इनकम, इनकमटैक्स और हमारा पोपट

Amar Tripathi


दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग बसते है :

एक जो पैसे के लिए काम करते हैं।
दूसरे जो अपने पैसे से काम लेते हैं।

आप कारीगर हैं, किसान हैं, मिल या फैक्ट्री के मजदूर हैं, अध्यापक हैं, बुद्धिजीवी हैं, पेंटर हैं, कलाकार हैं, सरकारी,अर्ध सरकारी या निजी उपक्रम में कर्मचारी हैं, 

तो जाहिर है आप पैसे के लिए काम कर रहे हैं। 

यदि आप व्यापारी हैं या उद्योगपति हैं तो स्पष्ट है की आप अपने पैसे से काम ले रहे हैं।

आप सभी अपनी आय के अनुसार सरकार को इनकमटैक्स भी देते हैं।

अब सिर्फ ये समझना बाकी है कि इनकम टैक्स की व्यवस्था किस तरह उन लोगों के पक्ष में झुकी हुयी है कि जो अपने पैसे से काम लेते हैं

और उनका पोपट कैसे बन गया जो पैसे के लिए काम करते हैं।

अब थोड़ा इनकम टैक्स की पृष्ठभूमि में चलते हैं। 

इनकमटैक्स ही नहीं किसी भी टैक्स की ईजाद राज्य द्वारा प्रत्यक्ष अपने खर्चे चलाने के लिए की गयी परन्तु ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान रखा गया कि इसका बोझ उनके ऊपर न पड़े जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इसीलिए टैक्स वसूली की जद में सामान्य रूप से धनिकों को ही रखने का प्रचलन रहा।

प्राचीन रोम में केवल संपत्ति कर लिया जाता था जो कि संपत्ति (भूमि, भवन, पशुधन, गुलामो की संख्या, मूल्यवान वस्तुओं और नकदी) की कुल मूल्य का १ % वार्षिक होता था, लेकिन युद्ध के दिनों में बढ़ा कर ३% तक कर दिया जाता था। इसके अलावा दसवीं शताब्दी के चीन में ‘सिन’ साम्राज्य के ‘वैंग मैंग’ नामक सम्राट ने १०% वार्षिक तक का टैक्स लगाया लेकिन वह मात्र १३ साल चल पाया और उसके बाद आने वाले ‘हान’ साम्राज्य में फिर से पुरानी टैक्स दर लागू कर दी गयी। परन्तु इनकमटैक्स सबसे पहले लागू किया गया ११८८ के इंग्लॅण्ड में, तीसरे क्रूसेड के खर्चे पूरे करने के लिए, जब हर खासो-आम से उसकी चल संपत्ति और नकदी का १०% वसूला गया।

इसके बाद में १७९८ के दौरान ग्रेट ब्रिटेन में ब्रिस्टल के डीन के सुझाव पर प्रधानमंत्री विलियम पिट ने प्रति पौंड २ पेन्स (तब १२० पेन्स का एक पौंड होता था) का इनकम टैक्स लगाया जिसका मकसद फ़्रांसीसी क्रांति से उपजे युद्ध के लिए हथियार खरीदना था। यही पर पिट ने ही सर्वप्रथम बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों से टैक्स वसूलने के प्रथा शुरू की। उसके समय ६० पौंड (अबके लगभग ६००० पौंड) के ऊपर की आय वालों से २ शिलिंग प्रति पौंड की दर से टैक्स लिया गया जो लगभग १०% बैठता है। हालाँकि यह टैक्स १८०१ में ख़त्म किया गया, फिर १८०३ में हेनरी अड्डिंग्टन द्वारा शुरू किया गया जो १८१६ में फिर खत्म किया गया। 

इनकम टैक्स की विधिवत शुरुआत १८४२ के इनकम टैक्स एक्ट से हो सकी जो कि बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों वाले हेनरी अड्डिंग्टन माडल पर ही आधारित थी। हालाँकि उस समय इसका विरोध भी हुआ लेकिन धीरे-धीरे १८६१ तक इनकम टैक्स वहां की टैक्स व्यवस्था का अंग बन गया। 

अमेरिका में भी इसी दौरान सरकार ने इनकम टैक्स लागू किया जो कि १९१३ के संशोधन के बाद वहां भी स्थायी हो गया।

इस छोटे से विवरण से यह तो स्पष्ट है ही कि राज्य द्वारा युध्द या दूसरे आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए लगाये गए इनकम टैक्स की अवधारणा ने अंततः स्थायी रूप ले लिया, लेकिन फिर भी मूल रूप से यह टैक्स धनिक वर्ग से ही वसूला जाता था, जिनमें वही लोग होते थे जो वहुधा अपने पैसों से काम लेते थे, न कि पैसों के लिया काम करते थे। अब देखिये कि इस व्यवस्था का पोपट कैसे बना —-

लेकिन इसके पहले जरा उनकी भी पड़ताल कर ली जाये की जो अपने पैसे से काम लेते हैं। सन १६०० तक शुद्ध और मुक्त व्यावसायिक कंपनियां नहीं होती थीं। यूरोप के कुछ देशों ने अपनी अपनी संसद के चार्टर से चंद लुटेरी कंपनियां बना रखी थीं जिनका काम दूसरे मुल्कों में जाना, व्यापारिक समझौते या युद्ध के माध्यम से उनकी संपत्ति हड़पना ही होता था, ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनमे एक थी जिसने प्लासी की लड़ाई के बाद से भारत पर अधिपत्य जमाया। उस समय भी कंपनियों में सरकार की कोई सीधी आर्थिक भागीदारी नहीं होती थी लेकिन परोक्ष रूप से उन पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

विस्तृत इतिहास में न जाते हुए केवल इतना बताना प्रासंगिक होगा कि धनिक वर्ग शुरू से राज्य सत्ता का सहयोगी तो रहा है लेकिन राज्य सदैव उसे नियंत्रण में भी रखता रहा है, जिससे एक तनावपूर्ण संतुलन सदैव बना रहता था …और इसी संतुलन की वजह से देशों की आतंरिक आर्थिक प्रगति भी संभव हो सकी। ग्लेडस्टोन के ज़माने में १८४४ में आये कानून के माध्यम से ही आधुनिक व्यापारिक प्रतिष्ठानो का गठन संवैधानिक रूप से संभव हुआ। अमरीका में भी यह प्रक्रिया सबसे पहले न्यू जर्सी में १८९६ में शुरू हुयी। इसके बाद हुए अनेक कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से हिस्सेदारी के स्वरूप तय किये गए और कंपनियों को स्वतन्त्र वित्तीय इकाई के रूप में प्रतिष्ठा मिली ।

इसके बाद लगभग आधे दशक तक कम्पनियाँ बनी, शेयर निर्धारण के तौर तरीके, उनके बाजार विकसित हुए और साथ ही विकसितहुए विविध मैन्युफैक्चरिंग उद्योग, जिसके बल पर चारों और तमाम नयी-नयी वस्तुओं के ढेर लग गए और हम अपने को अत्यंत प्रगतिशील समझने लगे । वस्तुतः हमारी प्रगतिशीलता विचारों से फिसल कर वस्तुओं में केंद्रित होने लगी थी । इसके बाद १९५० के दशक में सरकार पर कंपनियों पर से नियंत्रण कम करने के लिए दबाव की मुहीम शुरू हुयी, और सफल भी हुयी जिसकी चर्चा हम अर्थसत्ता-१ व २ में कर चुके हैं।

यूरोप में औद्योगिक विकास के साथ ही गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़नी शुरू हो गयी थी और उसी के साथ विकसित हुयी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, जिसमे राज्यसत्ता ने, टैक्स द्वारा प्राप्त धन को गरीबों और निर्बलों की स्थिति सुधारने में भी व्यय करने की योजना बनायी और इनकम टैक्स बढ़ती आय पर बढ़ती दर के हिसाब से ही लगाया, जो सर्वथा न्याय सांगत जान पड़ता था, और वास्तव में था भी।

इसी के साथ उन लोगो ने —जो पैसे से काम लेते हैं, अपनी हैसियत के अनुसार, छोटी बड़ी कम्पनियाँ बनानी शुरू कर दीं। अत्यंत छोटी हैसियत की मालिकाना हक़ वाली कम्पनियाँ भी खूब बनी। साथ में आय को पारिभाषित करने का फार्मूला ऐसा विकसित हुआ जो कि ‘पैसे से काम लेने’ वालों के हक़ में था; और वही आज भी लागू है।

फर्क यही से शुरू होता है—– किसी कंपनी की आय, उसे प्राप्त कुल व्यापारिक भुगतान में से सारे खर्चे काट कर बची हुयी राशि को माना जाता है, जब कि किसी व्यक्ति को उसके श्रम के बदले मिले हुए सकल भुगतान को। अब टैक्स का निर्धारण तो आय पर ही होना है।

नतीजा—

आज हर वेतन भोगी पैसे कमाता है, पहले टैक्स अदा करता है उसके बाद खर्च कर पाता है। 

जब कि हर व्यवसायी पैसे कमाता है, पहले जी भर खर्च करता है,खर्च के वाउचर जमा करता है फिर बचे हुयी राशि पर टैक्स अदा करता है ।

यानि की जो कर व्यवस्था सामान्य और निम्न वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए बनायी गयी थी वह उन्ही की आय में कटौती का वायस बन रही है, जब कि व्यावसायिक वर्ग/धनिक वर्ग के जीवन यापन के स्तर पर इसका तनिक भी प्रभाव नहीं है।

हो गया न हमारा पोपट !

अब इसमें बढ़ती मुद्रा स्फीति के अनुपात में टैक्स स्लैब का न बढाया जाना और कोढ़ में खाज का काम करता है।


Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2016/12/blog-post.html