सेवाभावी सुकमा बड्डे : अबुझमाड़ की पहली मड़िया आदिवासी नर्स

Vivek "सामाजिक यायावर"

सुकमा बड्डे अबुझमाड़ क्षेत्र की पहली मुरिया आदिवासी लड़की है जिसने स्नातक किया है। सुकमा बड्डे ने रामकृष्ण मिशन के आवासीय छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 12वीं के बाद भिलाई के संस्थान से नर्सिंग में B.Sc स्नातक किया।

सुकमा बड्डे ने अपनी इच्छा के लिए कि वह अबुझमाड़ में जरूरतमंद लोगों के लिए काम करेगी, शहर में रहकर नौकरी करते हुए आरामदेह व सुरक्षित जीवन जी पाने की संभावनाओं पर कभी विचार ही नहीं किया। विचार ही नहीं किया कि उसके पास छत्तीसगढ़ की राजधानी में घर हो सकता है, वह महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाने जा सकती है, कार खरीद सकती है, ग्लैमर का जीवन जी सकती है।

सुकमा बड्डे जो विशेष आदिवासी क्षेत्र से है, विशेष आरक्षण की सुविधा का प्रयोग करते हुए किसी शहर में नौकरी पाना उसके लिए बहुत मुश्किल नहीं था। लेकिन स्नातक के बाद इन संभावनाओं को तिलांजलि देते हुए वह अबुझमाड़ लौटी। उसने स्वास्थ्य विभाग में नर्स की नौकरी के लिए आवेदन दिया, जो भी कारण रहा हो लेकिन उसके आवेदन को स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने अस्वीकृत कर दिया।

Sukma Badde

लगभग दो वर्ष पूर्व जब टामन सिंह सोनवानी जिलाधिकारी होते हुए भी अबुझमाड़ के गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगवाते घूम रहे थे। तब सुकमा बड्डे उनसे मिली और नर्स की नौकरी की मांग की। टामन सिंह सोनवानी को बड़ा ताज्जुब हुआ जब उनको मालूम पड़ा कि अबुझमाड़ जैसे क्षेत्रों की माड़िया आदिवासी लड़की ने इतना पढ़ाई की है। उनको लगा कि उनको इस लड़की का सहयोग करना चाहिए। उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सुकमा बड्डे को नारायणपुर जिला अस्पताल में नर्स की नौकरी दिलवा दी।

नौकरी पाने के अगले दिन सुकमा बड्डे नारायणपुर जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी के पास आती है और कहती है कि वह जिला अस्पताल में नौकरी नहीं करना चाहती है वह तो अपने क्षेत्र के पिछड़े गावों की सेवा करना चाहती है।

ऐसी भावना व कार्य करने का जज्बा देखकर सुकमा बड्डे का स्थानांतरण अबुझमाड़ के गावों में कर दिया गया। सुकमा बड्डे उत्साह व जज्बे के साथ गांवों के लोगों की सेवा में लगी हुई हैं। एक ऐसी लड़की जिसने बेहतर जीवन की संभावनाओं को त्याग कर अबुझमाड़ जैसे शताब्दियों से अपवर्जित क्षेत्र में स्वेच्छा व जिद से जाकर आदिवासियों की सेवा करने का भाव रखा। उस सुकमा बड्डे को माओवादी क्रांतिकारी प्रशासन का इंफारमर कहते हुए धमकी देते हैं।

स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न रहने के कारण असमय अपनी माता को खो चुकी सुकमा बड्डे का अपराध क्या सिर्फ यह है कि वह जागरूक है, उसमें पढाई करने का जज्बा था और उसने अपने जीवन में एक निर्णय लिया कि उसको अपने इलाके में लोगों के स्वास्थ्य के लिए जीवन समर्पित करना है ताकि उसकी माता जैसा दर्द औरों को न झेलना पड़े। इस निर्णय के लिए उसने पढ़ाई पढ़ी, शहरों में नौकरी करके आरामदेह जीवन यापन करने की संभावनाओं को त्यागा। नारायणपुर जिला अस्पताल में लगी सरकारी नौकरी नहीं करने की इच्छा जाहिर की।

ऐसी सेवाभावी व दृढ़ निश्चयी लड़की को तो सलाम करना चाहिए। सुकमा बड्डे को कोटि-कोटि सलाम।

About author: 
Vivek Umrao Glendenning "SAMAJIK YAYAVAR"

He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

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