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  • एक मुठ्ठी चावल से अंगूठा-छाप आदिवासी महिलाओं के स्वावलंबन व आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ते कदम 

    सामाजिक यायावर

    छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में एक गांव है जहां की महिलाओं नें एक मुठ्ठी चावल जमा करना शुरू किया फिर हांडी भर जानें पर गांव भर से हांडियां जमा कर चावल एकत्र करके बेचकर कमाये पैसों से कुटीर उद्योग का काम शुरू किया।

    अचार, बड़ियां, कपड़ा सिलना आदि काम करतीं हैं। ईंट भी बनातीं हैं, खेती भी करतीं हैं।

    एक मुठ्ठी चावल जमा करना आज भी जारी है जबकि इनके समूह में लाखों रुपये का ट्रांजेक्शन होता है।

    इनके पास जनलोकपाल पर आश्रित होकर अपनीं प्रगति की कल्पना करते हुये सरकारी तंत्र को गरियानें की कोई महान-क्रांतिकारिता नहीं।

    ये लोग तो जो इनसे हो सकता है वह भी खालिस अपनें दम पर बिना बाहरी सहायता के, उद्योग करतीं हैं।

    आप समझदार लोग जो मर्जी चिल्लायें लेकिन मुझ जैसे गवांर का बहुत स्पष्ट रूप से मानना है कि देश में बड़े बदलाव इन जैसी उद्यमी महिलाओं से ही होगें न कि मुद्रा आधारित भ्रष्टाचार की बात करनें वाले जादुई जन-लोकपाल आदि राजनैतिक सत्ता प्राप्ति के चोचलों से।

    काश भारत के लोग व मीडिया इन जैसी अंगूंठा छाप किंतु दूरदृष्टि रखनें वाली महिलाओं के साथ खड़े हो पानें की सोच, समझ, साहस व सामाजिक इमानदारी रखते होते।
    ………….‌… काश …..

     

     

  • ‘लोकतंत्र’, ‘साहब’, ‘जनलोकपाल’ और ‘बेरोकटोक-सत्ता-भोग’ की महात्वाकांक्षा

    सामाजिक यायावर

    ‘मेरी समझ में कुछ बातें नहीं आती हैं जैसे कि साहब यदि सच में ही ‘जनलोकपाल’ बिल लाना चाहते हैं तो लोकतंत्र का आदर क्यों नहीं करते हैं। इनके इस दावे का कि इनके अलावे बाकी सब लुच्चे लफंगें है और केवल इनकी ही पार्टी के लोग शुद्ध-बुद्ध हैं इसलिये देश की जनता को इनको पूर्ण बहुमत देना चाहिये ताकि साहब ‘जनलोकपाल’ कानून बना पावें……. में बहुत ही बेसिक नुक्श हैं, जिनकी चर्चा ‘साहब’ कभी नहीं करते हैं।

    भारत के संविधान के अनुसार तो ‘साहब’ को ‘जनलोकपाल’ कानून बनानें के लिये 362 सांसद लोकसभा में और 160 सांसद राज्यसभा में चाहिये। जो कि साहब की पार्टी केवल अपनें दम पर ले आयेगी ऐसा साहब जी के जीते जी हो पायेगा ऐसा लगता नहीं है क्योंकि 2014 इनकी पार्टी का सबसे स्वर्णिम अवसर है और इस बार इनकी पार्टी चुनाव ही लड़ रही है कुल 350 सीटों में, यदि साहब की पार्टी सभी 350 सीटों में जीत जाती है तब भी लोकसभा में 12 लोग और और राज्यसभा में 160 सांसद कहां से लायेंगें।

    अब सवाल यह उठता है कि जब साहब अपनें दम पर ‘जनलोकपाल’ कानून बना ही नहीं सकते हैं तो क्या यह सब धींगामुस्ती खुद के लिये बेरोकटोक सत्ता का भोग करनें के लिये ही है…….

    पता नहीं क्यों ‘साहब’ की अधिकतर बातें, दावे और तर्क बिलकुल ही हजम नहीं हो पाते हैं और थोड़ी सी ही गवईं-अकल लगाते ही बातों के बताशों की तरह ढेर हो जाते हैं।

    ‘साहब’ जिस लोकतंत्र को रोज गलियाते हैं, उसी लोकतंत्र नें सिर्फ ‘साहब’ की हवाई बातों और दावों पर विश्वास करके सत्ता सौंप दी।

    ‘साहब’ को अपनीं खुद की राजनैतिक महात्वाकांक्षा से बाहर निकलकर सच में ही देश, देश के असल व बहुसंख्य समाज और देश के लोकतंत्र का आदर करना सीखना चाहिये।

  • उत्तर प्रदेश और बिहार सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी राज्य हैं

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningगांधी जी का "नील" आंदोलन की धरती बिहार थी। देश में अंग्रेजों की दासता को नकारनें का काम जिन मंगल पांडे जी नें किया था वे उत्तर प्रदेश के ही थे। एक महिला होकर भी अंग्रेजों से भीषण पंगा लेंनें वाली झांसी की रानी भी उत्तर प्रदेश की ही थीं। 

    इन दोनों राज्यों में लगभग हर जिले में ऐसे लोग मिल जायेंगें जिन्होनें समाज को शिक्षित करनें के लिये शिक्षा संस्थानों के लिये सैकड़ों/हजारों एकड़ जमीन एक झटके में बिना किसी लाग-लपेट के दान कर दी होगी।

    मैं भूदान आंदोलन की बात नहीं कर रहा हूं। ऐसे बहुत उदाहरण हैं जो कि उस समय के हैं जबकि खुद विनोबा जी को नहीं पता था कि वे कभी भूदान-आंदोलन चलायेंगें 🙂 ।

    काशीराम जी की बात को समझनें और आगे बढ़ानें वाला राज्य भी उत्तर प्रदेश ही था, जबकि काशीराम जी नें अपनें जीवन के बेहतरीन साल पंजाब जैसे राज्यों को दिये। 

    जयप्रकाश नारायण जी बिहार की धरती में अवतरित हुये थे। 

    उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में एक से बढ़कर एक राजनैतिक व सामाजिक आंदोलन हुये हैं। लालू, मुलायम, काशीराम, मायावती, नितीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह आदि जैसे राजनेताओं का उदय और ऊंचाई पर बीसियों वर्षों के जमीनी संघर्षों को लगातार करते हुये पहुंचना … इन राज्यों के दबे-कुचले समाज की सामाजिक व राजनैतिक चेतना के ही कारण हो पाया। और ये सभी राजनैतिक प्रक्रियायें "सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन" ही रही हैं। और इस यथार्थ को किसी भी तर्क/वितर्क/कुतर्क से नकारा नहीं जा सकता है। 
     

    देश में आपातकाल लागू करवानें, हजारों लोगों को महीनों जेलों में सड़वानें और फिर आपातकाल को फेंक देनें जैसी अतिवादी राजनैतिक चेतना के सूत्रधार उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य ही थे। 

    भारत में साम्यवाद को मजबूत आधार देनें का श्रेय उत्तर प्रदेश के ही जिले "कानपुर" को जाता है।

    उत्तर प्रदेश व बिहार के समाज नें सामाजिक व राजनैतिक चेतना को भी प्राथमिकता दी बाकी अन्य राज्यों की तरह एनकेन प्रकारेण बाजारीकरण  के कथित विकास के पीछे अंधे-भक्तों की तरह नहीं भागे। 

    सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी स्तर के कारण इन दोनों राज्यों में राजनीति करना और राजनैतिक सत्ता प्राप्त करना आसान नहीं है। 

    वैसे लोकतंत्र में राजनैतिक बकैती और बकलोली करनें का भी अपना अलग मजा है। किंतु हम तो आपको भारत में राजनैतिक चेतना के खिलाड़ी तब मानेंगें जब आप इन दो राज्यों में सम्मानजनक तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर कुछ उखा़ड़ पायें। 

    इन दो राज्यों नें अच्छों अच्छों को राजनीति करना सिखा दिया है, आपको भी सिखाया जायेगा बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के। सीखनें के पहले एक बात समझ लीजियेगा कि यहां के गांवों में लगभग हर आदमी अपनें घर में चुनाव, राजनीति और राजनैतिक परिवर्तन नाम की बकरियां बिना रस्सी के ही छोड़े रखता है लेकिन क्या मजाल कि बकरियां घर की डेहरी पार कर जायें 🙂 । 

    गांधी जी तो बता ही गये हैं कि बकरी का दूध मष्तिक के लिये बहुत लाभदायक होता है। 🙂
    भारत के दक्षिण से कुछ ऊपर में स्थित एक राज्य के लोगों की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों नें गांधी के साथ उठनें बैठनें वालों के व्यक्तिगत नामों के व्यक्तिगत-पहचान-कारपोरेट्स तो नहीं बनाये हैं लेकिन राजनैतिक-चेतना की बकरियां पालना जरूर ही खूब बढ़िया से जानते हैं।  

    चलते चलते एक बात और- उत्तर प्रदेश और बिहार के गांव आज भी लोगों का स्वागत करते हैं और सामाजिक लोगों को प्रेम करते हैं और साथ खड़े होते हैं। शुरुआत विश्वास से करते हैं किंतु एक सीमा से बाहर सामाजिक-धोखों को नहीं स्वीकारते हैं। स्वागत करना आता है तो धता बताना भी आता है। 

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"
    एक गवांर जाहिल यायावर 
     

  • आदरणीय मित्रों से एक सविनय निवेदन : गंभीर लेखों के मसले पर

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningआदरणीय मित्रों,

    सादर प्रणाम

     

    आपके प्रेम, आपकी सक्रिय भागीदारी और मेरा उत्सावर्धन करते रहनें के लिये मैं आपका हार्दिक आभारी हूं। गंभीर लेखों के संदर्भ में मैं आप सुधिजनों के समक्ष अपना सविनय निवेदन रखना चाहता हूं, आप मेरे निवेदन पर विचार करनें की कृपा कीजिये। सादर 

     

    मैं एक मान्यता प्राप्त प्रोफेशनल जर्नलिस्ट हूं, कुछ छोटी मोटी प्रिंट व आनलाइन पत्रिकाओं का संपादक भी हूं जिसमें कि एक 120 पृष्ठ की मल्टीकलर अंग्रेजी भाषा की प्रिंट जरनल भी है जो कि गंभीर सामाजिक मसलों में गंभीर लेख व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रकाशित करती है। 

     

    मेरी चंद रिपोर्ट्स दुनिया की प्रतिष्ठित प्रिंट-जर्नल्स में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। मैंने UN, UNICEF, EU जैसी वैश्विक संस्थाओं को उनके कुछ वैश्विक-दस्तावेजो को बनानें में एक जर्नलिस्ट के रूप में सहयोग भी किया है और उनके द्वारा मुझे सम्मानजनक तरीके से धन्यवाद भी ज्ञापित किया गया है। 

     

    मेरे पास एक जर्नलिस्ट/संपादक के रूप में बस यही कुछ चंद छोटे मोटे अनुभव हैं और कुछ खास नहीं। मैं अभी सीख रहा हूं और संभवतः आजीवन सीखूंगा। मैं आभारी हूं जो कि आपमें से बहुत मित्रों से समय समय पर बहुत कुछ सीखनें को मिलता रहता है। 

     

    मैं आपसे कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। कुछ ऐसी बातें हैं जो कि मुझे आपसे कुछ और सीख पानें से हतोत्साहित करतीं हैं। कुछ मसले हैं जिनको कि मैं आपके समक्ष सादर प्रेषित करना चाहता हूं ताकि आपसे और बेहतर सीख पानें में मुझे हतोत्साहन नहीं महसूस हो। सादर

     

    मेरी अधकचरी समझ के अनुसार-

     

    लंबे व गंभीर लेख लिखना टीवी-चैनल्स की बाइट्स, अखबारों की हेडलाइन्स और मैगजीन्स की सुर्खियां पढ़कर/देखकर प्रतिक्रियास्वरूप चंद लाइनें लिखनें जैसा या बाइट्स लिखनें जैसा नहीं होता है या अखबारी खबर लिखनें जैसा भी नहीं होता है जिसमें घटना की सूचना भर दे देनी होती है या खबरों की हेडलाइन आदि का लिखना जैसा भी नहीं होता है। 

     

    लंबे व गंभीर लेख, लेखक लिखनें के पहले सोचता है, विचारता है, अध्ययन करता है, तथ्यों की पड़ताल करता है …. फिर लिख पाता है। जो नये लेखक होते हैं उनको लिखनें में बहुत समय लगता है, किंतु जो लोग लंबे समय से लिख रहे होते हैं उनके अंदर हरसमय कुछ न कुछ चिंतन/आब्जरवेशन चलता रहता है सो लिखना तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम समय में हो जाता है। 

     

    मेरा सविनय निवेदन जो कि मेरी अधकचरी समझ के ऊपर आधारित हैं:

    • लेख/पोस्ट का मूल विषय लेख/पोस्ट होता है न कि लेख/पोस्ट में की गयी कमेंट्स:
      आपमें से कई लोग कमेंट्स में केवल यह बतानें के लिये आते हैं कि पोस्ट का विषय क्या होना चाहिये था और अपनी कमेंट्स से मुझ पर लेख/पोस्ट के मूल-विषय को बदलनें का दबाव भी डालते हैं और लगातार बहस करते हैं। और यदि मैं उनका दबाव नहीं स्वीकारता हूं तो मुझे अहंकारी/शंखनादी आदि आदि जैसी सांस्कृतिक-गालियों से सुशोभित करते हैं।

      चूंकि आप मेरे मित्र हैं, इसलिये मेरी अधकचरी समझ का आदर करना सीखिये। मैं आपकी पोस्ट में आकर आपसे कभी नहीं कहता कि आपको क्या लिखना या क्या नहीं लिखना चाहिये …. आप भी मेरे लेखों/पोस्टों में मुझे यह न बताईये कि मुझे क्या लिखना चाहिये था।

      यदि आपको लगता है कि मेरी अधकचरी समझ बेहतर नहीं है तो आप खुद लेख/पोस्ट लिखिये ताकि मुझे भी आपसे सीखकर परिष्कृत होनें का अवसर मिल सके।

    • आप मेरे मित्र होनें के नाते या मेरे पाठक होनें के नाते मुझे किसी विषय में लेख/पोस्ट लिखनें का आदेश दे सकते हैं। और यदि मुझे उस विषय की जानकारी होगी तो मैं आपका आदेश सिर-माथे रखूंगा।
      किंतु आप जब लिखे जा चुके लेख/पोस्ट के मूल-विषय में ही प्रश्न खड़ा करते हैं तो यह आपका मुझे गाली ही देना होता है और कुछ भी नहीं। भले ही आपकी भाषा कितनी भी संतुलित क्यूं न हो। 
       
    • रचनात्मकता, रचना और रचनाकार का आदर करना भी मानवीय संवेदनशीलता का आधारभूत जीवन-मूल्य है।
      मूल-विषय के बिंदुओं में सहमति/असहमति हो सकती हैं और ऐसा होना प्रशंसनीय है किंतु मूल-विषय के औचित्य को ही नकारनें का मतलब आप रचनाकार और रचना को गाली दे रहे हैं और खुद के अहंकार को पोषित कर रहे हैं, और अपनें अहंकार के कारण दूसरों पर मानसिक हिंसा भी कर रहे हैं।
       

    जिस प्रकार के लेखों को लोग पैसे लेकर लिखते हैं उस गुणवत्ता के लेखों को मैं बिना किसी आर्थिक लाभ के लिखता हूं और कापी-राइट के बिना ऐसे ही खुला छोड़ देता हूं। जबकि कई लोग मेरे लेखों को अपनें नाम से लिख रहे हैं और बेच रहे हैं वह भी चंद पंक्तियों में कुछ हेरफेर करके, और इस श्रेणी में आने वाले लोग वे हैं जो टीपते तो मेरे लेख हैं किंतु आजतक कभी मेरे लेखों में न तो "लाइक" किये और न ही "कमेंट"। ऐसे लोगों का चरित्र का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है। मुझे इन लोगों के इस प्रकार के अनैतिक-चरित्र से कोई तकलीफ नहीं है क्योंकि मेरे लिये सामाजिक-चेतना व जागरूकता महत्वपूर्ण है न कि मेरा नाम। 

    दुर्भाग्य से मैं 1992 से सामाजिक सरोकारों में प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हूं, इसलिये मेरे लिये लेखन का लक्ष्य "लाइक" "कमेंट" "सस्ती लोकप्रियता" या "आर्थिक लाभ" आदि नहीं ही है। यदि मुझे एक भी लाइक न मिले, एक भी कमेंट न मिले तब भी मैं लिखता रहूंगा। लिखना मेरे लिये सामाजिक-प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"

  • भैंस/गाय/बकरी का ग्रामीण-अर्थव्यवस्था से संबंध और उत्तर प्रदेश/बिहार जैसे भैंस/गाय/बकरी परिवेश वाले राज्य

    सामाजिक यायावर

    मेरे दादा (पिता के पिता) जी का देहांत नवंबर 1984 में सड़क दुर्घटना के कारण हुआ था लगभग 85 वर्ष के रहे होंगें। चूंकि मेरे माता-पिता उनके साथ गांव में नहीं रहते थे सो मेरे पिता के हिस्से में आईं हुयीं भैंसें, बकरियां, गाय और बैल आदि को मेरे दादा जी नें पिता जी के हिस्से की जमीन में काम करनें वाले अपनें पारंपरिक मजदूर परिवार को दे दिया था। 

    दादा जी के देहांत के बाद जब जानवरों को लौटानें की बात आयी तो मेरे पिता जी बोले कि हमें नहीं चाहिये जो पिताजी नें अस्थायी रूप से आपको दिया वह उनकी ओर से स्थायी-दान मान लीजिये। 

    मैं छोटा था किंतु इस घटना से मेरे मन में एक बात बैठ गई कि भैंस आदि जानवर शायद बेकार होते हैं और फिजूल का सिरदर्द भी होते हैं। चूंकि शहरी परिवेश में पला-बढ़ा इसलिये गोबर गंदी चीज होती है आदि बातें शहरीकरण वाली कथित-शुचिता नें बैठा दी।  मुझे लगता है कि ऐसे ही बहुत बालकों/किशोरों के मन में धारणायें बनतीं होगीं। 

    जब बड़ा हुआ और समाज को समझनें के लिये स्वाध्याय व समाज के लोगों के द्वारा किये जा रहे आर्थिक विकास/स्वावलंबन आदि के जमीनी प्रयासों को देखना व समझना शुरु किया, तो जो बात सबसे पहले मेरी समझ में आयी वह यह कि भैंस, गाय और बकरी भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव है। 

    मैंने देखा कि कैसे महिलायें अपनी मरी हुयी बकरी को अपनी गोद में लेकर दहाड़ें मारकर रोतीं हैं। बिहार की भीषण बाढ़ों और आग से नष्ट होते गावों में मैंने देखा कि ग्रामीण कैसे अपनी जान की बाजी लगाकर अपनें जानवरों की रक्षा करता है। 

    समय के साथ मैंने समझा कि वास्तव में भैंस/गाय/बकरी आदि भारत के करोड़ों ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि ये जानवर न हों तो करोड़ों भूमिहीन परिवारों को खाना/कपड़ा और झोपड़ी तक नसीब नहीं हो। 

    उदाहरण-

    • मेरे एक बहुत ही अच्छे व विश्वसनीय मित्र हैं। बहुत बड़े चिकित्सक हैं प्रतिदिन कई सौ मरीजों को देखते होगें, अपनी पैथोलोजी है, अपना क्लीनिक है और यह सब उनके पास देश के जानेमानें मेट्रो-शहर में है। उनकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनके एक सगे भाई एक Indian Institute of Technology (IIT) के उप-निदेशक भी रह चुके हैं और एक सगे साले-भाई Airtel Company के वाइस-प्रेसीडेंट।  उनके परिवार से बहुत लोग All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) से स्नातक/परा-स्नातक की पढ़ाई पढ़े हैं।मैंने उनसे एक बार कहा कि आजकल गांवों में गायों की डेयरीज खुलवा रहा हूं, ताकि ग्रामीणों की आर्थिक व्यवस्था आगे बढ़े। मित्र बोले कि एक गाय/भैंस मेरी ओर से और मुझे 10,000 (दस हजार) रुपये निकाल कर दिये। मैंने कहा कि यह क्या है, वे बोले कि इसे आप एक गाय या भैंस कुछ भी समझ लीजिये। मैं ठहाका मारकर हंसा, मैंने कहा कि एक अच्छी गाय या भैंस 70,000-80,000 की कीमत से शुरु होती है और कई लाख रुपये तक जाती है। मैंने उनसे कहा कि जब आप कभी गांवों जाते होगें तो जो भैंसे आपको ऐसे ही जमीन में बैठी हुयी दिखतीं हैं उनमें से बहुतों की कीमत 1 लाख रुपये से अधिक की भी हो सकती है।  

      मेरे मित्र अचंभित हुये और बोले कि मुझे बिलकुल पता नहीं था कि गाय और भैंस इतनी महंगी आती है। मैंने उनको बताया कि 10 हजार में तो अच्छी बकरी मिलती है। 

    • मेरे एक मित्र हैं लखनऊ में अपनें कामकाज से 1 लाख रुपिया महीना के लगभग आज से लगभग 10 साल पहिले कमाते थे। आजकल गांवों में रहते हैं और शानदार शुद्ध हवा लेते हुये मस्ती से रहते हैं। उननें और उनकी पत्नी नें तीन गाय-भैंसे पाल रखी हैं। बच्चों को भरपूर दूध-मलाई खिलानें और मुझे जैसे मित्रों को शुद्ध खोये के पेड़े खिलाते रहनें के बावजूद महीनें का 25,000-30,000 केवल दूध से कमाते हैं वह भी गांव में। जानवरों के गोबर का प्रयोग खेती में खाद में करते हैं और कभी कभी शरीर में चुपड़ कर स्नान भी कर लेते हैं। हमनें उनसे पूंछा कि इतना पढ़नें लिखनें के बाद गांव में रहते हैं, भैंसों की सेवा करते हैं … अजीब नहीं लगता है। 

      इन मित्र का कहना है कि आजकल के लाखों B.Tech/M.Tech/MBA लड़के/लड़कियां दिन में 15-15 घंटे काम करके जितना कमाते हैं उससे अधिक मैं अपनीं कुछ गायों/भैसों और खेती से कमा लेता हूं और बढ़िया शुद्ध हवा लेता हूं और शारीरिक/मानसिक रूप से स्वस्थ भी रहता हूं।

      रही सेवा करनें की बात तो ये जानवर जीवन हैं और मेरे अपनें परिवार का हिस्सा हैं मेरे प्रति वफादार हैं। जबकि शहरी चकाचौंध के लिये कंपनीज से शोषण कराते हुये शारीरिकमानसिक बीमार जिंदगी जीनें वाले लोगों को तो यह तक नहीं पता होता कि आज जिस नौकरी में हैं उसमें कल होंगें भी या नहीं या किसकी सेवा कर रहे हैं। वे नौकर हैं और मैं मालिक हूं।
       

    मैं उत्तर प्रदेश व बिहार की ऐसी हजारों महिलाओं से मिल चुका हूं जो कि केवल गाय/भैंस की सेवाटहल करके दसियों हजार महीनें की आय करतीं हैं जबकि अंगूठा-छाप हैं। 

    मैं तो कहता हूं िक पहले असली भारत को समझ लीजिये फिर उसकी बात कीजिये। नहीं तो आप अपनीं मूर्खता में उनका उपहास उड़ातें रहेंगें जिनके जीवन की तुलना में खुद आपका जीवन ही उपहास है। 

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  • आधुनिक भारतीय समाज की “जातिवाद” के कुछ घिनौनें उदाहरण जो कि रोजमर्रा की सामान्य उदाहरण हैं

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों को समर्पित है जो लोग मुझे मेरे जातिवाद के ऊपर लिखे लेखों में ज्ञान-प्रवचन देते हैं या प्रतिक्रिया स्वरूप तर्कोंशब्दों के जाल से यह बतानें का प्रयास करते हैं कि जातिवाद खतम हो रहा है या जातिवाद अपनें भीतर बहुत ही मानवीयदूरदर्शी भाव व मानवीय लक्ष्य को समाहित किये हुये है/या था ::

    मैंनें अपनें छात्र-जीवन में भी कुछ ऐसे गावों में समाज के लिये काम किये जिन गांवों में “दलित-वेश्यायेंऔरदलितही रहते थे और आज तक रहते हैं।

    यह बातें तब की हैं जब मैं स्नातक का छात्र हुआ करता था और सेमेस्टर्स में बंक मारकर, हर शनिवार-रविवार, सर्दियो/गर्मियों/सेमेस्टर-अवकाशों में 200 किलोमीटर की दूरी स्थानीय बसों या मोटरसाइकिल में तय करके पहुंचता था और इन्हीं दलितों के घरों में रहता था, खाता था और कभी कभी इनके साथ खेतों में या किसी और काम में मजदूरों की तरह काम करता था ताकि मेरे मन को यह नैतिक सकून मिल सके कि मैं अपनें भोजन के लिये इन पर अवांछित बोझ नहीं बन रहा हूं। 

    • “दलित-वेश्याओं” वाला गांव, कुछ सौ वर्ष पूर्व उस इलाके के ऊपरी जाति के लोगों नें बसाया था। इस गांव में पति नाम की कोई वस्तु नहीं होती थी। आसपास के इलाके के गांवों से कोई भी आकर इस गांव की महिलाओं को वस्तु की तरह भोग सकता था। बिना पिता की पहचान व नाम के पैदा होनें वाली इनकी संतानों में यदि पुत्र हुआ तो वह ऊपरी जाति के लोगों के घरों में बेगारी करनें में उसको अपनें जीवन की नियति माननी होती थी, और यदि लड़की हुयी तो उसको तो महज 13-14 साल की उम्र से ही वेश्या बनना तय था ही। इस गांव की लड़कियां आज भी वेश्या बनतीं हैं और यदि 35 साल से अधिक उम्र के पुरुष से यह पूंछा जाये कि उसका पिता कौन है तो 90% से अधिक पुरुष गोलमाल जवाब देगा क्योंकि उसको पता ही नहीं कि किस पुरुष के साथ रात-बितानें से उसका जन्म हुआ।

      जब लोग जागरूक होनें लगे तो ऊपरी जाति के लोगों नें नया तरीका निकाला- इस गांव की लड़कियों को मुंबई जैसे भारतीय मेट्रो शहरों, अरब देशों और दूसरे देशों के वेश्यालयों में बेचा जानें लगा।

      यह वही गांव है जहां कि लड़कियों को मैंनें अपनीं धर्म-बहनें माना और उन्होनें मुझे रक्षाबंधन में राखी बांधी।  कुछ स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर इस गांव के लोगों के लिये गैर-परंपरागत ऊर्जा के उपकरण, प्राथमिक शिक्षा व स्वास्थ्य आदि के काम भी शुरु किये गये थे।

    • “दलित” वाला गांव में सिर्फ एक घर पंडित जी का था उसमें भी केवल एक पंडित जी ही रहते थे और उनका पूरा परिवार मेट्रो शहर में रहता था।  पंडित जी थे अकेले लेकिन पूरा गांव उनका गुलाम था क्योंकि पूरे गांव की जमीन लगभग मानिये कि उनकी ही थी। इसलिये 60 परिवारों के दलित उनके अघोषित गुलाम।महज 15 वर्ष पूर्व की ही बात है कि एक 12 साल के दलित बच्चे नें उनके खेतों में बेगार करनें से मना कर दिया तो उसको खेत में जिंदा जला दिया गया था और किसी की हिम्मतहुयी कि पंडित जी को कोई किसी कानून आदि बता पाता। यह घटना उन पंडित जी की है, जिनके परिवार के लोग न तो बहुत बड़े पदों में थे औरही कोई राजा या नवाब आदि।   

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से यह मानना है किजातिवादका घिनौनापनहिंसा समझनें के लिये मनुष्य को अपनें स्वार्थ, अहंकार, शाब्दिक-तर्कों के कथित ज्ञान की महानता के गौरव आदि ओछेपन से बाहर आकर सच्ची मानवीय-संवेदनशीलता से घिनौनेपन को समझना होगा।

    ऊपर की बातें तो तब की हैं जब मैं छात्र होता था। तब से अब तक तो मैं कितना भारत देख चुका हूं मुझे खुद भी याद नहीं रहता…. मैं सैकड़ों घटनायें बता सकता हूं जो कि ऊपरी जातियों के वीभत्स व घिनौंनें अमानवीय आत्याचारों पर हैं। सारी घटनायें सत्य हैं और आधुनिक भारत व समाज की हैं।

    “जातिवाद” को खतम करना है तो पहले खुद में इमानदार और मानवीय होईये और तार्किक, शाब्दिक और पौराणिक-कथाओं वाला दर्शन किनारे रखकर इमानदार चिंतन कीजिये। अपनें इर्द-गिर्द की दस-पांच घटनाओं को दुनिया की कसौटी न मानिये। दुनिया आपके मुहल्ले से बहुत ही अधिक बड़ी है।

     

  • आत्मविश्वास और सम्मान का नया औज़ार: इनकम रिटर्न

    कोई भी देश-समाज अपनी उत्पादक शक्तियों की पहचान, आंकलन और सम्मान द्वारा ही विकास की सीढियां चढ़ता है. इस मामले में हमारे यहाँ एक गंभीर चूक हुई है. भारत में दो महत्वपूर्ण उत्पादक वर्ग इस से अछूते रह गए जो उनके हाशिये पर छूटे/ढकेले रहने का सम्भवतः बड़ा कारण है. इसका कुप्रभाव इन वर्गों के आत्मविश्वास, सम्मान और विकास की कमी के रूप में साफ़ दिखाई देता है.

    यह दो वर्ग हैं :
    १. घरेलू-महिलाएं.
    २. कृषि क्षेत्र में मजदूर-किसान.

    आय-व्यय-मुनाफे का आकलन अभी भारत में बहुत ही छोटे वर्ग विशेष तक सीमित है. मध्यम दर्जे और ऊपर के व्यवसायी व् नौकरीपेशा (दर्ज) लोग ही इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं.वह भी लगभग मजबूरी में. बाकी बचे लोगों के लिए यह एक बहुत ही जटिल तकनीकी हौआ है और सुनते ही इस सरदर्द को येन-केन-प्रकारेण टालने की कोशिशें जोर मारने लगती हैं. छोटे व्यवसाइयों और उत्पादकों का एक बड़ा वर्ग इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखता है. आय का टैक्स से जुड़ा होना भी एक अड़ंगा है. मुझे लगता है कि “इनकम टैक्स रिटर्न” से इतर इस छूटे हुए वर्ग के लिए यदि सिर्फ “इनकम-रिटर्न” की नयी प्रक्रिया सृजित की जा सके तो क्रांतिकारी बदलाव हो सकते हैं.

    तकनीकि-क्रान्ति के युग में इस कल्पना को साकार कर पाना मुश्किल बिलकुल भी नहीं है. shop.viavisolutions.com एक गृहणी टोल-फ्री नम्बर पर फोन मिलाती है. उसके स्वागत के साथ कंप्यूटरिकृत सिस्टम द्वारा कुछ निश्चित सूचनाएं ली जाती हैं जिससे उसका प्रोफाइल तैयार होता है. इस प्रोफाइल में फिर विभिन्न प्रतिमानों के अनुसार उनके द्वारा किये जाने वाले दैनिक कार्य, घंटे आदि सूचनाएं दर्ज होती हैं और मिनटों में ही स्वतः उक्त व्यक्ति को स्वयं द्वारा किये गए श्रम का आंकलन उसकी अनुमानित कीमत के रूप में प्राप्त हो जाता है.

    ऐसी ही व्यवस्था हर वर्ग के लिए भिन्न प्रतिमानों/ घटकों के आधार पर की जा सकती है ताकि व्यय और आय की स्पष्ट समझ विकसित हो सके. निश्चित ही यह प्रक्रिया घाटे को कम करने और आय को बढाने की दिशा में एकाउंटिंग के प्रति अनजान और उदासीन वर्ग के लिए एक कामयाब नुस्खा साबित हो सकती है.

    सरकारों में यदि ईक्षा-शक्ति हो तो क्या ऐसा सम्भव नहीं है ?
    क्या इस प्रक्रिया के लागू होने से उत्पादक-शक्तियों और देश-समाज के कदम तेज़ी से गुणात्मक बदलाव की तरफ नहीं बढ़ जायेंगे?

  • हिंदू धर्म की आधारभूत कथित-कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था का आधुनिक काल्पनिक-चित्रण

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों के लिये लाभदायक हो सकता है, जो कि जातिवाद के घोर हिमायती हैं और इस गुमान में जीते हैं कि जातिवाद वास्तव में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था है। जिन लोगों का जाति-विरोध केवल चुनावी-राजनीतिक व आरक्षण जैसे मसलों में होनें वाली हानि के स्वार्थ पर आधारित है, कृपया वे खुद को जातिवाद का घोर हिमायती ही मानकर इस लेख का आनंद उठावें।

    यदि आप यह मानते हैं कि भारत के लिये जाति वास्तव में ही आधारभूत जरूरी है। यदि जाति-व्यवस्था बहुत ही नायाब खोज थी और वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म की ही अति-मानवीय व सामाजिक-व्यवस्था है।  और समय के साथ वर्ण-व्यवस्था को यदि चौपट नहीं किया गया होता तो यह बहुत ही लाजवाब व्यवस्था थी।

    तो आप नीचें की काल्पनिक-चित्रण को समझिये और सच में अंदर से इमानदार होकर बहुत ही साधारण भी तार्किक क्षमता का प्रयोग करके स्वयं में जातिवाद से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजनें की सामाजिक-इमानदार चेष्टा कीजिये।

    वर्ण-व्यवस्था सच में ही जन्म-आधारित न होकर कर्म-आधारित थी तो आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था किस प्रकार की हो सकती है, इसका काल्पनिक-चित्रण का प्रयास किया जाये।

    यदि ध्यान से देखा जाये तो जिस कर्म को वर्ण तय करनें का आधार माना गया था वह कोई गूढ़ कर्म न होकर व्यवसाय के चरित्र पर आधारित था।  इसलिये मैंने व्यवसाय को कर्म मानते हुये आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था की कुछ-कुछ कल्पना की, जो कि कुछ यूं है-

    ब्राम्हण वर्ण:

    • वैज्ञानिक
    • प्रोफेसर
    • शिक्षक
    • ट्यूटर
    • अवैतनिक सामाजिक-कार्यकर्ता
    • सामाजिक-शोधार्थी
    • संपादक
    • जर्नलिस्ट
    • चिकित्सक
    • …. आदि आदि

    क्षत्रिय वर्ण:

    • सांसद/विधायक
    • सेना में काम करनें वाले लोग
    • पुलिस में काम करनें वाले लोग
    • …… आदि आदि

    वैश्य वर्ण:

    • नौकरशाह
    • कंपनीज के निदेशक/मुख्य-कार्यकारी अधिकारी आदि
    • प्रबंधक
    • मार्केटिंग विभाग
    • व्यापारी (गांव में सड़क किनारे कपड़ा बिछाकर पान-मसाला बेचनें वाले से लेकर सुपर-मार्केट तक)
    • व्यापाराना डीलों के दलाल
    • शेयर-बाजार के दलाल
    • राजनीति में दलाल किस्म के लोग
    • मीडिया के दलाल किस्म के लोग
    • गांव-गांव/कस्बे-कस्बे/नगर-नगर में व्यापाराना के अंदाज में मंदिरों को चलानें वाले
    • NGOs को फंड के लिये चलानें वाले
    • NGOs में वेतन के लिये काम करनें वाले
    • ….. आदि आदि

    शूद्र वर्ण:

    • इंजीनियर
    • मजदूर
    • किसान
    • राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के प्रचार के लिये सड़क/सोशल साइट्स आदि में पोस्टरबाज
    • ….. आदि आदि

    आधुनिक वर्ण-व्यवस्था बहुत अधिक परिवर्तनशील होगी, उदाहरण के लिये-

    • कोई महानुभाव आज किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं तो आज “ब्राम्हण” हैं, किंतु उनकी इच्छा हुयी कि अब चुनाव लड़कर सांसद बना जाये तो उनके सांसद बनते ही जाति बदल कर “क्षत्रिय” हो गयी। कभी चुनाव हार गये और फिर प्रोफेसरी शुरु कर दी तो उनकी जाति फिर “क्षत्रिय” से बदलकर “ब्राम्हण” हो गयी।
    • कोई महानुभाव आज इंजीनियर है तो “शूद्र” जाति का हुआ। किंतु यदि किसी कंपनी में मजूरी न करके किसी कालेज में पढ़ानें लगा तो उसकी जाति “ब्राम्हण” हो गयी। जिस दिन कालेज प्रबंधन नें कालेज में पढ़ानें की नौकरी से निकाल दिया और उसनें फिर से किसी कंपनी में मजूरी करनी शुृरू की तो उसकी जाति “शूद्र” हो गयी।

    आप अपनीं कल्पना शक्ति से ऐसे ही हजारों उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं।

    “आधार-कार्ड” जैसा एक “वर्ण-कार्ड” होना चाहिये जिसका कि मुख्य डाटाबेस से सीधा आनलाइन संबंध हो और बहुत ही उच्च क्षमता व गुणवत्ता के साफ्टवेयर्स और आनलाइन डाटाबेस आदि होनें चाहिये, जिससे कि मनुष्य के व्यवसाय के बदलते ही तुरत डाटाबेस में उसकी जाति अपडेट हो जाये।

    “वर्ण-कार्ड” सबसे जरूरी चीज होगी। हजारों साल पहले लोग पूरा जीवन एक ही गांव या नगर में ही परंपरा में कई पुश्तों तक रह जाते थे। किंतु आज कौन कहां चला जाये और किस व्यवसाय को अपना ले, इसका कोई अनुमान नहीं किया जा सकता है …. इसलिये “वर्ण-कार्ड” बहुत जरूरी होगा ताकि “जाति” को व्यवसाय बदलते ही तुरंत अपडेट कर दिया जाये ताकि कोई लोगों को अपनीं जाति गलत बताकर धोखा न दे पाये, आदि आदि।

    यदि आपनें सच में ही यह लेख सच्चे मन से पढ़ा है और अंदर से सामाजिक-बेईमान और स्वार्थी नहीं हैं। तो इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि “जाति-व्यवस्था” एक वाहियात बात है भले ही यह कर्म पर ही आधारित क्यों न हो।

    कोशिश कीजिये कि भारत को और भारतीय समाज को जाति से बिलकुल ही मुक्त कीजिये। और इस दिशा में एक छोटा सा कदम भी आप तब ही चल सकते हैं जबकि आप स्वयं में सच्चे मन से इमानदार हों।  इस दिशा में एक कदम चलनें के लिये आपको तर्कों की नहीं सच्चे मन की भावना को यथार्थ धरातल में जीकर प्रमाणित होनें की जरूरत है।

    हिंदू धर्म में बहुत ही सुंदर तत्व हैं किंतु जाति जैसी आधारभूत घिनौनी, हिंसक व सामाजिक गुलामी जैसी सड़ांध के कारण सबकुछ आधारहीन हो जाता है।

    मैं तो यही कहूंगा कि आईये सबसे पहले भारत को जाति मुक्त देश व समाज बनायें। इतना होते ही भारत में भ्रष्टाचार नगण्य के स्तर में पहुंच जायेगा। भारत सच में ही विश्व-गुरू बननें की क्षमता व योग्यता रखता होगा।

    —-
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

  • न्यायपूर्ण-व्यवहार – रवि प्रकाश सिन्हा

    Ravi-Praksh-Sinhaभारत में २८ राज्यों और ७ केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाले सभी १.२४८+ अरब लोगों सहित धरती में २०६ देशों में रहने वाले सभी ७.२५६+ अरब लोग यदि अपने सभी संपर्क/सम्बन्ध को “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक निर्वाह करने लग जाए तो क्या कोइ “अपराध” धरती में हो सकता है……….. विचार करें …………सादर ………. शुभकामना

    ०१-
    सम्पूर्ण-समग्र अस्तित्व/सह-अस्तित्व/ब्रह्माण्ड की हर एक इकाई, प्रत्येक इकाई पर/में/से/के लिए प्रतिबिंबित/अनुबिम्बित/प्रत्यानुबिम्बित है।  सम्पूर्ण अस्तित्व के होने में हर एक इकाई की भागीदारी है, और किसी एक इकाई के होने में सम्पूर्ण अस्तित्व की भागीदारी है.

    ब्रह्माण्ड का यह सह-अस्तित्व स्वरूप “स्वयं” में “प्रमाण” के रूप में होता है, और यही प्रमाण जीन में संगीतमयता-एकरूपता-एकसूत्रता-एकात्मता-तालमेल के रूप में “प्रमाणित” होता है.

    ०२-
    माता-पिता-संतान, गुरू-शिष्य, भाई-बहन, मित्र आदि संबोधन, केवल सम्बन्ध निर्वाह “क्रिया” का नामकरण/संज्ञा ही है, किसी व्यक्ति-विशेष का नामकरण नहीं …….. ये “क्रिया” शास्वत (नित्य-निरंतर) है। अर्थात सम्बन्ध भी शास्वत (नित्य-निरंतर) ही है, अर्थात बने हुए ही हैं, उन्हें केवल जैसा है उसे वैसा ही जानना/समझना, स्वीकारना (मानना), पहचानना और निर्वाह करना है.

    ०३-
    जिज्ञासा= सुख-शान्ति-संतोष-आनंद-परमानंद-चिदानंद-ब्रह्मानंद पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =विचार, वचन, व्यवहार, कार्य में एकसूत्रता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =अनुभव-प्रमाण-बोध-संकल्प-चिंतन-चित्रण(इक्षा)-तुलना-विश्लेषण-आस्वादन-चयन(निर्णय)-मेधस-शरीर-प्रकृति(भौतिक-रासायनिक)-अस्तित्व में संगीतमयता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =स्वयं(मन)-शरीर-सम्बन्ध-परिवार-समाज-राष्ट्र-अन्तर्राष्ट्र-विश्व-प्रकृति-धरती-ब्रह्माण्ड-अस्तितिवा में एकात्मता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =शिक्षा-संसका, न्याय-सुरक्षा, स्वास्थ्य-संयम, उत्पादन-कार्य, विनिमय-कोष आयामों में तालमेल पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है वैसा ही जानना/समाझ्ना और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”.

    ०४-
    जहां “पार” लग जाए वह “परिवार”
    जहां हम निश्चिन्त होकर विशवास पूर्वक (अभयता=भय मुक्त) रह सकें वह “परिवार”
    जहां प्रतेक सम्बन्ध-परस्परता का निर्वाह “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक होता हो वह “परिवार”
    परिवार = (सूक्ष्मतम/न्यूनतम स्वरूप) अनेक मनुष्यों द्वारा सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए “सहोदर (शरीर के आधार पर)” परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहयोगिता-सहभागिता-प्रयोजनीयता पूर्वक निर्वाह क्रिया का नामकरण/संज्ञा “परिवार”
    परिवार का व्यापक/वास्तविक स्वरूप “सहोदर (शरीर के आधार पर)” से मुक्त “मानसिकता” के रूप में “अनन्यता” के स्वरूप में सम्पूर्ण विश्व मानव जाती “एक परिवार”

    ०५-
    जो सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित करे सो मित्र (एकोदरवत्), अर्थात “सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “मित्र” (एकोदरवत्).

    ०६-
    मित्र = केवल और केवल भाई/बहन इससे भिन्न कुछ भी नहीं ………. सहोदर (एक माता-पिता की संतान) नहीं होने की स्थिति को संबोधित करने के लिए “मित्र” संबोधन, मित्र की वास्तविकता केवल भाई/बहन के स्वरूप में ही है अर्थात, धरती में “मित्र” संबोधन से संबोधित सभी व्यक्ति मूलतः भाई/बहन ही हैं, इससे भिन्न कुछ भी नहीं …… विचार करें

    ०७-
    जो समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो बहन, अर्थात “समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “बहन”

    ०८-
    जो समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो भाई, अर्थात “समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “भाई”

    ०९-
    जो जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करे सो शिष्य, अर्थात “जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “शिष्य”

    १०-
    जो प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा तृप्त/शांत करे सो गुरू, अर्थात “प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा त्रिप्ती क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “गुरू”

    ११-
    जो अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करे सो संतान, अर्थात “अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “संतान”

    १२-
    जो संरक्षण करे सो पिता, अर्थात “संरक्षण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “पिता”
    जो पोषण करे सो माँ, अर्थात “पोषण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “माता”
    अस्तित्व (समग्र-सम्पूर्ण), सह-अस्तित्व, ब्रह्माण्ड, धरती, प्रकृति, विश्व, अन्तर्राष्ट्र, राष्ट्र, समाज, परिवार, सम्बन्ध, व्यक्ति, शरीर, मन, अस्तित्व (स्वयं).

    १३-
    मनुष्य ने लिखी किताब……….प्रमाण कौन……..मनुष्य या किताब…
    मनुष्य ने बनायी मशीन………प्रमाण कौन……..मनुष्य या मशीन….
    मनुष्य ने बोले शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…………प्रमाण कौन……….मनुष्य या शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…..
    प्रमाण अथवा महत्वपूर्ण और बड़ा कौन………..मनुष्य-स्वयं या उसके द्वारा लिखी, रची, बनायी, बोली गयी चीजें……..

    १४-
    संविधान की मूल उद्देशिका:- “न्याय”,

    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पात्रता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की क्षमता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की योग्यता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के अनुसार निर्वाह करना,
    सम्बन्ध/परस्परता में पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के निर्वाह से प्राप्त फल-परिणाम का परस्पर अपेक्षा एवं पूरकता के आधार पर मूल्यांकन करना,
    सम्बन्ध/परस्परता में किये गए मूल्यांकन का निष्कर्ष परस्पर-अपेक्षा-पूरकता के अनुरूप होने के फलस्वरूप दोनों सम्बन्धियों का तृप्त होना अर्थात उभय-तृप्त होना.
    सम्बन्ध/परस्परता में इस प्रकार से उभय-सुख होना, उत्सवित होना = न्याय.
    सम्बन्ध/परस्परता में न्याय होना = व्यवहार.

    जाँचिये कि “न्याय” कोर्ट में हो सकता है क्या…….

    १५-
    कौन ज्यादा समझदार है या कम ना-समझ ……

    पढ़ा-लिखा-उच्च डिग्रीधारी और ज्यादातर बीमार आदमी…..
    अनपढ़-निरक्षर बिना डिग्री वाला और ज्यादातर स्वस्थ आदमी……..

    १६-
    वर्त्तमान की समीक्षा :—–

    १. व्यापार-तंत्र = कृषी-बागवानी-पशुपालन-आपसी-लेन-देन सहित बेईमानी, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, लूट, प्रकृति+मानव का शोषण, उत्पादन, उद्द्योग, विपणन, मुद्रा-विनिमय, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……

    २. राज-तंत्र = सरकार-शासन-प्रशासन सहित भीड़, गिरोह, कबीला, मुखिया, राजा, प्रतिनिधि, बन्दूक-द्रोही-विद्रोही-आतंकवादी-पुलिश-सेना, संस्था, संगठन, एन०जी०ओ०, दल, लोक, प्रजा, जन, गण, साम्यवादी, समाजवादी, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……..

    ३. धर्म-तंत्र = व्यवस्था-अव्यवस्था सहित पूजा-पद्धति, भक्ति-उपासना, साधना, ध्यान-योग, आस्था, विचार, वाद, मत, पंथ, समुदाय, सम्प्रदाय, …., …., ….-तंत्र, आदि और इन सब के द्वारा “नियंत्रित”……..

    ४. शिक्षा-तंत्र = विद्यालय सहित प्रचार – कविता, कहानी, किताब, मीडिया/पत्रकारिता (प्रिंट, ऑडियो, विडिओ), इन्टरनेट (गूगल, फेसबुक, ट्विटर, सोशल-मीडिया, …., …., आदि), स्मार्टफोन, टोपी, ड्रेस, झंडा, पर्चा, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, टी-वी, सिनेमा, …., आदि, प्रदर्शन – नाटक, नौटंकी, नाच, हुड़दंग, हंगामा, धरना, अनशन, चर्चा, गोष्ठी, सभी व्यक्तिगत (शारीरिक+मानसिक)/पारिवारिक/सामाजिक/राष्ट्रीय/वैश्विक/प्राकृतिक -गतिविधियाँ एवं उत्सव, पर्व, त्यौहार, जयन्ती, मेला, रैली, आन्दोलन, ,…., …., ….-तंत्र, आदि इन चारों के द्वारा “नियंत्रित”

    नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र का मकडजाल:

    जिससे टीचर्स की मानसिकता अथवा टीचर्स को मानसिक तौर पर “गुलाम” बनाया जा सके. जिससे मानसिक तौर पर अथवा “गुलाम” मानसिकता के अथवा “रोबोट” नागरिक बनाया जा सके, जो “स्वतन्त्र” रूप से कभी भी सोच ही न सकें और इसप्रकार के नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र के मकडजाल के सही, अच्छे और सार्वभौम रूप से कल्याणकारी होने और उसके संवैधानिकता का मूल्यांकन नहीं कर सके, जिससे इन चारों तंत्रों को अपने कार्यक्रमों को संचालित करने में कोइ बाधा न आये और उनके जरूरत के अनुसार कार्य-शक्ति “मशीनीकृत-आदमी” मिल सके.

    १. व्यापार-तंत्र को कामगार अर्थात सामान्य-मजदूर, कम-स्किल्ड-मजदूर, उच्च-शिक्षित/स्किल्ड-मजदूर और लाभ को अधिकतम कर सकने वाले विशेषज्ञ,

    २. राज-तंत्र को कर्मचारी, नौकरशाह और लोक/प्रजा/जन/गण/मन को बल पूर्वक नियंत्रित कर सकने वाले विशेषज्ञ,

    ३. धर्म-तंत्र को अन्धानुकरण करने वाले अनुयायी, भक्त, कार्यकर्ता, सेवादार और सम्मोहित कर सकने वाले वाक्पटु विशेषज्ञ,

    ४. शिक्षा-तंत्र को टीचर्स जिनकी मानसिकता “गुलाम” जैसी हो और दूसरों के मानसिकता को “गुलाम” बनाने वाले विशेषज्ञ.

    मिल सकें………….इसके समाधान हेतु शिक्षा के समग्र-सम्पूर्ण-सार्वभौम स्वरूप/प्रारूप के प्रस्ताव पर विचार करें ………….शुभकामना ………………

    =====

    रवि प्रकाश सिंन्हा
    प्राथमिक शिक्षा परिषद में अध्यापक हैं

  • होमई व्यरवाल्ला Homai Vyarawalla

    UNKNOWN PHOTOGRAPHER  Homai Vyarawalla with her Speed Graphic Camera on her shoulder.Gelatin silver print. Alkazi Collection of Photography

    होमई व्यरवाल्ला भारत की पहली महिला पेशेवर प्रेस-फोटोग्राफर थीं और उन राजनेताओं से कम प्रसिद्ध न थीं जिनकी तस्वीरें उन्होंने उतारी. फोटोग्राफी के प्रति उनका प्रेम भी अपने पति श्री मानेकशा व्यरावल्ला के सानिध्य और प्रेम में अंकुरित हुआ. मानेकशा खुद एक पेशेवर फोटोग्राफर थे और उन्होंने होमई को फोटोग्राफी की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराया. संयोगवश 1930 फोटो-जगत का एक ख़ास दौर था जब होमई ने फोटोग्राफी जगत में प्रवेश किया. नयी तकनीकी ने कैमरे को स्टूडियो की बंदिशों से से मुक्त कर दिया था और भारतीय फोटोग्राफर आत्मनिर्भर होने लगे थे. “द बॉम्बे क्रोनिकल” और “द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया” ने, जो छायाचित्रों को विशेष महत्व देते थे, होमई के छायाचित्रों को अपने पन्नों में स्थान दे एक नयी पहचान दी.

    होमई ने आज़ादी से पहले और बाद के सैकड़ों अनमोल पलों को अपने कैमरे में कैद किया. जवाहरलाल नेहरु उनके पसंदीदा विषय थे. फ्लैश चमकने के कारण एक बार उन्हें गांधी जी की डांट भी खानी पड़ी कि इस लड़की को तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक यह मुझे अँधा न कर दे. ख़ास क्षणों को बगैर चूके तस्वीरों में जज़्ब करने की गज़ब की दृष्टि थी होमई के पास जो हमेशा-हमेशा के लिए देशवासियों के लिए धरोहर बनी रहेगी.

    1970 में होमई ने फोटोग्राफी से सन्यास ले लिया.