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  • मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा

    Shayak Alok

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    उस घर की दीवारों में दरारें थीं तो पिस्त्रा मोरी सूई और मोटे ऊन से उन दरारों को सिलने लगी .. रोज वह घर के जरुरी काम निपटाती .. पति को कलेवा दे काम करने भेजती और फिर दोपहर से शाम एक एक दरार को ढूंढती और उसे सिलने लगती .. दीवारों में नए दरार फिर उभर आते तो वह ऊन और वक़्त का अनुमान करती और फिर उन्हें सिलने में लग जाती .. रात को कभी चौंक के उठती तो दीया जलाती और महीन दरारों की महीन सिलाई शुरू कर देती ..

    उसका पति उसे थका देने वाला प्यार कर रहा होता और वह छत की दरारों को देखती उन्हें सिलने का उपाय सोच रही होती ..

    अलग अलग दरारों में अलग रंग ढंग के ऊन..

    पिस्त्रा मोरी का पति खुश था .. उसे लगता एक एक दरारें मिट रही हैं .. उसे लगता उनके बीच की दूरियां भी मिट रही हैं ..

    आजकल पिस्त्रा से संतुष्ट उसका पति पूछता कि बोलो कितना प्रेम है मुझसे तो तुरंत वह जवाब देती ‘उतना जितना प्रेम है मुझे मेरे दरारों के सिलने के काम से ‘ ..

    वह फिर पूछता और पिस्त्रा फिर दरारों के रूपक में जवाब देती – ‘ इतना प्रेम जितनी गहरी वह नई दरार ‘ ..

    काम से जल्दी लौटे पिस्त्रा के पति ने उस नई दरार की चिर्री से एक रोज देखा पिस्त्रा को उस ऊन वाले सौदागर के साथ ऊन का हिसाब किताब करते .. पिस्त्रा हंसती और नए ऊन का गोला उठाती फिर मोलभाव करती ..

    पति को गुस्सा आया .. पिस्त्रा रोती चिल्लाती रही पर न सुना उसने .. सब दरारें उघाड़ दी और बडबडाता पैर पटकता चला गया ..

    देर रात लौटा पिस्त्रा मोरी का पति तो दरारों भरी दीवारें गिर चुकी थी.. दीवारों के नीचे दबी पिस्त्रा मोरी के शरीर पर दरारें उभर आई थीं.. पिस्त्रा की मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा था..

  • समलैंगिकता – प्राकृतिक या अप्राकृतिक

    सामाजिक यायावर


    मैं जब प्राकृतिक शब्द का प्रयोग करता हूं तो इसका अर्थ प्रकृति की व्यवस्था के सहज नियमों को जानना, समझना व अनुपालन करना है, न कि केवल प्रकृति में होना मात्र। यदि प्राकृतिक होने का अर्थ प्रकृति में होना मात्र है तो फिर पर्यावरण असंतुलन, बलात्कार, शोषण आदि का कोई तात्पर्य नहीं रह जाता है। कुछ भी सब प्राकृतिक है।

    समलैंगिकता को मैं अप्राकृतिक मानता हूं। अप्राकृतिक क्यों मानता हूं क्योंकि प्रकृति में जिन भी स्तनपायी जीव जंतुओं के पास योनि व गुदा अलग-अलग हैं, उनमें गुदा-मैथुन नहीं होता है। दूसरी बात सेक्स प्राकृतिक रूप से संतानोत्पत्ति के लिए है। जीव जंतुओं में रात दिन जब मन हो जाए तब सेक्स नहीं होता है। जब संतानोत्पत्ति के लिए ऋतु आएगी तभी पशुओं में सेक्स होता है। जीवन की गति चलती रहे इसके लिए सेक्स एक व्यवस्था है प्रकृति में।

    समलैंगिकता को अप्राकृतिक मानने के बावजूद, मेरा ऐसा मानना है कि जो लोग समलैंगिकता को जीना चाहते हैं उनको ऐसा जीने का पूरा अधिकार है। उनको समलैंगिकता का प्रचार प्रसार करने, समलैंगिकता को प्रतिष्ठित करने, समलैंगिकता को महानता साबित करने, समलैंगिकता को धर्म के रूप में भी प्रतिष्ठित करने आदि-आदि का संपूर्ण अधिकार है।

    समलैंगिकता के विरोध का मतलब सिर्फ यह है कि स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के साथ सेक्स न करे, जीवन भर सेक्स करते रहने के साथी के रूप में न चुने। दो पुरुष या दो स्त्री साथ में रहें लेकिन आपस में सेक्स न करें तो मामला समलैंगिकता का नहीं होता। मुख्य मामला सेक्स करने के तरीके का है और कुछ नहीं।

    यदि बात सेक्स करने के तरीके पर की जाएगी तो हममें से बहुत ऐसे लोग होगें जो अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी पत्नी के साथ या अपनी प्रेमिका के साथ या वेश्या के साथ या बलात्कार करते समय या पशु के साथ गुदा मैथुन करते होगें। बहुत ऐसी स्त्रियां होगीं जो अपने पति से या प्रेमी से या पशु से या छोटे बच्चों से मुख-मैथुन करती होगीं। यह भी तो समलैंगिकता ही हुई।

    मैं समलैंगिकता को अप्राकृतिक इसलिए मानता हूं क्योंकि मैं गुदा-मैथुन, मुख-मैथुन, हस्त-मैथुन आदि को अप्राकृतिक मानता हूं। लेकिन मैं समलैंगिकता का विरोध नहीं करता क्योंकि मैं यह भी जानता हूं कि हम सभी लोग गर्भ में बीज बनने से लेकर मृत्यु तक पूरा का पूरा जीवन अप्राकृतिक रूप से जीते हैं।

    राष्ट्र की सीमाएं, संविधान, सेना, कानून, परंपराएं, कर्मकांड, धर्म, संस्कार, ईश्वर की कल्पनाएं, मुद्रा, व्यापार, बाजार, संपत्ति-अधिकार आदि-आदि सभी कुछ अप्राकृतिक है। समलैंगिकता की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक कोटि के धूर्तता, नीचता व पाखंड से भरे हुए अप्राकृतिक हैं। जब इन जैसी अप्राकृतिक बातों को हमनें सर-आखों पर प्रतिष्ठित कर रखा है तो समलैंगिकता जैसी व्यक्तिगत-स्वाद पर आधारित इच्छा जो किसी का शोषण नहीं करती, हिंसा नहीं करती, पर सवाल उठाने व विरोध करने का कोई औचित्य नहीं।

    हमने धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कार जैसी निहायत ही अप्राकृतिक चीजों में स्वयं के संपूर्ण अस्तित्व को ही विलीन कर रखा है। हमने अपने स्वाद पर आधारित तौर-तरीके जैसे भोजन, भोजन करने के तौर-तरीकों, कपड़े पहनने के तौर-तरीकों, बोलचाल के तौर-तरीकों, अभिवादन करने के तौर-तरीकों, सम्मान प्रेम आदि को व्यक्त करने के तौर-तरीकों, संपत्ति कब्जाने व उसके बटवारे के तौर-तरीकों आदि-आदि को संस्कृति व सभ्यता आदि के रूप में प्रतिष्ठित कर रखा है।

    चलते – चलते :

    हम पूरा जीवन एक से बढ़कर एक अप्राकृतिक, धूर्तता, हिंसा, बेहूदगी व झूठ से भरे झोल-झपाटों को प्रतिष्ठा के साथ स्वयं को महान व अद्वितीय मानते हुए स्वीकार कर रखते हैं। लेकिन हम इतनी मूलभूत ईमानदारी क्यों नहीं रख पाते कि हम समलैंगिकता जैसी बातों को भी धर्म या संस्कृति या सभ्यता या स्वाद के एक तौर-तरीके के रूप में स्वीकार कर लें, या फिर हम किसी भी झोल-झपाटे को न स्वीकार करें।

     

    जब तक हम कंडीशनिंग से स्वयं को मुक्त करने का ईमानदार प्रयास नहीं शुरू करेंगें हम दोहरे चरित्र/कसौटियों/मापदंडों आदि को ईश्वरीय, महान व अद्वितीय आदि मानने की मूर्खता व भ्रम में जीते रहेंगे।

     

     

  • मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ

    नीलम बसंत नंदिनी


    दुनियां पूरब चलती थी
    तो मैं पश्चिम
    लडकियों को लंबे बाल पंसद थे
    मैंने मान्यताओं पर कैंची चलवायी
    लड़कियां दुपट्टों के कलेक्शन करतीं
    मैं थान से कपड़ा काट
    विद्रोह सिलवाती थी

    मैंने ज़िद की वो सब करने की
    जो लडकियों के लिए हेय था
    पापा हौसला देते रहे
    मैं उडती रही…

    परकटी, गंजी, लडकों जैसी लडकी..
    जैसे संबोधनों को
    स्कूटर के पहिए से कुचल
    आगे बढती रही..

    मैं खराब लड़की थी
    पर मुझे वही होना पसंद था!

    दसवीं में
    मेरी सहपाठिनों ने
    विवाह का पिंजरा चुना..
    मुझे अकेले जाकर
    शहर में किताबों से यारी करनी थी..

    मेरी हमउम्रों को माता पिता की मोहर लगा
    सुंदर-सा खूंटा चाहिए था
    मुझे अपनी ही पंसद के सोलमेट के साथ जीना था..

    मेरी पलकों में था वो अनंत व्योम
    जिसमें जब जी चाहूँ
    पंख फैलाए उड़ सकूं..

    मैं मुक्त थी.. मुक्त हूँ..
    सामाजिक बंधन वाली मोटी सांकल से
    पर…
    अभी और मुक्त होना बाकी है..
    फ्रीडम जैसी सहज
    पर अमूल्य चीज
    सरलता से नहीं मिलती..

    लड़ना पड़ता है
    गालियां खानी पड़ती हैं
    तथाकथित समाज की
    जीभ और दिमाग से..

    और जंग लगी जंजीर खोल
    मुक्त होना पड़ता है
    रिश्तों के मकडजाल से..

    सो कॉल्ड अच्छी बेटी,
    संस्कारी बहू,
    पतिव्रता पत्नि
    मैं बन जाती तो क्या जीवित कहलाती
    खुद से संवाद में हार नहीं नहीं जाती..

    मुझे आया ही नहीं कभी
    उस तरह जीना
    एक ही जीवन मिला है
    अपनी तरह जीने के लिए…

    असंख्य स्वप्न अपूर्ण हैं अभी
    असंख्य ख्वाहिशें बाकी हैं…

    फेफड़ो में भर ढेर सारी
    ऑक्सीजन..
    डुबकी लगानी है
    चाहतों की मछलियों संग तैरना है..

    अपनी ही बाहों का जैकेट ओढ़
    खुद को शाबाशी दे
    पार करना है
    सामने खड़ा एवरेस्ट…

    चोटी पर पहुँच
    गला फाड़ चीखना है..
    अभी मुझे जीना है
    ढ़ेर सारा जीना है….!

     

  • महज इंसान

    भवंर मेघवंशी


    पैदा होना
    तुम्हारी जाति
    धर्म व देश में
    मेरे वश की
    बात ही कहां थी ?

    मेरा चयन
    नहीं था ये
    जानता हूं
    यह सिर्फ
    संयोगवश ही
    हुआ होगा
    फिर इन पर
    गर्व कैसा ?

    जाति की जकड़न
    धर्म की अकड़न
    देश की सिकुड़न
    सुहाती नहीं मुझको.

    स्वदेश
    स्वधर्म
    स्वजाति जैसे
    भारी भरकम शब्द
    लगते है
    बोझ से.

    मैं दिल से
    चाहता हूं कि
    खुद को मुक्त
    कर लूं इनसे.

    कृपया
    आप भी
    काट दे नाम मेरा
    अपनी जाति
    धर्म और देश की
    लिस्ट से.

    मैं रहना
    चाहता हूं
    महज एक
    इंसान बनकर .

     

  • जब मुसलमान हिन्दू हो गए और हिन्दू मुसलमान होते चले गए!

    त्रिभुवन


    प्राचीन भारत में कभी मूर्तिपूजा नहीं होती थी। पूर्व वैदिक काल में लोग मंदिर नहीं बनाते थे। उनके लिए कण-कण में ईश्वर था। मानव-मानव बराबर था। इसका प्रमाण है मनुस्मृति और अन्य ग्रंथ। किसी प्राचीन भारतीय ग्रंथ में मूर्ति का जिक्र तक नहीं है। न चारों वेदों में, न छहों दर्शन में। न उपनिषदों में। किसी स्मृति में भी किसी मूर्ति का उल्लेख नहीं है। प्राचीन भारत के लोग ईश्वर के सर्वव्यापक, निराकार और अमूर्त स्वरूप में विश्वास करते थे। वे इसे दयालु और न्यायकारी भी मानते थे।

    और मुसलमान लोग या कहें कि अरब देशों के वासी, जहां यह धर्म पनपा, मुहम्मद साहब और कुरआन के अार्विभाव होने से पहले हमसे कहीं ज्यादा मूर्तिपूजक थे। उनके यहां बड़े-बड़े मंदिर और विशालकाय मूर्तियां थीं। प्रतिमा पूजन के कारण वे बहुदेववादी हो गए थे और आपस में बुरी तरह लड़ते थे। कत्लोगारत मची रहती थी। शांति और बंधुता उनके लिए जैसे स्वप्न था।

    अगर ऋषि इब्राहिम पैदा नहीं हुए होते और उन्होने प्रतिमा पूजन के ख़िलाफ़ अलख नहीं जगाई होती तो अरब देशों में ऐसे ताकतवर लोग पैदा नहीं होते, जिन्होंने शांति और बंधुता के लिए संघर्ष किया। इब्राहीम ने ही दुनिया में पहली मस्ज़िद स्थापित की, जो मक्का में थी। ऋषि मुहम्मद ने उनके काम को अंतिम रूप दिया और एक नया धर्म इस पृथिवी पर पनपा, जिसमें मूर्तिपूजा अपराध घोषित की गई। ऋषि मुहम्मद ने मदीना की मस्ज़िद स्थापित की। आप अगर ऋषि इब्राहीम का जीवन पढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा, मानो आप भक्त प्रह्लाद, भगवान् क़ृष्ण और स्वामी दयानंद के जीवन का कोई पार्ट पढ़ रहे हैं।

    लेकिन कालांतर में समय ने ऐसी करवट ली कि मुसलमानों के अरब में तो हमारा निराकार, दयालु और सर्वशक्तिमान ईश्वरीय और मानव-मानव बंधु का दर्शन पहुंच गया और मुसलमानों के अरब की बुतपरस्ती हमारे यहां आ बैठी। अब यह भी समय का फेर है कि इस्लाम, जिसका अर्थ है शांति है, हिंसा और अशांति का पर्याय बना दिया गया है और सनातन धर्म, जो बिलकुल वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाला था, इस्लाम के उत्कर्ष के कारण वहां से भाग कर भारत में आए रूढ़वादियों, अंधविश्वासपरस्तों और पोंगापंथियों के कारण प्रतिगामिता की राह पर चल पड़ा, जहां ऊंचनीच, जातिगोत्र और न जाने क्या-क्या नहीं पनपाया गया।

    आप पूछेंगे : क्यों? ऐसा क्यों हुआ और क्या ऐसा हो सकता है कि अरब से कोई चीज़ यहां आए और हम उसे मान लें? यह तो असंभव बात है!

    लेकिन यह सच है। हैरान कर देने वाला सच। भारत सदा से ही पराए और पश्चिमी देशों की चीज़ों के प्रति सम्मोहन का शिकार रहा है। पश्चिम-परस्त भारतीयों ने पहले अपने सनातन धर्म का नाम छोड़ा और पर्शियाई लोगाें के दिए विदेशी और घृणासूचक नाम हिन्दू तक को अपनाया। इसके बाद अंग़रेज़ आए तो इंडियन हो गए और देश का नाम बदलकर इंडिया कर लिया। यही नहीं, आज भी हम न्यू ईयर मनाते हैं। बर्थ डे पर केक काटते हैं!

    आज भी हमारे प्रधानमंत्री किसी भारतीय पत्रकार को इंटरव्यू देने में आनाकानी करते हैं और विदेशी बबलू टाइप स्ट्रिंगर को बुलाकर साक्षात्कार करते हैं। फिर भले वे पंडित नेहरू हों या अब के अपने प्रिय मोदी।

    टाइम पत्रिका किसी को पर्सन ऑव द ईयर घोषित करने का संकेत देती है तो हमारे लोग कलाबाजियां खाने लगते हैं और अगर हमारे यहां की कोई पत्रिका या अखबार क्रिटिसाइज कर दे तो हमारे सत्तापुरुष तमतमाने लगते हैं।

    धोती-कुर्ता भले कहीं टंगा रहे, लेकिन विदेशी हैट लगाकर मैं आज भी विदेशी संस्कृति पर प्राण निछावर करता हूं। क्या आपने कभी मुझे धोती-कुर्ते में देखा? नहीं न!

    और अंत में : मेरा विचार वह नहीं है, जो अभी यहां प्रस्तुत है। मेरा विचार होगा, जो आप सबकी प्रतिक्रियाओं और तर्कों के बाद बनेगा। हमें इतना विवेकी और विनम्र होना चाहिए कि हम एक-दूसरे के तर्कों को ससम्मान आत्मसात कर सकें।


    credits : Tribhuvan's facebook wall

  • राष्ट्र गान देशभक्ती की चेतना अवश्य जगाएगा

    डॉ नीलम महेंद्र


    ” एक बालक को देशभक्त नागरिक बनाना आसान है बनिस्बत एक वयस्क के क्योंकि हमारे बचपन के संस्कार ही भविष्य में हमारा व्यक्तित्व बनते हैं।”

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सिनेमा हॉल में हर शो से पहले राष्ट्र गान बजाना अनिवार्य होगा। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और चूँकि हम लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है तो हम हर मुद्दे पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और किसी भी फैसले अथवा वक्तव्य को विवाद बना देते हैं, यही हमारे समाज की विशेषता बन गई है।

    किसी सभ्य समाज को अगर यह महसूस होने लगे कि उसके देश का राष्ट्र गान उस पर थोपा जा रहा है और इसके विरोध में स्वर उठने लगें तो यह उस देश के भविष्य के लिए वाकई चिंताजनक विषय है। “राष्ट्र गान” देश प्रेम से परिपूर्ण एक ऐसी संगीत रचना जो उस देश के इतिहास सभ्यता संस्कृति एवं उसके पूर्वजों के संघर्ष की कहानी अपने नागरिकों को याद दिलाती है। “राष्ट्र गान ” जिसे हम सभी ने बचपन से एक साथ मिलकर गाया है, स्कूल में हर रोज़ और 26 जनवरी 15 अगस्त को हर साल। इसके एक एक शब्द के उच्चारण में हम सभी ने एक गर्व, एक अभिमान इस देश पर अपने अधिकार एवं उसके प्रति अपने कर्तव्य, ऐसे अनेकों मिश्रित भावों से युक्त एक स्फूर्ति की लहर अपने भीतर से उठती हुई सी महसूस की है।

    हमारा राष्ट्र गान ‘जन गण मन ‘ जो मूलतः गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में लिखा था, भारत सरकार ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्र गान के रूप में अंगीकृत किया था। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर विश्व के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनकी रचना को एक से अधिक देशों में राष्ट्र गान का दर्जा प्राप्त है। बांग्लादेश का राष्ट्र गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उन्हीं की रचना है।

    विश्व के हर देश का अपना राष्ट्र गान है और उसके सम्मान से जुड़े कानून। जैसे यूनाइटेड स्टेट्स में जब भी राष्ट्र गान बजता है, सभी को सावधान की मुद्रा में अपना दांयाँ हाथ अपने सीने (दिल ) पर रखकर अपने राष्ट्रीय ध्वज की ओर मुख करके खड़ा रहना होता है और अगर राष्ट्रीय ध्वज मौजूद न हो तो राष्ट्र गान के स्रोत की ओर मुख करके खड़ा होना आवश्यक है। थाइलैंड में हर रोज राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रात: 8 बजे और संध्या 6 बजे उनके राष्ट्र गान का प्रसारण होता है तथा स्कूलों में रोज बच्चे सुबह 8 बजे अपने राष्ट्रीय ध्वज के सामने राष्ट्र गान गाते हैं। इतना ही नहीं सरकारी कार्यालयों एवं सिनेमाघरों में भी इसे नियमित रूप से बजाया जाता है।

    रशिया में भी अपने राष्ट्र गान का अनादर करने पर आर्थिक दंड के साथ साथ जेल में डाल देने का प्रावधान है। अफ्रीका के एक देश ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ काँगो’ का राष्ट्र गान अपने नागरिकों से पूछता है “एंड इफ वी हैव टू डाई , डज़ इट रीयली मैटर?” अर्थात् अगर हमें अपनी जान भी देनी पड़े तो भी क्या फर्क पड़ता है?

    यहाँ पर इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए नहीं किया गया है कि चूँकि अन्य देशों में ऐसा होता है तो हमारे देश में भी होना चाहिए और ऐसा भी नहीं है कि अगर अन्य देशों में ऐसा कुछ नहीं है तो फिर हमारे देश में क्यों?

    दरअसल इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए कि हम इस भावना के मूल को समझें कि जितना यह सत्य है कि दुनिया के हर देश के नागरिक अपने देश से प्रेम करते हैं और उनके ह्रदय में अपने देश के लिए अभूतपूर्व सम्मान की भावना होती है उतना ही बड़ा एक सत्य यह भी है कि जिस देश के नागरिक अपने देश से प्रेम एवं उसका सम्मान नहीं करते वह देश गुलामी की राह पर अग्रसर होने लगता है। हम सभी अपने माता पिता से प्रेम करते हैं उनका सम्मान करते हैं। हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि अपने दिन की शुरुआत हम अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेकर करें और उनका स्मरण उनका आशीर्वाद लेने का कोई दिन अथवा समय निश्चित नहीं है हम जब भी चाहें ले सकते हैं किसी विशेष दिन का इंतजार नहीं करते कि अपने जन्मदिन पर ही लेंगे या फिर नए साल पर ही लेंगे तो फिर यह देश जो हम सबकी शान है हमारा पालनहार है उसके आदर उसके सम्मान के दिन सीमित क्यों हों उसके लिए केवल कुछ विशेष दिन ही निश्चित क्यों हों?

    एक तथ्य यह भी है कि आज के इस दौर में कोई भी व्यक्ति फिल्म देखने सप्ताह अथवा महीने में एक बार या अधिक से अधिक दो बार ही जाता होगा रोज रोज दिन में तीनों चारों शो तो शायद ही कोई देखता हो तो सप्ताह अथवा महीने में एक या दो बार भी हमें अपने राष्ट्र गान को सम्मान देने में कठिनाई हो रही है, यह एक विचारणीय विषय है।

    कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि जब हम फिल्म देखने जाते हैं तो हम मनोरंजन के लिए जाते हैं तो ऐसे में राष्ट्र गान और मनोरंजन दोनों मानसिक स्थितियाँ मेल नहीं खातीं तो एक उदाहरण का उल्लेख यहाँ उचित होगा।

    स्कूल के दिनों में बच्चे फ्री पीरियड या फिर गेम्स पीरीयड के लिए लालायित रहते हैं और इन पीरियड में वे निश्चिंत होकर खेलते हैं लेकिन अगर उस समय उनके सामने प्राचार्य या अध्यापक कोई भी आ जाता है तो वे अपना खेल रोककर उनका अभिवादन करना नहीं भूलते। वे यह नहीं कहते कि अभी तो हम खेल रहे हैं हम अपने मनोरंजन में बाधा नहीं डाल सकते इसलिए आपका अभिवादन बाद में करेंगे आखिर स्वतंत्रता और स्वछन्दता में एक महीन सा अन्तर होता है । वही पतंग आकाश में ऊँची उड़ान भर पाती है जो अपनी डोर से बंधी हो इसलिए नियमों के बन्धन ऊँची उड़ान के लिए आवश्यक होते हैं। आप मनोरंजन के लिए लाँग ड्राइव पर जा रहे हैं तो गाड़ी की स्पीड रोमांच और मनोरंजन दोनों देती है लेकिन आपकी कुशलता के लिए आपका अपनी गाड़ी की गति पर नियंत्रण आवश्यक है । अगर आपकी गाड़ी कहे कि इस समय तो मैं ऊँची उड़ान और तेज रफतार की मानसिक स्थिति में हूँ मैं ब्रेक नहीं लगने दूंगी तो आप अंदाज लगा सकते हैं आपकी क्या दशा होगी। तो आप मनोरंजन के लिए जाएं लेकिन फिल्म से पहले राष्ट्र गान के रूप में अपने राष्ट्र के गौरव को याद करने एवं उसके प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने से आपके मनोरंजन में कोई कमी नहीं आएगी अपितु एक राष्ट्र प्रेम की चेतना अवश्य आ जाएगी।

    यहाँ कुछ व्यवहारिक परेशानी विकलांगों के साथ अवश्य हो सकती है तो सरकार एवं सिनेमाघर यह सुनिश्चित करें कि विकलांगों के बैठने की व्यवस्था अलग से की जाए ताकि राष्ट्र गान के समय न तो इन्हें असुविधा हो और न ही इनके खड़े न होने की स्थिति में वहाँ के वातावरण में अराजकता अथवा असंतोष की कोई अप्रिय स्थिति निर्मित हो।

    यहाँ पर यह जानकारी रोचक होगी कि चीन से युद्ध के बाद भारत के सिनेमाघरों में फिल्म खत्म होने के बाद राष्ट्र गान बजाने की परंपरा थी लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद लोगों के बाहर निकलने की जल्दी में राष्ट्र गान का अनादर होने की स्थिति में इस परम्परा को कालांतर में बन्द कर दिया गया था हालांकि एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के मनोरंजन कर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सिनेमाघरों को सरकार की ओर से कभी भी यह आदेश नहीं दिया गया कि राष्ट्र गान बन्द कर दिया जाए।

    तो 30 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देश निश्चित ही सराहनीय हैं न सिर्फ देश के वर्तमान के लिए बल्कि उसके भविष्य के लिए भी लेकिन हर बात को विवाद बना देना न तो देश के वर्तमान के लिए अच्छा है न भविष्य के लिए।

  • मेरी संसद में

    संजीबा


    मेरी संसद में बैठे हैं –
    काठ की
    कुर्सियों पर
    काठ के उल्लू ,
    वे जब लौटेंगे दिल्ली से
    तो झूठ पर
    नये सपनों/ नारों
    वादों का मुल्लमा चढ़ाके
    हाय ! री कमबख्त सरकार
    तेरे विश्वास पर
    मर गया
    इंतजारी में
    अपनी ही देहरी पर
    हाड़ का उल्लू ,
    सचमुच हम कब तक
    मरेंगे – जियेंगे
    इस हुकूमत की इस
    व्यवस्था में
    अफ़सोस
    मैं उनसे लड़-के क्यों नही
    मरता –
    उफ़ !!
    मैं भी इस बात का उल्लू……..

    .

  • यह सब एक दिन में नहीं हुआ

    हयात सिंह


    यह सब एक दिन में नहीं हुआ
    अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त
    गवाह बने और मिट गए
    नाटक का पर्दा उठने और गिरने में
    समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का
    मगर मंचन घंटों चलता है
    मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक
    कई बार बरसों लग जाते हैं
    एक आम दर्शक पर्दा उठने और गिरने के सिवा
    कहाँ कुछ सहेज पाता है स्मृति में
    बस, आम की इसी कमजोरी का फ़ायदा
    उठाता है, निर्देशक
    समय के सापेक्ष
    कभी साप्ताहिक, कभी मासिक अंतराल में
    जरुरत पड़ने पर शहर और पात्र बदलकर
    एक ही नाटक के मंचन से
    अर्जित कर लेता है कहीं अधिक
    हर एक दशक के बाद बदल जाता है
    नाटक लिखने वाला
    मंचन करने वाला
    पर्दा उठाने वाला, गिराने वाला
    यहाँ तक कि बदल जाता है निर्देशक
    मगर, निर्देशन युगों-युगों से
    जैसे का तैसा ही, चलता आ रहा है
    प्रकृति प्रद्दत सभी रंग और ध्वनियों से अनभिज्ञ
    आम, एक बार पुनः ठगा जाता है
    कला के बहाने
    संगीत के बहाने
    इसीलिए, इस सबके पूर्णरूपेण
    समाप्त होने की आशा और उम्मीद,बहुत
    बड़ी बेईमानी है
    जीवन की एक अदद जरुरत है मनोरंजन
    हाँ, मनोरंजन में कटौती की जा सकती है
    कब, कैसे और कितने का निर्धारण
    स्वयं करना होगा
    और स्वयं निर्धारण करने योग्य विवेक के लिए
    जरुरी है एक और नाटक
    एक और मंचन
    एक और शहर
    एक और नायक
    एक और नायिका
    एक और खलनायक
    एक और पर्दा
    इन सब में एक से अधिक अगर कुछ चाहिए, तो
    वह है आम दर्शक
    जिसकी हाल-फिलहाल कोई कमी नहीं
    यह बात निर्देशक के अलावा
    नाटक के पात्रों को भी पड़ गयी है मालूम
    इसीलिए, सबके सब निर्देशक बनकर
    नए-नए पात्रों के साथ
    नए-नए तरीके से नए-नए नाटक रच रहे हैं
    भीड़ कभी इधर, कभी उधर

    इस भीड़ को आदत पड़ गयी है नाटकों की
    हाँ, किरदार निभाने वाला
    हर बार नए होना चाहिए
    नया किरदार एक दिन में नहीं पैदा हो जाता
    बल्कि इसके लिए
    सैकड़ों- हजारों साँझ
    अपना यौवन लुटा समय से पहले रात बन जाती हैं।

    .

  • डंडा-झंडा

    आलोक नंदन


    हाथ में होना चाहिए
    डंडा-झंडा
    और जुबां पर नारा
    फिर कियादत की
    कतारों में हो गये शामिल।

    भ्रम पैदा करके
    यदि दूर तक चल सकते हैं।
    और फिर अपने औलादों को भी
    उसी राह पर ढाल कर
    आगे निकल बढ़ना ही
    आपकी बेहतर सेवा
    में शुमार होती है।


    जम्हूरियत के गहवारों में
    पुश्त-दर-पुश्त
    पैबैंद हो जाते हैं।
    बस शर्त एक है
    हाथ से झंडा-डंडा
    नहीं छूटना चाहिए।


    जम्हूरियत पताकों पर चलती है
    जिसका पताका जितना ऊंचा
    उसके हिस्से में जम्हूरियत
    का उतना ही बड़ा हिस्सा।

    .

  • समकालीन वैश्विक संकट के पीछे धर्म है या राजनीति?

    प्रो० राम पुनियानी


    वैश्विक स्तर पर ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द बहुप्रचलित हो गया है और इस्लाम के आंतरिक ‘संकट’ की कई तरह से विवेचना की जा रही है। कुछ लोगों की राय है कि इस्लाम एक बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है और इस संकट से निपटने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि इसके पूर्व इस्लाम एक बहुत बड़े संकट से उबर चुका है। वह था क्रूसेड्स। वह एक बाहरी संकट था। इस्लाम का वर्तमान संकट उसका आंतरिक संकट है,जिसमें मुसलमान एक-दूसरे को ही मार रहे हैं। यहां तक कि एक ही पंथ के मुसलमान भी अपने साथियों का खून बहा रहे हैं। यह संकट पिछले कुछ दशकों में इस्लाम पर हावी हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमान, स्वयं इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हैं और इस्लाम अब अपने ही अनुयायियों को निगल रहा है। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में ‘अच्छा मुसलमान, बुरा मुसलमान’ शब्द ईजाद कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस्लाम पर अतिवादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है। सुन्नी इस्लाम अतिवादी हो गया है और शिया इस्लाम का खोमैनीकरण हो गया है। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस्लाम में अंदर से सुधार लाए जाने की ज़रूरत है।

     

    यह तर्क मध्यमार्गी मुसलमानों की व्यथा को प्रदर्शित करता है, जो अलकायदा से शुरू होकर आईएस और उसके कई अवतारों में फैल गया है। सच यह है कि यह विवेचना उथली है। ज़रूरत इस बात पर विचार करने की है कि इस्लाम से आतंकवाद के जुड़ाव की यह प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों में ही क्यों शुरू हुई। यह मानना अनुचित होगा कि केवल इस्लाम के मानने वाले ही हिंसा करते हैं। साध्वी प्रज्ञा और गोडसे जैसे हिन्दू, असिन विराथू जैसे बौद्ध और एण्डर्स बर्लिन ब्रेविक जैसे ईसाई भी आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि आतंकवाद से जुड़े अधिकांश व्यक्ति मुसलमान हैं परंतु हमें यह समझना होगा कि कबजब राजनीति भी धर्म का भेस धर लेती है। और यह बात सभी धर्मों के बारे में सही है।

     

    वर्तमान समय की बात करने से पहले हमें धर्मों की नैतिकता और उनके आदर्शों और धर्म के पहचान से जुड़े पहलुओं के बीच अंतर करना होगा। पहचान से जुड़े पहलुओं का सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह, समाज पर अपना दबदबा कायम करने के लिए करते हैं। अधिकांश धर्मों के पुरोहित वर्ग ने सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूहों के साथ मिलकर सामाजिक ऊँचनीच को धार्मिक पवित्रता का चोला पहनाया। चर्च और मौलाना दोनों सामंती व्यवस्था के समर्थक रहे हैं और ब्राह्मणों ने जाति और लिंग पर आधारित पदक्रम को समाज पर लादा। यह सब समाज के श्रेष्ठी वर्ग द्वारा अपना राज कायम करने की कवायद का हिस्सा था।

     

    हमें यह भी समझना होगा कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजाओं ने जिहाद, क्रूसेड्स और धर्मयुद्ध जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों को विस्तार देने के लिए किया। धर्म तो मात्र एक बहाना था, असल में वे सत्ता के भूखे थे। सभी धर्मों के राजाओं के लक्ष्य एक से थे। उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना नहीं वरन धर्म के नाम पर अपनी सत्ता को मज़बूती और अपने साम्राज्य को विस्तार देना था। ऐसे में हम केवल जिहाद की बात कैसे कर सकते हैं?हम अन्य धर्मों के शासकों द्वारा धर्म के दुरूपयोग को कैसे भुला सकते हैं?

     

    जहां तक भारत का संबंध है, 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप अस्त होते ज़मींदारों और सामंतों के वर्ग ने अपनी उच्च सामाजिक स्थिति को बनाए रखने और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को संरक्षित रखने के लिए धर्म की भाषा बोलनी शुरू कर दी। उदित होते राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध करने के लिए इस्लाम के नाम पर राजनीति करने के लिए मुस्लिम लीग जैसी संस्थाएं बनीं तो हिन्दू धर्म के नाम पर सत्ता का खेल खेलने के लिए हिन्दू महासभा और आरएसएस का गठन हुआ। एक ओर थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गांधी जैसे लोग, जो भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार थे तो दूसरी ओर थे जिन्ना, सावरकर, गोलवलकर और गोडसे जैसे व्यक्ति जो धार्मिक राष्ट्रवाद के हामी थे। गोडसे ने अपने समय के महानतम हिन्दू की हत्या की और उसके अनुसार ऐसा उसने ‘हिन्दू समाज’ की खातिर किया। बौद्ध धर्म के भेस में ऐसा ही राष्ट्रवाद म्यांमार और श्रीलंका में भी फलफूल रहा है।

    पिछले कुछ दशकों में अमरीका, अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम का खलनायकीकरण करता आ रहा है। अमरीका का असली उद्देश्य कच्चे तेल के कुंओं पर कब्ज़ा करना है। अपनी इसी लिप्सा के चलते अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी संस्करण को प्रोत्साहन दिया। यह सर्वज्ञात है कि अमरीका ने पाकिस्तान के मदरसों में युवकों को इस्लाम के कट्टरवादी सऊदी संस्करण में प्रशिक्षित किया और उन्हें करोड़ों डॉलर और सैंकड़ों टन हथियार मुहैय्या करवाए। अमरीका तब इन युवकों के ज़रिए अफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करना चाहता था। बाद में ये लोग अमरीका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। इसके पहले अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडिक सरकार को अपदस्थ किया था। इसके नतीजे में अंततः अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए और इस्लामिक कट्टरता का बोलबाला बढ़ा। खोमैनी के सत्तासीन होने के बाद पश्चिमी मीडिया ने यह कहा था कि अब इस्लाम, दुनिया के लिए एक ‘नया खतरा’ बन गया है और 9/11 के आतंकी हमले के बाद, इसी मीडिया ने ‘इस्लामिक आंतकवाद’ शब्द गढ़ा।

     

    ऐसा बताया जा रहा है मानो आतंकवाद के कैंसर का कारण इस्लाम है। परंतु गहराई से देखने पर हमें यह समझ आएगा कि हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। कुछ प्रेम का प्रचार करती हैं तो कुछ नफरत फैलाती हैं। कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे लोग गरीबों के साथ खड़े हुए और उन्होंने सत्ताधारी पुरोहित वर्ग का विरोध किया। पुरोहित वर्ग, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करता आया है। गांधी भी हिन्दू थे और गोडसे भी। किसी धर्म की कौनसी धारा मज़बूत होती है और कौनसी कमज़ोर, यह अक्सर तत्कालीन राजनैतिक शक्तियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

     

    यह सचमुच चिंता की बात है कि इस्लाम कई तरह की आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है परंतु यदि इस्लाम के अतिवादी पंथ शक्तिशाली बन गए हैं तो इसका कारण धर्म है या राजनीति। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के लिए हिन्दू धर्म समावेशी था तो गोडसे जैसों के लिए वह अन्यों से घृणा करना सिखाने वाला था। अतः, ज़रूरत इस बात की है कि हम धर्म का लबादा ओढ़े उस राजनीति को पहचानें, जो अतिवाद को बढ़ावा दे रही है और इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने नहीं आने दे रही है। हमारे समय में भी मौलाना वहीदउद्दीन और असगर अली इंजीनियर जैसी शख्सियतें हुईं जिन्होंने इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने रखा। परंतु सत्ता के समीकरणों के चलते, वे हाशिए पर पटक दिए गए और आईएस जैसी संस्थाएं केन्द्र में आ गईं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि जो शक्तियां अतिवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं वे दरअसल तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति में संलग्न हैं। धर्म का आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)