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  • “इन्तजार”

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    1.

    सह लूँगा
    तुम्हारी हर आलोचना
    गालियाँ भी ….
    आखिर इनके बीच जल कर ही तो
    फिनिक्स की तरह,
    जन्म लूँगा ….. !!
    इन्तजार करना बस !! 

    2.

    ज़िन्दगी की चक्की में
    खुद को इतना पीस दिया
    कि, ‘सच’, कुछ खोते चले गए
    बस कर रहा अब इन्तजार
    पिसने के बाद पाने का….

    3.

    मेरी राख पर
    जब पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!
    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का

    .

  • भारतीय समाज को सामाजिक सेलिब्रिटियों से खुद को बचाने की जरूरत है

    सामाजिक यायावर Social Wayfarer

    लेख की शुरुआत में ही यह कहना चाहता हूं कि मुझे मोदी जी बड़े मासूम लगते हैं और RSS (संघ) से अधिक भारतीय लोगों की चारित्रिक-नस को समझने वाला कोई और संगठन नहीं।

    फेंकना हो, झूठ बोलना हो, दावे ठोंकना हो, सेल्फी लेना हो, मीडिया का प्रबंधन करना हो, लोगों के सामने लछ्छेदार बातें बनानी हों, यात्राएं करनी हों, मैं फकीर हूं कभी भी झोला उठाकर चल दूंगा, मैं तो आप लोगों के लिए जीवन का त्याग किया हूं, जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की बजाय विरोधियों की बुराई करना, वगैरह-वगैरह …. मतलब मोदी जी के जीवन-व्यवहार के किसी मुद्दे की बात कर ली जाए।

    यदि आपको यह लगता है कि मोदी जी ही ऐसे हैं, विरले हैं, तो आप या तो मूर्ख हैं या निहायत ही धूर्त हैं या आपको मोदी जी के व्यक्तित्व की बुराई करने में सैडिस्टिक आनंद आता है। वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी की इन सभी बातों व क्रियाकलापों में एक भी बात उनकी अपनी मौलिक नहीं है। ध्यान से देखेंगे तो भारतीय समाज में इनके जैसे लोग जगह-जगह छितरे हुए मिल जाएंगें।

    मैंने 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक छोटी सी चंद लाइनों की पोस्ट की थी, कि मोदी जी भारत के लोगों के चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरी मित्र सूची के केवल एक ऐसे मित्र हैं जिन्होंने कहा था कि यदि ऐसा है तो यह चिंताजनक बात है, उन मित्र का नाम है सचिन भंडारी, भंडारी जी मोदी के बड़े प्रशंसक हैं लेकिन मेरी बात से इनको चिंता इसलिए हुई क्योंकि इनको भारत के लोगों का चरित्र का अनुमान है और यदि मोदी जी उसी चरित्र के हैं तो इनको यह चिंताजनक बात लगी।

    मोदी जी ने कैसे गुजरात को विकास के अद्वितीय माडल के रूप में प्रायोजित करके पूरे देश में अपने लिए माहौल बनाया और विकास के जनक व पुरोधा बनते हुए प्रधानमंत्री की गद्दी को सुशोभित करने तक की सीढ़ी तय की। प्रधानमंत्री बनते ही विदेश के दौरे शुरू, महंगे-महंगे कपड़े पहनना, विदेशी राजनेताओं के साथ सेल्फी लेना, खुद को महान मानते हुए नए-नए नारे देना, मन की बात करना। अधिक क्या बताना, फेसबुक की वालों को घूमिए मोदी जी के चरित्र के बारे में हजारों लोग बतियाते हुए मिल जाएंगें।

    मुझे इस बात से बिलकुल विरोध नहीं कि देश के नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को लाते बाते सुनाने, व्यंग्य कसने आदि का अधिकार नहीं। बिलकुल है, नागरिक सत्ता सौंपते हैं तो उन्हें अपने प्रतिनिधि के बारे में मूल्यांकन करने, लाते-बातें सुनाने का पूरा अधिकार है। फिर मोदी जी तो भारत के पहले ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाले राजनेता है जो स्वयं ही लोगों से कहते हैं कि यदि इतने दिनों में ऐसा या वैसा न हो तो मुझे चौराहे में जूते मार लेना।

    भाजपा के नेताओं को ही लीजिए, जब सरकार में नहीं होते तो धरना करते हैं, प्रदर्शन करते हैं, जिसकी सरकार होती है उसकी हर बात का विरोध करते हैं। वह बात अलग है कि जब खुद सरकार में आते हैं तो सरकार में नहीं होने पर जिस बात का विरोध करते थे, उसी बात को और अधिक शिद्दत के साथ करते हैं। इन सभी बातों को कोई कहे या न कहे, लेकिन सभी जानते समझते हैं। भाजपा के नेता, समर्थक व भक्त लोग भी जानते समझते हैं।

    भाजपा, संघ व मोदी जी भारतीय समाज के लोगों की सोच, मानसिकता व चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और विशेषज्ञ हैं।। लोगों के चरित्र को घुमाना-फिराना, उठाना-बिठाना, सुलाना-जगाना सभी कुछ बहुत ही बढ़िया से जानते हैं। उदाहरणस्वरूप देख लीजिए नोटबंदी को भूल गए लोगबाग।

    इस पोस्ट को लिखने का मकसद इन सब बातों की चर्चा करना नहीं है। लेकिन चूंकि इन बातों की चर्चा किए बिना आगे की बात कही ही नहीं जा सकती है, इसलिए करना पड़ रहा है। खैर आते हैं पोस्ट की असल बात पर…।

    —-

    आपमें से बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जिनको भारत के सामाजिक क्षेत्र के सेलिब्रिटियों को असल जीवन में जानने समझने का अवसर मिला होगा। अवसर भी तो तब मिलता जब आपने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर कभी कुछ करने का सोचा होता।

    मैं सामाजिक सेलिब्रिटी उनको कहता हूं, जिनको सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए नोबेल, मैगसेसे आदि जैसे पुरस्कार मिले, जो पादें या हगें या खांसे तो खबर बने या जिनकी संस्थाओं का टर्नओवर करोड़ों/अरबों का है या जो हर सप्ताह/महीना विदेश भाषण देने पहुंचते रहते हैं।

    यहां मैं उन अवसरों की बात नहीं कर रहा जो रोजगार की तलाश में या कुछ साल सेलिब्रिटियों को तेल-मालिश करके अपने लिए पहचान व लंबी ग्रांट आदि का जुगाड़ तलाशने या बनाने की देन होते हैं या इन जैसे एजेंडों से जुड़े होते हैं।

    मैं उन अवसरों की बात कर रहा हूं जिन्होंने निर्णय पूर्वक सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यों, आंदोलनों आदि को समझने के लिए इन सेलिब्रिटी लोगों के ढांचों में बिलकुल निचले स्तर पर रहकर काम करने का प्रयास किया।

    आपमें से शायद ही कोई ऐसे अवसर पाने के लिए प्रयास करता हो, गंभीर हो। ऐसा हो पाने के लिए अंदर की मजबूत सोच वाली ताकत चाहिए होती है, अहंकार की कमी चाहिए होती है। सबसे बड़ी बात समाज को नजदीक से समझने का भयंकर जज्बा व प्रतिबद्धता चाहिए होती है।

    भले ही आप जीवन व समाज को व्यवहारिक रूप से समझने के प्रति ईमानदार, गंभीर, जज्बेधारी व प्रतिबद्ध नहीं हों। लेकिन चूंकि आपमें से अधिकतर लोग तर्क वितर्क कुतर्क के विशेषज्ञ हैं और इन तत्वों को आलोचना, समालोचना जैसे खूबसूरत नामों से अलंकृत भी करते हैं। कुछ तो अपने बौद्धिक अहंकार को तुष्ट करने के लिए लंबी-लंबी पोस्ट लिख कर यह भी साबित करते हैं कि कैसे फेसबुक में बिना जमीन में कुछ किए हुए भी लिखना, बहुत बड़ा सामाजिक काम है, महानता है, सामाजिक परिवर्तन वाली प्रतिबद्धता है।  इसलिए आगे मैं जो लिखने जा रहा हूं वह आप मोटे तौर समझ ही जाएंगें ऐसी आशा मैं रखता हूं।

    आपको शायद नहीं भी पता हो सकता है कि भारत में सामाजिक प्रतिबद्ध लोग व सामाजिक क्रांतिकारी लोग कुकुरमुत्तों की तरह यहां-वहां जहां-तहां उगे हुए मिल जाते हैं।

    कोई NGO वाला होगा जिसने बीसियों साल भ्रष्टाचार व दलाली करके पैसे बनाए होगें, आदिवासी लड़कियों का यौन शोषण किया होगा, ग्रांट पाने के लिए आदिवासी लड़कियों को परोसा होगा, सरकारी विभागों को ग्रांट पाने के लिए कमीशन दिया होगा, फर्जी बिल वाऊचर लगाए होगें। वह एक दिन देश भर में घूम-घूम कर मानवाधिकारों की बात करना शुरू कर देता है, लोग हाथों हाथ लेते हैं यहां तक कि उसके नाम का रिफरेंस देते हुए खुद को जमीनी समझने के गौरव में जिएंगे और तो और अपने शोधों में भी उसकी बातों का रिफरेंस देते हैं।

    छोड़िए इन जैसे टटपुंजिए NGO वाले दुमछुल्ले लोगों को, खाने कमाने दीजिए, खुद को बड़ा आदमी मानने की कुंठा में जीने दीजिए व बैठने लायक जगह बनाने दीजिए। बात करते हैं बड़े पुरस्कारों व बड़े नामों वाले सेलिब्रिटी लोगों की।

    तो गैर-पंचसितारा व गैर सात-सितारा फार्महाउस टाइप वाले सामाजिक सेलिब्रिटी लोग शुरुआत तो जमीनी कामों से करते हैं, लेकिन मन के भीतर एजेंडा कुछ और रहता है। इसलिए किए गए कामों के लिए किसी भी जुगाड़ से मीडिया पब्लिसिटी करते हैं। मीडिया में सेटिंग करते हैं। बड़े नाम वालों के साथ जुड़ते हैं, वह अलग बात है कि पुरस्कार पाने या सेलिब्रिटी बनने के बाद उनको लतिया देते हैं। जैसे मोदी जी ने आडवाणी जी व मुरली जी को कोने में टरका दिया। शुरुआत के लिए गुजरात विकास को प्रायोजित किया।

    पुरस्कार मिलने व सेलिब्रिटी बनने के बाद काम करना बिलकुल बंद। कहीं भी कोई भी मुद्दा हो, विशेषज्ञ बनते हुए प्रेस कान्फेरेंस करते हैं, टीवी चैनल्स में ज्ञान बाटते हैं। मुद्दों को गहराई से बिना समझे जो भी समझ में आया या विरोध या समर्थन जो भी करना हुआ उसके आधार पर घुमा फिराकर लछ्छेदार तरीके से बातें बोलते हैं। मतलब यह कि काम न करने के बावजूद काम कर रहे हैं ऐसा जोरशोर से प्रायोजित करने में लगे रहते हैं। इन्हीं की तरह मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद काम बंद कर दिया, केवल काम करते हैं ऐसा प्रायोजित करने में लगे रहते हैं, इसके लिए नारे देते हैं, मीडिया का प्रयोग करते हैं, भाषणबाजी करते हैं।

    अपने मित्रों व चेले चपाटों के माध्यम से लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे करते रहने के बावजूद खुद को फकीर व समाज के लिए त्यागी महात्मा के रूप में जबरदस्त तरीके से प्रायोजित किए रहते हैं। फोटो व मीडिया का तो इतना नशा होता है कि मोदी जी की सेल्फी-दीवानगी इनके नशे के आगे बौनी है। जैसे मोदी जी अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने फेवर में रिपोर्ट्स प्लांट करवाते हैं।

    जैसे मोदी जी अपने आगे किसी को पनपने नहीं देना चाहते हैं, बिलकुल वैसे ही सेलिब्रिटी लोग अपनी संस्था में अपने आगे किसी को पनपने नहीं देते हैं। भाजपा व मोदी जी तो इस मामले इन सेलिब्रिटियों की तुलना में बहुत अधिक लिबरल व लोकतांत्रिक हैं।

    जैसे मोदी जी विदेश के दौरों में सरकारी धन खर्च करके जाते हैं। वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग ग्रांट या लोगों से मिले पैसे से विदेश के दौरों पर जाते हैं, लेकिन अपने चेले चपाटों को यह बताते हैं कि उनको विदेश से खर्चा पानी मिला था, जबकि या तो ग्रांट का पैसे का अकाउंट एडजस्टमेंट होता है या किसी भक्त के खर्चे पर या विदेश में रहने वाले चेले-चपाटों के खर्चे पर जाते हैं। बहुत ही कम बिलकुल न के बराबर ही ऐसी घटनाएं होती हैं जब सेमिनार के आयोजकों ने सच में खर्चा पानी दिया हो।

    जैसे मोदी जी अपने चेलों के बुलावे पर राक-डांस करने जाते हैं, वैसे ही सामाजिक सेलिब्रिटी लोग अपने चेलों के बुलावे पर किसी यूनिवर्सिटी में दो चार लोगों को लेक्चर देने रूपी कान्फेरेंस करने पहुंच जाते हैं। बेसिकली यह होता है हालीडे/पर्यटन ही।

    खैर कितना लिखा जाए, मोटा-मोटी यह समझिए कि मोदी जी अभी बच्चे हैं इन सामाजिक सेलिब्रिटियों के सामने। मोदी जी इन सामाजिक सेलिब्रिटियों की तुलना में कम धूर्त हैं क्योंकि मोदी जी का खाया पिया दिखता है, मोदी जी का नाम लेकर मैं यह पोस्ट लिख सकता हूं लेकिन मेरी यह औकात नहीं कि मैं जिन-जिन सेलिब्रिटियों का खाया पिया अघाया जानता हूं उनका नाम लेकर यह पोस्ट लिख पाऊं।

    रातदिन कारपोरेट को गरियाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के घर का चम्मच भी कारपोरेट के धन से खरीदा गया होता है। उनके बच्चों की नैपी, चाकलेट व पेंसिल भी कारपोरेट के पैसे से आती है। लोकतंत्र का रट्टा लगाने वाले ये सामाजिक सेलिब्रिटी लोग निहायत ही साम्राज्यवादी सोच के होते हैं।

    यदि तुलनात्मक बात की जाए तो ऊपर बताए गए किस्म के NGO वाले लोगों, प्रायोजित आंदोलनों वाले लोगों तथा सेलिब्रिटी लोगों की जिसकी जो औकात व स्तर है, उस औकात व स्तर पर ये लोग मोदी जी की तुलना में बहुत अधिक भयावह हैं, खतरनाक हैं। आप मानें या ना मानें लेकिन इन्हीं लोगों के कारण आम समाज के लोगों की मानसिकता बदलती है और देश के लोग मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनने व देश का कर्णधार अवतार मानने में गर्व का अनुभव करते हैं।

    हमारे समाज व देश के लोकतंत्र के लिए मोदी जी कोई खतरा नहीं, अपने समाज से इन जैसे NGO वालों, सेलिब्रिटी लोगों को नियंत्रित कर लीजिए, इनको ईमानदार, विशेषज्ञ व आदर्श मानना बंद कर दीजिए। मोदी जी जैसे लोगों का चरित्र अपने आप बदला हुआ ही मिलेगा। लेकिन हम आप इन्हीं सामाजिक सेलिब्रिटी लोगों के आधार पर, इन्हीं पर अंधा विश्वास करते हुए अपना माइंडसेट तय करते हैं।

    जब इतनी बात कर ही रहा हूं तो लगे हाथ यूनिवर्सिटी के छात्रों व छात्र नेताओं की बात भी कर ली जाए। अपवादों में भी अपवाद की बात यदि छोड़ दी जाए तो जिन छात्रों ने अपने छात्र जीवन में छात्रों व सामाजिक मुद्दों के नाम धरना प्रदर्शन किए होते हैं, पुलिस की लाठी खाई होती है वे सभी अपने जीवन में निहायत धूर्त, भ्रष्ट व चालबाज लोग ही निकलते हैं। दरअसल धरना करना, प्रदर्शन करना, नारे लगाना, पुलिस की लाठी खाना यह सब निवेश की तरह होता है जो या तो कैरियर के लिए होता है या फिर नाम-पहचान की वाहवाही के लिए होता है।

    अब आप कहेंगे कि नौकरशाहों के बारे में कुछ न लिखा। इस मसले पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि भारत में सामाजिक सेलिब्रिटी, राजनेता, छात्रनेता, व्यापारी आदि मने जो कोई भी जो कुछ भी करता है वह सब नौकरशाही की रची हुई दुनिया में करता है। नौकरशाह ईश्वर है, सृष्टि का रचयिता है। इनकी माया जितनी समझें उतनी ही घुसी हुई मिलेगी।

    फिर भी हर क्षेत्रों की तरह इन लोगों में भी अपवाद होते हैं। अपवादों में भी अपवाद ऐसे होते हैं जो यह सब जीवन, समाज व ढांचों आदि की समझ विकसित व जीवंत अनुभव लेकर मानसिक रूप से समृद्ध होने के लिए करते हैं। ऐसे अपवाद लोगों की तासीर आपको अलग ही दिखेगी यदि आपको व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की जरा सी भी समझ होगी और आप सभी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखते हैं, तो।

    अंत में मैं सिर्फ यह लिखते हुए कि “ये सभी लोग निकलते किस समाज से हैं”, पोस्ट को अपूर्ण छोड़ रहा हूं, आप अपनी-अपनी समझ के अनुसार स्वयं पूर्ण कर लीजिए।

    .

  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    त्रिभुवन

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    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


    फेसबुक वाल से साभार

  • इनकम, इनकमटैक्स और हमारा पोपट

    Amar Tripathi

    [themify_hr color=”red”]

    दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग बसते है :

    एक जो पैसे के लिए काम करते हैं।
    दूसरे जो अपने पैसे से काम लेते हैं।

    आप कारीगर हैं, किसान हैं, मिल या फैक्ट्री के मजदूर हैं, अध्यापक हैं, बुद्धिजीवी हैं, पेंटर हैं, कलाकार हैं, सरकारी,अर्ध सरकारी या निजी उपक्रम में कर्मचारी हैं, 

    तो जाहिर है आप पैसे के लिए काम कर रहे हैं। 

    यदि आप व्यापारी हैं या उद्योगपति हैं तो स्पष्ट है की आप अपने पैसे से काम ले रहे हैं।

    आप सभी अपनी आय के अनुसार सरकार को इनकमटैक्स भी देते हैं।

    अब सिर्फ ये समझना बाकी है कि इनकम टैक्स की व्यवस्था किस तरह उन लोगों के पक्ष में झुकी हुयी है कि जो अपने पैसे से काम लेते हैं

    और उनका पोपट कैसे बन गया जो पैसे के लिए काम करते हैं।

    अब थोड़ा इनकम टैक्स की पृष्ठभूमि में चलते हैं। 

    इनकमटैक्स ही नहीं किसी भी टैक्स की ईजाद राज्य द्वारा प्रत्यक्ष अपने खर्चे चलाने के लिए की गयी परन्तु ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान रखा गया कि इसका बोझ उनके ऊपर न पड़े जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इसीलिए टैक्स वसूली की जद में सामान्य रूप से धनिकों को ही रखने का प्रचलन रहा।

    प्राचीन रोम में केवल संपत्ति कर लिया जाता था जो कि संपत्ति (भूमि, भवन, पशुधन, गुलामो की संख्या, मूल्यवान वस्तुओं और नकदी) की कुल मूल्य का १ % वार्षिक होता था, लेकिन युद्ध के दिनों में बढ़ा कर ३% तक कर दिया जाता था। इसके अलावा दसवीं शताब्दी के चीन में ‘सिन’ साम्राज्य के ‘वैंग मैंग’ नामक सम्राट ने १०% वार्षिक तक का टैक्स लगाया लेकिन वह मात्र १३ साल चल पाया और उसके बाद आने वाले ‘हान’ साम्राज्य में फिर से पुरानी टैक्स दर लागू कर दी गयी। परन्तु इनकमटैक्स सबसे पहले लागू किया गया ११८८ के इंग्लॅण्ड में, तीसरे क्रूसेड के खर्चे पूरे करने के लिए, जब हर खासो-आम से उसकी चल संपत्ति और नकदी का १०% वसूला गया।

    इसके बाद में १७९८ के दौरान ग्रेट ब्रिटेन में ब्रिस्टल के डीन के सुझाव पर प्रधानमंत्री विलियम पिट ने प्रति पौंड २ पेन्स (तब १२० पेन्स का एक पौंड होता था) का इनकम टैक्स लगाया जिसका मकसद फ़्रांसीसी क्रांति से उपजे युद्ध के लिए हथियार खरीदना था। यही पर पिट ने ही सर्वप्रथम बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों से टैक्स वसूलने के प्रथा शुरू की। उसके समय ६० पौंड (अबके लगभग ६००० पौंड) के ऊपर की आय वालों से २ शिलिंग प्रति पौंड की दर से टैक्स लिया गया जो लगभग १०% बैठता है। हालाँकि यह टैक्स १८०१ में ख़त्म किया गया, फिर १८०३ में हेनरी अड्डिंग्टन द्वारा शुरू किया गया जो १८१६ में फिर खत्म किया गया। 

    इनकम टैक्स की विधिवत शुरुआत १८४२ के इनकम टैक्स एक्ट से हो सकी जो कि बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों वाले हेनरी अड्डिंग्टन माडल पर ही आधारित थी। हालाँकि उस समय इसका विरोध भी हुआ लेकिन धीरे-धीरे १८६१ तक इनकम टैक्स वहां की टैक्स व्यवस्था का अंग बन गया। 

    अमेरिका में भी इसी दौरान सरकार ने इनकम टैक्स लागू किया जो कि १९१३ के संशोधन के बाद वहां भी स्थायी हो गया।

    इस छोटे से विवरण से यह तो स्पष्ट है ही कि राज्य द्वारा युध्द या दूसरे आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए लगाये गए इनकम टैक्स की अवधारणा ने अंततः स्थायी रूप ले लिया, लेकिन फिर भी मूल रूप से यह टैक्स धनिक वर्ग से ही वसूला जाता था, जिनमें वही लोग होते थे जो वहुधा अपने पैसों से काम लेते थे, न कि पैसों के लिया काम करते थे। अब देखिये कि इस व्यवस्था का पोपट कैसे बना —-

    लेकिन इसके पहले जरा उनकी भी पड़ताल कर ली जाये की जो अपने पैसे से काम लेते हैं। सन १६०० तक शुद्ध और मुक्त व्यावसायिक कंपनियां नहीं होती थीं। यूरोप के कुछ देशों ने अपनी अपनी संसद के चार्टर से चंद लुटेरी कंपनियां बना रखी थीं जिनका काम दूसरे मुल्कों में जाना, व्यापारिक समझौते या युद्ध के माध्यम से उनकी संपत्ति हड़पना ही होता था, ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनमे एक थी जिसने प्लासी की लड़ाई के बाद से भारत पर अधिपत्य जमाया। उस समय भी कंपनियों में सरकार की कोई सीधी आर्थिक भागीदारी नहीं होती थी लेकिन परोक्ष रूप से उन पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

    विस्तृत इतिहास में न जाते हुए केवल इतना बताना प्रासंगिक होगा कि धनिक वर्ग शुरू से राज्य सत्ता का सहयोगी तो रहा है लेकिन राज्य सदैव उसे नियंत्रण में भी रखता रहा है, जिससे एक तनावपूर्ण संतुलन सदैव बना रहता था …और इसी संतुलन की वजह से देशों की आतंरिक आर्थिक प्रगति भी संभव हो सकी। ग्लेडस्टोन के ज़माने में १८४४ में आये कानून के माध्यम से ही आधुनिक व्यापारिक प्रतिष्ठानो का गठन संवैधानिक रूप से संभव हुआ। अमरीका में भी यह प्रक्रिया सबसे पहले न्यू जर्सी में १८९६ में शुरू हुयी। इसके बाद हुए अनेक कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से हिस्सेदारी के स्वरूप तय किये गए और कंपनियों को स्वतन्त्र वित्तीय इकाई के रूप में प्रतिष्ठा मिली ।

    इसके बाद लगभग आधे दशक तक कम्पनियाँ बनी, शेयर निर्धारण के तौर तरीके, उनके बाजार विकसित हुए और साथ ही विकसितहुए विविध मैन्युफैक्चरिंग उद्योग, जिसके बल पर चारों और तमाम नयी-नयी वस्तुओं के ढेर लग गए और हम अपने को अत्यंत प्रगतिशील समझने लगे । वस्तुतः हमारी प्रगतिशीलता विचारों से फिसल कर वस्तुओं में केंद्रित होने लगी थी । इसके बाद १९५० के दशक में सरकार पर कंपनियों पर से नियंत्रण कम करने के लिए दबाव की मुहीम शुरू हुयी, और सफल भी हुयी जिसकी चर्चा हम अर्थसत्ता-१ व २ में कर चुके हैं।

    यूरोप में औद्योगिक विकास के साथ ही गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़नी शुरू हो गयी थी और उसी के साथ विकसित हुयी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, जिसमे राज्यसत्ता ने, टैक्स द्वारा प्राप्त धन को गरीबों और निर्बलों की स्थिति सुधारने में भी व्यय करने की योजना बनायी और इनकम टैक्स बढ़ती आय पर बढ़ती दर के हिसाब से ही लगाया, जो सर्वथा न्याय सांगत जान पड़ता था, और वास्तव में था भी।

    इसी के साथ उन लोगो ने —जो पैसे से काम लेते हैं, अपनी हैसियत के अनुसार, छोटी बड़ी कम्पनियाँ बनानी शुरू कर दीं। अत्यंत छोटी हैसियत की मालिकाना हक़ वाली कम्पनियाँ भी खूब बनी। साथ में आय को पारिभाषित करने का फार्मूला ऐसा विकसित हुआ जो कि ‘पैसे से काम लेने’ वालों के हक़ में था; और वही आज भी लागू है।

    फर्क यही से शुरू होता है—– किसी कंपनी की आय, उसे प्राप्त कुल व्यापारिक भुगतान में से सारे खर्चे काट कर बची हुयी राशि को माना जाता है, जब कि किसी व्यक्ति को उसके श्रम के बदले मिले हुए सकल भुगतान को। अब टैक्स का निर्धारण तो आय पर ही होना है।

    नतीजा—

    आज हर वेतन भोगी पैसे कमाता है, पहले टैक्स अदा करता है उसके बाद खर्च कर पाता है। 

    जब कि हर व्यवसायी पैसे कमाता है, पहले जी भर खर्च करता है,खर्च के वाउचर जमा करता है फिर बचे हुयी राशि पर टैक्स अदा करता है ।

    यानि की जो कर व्यवस्था सामान्य और निम्न वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए बनायी गयी थी वह उन्ही की आय में कटौती का वायस बन रही है, जब कि व्यावसायिक वर्ग/धनिक वर्ग के जीवन यापन के स्तर पर इसका तनिक भी प्रभाव नहीं है।

    हो गया न हमारा पोपट !

    अब इसमें बढ़ती मुद्रा स्फीति के अनुपात में टैक्स स्लैब का न बढाया जाना और कोढ़ में खाज का काम करता है।


    Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2016/12/blog-post.html

  • माओ त्से-तुंग वाले मसले पर एक और उठापटक-बेबाक-लेख – जो गंभीर हैं, लोकतांत्रिक दृष्टि रखते हैं, उनको लेख खराब न लगेगा

    सामाजिक यायावर

    भारत में कस्बाई व शहरी लोग अंग्रेजी भाषा को पहली कक्षा से पढ़ना शुरू कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छठवीं कक्षा से अंग्रेजी शुरू होती थी। अब तो खैर हर गली नुक्कड़ में अंग्रेजी मीडियम व तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खुल गए हैं। पहली कक्षा से बारहवीं तक अंग्रेजी भाषा-विषय के रूप में साथ चिपकी रहती है। स्नातक में भी अंग्रेजी भाषा को सामान्य विषय की तरह उत्तीर्ण करना पड़ता है। इंजीनियरी जैसी प्रोफेशनल डिग्रियों की पढ़ाई तक में अंग्रेजी एक विषय की भांति चिपकी रहती है, वह भी तब जबकि डिग्री की पढ़ाई लिखाई तो अंग्रेजी में ही होती है।

    अंग्रेजी हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में भी समाहित है। गावों के निरक्षर लोग भी अपनी भाषा में बिना जानकारी के अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अंग्रेजी हमारे सामाजिक जीवन में रचीबसी हुई है। जो अंग्रेजी बोलता है उसको संभ्रांत व योग्य मान लिया जाता है। अंग्रेजी में संभ्रांतता, योग्यता, क्षमता व शक्ति निहित मानी जाती है।

    इतना सब होने व बचपन से पढ़ाई पूरी करने तक मतलब लगातार कम से कम लगभग 15 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ने बोलने व लिखने के बावजूद गंभीर अंग्रेजी को पढ़ने समझने बोलने व लिखने में अच्छे-अच्छे पुरोधा पानी मांगते हैं, जबकि अंग्रेजी बहुत समृद्ध व परिष्कृत भाषा नहीं है। जो अंग्रेजी से स्नातक, परास्नातक किए होते हैं उनकी भी हालत कमोवेश ऐसी ही होती है। अपवादों की बात अलग है, अपवाद नियम बनाते भी नहीं हैं।

    आप माओवाद, माओ, साम्यवाद पर बात कीजिए। JNU के लोग मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए आ जाएंगें। उनमें से बहुतेरे तो फूहड़ तरीके से धमकाएंगे कि JNU के हैं इसलिए चीन, माओ, माओवाद, साम्यवाद को समझते हैं। भिनभिनाते हुए आपके साथ सड़कछाप, सड़ियल, सतही, बेशर्म व बेहूदा व्यवहार करेंगे, शाब्दिक गुंडई करेंगे।

    JNU छोड़िए जो JNU की कैंटीन में जाकर चाय पी लेता है, जो उसकी चहारदीवारी को छू लेता है या कभी उसकी बाहरी दीवारों में सटकर पेशाब भी कर आता है वह भी अपने को विचारक, चिंतक, विद्वान व सामाजिक मसलों का विशेषज्ञ मान लेता है।

    इसलिए JNU या JNU के जैसे ठेकेदारों से मेरा फिलहाल इतना ही कहना है कि गंभीर बात कीजिए। JNU एक बौद्धिक सामंतवादी संस्थान है। कोशिश कीजिए कि JNU-वादी सामंती सोच से बाहर आकर आदमी की तरह बात कीजिए, तहजीब व तमीज से बात करने का प्रयास कीजिए।

    JNU भारत को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य, मानवाधिकार आदि मूल्य सिखाता है, भारत के लोगों को जीवन जीना JNU सिखाता है, इस प्रकार की नीचता पूर्ण अहंकार से बाहर आकर अपनी बात रखिए।

    आपके व्यवहार से ही JNU का स्तर साबित होता है। पिछले लगभग दो दशकों में, अपवाद प्रतिशत लोगों को छोड़कर JNU के लोगों से बातचीत व चर्चाओं के बाद ही मैं JNU को एक रद्दी यूनिवर्सिटी मानने के नतीजे पर पहुंचा हूँ।

    समय समय पर JNU के ऊपर कई लेख लिखता रहा हूं। आपके अनुसार आपको शोध करने व रिफरेंसेस खोजने की क्षमता योग्यता व धैर्य तो है ही, मेरे इन लेखों की लिंक खोज सकते हैं, सामान्य आदमी हूं लिंक्स बहुत सरलता से मिल जाएंगीं। फेसबुक के कारण ये लेख मैंने बस यूं ही प्रथम दृष्टया ही लिखे थे। चाहेंगे तो गहराई से लिख कर भी आइना दिखा सकने की क्षमता व योग्यता रखता हूं। लेकिन यह सब ऊर्जा बर्बादी है।

    मान लीजिए यदि आप JNU के भी हैं और यदि आपने JNU में चीनी भाषा पढ़ी है, माओ से संबंधित साहित्य भी पढ़ा है तब भी आप अपनी बात सहजता से ही रखिए। ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको आगे की पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ना पड़ेगा।

    पहली बात तो यह है कि चीनी भाषा वर्तमान युग की भाषाओं की सबसे क्लिष्ट, समृद्ध व परिष्कृत भाषाओं में से है। वास्तव में यदि ध्यान से देखा जाए तो चीनी भाषा जैसी कोई भाषा है भी नहीं। चीन में कई भाषाएं हैं लेकिन चीनी भाषा जैसी कोई भाषा नहीं है।  फिर भी आपके JNU-सामंती-बौद्धिक अहंकार की तुष्टि के लिए मान लेते हैं कि चीन की भाषा एक ही है, उसका नाम चीनी-भाषा ही है और आपने JNU से स्नातक/परास्नातक में चीनी भाषा पढ़ी है। आपकी सहूलियत के लिए वह सब भी जो “नहीं है”, उसको “है” ऐसा मान भी लेते हैं तब भी …..

    जब बचपन से पहली कक्षा से हर साल प्रमुख विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ते हुए, स्नातक परास्नातक में, कम्पटीशन की तैयारी करते हुए, इंजीनियरी आदि जैसे कोर्सेस की किताबें अंग्रेजी में पढ़ते हुए, अंग्रेजी फिल्में देखते हुए, अंग्रेजी अखबारों को पढ़ते हुए, सड़क में चलते हुए अंग्रेजी के होर्डिंग्स को देखते हुए, अंग्रेजी जैसी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते तो चीनी भाषा जैसी क्लिष्ट, समृद्ध व परिमार्जित भाषा के विद्वान आप महज दो चार वर्षों में ककहरा टाइप सीखते हुए कैसे हो सकते हैं। फिर चीन में कई प्रमुख भाषाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं।

    भाषा के संदर्भ में एक जरूरी बात और कहना चाहता हूं। जिस भाषा या जिन भाषाओं के संपर्क में बच्चा अपने पैदा होने के दिन से रहता है, वही भाषाएं जीवन भर उस बच्चे की मौलिक भाषाएं होती हैं, भाषाओं के नुक्ते समझ आते हैं, साहित्य समझ आता है।

    पहले हिंदी को ही ठीक से समझना सीख लीजिए, चीनी भाषा पर अपनी विद्वता व विशेषज्ञता की चर्चा फिर कभी कर लीजिएगा, अभी उचित अवसर नहीं है।

    अब JNU के माओ-भक्तों व गैर-JNU के माओ-भक्तों से जो यह मानते हैं कि उनने माओ के बारे में पढ़ा है उनके बारे में भी कुछ खरी-खरी दो टूक बात कर ली जाए। 

    ये लोग इस गलतफहमी में रहते हैं या अपनी कंडीशनिंग के कारण मूर्खता में विद्वता देखते हुए गलतफहमी प्लाँट करते रहते हैं कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश (ये लोग इनको साम्राज्यवादी देश कहते हैं) माओ त्से-तुंग के विरोध में सूचनाएं प्लांट करते हैं।

    इन लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि जनाब आपके भगवान माओ त्से-तुंग ने जैसा भी चीन बनाया है वह बहुत ही वीभत्स-कारपोरेट साम्राज्यवादी देश बनाया है। आपके माओ का चरित्र साम्राज्यवादी था, चीन देश को निहायत ही बर्बर चरित्र का कारपोरेट ही संचालित करता है। चीन का कारपोरेट साम्राज्यवादी देशों के कारपोरेट की तुलना में ज्यादे केंद्रित सत्ता रखता है।

    अपनी सोच, मानसिकता की कंडीशंडनिंग व एक्सपोजर के छोटे-छोटे कुंठित दड़बों से बाहर निकल कर दुनिया को उसकी मौलिकता के साथ बिना पूर्वाग्रहों व अनुमानों के देखने समझने का प्रयास कीजिए। चीन व माओ का यथार्थ समझ पाने की दृष्टि आनी शुरू हो जाएगी। लोकतंत्र बेहतर लगने लगेगा। लोकतंत्र को परिमार्जन की ओर ढाला जा सकता है, माओवाद को कतई नहीं। हिंसा व बर्बरता में परिमार्जन की कोई संभावना नहीं होती, हो ही नहीं सकती।

    जैसे भारत कागज में लोकतांत्रिक देश है लेकिन असल में लोकतांत्रिक देश नहीं है, भारत के लोग अभी लोकतांत्रिक मूल्यों का ककहरा भी नहीं समझते हैं। वैसे ही चीन कागज में साम्यवादी व्यवस्था के देश है लेकिन असल में वीभत्स व बर्बर कारपोरेट साम्राज्यवादी देश है। अब इस बात के लिए रिफरेंस मांगने की मूर्खता न कीजिएगा। क्योंकि यह समझने की बात है, महसूस करने की बात है, एक्सपोजर की बात है, दृष्टि की बात है।

    जो चीन सत्ता के लिए माओ के निर्देशन में अपने ही 7 करोड़ लोगों की हत्या कर सकता है। जो चीन 1989 में अपने ही छात्रों के शांतिप्रिय आंदोलन के खिलाफ कई लाख सैनिक उतार सकता है और चारों तरफ से घेर कर हजारों मासूम छात्रों की हत्याएं कर सकता है।

    वह चीन आपकी यूनिवर्सिटीज में साहित्य, दस्तावेजों व किताबें नहीं प्लांट नहीं करेगा। इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं आप। इसलिए प्लांटेड किताबों व दस्तावेजों के दम पर कूदिए मत। वास्तव में जानने समझने महसूस व दृष्टि विकसित कर पाने के विभिन्न स्तरों पर स्वाध्याय कीजिए, तभी कुछ गंभीर चर्चा कर पाने लायक दृष्टि रख पाएंगे।

    जरूरी नहीं कि सभी लंपट ही हों, सभी खोखले ही हों, सभी सतही ही हों। दुनिया में गंभीर लोग भी हैं, दृष्टिवान लोग भी हैं, ऐसे लोग भी हैं जो सामाजिक मसलों को गहराई से भेद कर देख व समझ लेने की क्षमता व दृष्टि विकसित कर लिए होते हैं।

    चीन व माओ के ऊपर चीन के ही गंभीर चिंतक लोगों ने चीन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने समझने, चीन के समाज को नजदीक से जानने समझने के बाद निष्पक्ष भाव से अच्छी किताबें लिखी हैं। यदि आपकी पहुंच, हैसियत व औकात है, इन किताबों का इंतजाम कर पाने की तो इनको पढ़िए। कुछ नहीं तो कम से कम चीन के दूसरे चेहरे का अंदाजा होगा। चीन के लोगों की वैचारिक विभिन्नता के बारे में पता चलेगा।

    जो चीन शांति प्रदर्शन को रोकने के लिए लाखों सैनिक उतार देता हो, जो चीन भविष्य में आंदोलनों की संभावनाएं के भ्रूण को भी खतम करने के लिए अपने ही हजारों मासूम युवा छात्रों को चारों तरफ से घेरकर गोलियों से भून कर हत्याएं करता हो।

    वह चीन स्वतंत्र किताबें व दस्तावेज लिखने की इजाजत देता होगा, इस बचकानी कल्पना को सच मानने वालों के वैचारिक स्तर पर चर्चा करना भी ऊर्जा बर्बादी है। JNU, माओवादी समर्थक, माओ-भक्त व साम्यवाद-माओवाद को एक ही मानने वाले चीन की प्रायोजित व प्लांटेड किताबों, साहित्य व दस्तावेजों के मायाजाल व कंडीशनिंग में सच कितना व किस स्तर का जानते समझते होगें, इसका अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं।

    चलते-चलते :

    जो माओ व माओवाद का समर्थक/भक्त है, वह ढोंग चाहे जैसा करे तर्क चाहे जो दे लेकिन अपने वास्तविक चरित्र में निहायत ही हिंसक, बर्बर, फरेबी, झूठा व रक्तपिपाशु है।

    .

  • गधा पचीसी

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    मैं एक गधा हूँ
    चाहूँ तो कुछ भी बन सकता हूँ
    चुनाव में खड़ा भी हो सकता हूँ
    किसी योग्य उम्मीदवार को हरा कर
    जीत भी सकता हूँ

    फिर मंत्री भी बन सकता हूँ

    फिर एक दिन
    इस मुल्क का प्रधानमंत्री भी
    मैं एक गधाहूँ
    अपने मालिक का बहुत वफादार हूँ
    इसलिए तो नहीं किसी बातसे शर्मशार हूँ
    फिर क्या कुछ भी बनसकता हूँ

    अगर कुछ लिखने आता हो
    तो अखबार में
    आता हो कुछ बोलने उटपटांग
    तो टी वी का पत्रकार
    भी बन सकताहूँ

    तेल मालिश की कला में अगर हूँ
    निपुण
    तो सम्पादक भी बन सकता हूँ

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए हाँ में हाँ मिलाने की कला अच्छी तरह जानता हूँ
    हुक्म तामिल करने आता हो
    अगर १८० फीटका तिरंगा लहरादूँ
    तो किसी विश्विद्यालय का कुलपति भी बन सकता हूँ .

    मैं एक गधा हूँ
    लेकिन जन्म से नहीं
    बल्कि डिग्री से
    इसलिए कुछभी बन सकता हूँ
    किसी अकेडमी का अध्यक्ष
    फिर क्या पुरस्कार भी झटक सकता हूँ

    बहुत सरे गधे हैं
    इस मुल्क में
    उनमे एक मैं भीहूँ
    गधों के मेले में हूँ
    खड़ा
    बिकने के इंतज़ार में

    ढेन्चू ढेन्चू कर सकता हूँ मैं
    किसी के प्यार में

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए आप यह न कहें
    यार इस उम्र मे
    आखिर
    तुम भी क्या करते हो
    इसतरह
    गदह पचीसी


    फेसबुक वाल से साभार

  • सामाजिक सुरक्षा अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिले

    आज दिनांक 23 फ़रवरी 2017 को बिहार चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स पटना के सभागार में असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन के द्वारा सामाजिक सुरक्षा अधिकार अभियान  के तहत राज्य अस्तर पर विमर्श सभा का आयोजन किया गया इस मौके पर मनानिये दुलाल चाँद गोस्वामी पूर्व शर्म संसाधन मंत्री, श्री विद्यानंद विकल पूर्व अध्यक्ष अनुसुचित जाति योग, श्री बिन्देश्री सिंह राष्ट्रीय शरीक सघ के अध्यक्ष, श्री दुनु राय साझा मंच दिल्ली अवम असंगाथिक छेत्र कामगार संगठन के 28 जिलो के पर्तिनिध, सौरभ कुमार एक्शन एड रुपेश कुमार भोजक का अधिकार अभियान बिहार, कपिलेश्वर राम अध्यक्ष दलित अधिकार मंच, राकेश सचिव बिहार विकलांग अधिकार मच, आश्र्फी सदा अध्यक्ष मुसहर विकास मच, महफूज़ आलम अध्यक्ष जन अधिकार पार्टी पटना विश्वविध्यालय रंजम कुमार निदान संस्था, राकेश त्रिपाठी सदस्य नासवी अवम अनन्य जन संगठन के पर्तिनिधि इस विमर्श सभा में शामिल हुए।

    कार्यकर्म के शुरवात में संगठन के राज्य संयोजक विजय कान्त ने बिहार के असंगाथिक क्षेत्र के कामगारों की समस्यावो वो मुद्दों पर विचार प्रकट करते हुए असंगठि कामगारों के हक़ में नागरिक मांग पत्र के 18 सूत्री मानगो को पढ़ कर सदन में प्रस्तावित किया. संगठन के रन निति व वैचारिक सलाहकार पंकज श्वेताभ ने बिहार में असंगाथिक क्षेत्र कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा की असंगठित कामगारों के हक़ में बने इस अधिनियम को बिहार सरकार लागु करने में अनदेखी कर रही है, उक्त अधिनियम के मुताबिक राज्य नियमावली का निर्माण नहीं हुआ, बिहार राज्य अस्तर पर सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन नही हुआ, असंगठित कामगारों का निंधन व यूनिक नंबर युक्त स्मार्ट कार्ड को अब तक निष्पादन कार्य सरकारी अस्तर से नही किया गया, बिहार के प्रतेक जिला स्तर पर अबतक श्रीमिक सुचना संसाधन केंद्र की स्थापना भी नही हुआ. इन संदर्भो में उन्होंने नागरिक मांग पत्र का हवाला देते हुए कहा की देश के 94% व बिहार में 96% असंगठित क्षेत्र के दायरे में कामगारों के हक़ में संवैधानिक संसोधन कर सामाजिक सुरक्षा अधिकार को मौलिक अधिकार  के अंतर्गत सम्मान पूर्ण जीवन जीने का अधिकार के रूप में मान्यता दिलाने, असंगठित कामगारों के हित में राष्ट्रीय व राज्य सरकारों के वित्तय बजट का 10% हिस्सा का प्रावधान होना चाहिए, न्यूनतम मजदूरी के सिधांत का समीक्षा बर्तमान के महंगाई दर को ध्यान में रखते हुए नयी निति बननी चाहिए ताकि श्रमिको को उनका श्रम का उचित व सम्मान पूर्ण मूल्य प्राप्त हो, विशाल असंगठित संगार तबके के हित के लिए नोटी व योजना तथा राज्य व राष्ट्र की अर्थव्यस्था को मजबूत करने हेतु राज्य स्तर पे श्रमिक आयोग का भी गठबं करना आवश्यक है साथ ही वृधा, विधवा, विकलांग पेंशन योजना के तहत लाभुको को कम से कम पांच हज़ार रुपया या न्यूनतम मजदूरी का पचास फीसदी मासिक दर के हिसाब से मिलने का प्रावधान होना चाहिए ताकि वे सभी सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार को सही मायने में जनहित में दिखे. इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए सभागार में उपस्थित विभिन्न जन्संगाथानो अवम ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों से अपील किया की पुरे प्रदेश में सभी असंगठित कामगारों को न्याय दिलाने के लिए सामाजिक सुरक्षा अधिकार अभियान को जन व्यापी अभियान बनाने हेतु आगामी समय में अपनी एकजुटता दिखाए. इस अवसर पर उपस्थित एटक के उप महासचिव गजनफर नवाब में सभी को उत्साहित करते हुए संगठन के द्वारा प्रस्तावित पंग पत्र को जायज बताते हुए बिहार में एक बड़ी जन अन्दोलन का आगाज़ को अंजाम देने की अपील की. इस मौके पे उपस्थित दुलाल चंद गोस्वामी एवं विद्यानंद विकल ने संगठन के दुवारा मांग पत्र को समर्थन करते हुए कहा की यह जन आन्दोलन बिहार से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर पर एक महासम्मेलन का आयोजन भी हो ताकि किन्द्रिय सरकार इन प्रस्तावों के आलोक में असंगठित कामगारों के हित में नये सिरे से एक विशेष निति, अधिनियम 2008 का संसोधन हो तथा सामाजिक सुरक्षा अधिकार को संवैधानिक संसोधन के उपरांत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिले. इस कार्यकर्म के आयोजन में संगठन के अजय कुमार, अभिषेक कुमार, सुनील बासु, नीलम,आदि ने मुख्य भूमिका निभाई।

     

  • मेरी खुराक है गलत का विरोध

    Neelam Basant Nandini

    [themify_hr color=”red”]

    मेरी ख़ुराक है
    गलत का विरोध
    शक्ति है..
    मैंने खुद अर्जित की है

    बदले में मतलबी, घंमडी, आलसी
    और बुरी लडकी के खिताब पाए हैं..

    अभी भी पूरी शक्ति से विरोध नहीं कर पाती
    रिश्ते, मान-सम्मान
    आड़े आ जाता है
    अक्सर एक संस्कारी लडकी से
    पराजित हो जाती हूँ मैं..

    नौ गज लंबी ज़ुबान
    चपड़ चपड़ चलती है
    औरत जात को इतना नहीं बोलना चाहिए

    मेरी दूर की दीदी की आँख डैमेज कर दी
    उन लोगों ने
    इतना भी मुँह नहीं चलाना चाहिए था उनको
    तो क्या हुआ उनकी माँ को वैश्या बोल दिया तो….
    पति/सास से बराबर ज़ुबान नहीं लड़ानी चाहिए थी…

    पर कोई कीड़ा है
    मेरे अंदर.. मेरी दूर की दीदी और उन जैसी कइयों के अंदर.. https://remotepilot101.com
    चुप्प नहीं रह पाता
    बोलता है.. बहुत बोलता है
    जब तक खुद पर लगे आरोप खारिज़ नहीं कर देता..
    बोलता जाता है…

    ये बोलना या मुंह चलाना
    एक तरह से मजबूत पकड़/रस्सी है
    जो अवसाद के कुँए में नहीं गिरने देती
    जो न बोला तो धम्म से डिप्रेशन…!!

    बोल बोल के अपने हक में लड कर
    हल्की हो लेती हैं…
    हम बदजुबान लड़कियाँ
    इसीलिए टिकी रहती हैं

    .

  • अखिलेश यादव और उत्तरप्रदेश

    Vivek सामाजिक यायावर

    मुझे नहीं पता कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा, किसकी सरकार बनेगी किसकी नहीं बनेगी। यूं लगता है कि जिस तरह लोकसभा चुनाव में लोगों का माइंडसेट स्विंग हुआ था, यदि वैसी पुनरावृत्ति होती है तो “बसपा+भाजपा” की सरकार बनेगी।

    यदि यह पूछा जाए कि मेरी इच्छा क्या है तो मेरी इच्छा अखिलेश जी को एक बार और मुख्यमंत्री के रूप में देखने की है। मैं किसी राजनैतिक पार्टी का नहीं हूं। भारत से दूर आस्ट्रेलिया में रहता हूं यहीं का स्थाई निवासी हूं, भारत में अपना कार्यक्षेत्र बिहार, छत्तीसगढ़ व राजस्थान आदि राज्यों के आदिवासी व दलित क्षेत्र होने के कारण कोई फर्क भी नहीं पड़ता कि उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनती है या नहीं।

    जैसे मैं छत्तीसगढ़ राज्य में डा० रमण सिंह जी के बारे में यह मानता हूं कि मुझे बस्तर क्षेत्र के संदर्भ उनके में प्रशासनिक निर्णय, समाधान व विकास के रचनात्मक प्रयासों में गंभीरता व इच्छाशाक्ति दिखती है। बहुत लोग मेरी इस बात से वास्ता नहीं रखते, लेकिन मैं यह अपने जमीनी अनुभवों के आधार पर मानता हूं। जैसे मैं बिहार में नितीश कुमार जी को तुलनात्मक बेहतर मुख्यमंत्री मानता हूं। वैसे ही मैं उत्तर प्रदेश के लिए अखिलेश जी को बेहतर राजनेता मानता हूं।

    मेरा यह लेख चुनावी हथकंडों से इतर सीधी सपाट बात कहने के लिए है। उत्तर प्रदेश व देश को सुलझे हुए राजनेताओं की जरूरत है जो सभी के लिए विकास के कार्य करें, घृणा व नफरत की बात न करें, संवेदनशील हों व प्रगतिशील सोच रखते हों। महिलाओं के प्रति सुलझी हुई सोच हो। पर्यावरण के मसलों पर बेहतर समझ हो। युवा हों, सच में ही पढ़े लिखे हों, देश दुनिया विज्ञान व तकनीक आदि की मूलभूत समझ हो, तार्किक हों।

    चुनावी राजनीति के प्रचार हथकंडों व टटपुंजिया पैंतरेबाजी से इतर यदि देखा बूझा समझा जाए तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश जी एक सुलझे हुए संवेदनशील राजनेता के रूप में उभर कर आए हैं।

    यदि व्यक्तिगत व जातिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर देखा जाए तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में जो अन्य राजनेता हैं उनकी सोच व समझ व संवेदनशीलता अखिलेश जी से बेहतर दिखाई नहीं देती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसी कल्पनातीत तत्व की तो बात ही छोड़ दीजिए।

    ऐसे में यदि यह मानने में कोई नुकसान नहीं कि अखिलेश जी को उनके चाचाओं आदि ने अखिलेश जी के मन के अनुसार काम करने में बाधाएं दीं, अखिलेश जी के हाथ बंधे रहे। एक अवसर अखिलेश जी को देने में कोई हर्ज नहीं। ऐसा नहीं है कि अखिलेश जी की तुलना में बहुत बेहतर सोच समझ दृष्टि व संवेदनशीलता के राजनेता उत्तर प्रदेश की राजनैतिक सत्ता की दौड़ में हैं तो अखिलेश जी को अवसर देने में ऐतिहासिक नुकसान होगा।

    यह महसूस करते हुए भी कि “बसपा+भाजपा” की ही सरकार बनने की संभावनाएं अधिक हैं, मेरी इच्छा यह है कि उत्तर प्रदेश को अखिलेश जी को एक बार भरपूर अवसर देकर देखना चाहिए। पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कुछ ऐसा तो किया नहीं है कि आगे के पांच वर्षों में पहाड़ टूट जाएगा या प्रदेश अंधेरे गलियारों में खो जाएगा।

    पूरे देश की राजनीति फूहड़ है, इसलिए उत्तर प्रदेश में भी थोड़ी बहुत राजनैतिक फूहड़ता होती रही तो यह कोई विशेष बात नहीं, विशेष बात यह है कि अन्य बड़े राज्यों की तुलना में फूहड़ता कम हुई।

    मैं अखिलेश जी की कुछ कामों के लिए उनका तहेदिल से शुक्रिया करता हूं। ये उनके वे काम हैं जिनके लिए मैं उनको पसंद करता हूं।

    छात्रों को लैपटाप बांटने की योजना

    इसको मैं बहुत दूरदर्शी व जबरदस्त योजना की श्रेणी में रखता हूं। यदि चुनावी राजनैतिक फूहड़ता के कारण जबरन इस योजना का विरोध न किया जाए तो यह बहुत ही शानदार योजना है, दूरगामी परिणाम बहुत ही बेहतर हैं। यह योजना क्यों बेहतर है, सभी अपने दिलों में भलीभांति समझते हैं वह बात अलग है कि हमें अपना स्वार्थ अपने बच्चों के भविष्य से अधिक प्यारा है और हम इस योजना को गरियाते हैं। कुछ लोगों का तर्क यह है कि पब्लिक का पैसा है। तो भई पब्लिक का पैसा तो हर सरकार ही प्रयोग करती है। तब तो किसी सरकार को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यह तर्क बेमानी लगता है।

    शिक्षा मित्रों को स्थाई टीचर बनाने वाली योजना

    मैं हमेशा कहता रहा हूं कि जब काम समान है, स्तर समान है, चरित्र समान है तब वेतन व अधिकारों में इतना भेदभाव क्यों। यह अलोकतांत्रिक है, गलत है। मुझे बहुत ही अच्छा लगा था जब शिक्षामित्रों को स्थाई टीचर बनाने की घोषणा हुई। कुछ लोगों ने नुक्ते फंसाए, योजना उलझी। लेकिन यह योजना है काबिलेतारीफ।

    सड़कें

    वैसे तो बहुत लोग रटीरटाई कहावतों का प्रयोग करते हैं कि उत्तर प्रदेश की सड़कें खराब हैं। सच यह है कि उत्तर प्रदेश में अच्छी सड़कें हैं। सड़क निर्माण में भयंकर भ्रष्टाचार के बावजूद, अच्छी सड़कों का काम पिछली कई सरकारों ने किया है। लेकिन अखिलेश जी की सरकार ने सड़कों की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा। सड़कों की कुछ बड़ी महात्वाकांक्षी योजनाएं भी उपलब्धि रही अखिलेश जी की सरकार की।

    तालाब

    अखिलेश जी की सरकार ने तालाबों पर विशेष ध्यान दिया जो किसी भी पिछली सरकार ने न दिया। यह बात अलग है कि स्थानीय लोगों व स्थानीय नौकरशाहों की मिली भगत के कारण तालाब वाली योजनाओं की उपलब्धि उतनी नहीं रही जितनी होनी चाहिए थे। लेकिन यदि अन्य राज्यों जहां तालाबों पर सरकारी योजनाएं बनी हैं उन सरकारी तालाब योजनाओं की तुलना में उत्तर प्रदेश की तालाब योजनाओं का आउटपुट अच्छा रहा है। कम से कम अखिलेश जी ने तालाबों के बारे में सोचा व जिन जमीनी कार्यकर्ताओं ने तालाब मुद्दों पर चर्चा की, उसका मान रखा, सम्मान रखा व य़ोजनाओं को स्वीकृति दी। यह अखिलेश जी की सोच व संवेदनशीलता को व्यक्त करता है।

    किसान व कृषि

    पूरे भारत में ही किसान व कृषि को सबसे उपेक्षित रखा जाता है। वास्तव में जो नौकरशाह हैं, जो कृषि वैज्ञानिक हैं, जो राजनेता हैं उनको पता ही नहीं कि किसान व कृषि के लिए क्या किया जाए। इसके बावजूद अखिलेश जी की कुछ छोटी-छोटी योजनाएं बहुत अच्छी रहीं। इनमें से एक योजना गावों में किसान बस चलाने की भी रही। किसानों के लिए ग्रामीण बसें जिनमें किसान अपना सामान लाद कर यात्रा कर सकता है। ध्यान से देखा जाए तो ऐसी कई छोटी-छोटी योजनाएं मिल जाएंगी जो किसानों व ग्रामीणों के लिए रहीं हैं।

    बिजली

    विकास के मामले में मैं बिजली को अखिलेश जी की सरकार की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण उपलब्धियों में मानता हूं। मैने अपना पूरा छात्र जीवन बिजली कटौती झेलते हुए व्यतीत किया। कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरे प्रदेश में बिजली की आपूर्ति जबरदस्त रही। बिजली के उत्पादन की दूरगामी योजनाएं आईं, आपूर्ति सही हुई। जो काम पिछले कई दशकों की सरकारें न कर पाईं वह अखिलेश जी के नेतृत्व ने कर दिखाया।

    योजनाएं तो और भी अच्छी रहीं। मैंने खुद कई लोहिया ग्रामों को देखा है, बहुत अच्छी योजना रही। यदि ईमानदारी से बात की जाए तो अखिलेश जी ने चाचाओं व यादवों की यादवगिरी के बावजूद तालमेल बिठाते हुए बेहतर काम या प्रयास करते हुए सरकार चलाई।

    रही बात यादवगिरी की तो इस सरकार में यादवगिरी बहुत कम रही, हां बदनाम बहुत अधिक किए गए। यदि सपा सरकार में यादवगिरी होती है तो मायावती जी की सरकार में दलितगिरी होती है। भाजपा में बनियागिरी व पंडितगिरी होती है। और यह सब चुनावी हथकंडे हैं कि अखिलेश जी की सरकार में अपराध बढ़े, मेरा साफ-साफ मानना है कि जिस राज्य में विकास के काम होते हैं वहां अपराध कम ही होते हैं, मैं दृढ़ता से मानता हूं कि अखिलेश सरकार में अपराध कम हुए हैं। पड़ोसी राज्यों से यदि तुलना की जाए तो उत्तर प्रदेश अपराध के मामलों में बौना लगेगा।

    दरअसल किसी समाज, राज्य व देश का विकास जाति, धर्म आदि जैसे फूहड़ चुनावी राजनैतिक टटपुंजियागिरी की फूहड़ता से भरे पच्चड़ों की बजाय लोगों के लिए किए गए दूरगामी कामों व कामों की नीवें रखने से होता है। धीरे-धीरे लोग समृद्ध होते हैं, समाज व देश समृद्ध होता है।

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  • कविता – “टचवुड”

    Mukesh Kumar Sinha

    अव्यवस्थित भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?

    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं

    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे
    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!


    फेसवुक वाल से साभार