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  • जामनगर बंगलुरु : घुटता, अटकता शहर

    संजीव कुमार शर्मा


    जामनगर भले ही गुजरात में हो लेकिन असली जामनगर तो बेंगलुरु है| वैसे बेंगलुरु का जिक्र आते ही आँखों के सामने एक मनोहारी नजारा घूम जाता है| आँखों को लुभाती हरियाली, देह गुदगुदाती ठंडी हवाएं और शहर से बाहर निकलते ही एक-से-एक नयनाभिराम दृश्य| एक तरफ सिलिकॉन क्रांति का परचम लहराती इलेक्ट्रॉनिक सिटी तो दूसरी तरफ जगह-जगह पर झीलें, बाग़, बगीचे, पेड़ों की कतारों की बीच बनी साफ़-सुथरी सड़कें मानो किसी शौक़ीन चित्रकार ने बड़े मनोयोग से इस शहर के कैनवास को अपने नायब स्ट्रोकों से गढ़ा हो|

    लेकिन हकीकत की कठोर जमीन से टकरा कर ख्वाब के शीशों पर रची गयी ये कल्पनाएँ सहज ही चकनाचूर हो जाती हैं| जैसे ही आप बेंगलरु की सडकों पर उतरते हैं ऐसा महसूस होता है जैसे पूरा शहर भयंकर दमे का शिकार है| ज्यादातर चौराहे, सड़कें, मोड़ सब जाम रहते हैं, कहीं ट्रैफिक रेंग रहा है तो कहीं ओलिंपिक में भारत की उम्मीदों की तरह एक ही जगह पर फंसा है| एक-दो घंटे किसी जाम में बिलकुल एक जगह पर ही फंसे रहना सामान्य बात है, बेहतर होगा आप अपना लंच बॉक्स, काम करने के रजिस्टर या टैब व मोबाइल में कुछ पसंदीदा मूवीज रखें ताकि इस समय में आपका मानसिक संतुलन बना रहे और आप बाल नोचते या कपड़े फाड़ते हुए अपने वाहन से बाहर न आ जाएँ|

    हाल ही में भारत के प्रमुख शहरों के वाहनों की औसत रफ़्तार का आकलन करने के लिए विभिन्न टैक्सी चलाने वाली कंपनियों के साथ एक सर्वे किया गया| उसमें जहाँ पुणे और दिल्ली ने 23 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया वहीं कोलकाता और बेंगुलुर ने क्रमशः 17 और 18 किलोमीटर प्रतिघंटा की औसत रफ़्तार के साथ अपने हालात खुद ही बयां कर दिए|

    बहुत जल्द चिकित्सा विज्ञान में एक नयी विधा का सूत्रपात होगा – ट्रैफिक जाम में फंसने से होनी वाली बीमारियाँ और उनके उपचार| नए तरह के विशेषज्ञ पैदा होंगे – ट्रैफिक सिकनेस एक्सपर्ट| अलग हॉस्पिटल खोले जाएंगे – ट्रैफिक जाम डिजीज मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल्स| योग वाले भी पीछे नहीं रहेंगे और ट्रैफिक जाम में फंसने पर करने वाली विशेष यौगिक क्रियाएं बताएंगे वह भी साक्षात पतंजलि के हवाले से| विशेष ध्यान पद्धितियां और विपासना भी बाजार में आ जाएगी, खास तौर ट्रैफिक जाम के शिकार लोगों के लिए| वह दिन दूर नहीं जब बेंगलुरु इन सब का अंतरराष्ट्रीय हब बन जाएगा, सूचना तकनीकी से भी बड़ा|

    उच्चस्तरीय नीति निर्माता, बेहतरीन इंजीनियर और वास्तुविद, अधिकारीयों की फ़ौज और राजधानी होने के कारण राजनैतिक व्यक्तित्वों का जमावड़ा, इसके बावजूद ऐसा क्या हो गया कि पिछले दस वर्षों के अंदर बेंगलुरु के फेफड़े जाम हो गए और उसके लिए सांस लेना दूभर हो गया| दमे का तो फिर भी स्प्रे हैं जिसे सूंघ कर कुछ राहत की उम्मीद होती है लेकिन यहाँ की सडकों का जो दमा है उसका तो कोई स्प्रे भी नहीं है|

    मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर हैं| एक अनुमान के मुताबिक बेंगलुरु की आबादी हर साल 10% की वृद्धि के साथ 11.5 करोड़ पार कर चुकी है| और इसके साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों को ले कर दीवानगी| मार्च 31, 2015 तक करीब 60 लाख वाहन बंगलुरु की सड़कों पर दौड़ रहे हैं| इनमे से लगभग पांच लाख वाहन महज एक साल में बढे थे| इसके बाद कितने वाहन और बढ़ गए होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है|

    यह सच है कि बाहर से आने वाले लोगों का ज्यादा होता दवाब, लगातार बढ़ती आबादी और उसकी निरंतर फैलती जरूरतों ने इस शहर पर बहुत बोझ बढ़ा दिया है लेकिन यह कोई अनपेक्षित नहीं था| यहाँ सूचना क्रांति की शुरुआत अस्सी के दशक में ही हो गयी थी नब्बे के बाद आर्थिक सुधार लागू होने बाद तो जैसे इसे पर लग गए| जब इसे सिलिकॉन वैली के रूप में विकसित किया जा रहा तभी यह स्पष्ट हो गया था कि आने वाले समय में यहाँ की आबादी बहुत अधिक बढ़ने वाली है| लेकिन उससे निबटने के लिए जो उपाय किए गए वे विस्तृत और उपयुक्त विज़न के अभाव में बोने साबित हुए| बस फौरी तौर पर किसी तरह से समस्यों से निबटने के प्रयास किए गए|

    इसी का परिणाम है कि आज सड़कें जाम हो गयीं और पर्यावरण को नुकसान हुआ वो अलग| ट्रैफिक की समस्या तो सुलझी नहीं लेकिन आधी से ज्यादा झीलें सूख गयीं, बेशकीमती पुराने पेड़ कट गए और उनकी जगह लगाए थोड़े-बहुत बाहरी पेड़ों पर घोंसला बनाते हुए परिंदे भी हिचकने लगे| सीएनजी वगैरह के बारे में कोई जागरूकता नहीं होने के कारण बेहताशा धुंआ उगलते वाहनों की कतारें बढ़ती हीं गयीं|

    मेट्रो ट्रेन यहाँ की ट्रैफिक समस्या से निबटने का एक प्रभावी उपाय हो सकती थी लेकिन घोंघे की रफ़्तार से चलती मेट्रो योजना कयामत के दिन से एक दिन पहले पूरी होगी या उसी दिन पूरी होगी कहना कठिन है| मेट्रो का काम राज्य सरकार और केंद्र सरकार के सम्मिलित उपक्रम के रूप में विधिवत रूप से अक्टूबर 2011 को शुरू हुआ| पहला चरण जुलाई 2016 को खत्म हुआ और अभी लगभग कई चरण बचे हैं| जो चरण पूरा हो चुका है उसमें भी अभी सीमित यात्री हैं क्योंकि या तो वह रूट उपयोगी नहीं है या लोगों को जानकारी नहीं है और कई लोगों को बस की तुलना में वह महँगा भी लग रहा है| अगर मेट्रो का काम युद्धस्तर पर चले, सुनियोजित ढंग से चलाया जाए, लोगों को पर्याप्त जानकारी दी जाए और किराया उपयुक्त रखा जाए तो ट्रैफिक में काफी राहत मिल सकती है| लेकिन यह मृग तृष्णा है या हकीकत ये तो आने वाला समय ही बताएगा|

    सबसे चमत्कारी रवैया इस उच्चशिक्षित, सूचना क्रांति के उद्गम और साधन-सम्पन्न शहर के नागरिकों का है| चाहे बाहर से आकर यहाँ बस गए लोग हों या यहाँ के मूल निवासी, लगता है प्रकृति के उपहार इस खूबसूरत शहर की किसी को परवाह ही नहीं है| ढेरों झीलों, खूबसूरत पहाड़ियों, अद्भुत हरियाली और मनोहारी जलवायु वाले इस शहर के नागरिकों की उदासीनता अपराध की सीमा को छूती है| ट्रैफिक का रोना रोएंगे, रोज यंत्रणा भुगतेंगे, अपने जीवन के कीमती घंटे सड़कों पर गुजार देंगे लेकिन कहीं कोई पहल नहीं करेगा, कहीं कोई कदम नहीं उठाएगा| यहाँ तक कॉलोनियों की समितियों में इस बात पर कोई चर्चा तक नहीं होती|

    चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सामूहिक, लगातार कम्प्लेन मोड पर रहना लेकिन हकीकत में कुछ नहीं करना ये हमारे जीवन की एक बड़ी महामारी बन कर आयी है| इस बात में आलोचना जैसा कुछ नहीं है बल्कि यह हम लोगों की हकीकत है| अगर हम इस महामारी से निजात पा सकें तो शायद बंगलुरु के ट्रैफिक के लिए कुछ किया जा सकता है वरना जिन्दगी तो बेशरम है ही, येन केन प्रकारेण चलती ही रहती है|

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  • छोटे उद्योग व्यवसायों को स्वच्छ शासन व्यवस्था चाहिए नाकि रियायतें या सुरक्षा, कहतें हैं स्वर्ण भारत पार्टी के अध्यक्ष, संजय सोनवणी 

    श्री सोनवणी, भारत की एकमात्र लिबरल पार्टी, स्वर्ण भारत पार्टी के अध्यक्ष ने चिंता व्यक्त की, कि भारत के छोटे उद्योग कारोबार शासन प्रणाली की गम्भीर दुष्क्रिया/अराजकता से ग्रसित है ।

    भारत में जटिल नियामक व्यवस्था है जिसमें अधूरी और गैर विद्यमान इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवस्था है। इंस्पेक्टर राज आज भी पूर्ण रूप से जीवित है और कार्य कर रहा है । हर स्तर पर भ्रस्टाचार विद्यमान है । बैंकों का राष्ट्रीयकरण समस्या का बड़ा हिस्सा हैं। जबकि राष्ट्रीय बैंकों में पूर्ण रूप से जवाबदेही का आभाव है तब भी ये बैंक छोटे उद्योगों को फण्ड के बजाय बड़ी कंपनियों को फण्ड करनें के लिए दौड़ लगातें हैं जिससे भ्रष्ट नेताओं के साथ मिलकर करदाता के फण्ड को निगल लिया जाता है । देश के करदाता के आज तक लगभग 5 लाख करोड़ अनर्जक परिसंपत्ति (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) के नाम पर सरकारी बैंकों द्वारा डकार दिए गए हैं ।

    कदम कदम पर नए कारोबार को शुरू करनें में और उसे चलानें में अड़चनें, विकट मुश्किलें खड़ी कर देती हैं । भारत आज भी दुनियां में उद्योग लगानें और व्यापार करनें में सबसे कठिन देशों में से एक है। "मेक इन इंडिया " जैसे नारों का कोई वजूद नहीं रह जाता यदि भारतीयों को भारत में उद्योग लगानें और व्यापार करनें में प्रतिबन्ध लगाया जाय। सभी सफल देशों में लघु उद्योग छेत्र ही विकास के इंजन होते हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत में इस छेत्र को बढनें ही नहीं दिया जाता है ।  जरूरत है भारतीय युवा के सशक्तिकरण करनें की, जिससे वह कारोबार को शुरू करके उसका विकास भी कर सके ।  लेकिन दुर्भाग्य है कि युवाओं को हर कदम पर रोका जा रहा है ।
     
    सफल होनें के लिए उद्योगों को सरकार से बहुत कुछ नहीं चाहिए। सरकार से उन्हें केवल उतना ही चाहिए जोकि सरकार का दायित्व है जिसमें सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था का भरोसा हो, और संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा का प्रावधान हो । इसके साथ ही सरकार जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करनें की सुविधा करे । साथ ही सरकार कीमत संकेतों को प्रशासित मूल्यों द्वारा नहीं बिगाड़े। ठीक इसी प्रकार वस्तुओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य भी समाप्त हो जाना चाहिए । व्यापार को अपनी चीज़ की कीमत रखने का अधिकार भी होना चाहिए जिससे खुले बाजार में ये व्यवसाय स्वस्थ रूप से प्रतिस्पर्धा भी कर सकें।

    लेकिन भारत में, सरकार अपनें मूलभूत जरूरी दायित्वों को पूरा नहीं करती । सच्चाई तो यह है कि सरकार छोटेव्यवसायों के साथ प्रतिस्पर्धा  करती है जैसे की सिगरेट और शराब को ड्यूटी फ्री दुकानों में बेचना और होटलों को चलानें का कारोबार करना । और शायद अपनी कमियों  को छुपानें के लिए एक विकृत रूप में , सरकार रियायतों और आरक्षण को छोटेव्यवसायों  के लिए बाटती है  । लेकिन रियायतें सचमुच में प्रोत्साहन को नष्ट करती हैं और भ्रष्टाचार को बढाती हैं। 

    व्यवसाय की आज़ादी ही समृद्धि की चाबी है। श्री सोनवणी ने बताया कि जबतक भारत की शासन प्रणाली का पूर्ण रूप से सुधार नहीं हो जाता और जबतब भारत आज़ादी की नीतियों को अपनाता नहीं है तबतक भारत का विकास नहीं हो  सकता है श्री सोनवणी ने कहा कि स्वर्ण भारत पार्टी की नीतियाँ भारत के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शासन प्रणाली का  सर्जन करती हैं जिससे सभी देशवासियों के लिए अभूतपूर्व समृद्धि हो सके ।

     छोटे व्यवसायों के सम्बन्ध में, स्वर्ण भारत पार्टी नौकरशाही की पूर्ण जवाबदेही को सुनिश्चित करेगी जिससे छोटे व्यवसायों को इंस्पेक्टरों की फ़ौज द्वारा परेशान नहीं किया जाए, लाल फीताशाही पर पूरी तरह नकेल कसी जाए , और कर्मचारियों को लेने और फायरिंग करने के अनुचित प्रतिबन्ध को हटाया जाए । इसके साथ ही हम ESIS नामांकन स्वैच्छिक बनायेगें और कर्मचारियों को निजी कंपनियों से स्वास्थ बिमा लेने की भी छूट होगी जबतक स्वर्ण भारत पार्टी की सामान्य स्वास्थ्य नीति प्रभाव में नहीं आती है ।

    श्री सोनवणी ने छोटे व्यवसायों को स्वर्ण भारत पार्टी के मैनिफेस्टो की समीक्षा करनें और सुधार के लिए सुझावों को भी आमंत्रित किया ।

  • वेजीटेबल फ्राइड वियतनामी ब्राउन राइस – विटामिन B12 व K से युक्त पौष्टिक भोजन

    सामाजिक यायावर


     

    सामाजिक यायावर का पकाया
    सामाजिक यायावर का पकाया

    सामग्री

    • वियतनामी ब्राउन राइस
    • सेलेरी
    • असपारागस
    • बक चॉय
    • स्कैलियन
    • ब्रोकली
    • गोभी
    • बंद गोभी
    • बैंगनी गाजर
    • लाल गाजर
    • पार्सली
    • चाइव्स
    • अदरक
    • जीरा
    • हींग
    • मेथी
    • प्याज
    • लहसुन
    • लौंग
    • बे-लीफ
    • पुदीना
    • काला टमाटर
    • लाल टमाटर
    • नमक
    • काली मिर्च
    • सोडियम सोया सॉस
    • राइस वाइनगर
    • आलिव ऑयल

    विधि (बनाने में कुल समय = 60 मिनट + सब्जियां काटने में जितना समय आप लें) :

    वियतनामी ब्राउन राइस इसलिए अच्छा होता है क्योंकि यह पकने के बाद स्टिकी हो जाता है और बहुत स्वादिष्ट होता है। ब्राउन राइस को प्रेशर कुकर की बजाय बर्तन में पकाइए। ब्राउन राइस को बर्तन में पकाने में कुल लगभग 45 मिनट लगता है।

    जब तक चावल पक रहा है तब तक सब्जियों को काट लीजिए।

    अदरक, जीरा, हींग, मेथी, प्याज, लहसुन, लौंग, बे-लीफ, पुदीना, काला टमाटर, लाल टमाटर, नमक, काली मिर्च को बाकी सामग्री से अलग रखिए।

    तेज आंच में आलिव ऑयल में अदरक, जीरा, हींग, मेथी, प्याज, लहसुन, लौंग, बे-लीफ, पुदीना को फ्राइ कर लीजिए फिर एक टमाटर को दो या चार टुकड़ों में काट कर काला टमाटर व लाल टमाटर को डाल दीजिए फिर कुछ मिनट बाद नमक व काली मिर्च डाल दीजिए।

    आंच को तेज ही रखिए और काटी हुई सब्जियों में से पार्सली को छोड़कर बाकी सब कुछ डाल दीजिए। तेज आंच में ही पांच-दस मिनट तक कलारते रहिए।

    अब पकाए गए ब्राउन राइस को डाल दीजिए। एक मिनट बाद राइस-वाइनगर और सोया-सॉस डाल दीजिए। कुछ मिनट तक कलारते रहिए। आंच बंद कर दीजिए। पार्सली की पत्तियां डाल दीजिए।

    परोसिए, खिलाइए, खाइए और गुनगुनाइए  ।

     

  • तस्मानिया 2016 – ओवरलैंड ट्रैक | इस्ट कोस्ट

    ग्रेगरी नॉड फ्रांस के हैं। फ्रांस के बेहतरीन संस्थान से इंजीनियरी में स्नातक हैं। ब्लाकबस्टर फिल्म “लेगो” के डिजाइनर रहे हैं। दुनिया की जानी मानी एनिमेशन मूवी बनाने वाली कंपनी में काम करते हैं। बहुत ही अच्छे फोटोग्राफर हैं। बहुत ही अच्छे चित्रकार भी हैं। लोगों की लाइफ पेंटिंग भी करते हैं। लाइफ पेंटिंग का मतलब स्त्री हो या पुरुष इनके सामने पूरी तरह से नंगे विभिन्न्न मुद्राओं में रहते हैं और ये उनका चित्र हाथ से कैनवास में बनाते हैं।

    इनकी एक शार्ट मूवी तस्मानिया के फिल्म समारोह के लिए चुनी गई है। चुनी गई फिल्म को फिल्म समारोह के कॉपी राइट आदि जैसे मसलों के कारण दिखा पाना संभव नहीं है। लेकिन उस फिल्म से मिलती जुलती दूसरी फिल्म आप यहां देख सकते हैं। यह फिल्म भी अच्छी बन पड़ी है।

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  • 1977 में अमेरिका से इंजीनियरी में PhD की – अपना जीवन आदिवासियों के लिए समर्पित कर दिया, आदिवासियों जैसे रहते हैं टुटही साइकिल में चलते हैं

    व्योम पराशर
    लेखक – व्योम पराशर, वैज्ञानिक अमेरिका

    एक हैं आलोक सागर, जिनका जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ। उच्च शिक्षा हासिल की। समाज के लिए आदिवासी बन गए। परिवार भी संपन्न और उच्चशिक्षित है, जिंदगी में कोई तनाव भी नहीं था, सफलता कदम चूम रही थी परंतु पूरी जिंदगी आदिवासियों के नाम कर दी। पैरों में रबड़ की चप्पलें, हाथ में झोला, उलझे हुए बाल, कोई कह ही नहीं सकता कि ये वही व्यक्ति है जिसे अंग्रेजी सहित कई विदेशी भाषाएं आतीं हैं। हजारों-लाखों आदिवासियों का जीवन संवार चुके हैं।

    डा० आलोक सागर, PhD अमेरिका पोस्ट डाक्टरेट, अमेरिका पूर्व प्रोफेसर, IIT दिल्ली
    डा० आलोक सागर,
    PhD अमेरिका
    पोस्ट डाक्टरेट, अमेरिका
    पूर्व प्रोफेसर, IIT दिल्ली


    प्रोफेसर आलोक सागर ने आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की। 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए।

    आलोक सागर के पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है। एक बहन अमेरिका कनाडा में तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थी। सागर बहुभाषी है और कई विदेशी भाषाओं के साथ ही वे आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आलोक सागर 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। उनका पहनावा भी आदिवासियों की तरह ही है।

    आलोक सागर ने 1990 से अपनी तमाम डिग्रियां संदूक में बंदकर रख दी थीं। बैतूल जिले में वे सालों से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। अब हजारों फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं।

    आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। कोचमहू आने के पहले वे उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में भी रहे हैं। इसके बाद 1990 से वे कोचमहू गांव में आए और यहीं बस गए।

  • गौमांस और राजनैतिक परिदृश्य – प्रो० राम पुनियानी

    2016-09-10-beef-cowपिछले दो वर्षों में दलितों और मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा की कई घटनाएं समाचारपत्रों की सुर्खियां बनीं। इनमें से कुछ, जिनमें उना, गुजरात में जुलाई 2016 का घटनाक्रम शामिल है, ने देश के संवेदनशील नागरिकों की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। इसके पहले, जून 2015 में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की इस झूठे आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी कि उसके घर गौमांस रखा था।

    आज नरेन्द्र मोदी यह कह रहे हैं कि 80 प्रतिशत गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं परंतु इन्हीं मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान इस मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया था। इसे जानने के लिए हमें केवल उनके भाषणों को याद करने की ज़रूरत है। श्री मोदी ने कहा था कि, ‘‘राणा प्रताप ने अपना जीवन गौरक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने गाय की रक्षा के लिए युद्ध लड़े और युवाओं के जीवन की कुर्बानी दी…’’। उन्होंने देश से बीफ के निर्यात को ‘‘पिंक रेवोल्यूशन’’ बताया था और उसकी कड़ी निंदा की थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो बीफ के निर्यात के लिए गायों का वध किया जाएगा।

    इसी सिलसिले में दो अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। भाजपा-शासित राजस्थान में ‘‘गौ विभाग’’ का गठन किया गया है और इसका ज़िम्मा एक मंत्री को सौंपा गया है। इसी राज्य में हिंगोनिया में स्थित एक गौशाला में उचित देखभाल न होने के कारण सैंकड़ों गायों के मरने की खबर है। यह बताया जाता है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से गौशालाओं के लिए दिए जाने वाले अनुदान में भारी कमी की गई है।

    इन सब तथ्यों से यह स्पष्ट है कि गौभक्ति, दरअसल, एक समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा फैलाने का बहाना भर है। गाय से जुड़े मुद्दों पर हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी इसलिए हुई है क्योंकि कथित गौरक्षक यह जानते हैं कि केंद्र सरकार और भाजपा-शासित अनेक राज्य सरकारें उनकी गैर-कानूनी हरकतों को नज़रअंदाज करेंगी।

    यह सही है कि संविधान में गौवंश की रक्षा के लिए प्रावधान है। संविधानसभा में ‘‘काफी लंबी बहस और चर्चा, जिसके दौरान कई सदस्यों ने गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध को संविधान के मूल अधिकारों में शामिल करने की मांग की, के बाद एक समझौते पर पहुंचा गया, जिसके अन्तर्गत गाय की रक्षा को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया गया। यह अनमने ढंग और हिचकिचाहट के साथ हिन्दुओं की भावनाओं को संविधान में जगह देने का प्रयास था।’’

    इस प्रावधान को भी धार्मिक रंग न देते हुए उसे कृषि और विज्ञान से जोड़ा गया। ‘‘राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिशेध करने के लिए कदम उठाएगा।’’

    देश के 28 में से 24 राज्यों में गायों और अन्य मवेशियों के वध को प्रतिबंधित करने वाले या उन पर किसी न किसी तरह की रोक लगाने वाले कानून लागू हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में गौवध को गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया है और इसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान किया गया है। इन कानूनों की संवैधानिक वैधता की जांच की जानी आवश्यक है और यह पता लगाया जाना ज़रूरी है कि कहीं वे देश के कुछ समूहों या समुदायों के मूल अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करते और भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा के खिलाफ तो नहीं हैं।

    बहरहाल, जहां एक ओर गौशालाओं के लिए बजट में कमी की गई है और गौ विभागों के बाद भी गौशालाओं में रह रही गायों की देखभाल में घोर लापरवाही बरती जा रही है, वहीं गाय के नाम पर मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हिंसा भी भड़काई जा रही है। गौमाता की रक्षा के मुद्दे पर हिन्दू संप्रदायवादी 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक कई तरह के आंदोलन चलाते आए हैं। स्वाधीनता के पहले तक मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, सूअर को घृणा का पात्र बताकर इस आग को भड़काने का काम करते रहे थे।

    ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जिनमें बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मंदिरों में गौमांस फेंका। जहां समाज के सामूहिक अवचेतन में गौमांस के मुद्दे को हमेशा जीवित रखा गया वहीं अब इसका खुलकर इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए किया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गाय, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण व उपयोगी पशु है। जहां गाय दूध देती है वहीं बैल का इस्तेमाल खेती में किया जाता है। परंतु बूढ़े और अनुपयोगी बैलों और गायों का भोजन के रूप में इस्तेमाल भी हमेशा से होता आया है। आदिवासियों के अतिरिक्त, दलितों, मुसलमानों और ईसाईयों और यहां तक कि उच्च जातियों के हिन्दुओं के कुछ तबके भी बीफ का प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत के रूप में सेवन करते आए हैं।

    अगर हम इतिहास की दृष्टि से देखें तो बीफ, वैदिक काल से ही खानपान का भाग था। गाय को गौमाता का दर्जा काफी बाद में दिया गया और धीरे-धीरे उसे पहचान की राजनीति का उपकरण बना दिया गया। भीमराव अंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘‘डिड हिन्दूज़ नेवर ईट बीफ?’’ में इसका खुलासा किया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘‘आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि पुरानी प्रथाओं के अनुसार, वो हिन्दू एक अच्छा हिन्दू नहीं था जो बीफ नहीं खाता था। कुछ मौकों पर उसे बैल की बलि देकर उसे खाना होता था।’’

    किसी भी बहुसांस्कृतिक समाज में खानपान की विविधता अपरिहार्य है। इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है। गांधी इस मामले में हमें राह दिखाते हैं। गौमांस के मुद्दे पर उन्होंने कहा था, ‘‘…गौमांस उनका (मुसलमान) रोजाना का सामान्य भोजन नहीं है, उनका रोजाना का सामान्य भोजन तो वही है जो देश के अन्य करोड़ों बाशिन्दों का है। यह सही है कि ऐसे मुसलमान बहुत कम हैं जो धार्मिक कारण से शाकाहारी हों। अगर उन्हें मांस, जिसमें गौमांस शामिल है, उपलब्ध होगा तो वे उसे खाएंगे। परंतु एक लंबे समय से गरीबी के कारण करोड़ों मुसलमान किसी भी प्रकार का मांस नहीं खा पाते हैं। ये तो तथ्य हैं। परंतु सैद्धांतिक प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देना आवश्यक है…मेरी यह मान्यता है कि मुसलमानों को गौवध करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए…’’

    परंतु अब सांप्रदायिक ताकतों द्वारा मुसलमानों की छवि गौवध करने वालों के रूप में इस हद तक प्रचारित कर दी गई है कि जो लोग शांति, सहिष्णुता और बहुवाद के हामी हैं, उन्हें इस मुद्दे पर मुसलमानों के प्रति घृणा के भाव को समाप्त करने के लिए बहुत मेहनत और प्रयास करने होंगे।

    मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण – अमरीश हरदेनिया
    Dr Ram Puniyani Rtd Prof, IIT Bombay
    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay
  • भारतीय समन्वय संग़ठन (लक्ष्य), अलीगढ (उत्तर प्रदेश)

    महेश गौतम
    जिला प्रभारी अलीगढ
    भारतीय समन्वय संगठन (लक्ष्य)

    IMG-20160821-WA0284दिनांक 21 अगस्त 2016  को भारतीय समन्वय संग़ठन (लक्ष्य) की जिला अलीगढ उत्तर प्रदेश की टीम ने गाँव बस्तौली (अलीगढ) में एक दिवसीय कैडर कैंप का आयोजन किया। कैडर को बहुत ही सुलझे हुए मास्टर एन.सी.आर. प्रभारी श्री गंगालाल गौतम ने कैडर में उपस्थित बहुजन समाज के लोगों को उनके इतिहास से लेकर आज लोकतंत्र में उनके अधिकारों की जानकारी दी। कैडर के मुख्य अतिथि  श्री तेजपाल सिंह ने कैडर में उपस्थित महिलाओं को अन्धविश्वास से बचने की सलाह दी। जिला अलीगढ के प्रभारी श्री महेश गौतम ने लोगों को बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया एवं जिला बरेली के कमांडर श्री अरविन्द सिंह  ने लोगों को बताया की इस देश की ईंट- ईंट में आप लोगों की IMG-20160821-WA0293भागेदारी है जो की परमपूज्य बाबा साहब भीम राव  अम्बेडकर की देन है। इसलिए हमें बाबा साहब भीम राव  अम्बेडकर के बताये हुए रास्ते पैर ही चलना चाहिए। कैडर कैंप की आयोजक बहन अनीता मौर्या ने महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा की हमें अपनी  बेटियों की शिक्षा पर जोर देना होगा ताकि  एक नये समाज की  रचना की जा  सके।

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  • गौ-सेवक बनाम गौ-रक्षक

     

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह

    लगभग दो साल पहले की बात है मैं अपनी टीम के साथ राजस्थान राज्य के कई जिलों के अनेकों गावों में जलसंग्रहण, नारीसमृद्धता, आर्थिक विकास, शिक्षा व कृषि आदि के कामों को समझने के लिए यात्राएं कर रहा था। इसी प्रक्रिया में मेरा ऐसे गावों में भी जाना हुआ जहां की जनसंख्या का 95% मुसलमान थे, इनमें से कुछ गावों में मतदाताओं की संख्या 10,000-15,000 के लगभग थी।

    ये गांव मुसलमान बहु्ल्य वाले बड़े गांव थे। मुझे व मेरे साथियों को इन गांवों के कई घरों में बहुत सम्मान व प्रेम से शाकाहारी भोजन कराया गया। इन गांवों में पानी के लिए लगभग हर घर में टांके बने हुए थे। पानी का स्रोत टांके थे। राजस्थान व जलसंग्रहण को समझने वाले भलीभांति टांकों व टांकों का जीवन से रिश्ता समझते हैं।

    इन गांवों में चलने वाले मदरसों में मैंने गौशालाएं देखीं, जिनकी देखभाल मुसलमान बंधु करते थे। मैंने पूछा कि ये गाएं कहा से आती हैं तो उनका जवाब था कि आप हिंदू भाई लोगों की गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो वे या तो हमारी गौशालाओं में गाएं छोड़ जाते हैं या उनको ऐसे ही अवारा छोड़ देते हैं। इन गौशालाओं में अपवाद छोड़कर सभी गाएं ऐसी ही थीं।

    इन गौशालाओं के चरवाहे मुसलमान थे। मैंने खुद अपनी आंखों से इन मुसलमान चरवाहों के गायों के साथ आत्मीय रिश्ते देखे। चरचाहे की आवाज पर रंभाती हुई गाएं दूर-दूर से चराई छोड़ कर विश्वास भाव के साथ चरवाहे के पास चली आतीं थीं।

    बचपन से मेरे दिलोदिमाग में यह अनुकूलता (कंडीशनिंग) घुसा दी गई थी कि मुसलमान मतलब हिंसक मनुष्य। मैं अपने जीवन में लगभग दो दशक से अधिक इसी पूर्वाग्रह में जीता रहा कि मुसलमान मतलब गाय व आदमी को काट देने वाला बर्बर मनुष्य।

    मैंने जब इन गावों के मौलवियों आदि से पूछा कि मुसलमान व गाय का यह रिश्ता मेरी समझ के बाहर है। मुझे जवाब मिला कि मुसलमान का गाय व बकरी से बहुत गहरा  आर्थिक रिश्ता है। आर्थिक रिश्ता ही हमें गाय व बकरी को संरक्षित करने व उनकी सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनका कहना था कि गाय की बजाय यदि बकरी की बात की जाए तो बकरी तो हमारे भोजन का प्रमुख हिस्सा है, बकरीद में हम बकरों की बलि देते हैं। लेकिन बकरी सबसे अधिक मुसलमान ही पालता है, बकरी की सेवा सबसे अधिक मुसलमान ही करता है।

    उनका कहना था कि प्रतिबंध लगाने से समाज पशुओं की सेवा करने के लिए प्रेरित नहीं होता है। पशुओं को यदि मनुष्य के आर्थिक लाभ व उपयोगिता से जोड़ दिया जाए तो समाज का बड़ा तबका जो गरीब होता है वह पालतू पशुओं की सेवा अपने आप करता है।

    उनका कहना था कि डेयरी की बहुत योजनाएं सरकारों की विभिन्न माध्यमों से चलती रहती हैं। लोग खूब फर्जीवाड़ा करते हैं लाखों करोड़ों रुपए की सरकारी ग्रांट व सरकारी योजनाओं के तहत बैंकों से लोन लेते हैं। एक-एक डेयरी पर कई-कई ग्रांट लेते हैं। डेयरी का अधिकतर पैसा हजम कर लिया जाता है। कुछ दिन चलाई जाती है फिर सिर्फ कागजों में चलती है या घसीट-घसाट कर चलाई जाती है। कुछ लोग डेयरी की गायों को लोगों में बांट कर खुद को महान समाजसेवी दिखाने का नीचता भरा ढोंग भी कर लेते हैं। जबकि उनसे जितना बन पड़ा उतना लूटघसोट डेयरी की योजनाओं से कर चुके होते हैं।

    उनका कहना था कि जब डेयरी के हालात यह है तो सरकारी योजनाओं व लोगों से चंदे वसूल कर चलने वाली गौशालाओं का हाल न पूछिए। उनका कहना था कि जैसे कि मुसलमान गायों को लेकर बदनाम है लेकिन हमारे जैसे लोग अच्छी गौशालाएं चला रहे हैं, गायों की सेवा कर रहे हैं जबकि हमें ग्रांट नहीं मिलती है। उसी तरह देश में कुछ लोग ईमानदारी से गौशालाएं व डेयरी भी चलाते हैं। लेकिन देश भर में डेयरी की सरकारी योजनाओं व गौशालाओं में जमकर फर्जीवाड़ा है।

    चलते-चलते ….

    cowबुंदेलखंड में स्थिति यह है कि एक गांव के लोग बंदूके लेकर दूसरे गांव के लोगों पर ताने रहते हैं ताकि दूसरे गांवों की गाएं उनके गांव में न आ जाएं। हर गांव में सैकड़ों हजारों गाएं अवारा घूम रही हैं, किसानों की फसलें बर्बाद कर रहीं हैं। किसान पूरी रात बंदूकें लिए खेतों में सोने के बाध्य हैं। किसान गायों से अपनी फसलों को बचाने के लिए बंदूकों से हवा में फायर करते हैं। गाएं हांकी जाती हैं, जहां हांकी जाती हैं वहां से वे फिर अन्यत्र हांकी जाती हैं। बस यही चल रहा है।

    पिछले दो वर्षों में सैकड़ों किसान जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी हमेशा गाएं पालते रहे, ने अपने घर में गाय रखना छोड़ दिया। इनमें से बहुतों ने तो अपनी दुधारू गाएं ऐसे ही अवारा छोड़ दीं ताकि उनके पास कोई गौ-रक्षक उगाही करने न आ जाए। कुकरमुत्तों की तरह गौ-रक्षक दल व अभियान उगे हैं।

    मेरा सुझाव है कि गाय को आर्थिक रूप से देखा जाए न कि धर्म की मजबूरी। तभी गाय का वास्तव में संरक्षण व पोषण हो पाएगा। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन गाय भी विलुप्त प्रजातियों की ओर बढ़ जाए।

    यदि देश के किसान व गरीब तबके ने गाय से अपना रिश्ता तोड़ लिया तब कोई भी ताकत भारत में गाय को विलुप्त होने से नहीं बचा सकती है।

    तय हमें करना है कि हम ढोंग करेंगें, ढपोरशंखी करेंगें या हम अंदर से ईमानदार होना चाहेंगें।

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  • मुहम्मद अकबर हुसैन पांचो वक्त नमाजी हैं, शाकाहारी हैं, हिंदू श्रद्धालुओं को पानी पिलाते हैं, मंदिरों को दान देते हैं, गाएं पालते हैं

    अकबर हुसैन (बाएं) सामाजिक यायावर (दाएं)
    अकबर हुसैन (बाएं) सामाजिक यायावर (दाएं)

    आप हैं जनाब मुहम्मद अकबर हुसैन। आप पांचो वक्त के नमाजी हैं। रोज कुरान पढ़ते हैं। जरूरतमंदों को जकात देते हैं। दशकों तक हर वर्ष पवित्र रमजान माह में बिना नागा रोजा रखते रहे हैं। आजकल व्यापार में दौड़-धूप बहुत होने के कारण रमजान में सीमित रोजा रखते हैं।

    अकबर हुसैन मुसलमान होते हुए भी शाकाहारी हैं, मांस नहीं खाते हैं, केवल अंडे खाते हैं। गाय पाल कर डेयरी चलाते हैं, बकरी पालते हैं। आजकल डेयरी व बकरी पालन को स्वावलंबित करने के लिए जोरशोर से प्रयास में लगे हुए हैं। आठवीं पास अकबर हुसैन स्मार्ट फोन रखते हैं, इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। रोज रात में यूट्यूब देखते हैं जिनमें गाय व बकरियों व खेती आदि के बारे में वीडियो होते हैं।

    आपके पूर्वज उत्तर प्रदेश राज्य से थे लेकिन अकबर साहब की पैदाइश छत्तीसगढ़ राज्य के जगदलपुर शहर में हुई। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण अकबर साहब को नौवीं कक्षा से पढाई छोड़नी पड़ी। अकबर हुसैन कहते हैं कि भारत में हिंदू व मुसलमान सभी एक हैं, अंतर केवल यह है कि लोग अलग-अलग ईश्वर को मानते हैं। इनका मानना है कि अलग-अलग ईश्वर को मानने के बावजूद प्रेम से रहना भारतीय समाज की खासियत है।

    पांचो वक्त के नमाजी अकबर हुसैन रोज कुरान पढ़ने के बावजूद मंदिरों को दान देते हैं। प्रतिवर्ष नवरात्रों में मंदिर के दर्शन करने आने वाले हजारों लोगों को पेयजल खरीद कर उपलब्ध कराते हैं। कभी कभार तो इनके द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पानी की पाउचों की संख्या दस हजार भी पार कर जाती है। अर्थात नवरात्रों में दसियों हजार रुपए मंदिर में ईश्वर के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पानी का इंतजाम करने में खर्च करते हैं।

    दंतेवाड़ा जिले मे स्थित माँ दंतेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ का सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में फुल पैंट पहन कर जाना प्रतिबंधित है। इसलिए मंदिर फुल पैंट वाले दर्शनाभिलाषियों को लुंगी उपलब्ध कराता है। अकबर हुसैन मंदिर को सैकड़ों अच्छी गुणचत्ता की पीली लुंगियाँ दान देते हैं, जिनको पहन कर श्रद्धालु लोग माता दंतेश्वरी के दर्शन करते हैं।

    अकबर हुसैन कहते हैं कि डेयरी को स्वावलंबित करने के लिए बाजार से दाना खरीदना बंद करना पड़ेगा। गायों को हरा व खेती करके उगाया जाने वाला चारा उगा कर देना पड़ेगा। इससे गायों स्वस्थ रहती हैं, पुष्ट होती हैं और उनका दूध भी बढ़ता है।

    अकबर हुसैन की डेयरी में कई प्रजातियों की गाएं हैं लेकिन उनकी योजना है कि भविष्य में केवल अच्छी जाति की देशी गाएं हों।

    बकरी-घर :

    मुहम्मद अकबर हुसैन का बकरी-घर
    मुहम्मद अकबर हुसैन का बकरी-घर

    अकबर हुसैन बकरियां भी पालते हैं। बकरियों के लिए इन्होंने बकरी-घर बनावाया है। बकरी-घर में गर्भवती व छोटे बच्चों वाली बकरियों के लिए अलग व्यवस्था है ताकि बच्चों के साथ बड़ी बकरियां मारपीट न करें। बकरियों की लेड़ी अपने आप नीचे गिरती है जिसको एकत्र करके बेच देते हैं या खाद के लिए प्रयोग कर लेते हैं। बकरियों के लिए पत्तियों वाले पौधो का रोपड़ कर रहे हैं ताकि बकरियों को बेहतर, स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन मिल सके।

    अकबर हुसैन जब गायों व बकरियों की बातें करते हैं तो इनका चेहरा चमक जाता है। घंटों बाते करते रहते हैं। गायों के रहने का इंतजाम साफ सुथरा रहता है। रोज सुबह शाम सफाई होती है। कई बार नहलाते हैं। शाम व सुबह खुले में टहलने के लिए छोड़ते हैं।

    अकबर हुसैन व सामाजिक यायावर
    अकबर हुसैन व सामाजिक यायावर

    गायों व बकरियों की देखभाल अपने परिवार की तरह करते हैं। सामाजिक मुद्दों पर तार्किक समझ रखते हैं। मुझे इनकी डेयरी व बकरी-घर को देखने का अवसर मिला, पूरा दिन साथ रहकर चर्चाएं करने का भी अवसर मिला।

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