सामाजिक यायावर
गुजरात से अपना मांग पत्र लेकर दो गाएं दिल्ली स्थित 7-लोककल्याण मार्ग (उर्फ़ सेवन रेस कोर्स रोड) के लिए निकली थीं। उदयपुर आते-आते वे थककर चूर हो गईं और भूख से बिलबिला उठीं। कई जगह तलाशने के बाद जब खाना नहीं मिला तो वे एक कंटेनर में मुंह मारने लगीं और अपने सिर फंसा बैठीं। हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित राव ने जब फोटो खींचने की कोशिश की तो एक गाय ने धीरे से अपने गले में बंधा एक लिफ़ाफ़ा भरी आंखों से थमा दिया। इस लिफ़ाफ़े को खोला तो इसमें एक विनय- पत्रिका निकली, जो इस प्रकार है :-
धेनु मां का आप सबको आशीर्वाद। हम भारत के हृदय का मर्मस्थल हैं। हमारा महत्त्व तो आप नहीं जानते। हमारा महत्त्व जानना हो तो आप उन नीरद सी. चौधरी की “दॅ कॉण्टीनेंट ऑव सरसी” पढ़ो; जिन नीरद चौधरी को आप सब सदैव गाली ही देते हैं, लेकिन उन्हें कुछ पढ़ो तो आपको हमारा भी पता चले। नीरद लिखते हैं : गाय आर्यों के साथ भारत आई। आर्यों का सौंदर्यबोध बहुत विकसित था और वे गायों और सांडों की सुंदरता से बहुत प्रभावित थे। दरअसल एक हृष्टपुष्ट सुंदर गाय या सांड से अधिक सुंदर प्राणी इस दुनिया में है भी नहीं। उसका चिकना सफेद रंग, तीखे नाक-नक्श, विवेकमयी भाव-भंगिमा और उसकी रंभाहट उसे एक विचित्र सतयुगी और सतोगुणी सात्विकता वाली आभा प्रदान करती है।
हम गाय ही एक ऐसा प्राणी है, जिसकी प्रशस्ति वेदों आैर उपनिषदों में बिखरी पड़ी है। यह एक प्राणी ऐसा है, जो पशुत्व से ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। प्रकृति के जीवों की यही एक कृति ऐसी है, जो आज तक भारतीय उप महाद्वीप में मानव जीवन को मां के बाद सबसे अधिक दुग्धपान करवाकर जीवनीशक्ति देती आई है। गाय ने ही हमारे खेतों में अपने बेटों को किसान बेटों के साथ लगाकर शस्य-श्यामल धरती में बदला। लेकिन अनादिकाल से गायों की आंखों में एक करुणा छलछलाती दिखाई देती है, जो साफ़ कहती है कि कभी उसके बेटों को जुए में जोत कर आहत किया गया तो आज वह एक पल कसाई के हाथ से छूटती है तो अगले ही पल कसाई से भी अधिक क्रूर भूख से जूझने को छोड़ दी जाती है।
हम यह विनय पत्रिका लिख रही हैं कि क्या हमारे हित में गोभक्तों की यह सरकार और गोभक्तों का यह अपार संगठन हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संघ परिवार के भारतीय जनता पार्टी सहित सभी अानुषांगिक संगठन हम गाय के लिए कुछ करने को तैयार हैं? क्या ये सभी संगठन अपने-अपने संविधान में नहीं बना सकते कि इनके किसी भी संगठन के सदस्य होने के लिए गाय का पालन ज़रूरी होगा। वह घर में नहीं पाल सकता तो उसके लिए किसी गोशाला में उस गाय के पालन लायक पैसा देगा।
विधानसभा का टिकट सिर्फ़ उसी व्यक्ति को मिलेगा, जो कम से कम 100 गायों को नियमित रूप से पाल रहा होगा। लोकसभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो कम से कम 250 गायों के पालन लायक गोशाला का संचालन करवा रहा होगा। राज्य सभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो 500 गायों की क्षमता वाली गोशाला का बेहतर प्रबंधन अपने स्तर पर करवा रहा होगा। और राज्य सरकार में वही व्यक्ति मंत्री बनेगा, जो 1000 गायों और केंद्र में वह जो 2500 गायों से ज्यादा की क्षमता वाली गोशालाओं का शानदार संचालन करवा रहे होंगे।
भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था प्रकट करने आैर गोमाता की सेवा करने का इससे इतर और क्या श्रेष्ठ उपाय हो सकता है? यह क़दम उठाना इन सब लोगों की नैतिक जवाबदेही भी है, क्योंकि ये लोग जिस गोमाता के नाम पर वोट मांग रहे और देशवासियों की सहानुभूति बटोरकर चुनाव में जीत दर्ज कर रहे हैं, उसके लिए गोमाता की प्रति इनको अपना उत्तरदायित्व निभाना जरूरी है। आख़िर अगर आप अपनी निष्ठाओं को रचनात्मक रूप तो देना ही चाहिए।
ये लोग यह प्रतिज्ञा ख़ुद भी करें और आप जैसे लोगों से भी करवाएं कि आप केवल गाय का घी खाएंगे। गाय का ही दूध पिएंगे। दही या पनीर वही लेंगे, जो गाय के दूध से बना हो। मिठाई वही खरीदेंगे, जो गोघृत से बनी हो। हम सिर्फ़ उसी होटल में रुकेंगे, जो गाय के दूध को ही इस्तेमाल करता हो। हम सिर्फ़ उसी विमान में सवारी करेंगे, जो गाय के दूध का प्रयोग करता हो। हम सिर्फ़ उसी को वोट देंगे, जिसके घर गायें बंधी हों।
यह भी संकल्प लें कि हम ऐसे चमड़े से बनी किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करेंगे, जो गाय का हो। हम ऐसे किसी देश से मित्रता नहीं करेंगे, जो गोमांस का प्रयोग करता हो। हम ऐसे किसी व्यक्ति से हाथ नहीं मिलाएंगे, जो गोमांस खाता हो। हम ऐसे देश में जाकर अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं समझेंगे, जहां गोमाता कटती हो। हम ऐसे देशों के ऐसे होटलों में तो रुकेंगे ही नहीं, जिनके किचन में गोमांस पकता हो! हम अपने बच्चों को ऐसे देशी-विदेशी संस्थानों में पढ़ने नहीं भेजेंगे, जहां गोमांस का प्रचलन हो!
मुझे लगता है, ये बेटे हम गोमाताओं के लिए भी वैसा ही दिखावटी प्रेम रखते हैं, जैसा आजकल के बेटे रखते हैं। अपने वेतन से पांच रुपए मां के खाते में जमा नहीं कराते, लेकिन मदर्स डे पर मां की बड़ी-बड़ी तसवीरें लेंगे, सेल्फी खिंचवाएंगे! सच तो ये है कि मुझ गोमाता से प्रेम और सैद्धांधिक आबद्धता रखने वाले लाेग हैं ही नहीं ये। कुछ लोग हम गायों के नाम पर देश का वातावरण तो ख़राब करना चाहते हैं, लेकिन हम गाय के प्रति उनके मन में वैसी सैद्धांतिक दृढ़़ता नहीं है, जो वास्तविक और एक पवित्र गोप्रेमी हृदय में होनी चाहिए। अगर होती तो वे ऊपर लिखी हुई प्रतिज्ञाएं करते। हम गाय को आज कचरे के ढेरों पर भूख से लड़ने और सड़कों पर मरने को निष्ठुर नहीं छोड़ देते। हमारी दुर्दशा को लेकर लोगों का दुहरा आचरण देखकर मन में करुण रुदन हो उठता है। हमारा निवेदन है कि हम गायों को आप जीवन, मरण, इहलोक और परलोक मानना बंद करो। हम गायों का भजन, पूजन, साधन आैर आराधन अब समाप्त करो। बहुत पाखंड हो लिया। अगर कुछ कर सकते हो तो हमारी हालत सुधारने के लिए कुछ करो। और जो हमने कही हैं, वे संकल्प लो। नहीं तो हमारा नाम लेना बंद करो।
पुनश्च:
और हॉं सुनो, तुम सब पूत कपूत हो सकते हो, लेकिन हम माता कभी कुमाता नहीं होंगी!!!
_
त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार
.
Leave a Reply