भारतीय-दाम्पत्य जीवन व परिवार के व्यवहारिक मूल्य

सामाजिक यायावर

जैसे हम मानव-निर्मित ईश्वर को वास्तविक ईश्वर माने हुए हैं, माने हुए हैं कि हमारी सभ्यता विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। वैसे ही और भी बहुत कुछ हम यूं ही माने हुए हैं और माने हुए को मनवाने के लिए दूसरों को अपशब्द कहते हैं, अपमानित करते हैं। अपने द्वारा माने हुए को जबरन तथ्यपरक सिद्ध करने के लिए  दूसरों के प्रति स्वयं को हिंसक भी बनाते हैं। बिलकुल ऐसे ही हम, बस यूं ही मान बैठे हैं कि भारतीय संस्कृति के परिवार व पारिवारिक मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि, बस यूं ही मान लेने की अनुकूलता व बंद-दिमाग की जिद से बाहर आकर परिवार व पारिवारिक मूल्यों का ठोस धरातल पर मूल्यांकन किया जाए; तो परिवार की नीव हिंसा, ढोंग, झूठ, बाजारूपन व उपभोक्तावाद से भरी हुई दिखती है।

हम समाज व देश निर्माण, विश्वगुरू होने की संस्कृति आदि का दावा करते हैं लेकिन मनुष्य व समाज को जीवन मूल्य व संस्कार देने वाली मूलभूत ईकाई परिवार के प्रति कतई गंभीर व जिम्मेदार नहीं होते हैं। हमने परिवार व परिवार की मूलभूत ईकाई विवाह को बाजारू बना रखा है जो मनुष्य में जीवन मूल्यों व संस्कारों को समृद्ध करने के बजाय संभावना के भ्रूण को भी नष्ट करता है।

हम अपने जीवन साथी तक के चुनाव में अंदर से ईमानदार नहीं होते जबकि हम समाज व देश के निर्माण, विकास व समृद्धि की बात करते हैं। हम भूल जाते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्यों के निर्माण से होता है और मनुष्य के निर्माण की मूलभूत इकाईयाँ परिवार व विवाह हैं। जहां परिवार नहीं, वहां समाज नहीं; जहां समाज नही, वहां देश नहीं। खोखलेपन, दोहरेपन व सतहीपन आदि से व्यक्ति, परिवार, समाज व देश कुछ भी न तो निर्मित होता है और न ही समृद्ध होता है।

यदि ईमानदारी व सूक्ष्मता से पारिवारिक मूल्यों के तत्वों को देखा जाए तो देश व समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की नीव जाति-व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय परिवार भी है।

परिवार में संस्कार व संस्कृति के मायने :

संस्कृति बोलचाल की भाषा, कपड़े पहनने व भोजन करने के तौर तरीको, त्योहारों व पूजापाठ के कर्मकांडो आदि तक ही संकुचित होती है। वास्तविक जीवन मूल्यों व आंतरिक भाव संवेदना का कोई औचित्य नहीं होता है, उल्टे तिरस्कृत किए जाते हैं।

संस्कारित स्त्री का तात्पर्य कि निर्धारित किए गए कपड़े पहने, किसी पुरुष से मित्रता न करे, प्रेम की स्वतंत्रता की मांग न करे। किसी पुरुष से कल्पना में भी भावात्मक प्रेम भी न करे। विवाह अर्थात् माता पिता जिस पुरुष से शारीरिक संभोग करने के लिए  निर्धारण करें केवल उसी पुरुष से शारीरिक संभोग करे और उस पुरुष के लिए  संताने पैदा करे। बचपन से विवाह तक माता पिता व भाई आदि की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले और विवाह पश्चात् अपने सास ससुर व पति की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले।

संस्कारित पुरुष का तात्पर्य कि पुरुष परिवार के लिए  संपत्तियां अर्जित करे और सुविधाएं एकत्र करे और संपत्तियों व सुविधाओं से अपने माता पिता, पत्नी व संतानों की देखभाल करे। बचपन से लेकर युवा होने तक माता पिता ने देखभाल किया है इसलिए   पुत्र अपने माता पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल करे और आज्ञाकारी बन कर रहे। केवल संपत्ति व सुविधा अर्जित करने के तौर तरीको में विशेषज्ञता प्राप्त करे और माता पिता जिस स्त्री से विवाह कर दें, उसी स्त्री के साथ शारीरिक संभोग करे और उस स्त्री का प्रयोग अपने लिए  संताने उत्पन्न करने के लिए  करे।   

माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह :

माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह में लड़की व लड़के को सभ्यता व संस्कारों के मूल्यों की कसौटी में मूल्यांकन करने का जबरदस्त प्रचलन है, इस प्रचलन को लड़का या लड़की को परिवार व समाज की संस्कृति की रक्षा व समृद्धि के लिए  ठोंक बजाकर चुनना कहा जाता है; इस प्रक्रिया में बहुत सारी लड़कियां व लड़के अस्वीकृत किए जाते हैं, ताकि अपने पुत्र के लिए  सेवाभावी संस्कारी पत्नी और पुत्री के लिए  देखभाल करने वाला प्रतिष्ठित पति खोजा जा सके।

पुत्रवधू के संस्कारी होने के मूल्य :

लड़की अपने ही धर्म व जाति की हो, लड़की स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर हो, बहुत अमीर घर की हो या अच्छे वेतन व सुविधा वाली सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करती हो या दोनो, मुंहमागा दहेज लेकर आए, भाई न हों तो और बेहतर ताकि माता पिता की चल-अचल संपत्ति में हिस्सा भी मिले, प्रतिष्ठित परिवार की हो ताकि लड़के वालों का सामाजिक कद भी बढ़ जाए आदि आदि प्रकार की सभ्यता व संस्कारों से संपन्न गुणी लड़की को पुत्र की पत्नी होने के लिए  प्राथमिकता दी जाती है।

ऊपर बताए गए मानकों की सभ्य व संस्कारी लड़की मिलने पर उसको चलाकर देखा जाता है ताकि उसके लंगड़ेपन की जांच हो सके, गाना गवाकर देखा जाता है ताकि उसके गूंगेपन की जांच हो सके, किसी प्रकार जुगत लगाकर लड़की के शरीर के आंतरिक अंगों को भी किसी विश्वसनीय महिला द्वारा देखे जाने का प्रयास किया जाता है ताकि शरीर में दाग-धब्बे आदि की जानकारी हो पाए, कुछ संस्कृतिवान लोग तो लड़की के अंतः वस्त्र तक उतरवा कर जांच करना चाहते हैं ताकि शरीर में छुपे हुए दाग व धब्बों की पूरी जानकारी मिल सके और वे लड़की के परिवार वालों से ठगा हुआ न महसूस करें।

जामाता के संस्कारी होने के मूल्य :

लड़का अपने ही धर्म व जाति का हो।  लड़के के माता पिता के पास चल अचल संपत्ति हो या लड़का ऊंचे वेतनमान व सुविधाओं की सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करता हो या दोनो। लड़का सुंदर हो किंतु यदि लड़का बहुत अमीर है और बदसूरत है तो उसकी अमीरी के कारण उसको सुंदर और सुपात्र मान लिया जाता है। लड़का इकलौता हो तो और अच्छा, लड़के की बहन न हो तो और अच्छा। लड़का ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरी में हो तो सबसे अधिक संस्कारी और सुपात्र माना जाता है।

माता पिता द्वारा तय किए गए विवाहों को परंपरा में केवल इसलिए   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि इसमें लड़का या लड़की अपना जीवन साथी अपनी विचारशीलता व समझ के आधार पर नहीं बल्कि अपने माता पिता की इच्छा के आधार पर चुनते हैं।

प्रेम विवाह :

चूंकि परंपरा में प्रेम को स्त्री पुरुष के मध्य यौन संभोग तक ही संकुचित कर दिया गया है; इसलिए   माता पिता के द्वारा तय किए गए विवाह और प्रेम विवाह में केवल एक ही अंतर रह पाता है, वह यह कि एक में माता पिता द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है जबकि दूसरे में अपने द्वारा पसंद किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है। बाकी सब कुछ समान ही रहता है।

परिवार में सहज प्रेम व पारस्परिक विश्वास की जीवंतता न होने से युवक या युवती को सहज प्रेम की अनुभूति नहीं होती। परिवार में यौन से संबंधित चर्चा बच्चों व किशोरों के लिए  प्रतिबंधित होती है, अश्लीलता माना जाता है।

माता पिता आपस में यौन संभोग करते हैं किंतु यह मानने को तैयार नहीं होते कि स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर व शारीरिक क्रियायें प्राकृतिक हैं, कुछ भी बुरा नही, कुछ भी छुपाने लायक नहीं। स्त्री के अंगों को अश्लील मानते हैं, छुपाने लायक मानते हैं।

उचित जानकारी के अभाव में किशोर यौन कुंठित हो जाता है, इसलिए   अपवाद को छोड़कर प्रेम विवाह में भी सहज प्रेम प्रस्फुटित नहीं हो पाता है; प्रेमी प्रेमिका सहज प्रेम व यौन आकर्षण में अंतर ही नहीं कर पाते परिणामस्वरूप उनका प्रेम विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व वासना तक ही संकुचित हो जाता है।

यही कारण है कि बहुत मामलों में लड़की अपने प्रेमी को एक झटके में केवल इसलिए छोड़ देती है कि उसके माता पिता द्वारा खोजा गया लड़का उसके प्रेमी की तुलना में अधिक अमीर और कमाऊ है; और ऐसा करते ही उस लड़की को उसके माता पिता व परिवार द्वारा समझदार, तीव्रबुद्धि व संस्कारी मान लिया जाता है। प्रेमी के साथ यौन संबंधो के बावजूद उस लड़की को चरित्रवान व संस्कारी लड़की माना जाता है।

ऐसा ही लड़के के लिए  भी है; जब वह माता पिता द्वारा खोजी गई अमीर लड़की, दहेज व सुविधाओं आदि के लिए  अपनी प्रेमिका को एक झटके में छोड़ देता है।

प्रेम विवाह व माता पिता द्वारा तय किए विवाह का चरित्र बिलकुल एक सा ही होने के बावजूद प्रेम विवाह सामाजिक रूप से केवल इसलिए   तिरस्कृत होता है क्योंकि प्रेम विवाह में जाति या धर्म के बाहर का मनुष्य प्रेमी या प्रेमिका हो सकता है और माता पिता के द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के बजाय अपनी पसंद के मनुष्य के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं और संतानोत्पत्ति की जाती है।

परिवार में पति पत्नी  :

अपवादों को छोड़कर विवाह होने के पश्चात् कुछ दिनों तक दोनों पक्षों की ओर से सामंजस्य, संतुलन आदि का ढोंग चलता है। लेकिन समय के साथ-साथ जब पति पत्नी अपने वास्तविक चरित्र के साथ जीना शुरू करते हैं, तो आपसी टकराहटें शुरू होतीं हैं। ऐसी स्थिति आने पर जो पति पत्नी अपने स्वार्थ व अहंकार से बाहर आकर संतुलन नहीं कायम कर पाते हैं, वे अपने वैवाहिक जीवन को नर्क बनाते हैं।

दरअसल लड़का, लड़की, माता, पिता आदि यह भूल जाते हैं कि उनमे अच्छाई व बुराई दोनों ही हैं और वे समाज व परिवार की अनुकूलता के ही उत्पाद हैं; जैसे वे खुद हैं वैसे ही उनकी पत्नी, पति, बहू, दामाद, पुत्र, पुत्री आदि भी हैं।

ये लोग स्वार्थ, लिप्सा व बाजारू भोग के नशे के अंधेपन में यह भूल जाते हैं कि विचार, संस्कार, विनम्रता, शुद्धता, प्रेम, समर्पण, त्याग आदि मूल्य जीवन में जीवंतता से जिए जाते हैं।  ऐसे लोगों की ईमानदारी, विश्वास व प्रेम का कोई ‘वास्तविक जीवन मूल्य’ नहीं होता।  ऐसे लोग पूरा जीवन रोते झींकते गुजारते हैं और समय के साथ-साथ परिवार व समाज में जाने अनजाने ऋणात्मकता ही बढ़ाते हैं।

परंपरा में विवाह संस्था में सहज व स्वतंत्र जीवन सहचरत्व का मूल्य विकसित करने के बजाय स्त्री व पुरुष के यौन संबंध से संतान पैदा करने व पैदा की गई संतान को अपने जैसा ही संकुचित, अनुकूलित, कुंठित व परतंत्र बनाने वाली संस्था बना दिया गया है; जिसमें मनुष्य के भावों, प्रेम व स्वतंत्रता आदि का कोई स्थान व महत्व नहीं है। सब कुछ बने बनाए ढांचे से ही तय होता है।

परिवार में बच्चे :

चूंकि विवाह संस्था के ढांचे में ही सहज प्रेम उपेक्षित व तिरस्कृत किया जाता है, इसलिए   बच्चों का पालन पोषण भी ढांचे की अनुकूलता के संकुचित प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही होता है। अनुकूलता के प्रभाव क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करना ही संस्कृति व संस्कार का ध्वस्त होना मान लिया जाता है।

माता पिता व परिवार द्वारा बच्चों में स्वतंत्र व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना तक की भ्रूण हत्या की जाती है। बच्चे  स्वतंत्र अस्तित्व वाले चेतनशील जीवंत मनुष्य के बजाय माता पिता की व्यक्तिगत संपत्ति माने जाते हैं; यही कारण है कि माता पिता व बच्चों के संबंध सहज व मौलिक प्रेम के बजाय अनकही किंतु तीव्र अपेक्षाओं के व्यापाराना लेनदेन पर आधारित होते हैं।

ऐसी अनुकूलता व कुंठित वातावरण मनुष्य व समाज का विकास व चेतनशीलता अवरुद्ध कर देते हैं और बचपन से ही मानसिकता दूषित व कुंठित कर देते हैं।  बच्चा मौलिकता व स्वतंत्रता के बजाय व्युत्पन्न अनुकूलता की परतंत्रता की ओर बढ़ता जाता है और इन्ही के सख्त व संकुचित दायरों में आजीवन कुंठित होकर रह जाता है। ऐसे ही चक्रों के कारण कुंठा व मानसिक परतंत्रता पीढ़ी दर पीढ़ी और गहरे व्याप्त होती चली जाती है।   

चलते-चलते :

परिवार व विवाह संस्था के भावों व मूल्यों को अपनी जरूरत के अनुसार परिभाषित करके प्रायोजित करते हुए कुंठित व परतंत्र मानसिकता के व्यापाराना ढांचे को संस्कृति का नाम दे दिया गया है। यही कारण है कि वास्तविक जीवन-मूल्य, संस्कार, संस्कृति, स्वतंत्रता व चेतनशीलता आदि अपवाद परिवार में ही परिलक्षित होता है।

साभार – “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के एक खंड से लिया गया.

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