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कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

Vivek "सामाजिक यायावर"

कात्सु होरिउची जब पहली बार भारत आईं थीं तब वे युवती थीं, अब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है। हम भारतीय, समाज में शांति के प्रति इनके समर्पण को सम्मान देते हुए, प्रेम व सम्मान से कात्सु बहन पुकारते हैं। लगभग 30 वर्ष से भारत में रह रहीं हैं। इनका जीवन विश्व में शांति का संदेश फैलाने के लिए समर्पित है। जापान से आईं कात्सु बहन लगभग 17-18 वर्ष पहले भारत की नागरिक बन गईं थीं।

दत्तात्रेय बालकृष्णा कालेलकर, लोकप्रिय नाम “काका कालेलकर”, कात्सु बहन के जीवन गुरुओं में से थे तथा कात्सु बहन को अपनी दत्तक पुत्री मानते थे। 

महात्मा गांधी की इच्छा थी कि समाज में धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, संस्कृतिवाद, भाषावाद इत्यादि से ऊपर उठकर लोगों के हृदय मिलने चाहिए, हृदय से एकाकर होना चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना होनी चाहिए। इसी जिम्मेदारी को स्वीकारते हुए काका कालेलकर ने 1955 में दिल्ली के राजघाट में  गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा (सन्निधि)  की स्थापना की।

काका कालेलकर गुजरात विद्यापीठ के सह-संस्थापक व वाइस-चांसलर रहे। काका कालेलकर भारत के प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के अध्यक्ष भी रहे थे।

कात्सु बहन से मिलने का सौभाग्य मुझे 2005 में हुआ। मैं उन दिनों गांधी स्मारक निधि, राजघाट में रहता था तथा गांधी स्मारक निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड तथा कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों के द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में सहयोग कर रहा था तथा गांधी स्मारक निधि के मंत्री के सचिव के तौर पर कार्य कर रहा था।

उस समय कात्सु बहन की उम्र लगभग 65 वर्ष रही होगी। मैं कात्सु बहन की सहृदयता व विनम्रता से प्रभावित हुआ था, मेरा प्रयास रहता था कि यदि अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार की आयोजन समिति की बैठक शाम को नहीं है, तो भले ही कुछ मिनट के लिए ही सही कात्सु बहन के दर्शन कर लूं। कभी कभार स्वादिष्ट स्नैक्स भी खाने को मिल जाते थे। 2005 के बाद पिछले लगभग साढ़े 13 वर्षों में उनसे कभी कोई संवाद, मुलाकात या संपर्क भी नहीं हुआ। इसलिए कात्सु बहन को शायद ही मेरी याद हो, यदि मैं उनको आज भी याद हूँ तो मेरे लिए यह अत्यधिक सौभाग्य की बात है।

गांधी शांति-दर्शन से प्रभावित कात्सु बहन हिंदी बहुत अच्छे से जानती हैं। बच्चों के लिए जापानी लोक कथा नामक पुस्तक भी हिंदी में लिखी। सन्निधि की पत्रिका का संपादन भी करतीं थीं। कात्सु बहन की विश्व शांति के लिए शांति स्तूप, इंद्रप्रस्थ, दिल्ली की स्थापना में भी सक्रिय भूमिका रही।

गांधीवादी रमेश कुमार शर्मा भाई की फेसबुक पोस्ट देखकर कात्सु बहन से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो गईं। रमेश भाई को बहुत बहुत धन्यवाद। फोटो में कात्सु बहन, रमेश भाई व विष्णु प्रभाकर जी के पुत्र अतुल प्रभाकर भी हैं, जिन्हें मैं अवसर मिलने पर अपना मित्र कहने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता हूँ।

Vivek Umrao Glendenning "Samajik Yayavar"

He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

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