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  • राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र के संवेदनशील लोगों के लिए सूचना – अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे आपसे मिलने दिल्ली पहुंच चुके हैं

    सामाजिक यायावर


    अबुझमाड़ भारत का वह आदिवासी इलाका है जहां पर 2009 तक अबुझमाड़ से बाहर के लोगों के लिए अबुझमाड़ में प्रवेश प्रतिबंधित रहा था। माओवादियों ने जंगल के प्रवेश मार्गों पर लैंड माइन्स लगा कर प्रशासनिक सेवाओं का मार्ग अवरुद्ध कर रखा था। इसलिए अबुझमाड़ के आदिवासी लोग हमारी आपकी दुनिया से कटे रहे, अपरिचित रहे।

    Dr Santosh Kr Dewangan

    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंधाधिकारी, ADM, नारायणपुर ने टेलीफोनिक चर्चा के दौरान बताया कि श्री टामन सिंह सोनवानी, जिलाधिकारी, DM, नारायणपुर के निर्देश पर वे व श्री दीपक हिरवानी, निजसचिव, जिलाधिकारी नारायणपुर अबुझमाड़ के बच्चों के साथ दिल्ली भ्रमण पर पहुंच चुके हैं।

    अबुझमाड़ क्षेत्र के ये आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति आदि से मिलने, लोकतंत्र के विभिन्न पहलुओं को समझने, संसद, सेना मुख्यालयों, चुनाव आयोग, लाल किला, कुतुबमीनार आदि देखने के लिए दिल्ली कुछ दिनों के लिए आए हैं।

    यदि आप इन बच्चों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाना चाहते हैं, उनका नई दुनिया में स्वागत करना चाहते हैं, उनको महसूस कराना चाहते हैं कि उनके घर अबुझमाड़ के बाहर की दुनिया व लोग कैसे हैं। तो आप इन बच्चों से मिलें, उनके साथ कुछ समय बिताएं। 

    यदि आप ऐसा करने के इच्छुक हैं तो आपकी सुविधा के लिए दिल्ली में बच्चों के प्रस्तावित-कार्यक्रम व संपर्क की सूचना निम्न है।

     

    • 11 नवंबर – भारत के राष्ट्रपति, लोटस टेम्पल व इंडिया गेट
    • 12 नवंबर – कुतुब मीनार, विज्ञान भवन, हुमाऊँ का मकबरा, राजघाट
    • 13 नवंबर – अक्षरधाम मंदिर, मेट्रो ट्रेन, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, विभिन्न देशों के राजदूतों के कार्यालय
    • 14 नवंबर – थलसेना मुख्यालय, वायुसेना मुख्यालय, जलसेना मुख्यालय, CRPF मुख्यालय
    • 15 नवंबर – भारतीय चुनाव आयोग, खेलगांव
    • 16 नवंबर – नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT), भारत के प्रधानमंत्री, भारत की संसद, मीडिया संस्थान

     

    संपर्क :
    डा० संतोष कुमार देवांगन, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, ADM, 09425253589 व
    श्री दीपक हिरवानी, निज सचिव, जिला दंडाधिकारी (जिलाधिकारी), DM, 09425595244

     

    यह कार्यक्रम किसी NGO का फंड से आयोजित कार्यक्रम नहीं है। यह जिला प्रशासन के संवेदनशील अधिकारियों का कार्यक्रम है। यहां तक कि इन अधिकारियों ने इस आयोजन में होने वाले खर्च में सहयोग के लिए अपने वेतन में से आर्थिक सहयोग भी किया है। इन अधिकारियों ने अबुझमाड़ में क्या काम किए और कर रहे हैं, उसका कुछ अंश समझने व जानने के लिए आप दी हुई लिंक पर जाकर लेख पढ़ सकते हैं।

     

    अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे DM, ADM व अन्य के साथ

  • 500 और 1000 के नोट समाप्त करने से अधिकतम 3% काला धन आ सकता है बाहर

    के० एन० गोविंदाचार्य


    प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़, निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

    अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलु उत्पाद (GDP) के लगभग 20% अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी। वहीँ 2000 के समय वह 40% तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20% तक पहुंची है। 2015 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना। इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है।

    रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86% था। अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3% होता है!

    प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहाँ है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु (अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं। इसके आलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चूका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फरक नहीं पड़ेगा।

    अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है, इन्हें काला धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सीखाने वाले मिल जाते हैं। इसीप्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे। 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3% है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य ।

     

    अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3% ही बाहर आ पायेगा और 1% से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं। केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आँख में धूल झोंकना है। उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग।

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  • आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ

    त्रिभुवन


    आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ।

    महाभारत में एक एक श्लोक है : श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्ममें मरना भी कल्याणकारक है, पर परधर्म तो भय उपजानेवाला है।

    आखिरी ऐसा क्या होता है कि पूंजा गोकुलदास मेघजी का गुजराती परिवार इस्लाम अपना लेता है और भारत का खंडित करके एक नया देश पाकिस्तान बना लेता है। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, इस पाकिस्तान से एक बांग्लादेश भी निकलता है। यह इतिहास की बात है। अभी समीचीन भी नहीं है, लेकिन बहुत गंभीरता से साेचने की बात है। आप जिन्ना या पूंजा परिवार को विभीषण या जयचंद कुछ भी कहें, लेकिन इस बदलाव ने भारत को बहुत क्षति पहुंचाई है।

    देश में जिस तरह की चर्चा इन दिनों चल रही है और जैसे नारेबाजियां और किलेबंदियां हो रही हैं, उनमें क्या यह आत्मविश्लेषण का विषय नहीं है कि एक सुशिक्षित व्यापारिक परिवार ने महाभारत और श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को छोड़कर कुरआन की शिक्षा को अपनाया। यह प्रश्न परेशान करने वाला है। आप यह पोस्ट लिखने के लिए मुझे या धर्म बदलने के लिए जिन्ना परिवार को गाली दे सकते हैं। लेकिन मेरा विनम्र अनुराध है कि कई बार आत्मविश्लेषण और आत्मावलोकन संभवत: बहुत उपयुक्त और समीचीन होता है। आख़िर कुछ तो कारण रहा होगा कि पूंजा जैसा गौरवशाली नाम बदल गया। मीठी बाई जैसा शुद्ध भारतीय संस्कारशील नाम तिरोहित हो गया।

     


    credits : Tribhuvan's facebook wall

  • जीएसटी में तंबाकू पर 26 प्रतिशत की प्रस्तावित सिन रेट राजस्व और जन स्वास्थ्य पर डालेगी नकारात्मक असर : 40 प्रतिशत से कम की सिन रेट से तंबाकू उपयोगकर्ताअेां की संख्या में होगी बढ़ोतरी

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    मुंबई, 1 नवंबर।

    विश्व भर में तंबाकू उपभोक्ताओं की संख्या के मामले भारत दूसरे स्थान (27.5 करोड या भारत के 35 प्रतिशत व्यस्क) पर है। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हर साल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर जाते हैं। जिसमें 72 हजार नागरिक राजस्थान के भी शामिल है। तंबाकू सेवन के कारण देश को स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक आर्थिक खर्च वहन करना पडता है। हाल ही में दिल्ली में हुई जीएसटी की बैठक में 26 प्रतिशत की सिन रेट (तंबाकू इत्यादि उत्पादों पर लगने वाला कर)  का प्रस्ताव दिया गया है, जबकि राजस्थान में सभी तंबाकू उत्पादों पर 65 प्रतिशत टैक्स है।

    इस बात पर निश्चित तौर पर एक अहम आम सहमति है कि तंबाकू जैसी जो चीजें समाज के लिए हानिकारक हैं और “सिन” के रूप में वर्गीकृत की गई हैं, उनपर जीएसटी के तहत उच्च दर पर कर लगाया जाना चाहिए। प्रमुख आर्थिक सलाहकार रिपोर्ट में ऐसी सिफारिश की गई है। उसमें सिगरेट, बीडी और चबाने वाले तंबाकू समेत सभी तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत जीएसटी सिन रेट लगाने की बात कही गई है।

    20 अक्तूबर को संपन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में इससे कहीं कम यानी 26 प्रतिशत की सिन रेट का प्रस्ताव दिया गया है, जिसका देश के राजस्व के साथसाथ उसके जन स्वास्थ्य पर भी बड़ा असर पडेगा। इन दोनों पर ही गंभीरता से गौर किया जाना जरूरी है। सिन टैक्स के पीछे के दो तार्किक कारण हैं। पहला तार्किक कारण तंबाकू जैसे उत्पादों के कारण समाज को होने वाले नुकसान के लिए भरपाई है और दूसरा कारण इन उत्पादों की कीमत बढाना और इनका इस्तेमाल घटाना है। 26 प्रतिशत की दर इन दोनों ही उद्देश्यों को विफल कर देगी। यह तंबाकू से मिलने वाले मौजूदा राजस्व को कम कर देगी और असल में तंबाकू उत्पादों को खास तौर पर बच्चों एवं युवाओं समेत कमजोर वर्ग के लोगों को आदतन बना देगी, जिससे इन उत्पादों के सेवन को बढावा मिलेगा।

    आईआईटी जोधपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ.रीजो जॉन के अनुसार, “यदि सरकार जीएसटी के बाद तंबाकू उत्पादों पर मौजूदा आबकारी शुल्क को बनाए भीरखती है तो भी 40 प्रतिशत की जीएसटी सिन रेट की तुलना में 26 प्रतिशत की सिन रेट लगाना तंबाकू कर के कुल राजस्व को लगभग पांचवें हिस्से (17प्रतिशत या मोटे तौर पर 10,510 करोड रूपए) तक घटा देगा। स्पष्ट तौर पर, 26 प्रतिशत की सिन रेट तंबाकू के लिए राजस्व निरपेक्ष स्थिति बनाए रखने केलिए जरूरी दर से कहीं कम होगी। चूंकि अधिकतर तंबाकू उत्पादों पर औसत वैट की दरें खुद ही 26 प्रतिशत से ज्यादा हैं, ऐसे में 26 प्रतिशत की सिन रेट सभी तंबाकू उत्पादों पर कर का बोझ महत्वपूर्ण तरीके से कम कर देंगी।” उन्होने बताया कि तंबाकू का सेवन देश पर भारी स्वास्थ्य एवं आर्थिक खर्च डालता है। तंबाकू के सेवन के कारण होने वाली बीमारियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्च वर्ष 2011 में 1.04 लाख करोड रूपए या भारत की जीडीपी का 1. https://www.caasimada.net 16 प्रतिशत था।

    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्रोफेसर और कैंसर सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी के अनुसार, “जीएसटी की कहीं कम दर सभी तंबाकू उत्पादों को युवाओं और अन्य कमजोर तबकों के लोगों के लिए कहीं ज्यादा आदतन बना देगी। इसके परिणामस्वरूप तंबाकू का प्रकोप और ज्यादा बढ जाएगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बहुत बढ जाएगा और उत्पादकता में गिरावट आएगी। इससे निश्चित तौर पर प्रति वर्ष कैंसर से मरने वालों की संख्या बढेगी, जो किसी भी देश के लिए अच्छी खबर नहीं है। डा.चतुर्वेदी ने अपील है कि सरकार को तंबाकू उत्पादों पर उच्च् दर पर कर लगाना चाहिए ताकि लोगों को इसके सेवन के लिए हतोत्साहित किया जा सके।”

    लगभग 48 प्रतिशत पुरूष और 20 प्रतिशत महिलाएं (व्यस्क जनसंख्या का 35 प्रतिशत) तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हरसाल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर रहे हैं। तंबाकू के बाजार में 48 प्रतिशत हिस्सेदारी बीडी की, 38 प्रतिशत चबाने वाले तंबाकू की और 14 प्रतिशत हिस्सेदारी सिगरेट की है। इसलिए यह बात स्पष्ट है कि इन मौतों के लिए बीड़ीं बडी जिम्मेदार हैं।

    “मौजूदा तंबाकू कर तंबाकू उत्पादों की विभिन्न किस्मों (जैसे बीड़ीें, धुंआरहित तंबाकू और सिगरेटों) के बीच भेद करता है। नई जीएसटी प्रणाली में भी कमजोर लोगों को एक तरह से कर मुक्त बीड़ी बेचना जारी रखने से यह सुनिश्चित होगा कि गरीब लोग गरीबी और खराब स्वास्थ्य के दुष्चक्र में फंसे रहें। इसकी नियमित लत के कारण वह तंबाकू पर ज्यादा खर्च करने के लिए प्रेरित होते हैं और भोजन, स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा पर कम खर्च करते हैं। हम केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करतें है कि बीडी समेत तंबाकू की सभी किस्मों पर जीएसटी प्रणाली के तहत 40 प्रतिशत का कर लगाया जाए ताकि लोगों को इसके बुरे प्रभाव से बचाया जा सके।”

    “धुंए वाले 85 प्रतिशत तंबाकू का सेवन बीड़ी के रूप में किया जाता है, तंबाकू संबंधी 10 लाख मौतों का एक बडा प्रतिशत(5.8 लाख लोग) बीडी के सेवन के कारण है। इसलिए अधिकतम कर लगाने के लिए सिन प्रोडक्ट्स की उच्चतम श्रेणी में बीड़ी को रखकर न सिर्फ लाखों गरीब भारतीयों की जिंदगी ही बचाई जा सकती है बल्कि यह समाज के विभिन्न तबकों के बीच स्वास्थ्य के भारी अंतर को भी कम करने में मदद मिल सकती है। सरकार को इन मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर देखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तंबाकू की विभिन्न किस्मों के बीच कोई अंतर न किया जाए और उन पर उच्चतम संभावित दरों का कर लगाया जाए ताकि हमारे सबसे कमजोर तबकों के लोगों को इसका शिकार बनने से बचाया जा सके।”

    करीब 27.5 करोड़ भारतीय तंबाकू का सेवन करते हैं और इनमें एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें बचपन में ही इसकी लत लग जाती है। ग्लोबल एडल्टटोबेको के सर्वे के अनुसार तंबाकू शुरु करने की उम्र 17 साल है वहीं किशोरियों में यह आयु महज 13 साल है। ग्लोबल यूथ टोबेको के सर्वे में सामने आया किभारत के 20 प्रतिशत बच्चे तंबाकू के उत्पादों का प्रयोग करते हैं। 5500 बच्चे, किशोर प्रति दिन तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। राज्य में हर रोज औसतन350 नए बच्चे तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। प्रदेश में तंबाकू की लत 32 प्रतिशत लोगों में है तथा राजस्थान में करीब 72 हजार लोग इसी कारण दम तोड़ देते है।

    मुख के कैंसर के कारण मौत का ग्रास बने महाराष्ट्र के पूर्व गृह एवं श्रम मंत्री सतीश पेडनेकर की पत्नी श्रीमति सुमित्रा पेडनेकर ने कहा, मैंने तंबाकू के कारण अपने पति को एक छोटी उम्र में खो दिया। मैं उनकी एक गलत निजी पसंद के कारण कष्ट उठा रही हूं। मुझे और मेरी दो बेटियों को न सिर्फ भावनात्मक कष्ट उठाना पडा बल्कि हम आर्थिक तौर पर भी टूट गए थे। कोई भी विधवा और अनाथ बनाने वाले इस कारखाने को सब्सिडी देने की सोच भी कैसे सकता है? सरकार ऐसे उद्योग को सहायता देती नहीं दिखाई देनी चाहिए कि , जो भारी मुनाफा जुटाने के लिए हर साल 10 लाख परिवारों को तबाह कर देता है।”

    मौजूदा परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान आबकारी कर के साथ 40 प्रतिशत की सिन रेट और तंबाकू उत्पादों पर कर लगाने के राज्य के अधिकार जनस्वास्थ्य एवं राजस्व के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति हैं। इससे हमें न सिर्फ तंबाकू पर मौजूदा कर के बोझ के प्रबंधन में मदद मिलेगी बल्कि यह और अधिक भारतीयों को जिंदगी पर खतरा पैदा करने वाली बीमारियों का शिकार बनने एवं गरीबी के अनवरत चक्र में फंसने से भी बचाएगा।

     

  • सेवाभावी सुकमा बड्डे : अबुझमाड़ की पहली मड़िया आदिवासी नर्स

    सेवाभावी सुकमा बड्डे : अबुझमाड़ की पहली मड़िया आदिवासी नर्स

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सुकमा बड्डे अबुझमाड़ क्षेत्र की पहली मुरिया आदिवासी लड़की है जिसने स्नातक किया है। सुकमा बड्डे ने रामकृष्ण मिशन के आवासीय छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 12वीं के बाद भिलाई के संस्थान से नर्सिंग में B.Sc स्नातक किया।

    सुकमा बड्डे ने अपनी इच्छा के लिए कि वह अबुझमाड़ में जरूरतमंद लोगों के लिए काम करेगी, शहर में रहकर नौकरी करते हुए आरामदेह व सुरक्षित जीवन जी पाने की संभावनाओं पर कभी विचार ही नहीं किया। विचार ही नहीं किया कि उसके पास छत्तीसगढ़ की राजधानी में घर हो सकता है, वह महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाने जा सकती है, कार खरीद सकती है, ग्लैमर का जीवन जी सकती है।

    सुकमा बड्डे जो विशेष आदिवासी क्षेत्र से है, विशेष आरक्षण की सुविधा का प्रयोग करते हुए किसी शहर में नौकरी पाना उसके लिए बहुत मुश्किल नहीं था। लेकिन स्नातक के बाद इन संभावनाओं को तिलांजलि देते हुए वह अबुझमाड़ लौटी। उसने स्वास्थ्य विभाग में नर्स की नौकरी के लिए आवेदन दिया, जो भी कारण रहा हो लेकिन उसके आवेदन को स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने अस्वीकृत कर दिया।

    Sukma Badde

    लगभग दो वर्ष पूर्व जब टामन सिंह सोनवानी जिलाधिकारी होते हुए भी अबुझमाड़ के गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगवाते घूम रहे थे। तब सुकमा बड्डे उनसे मिली और नर्स की नौकरी की मांग की। टामन सिंह सोनवानी को बड़ा ताज्जुब हुआ जब उनको मालूम पड़ा कि अबुझमाड़ जैसे क्षेत्रों की माड़िया आदिवासी लड़की ने इतना पढ़ाई की है। उनको लगा कि उनको इस लड़की का सहयोग करना चाहिए। उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सुकमा बड्डे को नारायणपुर जिला अस्पताल में नर्स की नौकरी दिलवा दी।

    नौकरी पाने के अगले दिन सुकमा बड्डे नारायणपुर जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी के पास आती है और कहती है कि वह जिला अस्पताल में नौकरी नहीं करना चाहती है वह तो अपने क्षेत्र के पिछड़े गावों की सेवा करना चाहती है।

    ऐसी भावना व कार्य करने का जज्बा देखकर सुकमा बड्डे का स्थानांतरण अबुझमाड़ के गावों में कर दिया गया। सुकमा बड्डे उत्साह व जज्बे के साथ गांवों के लोगों की सेवा में लगी हुई हैं। एक ऐसी लड़की जिसने बेहतर जीवन की संभावनाओं को त्याग कर अबुझमाड़ जैसे शताब्दियों से अपवर्जित क्षेत्र में स्वेच्छा व जिद से जाकर आदिवासियों की सेवा करने का भाव रखा। उस सुकमा बड्डे को माओवादी क्रांतिकारी प्रशासन का इंफारमर कहते हुए धमकी देते हैं।

    स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न रहने के कारण असमय अपनी माता को खो चुकी सुकमा बड्डे का अपराध क्या सिर्फ यह है कि वह जागरूक है, उसमें पढाई करने का जज्बा था और उसने अपने जीवन में एक निर्णय लिया कि उसको अपने इलाके में लोगों के स्वास्थ्य के लिए जीवन समर्पित करना है ताकि उसकी माता जैसा दर्द औरों को न झेलना पड़े। इस निर्णय के लिए उसने पढ़ाई पढ़ी, शहरों में नौकरी करके आरामदेह जीवन यापन करने की संभावनाओं को त्यागा। नारायणपुर जिला अस्पताल में लगी सरकारी नौकरी नहीं करने की इच्छा जाहिर की।

    ऐसी सेवाभावी व दृढ़ निश्चयी लड़की को तो सलाम करना चाहिए। सुकमा बड्डे को कोटि-कोटि सलाम।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारत के IAS अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि ब्रिटिश किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझे

    त्रिभुवन


    गंगासिंह के गंगनहर लाने का मिथक

    गंग नहर
    गंग नहर

    महाराजा गंगासिंह गंगनहर निकालकर आए और भगीरथ की तरह साबित हुए। यह मिथक जाने कब से चल रहा है। जिसकी सत्ता होती है, इतिहासकार भी उसके दास होते हैं। आप बस एक बार एक मिथक बस साबित कर दीजिए, फिर बाकी काम हम पत्रकार मुफ़्त में करते रहेंगे। ये मिथक फिर चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक कितने ही क्यों न हों। हर युग की अपनी रामायण और हर युग के अपने राम होते हैं। हर सम्राट, हर बादशाह और लोकतांत्रिक शासक तक अपने आपको गौरवान्वित करने की आत्मप्रशंसा से बाज नहीं आते। उन्हें स्वयं एहसास नहीं होता तो हर राम को उनका तुलसीदास तलाश कर ही लेता है।

    गंगनहर और गंगानगर के इतिहास को लेकर मैं बीकानेर के अभिलेखागार से लेकर दिल्ली में तीन मूर्ति भवन के नेहरू मेमोरियल संग्रहालय तक की बहुत ख़ाक छान चुका हूं। इस पर मेरी एक किताब भी कंप्यूटर के किसी कोने में पड़ी है। तथ्य ये है कि 1876 से 1878 के बीच भयावना अकाल पूरे हिंदुस्तान में पड़ा था। यह ग्रेट फेमीन के नाम से इतिहास में कुख्यात है। इंपीरियल गजट ऑव इंडिया के थर्ड वॉल्यूम (1907 में प्रकाशित) के अनुसार इस अकाल ने देश के छह लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने बाहुपाश में ले लिया था। इसमें पांच करोड़ 85 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए थे और 55 लाख लोग भूखों मर गए थे। पंजाब और नॉर्थ प्रोविंस में आठ लाख और राजपूताने में कोई 20 लाख काल कवलित हुए। किसी को अनाज का दाना नहीं मिला और किसी को पानी की बूंद। मारे भूख के लोग मरे हुए जानवरों तक को खा गए या कीकर-जांटी के पेड़ों की छाल चबा-चबाकर मर गए।

     

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    लार्ड नार्थब्रुक
    लार्ड नार्थब्रुक

    इस अकाल ने दक्षिण भारत के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। इस अकाल ने ब्रिटिश सरकार के संवेदनहीन लोगों तक को बुरी तरह हिला दिया था। उन दिनों लॉर्ड नार्थब्रुक वायसरॉय थे। लेकिन वे 1876 में चले गए थे। लेकिन इस अकाल का सामना किया लार्ड लिटन ने, जो 1876 से 1880 तक वायसरॉय रहे। लॉर्ड नार्थ ब्रुक और लॉर्ड लिटन की डायरियाें में दर्ज टिप्पणियां रोंगटे खड़े कर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि भारतीय राजे-महाराजे, जिन्हें हमने आज लोकतांत्रिक कालखंड में सिर के ऊपर बिठा रखा है, कितना गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे थे। इन देशी शासकों और उनके सलाहकारों ने इस तांडव को भाग्य से जोड़कर अपने फर्ज़ से किस तरह मुंह मोड़ लिया था। आप भरोसा नहीं करेंगे, अगर उस समय जातिभेद से ऊपर उठकर काम करने वाला अंगरेज़ अमला नहीं होता तो दलितों और कथित अछूतों की जो हालत होती, वह अकल्पनीय थी। और बहुत हद तक रही भी।

    लार्ड रोबर्ट लिटन
    लार्ड रोबर्ट लिटन

    ख़ैर, उन्हीं दिनों लॉर्ड लिटन के बाद जब मार्केस ऑव रिपन वायसरॉय बनकर आए तो उन्होंने अकाल से निबटने की बड़ी योजना बनाई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे विदेशी, भारत विरोधी और क्रूरशासक थे। उन दिनों उत्तर भारत के राजपूताना और बहावलनगर रियासतों में भुखमरी बहुत बढ़ गई थी। यहां के लाेगों ने पंजाब और नॉर्थवेस्ट प्रोविंस में चोरियां, डाके और बलात्कार शुरू कर दिए थे। आखिर बूभुक्षितों किं न करोति पापम् वाली स्थिति हो गई। यानी कि भूख से लड़ता आदमी कौन सा अपराध नहीं करता है! ऐसे हालात में जब पंजाब और ये प्रोविंस त्राहिमाम़् कर बैठे तो रिपन ने एक बड़ा सर्वे करवाया कि आखिर इस लॉ लेसनेस की स्थिति का कारण क्या है? वे किसी विदेशी सरकार या अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गए। इस सर्वे को बहुत बुद्धमत्ता से सोशियो-इकोनॉमिक सोच वाले लोगों ने बड़े शानदार तरीके से किया और निष्कर्ष निकला कि अगर बहावलनगर और बीकानेर रियासतों में लोगों की बहबूदी की कोई परियोजना बने तो ये लोग बस जाएं और अपराध घटें।

    लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन
    लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन

    राजनीतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने मुकम्मल येाजना बनाकर कहा कि अगर सतलुज का पानी इन दोनों इलाकों में पहुंचा दिया जाए तो लोग खेती करेंगे और लोग खुशहाल हो जाएंगे। अर्ल ऑव डफरिन ने कोशिश की, लेकिन डूंगरसिंह नहीं मानें। वे बीकानेर के महाराजा था। मार्क्वेस ऑव लैंड्स डाउने ने भी कोशिश की, लेकिन उनके समय में एक बड़ी उम्मीद थी। उन दिनों बीकानेर कोई स्वतंत्र रियासत नहीं थी, जैसे उदयपुर, जोधपुर या जयपुर हुअा करती थी। बीकानेर में भले शासक डूंगरसिंह या गंगासिंह रहे, लेकिन वहां ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल का काम करती थी। यही मूल शासक थी। नाम मात्र को डूंगरसिंह और गंगासिंह थे। यह काउंसिल भारत सरकार तय करती थी। यानी बीकानेर सीधे तौर पर ब्रिटिश डाेमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल से गवर्न होता था। बहरहाल, इसी काउंसिल ने डूंगरसिंह के समय ही गंगासिंह को मेयो कॉलेज में पढ़ाने, ऑक्सफॉर्ड भेजने और उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना तय किया था। ये राजपरिवार के नहीं, ब्रिटिश काउंसिल के फैसले थे। और इसके बाद अंगरेज़ों का पढ़ाया गंगासिंह जब शासक बना तो वह अंगरेज़ के फैसले हूबहू लेने लगा। जैसे आर्यसमाज के सुधारकों को बीकानेर से देशनिकाला देना। जैसे आज़ादी की मांग करने वालों को बाहर निकालना और स्कूल तक नहीं खुलने देना।

    महाराज गंगा सिंह
    महाराज गंगा सिंह

    लेकिन चूंकि अंगरेजों को अपने प्रोविंस में अपराध कम करने थे, इसलिए उन्होंने बजरिए गंगासिंह बीकानेर नहर का प्रोजेक्ट बनवाया और पूरा करवाया। यह लॉर्ड चेम्सफॉर्ड के समय यानी 1916 से 1921 के बीच बना। आपको यह भी याद दिलाता चलूं कि एक भयावना अकाल 1918-1919 के बीच भी पड़ा था। इस दौरान लॉर्ड चेम्सफॉर्ड वायसरॉय थे। इस काल ने भी उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जो विकराल कहर बरपाया, वह अवर्णनीय है। इसके नतीजे भी घोर मानवहंता रहे। इस तरह बार-बार अकाल पड़ना और बार-बार अंगरेज़ों के सीधे शासन वाले उत्तर भारतीय पंजाब और साथ लगते प्रोविंसेज में जब अपराध बेकाबू हुए तो अंगरेज़ प्रशासन की यह धारणा सुदृढ़ हुई कि अगर इन अपराधों को नियंत्रित करना है तो उन इलाकों में नए रोज़गार पैदा करने होंगे, जहां से ये आपराधिक मानसिकता पैदा हो रही है। ऐसे लोगों को रोज़गार से जोड़ना होगा, जिनकी मानसिकता इस ओर चुंबकीय ढंग से आकर्षित हो रही है। इस सोच से सतलुज का पानी बीकानेर रियासत में भेजने का फैसला हुआ। यह सिर्फ़ बीकानेर नहीं, बहावलनगर और फ़ीरोज़पुर के लिए भी हुआ। इन तीनों के लिए नहरें निकाली गईं।

    आपको हैरानी होगी, 1923 में बीकानेर नहर, जिसे हम आजकल गंगकैनाल कहते हैं, वह 1925 में बनकर तैयार हो गई। दो साल में। यह काम अंगरेज़ों ने किया। भारतीय मज़दूरों का पसीना इस नहर में आज भी बहता है। गंगनहर के पानी में उन लाखों मजदूरों के उस पसीने की महक आज भी आती है। बीकानेर रियासत की प्रशासनिक और इंजीनियरिंग क्षमता जवाब दे गई तो पंजाब से अंगरेज़ सरकार ने जीडी रुडकिन और एक कमिश्नर, जिनका नाम फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा है, दो लोगों काे भेजा। इन दोनों ने गंगनहर के निकलने के साथ-साथ कालोनाइजेशन का काम शुरू किया और 1ए, दो ए, एक बीबी, चार बीबी, एक केके, दो केके, 25 एमएल, 24 एमएल, 8 टीके, पांच केके, 36 एलएनपी आदि आदि जैसे चकों के नाम हाउटलेट्स के, जिन्हें हम मोघा कहते हैं, हिसाब से निकाले। मेरा अपना गांव चक 25 एमएल है। मुख्य गंगनगर पर बने सुलेमान की हैड की शोभा और सम्मोहन आज भी कम नहीं होता है। सुलेमान की हैड का 1925 में बना पुल अभी कुछ साल तक जस का तस था। अब शायद वहां नया पुल बन गया है। लेकिन राखी और चूने के उस कमाल के सामने आधुनिक इंजीनियरिंग मारे शर्म के अपना चेहरा तो छुपा ही लेती होगी।

    लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग
    लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग

    लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन
    लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन

    महाराजा गंगासिंह से ज्यादा तो अर्ल ऑव रीडिंग और लार्ड इरविन ने किया। इन दोनों वायसरॉय ने 1921 से 1926 और 1926 से 1931 के बीच गंगनहर के लिए जो किया, वह रिकॉर्ड पर है। लार्ड इरविन तो 26 अक्टूबर 1927 के दिन फीरोज़पुर हैड पर बीकानेर नहर में पानी प्रवाहित करने के उद्घाटन के मौके पर माैजूद थे।द्ध गंगासिुह के साथ-साथ इस मौके पर मदन मोहन मालवीय जी को भी विशेष तौर पर बुलवाया गया था। आपको इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि गंगानगर का स्थापना दिवस 26 अक्टूबर नहीं है। यह तो पानी प्रवाहित करने का दिन है। इसे स्थापना दिवस का नाम एक स्वच्छेचारी कलेक्टर करणीसिंह ने कुछ साल पहले दिलाने की कोशिश की थी। इन करणीसिंह को गंगानगर के सरदार सुच्चासिंह ने चूरू से लाकर बड़ी कोशिशों से खुद पढाया लिखाया और कलेक्टर के आेहदे तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन यह बंदा जब कलेक्टर बनकर आया तो इन्होंने गंगानगर के लोगों को बहुत निराशा किया। जनप्रतिनिधियों को सम्मान देना तो दूर, इनमें किसी प्रतिष्ठित नागरिक से पेश आने की शालीनता के मानदंडों को भी ताक पर रख दिया था।

    इन नहरों को निकालने का अंगरेज़ सरकार का मक़सद वाकई में न केवल पूरा हुआ, बल्कि ये हमारे आधुनिक प्रशासकों और आईएएस अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि वे किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझें। अंगरेज़ों से हमें यह सीख तो लेनी ही चाहिए कि उनकी तरह अगर हम काम करें तो हम समस्याओं को दूर कर सकते हैं, अपराधों से लड़ सकते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने राजों-महाराजों की झूठी प्रशस्तियां कब तक पढ़ते रहेंगे और विदेशी आक्रांत के रूप में आए अंगरेज़ प्रशासकों की खूबियों और अच्छाइयों को निष्पक्ष होकर ग्रहण करने का काम कब करेंगे? हमें अपनी क्रूरताएं सदा करुणा के निर्झर लगती हैं। हमें अपनी मूर्खताएं बुद्धिमत्ता की प्रज्वलित ज्योतियां प्रतीत होती हैं। हमें अपने खलनायक दिव्य आत्माएं लगती हैं। लेकिन सच यही है कि आज हम एक आज़ाद और सबल देश हैं। हमें हर चीज़ को क्रिटकली ही देखना चाहिए। गंगनहर लाना तो दूर, गंगनहर का कनसेप्ट तक गंगासिंह के दिमाग में नहीं आ सकता था। यह अंगरेज़ों का काम था और उन्होंने किया। अंगरेज़ों ने गंगनहर ला दी, लेकिन गंगासिंह से लेकर आज के शासक तक पानी का सही बटवारा नहीं करवा सके। हमारे इंजीनियरों ने अपनी इंजीनियरिंग की समस्त मेधा को कलंकित कर दिया है। हमारे प्रशासनिक अधिकारी किसानों को कभी सही पानी नहीं दिला पाए। किसान मुड़ढ़ और टेल के पाटों में कारुणिक ढंग से पिस रहा है।

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    त्रिभुवन की अनुमति से उनकी फेसबुक प्रोफाइल से लिया गया

     

  • ​हिंदुओं को समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) के नुक्ते समझने होगें

    सामाजिक यायावर


    भारत में जब भी कामन सिविल कोड की बहस शुरू होती है तब यह बहस मुसलमान धर्म की कुछ बातों जैसे चार पत्नियां रखने की अनुमति उनके धर्म में होना व तीन बार तलाक बोल कर तलाक हो जाने जैसी बातों तक ही सीमित रह जाती है। यूं लगता है कि जैसे कामन सिविल कोड का नाम केवल कामन सिविल कोड है किंतु इसमें कामन व सिविल जैसा कुछ है ही नहीं। क्योंकि कामन सिविल कोड की बहस मुसलमान धर्म में चार विवाहों की अनुमति व तीन तलाक आदि तक ही सीमित हो जाती है। यूं लगता है जैसे बहस कामन सिविल कोड पर न होकर एंटी-मुस्लिम कोड पर होनी है।

    गहराई से देखने पर दिखने लगता है कि कामन सिविल कोड के लागू न हो पाने में सबसे अधिक पेंच तो हिंदू धर्म से आएंगें। चूंकि मुस्लिम घृणा को हिंदुत्व, महानता, विश्वबंधुत्व, संस्कृति, संस्कार, राष्ट्रभक्ति व सहिष्णुता आदि मानने वाले हिंदुओं को यह लगता है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करना होगा। सच तो यह है कि इन लोगों को कामन सिविल कोड के ककहरे का भी अंदाजा नहीं।

    प्रासांगिक यथार्थ तो यही है कि वास्तव में कामन सिविल कोड एक असमाधानित मुद्दा है जिसे हिंदुओं के अंदर एंटी-मुस्लिम भावना को हवा देते रहने के लिए जीवित रखा जाता है।

    मुस्लिम व हिंदू समाजों में वैधानिक/अवैधानिक एक से अधिक पत्नियां :

    मुस्लिम समाज में चार पत्नियां रखने की अनुमति है लेकिन बहुत ही कम प्रतिशत होगा जो वास्तव में एक से अधिक पत्नी रखने की माली हैसियत रखता होगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नियां रखने वाले लोग नहीं होगें। होगें जरूर होगें लेकिन प्रतिशत बहुत ही कम है।

    मुस्लिम धर्म में एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति होने के बावजूद भारत में जितने प्रतिशत मुसलमान एक से अधिक पत्नियां रखते होगें। हिंदूओं में एक से अधिक पत्नियों की अनुमति न होने के बावजूद उससे अधिक प्रतिशत हिंदू रखैलें व दूसरी पत्नियां रखते होगें। बेहतर हो कि हिंदुओं को भी एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार दे दिया जाए। चोरी छिपे रखैल रखने या दावपेंच करके दूसरी पत्नी रखने से बेहतर होगा कि खुल्लमखुल्ला अधिकार मिल जाएं।

    मैंने तो ऐसे ऐसे हिंदू देखे हैं जो अपनी दो-दो पत्नियों को साथ लेकर खुलेआम घूमते हैं। दोनों पत्नियों से संतानें। यात्रा करते समय कार की सीट में वे बीच में बैठते हैं और उनके दोनों बगल उनकी दो पत्नियां बैठतीं हैं। दो पत्नियों के अलावे रखैंलें अलग से।

    बहुत हिंदू ऐसे हैं जो दबंग नहीं हैं, पारिवारिक कलह को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, वे रखैंले रखते हैं। रखैल को बाकायदा अलग घर देते हैं, महीने का पूरा खर्चा, रखैल से बच्चे भी उनका पूरा खर्चा। मतलब यह कि समानांतर एक और परिवार चलाते हैं। अंतर केवल यह कि रखैल को वैधानिकता नहीं हासिल।

    मुस्लिम समाज व हिंदू समाज में वैधानिक अवैधानिक तरीके से एक से अधिक पत्नियां या सहपत्नियां रखने वालों का प्रतिशत लगभग बराबर ही होगा। इसलिए व्यवारिक व चारित्रिक अंतर तो कुछ रहा नहीं।

    आदिवासी समाजों में एक से अधिक पत्नियां :

    भारत के आदिवासी समाजों में अधिकतर आदिवासी समाज पुरुष सत्ता की परंपरा वाले हैं। मुस्लिम धर्म में अधिकतम चार पूर्णकालिक पत्नियां रखने का अधिकार है। लेकिन भारत के अधिकतर आदिवासी समाजों में तो ऐसी व्यवस्था है कि आदिवासी पुरुष जितनी मर्जी हो उतनी पत्नी रख सकता है। यह भी एक कटु सत्य है कि भारत में अधिकतर आदिवासी लोग जिनका शहरीकरण नहीं हुआ है उनमें से अधिकतर लोग एक से अधिक पत्नियां रखते हैं। मैं अपने जीवन में ऐसे हजारों आदिवासियों से मिला हूं जिनके पास एक से अधिक पत्नियां हैं। या यूं कहूं कि जितने आदिवासियों से मिला हूं उनमें से अधिकतर के पास एक से अधिक पत्नियां हैं/थीं। आदिवासियों में एक से अधिक पत्नी रखना इसलिए भी आसान है क्योंकि महिला ही खेतों में काम करती है, जंगल से जंगल-उत्पाद चुन कर लाती है और उसके द्वारा किए गए उत्पादन पर उसके पति का मालिकाना हक होता है। तो जिसके पास जितनी अधिक पत्नियां उसकी उतनी अधिक आय। पत्नी को खाना, कपड़ा और झोपड़ी में एक कोना मिल जाए, बस यही बहुत है। इसमें भी खाना पत्नी ही बनाती है, कपड़े भी पत्नी ही बनाती है, झोपड़ी भी पत्नी ही बनाती है फिर भी यह सब पति के द्वारा दिया गया माना जाता है। इसलिए अधिकतर आदिवासियों ने जिनके पास कुछ पेड़ या कुछ जमीन है, मतलब खाने का जुगाड़ हो, एक से अधिक पत्नियां रख रखीं हैं।

    कामन सिविल कोड :

    अभी हिंदुओं के मंदिरों में बहुत ऐसे मंदिर हैं जिनके विवाह प्रमाणपत्र को वैधानिक दर्जा प्राप्त है। हिंदू रीतियों से होने वाले विवाहों का विवाह विभाग में पंजीकरण करवा लिया जाता है, क्योंकि हिंदू रीति से विवाह को मान्यता प्राप्त है। कामन सिविल कोड के लागू होने पर या तो हिंदुओं से यह सुविधाएं छिन जाएंगीं या सभी धर्मों को वर्तमान में प्राप्त सुविधाएं मिलती रहेंगी। कामन सिविल कोड का मतलब ही यही है कि सभी नागरिकों के लिए समान संहिता। इसका यह मतलब कतई नहीं कि समान सहिंता में हिंदू धर्म के तौर तरीके होगें। या तो सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं बरकरार रहेंगीं या सभी धर्मों को प्राप्त सुविधाएं खतम कर दी जाएंगीं। जो भी होगा वह सभी के लिए समान होगा।

    यदि ये सुविधाएं बरकरार रहतीं हैं तो कामन सिविल कोड का औचित्य ही खतम हो जाता है। यदि खतम कर दी जातीं हैं तो हिंदू लोग भी कितना तैयार होगें यह विचारणीय तथ्य है। क्योंकि अभी तो हिंदुओं की कल्पना यही है कि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू धर्म के रीति रिवाज।

    कामन सिविल कोड यदि धर्मों की इन सुविधाओं को खतम करता है जो करना ही पड़ेगा तो पारंपरिक विवाहों की मान्यता खतम हो जाएगी। भले ही कई लाख लोगों के सामने अग्नि के सत्तर फेरे लीजिए लेकिन विवाह अवैधानिक होगा, अमान्य होगा। विवाह किसे कहा जाए इसकी परिभाषा तय होगी जो किसी धर्म के रीति रिवाजों की बजाय सभी नागरिकों के लिए समान होगी।

    आदिवासी समाजों के अधिकतर विवाह अमान्य घोषित हो जाएंगें।

    दरअसल कामन सिविल कोड बहुत ही टेढ़ी खीर है, बहुत ही अधिक पेंचदार चूड़ी है। अभी भारत के लोग कामन सिविल कोड के लिए मानसिक व सामाजिक रूप से तैयार भी नहीं हैं। हंगामा तो इसलिए होता है क्योंकि कामन सिविल कोड का मतलब हिंदू सिविल कोड या एंटी मुस्लिम कोड मान लिया जाता है। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है जो हिंदू सिविल कोड को कामन सिविल कोड मान लिया जाएगा। हिंदू सिविल कोड में भी किस जाति की परंपरा को हिंदू सिविल कोड माना जाए, यह भी बहुत पेंचदार है।

    हिंदू जब कामन सिविल कोड के समर्थन की बात करता है तो यह भूल जाता है कि उनके धर्म में हजारों जातियां व उपजातियां हैं, सबने दूसरे से अलग दिखने के लिए अपने लिए अलग-अलग रीति रिवाज व परंपराएं बनाई हैं, जो कामन सिविल कोड के लिए सबसे बड़े रोड़े बनेंगें, जब भी कामन सिविल कोड की गंभीर बहस शुरू होगी। अधिकतर हिंदुओं की मान्यता में तो कामन सिविल कोड को एंटी-मुस्लिम कोड या हिंदू सिविल कोड के रूप में देखा समझा जाता है इसलिए वास्तविक व बारीक नुक्तों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है, न ही जानने समझने की चेष्टा ही की जाती है।

    चलते – चलते :

     

    कामन सिविल कोड में सबसे बड़ी बात यह होगी कि किसी भी परिस्थिति में एक से अधिक पत्नी रखना अवैध होगा, क्योंकि स्त्री भी एक नागरिक है। यदि पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार होगा तो स्त्री को भी एक से अधिक पति रखने का अधिकार होगा। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक पति कई पत्नी रखे और उसकी पत्नियां कई-कई पति। इसलिए उन हिंदुओं का क्या होगा जिन्होंने दो-दो या तीन-तीन पत्नियां कर रखीं हैं। हिंदू को एंटी-मुसलमान आवेश से बाहर निकल कर कामन सिविल कोड की जमीनी हकीकत को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

     

    सभ्य लोगों के सभ्य देश का कानून किसी धर्म विशेष के प्रति घृणा के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है। फिलहाल तो कामन सिविल कोड असमाधानित मुद्दा रूपी जिन्न है, जो बाहर तो निकाल लिया जाता है लेकिन उसे लागू कर पाना तो बहुत दूर की बात है, उसका आकार प्रकार व परिभाषाएं कैसीं हों यह ही उचित व व्यवस्थित रूप से नहीं तय हो पाया है।

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  • गौमाता का मांग-पत्र

    सामाजिक यायावर


    गुजरात से अपना मांग पत्र लेकर दो गाएं दिल्ली स्थित 7-लोककल्याण मार्ग (उर्फ़ सेवन रेस कोर्स रोड) के लिए निकली थीं। उदयपुर आते-आते वे थककर चूर हो गईं और भूख से बिलबिला उठीं। कई जगह तलाशने के बाद जब खाना नहीं मिला तो वे एक कंटेनर में मुंह मारने लगीं और अपने सिर फंसा बैठीं। हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित राव ने जब फोटो खींचने की कोशिश की तो एक गाय ने धीरे से अपने गले में बंधा एक लिफ़ाफ़ा भरी आंखों से थमा दिया। इस लिफ़ाफ़े को खोला तो इसमें एक विनय- पत्रिका निकली, जो इस प्रकार है :-

    धेनु मां का आप सबको आशीर्वाद। हम भारत के हृदय का मर्मस्थल हैं। हमारा महत्त्व तो आप नहीं जानते। हमारा महत्त्व जानना हो तो आप उन नीरद सी. चौधरी की “दॅ कॉण्टीनेंट ऑव सरसी” पढ़ो; जिन नीरद चौधरी को आप सब सदैव गाली ही देते हैं, लेकिन उन्हें कुछ पढ़ो तो आपको हमारा भी पता चले। नीरद लिखते हैं : गाय आर्यों के साथ भारत आई। आर्यों का सौंदर्यबोध बहुत विकसित था और वे गायों और सांडों की सुंदरता से बहुत प्रभावित थे। दरअसल एक हृष्टपुष्ट सुंदर गाय या सांड से अधिक सुंदर प्राणी इस दुनिया में है भी नहीं। उसका चिकना सफेद रंग, तीखे नाक-नक्श, विवेकमयी भाव-भंगिमा और उसकी रंभाहट उसे एक विचित्र सतयुगी और सतोगुणी सात्विकता वाली आभा प्रदान करती है।

    हम गाय ही एक ऐसा प्राणी है, जिसकी प्रशस्ति वेदों आैर उपनिषदों में बिखरी पड़ी है। यह एक प्राणी ऐसा है, जो पशुत्व से ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। प्रकृति के जीवों की यही एक कृति ऐसी है, जो आज तक भारतीय उप महाद्वीप में मानव जीवन को मां के बाद सबसे अधिक दुग्धपान करवाकर जीवनीशक्ति देती आई है। गाय ने ही हमारे खेतों में अपने बेटों को किसान बेटों के साथ लगाकर शस्य-श्यामल धरती में बदला। लेकिन अनादिकाल से गायों की आंखों में एक करुणा छलछलाती दिखाई देती है, जो साफ़ कहती है कि कभी उसके बेटों को जुए में जोत कर आहत किया गया तो आज वह एक पल कसाई के हाथ से छूटती है तो अगले ही पल कसाई से भी अधिक क्रूर भूख से जूझने को छोड़ दी जाती है।

    हम यह विनय पत्रिका लिख रही हैं कि क्या हमारे हित में गोभक्तों की यह सरकार और गोभक्तों का यह अपार संगठन हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संघ परिवार के भारतीय जनता पार्टी सहित सभी अानुषांगिक संगठन हम गाय के लिए कुछ करने को तैयार हैं? क्या ये सभी संगठन अपने-अपने संविधान में नहीं बना सकते कि इनके किसी भी संगठन के सदस्य होने के लिए गाय का पालन ज़रूरी होगा। वह घर में नहीं पाल सकता तो उसके लिए किसी गोशाला में उस गाय के पालन लायक पैसा देगा।

    विधानसभा का टिकट सिर्फ़ उसी व्यक्ति को मिलेगा, जो कम से कम 100 गायों को नियमित रूप से पाल रहा होगा। लोकसभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो कम से कम 250 गायों के पालन लायक गोशाला का संचालन करवा रहा होगा। राज्य सभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो 500 गायों की क्षमता वाली गोशाला का बेहतर प्रबंधन अपने स्तर पर करवा रहा होगा। और राज्य सरकार में वही व्यक्ति मंत्री बनेगा, जो 1000 गायों और केंद्र में वह जो 2500 गायों से ज्यादा की क्षमता वाली गोशालाओं का शानदार संचालन करवा रहे होंगे।

    भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था प्रकट करने आैर गोमाता की सेवा करने का इससे इतर और क्या श्रेष्ठ उपाय हो सकता है? यह क़दम उठाना इन सब लोगों की नैतिक जवाबदेही भी है, क्योंकि ये लोग जिस गोमाता के नाम पर वोट मांग रहे और देशवासियों की सहानुभूति बटोरकर चुनाव में जीत दर्ज कर रहे हैं, उसके लिए गोमाता की प्रति इनको अपना उत्तरदायित्व निभाना जरूरी है। आख़िर अगर आप अपनी निष्ठाओं को रचनात्मक रूप तो देना ही चाहिए।

    ये लोग यह प्रतिज्ञा ख़ुद भी करें और आप जैसे लोगों से भी करवाएं कि आप केवल गाय का घी खाएंगे। गाय का ही दूध पिएंगे। दही या पनीर वही लेंगे, जो गाय के दूध से बना हो। मिठाई वही खरीदेंगे, जो गोघृत से बनी हो। हम सिर्फ़ उसी होटल में रुकेंगे, जो गाय के दूध को ही इस्तेमाल करता हो। हम सिर्फ़ उसी विमान में सवारी करेंगे, जो गाय के दूध का प्रयोग करता हो। हम सिर्फ़ उसी को वोट देंगे, जिसके घर गायें बंधी हों।

    यह भी संकल्प लें कि हम ऐसे चमड़े से बनी किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करेंगे, जो गाय का हो। हम ऐसे किसी देश से मित्रता नहीं करेंगे, जो गोमांस का प्रयोग करता हो। हम ऐसे किसी व्यक्ति से हाथ नहीं मिलाएंगे, जो गोमांस खाता हो। हम ऐसे देश में जाकर अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं समझेंगे, जहां गोमाता कटती हो। हम ऐसे देशों के ऐसे होटलों में तो रुकेंगे ही नहीं, जिनके किचन में गोमांस पकता हो! हम अपने बच्चों को ऐसे देशी-विदेशी संस्थानों में पढ़ने नहीं भेजेंगे, जहां गोमांस का प्रचलन हो!

    मुझे लगता है, ये बेटे हम गोमाताओं के लिए भी वैसा ही दिखावटी प्रेम रखते हैं, जैसा आजकल के बेटे रखते हैं। अपने वेतन से पांच रुपए मां के खाते में जमा नहीं कराते, लेकिन मदर्स डे पर मां की बड़ी-बड़ी तसवीरें लेंगे, सेल्फी खिंचवाएंगे! सच तो ये है कि मुझ गोमाता से प्रेम और सैद्धांधिक आबद्धता रखने वाले लाेग हैं ही नहीं ये। कुछ लोग हम गायों के नाम पर देश का वातावरण तो ख़राब करना चाहते हैं, लेकिन हम गाय के प्रति उनके मन में वैसी सैद्धांतिक दृढ़़ता नहीं है, जो वास्तविक और एक पवित्र गोप्रेमी हृदय में होनी चाहिए। अगर होती तो वे ऊपर लिखी हुई प्रतिज्ञाएं करते। हम गाय को आज कचरे के ढेरों पर भूख से लड़ने और सड़कों पर मरने को निष्ठुर नहीं छोड़ देते। हमारी दुर्दशा को लेकर लोगों का दुहरा आचरण देखकर मन में करुण रुदन हो उठता है। हमारा निवेदन है कि हम गायों को आप जीवन, मरण, इहलोक और परलोक मानना बंद करो। हम गायों का भजन, पूजन, साधन आैर आराधन अब समाप्त करो। बहुत पाखंड हो लिया। अगर कुछ कर सकते हो तो हमारी हालत सुधारने के लिए कुछ करो। और जो हमने कही हैं, वे संकल्प लो। नहीं तो हमारा नाम लेना बंद करो।

    पुनश्च:
    और हॉं सुनो, तुम सब पूत कपूत हो सकते हो, लेकिन हम माता कभी कुमाता नहीं होंगी!!!

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    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

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  • मुलायम काका को अखिलेश भाई जी के संदर्भ में पत्र

    सामाजिक यायावर


    आदरणीय मुलायम काका,
    सादर चरण स्पर्श।

    जो उठापटक व घमासान चल रही है, बयानबाजी चल रही है, भावावेश चल रहा है व त्यागपत्र वाले पत्र, खून से लिखे पत्र आदि लिखे जा रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं भी काका को पत्र लिख लूं, अवसर भी है अपनी बात कहने का। मेरा आपसे या अखिलेश भाई से स्वार्थ वाला कोई रिश्ता भी नहीं है, न ही मुझे चुनाव लड़ना है। मुझे आजतक आपकी पार्टी से या अखिलेश भाई की नेतृत्व वाली सरकार से, किसी प्रकार की कोई सुविधा ही प्राप्त हुई है और न ही मेरी आपसे या अखिलेश भाई से कभी व्यक्तिगत मुलाकात ही हुई है। इसलिए मेरा सोचना है कि मैं निष्पक्ष होकर अपनी बात कह सकता हूं। आशा है कि उदारमना आप मेरी धृष्टता को क्षमा करेंगें।

    आपकी बात :

    mulayam-singh-yadavइसमें कोई संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी सिर्फ और सिर्फ आपकी बनाई व बढ़ाई हुई है। आपने जिस जमाने में संघर्ष शुरू किया था, उस समय के जो हालात थे, आपने जिस तरह से अपनी जगह बनाई, पार्टी खड़ी की, सत्ता तक पहुंचे। आपके उस संघर्ष को समझ पाना, उस राजनैतिक चातुर्य की प्रशंसा कर पाना, आपकी दूरदर्शिता को देख पाने की क्षमता व दृष्टि आज के उन चाटुकार युवाओं में नहीं है जो अखिलेश भैया जिंदाबाद के नारे लगाते हुए अपनी वफादारी साबित करने का प्रयास करते हैं।

    अखिलेश भाई का जयकारा लगाने वाले लोगों में अपवादों को छोड़कर अधिकतर लोग ऐसे हैं, जो अखिलेश भाई की मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को देखते हुए साथ जुड़े, मुख्यमंत्री बनने पर सत्ता की मलाई खाने के लिए साथ जुड़े, जो अब जुड़ रहे हैं या वफादारी दिखा रहे हैं उनको यह लगता है कि अखिलेश भाई आज नहीं तो कल सत्ता में आएंगे।

    इस प्रकार के लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे आपकी सांगठनिक क्षमता को समझ पाएंगें या समर्पित कार्यकर्ताओं का क्या अर्थ होता है यह ही समझ पाएंगें।

    लोग कुछ भी कहें, अखिलेश भाई को भी बुरा लग सकता है लेकिन मैं दो टूक कहना चाहता हूं कि अखिलेश भाई आपके कारण मुख्यमंत्री बने। यदि वे आपकी ही तरह एक सामान्य परिवेश के निकले सामान्य गुमनाम से युवा होते तो इतनी बड़ी पार्टी व मजबूत संगठन खड़ा करना उनके बूते की बात नहीं थी। लेकिन चाटुकार लोगों को इन सब तथ्यों की गहराई को समझने व स्वीकारने से कोई मतलब नहीं होता। उन्हें तो हल्ला गुल्ला करना होता है।

    ये जो युवा आज अखिलेश जी के साथ खड़े दिख रहे हैं उनमें से अधिकतर का किसी विचारधारा, विकास या परिवर्तन से कोई मतलब नहीं, समझ ही नहीं जो कोई मतलब हो पड़ेगा। उनको सिर्फ इससे मतलब है कि आपके रहते आप अपने पुराने समर्पित व जांचे हुए सहयोगियों व कार्यकर्ताओं को ही महत्व देंगें, जिनके दम पर आपने इतनी बड़ी पार्टी खड़ी की और अखिलेश भाई को मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनको तो अपनी संभावनाएं देखनीं हैं, अपने जुगाड़ देखने हैं।

    अखिलेश भाई की बात :

    akhilesh-singh-yadavमैं अखिलेश भाई का अवलोकन उस समय से कर रहा हूं जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश लिया। निःसंदेह उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, परिपक्वता की ओर बढ़े हैं। विनम्र हैं, शालीन हैं, संवेदनशील हैं, दूरदर्शी व इच्छाशक्ति रखते हैं। भारत की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में ऐसे सुलझे हुए लोग बहुत नहीं है। यह आपकी ही रचनात्मकता है जो आपने ऐसा अपवाद नेता भारतीय राजनीति को उपलब्ध कराया।

    अखिलेश भाई करते हुए सीखते हैं, तीव्रता से सीखते हैं, बिना अपने मूल्यों को बदलते हुए सीखते हैं। लोकतंत्र को समझते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास करने की इच्छा नहीं रखते हैं। मेरा मानना है कि उनके ऐसा होने में आपकी परवरिश का योगदान है, इसलिए श्रेय आपको भी जाता है।

    यदि शुरू के दो सालों को छोड़ दें जिनमें आपको प्रधानमंत्री पद के नजदीक जाते देखने के लिए हड़बड़ी में सरकार को चलाना रहा। लोगों ने क्या देखा मैं नहीं जानता लेकिन मुझे स्पष्ट दिख रहा था कि अखिलेश भाई आपको प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। अच्छी सोच रखने के बावजूद लोकसभा चुनाव इतने नजदीक थे कि लोगों को लुभाने की पुरानी शैली को अपनाने के अलावे उनके पास पार्टी द्वारा स्वीकार्य विकल्प नहीं था। मामला अधकचरा रह गया। न पुरानी शैली ही पूरी तरह प्रयोग हो पाई और न ही नई शैली का आगाज हो पाया।

    लोकसभा चुनावों के बाद अखिलेश भाई ने प्रयास करना शुरू किया कि वे अपनी सोच के हिसाब से काम कर पाएं। पहली बार इतनी कम उम्र का कोई युवा मुख्यमंत्री बना था, पहली बार इतना पढ़ा लिखा युवा मुख्यमंत्री बना था, बहुत लोगों को भ्रम भी रहा कि वे कठपुतली मुख्यमंत्री रहेंगें। ये भी कारण रहे कि उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा।

    पार्टी के अंदर, नौकरशाही आदि से सहयोग न मिलने के बावजूद अखिलेश भाई ने तुलनात्मक बेहतर तरीके से सरकार चलाई। अपराध वगैरह तो आकड़ों के मामले होते हैं। अन्यथा कुल मिलाकर अखिलेश भाई ने सरकार अच्छी चलाई। विरोधी भी उनकी आलोचना दावे से नहीं कर पाते हैं। केवल उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अखिलेश भाई की लोकप्रियता बढ़ी है।

    मुझे लगता है कि अखिलेश भाई की यह इच्छा है कि उन्हें बिना अवांछनीय दबाव के अपने हिसाब से काम करने का अवसर मिले। ऐसी इच्छा रखना गलत भी नहीं क्योंकि युवा हैं, ऊर्जावान हैं, दृष्टि रखते हैं तथा काम करके स्वयं की क्षमता को साबित भी किया है।

    भारत में दीर्घकालिक राजनीति अब विचारों की, परिवर्तन की व कार्यशैली की होनी है। अखिलेश भाई की कार्यशैली से यह अनुमान होता है कि वे ऐसी ही दीर्घकालिक राजनीति करने की इच्छा रखते हैं।

    आप दोनों की बात :

    akhilesh-mulayamअखिलेश भाई जो संवेदनशील हैं, विचारशील हैं, वे जरूर ही अंदर से आपके प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापन का भाव रखते होगें। उनके व आपके मध्य जो भी वैचारिक मतभेद है वह पीढ़ी का अंतर ही होगा।

    मेरा आपसे निवेदन है कि आप अपने ऊपर विश्वास रखें। आपने अखिलेश भाई की बेहतरीन परवरिश की है। अखिलेश भाई को पाश्चात्य को भी समझने का अवसर मिला है। यदि वे बेहतर कार्यशैली से राजनीति करना चाहते हैं तो उनको करने दीजिए। इसमें आपका ही बड़प्पन है।

    आज की जो राजनैतिक परिस्थिति है उसमें आप लोगों के आपस में मनभेदों से बहुत बड़ा नुकसान है। संभव है कि अखिलेश भाई उस क्षति से कभी उबर न पाएं। यदि सत्ता उनके हाथ में लंबे समय तक हाथ में न रही तो उनके चाटुकार लोग पाला बदलकर भाग जाएंगें।  आपको भी क्षति है क्योंकि लोकप्रियता अखिलेश भाई के साथ है, उत्तर प्रदेश के लोग उनको पसंद करते हैं, लोग अब पुरानी शैली की ओर नहीं जाना चाहते हैं।

    मेरा निवेदन है कि आप लोग व्यवहारिकता को संज्ञान में रखते हुए, पिता-पुत्र वाले दंभ को दरकिनार करते हुए, चातुर्य व संतुलन के साथ मध्य का मार्ग निकालें। पिता-पुत्र के मध्य का दंभ सुलझाएं नहीं सुलझता है। सुलझता भी है तो सिर्फ पिता द्वारा पुत्र को स्वीकारने से। जीवन परिवर्तन व परिवर्तन को स्वीकारने का नाम है।

    आप चाहें तो मेरे पत्र को बचकाना व अप्रयोगात्मक भी मान सकते हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में अखिलेश भाई से बेहतर राजनेता कोई दीखता नहीं, इसलिए उनका अपव्यय होते देखने की इच्छा नहीं है, जबकि मेरा उत्तर प्रदेश की राजनीति से कोई लेना देना नहीं, मैं तो मतदान भी नहीं करता हूं। इसीलिए आप तक अपनी बात पहुंचाने की धृष्टता कर रहा हूं।

    सादर चरण स्पर्श।
    आपका,
    सामाजिक यायावर

    पुनश्च – एक दो साल पहले मैंने अखिलेश भाई को भी पत्र लिखा था, कई लोगों ने कहा भी कि वे उन तक मेरा पत्र पहुंचा देंगें। पत्र उन तक पहुंचा नहीं पहुंचा, मुझे अनुमान नहीं। लेकिन मैंने पत्र में जो लिखा था, आज वही होते दिख रहा है। 

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  • इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है – 001

    सामाजिक यायावर


    मेरी माता जी की एक चचेरी-ममेरी बहन हैं, माता जी से छोटी हैं सो छोटी बहन हुईं। मेरे गांव में ही उनका ब्याह हुआ। उनके एक लड़का एक लड़की हुई। उनके पति गांव-नाते से मेरे बड़े भाई लगते हैं, पारिवारिक रिश्ते में नहीं आते हैं, सो मौसी वाला रिश्ता ही चलता है। इसलिए उनके पति को मौसा लिखूंगा।

    मौसा किसान हैं। ट्रैक्टर हैं, ट्यूबवेल है, बाग-बगीचे हैं। अच्छी किसानी करते हैं, समृद्ध किसान हैं। बहुत ही सुंदर नक्काशीदार कुआं भी रहा उनके घर में जिसका प्रयोग आस पड़ोस के सभी लोग करते रहे। कुएं में गाय बैलों के पानी पीने के लिए बढ़िया अच्छी नांदें भी बनी रहीं, कुएं से पानी नाली में बहते हुए पास के तालाब में जाता रहा। बारिश के समय के अलावे कीचड़ नहीं रहता रहा। अब जरूरत नहीं रही तो कुआं बंद हो गया।

    मौसी जी शुरू से शौकीन व जागरूक रही हैं। अपने घर की किचेन को शहर जैसी किचेन की तरह बनवाया, वास-वेसिन, बर्तन को सुखाने का टंगना, बर्तन रखने का टंगना, रेफ्रीजरेटर, कूलर, गैस-चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा, खाना रसोई में खड़े होकर बनाया जाता है। चाऊमीन, बर्गर, समोसा, जलेबी, पनीर पकोड़ा, पनीर समोसा मतलब बहुत कुछ बनाना जानतीं हैं और प्रेम से जबरदस्ती बुला कर ठूंस कर खिलाने में इनको आनंद आता है।

    पनीर घर में बनातीं हैं। दूध के लिए घर में कई गायें पाल रखी हैं। मैंने उनके पास हमेशा गायें देखीं। बढ़िया मोटी  खूबसूरत गायें। बिना कीचड़ के पूंछ फटकारती गायें। मन आ गया तो कभी कभार गायों को रंगबिरंगा भी कर देतीं हैं, मतलब परिवार के बच्चों की तरह गायों को पालती हैं। उनका कहना है कि हमारे बच्चों की देखभाल गाय करती है तो हमारा फर्ज है कि हम गायों को अपना परिवार व बच्चा मानें, उनके नखरे खुशी से झेलें।

    मौसी जी का यह कहना रहा है कि जो खाना है बताओ मैं घर में बनाऊंगी, जो बनाना नहीं आता होगा वह बनाना सीखूंगी फिर बनाकर खिलाऊंगी लेकिन बाजार से खरीद कर नहीं खाना है क्योंकि बाजार में खाने में मिलावटी सामान प्रयोग होता है गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। इसी चक्कर में उन्होंने खूब सारी चीजें बनानी सीखीं।

    लड़का व लड़की दोनों इंजीनियर हैं। जब भी छुट्टियों में घर आते हैं तब मौसी जी रोज नाश्ते, लंच व डिनर में आज भी अलग-अलग चीजें बनाती हैं। जब मैं गांव में होता हूं तो सुबेरे सुबेरे पूछने आ जातीं हैं कि मैं नाश्ते में क्या खाऊंगा, धोखे से भी मुंह से कुछ निकल गया कि यह खाऊंगा तो वह चीज बनेगी।

    गांव में रहते हुए भी बच्चों को शहरों जैसी सुविधाएं दीं। बहुत अच्छी वाली तकिया, बहुत अच्छा बिस्तर मुलायम व गुदगुदा गद्दा, धुली व अच्छी चादरें व बेडशीट, मच्छरदानी, सोफा आदि। अच्छी मुलायम रोएंदार तौलियाएं। बच्चों को चलने के लिए उम्र व जरूरत के हिसाब से साइकिल व मोटरसाइकिल दीं।

    मौसी जी की उम्र पचास वर्ष से अधिक होगी। सुबह चार बजे उठती हैं, बड़ा घर है लेकिन खुद ही पूरे घर में झाड़ू लगाना, सफाई करना, गायों की देखभाल करना। फिर नाश्ता बनाना। फिर कपड़े धोना, फिर खाना बनाना, गायों की देखभाल। फिर कुछ देर आराम करतीं हैं, फिर खेत-खलिहान देखने जाती हैं कि काम-काज ठीक चल रहा है या नहीं, वहां से लौटकर फिर गाय व रात का भोजन। रोज साफ सुथरे बिस्तर लगाती हैं।

    शाम को भोजन के पश्चात अपने पति के साथ बैठकर या थकावट होने पर बिस्तर में लेटे हुए टीवी देखतीं हैं, समाचार देखतीं हैं। सो जाती हैं।

    मेरा मानना है कि मौसी जी अच्छा व स्वस्थ जीवन जीतीं आईं हैं। मेहनत किया, पैसा कमाया, पैसा सुविधाओं में खर्च भी किया, पैसा बचाया भी। मेरा अंदाजा है कि वे एक अच्छी कार खरीदने की हैसियत रखतीं है, दिल्ली जैसे शहर में एक अच्छा फ्लैट खरीद सकतीं हैं। क्या मालूम किसी मेट्रो शहर में उनके दो-चार प्लाट पड़े भी हों जिनकी कीमत आज करोड़ों में हो। किसी का बैंक अकाउंट या संपत्तियों की बहुत गहरी जानकारी नहीं रखी जा सकती है। कोई क्यों बताए भला।

    उनका लड़का गांव में रहते हुए भी सुविधाओं में पला बढ़ा। इंजीनियरी की और अब लगभग पचास-साठ हजार महीना की नौकरी करता है। मेट्रो शहरों में पचास-साठ हजार रुपए महीना कोई बड़ी रकम नहीं। छोटे से फ्लैट में रहता होगा। पैसे बचाता होगा, क्या पता मौसी अब भी उसको पैसे देतीं हों। अंदर की बात क्या मालूम। क्या पता जिस मेट्रो शहर में रहता है वहां घर खरीदने में भी आर्थिक मदद करें या किया हो। 

    दरअसल यह लेख इन सब बातों की चर्चा करने के लिए नहीं लिख रहा। यह सब बातें तो मुख्य बात का आमुख हैं सो अब आता हूं लेख की असली बात पर।

    मेरा मानना है कि जितना पैसा मौसी जी ने अपने लड़के मतलब मेरे मौसेरे भाई को इंजीनियरी की डिग्री दिलाने में खर्च किया, जितना रुपया जब वह नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा था उस समय खर्च किया होगा, जितना रुपया उसको मेट्रो शहर में घर खरीदने के लिए सहयोग कर रहीं होगीं। उससे बहुत कम पैसे से कोई व्यापार करवा सकतीं थीं या खेती किसानी को आधुनिक व व्यापाराना तरीके से करवाने की सोच दे सकतीं थीं।

    जिस कृषि ने उनको इतना सक्षम व समृद्ध बनाया कि उन्होंने बेहतर जीवन जिया व बच्चों को सुविधाओं वाली परवरिश दी। उसी कृषि को और बेहतर तरीके से करते हुए इंट्रेप्रिन्योर बनने की सोच अपने बच्चों को क्यों नहीं दे पाईं। पढ़ी लिखी व जागरूक होते हुए भी ऐसी सोच क्यों नहीं रख पाईं।

    लाखों रुपए साल का निवेश सालों तक बिना उफ किए वह भी पचास-साठ हजार रुपल्ली महीना जैसे छोटे आउटपुट के लिए।

    यदि इतना ही रुपया, इतने ही सालों तक बिना उफ किए, बिना लाभ की चिंता किए किसी व्यापार में लगाने की सोच रखतीं तो उनका लड़का आज नौकरी करने की बजाय कई लोगों को अपने यहां नौकरी दे रहा होता। जब उसकी मां उसको गांव में शहर जैसी सुविधा दे सकतीं थीं तो वह दिल्ली जैसे शहर की सुविधाओं को अपने गांव में लाकर खड़ा कर सकता था।

    लेकिन हुआ क्या अच्छी खासी समृद्धि व समृद्धि की संभावनाओं को छोड़कर वह लाखों करोड़ों की भीड़ में एक भूला हुआ बिना पहचान वाला चेहरा बनने चला गया वह भी विकास के नाम पर, प्रगति के नाम पर।

    इसमें गलती मौसी की या उनके लड़के की भी नहीं है। अपने समाज की सोच ऐसी है कि वह नौकरी को महान मानता है, नौकरी देने को महानता नहीं मानता। दूसरा रिस्क लेने की भावना अभी गांवों के लोगों में नहीं आई हैं। नौकरी में लगने वाला निवेश उनको बिना रिस्क का लगता है जबकि व्यापार का निवेश उनको रिस्क का लगता है। सामंतवादी सोच वाली ऐंठन, अहम व लोगों क्या कहेंगे जैसी मानसिकता भी बहुत बड़ा कारण है। व्यापार में विनम्र होना पड़ता है। लेकिन नौकरी करने में भी तो बातों के जूते रोज खाने ही पड़ते हैं।

    मैंने कल अपने गांव के बारे में लिखा। जैसा कि मैं करता हूं, मैंने फेसबुक व व्हाट्सअप जैसी कई सोशल मीडियाओं में उस लेख को भी पोस्ट किया। कई लोगों के अहम को मेरा लेख अनजाने में चोट कर गया। उन्होंने लेख के भाव को समझने की बजाय नुक्ताचीनी करने को प्राथमिकता दी, कुछ ने तो लेख के तथ्यों को ही गलत साबित करने को प्राथमकिता दी।

    हमारी सोच का स्तर यह है कि हमारा अहम स्वीकारने को तैयार नहीं होता, समझने को तैयार नहीं होता, सुनने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि हममें दृष्टि विकसित नहीं हो पाती, हम अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं को देख नहीं पाते।

    ऐसा नहीं है कि मेरा गांव एक आदर्श गांव है, भारत में ऐसे गांव बहुत हैं, सैकड़ों हैं। ऐसा नहीं है कि मेरी चचेरी-ममेरी मौसी ही ऐसी हैं, भारत के गांवों में हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं हैं लेकिन हम उनको देखते नहीं, क्योंकि हमारी हमारी कंडीशनिंग, हमारे पूर्वाग्रह, हमारा अहम, हमको आब्जर्व करने से रोकता है, हमें दृष्टिहीन बनाता है।

    दरअसल इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है, भारत को इस सोच की व दृष्टि की बहुत अधिक जरूरत है। तभी भारत, समाज व भारत के लोग वास्तव में विकसित व जागरूक होगें।

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