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  • अबुझमाड़ में इतिहास रचती टामन सिंह सोनवानी IAS, की प्रशासनिक टोली

    अबुझमाड़ में इतिहास रचती टामन सिंह सोनवानी IAS, की प्रशासनिक टोली

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मुझसे बहुत लोग असहमत रहते हैं इसके बावजूद मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि बस्तर में रमण सिंह जी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ प्रशासन संघर्ष-समाधान के लिए दीर्घकालिक रचनात्मक समाधान-प्रयासों के साथ प्रयासरत है। समाधान के लिए किए गए प्रयासों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि जो जमीन पर कार्य करने जा रहा है, वह व्यक्ति कैसा है, उसकी सोच, उसकी मानसिकता, उसकी क्षमता, उसका अपना व्यक्तिगत संकल्प, इच्छाशक्ति व दृढ़ता का स्तर क्या है। बस्तर संभाग के जिलों में ऐसे कई अधिकारी पहुंचे जिन्होंने अपने जीवन की सुरक्षा को ताक पर रखते हुए रचनात्मक-समाधान की ओर के प्रयासों के लिए वास्तव में जमीनी इतिहास रच दिया। ऐसे अधिकारियों को बस्तर में भेजे जाने के लिए, उनको प्रयास करने देने के लिए, दिशा-निर्देशन के लिए, प्रोत्साहन आदि के लिए निःसंदेह मुख्यमंत्री रमण सिंह जी, उनकी सलाहकार टोली व नौकरशाह आदि धन्यवाद के पात्र हैं।

    Raman Singh, the Chief Minister Chhattisgarh

    आधुनिक बस्तर में इतिहास रचने वाले अधिकारियों में एक नाम टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली का आता है। टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली के कामों की तासीर समझ पाने के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि उन्होंने काम किन परिस्थितियों में किया और कर रहे हैं।

    टामन सिंह सोनवानी लगभग ढाई साल पहले बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के जिलाधिकारी बनाए गए। नारायणपुर जिला क्या है, इस जिले में जिलाधिकारी या प्रशासन में होने का मतलब क्या है, यह समझने के लिए नारायणपुर जिला जिसके कुल क्षेत्रफल का लगभग 90% भाग घना जंगली क्षेत्र है, के “अबुझमाड़” को समझना पड़ेगा।

    “अबुझमाड़”

    “अबुझमाड़”, छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का एक ऐसा इलाका जिसे आधुनिक काल में भारत में आदिवासियों का वास्तविक घर कहा जा सकता है जो बाहरी दुनिया से अछूता है। बाहरी दुनिया से कितना अछूता है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सन् 2009 में मुख्यमंत्री रमण सिंह जी के निर्देश पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे से मुक्त किया। अबुझमाड़ क्षेत्र कई दशकों तक प्रतिबंधित क्षेत्र रहा, जो लोग इस क्षेत्र के नहीं थे उन लोगों का प्रवेश इस क्षेत्र में प्रतिबंधित रहा।

    यह क्षेत्र आजादी के कुछ दशकों बाद आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया, इसलिए बाहरी दुनिया से अछूता हो गया हो, ऐसा नहीं है। अंग्रेज जिन्होंने दुनिया के कई देश खोजे, उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों को खोज लिया उन अंग्रेजों के शासन काल में भी लगभग डेढ़ सौ साल पहले जमीनी सर्वे किए जाने के बावजूद यह क्षेत्र अपवर्जित घोषित रहा।

    आदिवासियों की स्थानीय भाषा में “अबुझमाड़” का मतलब अज्ञात पहाड़ियां होता है। बहुत अधिक घने जंगलों, पहाड़ियों व इन्द्रावती नदी के कारण अबुझमाड़ बाहरी दुनिया से सदैव ही अलग थलग रहा है। बाहरी दुनिया से पूरी तरह अछूते अबुझमाड़ क्षेत्र में पहुंचने के लिए साधन केवल दुर्गम जंगली रास्ते रहे हैं इसलिए यहां प्रशासन की पहुंच तक नहीं रही, विकास की योजनाओं का पहुंचाना तो कल्पनातीत बात रही है। यह सबसे प्रमुख कारण रहा कि यह क्षेत्र माओवाद का सबसे मजबूत व मुख्य गढ़ बन गया।

    अबुझमाड़ क्षेत्र में अभी भी सिर्फ पैदल व साइकिल से ही पहुंचना संभव है। माओवादियों ने अबुझमाड़ जो उनका मुख्य गढ़ है को प्रशासनिक पहुंच से सुरक्षित करने के लिए यहां पहुंचने वाली जंगली पंगडंडियों वाले रास्तों में विस्फोटक सुरंगों (लैंड माइंस) आदि का प्रयोग बहुतायत से किया, ताकि प्रशासन व सुरक्षा बल यहां तक न पहुंच सकें।

    टामन सिंह सोनवानी व उनकी टीम के कार्य

    Taman Singh Sonwani IAS

    जिन इलाकों में कार, बस, जीप, मोटरगाड़ी आदि पहुंचने के रास्ते ही नहीं उन इलाकों में जिलाधिकारी द्वारा प्रशासन की टोली के साथ माओवादियों के धमकी देने के बावजूद पैदल व साइकिल आदि से किसी तरह पहुंचते हुए, माओवादियों के झंडा बैनर लगे स्थानों में अपनी जान की बिना परवाह करते हुए बैठकर आदिवासियों के साथ विकास की योजनाओं के संदर्भ में चर्चाएं की, समाग्री वितरण कराया, डाक्टरों की टोलियों को भी साथ ले जाकर चिकित्सा शिविर कराए।

    माओवादियों की समानांतर सरकार वाले इलाकों में जाकर आदिवासियों से विकास कार्यों व योजनाओं की चर्चा करना, उनका विश्वास अर्जित करके विकास के कार्यों को इतने दुर्गम स्थानों पर उनके दरवाजे तक पहुंचाना; निरंतर प्रयास, संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता व टोली भावना के साथ काम करने का ही परिणाम हो सकता है।

    आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए पेयजल, चिकित्सा शिविर, सोलर-ऊर्जा वाली लाइट आदि जैसी मूलभूत सुविधाओं से शुरुआत की गई। इन सुविधाओं का विरोध माओवादी भी नहीं कर पाए क्योंकि उनको भी पानी व प्रकाश आदि चाहिए। इन सुविधाओं से बढ़ते हुए कृषि, आर्थिक विकास, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) व 20 वर्ष पहले विद्युत वितरण की योजनाओं को माओवादियोँ द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद, आज 20 वर्ष पश्चात उन योजनाओं को चलाने की स्थिति तक पहुंचे। 

    अब स्थिति यह है कि सड़कों का भी निर्माण शुरू हो रहा है, पुल और पुलियाएं बन रही हैं जिसके कारण आर्थिक विकास व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और बेहतर कर पाने में मदद मिल रही है तथा शताब्दियों से अपवर्जित इस इलाके को बाहरी दुनिया से जोड़ा भी जा सकेगा। इन सड़कों के निर्माण में मुश्किलों का अनुमान लगाने के लिए एक उदाहरण यह समझा जाए कि सिर्फ 26 किलोमीटर सड़क के निर्माण के लिए  23-24 पुल बनाने पड़ते हैं, कई घाट बनाने पड़ते हैं, औसतन लगभग हर एक किलोमीटर पर एक पुल। पुल व सड़क बनाने की सामग्री, यंत्र, इंजीनियर, मजदूर आदि का पहुंच पाना वह भी ऐसे दुर्गम व अशांत क्षेत्र में।

    नारायणपुर जिले में 176 राजस्व ग्रामों सहित कुल लगभग 400 गांव हैं। जिनमें से अबुझमाड़ क्षेत्र के 100 से अधिक गांवों में तामन सिंह सोनावनी व उनकी प्रशासनिक टोली द्वारा रचनात्मकता का इतिहास लिख दिया गया है। इन गांवों को जोड़ने के लिए, संपर्क में लाने के लिए पुल-पुलियों का बहुत अधिक निर्माण कराया गया है।

      स्वास्थ्य व पेयजल :

    आदिवासी लोग नदियों, चुओं, नालों, पहाड़ी झरने से आदि से पानी ढोकर घर लाते थे घरेलू प्रयोग के लिए, यही पानी पीते भी थे। टामन सिंह सोनवानी ने 100 से अधिक गांवों में सोलर-पंप लगवाकर पेयजल उपलब्ध करवाया। हर गांव से कुछ युवाओं को सोलर-पंप का प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे सोलर-पंप का संचालन व देखभाल कर पाएं। इन गांवों में सोलर ऊर्जा से प्रकाश की व्यवस्था भी की गई है।

    सीमित वनोपज पर निर्भर आदिवासी समाज के बच्चे, महिलाए व वयस्क सभी कुपोषित हैं। तामन सिंह ने गर्भवती महिलाओं व बच्चों को कुपोषण से बचाने का बीड़ा उठाया और गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं व बच्चों को सुपोषित आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई। स्वास्थ्य की जांच होती है, जांच में जिन पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है उनके सप्लीमेंट्स दिए जाते हैं।

    दुर्गमता के कारण अबुझमाड़ के गांवों में पहुंचना सरल नहीं, इसलिए दुपहिया वाहनों में चलंत चिकित्सा केंद्र संचालित किए जाते हैं। चिकित्सा से संबंधित जितना आवश्यक सामान दुपहिया में लाद पाना संभव होता है उतना लाद कर गांव-गांव पहुंच कर लोगों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराई जाती है। जहां जहां पुल पुलिया बनने से संपर्क रास्ते बनते जा रहे हैं वहां और बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाने लगीं हैं।

    Sukma Badde

    आदिवासी युवती “सुकमा बड्डे” :

    अबुझमाड़ के इलाके की एक आदिवासी लड़की, वह पहली माड़िया लड़की है जिसने नर्सिंग की पढाई करने के बाद अपने ही समाज के लोगों के लिए काम करने की इच्छा जाहिर की तो टामन सिंह सोनवानी ने सहयोग किया। सुकमा बड्डे नाम की यह पढ़ी लिखी युवती जिसने कितनी भयंकर तकलीफों से पढाई पढ़ी होगी, किसी शहर में सरकारी नौकरी करते हुए चकाचौंध, शहर में घर, कार, अपनी संतानों की बेहतर शिक्षा आदि सुविधाओं का भोग कर सकती थी। लेकिन उसने स्वेच्छा से यह निर्णय लिया कि उसको अबुझमाड़ के बिना सुविधा वाले दुर्गम गावों में अपने समाज के स्वास्थ्य के लिए काम करना है।

    सार्वजनिक वितरण प्रणाली, PDS :

    दुर्गम स्थानों व रास्ते न होने के कारण आदिवासी लगभग 60 किलोमीटर पैदल चलकर 35 किलो का राशन लेने आते थे। केवल राशन लेने आने के लिए आने जाने में कई-कई दिन लगते थे। जंगली व पहाड़ी रास्तों में 35-35 किलो का वजन शरीर पर लाद कर चलना पड़ता था। टामन सिंह सोनवानी ने सार्वजिनक वितरण प्रणाली के केंद्र लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित करने की योजना बनाई। प्रशासन के द्वारा अबुझमाड़ में इतने अंदर की दूरी तक घुस कर काम करने की कुव्वत इसलिए आ पाई क्योंकि वह आदिवासियों का विश्वास जीत पाने में सफल रहा और योजनाओं को वास्तव में आदिवासियों तक पहुंचाया।

    कृषि, पानी, लिवलीहुड कालेज, दुग्ध-उद्योग व रोजगार के अवसरों से आर्थिक विकास :

    अबुझमाड़ में आदिवासी पेंडा कृषि करते आए हैं। पेंडा कृषि का मतलब जो अपने आप उग वो उग गया, बीज को जमीन पर ऐसे ही बिखेर दिया जो उगना हुआ वह उग गया। पेड़ों से बीज गिर कर जिन बीजों को स्वतः उगना हुआ वे उग गए। वन संपदा को बीन कर एकत्र करना। यही सब मिलाजुला कर कहलाती है पेंडा कृषि।

    प्रशासन ने आदिवासियों को कृषि का प्रशिक्षण दिलवाया। अब किसान मक्का लगा रहे हैं, सब्जियों की खेती कर रहे हैं, बागवानी लगा रहे हैं। किसानों को बाजार उपलब्ध करवाया जा रहा है। किसानों के परिवारों को पोषण वाला भोजन प्राप्त हो रहा है और आय भी हो रही है। आर्थिक विकास हो रहा है। क्रय-विक्रय शक्ति बढ़ रही है।

    किसानों को खेती करने के लिए पानी की कमी न हो, कृषि योग्य जमीन उपलब्ध हो इसलिए नदीं नालों में जगह-जगह छोटे-छोटे चेकडैम बनवाए गए हैं ताकि पूरे वर्ष खेती करने के लिए किसानों को पानी उपलब्ध रहे।

    आदिवासी युवाओं की समितियां बनाकर डेयरी खोलीं गईं हैं। गायों की देखभाल करने का प्रशिक्षण दिलवाया गया है। दूध के विपणन के लिए आदिवासी बच्चों के लिए विद्यालयों, छात्रावासों व सुरक्षा बलों के कैपों आदि में आपूर्ति होती है।

    विभिन्न प्रकार के रोजगारों के लिए प्रशिक्षण देने के लिए जिला मुख्यालय में लिवलीहुड कालेज की स्थापना की गई। यहां से निकली कई आदिवासी महिलाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बैंगलोर जैसे शहरों में नौकरियां दीं। इनमें से कुछ वापस आकर लिवलीहुड कालेज में ही प्रशिक्षण देने का काम करने लगीं क्योंकि उनको महसूस हुआ कि उनको अपने समाज के लिए काम करना चाहिए।

    जंगल में रहने के कारण, असुविधाओं में रहने के कारण उनके शरीर का स्टेमिना अच्छा होता है लेकिन सुरक्षा बलों की फिजिकल फिटनेस आदि जैसी परीक्षाएं कैसे उत्तीर्ण करें यह कुछ पता नहीं होता। इसलिए जिला मुख्यालय में सुरक्षा बलों में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए छात्रावास सहित प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया है। प्रशिक्षकगण व प्रशिक्षुगण यहीं रहते हैं और सिखाते सीखते हैं। सरकार ने बस्तर के आदिवासियों के लिए बस्तर बटालियन की स्थापना की है। यह भी यहां के आदिवासियों को दुनिया व मुख्यधारा से जोड़ने का दूरदर्शी प्रयास है।

    Taman Singh Sonwani driving motorcycle

    दुर्गम गांवों में स्वयं मोटरसाइकिल चलाकर लोगों के पास पहुंचने वाले नारायणपुर के जिलाधिकारी तामन सिंह सोनवानी कहते हैं कि रेडियो बहुत कुछ बदलता है। रेडियो बहुत सहजता से प्रयोग किया जा सकता है, बहुत तामझाम की जरूरत नहीं होती, हाथ में लेकर टहलते हुए भी सुना जा सकता है। इसलिए गावों में उन्होंने युवाओं को रेडियो उपलब्ध कराए हैं ताकि उन तक विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की जानकारियां पहुंचती रहें। लोकतंत्र पर उनका विश्वास बने। देखने में आया है कि प्रधानमंत्री की मन की बात व मुख्यमंत्री का गोठ आदि कार्यक्रमों को भी सुनते हैं, फिर सहमति असहमति के साथ आपस में चर्चा करते हैं। रेडियो को कैसे संवाद का सशक्त माध्यम बनाया जा सके ऐसी योजनाओं पर विचार व काम चल रहा है।

    सुपर मार्केट :

    अबुझमाड़ के ओरछा नामक स्थान में जो ब्लाक मुख्यालय भी है, में सुपर मार्केट की स्थापना की गई। सुपर मार्केट की स्थापना के पहले स्थानीय आदिवासी युवाओं को सामान रखरखाव, लेखा-जोखा व विपणन आदि का प्रशिक्षण दिया गया। सुपर मार्केट का संचालन करने के लिए आदिवासी युवाओं की समिति बनाई गई।

    सुपर मार्केट की स्थापना दो प्रमुख कारणों से की गई। एक, दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को सरलता से उपलब्ध कराने के लिए जिनको लाने के लिए दुर्गम रास्तों में बहुत तकलीफें झेल कर मुख्यालय के बाजार तक आना पड़ता था। दो, किसान कृषि-उत्पाद का सरलता से विपणन कर सके, आदिवासी शिल्प आदि का सरलता से विपणन हो सके।

    रोजमर्रा के सामानों, वन-उपज, कृषि उपज, आदिवासी शिल्पकला आदि सामानों संग्रह, विपणन आदि करने के लिए सुपर मार्केट में सुपर मार्केट में गोदाम व दुकान की स्थापना की गई। इसी तरह की सुपरमार्केट अबुझमाड़ के अन्य स्थानों में भी स्थापित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है।

    शिक्षा :

    Taman Singh Sonwani IAS with tribal students

    माओवादी इलाकों में बच्चों व बच्चियों को माओवादी प्लाटून या दलम में भर्ती करने के लिए ले जाया जाता है। स्कूलों व शिक्षा आश्रमों को चलने नहीं दिया जाता है। गांव बहुत दूर-दूर व विरले बसे हुए हैं। इसलिए ओरछा ब्लाक में अंदर के गावों में एक प्रयोग किया गया है। आठ अलग-अलग गांवो के स्कूलों व आश्रमों को मिलाकर एक स्थान पर बड़े आश्रम की स्थापना करके “आठ-आश्रम” बनाया गया है। ये आठ गांव 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर थे, बहुत ही दुर्गम गांव।

    स्कूलों व आश्रमों में आधुनिक तकनीक वाली टेलीविजन भी लगवाएं गए हैं ताकि बच्चे देखकर, सुनकर सीख सकें। बाहरी दुनिया से अनजान न रहें। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं ताकि बच्चों का व्यक्तित्व विकास हो, आत्मविश्वास विकसित हो।

    दसवीं बारहवीं के बच्चे शिक्षक न होने की वहज से गणित व विज्ञान आदि जैसे विषयों में बहुत कमजोर रहते हैं। शिक्षक बीहड़ों में जाकर नहीं पढ़ाना चाहते हैं, इसलिए आउटसोर्सिंग करके नारायणपुर जिला मुख्यालय में कुछ भवन दिए गए हैं जहां छात्र व शिक्षक रहते हुए पढ़ते व पढ़ाते हैं। एक छात्र ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की मुख्य प्रवेश परीक्षा में अर्हता प्राप्त की।

    चलते-चलते

    Taman Singh Sonwani IAS

    टामन सिंह सोनवानी से यह पूछने पर कि इतने असंभव क्षेत्र में इतने काम कैसे कर पाए। वे विनम्रता से जवाब देते हैं कि उन्होंने नहीं किया। ये काम इसलिए हो पाए क्योंकि प्रशासन में उनको मिली टोली बहुत अच्छी है और काम करना चाहती है।  उन्होंने कहा कि पुलिस की सोच भी रचनात्मक समाधान की है इसलिए प्रशासन के साथ तालमेल अच्छा व संपूरकता का रहता है। टामन सिंह सोनवानी उपलब्धियों के श्रेय का बड़ा हिस्सा पुलिस व उनके अधिकारियों को देते हुए कहते हैं कि सिविक एक्शन प्रोग्राम के प्रति पुलिस बहुत गंभीर है। इस कार्यक्रम के तहत पुलिस अधीक्षक गांव-गांव प्रशासन के साथ लोगों से मिलने जाते हैं, चर्चा करते हैं, संभव हुआ तो वहीं समस्याओं का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, यहां तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यवहारिक रूप से सुदृढ़ व सरल बनाने में भी पुलिस का योगदान रहा।

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    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • ओमप्रकाश बंसल :: जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा, देश का संभवत: ऐसा अकेला पत्रकार, जिसने बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया

    त्रिभुवन


    ओमप्रकाश बंसल  नहीं रहे। वे प्रशांत ज्योति के संपादक थे। उनके नाम से नेता, अफ़सर और बड़े-बड़े लोग ख़ौफ़ खाते थे। किसी के भी ख़िलाफ़ ख़बर हो, रोकने का प्रश्न ही नहीं। इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि उनके पिता को एक बार पुलिस ने सट्टा करते हुए गिरफ़्तार कर लिया तो उन्होंने क्राइम रिपोर्टर के रूप में अपने पिता के भी ख़िलाफ़ ख़बर लिखी। उनके एक भाई सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे, उनके बारे में भी कई बार ख़बरें छपीं। किसी का कितना भी बड़ा विज्ञापन उनके अख़बार में छप रहा हो, ख़बर न रुकती थी और न डायल्यूट होती थी। फ़्रंट की है तो फ़्रंट पर छपेगी और अंदर की है तो अंदर। विज्ञप्ति को पहले पेज पर तो क्या, भीतर के किसी पेज पर भी जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। वे देश के संभवत: ऐसे अकेले पत्रकार थे, जिसने के बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया।

    मैंने अपनी पत्रकारिता प्रशांत ज्योति से शुरू की थी। यानी वह मेरे लिए पहली तनख़्वाह वाला अख़बार था। औम जी के किस्से कहीं से भी शुरू करो, ख़त्म नहीं होंगे। वे अनूठे जीवंत कैरेक्टर थे। क्राइम का वैसा रिपोर्टर मैंने कहीं नहीं देखा। किसी जगह पर पेड़ कटने की ख़बर आज भी हम लोगों के लिए कोई बड़ी ख़बर नहीं होती, लेकिन उन्होंने कुछ पेड़ कटे तो सिंचाई विभाग के तीन इंजीनियरों को जेल दिखाकर दम लिया। एक डाॅक्टर थीं कृष्णा गेदर। कलेक्टर थे आरएस गलूंडिया। गेदर से आंख में दर्द की दवा लाए तो 120 रुपए का बिल पास करवा लिया। उन दिनों आरटीआई वारटीआई नहीं हुआ करती थी। बंसल जी ने डोक्यूमेंट्स लिये, ख़बर छापी और कार्रवाई शुरू कर दी। गलूंडिया जी ने बंसल जी से आख़िरी क्षणों में माफ़ी न मांगी होती तो वे जेल में हाेते। लेकिन भाई रेवतीरमण ने उनका जितना साथ दिया और जिस दौर में दिया, वह कोई और नहीं दे सकता था।

    उनके कुछ किस्से तो ग़ज़ब ही हैं।  जैसे :

    • कहां जा रहा है?
      फ़ोन करने।
      तो ये फ़ोन है या बेरिये की…।
      अरे, वो बाहर करना था।
      एसटीडी?
      नहीं, आईएसडी।
      तो क्या हुआ? इसमें आईएसडी भी है, मिस्टर।
      मेरी तनख्वाह है छह सौ और आईएसडी का बिल आएगा 900 का।
      फ़ुकरिया समझा है क्या? आेए, बाहर नहीं जाएगा। ले पकड़ फ़ोन। कर यहीं से। बाहर कभी आईएसडी करने गया तो ये रही बंदूक, गोली मार दूंगा!
    • एक माननीया : बंसल जी, मुझे आज अापके …ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं बैठने दिया।
      क्यूं?
      बोला, तू कहां की पत्रकार है? तू तो विज्ञापन का काम करती है।
      हम्मममम ….कौन है रे अंदर। अरे सक्सेना!
      ..आज से संपादक सुदर्शना शर्मा….और डिक्लेयरेशन क्लियर होने से पहले प्रेसलाइन में उसी दिन से संपादक का नाम बदल गया।
    • नगर परिषद के चुनाव थे। एक बहुत बड़े ट्रांस्पोर्टर चुनाव में उतरे। चुनाव कार्यालय पुरानी धानमंडी में खोला। ठीक प्रशांत ज्योति के सामने। सुबह-सुबह लाउड स्पीकर शुरू। बंसल जी को सिरदर्द की पुरानी प्रॉब्लम थी। दोपहर दो बजे आए।
      बोले : ये क्या है? दो-चार बार सेठ जी से अनुरोध किया कि स्पीकर हटा लें। नहीं माने तो उन्होंने कलेक्टर को फ़ोन लगाया। बोले : कलेक्टर साहब, दो घंटे में या तो ये लाउडस्पीकर हटा दो। नहीं तो मैं तुम्हारी ….में लगा दूंगा!जिला कलेक्टर ने कोतवाली पुलिस को भेजा कि जाओ इस जाहिल को गिरफ़्तार करके लाओ। कोतवाल माफ़ी मांगते हुए आए और इस बीच किसी ने कलेक्टर को समझा दिया कि आप अपमान का घूंट व्हिस्की समझकर पी जाओ। नहीं तो कल आपके दिक्कत हो सकती है। उन्होंने कहा : मैंने ऐसा क्या किया है? सामने अॉफ़िसर ने समझाया : सर, वो आपकी घड़साना वाली ज़मीन के काग़ज़ उनके ही पास हैं! उसी दिन शाम को कलेक्टर का संदेशवाहक प्रशांत ज्योति कार्यालय में था और कलेक्टर साहब विनयावनत मुद्रा में। लाउडस्पीकर तो कभी का उतर चुका था।

    प्रशांत ज्योति का पुराना कार्यालय धानक धर्मशाला में एक ऊंचे चबूतरे पर हुआ करता था। उसे बंसल जी अधिकारपूर्वक "मेरा थड़ा" कहा करते थे। उन्हें छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाया करता था तो सामने बैठे रिपोर्टर हो या कोई बड़े सेठ जी, बोलते थे : उतर मेरै थड़ै ऊं!!! और उनका यह तकियाकलाम तब भी था जब वे धानमंडी के भूतल में अपनी मित्र के साथ बैठे रहते थे!

    इतिहास और धर्म से संबंधित पुस्तकों के वे बेहद शौकीन थे। उन्होंने एक बार मेरे पास एक ऐटलस देखा।
    बोले : कितने का है?
    मैंने कहा : 9000 का।
    बोले : ले चेक। दे दे।
    मैंने मना किया तो बोले : पता बता। मंगवा के दे। ये ले चेक।
    किताब चाहे कम्युनिज्म की हो या कौटिल्य की, खूबी बता दो तो बंदे से भले 50,000 रुपए ले लो।

    वे एक नेकदिल इनसान थे। फक्कड़ थे। भावुक थे। कोई चाहे उन्हें किसी अपराधी के पक्ष में मोड़ दे या साधु के। कई लाेगों ने उन्हें झूठे अत्याचारों के किस्से सुनाकर कई बार गलत ख़बरें भी छपवाईं और बाद में मैंने बंसल जी को रोते हुए भी देखा।

    कई बार वे 360 डिग्री घूम जाया करते थे। अगर कोई तथ्य ला दे तो। इस तरह की उनकी आदतों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका भी। लेकिन वे जिस पर भरोसा करते थे उस पर इतना करते थे कि वह चाहे उन्हें कुछ भी कह दे और कर दे, लेकिन अगर किसी ने उन्हें कुछ भर दिया तो आज का सोना कल की राख भी हाे सकता था। वे विचलनों और विद्रोहों के बीच संतुलन साधने की चालाकी नहीं जानते थे। वे किसी एक व्यक्ति के साथ अत्याचार होने पर पूरी कम्युनिटी से भिड़ जाते थे और इसीलिए वे औमप्रकाश बंसल थे। वे अफ़सरों से भिड़ते भी थे, लेकिन उनके साथ खड़े भी हो जाते थे। राजस्थान के टॉप ब्यूरोक्रैट रामलुभाया जिन दिनों कलेक्टर थे, उन्होंने अस्पताल को सुधारने का बीड़ा उठाया तो सब अख़बार वाले डॉक्टरों के साथ थे, लेकिन बंसल अकेले रामलुभाया के साथ।

     

    गंगानगर में पुरी के जगदगुरु शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ आए थे। उन दिनों सती विवाद चल रहा था। निरंजन देव सती समर्थक थे और कह रहे थे कि वेदों में सती का समर्थन है। बंसल जी ने मुझे बुलवाया। बोले : आपके पिताजी से पूछो कि वेदों में सती का समर्थन है क्या? मैंने बताया कि वे कह रहे हैं नहीं है। बोले : इस शंकराचार्य के खिलाफ केस भी करवाना है और इसे भगाना भी है। करीब दस हमने खबरें लिखीं। शंकराचार्य से प्रश्न पूछते। वे रात को जवाब देते। लेकिन पांच दिन बाद ही हमारी खबरों को लेकर पुलिस ने केस दर्ज किया और शंकराचार्य रातोरात भाग गए। उस दौर में पूरा मीडिया एक साथ था और शंकराचार्य अकेले पड़ गए।

     

    ख़बरों में वे किसी को नहीं बख्शते थे। किसी समय कम्युनिस्ट उनके दोस्त हुआ करते थे। आज भी हैं। लेकिन उन्होंने एक ख़बर निकाली जब सीपीएम नेता हेतराम बेनीवाल सीटू के नेता हुआ करते थे और जेसीटी मैनेजमेंट ने उनके बेटे की शादी में 51000 रुपए का बान दिया था।

    कानून की वैसी बारीकियां मैंने किसी संपादक में नहीं देखीं। क्राइम इन्वेस्टिगेशन की वैसी हूक शायद ही किसी में हो। पुलिस से आगे और ज्यादा तथ्यों के साथ। कई उलझे हुए मर्डर केसों में उन्होंने जांच की धारा बदल दी। कानून और पत्रकारिता मिलकर किसी का कितना फ़ायदा कर सकते हैं, यह चीज़ उन्होंने बार-बार साबित की।

    एक बार एक दोस्त को उन्होंने पूरा अख़बार संभालने को दे दिया। कुछ दिन बाद दोस्त दिखाई नहीं दिए। मैंने पूछा : ….कहां हैं? वे इधर-उधर देखने लगे। फिर भीतर आवाज़ दी : …कहां है? जल्दी लाओ कहां है? ….कुछ देर बाद अंदर से एक कंपोजीटर ब्लेड लेकर बाहर आया। मैं हंसा। गुस्से से बोले : हंसता क्याें है? मैंने कहा : ये तो ब्लेड है। बोले : नहीं, ये ब्लेड नहीं है। ये तो …..है! बाद में उन्होंने एक्सप्लेन किया कि वो आपका बंदा दिन भर इस ब्लेड से दूसरे अखबारों की खबरें काटकर यहां दिया करता था तो मैंने उस दिन से उन्हें कहा, तुम जाओ और आज से ये ब्लेड प्रशांत ज्योति का न्यूज एडिटर!

    वे बच्चे की तरह सरल स्वभाव भी थे। एक बार उनका अपने एक पुराने मित्र से झगड़ा हो गया और ऐसा हुआ कि बस पूछो मत। मैंने उनसे पूछा : आप तो दोस्त थे। ये गिरावट कैसे? बोले : उसने मेरी कपड़े की दुकान बंद करवाकर पान का खोखा शुरू करवा दिया। इसलिए। मैंने कहा : आप पहले कपड़े की दुकान करते थे? वे बोले : नहीं। मैं डेली अख़बार निकालता था। ये बोला : देख बंसल, विज्ञापन तो डेली मैं भी इत्ता ई आवैगा और वीकली मैं भी इत्ता ई। क्यूं खरचो करै? तो मैंने उसकी सलाह मानकर अखबार को डेली से वीकली कर दिया। यानी कपड़े की दुकान को पान के खोखे में बदल दिया। मैंने कहा : ये तो आपकी गलती है। आपने उनकी बात क्यों मानी? बोले : यार ये तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं। मैं तो जो कोई आता है। उसी की मान लेता हूं! मैंने कहा : आपका दोस्त कहता है : आप रात को पेटीकोट पहनकर घूमते हो! वे बहुत हंसे। बोले : यार पुराना दोस्त है। वही अंदर की बात जान सकता है! मुझे लगा, वे गुस्से से भर उठेंगे। लेकिन उन्होंने जोर से हंसते हुए बताया : यार, मैं लुंगी बांधता था। मेरा पेट बड़ा था। लुंगी खुल जाती थी। ये चौधरी ने सलाह दी : यार बंसल, तेरी ये लुंगी बार-बार खुल जाती है। तू इसे आगे से सिलवा ले। मैंने सिलवा ली। ये फिर भी गिरती रही। वो बोला : यार तू इसका नेफ़ा बनवा और नाला डाल ले। मैंने उसकी वो बात भी मान ली। …फिर कई दिन बाद साला मजाक करने लगा : यार ये तेरा पेटीकोट!!! अब देख…तू फिर मुझे कहेगा कि ये भी ग़लती मेरी ही ही है। चल उतर मेरे थड़े से!!!

    साहित्य को वे बहुत सम्मान से देखते थे। उन्होंने रविवार का पूरा अख़बार ही साहित्य को समर्पित कर रखा था। ऐसे कई मौके आए जब हमने पहले पन्ने पर हिन्दी की बेहतरीन रचनाएं छापीं।

    उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। लेकिन एक पहलू ऐसा है, जो शायद औमप्रकाश बंसल ही कर सकते थे। इन विषयों पर फ़िल्मों में काल्पनिक पात्रों को जीने वाले हीरो तो करते रहे हैं, लेकिन आम जीवन में वैसा दुस्साहस करना हर किसी के बस की बात नहीं। अपने जीवन में उठाया उनका यह कदम उनमें लाख अवगुण हों तो भी उन्हें ढांप लेता है और उन्हें मेरी नज़र में उन्हें एक नायक की छवि प्रदान करता है।

    आज बंसल नहीं रहे, बात इतनी सी नहीं है। वह अनगढ़ और अनचीन्हा व्यक्तित्व नहीं रहा। एक अदभुत चरित्र नहीं रहा। एक असाधारण व्यक्ति नहीं रहा। उनके साथ ही मेरे शहर की जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा चला गया, जिसमें दसों रस समान वेग से बहते थे।

     


    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

  • कश्मीर 2016 : जुनून के पीछे भी झाकें

    प्रो० राम पुनियानी


    उरी में भारतीय सेना के 18 जवानों के मारे जाने की घटना के जवाब में भारत द्वारा नियंत्रण रेखा के पार जो सैनिक कार्यवाही की गई, उसकी वाहवाही के शोर में कश्मीर के लोगों की व्यथा छुप सी गई है। भारत और पाकिस्तान के बीच जितनी भी झड़पें हुई हैं, उनके केंद्र में कश्मीर रहा है। भारत का कहना है कि कश्मीर उसका अविभाज्य हिस्सा है और धरती की कोई ताकत कश्मीर को उससे छीन नहीं सकती। दूसरी ओर, पाकिस्तान, कश्मीर के भारत में विलय के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करता है। पाकिस्तान का कहना है कि चूंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए।

    आतंकी हमलावरों द्वारा उरी में 18 भारतीय सैनिकों को मार दिए जाने के बाद से यह मुद्दा अखबारों की सुर्खियों में आ गया। दरअसल, घटनाक्रम की शुरूआत हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की सेना के साथ एक मुठभेड़ में मौत के साथ हुई। इस घटना पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। जहां मीडिया ने इसे घाटी में सक्रिय अतिवादियों से मुकाबला करने में भारतीय सेना की बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, वहीं कश्मीर के लोगों का एक तबका इसके विरोध में सड़कों पर उतर आया। विरोध की अभिव्यक्ति का मुख्य तरीका पुलिस और सेना के जवानों पर पत्थरबाजी है। इसके बाद हुए घटनाक्रम में लगभग 80 लोग मारे गए और 9,000 से ज्यादा घायल हुए। इनमें से अधिकांश को पेलेट से चोटे लगीं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षाबल करते हैं। कई अपनी आंखे खो बैठे हैं और अन्यों को शरीर के विभिन्न अंगों में गंभीर चोटें आईं। पुलिस और सेना के जवान भी घायल हुए। राज्य में कफ्र्यू लगा दिया गया और यह राज्य में अब तक का सबसे लंबा कर्फ्यू था।

    सरकार द्वारा शांति स्थापना के लिए कई प्रयास किए गए। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर गए और वहां के नेताओं से बातचीत की। भारत सरकार और गृहमंत्री का कहना है कि वे अलगाववादी नेताओं से बात नहीं करेंगे। जब एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल घाटी गया तब प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों जैसे सीताराम येचुरी और डी राजा ने अलगाववादी नेता गिलानी से बातचीत करने की कोशिश की परंतु उन्होंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

    लगभग दो माह बाद कर्फ्यू उठा लिया गया परंतु स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है। उरी में आतंकी हमले के बाद पूरा फोकस आतंकवाद के मुद्दे पर हो गया है। जहां तक कश्मीर के हालात का सवाल है, सरकार का कहना है कि गड़बड़ी फैलाने वाले घाटी की आबादी का पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें पाकिस्तान भड़का रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी में जो हालात हैं, उसके लिए पाकिस्तान भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। हमारे पड़ोसी देश के नेता इस मुद्दे पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं। परंतु यह भी सच है कि कश्मीरी लोगों में लंबे समय से गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है और पिछले कुछ वर्षों में यह अपने चरम पर पहुंच गया है। वहां के युवा गुस्से में हैं। उनके मन में अलगाव का भाव है। कश्मीर के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर आतंकी, घाटी में शांति का वातावरण नहीं बने रहने दे रहे हैं तो दूसरी ओर सशस्त्र बलों द्वारा लोगों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। राज्य में लागू सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना के कर्मी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं और कई मामलों में निर्दोष नागरिकों को जबरन परेशान किया जा रहा है।

    कश्मीर के हालात पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रपट बताती है कि घाटी में मानवाधिकारों का उल्लंघन कितना आम है। बैंगलोर में जारी इस रपट में कहा गया है कि 1990 से 2011 तक राज्य सरकार के अनुसार राज्य में 43,000 लोग मारे गए। उनमें से 21,323 ‘अतिवादी’ और 13,226 ‘नागरिक’ (अर्थात जो हिंसा में सीधे शामिल नहीं थे) थे। हथियारबंद समूहों द्वारा 5,369 सुरक्षाकर्मियों को मार डाला गया और इस अवधि में सुरक्षाबलों ने 3,642 ‘नागरिकों’को मौत के हवाले कर दिया।

    सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण बिना किसी जांच या मुकदमे के आरोपियों की जान ली जा रही है और मानवाधिकार उल्लंघन की अन्य घटनाएं हो रही हैं। इस अधिनियम की धारा 7 के अनुसार नागरिक अदालतों में सुरक्षाबलों के किसी सदस्य पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्रीय और राज्य शासन की अनुमति आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुरक्षाबलों की ज्यादतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है। सेना के खिलाफ जम्मू और कश्मीर में जो शिकायतें की गईं, उनमें से 96 प्रतिशत को ‘झूठा और आधारहीन’  या ‘सैन्यबलों की छवि को खराब करने के इरादे से किया गया’ बताकर खारिज कर दिया गया। इन परिस्थितियों में कश्मीर में हर घटना पर बवाल खड़ा हो जाता है और युवा विरोध करने सड़कों पर उतर आते हैं। नागरिकों में राज्य के प्रति जो गहरा असंतोष व्याप्त है, वह बहुत दुःखद है। नागरिक इलाके व्यवहारिक रूप से सेना के कब्जे में हैं। कई वर्षों से घाटी में लगभग 6 लाख सैनिक तैनात हैं। वहां के लोगों को ऐसा लगता ही नहीं है कि वहां प्रजातंत्र है। जाहिर है इन परिस्थितियों में असंतोष और गहरा होता जा रहा है। इस पूरी समस्या के लिए केवल पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा, यद्यपि पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

    आखिर रास्ता क्या है? यूपीए-2 सरकार ने वार्ताकारों की एक तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की थी जिसने यह सिफारिश की थी कि कश्मीर की विधानसभा की स्वायत्तता पुनर्स्थापित की जाए और अतिवादियों व पाकिस्तान के साथ बातचीत की जाए। यह मांग भी लंबे समय से की जा रही है कि सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम को समाप्त किया जाए और क्षेत्र में तैनात सैन्यबलों की संख्या घटाई जाए।

    कश्मीर में शासन कर रही पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार, असंतुष्टों से बात करने तक को तैयार नहीं है। इससे घाटी में बेचैनी और असंतोष बढ़ रहा है। उरी और उससे पहले पठानकोठ पर हमले में पाकिस्तान की भूमिका ने वातावरण को और विषाक्त कर दिया है।

    हम सब को याद है कि चुनाव अभियान के दौरान भाजपा यह घोषणा करते नहीं थकती थी कि मोदी के सरकार में आने के बाद आतंकवादियों की हमला करने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी। यह दावा खोखला सिद्ध हो चुका है।

    आज आवश्यकता यह है कि पूरे क्षेत्र में शांति की स्थापना की जाए। कश्मीर के लोगों के घावों पर मलहम लगाई जानी चाहिए और उन्हें चैन से अपना जीवन गुज़रबसर करने का मौका मिलना चाहिए। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत भी आवश्यक है। कश्मीर के साथ 1948 में विलय की जो संधि की गई थी, उसके स्वायत्तता संबंधी प्रावधानों का सम्मान किया जाना चाहिए। वार्ताकारों की समिति की रपट इस मुद्दे पर संतुलित रूख अपनाने की सिफारिश करती है। इस रपट पर गंभीरता से विचार होना चाहिए ताकि घाटी में शांति स्थापित हो सके।

     

     

    jammu-kashmir-snowfall

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

    सामाजिक यायावर


    एक बहुत पुरानी कहावत है। बुज़ुर्ग कहते आए हैं। अगर अपने वस्त्र उघाड़ेंगे तो अपनी ही नग्नता दिखाई देगी। हर चीज़ का न सुबूत होता है और न यह ज़रूरी कि हर चीज़ दिखाई ही जाए। सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं, पूरे मीडिया में जो बहस चल रही है, वह हमारे देश की जगहंसाई कराने के लिए काफ़ी है। दुनिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रराज्य की विदाई का समय आ चुका है और हम अभी तक पूरी तरह राष्ट्र ही नहीं हो सके हैं।

    हमारे देश में या तो राष्ट्रवाद के स्वयंभू ठेकेदार हैं और वे अपने अलावा किसी दूसरे को राष्ट्रवादी मानना ही नहीं चाहते या ऐसे लोग जिनके लिए राष्ट्र से पहले व्यक्तियों की जमात है। ऐसे लोगों के लिए उनके अपने अलावा सब देशद्रोहीनुमा चीज़ हैं। एक वर्ग ऐसे लोगों का है, जो लोकतांत्रिक ढंग से पांच साल के लिए चुने हुए लोगों की किसी भी बात को गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं हैं। ये सब वे लोग हैं, जिन्होंने चुनाव में और उससे पहले कभी इस देश के पीड़ित लोगों के अांसू पौंछने का कोई काम नहीं किया। ये सब विचारधारा के कड़ाहों में उबलते रहे हैं।

    मुझे तो कई बार लगता है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए उतनी मेहनत की ही नहीं, जितना परिश्रम सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहनसिंह, दिग्विजयसिंह, पी चिदंबरम्, कपिल सिब्बल आदि ने नरेंद्र मोदी की राह आसान बनाने के लिए किया। उनकी सरकार के पहले तीन साल का रिकॉर्ड मुखर होकर कह रहा था कि सीटें ज्यादा नहीं आएंगी, लेकिन सुनता कौन था? नरेंद्र मोदी के बारे में मैंने सबसे पहले वामपंथी अभियानों के दौरान बांटे जाने साहित्य के माध्यम से सुना था। वामपंथियों को मोदी को राष्ट्रव्यापी हिन्दू हृदयसम्राट बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।

    इस बात के कि वे गुजरात में उनके धत्कर्मों पर फोकस करके गुजरात में उन्हें रोकते। यह एक लोकतांत्रिक तरीका होता। लेकिन आज जो मोदी को लेकर अरण्यरोदन हो रहा है, वह अप्रासंगिक होता जा रहा है। आज सर्जिकल स्ट्राइक पर बहस करने वाले तीन साल बाद चुनावों के आते-आते इतने थक जाएंगे कि बोल ही नहीं निकाल पाएंगे, जबकि वही उचित समय होगा। अभी तो बच्चे की जान मत लीजिए, उसे फस्ट टेस्ट, सैकिंड टेस्ट, थर्ड टेस्ट, कॉपी चेक, हाफ़ इयरली आदि देने दीजिए। फ़ाइनल आए तो फिर ख़बर जरा कस कर लीजिएगा। जैसे लोगों ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिग्गी राजा, चिदंबरम, सिब्बल आदि की ली। लेेकिन मुझे लगता है, तब आपके तेवर ऐसे नहीं रहेंगे।

    लेकिन आप संवैधानिक ढंग से सत्ता में आ जाते हैं तो इसका मतलब यह भी नहीं होता कि आपकी आलोचना नहीं की जा सकती। इस देश की लोकशाही को अधिकार है कि वह ख़राब प्रश्नपत्र करने वाले बच्चे को दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़ा कर दे या मुर्गा बना दे। मुर्गा वुर्गा आजकल लोगबाग कम बनाते हैं, क्योंकि बच्चों की माएं बहुत हल्ला मचाने लगती हैं। फिर भी अापकी ग़लती पर आपको ग्राउंड के चार चक्कर तो लगवाए ही जा सकते हैं।

    खैर, एक खेमा है, जो पहले सत्ता में रही अपने विरोधी दलों की सरकारों की हर अच्छाई की तो आलाेचना करता ही था, उन बुराइयाें पर तो कोहराम मचाता था, जिन्हें आज उन्होंने अपना प्रिय कंठहार बना रखा है। एफडीआई, पाकिस्तान को सबक सिखाना, चीन की चीं बुला देना, स्वदेशी आदि ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन पर पूरा संघ परिवार पहले दिन से शीर्षासन की मुद्रा में है। पुराने ऑडियो और विडियो सामने आए तो मारे शर्म के ऐसे-ऐसे कदम उठाने पड़े, जिनसे किसी भी जिम्मेदार नेता को बचना ही चाहिए। आख़िर यह कौन-सा आत्मसम्मान है, जो आज चीन की हर चीज़ के बहिष्कार का नारा लगाता है, लेकिन हमारे प्राणप्रिय नेता सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की बारी आती है तो आप भारतीय हस्त लाघव वाले शिल्पकारों को भूल कर चीन की शरण में चले जाते हैं। आप अगर किसी ऐसी चीज़ का सहारा लेंगे, जो उचित नहीं है तो अनुचित प्रश्न भी आपके सामने जीभें लपलपाएंगे।

    इसलिए एक जिम्मेदार और सुसंस्कृत देश के नागरिक होने के नाते जिम्मेदार और सुसंस्कृत अाचरण ही करना चाहिए। आप अपने अहंकारों के लिए देश के दर्प को दांव पर मत लगाइए। अगर आपका उपहास उड़ता है तो अपनी पुरानी ग़लतियों पर अफ़सोस कीजिए, न कि उन पर गर्वीला पर्दा डालिए। यही पश्चाताप है। अगर इस देश ने किसी को संवैधानिक तौर पर चुना है तो बर्दाश्त कीजिए, क्योंकि करोड़ों लोग अपने नापसंद नेताओं को सत्तासीन होते मन ही मन कुढ़ते रहे हैं। उनके मन में 68 साल की दबी हुई कुंठा अगर उबाल नहीं खाएगी तो किसकी खाएगी? इसलिए देश को देश रहने दें। अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

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    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

     

  • भारत बनाम पाकिस्तान संभावित युद्ध : खरी खरी

    सामाजिक यायावर


    दरअसल हम भारतीय जो बात बात पर पाकिस्तान में भूसा भर देंगें। पाकिस्तान को मजा चखा देगें, धूल चटा देंगें आदि भावनाओं से ओतप्रोत पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद में रहते हैं। उसके पीछे का बहुत बड़ा कारण हमारे दिमाग में बैठी यह सोच है कि पाकिस्तान हमारे सामने भुनगा है और हम उसे चुटकियों में मसल देंगें।

    पाकिस्तानी अपना गाल बजाते हैं, भारतीय अपना गाल बजाते हैं। दोनों देशों के लोग अपने अपने देश की तुलना अपने दूसरे देश भारत या पाकिस्तान से करते हैं। दोनों देशों के लोगों की राष्ट्रप्रेम से संबंधित दुनिया एक दूसरे को गालियां देने, नफरत करने व हिंसक भावनाओं की अभिव्यक्ति जैसे क्रिया प्रतिक्रिया तक अधिकतर सीमित रहती है। दोनों देशों के लोग आपसी नफरत में इस कदर धंसे हुए हैं कि जीवन का असल मायने समझने व जीने की ओर कोशिश करना तो दूर की बात यदि गाहे-बगाहे इन देशों के कुछ नागरिक कोशिश करते भी हैं तो उन्हें देशद्रोही करार दिया जाता है।

    दोनों ही देश कुंठित हैं, समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनो ही देशों के अधिकतर लोग सामंती सोच के हैं, दिखावटी व दोहरेपन की जिंदगी जीने में लिप्त रहते हैं।

    इसी सोच के मेरे एक मित्र ने कहा कि भारत पाकिस्तान में भूसा भर देगा। मैंने कहा कि हवाई लफ्फाजी करना हो तो चर्चा यहीं खतम करें। यदि कुछ हकीकत व ठोस बात करनी हो तो कुछ बात हो सकती है।

    मैंने कहा कि बांग्लादेश जब अलग हुआ था यदि उस युद्ध की बात यदि छोड़ दी जाए क्योंकि उस युद्ध में पाकिस्तान दोतरफा मार झेल रहा था और पाकिस्तान के लिए भौगोलिक परिस्थितियां कुछ ऐसी विकट थीं कि उसको युद्ध हारना ही था। बाकी जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें भारत पाकिस्तान थोड़ा बहुत कम अधिक लगभग बराबरी पर ही छूटे हैं। यदि भारत ने पाकिस्तानी इलाके कब्जाए हैं तो पाकिस्तान ने भारतीय इलाके कब्जाए हैं। दोनों तरफ के सैनिक हताहत हुए हैं जबकि भारत के पास पाकिस्तान से लगभग दुगुनी सेना है। कारगिल में जो युद्ध हुआ उसका लब्बोलुआब यह था कि भारत ने पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा कब्जाई गईं भारतीय चौकियां आदि छुड़वा लिए थे। कारगिल का युद्ध एक सीमित युद्ध था जो केवल कब्जाई गई चौकियों के इलाकों तक ही लगभग सीमित रहा।

    भारत व पाकिस्तान दोनों की ही सैन्य क्षमता विदेशों पर आश्रित है। हथियारों के आविष्कार व उनकी तकनीक का विकास भारत या पाकिस्तान नहीं करते हैं। जो हथियार मिल गए उन्हीं में कुछ छोटे-मोटे यूं कहें कि सिर्फ स्वदेशी घोषित करने के लिए दिखावटी बदलाव करके स्वयं को स्वयंभू तुर्रमखां घोषित कर लिया जाता है।

    सैनिकों की संख्या को यदि छोड़ दिया जाए तो दोनों देशों की सैन्य क्षमता में बहुत अधिक का अंतर नहीं। इतना अंतर तो कदापि नहीं है कि भारत या पाकिस्तान में से कोई भी देश युद्ध के माध्यम से दूसरे में भूसा भर दे, नेस्तनाबूत कर दे। युद्ध यदि सैनिकों की संख्या से जीते जाते होते तो भारत न अरबों का गुलाम बनता न ही डचों का गुलाम बनता न ही फ्रासीसियों का गुलाम बनता न ही पुर्तगालियों का गुलाम बनता और न ही अंग्रेजों का ही गुलाम बनता। मुठ्ठी भर आए लोगों ने भारत को सैकड़ों सालों तक गुलाम बनाए रखा। भारतीय समाज में कहीं कुछ तो ऐसी कमजोरी जरूर ही होगी जो भारत को मुठ्ठी भर लोग न केवल गुलाम बनाते रहे वरन् गुलाम बनाए रखने में सफल भी रहे।

    संभवतः उन्हीं कमजोरियों के चलते अतिसंवेदनशील व अतिसुरक्षित सेना के मुख्यालयों वाले इलाकों में भी बाहरी लोग आराम से हथियार सहित घुस आते हैं और अत्यधिक प्रशिक्षित व आधुनिक हथियार संपन्न सैनिकों की हत्याएं कर जाते हैं। लेकिन हमें ऐसा क्योंकर हुआ, इन सब बातों को देखने, समझने व सुधारने जैसे मुद्दों में धेला भर भी रुचि नहीं। हमें इन सबसे कोई मतलब नहीं।
    हमें तो पाकिस्तान को गलियाने रूपी सड़कछाप राष्ट्रभक्ति के नशे को जीना है।

    इसलिए हम अपनी सैन्य व सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमजोरियों को देखने व सुधारने की बजाय, समय-समय पर अनेक बार हो चुकी सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सामान्य व कामचलाऊ सैन्य कार्यवाही को मजा चखा दिया, बदला ले लिया, घर में घुस कर मारा, इतिहास में पहली बार हुआ जैसे वाहियात, बेहूदे व उटपटांग तरीके से महिमामंडित करते हुए अपने ही देश की छीछालेदर में जुट जाते हैं।

    भारत व पाकिस्तान दोनों मिसाइल बनाते हैं, दोनो देशों के अपने अपने मिसाइल मैन हैं जिनको महान वैज्ञानिक का स्वयंभू दर्जा दिया जाता है। दोनो देशों के अपने अपने महान परमाणु वैज्ञानिक हैं। दोनो देशों के लोगों ने विदेशों में पलायन करके अपने लिए मुकाम बनाए हैं। इन प्रायोजित व तथाकथित राष्ट्रगौरवों से इतर बहुत कड़वा व नंगा यथार्थ यह भी है कि भारत व पाकिस्तान दोनों देश भले ही कितनी शिद्दत से झूठा दावा करें कि उन्होने मिसाइल, परमाणु बम व राकेट आदि खुद ही विकसित किए हैं, लेकिन दोनो देश तकनीक की चोरी करते हैं व विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं।

    हममें इतनी भी सहज बुद्धि नहीं कि हम इस यथार्थ को स्वीकार कर पाएं कि भारत व पाकिस्तान दोनो ही देश सैन्य क्षमता पर आत्मनिर्भर नहीं। दोनों देश लंबे समय तक युद्ध नहीं झेल सकते हैं। कुछ दिनों के युद्धा के बाद ही दोनों देश चाहेंगें कि कोई तीसरा आकर बीच-बचाव करे और युद्ध रुक जाए, कोई समझौता हो जाए। अधिक समय तक युद्ध में दोनों ही देशों के पास हथियार नहीं रहेंगें क्योंकि दोनों ही देश विदेशों पर आश्रित हैं। समझौता होने के बाद दोनों देशों की सेनाएं अपने देशवासियों के सामने अपनी-अपनी पीठ ठोकेंगें, अपनी-अपनी विजय बताएंगें। ऐसा करके लोगों के अंदर आपसी नफरत को जिंदा रखेंगें। सत्ताओं के वजूद के लिए यह फरेब जरूरी भी है।

    दोनो ही देशों के अधिकतर लोगों की सोच व मानसिकता अवैज्ञानिक है तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का तिरस्कार करती है, उपेक्षित करती है। दोनो ही देश एक दूसरे के प्रति नफरत को राष्ट्रभक्ति की कसौटी मानते हैं। चूंकि दोनों देश बचकानी हरकते करते हैं। सैन्य व्यवस्थाओं पर आत्मनिर्भर नहीं हैं। इसलिए यदि किसी कारण वश समझौता न हो पाया तो यदि अपनी मूर्खतावश परमाणु अस्त्रों का दुरुपयोग कर दिया तो क्या होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इतना तो तय है कि यदि इनमें से कोई भी एक देश परमाणु का प्रयोग करेगा तो दूसरा देश करेगा ही।

    भारत के विकृत मानसिकता के लोग तो बयान दे ही रहे हैं कि कुछ परमाणु बमों के प्रयोग से कुछ प्रतिशत लोगों का ही नुकसान होगा लेकिन शेष देश तो पाकिस्तान को नष्ट होते देख सकेगा। ऐसे मानसिक विकृत लोगों की दृष्टि में व्यक्ति, समाज, देश व जीवन के मायने क्या हैं यह समझना मानवीय संवेदनशीलता व मूल्यों के परे की बात है।

    दोनो ही देशों के तंत्र अपने नागरिकों के लिए असंवेदनशील, निष्ठुर, गैरजिम्मेदार व भ्रष्ट हैं। दोनो ही देशों में अधिकतर लोग शोषित हैं। दोनों ही देशों में हंगामा करने को लफ्फाजी करने को राजनीति माना जाता है। दोनो ही देशों के नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों का चरित्र लगभग एक जैसा है। पता नहीं किस लफ्फाजी व फूहड़ता के आधार पर दोनों देशों के लोग एक दूसरे का नाम दुनिया के नक्शे से मिटाने की हवाई बात करके अपने अपने सैडिज्म को जीते हैं।

    पाकिस्तानियों से तो नहीं कह सकता लेकिन अपने देशवासियों से निवेदन जरूर करना चाहता हूं कि कोई देश व समाज लफ्फाजी व फूहड़ता व सैडिज्म से महान नहीं बनता, मजबूत नहीं बनता। देश मजबूत बनता है जब देश के लोग मजबूत होते हैं जब देश का समाज व तंत्र व ढांचा मजबूत बनता है। बनाइए अपने देश को मजबूत। जिस दिन आप अपने देश को वास्तव में बिना सैडिस्ट लफ्फाजी के मजबूत बना लेंगें पाकिस्तान जैसे सड़ियल देश की बात छोड़िए दुनिया का कोई देश अमेरिका तक भी आपसे ऊंची आवाज में बात तक करने की हिम्मत नहीं करेगा।

    दरअसल देश के निर्माण की प्रक्रिया गंभीरता व आंतरिक मजबूती से होती है। और यही गंभीरता व आंतरिक मजबूती वास्तव में असल देशप्रेम व राष्ट्रभक्ति होता है। लफ्फाजी, बकैती, ओछेपन व लुच्चई आदि से भरा सैडिज्म राष्ट्रभक्ति नहीं होती, बिलकुल भी नहीं होती।

     

    मैं अपने आपको देशभक्त मानता हूं और उन सभी को देशभक्त मानता हूं जो देश के लोगों के लिए अपना जीवन लगाते हैं, संघर्ष करते हैं, रचना करते हैं। भारत की आज जो स्थिति है उसमें हर गंभीर देशभक्त युद्ध का विरोध करेगा। मैं भी युद्ध का विरोध करता हूं क्योंकि मैं अपने देश को बनते हुए आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं।
    लफ्फाजों का तो काम ही है लफ्फाजी करना।

  • चाइनीज माल का बहिष्कार बनाम हमारी खोखली राष्ट्रभक्ति

    सामाजिक यायावर


    इधर कुछ दिनों में जब से चीन ने पानी बंद किया। जब से चीन भारत में 30 से 40 किलोभीटर अंदर आकर अपनी अस्थाई छावनी बना गया। तब से हम लोगों में चाइनीज माल का बहिष्कार करने की चुल्ल उठ रही है। ऐसा करने वालों में शातिर ओछे राष्ट्रभक्तों से लेकर भोलेभाले जेनुइन राष्ट्रभक्त तक शामिल हैं।

    दरअसल इन लोगों को लगता है कि चाइनीज माल मतलब सस्ते मोबाइल, सस्ते खिलौने, दीपावली की बिजली की लड़ियां, प्लास्टिक वाला चावल व दाल, सस्ते जूते, सस्ते कपड़े आदि है।

    इन लोगों को चाइना की ताकत का अंदाजा नहीं। चाइना सस्ते से लेकर बहुत बेहतर गुणवत्ता की चीजें बनाता है। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का महंगा ब्रांडेड सामान जैसे टीवी, फ्रिज, एसी, लैपटाप, आईफोन, महंगे मोबाइल्स, महंगे ब्रांडेड कपड़े आदि सबकुछ चीन में बनता है।

    हो सकता है कि कैनन कंपनी का कई लाख रुपए की कीमत का जो महंगा लेंस आपने अपने SLR कैमरे में लगा रखा हो वह चीन का बना हो। NIKON का तो अधिकतर सामान चीन में ही बना होगा।

    हो सकता है सैमसंग, नोकिया, आईफोन, एलजी, एचटीसी आदि महंगी व ब्रांडेड कंपनियों का जो मोबाइल आप चौड़े से इस्तेमाल कर रहे हों वह चीन का बना हो।

    हो सकता है कि आपके घर का महंगा टीवी, फ्रिज, एसी, गीजर, बाथटब, ओवन, माइक्रोवेव, कालीन, टाइल्स आदि जिसे आप अमेरिका या अन्य किसी देश का बना मानकर अपने बड़े होने के अहंकार में जीते हों, वह सामान बेसिकली चीन का बना हो सकता है।

    जिन बहुत महंगी कारों व मोटरसाइकिलों में दूसरों को अपने जूते के नीचे का आदमी समझते हुए आप घूमते हों उस कार या मोटरसाइकिल के कई या बहुत या सारे कलपुर्जे चीन में बने हो सकते हैं।

    ये जो गांव गांव में सोलर लाइट लगी होती है, यह जो आपके घर में सोलर पैनल लगा है यह चीन का बना हो सकता है या इसके कई पुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

    चौकिएगा नहीं यदि राफेल विमान में लगे कई पुर्जे या लगभग सारे पुर्जे चीन के बने हों। एयरइंडिया के जिन विमानों में आप उड़ते हैं उनके कलपुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

    जिस बहुत महंगी फ्रेंच रेड वाइन को आप पीकर खुद को विश्वस्तरीय समझते होगें वह चाइनीज ओनरशिप की हो सकती है जबकि आपने उस बोतल को खुद फ्रांस से खरीदा हो।

    ये तो खैर कुछ भी नहीं। भारत में बहुत ऐसी भारतीय कंपनियां हैं जिनको हम स्वदेशी समझते हैं जिनके उत्पादों में मेड इन इंडिया लिखा रहता है जबकि उस उत्पाद में लगा सामान चीन में बना होता है, भारतीय कंपनियां चीन के सामान को जोड़ करके (एसेंबल) करके उत्पाद बनाकर मेड इन इंडिया छाप देती हैं।

    भारत की एक बहुत बड़ी मोबाइल कंपनी है जिसका अधिकतर सामान चीन का बना होता है लेकिन उसके सामानों पर मेड इन चाइना की बजाय कुछ और भी छपा हो सकता है।

    सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर कब तक हम सड़कछाप सोच व मानसिकता को खुद से लपेटे रहेंगें। सवाल यह खड़ा होता है कि हम कब इतने इमानदार व गंभीर होगें कि हम यह समझ पाएं कि बकैती से, छिछलेपन से, छिछोरेपन से, सतहीपन से किसी समाज व देश का विकास नहीं होता, मजबूती नहीं मिलती।

    हमारा देश भारत तब मजबूत होगा जब हम ठीक से देख पाने की दृष्टि विकसित करेंगें, जब हम अपनी कमजोरियों को स्वीकारना सीखेंगें। बकैती व लफ्फाजी करना बंद करेंगें।

    टटपुंजिया दिखावटी ईमानदारी, विद्वता, समझदारी व सामाजिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर ठोस रूप में होने का प्रयास करेंगें।

    यथार्थ से मुंह मोड़कर फिजूल के फर्जी नारे देने से, बेहूदे तर्क देने से व कोरी हवाई भावुकता से यथार्थ नहीं बदलते हैं।

    सच्चा राष्ट्रभक्त वह है जो देश व समाज के निर्माण के लिए काम करे, संघर्ष करे, त्याग करे.
    न कि अपने ही लोगों को चोरी व झूठ से लूट कर या ढकेमुंदे करप्शन से अपने घर में सुविधाओं का सामान भरे, बाजार का उपभोक्ता बने, तिजोरी भरे और खुद को बड़ा आदमी मानने के बेहूदे अहंकार में जिए।

     

  • राष्ट्र के नाम पर

    भंवर मेघवंशी


    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ
    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां
    मरते रहे इन्सान
    बहता रहा लहू
    चीखते रहे चेनल्स
    प्रजा
    मनाती रही जश्न
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प
    राजा
    करता रहा राज
    इसके अलावा वह
    कर भी क्या सकता था बेचारा

    युद्ध चलता रहा
    सैनिक मरते रहे
    राष्ट्र बहुत खुश था
    जब युद्ध का उन्माद
    फैल गया पूरे राष्ट्र में
    तब राजा ने
    राष्ट्र को संबोधित किया
    राष्ट्र के नाम सन्देश दिया
    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा चुनाव
    राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया
    और राष्ट्र ही राजा
    इस तरह अवतरित हुआ
    " राष्ट्र राज्य ."

    उसके बाद
    फिर वहां
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध

     

  • अल्पसंख्यकों के लिए न्याय कहां

    प्रो० राम पुनियानी


     

     

    Justice Markandey Katju

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 26 सितंबर, 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को लिखा  ‘‘आपको तो यह पता ही होगा कि अखलाक नामक एक व्यक्ति को दादरी में कथित गौरक्षकों ने पीट-पीटकर मार डाला। इस भयावह अपराध को अंजाम देने वालों को सज़ा देने की बजाए,पुलिस और स्थानीय जज, अखलाक के परिवार के खिलाफ ही कार्यवाही कर रहे हैं…क्या पुलिस पागल हो गई है?’’

    मुहम्मद अखलाक दादरी, उत्तर प्रदेश
    दादरी, उत्तर प्रदेश

    चांद खान उर्फ शान खान को अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमले के मामले में सन 2002 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसे 11 वर्ष जेल में बिताने के बाद,बिना किसी मुआवजे के रिहा कर दिया गया क्योंकि एक अदालत ने उसे बरी कर दिया। परंतु अब उसे गौहत्या के एक मामले में मुजरिम बना दिया गया है।

    मुफ्ती अब्दुल कय्यू्म मंसूरी

    मुफ्ती अब्दुल कय्यूम अब्दुल हुसैन की एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक है ‘‘इलेविन इयर्स बिहाइन्ड द बार्स-आई एम ए मुफ्ती, नॉट ए टेरोरिस्ट’’ (सींखचों के पीछे ग्यारह साल-मैं एक मुफ्ती हूं, मैं आतंकवादी नहीं हूं)। यह पुस्तक मुफ्ती साहब के आतंकी हिंसा में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तारी, उनको शारीरिक यंत्रणाएं दिए जाने और उसके बाद, इतने लंबे अरसे तक जेल में रखे जाने की करूण गाथा कहती है। आमिर खान नाम के एक मुस्लिम लड़के को आतंकियों का साथ देने के आरोप में जब गिरफ्तार किया गया था, तब वह मेट्रिक की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। चैदह साल जेल में काटने के बाद जब वह रिहा हुआ, तब तक उसके पिता गुज़र चुके थे और उसकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं। उनकी पुस्तक ‘‘फ्रेम्ड एज़ ए टेरेरिस्ट’’ (आतंकी बताकर फंसाया गया) को पढ़ने से यह अंदाज़ा होता है कि हमारी व्यवस्था एक निर्दोष व्यक्ति के प्रति कितनी क्रूर हो सकती है।

    Hyderabad Mecca Masjid

    ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। ऐसे मुसलमान युवकों की एक लंबी सूची है जिन्हें आतंकवाद से संबंधित आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया, उनकी जिंदगी थम गई और उनके करियर व परिवार तबाह हो गए। हाजी उमरजी को गोधरा ट्रेन आगजनी मामले का मास्टरमाइंड होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कई साल जेल में बिताने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला। मक्का मस्जिद (हैदराबाद), मालेगांव समझौता एक्सप्रेस और अजमेर धमाकों के मामलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया और बाद में कोई विश्वसनीय सुबूत न पाए जाने पर रिहा कर दिया गया। इन सभी मामलों में पुलिस की जांच पूर्वाहग्रहपूर्ण और गलत थी। यह स्पष्ट है कि पुलिस, अल्पसंख्यकों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। भारत में सांप्रदायिक हिंसा के अध्येता हमें बताते हैं कि ब्रिटिश काल में पुलिस की चाहे जो कमियां रही हों, सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में वह निष्पक्षता से काम करती थी। पुलिस के अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त होने की शुरूआत, स्वाधीनता के बाद हुई और स्वतंत्र भारत में जबलपुर में 1961 में हुए पहले सांप्रदायिक दंगे के बाद से लेकर आज तक पुलिस का अल्पसंख्यक-विरोधी दृष्टिकोण और मानसिकता हम सबके सामने है। कई मौकों पर पुलिस के अलावा, राज्य तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व ने भी निष्पक्षता नहीं दिखलाई। अधिकांश जांच आयोगों की रपटें, फिल्में और डोक्युमेंट्रियां इस तथ्य को रेखांकित करती हैं। सरकारी सेवाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है और जो चंद मुसलमान उच्च पदों पर हैं, वे भी या तो धारा के साथ बहने लगते हैं या चुप्पी साध लेते हैं। अक्सर उन्हें ऐसे क्षेत्रों में पदस्थ किया जाता है जहां वे सांप्रदायिक हिंसा को रोकने या उसे करने वालों को सज़ा दिलवाने में सक्षम ही नहीं होते।

    मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों पर श्रीकृष्ण न्यायिक जांच आयोग की रपट बताती है कि किस तरह पुलिस अधिकारियों ने दंगाईयों की हरकतों को नजरअंदाज किया और कई मामलों में उनका साथ दिया। दिल्ली में 1984 में हुई सिक्ख-विरोधी हिंसा और सन 2002 के गुजरात दंगों में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। महाराष्ट्र के धुले में सन 2013 में पुलिस वाले स्वयं दंगाईयों की भूमिका में थे। हाशिमपुरा घटना पर अपनी पुस्तक में पूर्व पुलिस महानिदेशक वीएन राय ने बताया है कि किस प्रकार पुलिस ने एक ट्रक में मुस्लिम युवकों को भरा, उन्हें दूर ले जाकर गोलियों से भून दिया और फिर उनकी लाशें एक नहर में फेंक दीं। जो लोग जिंदा बच गए, वे इस भयावह घटनाक्रम को दुनिया के सामने लाए।

    World Trade Centre, USA

    अमरीकी मीडिया ने 9/11/2001 को डब्ल्यूटीसी पर आतंकी हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इस शब्द से ऐसा प्रतीत होता है मानो दुनिया में आतंकवाद के लिए केवल इस्लाम और मुसलमान ज़िम्मेदार हैं। मीडिया ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि अल्कायदा को इतना शक्तिशाली बनाने वाला अमरीका ही था। तब से हालात और खराब हुए हैं। न केवल समाज बल्कि राज्यतंत्र भी मुसलमानों को आतंकी बतौर देखने लगा है। पूरे विश्व में इस्लाम के प्रति इस तरह का घृणा का वातावरण बनाने में मीडिया और निहित स्वार्थी तत्वों की भूमिका रही है।

    जाहिर है, निर्दोष युवाओं और अन्यों को पुलिस और राज्य तंत्र की मनमानी से बचाए जाने की आवश्यकता है। पुलिस सुधारों के लिए कई आयोग गठित किए गए जिन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए कई सुझाव दिए। परंतु अधिकांश सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पुलिसकर्मियों को अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की ज़रूरत है। जिन अकादमियों और संस्थानों में पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, उनके पाठ्यक्रमों में पूर्वाग्रहों और टकसाली धारणाओं के पीछे के सच को उजागर करने वाली सामग्री शामिल की जानी चाहिए। पुलिसकर्मियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि भावनाओं में बहने की बजाए उन्हें संविधान और कानून के प्रति वफादार रहना चाहिए।

    कई नागरिक समाज संगठन इन मुद्दों पर काम कर रहे हैं। वे ऐसे लोगों के मामले उठाते हैं जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसा दिया गया है परंतु इस तरह के संगठनों की क्षमता सीमित है। ऐसे संगठनों को मज़बूत किया जाना ज़रूरी है। जो लोग झूठे प्रकरणों में लंबी अवधि तक जेलों में पड़े रहते हैं उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए और उन्हें फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों को सज़ा दी जानी चाहिए। प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उन लोगों द्वारा लिखी पुस्तकें अनिवार्य रूप से पढ़वाई जानी चाहिए जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसाया गया हो। वे राजनैतिक दल, जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी हैं, उन्हें सांप्रदायिक संगठनों को अलग-थलग करने के प्रयास करने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सांप्रदायिक दलों के हाथों में सत्ता न आए। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जिसमें न्याय और शांति दोनों हों। किसी धर्म विशेष के व्यक्तियों के साथ इस तरह के घोर अन्याय को कोई समाज और देश स्वीकार नहीं कर सकता। कोई समाज कैसा है, इसका एक मानक यह है कि वह कमज़ोर वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ न्याय करता है अथवा नहीं। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि जस्टिस काटजू के पत्र को गंभीरता से लिया जाएगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • स्वर्ण भारत पार्टी के अध्यक्ष संजय सोनवणी ने स्वच्छ शासन प्रणाली के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन राज घाट, नई दिल्ली से आज छेड़ दिया है

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    स्वर्ण भारत पार्टी के  राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय सोनवणी ने स्वच्छ शासन प्रणाली को स्थापित कराने के लिए, लगभग 100 लोगों के साथ दिल्ली में राज घाट से लेकर आई टी ओ तक पद यात्रा करके राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन छेड़ दिया है। इस पद यात्रा में पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता जैसे कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आलोक कुमार, राष्ट्रीय सह-महासचिव विद्युत जैन और राष्ट्र प्रवक्ता श्री राहुल पंडित भी शामिल हुए।

    श्री सोनवणी ने कहा कि आज महात्मा गाँधी अपने जन्मदिवस पर भ्रष्टाचार को सरकारी तंत्र के स्तर पर महामारी के रूप में बढ़ा हुआ देखकर अत्यंत दुखी होते। लचर और बीमार शासन प्रणाली से हर नागरिक कदम दर कदम प्रतिदिन ग्रसित है।

    श्री सोनवणी ने कहा कि स्वर्ण भारत पार्टी(एस बी पी ) द्वारा 26 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री श्री मोदी को एक खुला पत्र भेजा गया था जिसमें पार्टी ने पुलिस की दुगुनी और न्यायतंत्र की दस गुनी फंडिंग बढाने के लिए अनुरोध किया था। एस बी पी ने बहुत विस्तार से उपयुक्त कारणों और उद्देश्यों के साथ यह समझाया था कि उक्त तंत्रों में फंडिंग को बढ़ाना क्यों जरूरी है। पार्टी ने पत्र में भारतीय पुलिस और न्याय तंत्र की बदहाल तस्वीरें भी भेजी थी।

    एस बी पी ने प्रधान मंत्री जी को यह भी बताया कि जरूरतमंद अतिरिक्त फंड पब्लिक सेक्टर उपक्रमों के विनिवेश से आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। सरकार को व्यापार करने और बैंकों को चलाकर भारी नुकसान उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    महात्मा गाँधी जी ने कहा था “आदर्श सरकार को कम से कम शासन करने की जरूरत होती है। वह स्वराज खोखला है जिसमें सरकार आम लोगों को करने के लिए किसी व्यापार को करने का मौका ही नहीं छोड़े। ” जब लोग व्यापार को खुद चला सकते हैं तो सरकार को व्यापार में फसने की क्या आवश्यकता है। यदि जरूरी समझा जाए तो लोगों के सुचारू रूप से व्यापार को चलानें के लिए सरकार नियंत्रण करे परन्तु सरकार स्वयं सीधे व्यवसाय नहीं करे।

    श्री मोदी ने यह दावा किया है कि वो “मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस ” और “सरकार का व्यापार करने का कोई बिज़नेस नहीं है” नारों पर अमल चाहते हैं। इसके बावजूद मोदी सरकार ड्यूटी फ्री शराब और सिगरेट के धंधों में इतनी व्यस्त है की उसके पास शासन करने के लिए कोई वक़्त नहीं है। हाल ही में आई टी डी सी ने अपनी 10 वीं ड्यूटी फ्री दुकान खोली है।

    एस बी पी ने मोदीजी को लिखे पत्र में बेहद जरूरी शासन सुधारों को लागू करने के लिए निवेदन किया था, जिसमे ईमानदार लोगों को चुनाव लड़नें का मौका देने के लिए चुनावों का फंडिंग प्रति वोट के आधार पर सरकार द्वारा किये जाने और वरिष्ठ नौकरशाहों के लिए उनके नौकरी में कार्यकाल की गारंटी को समाप्त करने की बात कही गयी थी। लोक सेवकों को परिणाम देने के लिए जवाबदेही की व्यवस्था बनानी जरूरी है। भारतीय रक्षा प्रणाली को बेहद सुद्रढ़ बनाने की आवश्यकता है।

    अपनें पत्र में स्वर्ण भारत पार्टी ने यह भी कहा था “यदि आप पार्टी के निवेदनों को लागू कराने मे इच्छुक नही हैं, तब हम यह निष्कर्ष निकालेंगे कि आपकी अत्यंत आवश्यक शासन के सुधारों को लागू करने की मनसा नहीं है और आप भारत के विकास के लिए चिंतित नहीं हैं। ” सच तो यह है कि मोदीजी ने पार्टी के पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझा।

    इस कारण से पार्टी ने राष्ट्र स्तर पर भारत के लोगों के पक्ष में इन जरूरी शासन सुधारों को लागू करवानें के लिए आंदोलन छेड़ दिया है।  श्री सोनवणी नें कहा कि पार्टी इस आंदोलन को तब तक चलाएगी जब तक सभी जरूरी सुधार लागू नहीं किये जाते और सभी भारतवर्ष के लोगों से आंदोलन में शामिल होने की गुज़ारिश की।जब ये सुधार लागू हो जाएँगे केवल तब भारत पुनः सोने की चिड़िया बन सकेगा : सबसे आज़ाद, सबसे समृद्ध और सबसे ताकतवर दुनियां का राष्ट्र ।

     

  • न्यायपूर्ण मूलभूत संपत्ति अधिकार, समाज की अनिवार्य आवश्यकता

    रोशनलाल अग्रवाल


    हर आदमी अधिक से अधिक भय मुक्त अभाव मुक्त सुख शांतिपूर्ण सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीना चाहता है लेकिन हर आदमी की यही इच्छा उनमें परस्पर टकराव पैदा करती है इस टकराव पर अंकुश रखने के लिए ही हमें एक व्यापक समझोते की ज़रूरत पड़ती है जिसे हम सामाजिक व्यवस्था कहते हैं।

    मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अपनी सीमाहीन व अनंत इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरे लोगों से होने वाला टकराव ही मुख्य है और इसके समाधान का एक ही मार्ग है एक व्यक्ति की इच्छाओं की अधिकतम न्याय पूर्व सीमा निर्धारित करना।

    वैसे तो हर आदमी की सुखी जीवन की जरूरतें बहुत कम होती हैं परंतु मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य कभी भी संतुष्ट नहीं होता और भविष्य की अनिश्चितता के भय और लोभ लालच के चलते सीमाहीन संपत्ति का मालिक बनना चाहता है जो कभी भी पूरी नहीं हो सकती।

    एक व्यक्ति के संपत्ति अधिकार की सीमा ताकत या बुद्धि के आधार पर कभी निर्धारित नहीं की जा सकती बल्कि यह समानता और स्वतंत्रता मैं समन्वय करके ही स्थापित की जा सकती है जिसे हम बोलचाल की भाषा में न्याय कहते हैं व्यावहारिक दृष्टि से यह सीमा औसत संपत्ति अधिकार ही हो सकती है और किसी से समाज में स्थाई शांति की स्थापना भी संभव हो सकती है इसी से समानता और स्वतंत्रता में परस्पर कोई टकराव नहीं होगा।

    हर व्यक्ति के ओसत सीमा तक मूलभूत संपत्ति अधिकार की रक्षा करने के लिए उससे अधिक संपत्ति रखने पर रोक नहीं होनी चाहिए बल्कि उससे अधिक संपत्ति का व्यक्ति को मालिक नहीं माना जाना चाहिए बल्कि उसे समाज का कर्ज़दार माना जाना चाहिए और उससे ब्याज की दर से संपत्ति कर लिया जाना चाहिए।

    इसलिए किसी भी व्यक्ति को सीमाहीन संपत्ति का स्वामी मानकर समाज में कभी भी शांति की स्थापना नहीं नहीं की जा सकती अर्थात अमीरी रेखा का निर्माण समाज की अनिवार्य आवश्यकता है जिससे कोई समझोता नहीं किया जा सकता।

    ओसत सीमा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाकर उससे होने वाली आए हो सामूहिक आए होना ही चाहिए और इससे व्यक्ति की लोग लालच की प्रवृत्ति पर न्याय पूर्ण अंकुश लग जाने से लोगों में टकराव को खत्म करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था मैं भी निरंतर गतिशीलता आ जाएगी जिससे यह बहुत टिकाऊ और संतुलित बनी रहेगी।

    मनुष्य प्रारंभ काल से ही शांति की स्थापना का सूत्र तलाशता रहा है और अनेक प्रकार की विचारधाराएं इसका प्रमाण है लेकिन आप देख सकते हैं कि यह विचारधाराएं स्वतंत्रता और समानता के बीच न्याय पूर्ण समन्वय स्थापित नहीं कर पाई और इसीलिए अपने मूल उद्देश्य में सफल भी नहीं हो सकी।

    मुझे तो लगता है कि पूंजीवाद मार्क्सवाद समाजवाद ही नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था से भी अधिक अच्छी व्यवस्था समाज में स्थापित हो सकती है।

    इसलिए मेरा निवेदन है कि अपने अपने दुराग्रहों से मुक्त हो कर विद्वानों को इस परिकल्पना का गहरा परीक्षण करना चाहिए। समानता और स्वतंत्रता में समन्वय होने के कारण यह सोच किसी के भी विरुद्ध नहीं हो सकती।