढ़ा रहता है हमेशा , अभी उमर बीत नही गयी मेरी जोहराजबीं ..आज शाम को ही तनिष्क से डायमंड ज्वेलरी की बरसो की साध पूरी हो जायेगी ….. चुपचाप 11 + 1 वाले ऑफर में पांच साल से पैसा जमा कर रहा हूँ जानेमन ….. अब जरा मुस्कुरा दो ….मुस्कुरा दो प्लीज़ , वो तो अच्छा हुआ जो तीन साल से साहब ने स्टोर का चार्ज अकेले मुझे दे रखा है ….. वर्ना इतनी किस्तों को बोझा कैसे सम्भलता …..एक डायमंड रिंग साहब की मिसेज़ के लिए भी लेना था कल उनका बड्डे है , लोवर स्टाफ में सिर्फ मुझे ही बुलाया है …बहुत मानते है साब मुझे …सुबह कथा होगी , धार्मिक आदमी है , परिवार भी संस्कारी है …. सारा इंतज़ाम देखना है , सुबह पंडी जी को भी मुझे ही ले जाना है …उधर दुनिया को देखो सब संस्कार भूलते जा रहे है ..

    अरे ये पंडितवे सब राजनीतिक पंडित हो या धार्मिक ये सब तो और महान है , ये ससुरे उस महान भौतिकवादी का मजाक उड़ाते थे …पता नही कहां से ढूंढ के लाये और उसके मुंह में ठूंस दिए ” ऋणं क्रित्वा घृतम पीवेत …” अब देखो इन्हें , अब खुद क्या कर रहे है , किधर ले जा रहे है देस को ….. देखा जाए तो उसका उपहास उड़ाने के लिए बोले गये बोल आज वेदव्यास के मुंह से निकले बोल हो गए है ..सनातन संस्कृति के निवृत्ति मार्ग के संस्कारों की कैसे वाट लग रही है …..बस , इतना समझ लो भागवान , कि ये जो नेताओं की भाषणबाज़ी है न , ये सब के सब दोगले है , जो कहेंगे उसका उल्टा करेंगे , जिसका मजाक उड़ाएंगे उसी का एजेंडा चुपचाप लागू करेंगे , जो ज्ञान देंगे उसका उल्टा अभ्यास करेंगे , ये सा सा ह ह … आह आह … क्या हुआ …

    क्या हुआ जी …..

    कुछ नही थोड़ा दर्द है इधर ..

    अरे …बायीं तरफ … पसीना भी आ रहा है , हार्ट अटैक के लक्षण है , लेट जाओ …..अरे गुड्डू बेटा देखो तो जरा पापा को क्या हुआ है … बीपी की दवा तो खाई थी न जी आज …

    दवाई व्वाई छोडो , पहले वो अलमारी खोलो …, अरे वो नही वो मैरून वाली , अरे ट्रिपल डोर वाली , जो अमन स्टील वाला उधार दे गया था ….. देखो उसमे वो मेडिकल इंश्योरेंस वाली फ़ाइल रखी होगी , चेक करो .. पता नही रिन्यू कराया था या नही …

    oh my god …. ये तो लैप्स हो गयी है ….

    आं …..तब अपोलो में नही , मेडिकल कालेज चलो …

    कितनी बार कहा …मेडिकल इंश्योरेंस लैप्स न हो ….. लेकिन ..

    अब बड़ बड़ न करो …. दर्द कम हो रहा है ….राहत है …..angina लगता है … राजेश को फोन करो …आये तो पालिसी रिन्यू करा लूँ ……कल सारा चेकप करा लूँगा , लाल पैथोलॉजी वाले कम्प्लीट बॉडी चेकप पर डिस्काउंट दे रहे अपने मेम्बर्स को , लाइफ मेम्बरशिप ले लूँगा उसके बाद कराऊंगा तो चीप पड़ेगा … अब समझ में आ गया , जान है तो जहान है ….

    नही जी …..क़िस्त है , तो जान है , जान है , तो जहान है , मेरा भारत महान है …..

    ठीक कहती हो ….क़िस्त है तो जान है , जान है तो जहान है , मेरा भारत महान है …

    कतरा कतरा मिलती है 
    कतरा कतरा जीने दो 
    जिंदगी है बहने दो …… प्यासी हूँ मैं प्यासी रहने दो 
    रहने दो ……ना …

    बेटा जरा वॉल्यूम बढा दो …

    प्यासी हूँ मैं … प्यासी रहने दो ….ठीक है ठीक है , रहने दो …..अब जरा , पॉप मोड से स्टैण्डर्ड मोड पे कर दो …. फिर जाओ नहाओ , गर्मी बहोत है ….और खाना वाना खाओ , रात गहरा गयी है ….

    Pankaj Mishra

  • रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक जी का अचानक चले जाना अम्बेडकरवादी महिलावादी आन्दोलन के लिए गहन धक्का है क्योंकि उन्होंने जीवन प्रयत्न इन सवालों पर कोई समझौता नहीं किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए वह संघर्षरत रही. आज ये कठिन दौर में साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरुद्ध सीधे खड़े होने के लिए बहुत वैचारिक निष्ठां चाहिए होती है . रजनी तिलक उन गिने चुने लोगो में थी जो बिना किसी ईगो के ऐसे किसी भी प्लेटफार्म पर जाने के लिए तैयार रहती थी जहा जनता के प्रश्नों पर लोग लड़ रहे थे. इसलिए दिल्ली के जंतर मंतर पर हम उन्हें भगाना उत्पीडित लोगो के साथ खड़े देखते थे तो निर्भया आन्दोलन के वक्त भी उन्होंने औरो के साथ जुड़ने में कोताही नहीं की लेकिन समय समय पर लोगो को चेताते रहना के दलित महिलाओं के उत्पीडन के प्रश्नों पर तथाकथित प्रगतिशील और जनवादी लोगो को उतना ही बेचेन दिखना पड़ेगा जैसे वो निर्भया के लिए कर रहे थे लेकिन उनकी उन लोगो से कोई हमदर्दी नहीं थी जो इन आंदोलनों में न शामिल होने के लिए अलग अलग तर्क गढ़ रहे थे. वह कहती थी के बदलाव और न्याय के लिए संघर्ष करना जरुरी है और मात्र सोशल मीडिया में ही क्रांति करने से बदलाव नहीं आएगा जब तक हम अपने प्रश्नों के लिए जन संवाद नहीं करेंगे और संघर्षरत लोगो के साथ नहीं जुड़ेंगे.

    रजनी तिलक जोड़ने वाली महिला थी. वो ऐसी अम्बेडकरवादी संघर्षशील महिला थी जो किसी भी संन्घर्ष में तत्पर थी. वैचारिक रूप से सशक्त अम्बेडकरवादी होने के बावजूद संघर्षो में उन्होंने बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया. इस समय भी उनका येही कहना था के हिंदुत्व की कट्टरपंथी ताकतों को हराने के लिए हमें सभी प्रगतिशील शक्तियों के साथ आना पड़ेगा. यही कारण था वह हर जगह मौजूद रहती ताकि कोई ये न कहे के अम्बेडकरवादी अन्य आन्दोलनों और मुद्दों पर दूसरो के साथ खड़े नहीं होते. उन्होंने वामपंथी साथियो के साथ भी अपने को जोड़े रखा लेकिन जाति के प्रश्नों को गौण करने के लिए उनकी आलोचना भी की. समाज के लिए काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ वह आसानी से जुड़ जाती थी. रजनी जी को मै पिछले वीस से अधिक वर्षो से जानता था और हमने कई प्रश्नों पर साथ साथ कार्य किया. दरअसल दलित महिलाओं के प्रश्नों पर वह ग्रामीण क्षेत्रो की महिलाओं को वैचारिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए साथ साथ कई बातो पर विचार कर रही थी. इतने वर्षो में उनको समझने के बाद ही मेरा उनके प्रति सम्मान बहुत गहरा था क्योंकि उन्होने सुलझे हुए साथियो को आगे बढाया और केवल जुमले बाजी की राजनीती नहीं की. वह एक नयी पौध को तैयार कर रही थी और शायद यही बात उन्होंने मुझमे देखी के उत्तर प्रदेश के अलग अलग इलाको में हमने कैसे अम्बेदार्वादी नौजवानों को राईट बेस्ड काम करने से जोड़ा.

    रजनी जी के लेखन में उनके संघर्षो का प्रभाव है. उनका लेखन केवल किताबी पाठशाला का ज्ञान नहीं था जो उनके जीवन संघर्षो और आन्दोलनों में भाग लेने के बाद पैनी हुई समझ से बनता है. हालाँकि एक कवियित्री और लेखिका के तौर पर वह अच्छे से स्थापित हो चुकी थी लेकिन उन्होंने कभी इस बात का पाखंड नहीं किया और हमेशा से संघरशील साथियो के साथ ही जुडी रही. क्योंकि वह सामाजिक आन्दोलनों से जुडी रही और नैक्डोर और कदम जैसी संगठनों के साथ लगकर काम कर रही थी तो बहुत से लोगो को नाराज भी की लेकिन उनकी निष्ठां काम में थी इसलिए उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कोई क्या कहता है. हालाँकि ये भी हकीकत है के वह अपने को अन्दोलानात्मक संगठनो से जोड़े रखना चाहती थी और पिछले दो वर्षो से उन्होंने राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन को मजबूत करने का प्रयास किया और इस सिलसिले में वह देश के विभिन्न भागो में दलित महिलाओं के प्रश्नों पर नए युवा साथियो को जोड़ रही थी और उन्हें अम्बेडकरवादी विचारधारा, सावित्रीबाई फुले और ज्योति बा फुले के संघर्षो से भी रूबरू करा रही थी.

    संघर्ष के पथ पर कार्यकरते कई युवा साथियो के व्यक्तिगत प्रश्नों को भी बहुत ध्यान और गंभीरता से उन्होंने देखा. मुझे ऐसे कई मौको पर उनके साथ जाने और सीखने का मौका मिला जब साथी अपने रिश्तो के कारण परेशान होते है, जब समाज में अपने ही लोग आपके साथ नहीं होते. वो बहुत मुश्किल क्षण होते है. हकीकत ये है के हम सभी जो समाज बदलाव की लड़ाई लड़ते है तो व्यक्तिगत जिन्दगी में अक्सर स्वयम से भी संघर्ष कर रहे होते है. ऐसे वक़्त में बहुत की कम लोग होते है जो साथ खड़े होते है. मनुवाद या ब्राह्मणवाद को फेसबुक या किताबो में लेख लिखकर ख़त्म करदेना तो बहुत आसान होता है लेकिन ये हमारे अन्दर से निकलना तब तक नहीं हो सकता जब तक स्त्री पुरुष संबंधो पर हमारा नजरिया खुला हुआ न हो और यदि हम  वैयक्तिक स्वतंत्रता का समर्थक न हो तो हमारा मनुवाद विरोधी भाषण मात्र जुमला रहेगा. बाबा साहेब आंबेडकर ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था कि हमारा समाज अभी समाज ही नहीं बना क्योंकि यहाँ वैयक्तिक रिश्तो का कोई सम्मान नहीं है. रजनी जी दूसरो की तो पूरी मदद की लेकिन स्वयं की जिंदगी में वह इन संघर्षो से झूझती रही. कई बार अपने विषय में सुनी सुनाई बातो का अपमान भी झेला लेकिन इसके बावजूद भी उनके चेहरे पे हमेशा मुस्कान होना और फिर भी समाज के लिए सोचना उनकी असीमित ताकत को दर्शाता है.

    वह ग्रामीण महिलाओं के संघर्षो की कहानी लिखना चाहिती थी. पिछले बीस वर्षो में मैंने जैसे जैसे अम्बेद्कर्वादियो के अनुभवों को विडियो रिकॉर्ड किया और लिपिबद्ध किया उससे वह बहुत प्रभावित थी और बार बार मुझे लोगो के पास जाने के लिए कहती. आर पी आई के सबसे पुराने साथी ब्रह्मदेव जी के साक्षात्कार के लिए वह मुझे शाहदरा में उनके निवास स्थान के ले के गयी. उनका कहना था के ये सभी आन्दोलनों के लोग है जिन्होंने अपनी जिंदगी बाबा साहेब के मिशन के लिए लगा दी इसलिए उनके जीवन के अंशो को जानना जरुरी है. उन्होंने स्वयं एक छोटी से पुस्तिका ब्रह्मदेव जी के ऊपर भी लिखी. फिर उन्होंने श्री महरोल जी से बातचीत की व्यवस्था की और वजीराबाद स्थित उनके निवास स्थान पर ही इसकी व्यवस्था की. दोनों की स्थानों पर मेरे पास कोई कैमरा हैंडल करने वाला नहीं था और उन्होंने ही इसे हैंडल किया ताकि मै आराम से इंटरव्यू कर सकू. नागपुर में कुमुद पावडे जी से उन्होंने मेरा संपर्क करवाया और नतीजा यह हुआ के अम्बेडकरी आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण महिला से हमने साक्षात्कार किया. हमारे लिए संतुष्टि के बात ये होती है के उनके जीवन के बेहद महत्वपूर्ण सवाल लोगो के सामने आते है. महिलाओ के अपने संघर्षो की कहानिया और फिर बाबा साहेब का उनके जीवन में प्रभाव भी समाज में चेतना जगाने के लिए जरुरी है इसलिए के ये पहले की पीढ़ी है जिसके पास अपने को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया नहीं था, न ही खुद को प्रमोट करने वाली बाते. उन्होंने संघर्ष किया और समाज के साथ जुडी रही इसलिए हमारे लिए ये आवश्यक है ऐसे लोगो की कहानियो को कलमबद्ध किया जाए या उनको विडियो रिकॉर्ड किया जाए. रजनी जी इस सन्दर्भ में मुझसे बिलकुल सहमत थी और इसलिए उन्होंने इतने प्रयास किये. मेरे जीवन में ये दर्द हमेशा रहेगा के सबके इंटरव्यू करते वक़्त उनकी बाते रिकॉर्ड नहीं कर पाया. इसका कारण यही था के वह हमेशा टालती रही के पहले बुजुर्ग लोगो के इंटरव्यू कर लो, हमारा तो हो जाएगा. जिंदगी कितनी अनिश्चित है ये साफ जाहिर हो जाता है. दिसंबर के महीने में मैंने एक प्रश्नावली भेजी थी जो उनकी नयी पुस्तक सावित्री बाई फुले रचना समग्र के बारे मे और अम्बेदारकरवाड़ी आन्दोलन के समक्ष चुनातियो के लेकर था लेकिन उसके उत्तर नहीं आ पाए हालाँकि लगभग दो हफ्ते पूर्व जब मैंने उनसे बात की थी तो उनका कहना था के उन्होंने उस पर काम कर लिया है और और वह उसे भेज देंगी क्योंकि वह टाइप करने की स्थिति में नहीं थी. मार्च आखिर में उन्होंने अम्बेद्कर्वादियो के साथ मेरे साक्षात्कारो पर आधारित पुस्तक पर परिचर्चा करने की बात कही. अकसर वह मुझसे कहती के हिंदी में लिखो ज्यादा लोगो तक पहुंचोगे.. मैंने कहा मै समय समय पर हिंदी में लिख भी रहा हूँ और अब ज्यादा लिखूंगा.

    रजनी जी के साहित्य को मैंने पढ़ा. उनकी कविताओं के पहली पुस्तक पदचाप की कई प्रतियों के मैंने नौजवान साथियो में वितरित भी किया और उनकी कई कविताओं के हमने अपने आन्दोलन में महिलाओं को प्रेरित करने के लिए बैनर पर भी छपवाया. आज भी उन बैनरों को हम अपने विभिन्न कार्यक्रमों में इस्तेमाल करते है. उनकी आत्मकथा ‘अपनी जमी अपना आसमा’ की पहली प्रति उन्होंने मुझे दी. पिछले वर्ष तीन जनवरी को हम दोनों सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस से सम्बंधित कार्यक्रम में भाग लेने हरियाणा राज्य के मेवात क्षेत्र में स्थित स्थान नुहू गए थे और वहा से लौटने पर जब  हम स्वराज प्रकाशन में गए तो पता चला के पुस्तक आ चुकी है. उनके चहरे की मुस्कराहट दिखा रही थी के उन्हें इसका इतना इंतज़ार था लेकिन उन्होंने कहा के ये तो भाग १ है और अभी अन्य भागो की तैय्यारी कर रही थी. इस भाग में उनके जीवन सघर्ष की वह कहानी थी जिसमे परिवार में साधारणतः होता है के महिलाओं को पारंपरिक कार्यो में ही उत्तम समझा जाता है. उनकी जीवटता को सलाम करना पड़ेगा के कैसे उन्होंने इतने संघर्ष किये और अपनी शर्तो पर जिन्दगी जी जो बेहद मुश्किल काम है क्योंकि अधिकांशतः छोटी सुविधाओं की खातिर, संघर्षो से डरकर हम समझौता कर लेते है.

    उनकी पुस्तक ‘बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ’ में उन्होंने हमारे समाज में व्याप्त दोगलेपन का पर्दाफाश किया है. मुझे उन छोटी छोटी कहानियो को पढने में इतना मज़ा आया के पुस्तक शीघ्र ख़त्म कर मैंने तुरंत उसका रिव्यु भी लिख दिया जिसका शीर्षक मैंने ‘कामरेड का करवाचौथ’ दिया क्योंकि कहानिया दिखा रही थी के कैसे बड़े बड़े कामरेड भी समय पड़ने पर अपनी पत्नियों से करवाचौथ की अपेक्षा रखते है. ब्राह्मणवाद की यही बड़ी ताकत है के उसके सामने बड़े बड़े विचारशील और क्रन्तिकारी लोग भी घुटने टेक देते है. शायद ब्राह्मणवाद में जो पित्र-सत्ता है उसको कोई सुविधाभोगी नहीं छोड़ना चाहता चाहे वह राजनैतिक तौर पर कोई भी विचारधारा की बात कहता हो.

    रजनी जी के जाने की ये उम्र नहीं थी क्योंकि बहुत से कार्यो के लिए वह स्वयं को तैयार कर रही थी. जिस फुर्ती से उन्होंने पिछले एक वर्षो में सामाजिक कार्यो के अलावा साहित्य सृजन किया वह बेहद महत्वपूर्ण है और मेरा सर इस बात के लिए उनके समक्ष झुकेगा. आज उनकी और शेकर पवार जी की मेहनत के कारण सावित्री बाई फुले रचना समग्र निकालने में कामयाब हुई जो इस दौर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है. मै तो सामाजिक संघर्षो के सभी अम्बेडकरवादी, बहुजन साथियो से अनुरोध करूँगा के वे इस पुस्तक को जरुर पढ़े और इमानदारी से अगर वे चले तो सामाजिक बदलाव अवश्यम्भावी है. बदलाव तो होना ही है लेकिन वो कैसा हो इसे समझने के लिए माँ सवित्ग्री बाई फुले के संघर्षो को और उनकी कविताओं, भाषणों और ज्योति बा को लिखी उनकी चिट्ठियों को पढ़ लेंगे तो पता चल जाएगा के हमारी सामाजिक सरकार कैसे होने चाहिए. ज्योति बा और सावित्री बाई इस सन्दर्भ में एक क्रांतिकारी युगल है जिनसे इस समाज के सोचने की दिशा बदल सकती है.

    एक सन्दर्भ में रजनी जी भी सावित्री बाई के सच्ची उत्तराधिकारी थी क्योंकि उनकी साहित्य सृजन में कोई दंभ नहीं था. भाषा बिलकुल आप बोलचाल वाली और संघर्षो से निकले अनुभव की थी. वह सावित्री बाई के साहित्य को मराठी से निकालकर हिंदी की विशाल जनता के समक्ष लाने वाली महिला थी और कम से कम उन गिने चुने लोगो में थी जिन्होंने ३ जनवरी को सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को शिक्षक दिवस में मनाने वाली परंपरा का निर्वहन लगातार किया. ये कैसा अजीब संयोग के उनकी मेरी अंतिम मुलाकात आन्ध्र भवन में सावित्रीबाई फुले रचना समग्र के विमोचन के समय पर २७ जनवरी को हुइ हालाँकि फ़ोन पर उनसे लगातार बात होती रही. मुझे दुःख है के पूरे मार्च में दिल्ली से बहुत दूर था और २९ मार्च को शाम जब में सिलीगुड़ी दार्जीलिंग क्षेत्र में था तब अनीता भारती जी की फेसबुक पोस्ट से पता चला के उनकी तबियत बिगड़ गयी है. मुझे रात भर नींद नहीं आये क्योंकि एक भय सा मन में आ गया. लगभग तीन बजे रात मेरी नींद खुले तो अपने मोबाइल पर फेसबुक अपडेट जानने लगा तो शबनम हाश्मी जी की पोस्ट से इस दुखद खबर की जानकारी मिली. यकीं नहीं हुआ, बहुत कोशिश की भरोषा न करने का. ये ऐसी घटना थी जिसने एक प्रकार से तोड़ के रख दिया क्योंकि रजनी जी के साथ जिसने भी काम किया उसे उन पर भरोषा था, वो हमारी एक मज़बूत स्तम्भ थी जो हर जगह हर उस व्यक्ति का साथ देने के लिए तैयार खड़ी थी जो समाज के लिए लड़ रहा था या जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो. दिल्ली की विषाक्त हवा में बहुत की कम ऐसे साथी है जिनसे मिलकर आपको ताकत मिलती हो और मेरा ये मानना है के रजनी जी वो शक्शियत थी जिसने आपको गलती पर डांटने में कोई परहेज नहीं किया लेकिन आपकी जरूरतों के समय पर वह मजबूती के साथ खड़ी रही .

    रजनी तिलक के असमय जाने से सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे अम्बेडकरवादी साथियो का तो बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है. मेरे लिए यह एक व्यक्तिगत क्षति है क्योंकि मैं तो उनसे लगातार बात करता रहता था और बहुत सी बातो में उनकी आवश्यकता महसूस होती थी तो वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहती. उनके निधन पर जिस प्रकार से देश भर से अम्बेडकरवादी, मानवाधिकारवाड़ी, महिलावादियों और वामपंथी साथीयो के शोक सन्देश आये है उससे जाहिर होता है के उनका दायरा कितना विस्तृत था और किस प्रकार इन संपर्को को उन्होंने सींचा. मुझे उम्मीद है के रजनी तिलक जी के संघर्ष और उनके विचारों को सभी साथी लोग आगे बढ़ाएंगे. ख़ुशी की बात यह है के वह अपने जीवन से हम सबको प्रेरणा देकर गयी है, वह लड़ी तो एक योद्धा बनकर. उनका साहित्य और उनके समर्पित सामाजिक कार्य हमेशा हमें मजबूती प्रदान करते रहेंगे.

    Vidya Bhushan Rawat

  • क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

    क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

    Tribhuvan

    इस देश के लोगों की बातें सुनें तो लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इसी धरती पर वास करते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों ने एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने वाले सुप्रीमकोर्ट के एक अवांछित हस्तक्षेप के विरोध को लेकर जिस तरह आंदोलन किया, वह शांतिपूर्ण अांदोलनों की आवाज़ों को नोटिस न करने वाले नेताओं की खोपड़ियों को झकझोरने के लिए काफ़ी है।

    आज़ादी से पहले सरदार भगतसिंह ने बहरों की सरकार को सुनाने के लिए कम नुक़सान करने वाले बम फोड़े थे। आज़ादी आकर छीज भी गयी। और राजनेता वैसे के वैसे और वहीं के वहीं। ढीठ शब्द ही शर्मसार है। काठ के कानों, प्लास्टिक की आंखों और अमेज़ॉन से आयातित दिलों वाले इन राजनेताअों और आम लोगों की विवेक बुद्धि के लिए एक-दो छोटे उदाहरण काफ़ी होंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिलाओं ने बेहद शालीन और शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन सरकारों, मीडिया और प्रशासनिक मशीनरी ने ध्यान ही नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट तक तो आवाज़ भी नहीं पहुंची। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन उन्हें काग़ज़ी भुलावे देकर वापस भेज दिया गया।

    आतंकित कर देने वाले और पूरे देश में भय फैला देने वाले आंदोलन करना जैसे भारत मां के सच्चे सपूत होने का प्रमाण है। जैसे घर का सबसे लाड़ला सबसे ऊधम भरे आंदोलन करने का अधिकार रखता है। बर्तन तोड़ेगा, घड़े फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा और सपूत का सपूत रहेगा। मां भी चुपचाप सुनेगी। बाप भी। बाकी बहन-भाई टुकुर-टुकुर देखेंगे कि उन्हें यह अधिकार कहां है! इसका आंदोलन-उसका आंदोलन। जिन्हें आपने कमज़ोर देखा या लगा कि इनका वोट तो मिल ही जाएगा या जिनका वोट मिलना ही नहीं है तो बंदूक भी चलाई और टैंक भी दौड़ाया। ठांय-ठांय। कितने सुसंस्कृत लोगों का यह अरुण मधुमय हमारा देश है। हम अपने इस देश में हर साल एससी कहे जाने वाले भारतीय नागरिकों पर 40,000 से ज्यादा अत्याचार करते हैं। और इनमें सज़ाएं होती ही नहीं हैं। सिर्फ़ पकड़-धकड़ करके छोड़ दिया जाता है।

    कितनी हैरानी की बात है कि इस देश के सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद से आज तक अनुसूचित जनजाति का कोई जज ही नहीं बना है। शिड्यूल कास्ट न्यायाधीश भी अभी सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। आप कत्लेआम भी करेंगे और यह भी दावा करेंगे कि आपकी तो पुश्तों में भी किसी को तेग़बाज़ी का शौक नहीं है। आप सत्ता में बैठे रहते हैं, कभी बाबरी मस्जि़द ढह रही होती है और कभी सड़कों पर उतरा आंदोलनकारी आपकी कानून और व्यवस्था के रामलला को बंधक बनाकर छोड़ देता है। और इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की बेचारगी का आलम ये होता है कि वह हिंसक समूहों को सलाम करने के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। बस यह जुमला जुबान पर रहता है कि ये सब हमारे धर्म के रक्षक भाई हैं और ये तो ऐसा नहीं कर सकते।

    इस देश के राजनेताओं की इससे बदतर तसवीर और क्या होगी कि वे पड़ोसी देश के साथ बैठकर समस्या का राजनीतिक हल नहीं निकाल सकते और इस देश के आम जवान को मरने के लिए हवि बनने देते रहेंगे। सरहद पर कभी अपना बेटा नहीं भेजेंगे। क्योंकि हमारे यहां किसान जातियां हैं और उनके बेटे जय जवान जय किसान सुनकर आ ही जाएंगे। क्या पुलिस के जवान इसी तरह पिटने और मारखाने के लिए बने हैं? हिंसक आंदोलनों में हमारे अपने ही बेटे कब तक पुलिस की वर्दी पहनकर अपने ही भाइयों के हाथों नृशंसता से पीटे और मारे जाते रहेंगे? आप समस्याएं सुलझाएंगे नहीं, बल्कि चुनावी जीत के लिए इस तरह के हिंसक प्रदर्शनों और खून सने रास्तों से अपनी चुनावी जीत के रथों में जुटे हुए घाेड़ों के लिए ऊर्जा जुटाएंगे और इस देश का आम नागरिक तमाशबीन बनकर आपको सत्ता का भोग लगाता रहेगा। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी कम्युनिस्ट, कभी समाजवादी! कभी आम आदमी और कभी खास आदमी।

    यह कितनी अजब बात है कि सभी राजनेता उस कूचे में बे-सबब धूम-धाम कर रहे हैं, जहां अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निर्धनों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की हालत रुला देने वाली कर दी जाती है। इस अरुण मधुमय देश में हर साल तीस हजार से ज्यादा हत्याएं की जाती हैं। 2014 में 33,981, 2015 में 32,127 और 2016 में 30,450 हत्याएं हुईं। किसी साल 77,237, किसी साल 82,999 और किसी किसी साल 88,008 अपहरण होते हैंं। हर साल 48 लाख से ज्यादा अपराध होते हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र देश में नागरिकों के लिए सबसे असुरक्षित इलाके हो गए हैं। हम महिलाओं को देवियां मानते हैं और बेटियों को अपना गर्व घोषित करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि हर साल महिलाओं के खिलाफ तीन लाख से ज्यादा अपराध घटित होते हैं। कभी 3,39,457 तो कभी 3,29,243 और कभी 3,38,954 अपराध। महिलाओं के प्रति क्रूरता के मामले में पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तरप्रदेश बहुत आगे हैं। ख़ासकर पति और उसके रिश्तेदारों की क्रूरता के मामले में। हर साल देश में 1,10,378, पश्चिम बंगाल में 19,302, राजस्थान में 13,811 और उत्तरप्रदेश में 11,156 महिलाएं पति और पति के रिश्तेदारों की हिंसा का शिकार होती हैं।

    जौन एलिया ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही है : नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम। बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम! लेकिन मेरा कहना है कि जब हम सबको साथ ही रहना है तो झगड़ा क्यूं करें हम? हम अपनी बात ख़ामोशी से भी तो कह सकते हैं और राजनेता ख़ामोश बातों को भी तो गंभीरता से ले सकते हैं। क्यों इतनी हिंसा और क्यों इतना हंगामा? क्यों बार-बार वफ़ादारी के दावे और क्यों बार-बार अग्निपरीक्षाएं? अगर अग्नि परीक्षाएं सीता माता को न्याय नहीं दिला सकतीं और वह भी भगवान राम जैसे शासक के होते हुए तो आज के शासक तो उनके सामने धूल का कण भी नहीं हैं। ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम। ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम! वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम! हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम? किया था अहद जब लम्हों में हमने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम! नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी तो फिर दुनिया की परवाह क्यूँ करें हम। लेकिन ख़ामोश और शालीनता भरी आवाज़ों को आप नहीं सुनेंगे तो आपको वही मिलेगा, जो आज सड़कों पर मिला है, जो कल हरियाणा में जाटों और परसों राजस्थान में गुर्जरों से मिला था। लेकिन ये अब कटु सच स्थापित हो गया है कि इस देश की धरती पर सिख और मुसलमान कभी दलितों, जाटों, गुर्जरों और हिंदुत्ववादियों जैसे आंदोलन का अधिकार नहीं रखते! क्योंकि अब एक ही तरह के राजनीतिक आचरण की चदरिया को देशद्रोह और देशभक्ति की इड़ा और पिंगला में बीन दिया गया है। लेकिन आसनसोल हो या नक्सलवाड़ी, जेतारण हो या जम्मू कश्मीर-हिंसा को हिंसा ही समझा जाना चाहिए। हिंसा का रंग देखेंगे तो आपकी आंख प्लास्टिक की, कान काठ के, दिल खंगर ईंटों का और चेतना भुस से भर जाएगी!

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  • मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani, Rtd
    IIT Bombay

    हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – एक, समुदाय के अन्दर और दूसरा, समुदाय के बाहर – और इन दोनों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। इन दोनों के जटिल संयुक्त प्रभाव से ही समय के साथ किसी भी समुदाय में परिवर्तन आते हैं। जहाँ मंदर का फोकस मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले बाहरी नकारात्मक प्रभावों पर है वहीं रामचंद्र गुहा, समुदाय के भीतर के कारकों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। 

    पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम समुदाय में आंतरिक तौर पर जो कुछ हो रहा है, उसे समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह जान सकें कि हामिद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान जैसे सुधारक क्यों कुछ विशेष नहीं कर सके। समुदाय में सुधार की प्रक्रिया, मुख्यतः उसमें व्याप्त असुरक्षा के भाव के कारण बाधित हो रही है। इस भाव के बढ़ने के दो कारण हैं – पहला, राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा, जिसके कारण इस समुदाय को जान-माल और रोज़गार का बहुत नुकसान हो रहा है। दूसरा, कई तरीकों से इस समुदाय को आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर धकेला जा रहा है। इन दोनों कारणों से यह समुदाय दकियानूसी विचारों को गले लगा रहा है और रूढ़िवादी मौलानाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

    वैश्विक स्तर पर तेल के संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति के चलते, इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का उदय हुआ और उससे उभरा वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति भय का भाव और मुसलमानों का दानवीकरण करने की प्रक्रिया। आज मुस्लिम पहचान को समाज के लिए एक खतरे की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दोनों के कारण हमारे देश में भी कट्टरपंथी नेतृत्व का मुस्लिम समाज पर नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा है। बहुत पहले, सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मैंने अचानक पाया कि मेरे मार्गदर्शन में शोध कर रहे अध्येता, दिन में कई बार मस्जिद जाने लगे और मेरे एक साथी शिक्षक ने अपने उपनाम, जो पहले उनके धर्म को इंगित नहीं करता था की जगह ऐसे उपनाम का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिससे यह साफ हो जाता था कि वे मुसलमान हैं। आईआईटी मुंबई के परिसर में निवास करते हुए मैंने देखा कि गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद केम्पस में मुस्लिम लड़कियां जो तब तक सलवार-कमीज या पेंट और शर्ट पहनती थीं, अचानक बुर्का ओढ़ने लगीं।

    मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए बम विस्फोटों के बाद, पुलिस ने तुरत-फुरत बड़ी संख्या में मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया और अदालतों से बरी होने के पूर्व, उन्हें कई साल सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। इससे भी सुधार की प्रक्रिया बाधित हुई। शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बहुत आतुर था परन्तु बाटला हाउस मुठभेड़ और आजमगढ़ और भटकल जैसे स्थानों के दानवीकरण ने शिक्षा को उनकी प्राथमिकता नहीं बनने दिया।

    इस परेशानहाल समुदाय में सुधार की प्रक्रिया कैसे सफल हो सकती है? जैसा कि हर्ष मंदर ने लिखा है, इस समुदाय का संपूर्ण राजनैतिक हाशियाकरण हो चुका है। सांप्रदायिक दंगों के चलते वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सन 1992-93 की हिंसा के बाद मुंबई के नज़दीक मुम्बरा अस्तित्व में आया तो 2002 के बाद, जुहापुरा। किसी डरे-सहमे और अपने में सिमटे समुदाय में किस हद तक सुधर लाया जा सकता है? कई विवेकशील और प्रबुद्ध मुसलमानों ने अपने समुदाय में शिक्षा को प्रोत्साहन देने के सघन प्रयास किए। अपनी एक अमरीका यात्रा के दौरान मुझे कई ऐसे मुसलमानों से मिलने का मौका मिला जो वहां अलग-अलग पेशों में थे। वे सब इस बारे में एकमत थे कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने के ज़रुरत है और वे इसके लिए भी तैयार थे कि वे भारत में इस समुदाय के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाएं और युवा मुसलमान लड़कों व लड़कियों के लिए वजीफों की व्यवस्था करें। इससे उन प्रयासों को मजबूती मिलेगी जो गुजरात में जेएस बंदूकवाला और देश भर में मुसलमानों की कई संस्थाएं कर रहीं हैं।

    आज देश में दक्षिणपंथ का जोर बढ़ रहा है और चुनाव जीतने के लिए नेताओं को अपने हिन्दू होने का दंभ भरना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही, “जो लोग भारत में रह रहे हैं, वे सब हिन्दू हैं” (मोहन भगवत) जैसे दावे, मुसलमानों को आतंकित कर रहे हैं। इसी के चलते असगर अली इंजीनियर जैसे लोग, जिन्होंने इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया और समुदाय में सुधार की नींव रखी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। मुस्लिम समुदाय आज एक दुविधा में फंसा हुआ है। उसका केवल राजनैतिक हाशियाकरण ही नहीं हुआ है बल्कि उसे घृणा का पात्र बना दिया गया है। इसके लिए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग किया गया और यह दिखाने का प्रयास किया गया कि हिन्दू, मुस्लिम राजाओं के हाथ प्रताड़ित हुए थे।

    जहां तक हामिद दलवई या आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों का सवाल है, उनके प्रयासों की सराहना करने में हम गुहा के साथ हैं परंतु हम सबको यह भी समझना होगा कि मुस्लिम समुदाय को एक कोने में ढकेला जा रहा है। आज भी देश के विभाजन और कश्मीर की समस्या के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। पिछले एक दषक में मेरे कई मुस्लिम मित्र, जिन्हे मैं कभी उनके धर्म की दृष्टि से देखता ही नहीं था, भी यह सवाल उठाने लगे हैं कि आज भारत में मुसलमान होने का क्या अर्थ है। मुसलमानों की उदारवादी परंपरा, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान से लेकर जाकिर हुसैन, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और जावेद अख्तर जैसे लोग शामिल हैं, आज भी जिंदा है परंतु समस्या यह है कि उनके समुदाय में उनकी सीमित स्वीकार्यता है।

    आज भी ’मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी’ और ’माडरेट मुस्लिमस’ जैसे संगठन, इस्लाम के मुल्ला संस्करण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। जिस सवाल पर हमें विचार करना चाहिए वह यह है कि सज्जनता, विवेक और तर्क की इन आवाजों को मुस्लिम समुदाय में तव्वजो क्यों नहीं मिल रही है। क्या कारण है कि यह समुदाय अब भी रूढ़िवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह भी दिलचस्प है कि आज हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आकर और वर्तमान सत्ताधारियों की सोच के चलते,बहुसंख्यक समुदाय भी आस्था और सच, मिथक और यथार्थ के बीच का भेद भुलाता जा रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हामिद दलवई जैसे लोग जो सुधार के प्रति प्रतिबद्ध थे और असगर अली इंजीनियर जैसे व्यक्तित्व जो इस्लाम का मानवतावादी चेहरा लोगों के सामने ला रहीं थीं, की आवाज सुनी और समझी जाएगी। यह भी आवश्यक है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के बढ़ते कदमों को रोका जाए क्योंकि वही समाज में इस समुदाय के प्रति घृणा उत्पन्न कर रहा है और इसे हाशिए पर ढकेल रहा है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

    हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए

    Atul Kumar Rai

    गाँव में सुबह उठते ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है और पता चलता है कि रात का बिछौना सुबह ओढ़ना हो जाए उसे चैत का महीना कहतें हैं। खटिया पर ऊंघते हुए देखता हूँ सात बज रहे हैं। सभी लोग अपने काम में लगे हैं। जैसे एक बहन खाना बना रही है। छोटी वाली पढ़ाई कर रही है। भाभी अंचार सूखा रहीं हैं। बड़का बाबू गाय को लेहना दे रहें हैं।

    मन में आता है कि बनारस के स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार एक घण्टा और सो लेना चाहिए। लेकिन माताजी इन अरमानों का धूप जलाकर दुर्गासप्तशती का पाठ रोकते हुए धीरे से कहती हैं…

    “जइबs खेतवा में हो.बनिहार आ गइल बाड़े सs.”

    मैं सर हिलाकर सहमति प्रदान करता हूँ.

    उसके बाद दोनों ओर कुछ देर तक एक गहरी खामोशी रहती है…मन में आता है कि क्यों न आदत के अनुसार मोबाइल में नोटिफिकेशन चेक कर लिया जाए…बारी-बारी से सभी को देखने लगता हूँ.. फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर, इंस्टाग्राम.

    माँ हाथ में मोबाइल देख एक बार और रुक जाती है..इस बार स्वर और लय में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है…

    “उठबs की ना हो..”

    मैं फिर सहमति में सर हिलाता हूँ.तब तक माँ का भाषण तार सप्तक के पंचम में पढ़ा जाने लगता है..और देखते ही देखते उससे जो सुमधुर और अत्यंत ही अझेलनीय ध्वनि निकलती है उसका मतलब ये होता है कि…

    “खेती नामक कार्य मेरे जैसे शहराती लोगों के बस की बात नहीं है. क्योंकि हमारी आदत को मोबाइल ने माटी में मिला दिया है..और आजकल के लड़के पता न अपनी किस नवकी माई को सुबह से लेकर शाम तक निरेखते रहतें हैं. रात को दो बजे सोएंगे तो उठेंगे कब. मेरा बस चले तो मोबाइल को चूल्हे में झोंककर उस पर खिचड़ी बना दूँ”

    हाय! मेरा दिल बैठ जाता है..”बस करो माई..’

    तब तक इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञान छोटी बहन दे देती है कि “ए मम्मी जब इहाँ सात बजे उठ रहा तो बनारस कs बजे उठता होगा हो”?

    मुझे गुस्सा नहीं आता है, न मां पर, न बहन पर। सोचता हूँ कि इसके पहले मां दुर्गासप्तशती का पाठ छोड़कर शिवतांडव पढ़ना शुरू करे, उठ जाने में ही भलाई है।

    इधर कमरे से बाहर कदम रखते ही एक दूसरे दृश्य से सामना होता है. लोग खेतों की ओर चले जा रहें हैं. सबके जबान पर खेती की बातें हैं और हवा में चैत की महक। कुछ देर खड़े होकर सोचता हूँ कि पता न ये वाली हवा किस एयर प्यूरीफायर और किस एसी से निकल के आ रही होगी.. इतनी शीतलता और इतनी ताज़गी कि मन भीग उठता है। सुबह का सूरज चमक रहा है…किसी सितार के तार की तरह गेंहू हिल रहें हैं..चना अधपका है…जिसे मुंह में डालते ही एक अनजानी सी मिठास रोम-रोम में फैल जाती है.

    सरसों पक के झुनझुने की तरह बज रहे हैं. उधर मेढ़ लगा रहे.. खेत काट रहे, पानी चला रहे चाचा, बाबा, भइया लोगों को प्रणाम करते, हाल-चाल लेते हुए बगीचे के आखिरी आम के नीचे वाले बरम बाबा को गोड़ लागते, सूख चूके महुआ के अंतिम पेड़ पर अफ़सोस करते हुए जब अपने खेतों में पहुंचता हूँ तो देखता हूँ कि अभी तो कोई आया ही नहीं यार…

    “ई हमार माई भी न..?

    क्या कहें..बदन को सिहराती हवा में मन तो करता है कि अतुल बाबू कुछ देर यहीं बिछाकर सो लिया जाए. मां यहां देखने थोड़े आएगी..लेकिन मन विद्रोह कर जाता है..”कि तुम बनारस से सोने आए हो कि दँवरी करवाने आए हो”..?

    तब तक चाचा ये कहकर इस चिंतन पर विराम दे देते हैं कि “खाली बैठकर क्या करोगे…सरसो ही काट दो. घूरन बो आती ही होंगी”।

    ये सुनकर अपने निठल्लेपन पर आंशू आने लगता है. लेकिन एक उत्साह से हाथ में हंसुआ उठाता हूँ.. मानों आज कीम जोंग के सगे फूफा किसी नई मिसाइल का टेस्ट करने जा रहें हों..

    मन करता है हँसुआ का दाँत गीन लें. तब तक चाचा मेरे कपड़े को देखकर ताना मारतें हैं… जिसका मतलब ये होता है कि..”सूट पहन लिए होते या शेरवानी.लोअर और टी शर्ट में कुछ मजा नहीं आ रहा है..”

    मैं हंसना छोड़कर सरसों काटने लगता हूँ..इधर चाचा से बगल वाले खेतों में काम कर रहे कुछ लोग पूछते हैं..”ई नया किसान के ह हो” ?

    चाचा अत्यंत ही व्यंगात्मक आवाज में जबाब देते हैं..”अरे! जीतन भाई ई किसान जो है न कि हॉलैंड में रहता है, और वहाँ बावन बीघा पुदीना बोकर सीधे यहीं आ रहा है”

    मैं अपनी इस बेइज्जती पर झेंपता हूँ.. तब तक पता चलता है कि घूरन बो बड़की माई अपने लाव-लश्कर के साथ बोझा बांधने आ गई हैं. साथ में बीसराम बो चाची और नमूना बो भौजी, उनके बेटा-पतोह सबके हाथ में बोझा बांधने वाला बांस का कोइन है, दूसरे हाथ में हंसुआ, तेतरा और सनीसवा के हाथ में मोबाइल और मोबाइल में गाना..

    “तू तs बहरा में करेलs आराम
    चइत में हमरा घाम लागsता’

    इधर घूरन बो बड़की माई मुझे सरसो काटता देख चाचा पर खिसियाती हैं..”काहें हेह घामा में हमार लइका के जान लेत बाड़s हो”

    बड़की माई की इस बात को सुनकर मन श्रद्धा से भर जाता है..वो हमारी बनिहार हैं,और कहतें हैं माँ-पापा की शादी से दस दिन पहले उनकी शादी हुई थी..और तेइस-चौबीस साल पहले मेरे संयुक्त परिवार वाले घर के पवनीयों में एक वहीं थीं, जिससे मां बिना घूंघट काढ़े भी घण्टो बतिया सकती थी. घर वालों से छिपाकर उनको कुछ दे सकती थी.और हर महीने दिल्ली रहने वाले उनके पति घूरन को चिट्ठी लिख सकती थी. यही कारण है कि हम सब भाई-बहन उनको बड़की माई कहतें हैं.

    वो मुझसे जब मिलतीं हैं तो बताती हैं कि मैं पैदा हुआ तो मेरी आजी ने उनको पायल दिया था. अब मेरी माँ ने कहा है कि बेटे की शादी में कुछ बढ़िया देगी. यही कारण है कि मुझे देखते ही उनका पहला सवाल होता है कि “कहिया बियाह करबा बबुआ..” ?

    मैं बबुआ नामक प्राणी बियाह के नाम पर बड़े ही रस्मी तरीके से मुस्कराता हूँ. तब तक पता चला है धूप तेज हो चली है और उधर बोझा बांधना शुरू हो गया है. मैं खेत की मेढ़ पर बैठ जाता हूँ.इधर पापा मुम्बई से फोन कर रहे…”ठीक से बोझा गीन लिहs..”

    मैं गिनती भूल गया हूँ.. देख रहा बनिहारों के हाथों को, उनकी अदम्य जिजीविषा को, कर्मठता और धैर्य को, वो ऐसे डूबे हैं जैसे डूब जाता है अलाप में खोया कोई ख्याल गायक, किसी नृत्य के साधक की साधना जैसे अचंभित कर जाती है..वैसे ही अचंभित कर जाता है उनका आपसी सामंजस्य..

    इधर नमूना बो भौजी को तेतरा छेड़ता है. सुना है नमूना भइया खेदन के संगे लोधियाना रहतें हैं. फगुआ में नहीं आए की एक्के बार अपने सार के बियाह में आएंगे. सनीसवा मोबाइल की आवाज़ बढ़ा देता है.और गाना बज उठता है..

    “तू तs लोधियाना में करs तारs ड्यूटी
    पछुआ के हवा मोर बिगाड़ देता ब्यूटी”

    घरवा रहितs तs पका के देहतs आम
    चइत में हमरा घाम लागs ता”

    हाय! नमूना बो भौजी ये गाना सुनकर किसी नवकी बहुरिया जैसा शरमाती हैं और देखते ही देखते दो घण्टे में पौने डेढ़ बीघे की मंसूरी बांध दी जाती है. खेत में ही बोझा बांधकर रख दिया जाता है.

    बारह बजने को होते हैं. तापमान चालीस हो चला है. पता चला ट्रैक्टर तीन बजे आएगा. तब तक खेत की मेढ़ पर बैठकर आराम करना चाहिए. माँ ने खेत में ही खाना और पानी भेजवा दिया है।

    आज पहली बार खेत में पराठा-भूजिया-अंचार खाते हुए एक ऐसे स्वाद से सामना होता है, जो महंगे से महंगे रेस्टुरेंट में खाकर कभी न हुआ।

    शाम को थ्रेसर लेकर ट्रैक्टर आता है. और देखते ही देखते सभी मंसूरी के बोझा को भूसा और अनाज में तब्दील कर देता है. अनाज घर आता है. मंसूरी को हाथ में लेते ही मां की आंखें चमक उठती हैं. मानों माँ अनाज को नहीं, सोने से जड़ी कोई बहुत खूबसूरत चीज़ को छू रही हो…बहन मंसूरी को मुंह में डाल लेती है।

    मां खिसिया जाती है..जिसका मतलब ये होता है कि “पागल कहीं की पहले अनाज देवता-पीतर और डीह बाबा काली माई को जाएगा..आखिर उन्हीं के आशीर्वाद से तो आंधी-तूफान और बारिश से बचकर अनाज किसान के घर में आता है’

    इधर मेरी हालत पस्त हो जाती है. और उस समय पता चलता है कि खेत मे जाकर खेती करने और कमरे में बैठकर खेती के बारे में लिखने में बड़ा भारी अंतर है.

    और हो सके तो हिंदी के कुछ लेखकों और एसी में बैठकर कभी न खत्म होने वाला चिंतन कर रहे कुछ कृषि विशेषज्ञों को कुछ दिन खेत में बिताना चाहिए..

    रात को कब नींद आ जाती है. समझ में नहीं आता है..आधी रात को नींद खुलती है. तो देखता हूँ किसी ने तेल रख दिया है कपार पर. पैर में.. माथे पर.. बदन टूट रहा है. उसी समय उन मजदूरों और खेतों में रोज मेहनत कर रहे लोगों को नमन करने का मन होता है।

    मोबाइल देख रहा तो डेढ़ बजे रहें हैं. आज नवमी का कलशा रखा गया है.. घर धूप-बाती अगरबत्ती से महक उठा है.. समूचा गाँव सो रहा है. और चारों ओर से पचरा की आवाज़ आ रही है. माँ किसी साध्वी जैसी कलश के सामने बैठकर गा रही है.

    “जवनी असिसिया मइया मलीया के दिहलु
    उहे असीसिया ना।
    हमारा अतुल बाबू के दिहतु कि उहे असिसिया ना”

    ये सुनते ही मेरा मन लोक की इस सुगन्ध में तैरने लगता है. और उस दिन पता चलता है कि अपने गाँव आना, अपने घर आना, अपनी टूट रही जड़ों को सींचना हैं।

    सुबह उठता हूँ.. भारी मन हल्का हो चला है..और लग रहा जैसे कि शहर माथे पर रखा एक तनाव है. और गाँव थाती में मिला एक सुकून. जिसे सम्भाला है खेतों ने, खलिहानों नें. गांव की टूटती पगडंडियों नें..मां के गीतों और बिना मतलब आपसे घँटों बतियाते लोगों नें..

    आखिर घर से बनारस चलते समय मन उदास हो जाता है. रह-रहकर कुछ ही दिन पहले गुज़र चूके प्रिय कवि केदार नाथ सिंह याद आतें हैं. याद आतीं हैं उनकी कई कविताएं..उनकी कई बातें..

    जब देखता हूँ कि गांव के सारे बगीचे वीरान हो चुके हैं..खेतों में पहुंच जाने वाला टैक्टर और थ्रेसर ने खलिहान नामक शब्द को लील लिया है..खलिहान में बचा गांव का आखिरी कुँआ झाड़-झंखाड़ से भर चुका है..और पानी के शीलबन्द बोतल घर-घर आने लगे हैं. लोगों में पहले वाला उत्साह नहीं है. कोई खेती करके खुश नहीं है..सब शहर भाग जाना चाहतें हैं.

    जैसे शहर केंद्रित विकास ने शहर को हमारी नियति में तब्दील कर दिया है…लेकिन इन विडम्बनाओं के बावजूद गाँव ने अपने किसी कोने में इतनी खूबियों को बचाकर रखा है कि बार-बार गाँव लौट जाने का मन होता है..डीह बाबा को गोड़ लागते समय एक बार फिर केदारनाथ सिंह याद आतें हैं.

    “अभी गाँव ही एक ऐसी जगह है,जहां कोई किसी के घर बिना काम के भी जा सकता है।

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    Atul Kumar Rai