त्रिभुवन
आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ।
महाभारत में एक एक श्लोक है : श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्ममें मरना भी कल्याणकारक है, पर परधर्म तो भय उपजानेवाला है।
आखिरी ऐसा क्या होता है कि पूंजा गोकुलदास मेघजी का गुजराती परिवार इस्लाम अपना लेता है और भारत का खंडित करके एक नया देश पाकिस्तान बना लेता है। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, इस पाकिस्तान से एक बांग्लादेश भी निकलता है। यह इतिहास की बात है। अभी समीचीन भी नहीं है, लेकिन बहुत गंभीरता से साेचने की बात है। आप जिन्ना या पूंजा परिवार को विभीषण या जयचंद कुछ भी कहें, लेकिन इस बदलाव ने भारत को बहुत क्षति पहुंचाई है।
देश में जिस तरह की चर्चा इन दिनों चल रही है और जैसे नारेबाजियां और किलेबंदियां हो रही हैं, उनमें क्या यह आत्मविश्लेषण का विषय नहीं है कि एक सुशिक्षित व्यापारिक परिवार ने महाभारत और श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को छोड़कर कुरआन की शिक्षा को अपनाया। यह प्रश्न परेशान करने वाला है। आप यह पोस्ट लिखने के लिए मुझे या धर्म बदलने के लिए जिन्ना परिवार को गाली दे सकते हैं। लेकिन मेरा विनम्र अनुराध है कि कई बार आत्मविश्लेषण और आत्मावलोकन संभवत: बहुत उपयुक्त और समीचीन होता है। आख़िर कुछ तो कारण रहा होगा कि पूंजा जैसा गौरवशाली नाम बदल गया। मीठी बाई जैसा शुद्ध भारतीय संस्कारशील नाम तिरोहित हो गया।
credits : Tribhuvan's facebook wall

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