आज जिस समाज में हम खड़े है हमारे चारों तरफ भय और हिंसा का माहौल है , किसी भी कीमत पर एक दूसरे को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने ही होड़ मची है . हजारों सालों में हिंसा को इतना सूक्ष्म किया है की हमारा दैनिक जीवन जाने अंजाने बिना किसी का भोग किये , शोषण किये आगे ही नहीं बढता और जब जब इस हिंसा में विस्फोट हुआ है तब तब धरती से जीवन को खत्म करती चली गई. शुरुआत से देखते चले तो जीने के ढंग में वैदिक व्यवस्था को सर्वोत्तम मान लिया। वर्ण व्यवस्था ऐसी बनायीं की आज तक मानसिक विकास थमा हुआ। जात पात के नाम पर मनुष्य को मनुष्य न समझा गया , स्त्रियों और शूद्रों को केवल भोगने के लिए ही पैदा होना बता दिया। इतने कड़े नियम बना दिए गए चलना , खाना पीना साँस लेना ही दूभर हो गया।
कुछ लोगों यहां से हटे तो जैनी हो गए मोक्ष के नाम पर शरीर को इतने कष्ट दिए की पूछो मत, अहिंसा के नाम पर इतने कट्टर हो गए की अपने शरीर के साथ की जा रही हिंसा ही न दिखी ।
एक व्यक्ति ने आगे आकर जीवन को समझने के लिए तब के सारे तरीकेे अपनाये जब शरीर को कष्ट देकर , तपस्या कर के, भूखा रह कर भी कुछ न हुआ तब जो सामने है उसे देखते हुए, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझते हुए बुद्ध ने सभी प्रपंचो की पोल पट्टी खोली। जीवन को समझने समझाने की कोशिश की लेकिन हमने उसका भी क्या किया बुद्ध के बाद उस पर भी झंडा लगा कर धर्म बना दिया। आज सबका जमाल घोटा चल रहा है, वर्तमान दिखता नहीं इतिहास में घुस कर किसी भविष्य के लिये मार काट मचाये पड़े है किसी को ब्राह्मणवादी व्यवस्था लागू करनी है , कोई संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए लड़ रहा है , किसी को साम्यवाद चाहिए , कुछ को भौतिकवाद चाहिए भले ही इन सब के लिए वर्तमान में कितनी भी हत्याएँ करनी पड़े , भृष्ट होना पड़े, खुद को कष्ट देना पड़े। अपना विकास हुआ नहीं पहले देश सुधार के तरीके दिमाग में भर लिए जाते है भले ही उस कल्पना के परिणाम कितने भी भयानक हो , ऐसे सुधार अंत आते आते में व्यक्तिगत कुंठाओं को तृप्त करने में ही योगदान देते है।
विकास के नाम पर हमनें किस दिन अपना भला किया है, अलग अलग नामों के साथ क्या सब एक जैसे ही नहीं है!
पूर्वजों ने अपने समय के हिसाब से जो ठीक लगा किया जो सुरक्षा , सत्ता , जीवन को समझने के लिए जो रास्ता दिखा अपना लिया, लेकिन हम किस हिसाब से अपने को विकसित बोलते है जैसे माहौल में पैदा हो गए, जैसा सुनते आये वहीं हमारा अंतिम सत्य हो गया भले ही वह कितना वीभत्स हो , वास्तविकता से कितना भी दूर हो बिना जांचे परखे ही अपना लेना उस पर तर्क वितर्क करते रहने ही विकसित होना होता है क्या भले ही पाँच हजार साल पुरानी जाति प्रथा पर ही गर्व क्यों न कर रहे हो । वास्तविकता यहीं है की वाह्य रूप से हम कितना भी आगे निकल आए हो मानसिक रूप से अपवाद व्यक्तित्वों को छोड़ कर हम दो कदम सही से न चले है। आज भौतिक सुखों को इकठ्ठा करने राह पकड़ रखी है लेकिन उम्र निकल जाती है सुख कमाते कमाते लेकिन वो दिन नहीं आता जिस दिन फुर्सत से उन सुखों का भी भोग कर ले , देख ले की इतना सब चाहिए भी था की नहीं, चाहिए भी था तो किस कीमत पर कभी सोचा की रोज एक जैसा जीवन जीने के लिए, धार्मिक, भौतिक उन्मादों में कितनी झीलों, तालाबों, नदियों की हत्या कर दी, कितने जंगल मिटा दिए , कितने जानवर मिटा दिए, युद्धों में कितने इंसान बलि चढ़ चुके। कल्पना कीजिए की खुद के ही जीवन का घेरा कितना सीमित कर चुके। कल्पना कीजिए उस कल की जिसमें ‘सीमेंट के एक घर’ जो कहीं रेगिस्तान में दुनिया की सारी सुविधाएँ लिए बिना पानी , भोजन व अन्य किसी भी प्राकृतिक संपदा के बिना खड़ा है।
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अपने लिए ही हिंसा के जाल बुनते हुए हम
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जनसंख्या वृद्धि का सांप्रदायिकीकरण : जनसांख्यकीय आंकड़ों को समझने की ज़रूरत
Dr Ram Puniyani
Rtd Prof, IIT Bombay[themify_hr color=”red”]
सांप्रदायिक ताकतों द्वारा धर्मपरिवर्तन व जनसंख्या वृद्धि के संबंध में पूर्वाग्रहों और गलत धारणाओं का लंबे समय से समाज को बांटने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसी कड़ी में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजुजू ने एक ट्वीट कर कहा कि भारत में हिन्दू आबादी घट रही है क्योंकि हिन्दू धर्मपरिवर्तन नहीं करवाते और यह भी कि पड़ोसी देशों के विपरीत, भारत में अल्पसंख्यक समृद्ध और खुशहाल हैं।
लंबे समय से यह प्रचार किया जा रहा है कि देश की हिन्दू आबादी कम हो रही है और मुसलमानों की आबादी में बढ़ोत्तरी हो रही है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हिन्दू, कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान, आबादी का 14.23 प्रतिशत हैं। जनगणना 2011 के धार्मिक समुदायवार आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 से 2011 के बीच जहां देश की हिन्दू आबादी में 16.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं मुसलमानों के मामले में यह आंकड़ा 24.6 प्रतिशत था। इसके पिछले दशक में हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों की आबादी में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुई थी। 2001-2011 की अवधि में हिन्दुओं की आबादी 19.92 प्रतिशत बढ़ी जबकि मुसलमानों की आबादी में 29.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों समुदायों की जनसंख्या वृद्धि दर घट रही है और इन दरों के बीच का अंतर कम हो रहा है।
स्पष्टतः हमें यह ध्यान में रखना होगा कि आने वाले समय में मुस्लिम आबादी में वृद्धि की दर घटेगी और हिन्दू आबादी में वृद्धि दर के लगभग बराबर हो जाएगी। परंतु भविष्य में कभी भी मुसलमानों की आबादी, हिन्दुओं से अधिक होने की संभावना नहीं है। सन 2001 से लेकर 2011 के बीच हिन्दुओं की आबादी में 13.3 करोड़ की वृद्धि हुई, जो कि सन 2001 में मुसलमानों की कुल आबादी के लगभग बराबर थी। यह साफ है कि मुसलमानों की आबादी के हिन्दुओं से अधिक हो जाने के खतरे के संबंध में जो दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसमें कोई दम नहीं है।
जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि अधिक प्रजनन दर, अक्सर शिक्षा के अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का नतीजा होती है। केरल के मुसलमानों की प्रजनन दर, उत्तर भारत के हिन्दू समुदायों से कहीं कम है और यहां तक कि केरल की कई हिन्दू जातियों से भी कम है। केरल के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र आदि के मुसलमानों से कहीं बेहतर है। यह तथ्य कि उच्च प्रजनन दर का संबंध शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं आदि से होता है, इससे भी स्पष्ट है कि दलितों (अनुसूचित जातियों) और आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की जनसंख्या वृद्धि दर भी अन्य समुदायों से अधिक है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, अनुसूचित जनजातियां, कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत थीं। यह आंकड़ा सन 1951 में 6.23 प्रतिशत था। इसी तरह सन 1951 में अनुसूचित जातियों का आबादी में प्रतिशत 15 था जो कि सन 2011 में बढ़कर 16.6 प्रतिशत हो गया। अतः यह स्पष्ट है कि सांप्रदायिक तत्व जो दुष्प्रचार कर रहे हैं, उसमें तनिक भी सत्यता नहीं है और उसका यथार्थ से कोई लेनादेना नहीं है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रवीण तोगड़िया जैसे कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि देश में दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए वहीं साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे कुछ नेता हिन्दुओं से यह अपील कर रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें!
भाजपा अध्यक्ष ने लोगों से यह अपील की है कि वे ईसाईयों की बढ़ती आबादी के खतरे को समझने के लिए उत्तर पूर्व की ओर देखें। उत्तर पूर्व, मुख्यतः आदिवासी इलाका है और यहां सन 1931 से 1951 के बीच ईसाई आबादी के प्रतिशत में वृद्धि हुई थी। इसका कारण था शिक्षा का प्रसार। अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो हमें पता चलेगा कि देश में ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत पिछले कुछ दशकों से लगभग स्थिर बना हुआ है, बल्कि उसमें कमी आई है। सन 1971 में ईसाई, देश की आबादी का 2.60 प्रतिशत थे। यह आंकड़ा 1981 में 2.44, 1991 में 2.34, 2001 में 2.30 और 2011 में भी 2.30 था। इस तथ्य के बावजूद यह दुष्प्रचार जारी है कि ईसाई मिशनरियां, आदिवासी क्षेत्रों में जमकर धर्म परिवर्तन करवा रही हैं। सन 1991 में आरएसएस से जुड़े बजरंग दल के दारा सिंह द्वारा ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टीवर्ट्स स्टेन्स को उसके दो नन्हे लड़कों के साथ ज़िन्दा जला दिए जाने के बाद से देश में ईसाई विरोधी हिंसा की शुरूआत हुई। वाधवा आयोग, जिसने पास्टर स्टेन्स की हत्या की जांच की, इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वे धर्मपरिवर्तन नहीं करवा रहे थे और यह भी कि क्योनझार व मनोहरपुर इलाकों में, जहां वे काम कर रहे थे, ईसाईयों की आबादी के प्रतिशत में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। ओडिसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बहाने ईसाई विरोधी हिंसा भड़काई गई। गुजरात में भी धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर ईसाईयों के खिलाफ हिंसा हुई। इसके साथ ही, ये आंकड़े भी हमारे सामने हैं कि ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत वही बना हुआ है। तो फिर आखिर धर्मपरिवर्तित ईसाई कहां छुपे हुए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि धर्मपरिवर्तित ईसाई, अपने धर्म को उजागर नहीं करते और इसलिए ईसाई आबादी के संबंध में सही आंकड़े सामने नहीं आ पाते। यह केवल एक आरोप है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। और अगर हम यह मान भी लें कि ऐसा हो रहा है, तो भी यह बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा होगा।
धर्मपरिवर्तन हमेशा से हिन्दू राष्ट्रवादियों के एजेंडे पर रहा है। आज़ादी के आंदोलन के दौरान धर्मपरिवर्तन करवाने की दो अलग–अलग मुहिम चल रही थीं। पहली थी तंज़ीम जो लोगों को मुसलमान बनाना चाहती थी और दूसरी थी शुद्धि जो ‘विदेशी’ धर्मों के अनुयायी बन गए हिन्दुओं को फिर से अपने घर वापस लाना चाहती थी। यह कहा जाता था कि धर्मपरिवर्तन कर लेने से वे लोग ‘अशुद्ध’ हो गए हैं और इसलिए उन्हें ‘शुद्धि’ की प्रक्रिया से गुज़ार कर हिन्दू बनाना ज़रूरी है। पिछले कई दशकों से आरएसएस, विहिप व वनवासी कल्याण आश्रम, घर वापसी अभियान चला रहे हैं जिसका उद्देश्य उन दलितों और आदिवासियों को फिर से हिन्दू धर्म के झंडे तले लाना है जो बल प्रयोग के कारण मुसलमान और लोभ लालच में फंसकर ईसाई बन गए हैं। यह घर वापसी अभियान आदिवासी व ग्रामीण इलाकों और शहरों की मलिन बस्तियों में चलाया जा रहा है।
आदिवासी, मूलतः, प्रकृति पूजक होते हैं। आरएसएस का कहना है कि वे हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू बनाने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम ने उत्तर पूर्व में स्कूलों और होस्टलों का एक जाल बिछा दिया है। यह साफ है कि इन सारे कार्यक्रमों का उद्देश्य राजनीतिक है और समाज की भलाई की बात केवल असली इरादों को ढंकने के लिए कही जा रही है। दरअसल, संघ परिवार धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ना चाहता है।
(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
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श्मशान और मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? –Sanjay Jothe
संजय जोठे
ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।
सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।
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अक्सर ही ग्रामीण विकास के मुद्दों पर काम करते हुए गाँवों में लोगों से बात करता हूँ या ग्रामीणों के साथ कोई प्रोजेक्ट की प्लानिंग करता हूँ तो दो बातें हमेशा चौंकाती हैं।
पहली बात ये कि ग्रामीण सवर्ण लोग मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, तालाब, स्कूल आदि बनवाने की बजाय मंदिर, श्मशान, कथा, यज्ञ हवन भंडारे आदि में ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। दुसरी बात ये कि जहाँ भी सार्वजनिक या सामाजिक संसाधन निर्मित करने की बात आती है वहां स्वर्ण हिन्दू एकदम से धर्मप्राण होकर विकास के खिलाफ हो जाते हैं और भूमिहीन दलित आदिवासी ओबीसी गरीब समुदाय चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते।
सीधे तौर पर आप देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू समुदाय में सामाजिक सहयोग से सड़क बिजली पानी और रोजगार आदि को लेकर कोई बड़ा काम करने की इच्छा नहीं होती। हाँ व्यक्तिगत रूप से वे अपने परिवार जाति समूह आदि में इन मुद्दों पर खूब काम करते हैं और किसी दूसरे समुदाय को घुसने नहीं देते। लेकिन पूरे गाँव के लिए मूलभूत सुविधा की प्लानिंग के लिए उनमे एकदम से वर्णाश्रम धर्मबुद्धि जाग जाती है।
ये सवर्ण लोग गांवों में विकास की प्लानिंग में मंदिर और श्मशान पर बहुत जोर देते हैं। हालाँकि गांव में मंदिरों की कोई कमी नहीं होती है। और श्मशान भी एक ही बार जाना है – वो भी मरकर। तो फिर मंदिर और श्मशान पर इतना जोर देने की जरूरत क्या है?
जरूरत है, बहुत गहरी जरूरत है। असल में अगर गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार या जीवन की अन्य सुविधाएं बढ़ती हैं तो इसका फायदा सवर्ण द्विज हिंदुओं को नहीं मिलेगा। वो इसलिए कि इनके पास तो ये सब सुविधाएं पहले से ही है। लेकिन इन सब सुविधाओं के बिना जीते आये भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासियों को इससे तुरन्त फायदा होगा। उनके बच्चे जल्दी ही शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक हो सकेंगे। एक या दो पीढ़ी में ही ग्रामीण दबंगों को चुनौती मिलने लगेगी। बेगार, बलात्कार, शोषण बन्द हो जाएगा। राजनितिक समीकरण बदल जायेगा। और समझदार ग्रामीण सवर्ण ये कभी नहीं होने देंगे। इसलिए वे हर योजना हर प्लानिंग में घुसकर पूरे गाँव को मंदिर, श्मशान,धर्मशाला, भंडारा, कथा, प्रवचन, ध्यान, समाधी आदि में उलझाये रखते हैं।
लेकिन मंदिर या श्मशान या अध्यात्म करते क्या हैं?
असल में जाति को बनाये रखने का एक ही तरीका है। जीवन के लिए जो भी जरूरी है उसकी निंदा करो और मृत्यु और मृत्यु के बाद की बकवास की प्रशंसा करो। यही रहस्यवाद, ध्यान समाधी, धर्म, वेदांत, सूफी, भक्ति आदि का कुल जमा काम रहा है। वे परलोक जन्नत मोक्ष पुनर्जन्म, साल्वेशन, ईश्वर आदि की फफूंद उड़ाते रहेंगे और इस जिंदगी के मुद्दों पर, सड़क शिक्षा रोजगार तालाब आदि पर कोई काम नहीं होने देंगे।
अब जैसे ही आप मंदिर, मस्जिद, चर्च या श्मशान जाते हैं वैसे ही इस जीवन से ज्यादा चिंता परलोक की होने लगती है। बस इसी मौके की तलाश में सारे पोंगा पंडित और मुल्ला पादरी आदि रहते हैं। आपमें ये परलोक का भय पैदा होते ही वे अपने शास्त्र, मिथक, कर्मकांड, रहस्यवाद और अध्यात्म लेकर घुस जाते हैं और आपको सड़क, शिक्षा रोजगार से हटाकर ध्यान, समाधी, श्राद्ध, रोज़ा, ज़कात, साल्वेशन, मोक्ष आदि में उलझा लेते हैं।
भारत में इसी ढंग से जिंदगी की मूलभूत सुविधाओं को नकारकर परलोक की सुविधाओं पर फोकस बनाये रखा जाता है। फिर इस लोक में भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासी के बच्चे कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार बने रहते हैं और वर्णाश्रम (असल में जाति) व्यवस्था बनी रहती है।
इसलिए जाति व्यवस्था और इसके शोषण को बनाये रखने के लिए मंदिर और श्मशान बहुत बड़ी भूमिका निभाते आये हैं। ये ही भारत के दुर्भाग्य के स्त्रोत हैं।
इसलिए जब कोई मंदिर या श्मशान की बात करे तो सावधान हो जाइये कि वे सज्जन असल में समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
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सामाजिक नेतृत्व और अवतार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पांच पार्टियां मुख्य है कांग्रेस, भाजपा, सपा ,बसपा और लोकदल। पिछले कई सालों से सपा और बसपा ने ही प्रदेश की राजनीति में मुख्य धमक रखी, पिछले लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा भी राजनैतिक सत्तात्मक लड़ाई में दोबारा दावेदारी ठोक चुकी। लोकदल व कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व बनाये रखने के लिए ही जूझते दिखे। खैर पोस्ट के विषय पर आते है –
भारतीय राजनीति में नेतृत्व दो तरीकों से होता आया है एक है सामंती तरीका जिसमें खुद को अवतार बना कर उसे लंबे समय तक भुनाया जा सकता है , अवतार नफरत फैलाकर, हिन्दू रक्षक, मुस्लिम रक्षक, दलित रक्षक , कल्पनाओं में ले जा कर आदि कैसे भी बन सकते है, ऐसा नहीं है कि इतना करने के लिए भी मेहनत नहीं करनी पड़ती बिल्कुल करनी पड़ती है लेकिन इस बात से कोई मतलब नहीं होता की जमीनी समस्याएं क्या है, उन पर काम कैसे करना है । सत्ता पाने और उसे बनाए रखने के लिए बस लोगों को आपके ईश्वर मान लेने तक बरगलाना है।
दूसरा तरीका है जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है। नेतृत्व लोगों के बीच से निकलता हुआ ऊपर तक पहुँचता है, इसमें आप अवतार नहीं होते , बरगलाना आपकी प्राथमिकता नहीं होती, क्षेत्रीय नेताओं के संगठन से शीर्ष नेतृत्व बनता है , अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग समस्याओं पर काम करते हुए लोगों के बीच नेता बनते है , चुनाव जीतकर अपने क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करते है। प्रदेश स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है की क्षेत्र स्तर की राजनीति में आप लोगों की समस्याओं पर कितना काम कर रहे; क्षेत्रीय नेताओं को अपने लोगों के लिए काम करने , बात रखने के लिए, आगे बढ़ने कितने मौके दे रहे। क्षेत्रीय नेतृत्व अपने वादों पर असफल तो शीर्ष स्तर पर भी नेतृत्व असफल।भारतीय समाज सामंती मानसिकता वाला है, लंबे समय से अवतारों को गढ़ता रचता आ रहा है, आम जन चाहे कोई सी भी जाति से आता हो उसे राजनीति में भी दो चीजें अवश्य चाहिए एक अवतार पूजने के लिए जो उसके मन मुताबिक बाते बस कह देता हो दूसरा जिससे नफरत की जा सके इतनी नफरत की पूज्य अवतार केवल और केवल दूसरे से नफरत की वजह से भी पूज्य रह जाए तो कोई दिक्कत नहीं। भारतीय राजनीति हमारी सामाजिक मानसिकता से बिलकुल अछूती नहीं रह सकती यदि कोई व्यक्ति अवतार-करण तोड़ने के लिए भी प्रयास कर रहा हो तो देर-सवेर हम उसे भी पूजने लग जायेंगे।
अपने आप को मसीहा बना देने की राजनीति करने में मैं बसपा को दूसरे स्थान पर रखूँगा क्योंकि भाजपा सत्ता में हो न हो उसकी विचारधारा चाहे वह नफरत फैलानी वाली हो, लोगों को बांटने वाली हो, समाज में सामंती व्यवस्था स्थापित करने वाली हो उसकी पूरी टीम समाज में लगातार अपना काम करती रहती है, पार्टी सत्ता में हो न हो वह समाज में लगातार वह अपनी विचारधारा पोषित करती रहती है। जबकि बसपा दलित उत्थान को मुद्दा बना कर अस्तित्व में आयी थी लेकिन बहन जी से अलग इतने सालों बाद भी न तो दलितों की स्थिति में कोई सुधार दिखा न ही दलित नेतृत्व करता कोई क्षेत्रीय नेता। चुनावों से पहले दलित मुद्दे, अन्य समस्याएं कहाँ गायब रहते है ! यह सवाल उठते नहीं है उठते भी है तो जवाब नदारद ही रहते है। मेरा यह मानना है कि सत्ता अपने कामों को पूरा करने के लिए जरुरी हो सकती है लेकिन किसी नेतृत्व या विचार की मज़बूरी नही हो सकती । लेकिन अवतार वाद की राजनीति इतनी प्रबल हो चुकी है कि जिसे पूजते है वह शीर्ष पर बने रहना चाहिए भले ही खुद की स्थिति ज्यों की त्यों रहें। दलित नेतृत्व जो आना चाहिए था जो नेतृत्व सामाजिक आंदोलन रच सकता था , समाज की दिशा तय कर सकता था वह आया ही नहीं। लेकिन जो आया वह सत्ता का सुख पाने के लिए समझौते और सामंती मानसिकता को ही मजबूत करता चला गया। -
उत्तर प्रदेश में आगामी राज्य सरकार (Role Model State Government) के गठन हेतु आवेदन /दावा
अपेक्षा, अनुरोध एवं अपील
पढ़कर मानसिक सांत्वना दें, इससे सस्ती और सुलभ मांग क्या हो सकती है l आप चाहें तो अपने पास – पडोसी, प्रियजन, पुरजन, मित्रजन एवं शत्रुजन को अग्रसारित कर सकते हैं।
विजय हो आपकी ! विजय हो आप सब के माँ बापकी !
– हर समस्या का एक मात्र विकल्प –
” सम्पूर्ण अव्यवस्था परिवर्तन अभियान “विवेक स्पर्श के साथ कानपुर से डॉ वी एन “पाल”
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13-02-2017 (समय 13-13-13)
प्रतिष्ठा में-
महामहिम राज्यपाल श्री राम नाइक जी,
उत्तर प्रदेश सरकार-लखनऊ।विषय : उत्तर प्रदेश में आगामी राज्य सरकार(Role Model State Government) के गठन हेतु आवेदन /दावा
द्वारा- जिलाधिकारी कानपुर नगर
महामहिम राज्यपाल जी,
विवेक स्पर्श।आपने विभिन्न चरणों में अधिसूचनाए जारी करके चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से अगली राज्य सरकार के गठन हेतु प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है, हालाँकि किसी भी अधिसूचना की अधिकृत जानकारी किसी भी संप्रभु नागरिक / मतकर्ता / मतदाता को serve / प्राप्त नहीं करायी गयी है l हाँ मुट्ठी भर लोगों को लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ के शोर शराबे के माध्यम से अवश्य प्राप्त हुई है , हो रही है Notice is not served to all concerned and the process of election is initiated traditionally by the election commission which is not fair . लोकतंत्र में जनता के द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार (जन जन की सरकार ) का गठन होना चाहिए था लेकिन अब तक दल दल की दलीय सरकारों का गठन होता आया है People’s Representative Act जन प्रतिनिधि के चुनाव के लिए है लेकिन उसकी जगह दल प्रतिनिधि के चुनाव हो रहे है।
संविधान में दो ही सरकारों की व्यवस्था है एक राज्य सरकार दूसरी संघ सरकार / भारत सरकार(Union Government of India) l संविधान में केंद्र सरकार का कोई जिक्र/अनुमोदन नहीं है और फिर किसी भी पहचान / नाम से सरकार हो ही नहीं सकती l जैसे राष्ट्रपति या राज्यपाल की कोई दलीय पहचान नहीं होती है वैसे ही प्रधानमंत्री ,मुख्यमंत्री , मंत्री, जन प्रतिनिधि की सदन में संविधान की शपथ खाने के बाद पहचान स्वत: समाप्त हो जाती हैl पहचान बनाये रखना संविधान का घोर अपमान है l
संविधान के अनुसार कोई भी संप्रभु नागरिक छह महीने के लिए सरकार बनाने की पहल कर सकता है सदन के सदस्य न होने पर भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं मंत्री बनते रहे हैं। छह महीने के लिए बन सकते है बशर्ते वह राष्ट्रपति या राज्यपाल / जन जन को सम्पूर्ण संतुष्टि प्रदान कर सके l पूरे देश / प्रदेश के जन जन के कल्याण के लिए कार्य कर सके l इसके लिए सदन में सरकार के दावेदारों को अपनी अपनी सरकार प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिये l फिर सदन में बहुमत या सर्व सम्मत से चुनाव आयोग की देखरेख में सरकार का चुनाव होना चाहिए l इस तरह से चुने हुए व्यक्ति / सरकार को सदन के अनुरोध पर नियुक्ति पत्र जारी करने से पूर्व राष्ट्रपति या राज्यपाल को विवेकाधिकार जो उनका विशेषाधिकार है का प्रयोग करते हुए पूरी छानबीन कर आश्वस्त होकर सदन में शपथ ग्रहण करानी चाहिए अन्यत्र नहीं l असम्बैधानिक गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करने के लिए अग्रिम त्याग पत्र लिया जा सकता है संपत्ति एवं स्वत:लिखित प्रमाण पत्र भी लिया जा सकता है l
मै दलीय गिरोह बंधन से मुक्त, सच्ची संबैधानिक, लोकतान्त्रिक, जाति निरपेक्ष, धर्म निरपेक्ष, पन्थ निरपेक्ष, वित्त निरपेक्ष, लिंग निरपेक्ष एवं संप्रदाय निरपेक्ष नवगठित की जाने वाली सरकार के लिए प्रस्ताव भेज कर आवेदन कर रहा हूँ l मेरा दावा है कि मै और मेरी सरकार का प्रत्येक सदस्य आपको / पूरे सदन को / जन जन को -सम्पूर्ण संतुष्टि प्रदान करने में सक्षम है -मुझे अपनी सरकार आपके सम्मुख बंद कमरे में एवं संतुष्ट होने पर सदन में प्रस्तुत करने के अवसर दीजिये l मेरे पास तरह तरह की (Role Model State Governments) हैं l
क्रमश :
आपका शुभेक्षु,
डॉ विजय नारायण ” पाल ”
राम गंगा हाऊसिंग कॉम्प्लेक्स,
जी टीरोड नारामऊ / मंधना कानपुर
उत्तर प्रदेश. -
क्या यह पूरा न्याय है
डा० नीलम महेंद्र
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‘व्यापम’ अर्थात व्यवसायिक परीक्षा मण्डल, यह उन पोस्ट पर भर्तियाँ या एजुकेशन कोर्स में एडमिशन करता है जिनकी भर्ती मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन नहीं करता है जैसे मेडिकल इंजीनियरिंग पुलिस नापतौल इंस्पेक्टर शिक्षक आदि। साल भर पूरी मेहनत से पढ़कर बच्चे इस परीक्षा को एक बेहतर भविष्य की आस में देते हैं। परीक्षा के परिणाम का इंतजार दिल थाम कर करते हैं। वह बालक जो अपनी कक्षा और कोचिंग दोनों ही जगह हमेशा अव्वल रहता है तब निराश हो जाता हैं जब पता चलता है कि मात्र एक नम्बर से वह अनुत्तीर्ण हो गया लेकिन उसे आज पता चला कि वह एक नम्बर नहीं बल्कि चन्द रुपयों से अनुत्तीर्ण हुआ था। यह परीक्षा बुद्धि बल की नहीं धन बल की थी। आज ऐसे अनेकों बच्चे यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि जिस डिग्री के लिए वे सालों मेहनत करते हैं वो पैसे से खरीदे गए एक कागज के टुकड़े से अधिक क्या है जिस पर कुछ खरीदे गए शब्द लिखे जाते हैं। जब एक होनहार बालक को उसके हक से महरूम किया जाता है तो केवल वो बालक नहीं बल्कि पूरा देश पीछे चला जाता है क्योंकि जो योग्य है वो परिस्थितियों के आगे हार जाता है और जो अयोग्य है वो परिस्थितियों को खरीद लेता है लेकिन इस खरीद फरोख्त में देश का विकास रुक जाता है। आप खुद सोचिए कि आपका इलाज ‘व्यापम’ की देन एक अयोग्य डाक्टर बेहतर करता जिसने अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए डिग्री खरीदी या फिर वो योग्य बालक जो अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए डाक्टर बनना चाह रहा था लेकिन बन न सका।
कहते हैं सच्चाई की हमेशा जीत होती है तो शिक्षा के क्षेत्र में देश के इस सबसे बड़े घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आखिर आ ही गया। फैसले में 2008 से 2012 के बीच प्रवेश पाने वाले 634 मेडिकल छात्रों के दाखिले निरस्त किए गए हैं और जो डाक्टर बन चुके हैं उनकी डिग्री छीन ली जाएगी। जस्टिस खेहर की अगुवाई वाली पीठ का कहना है कि विद्यार्थी जालसाजी को स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वे किसी राहत की पात्रता नहीं रखते।
सही भी है आखिर किसी योग्य छात्र का हक मारा गया होगा, किसी होनहार विद्यार्थी का भविष्य दांव पर लगा होगा, किसी पिता के अपने पुत्र के लिए देखे गए सपने को कुचला गया होगा, किसी माँ का अपने बच्चे के लिए माँगी गई मन्नतों पर से विश्वास उठा होगा, कुछ मुठ्ठी भर रसूखदार और पैसे वालों के द्वारा कितने होनहारों और देश दोनों के भविष्य से खेला गया।
लेकिन चूंकि “बुरे काम का बुरा नतीजा ” होता है तो कल तक पैसे के दम पर किसी के सपनों की लाश पर अपने भविष्य का महल बनाने वालों का खुद का भविष्य आज दांव पर लग गया है। कहने को न्याय हुआ लेकिन क्या यह पूर्ण न्याय है? जिस सिस्टम में यह सब सम्भव हो पाया उस सिस्टम का क्या? जिन अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया उनका क्या? जिन नेताओं के सरंक्षण में इस घोटाले को अंजाम दिया गया उन नेताओं का क्या? क्या इन सभी की सन्लिप्तता के बिना इतना बड़ा घोटाला 1990 के दशक से लेकर 2013 तक इतने सालों तक संभव है?
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी क्योंकि अगर सरकार की जानकारी के बिना यह प्रवेश हुए तो फिर सरकार क्या कर रही थी और अगर सरकार की जानकारी में हुए तो वो होने क्यों दे रही थी? दोनों ही स्थितियों में सरकार सवालों के घेरे से बच नहीं सकती। तो जिस दोषी सिस्टम और सरकारी तंत्र के सहारे पूरा घोटाला हुआ उस का कोई दोष नहीं उसे कोई सजा नहीं लेकिन जिसने इस सिस्टम का फायदा उठाया दोषी वो है और सजा का हकदार भी।
तो यह समझा जाए कि सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है न तो सिस्टम के प्रति न लोगों के प्रति, उसकी जवाबदेही है सत्ता और उसकी ताकत के प्रति यानी खुद के प्रति। लेकिन हम लोगों को भी शायद भ्रष्टाचार और उसकी देन घोटालों की आदत हो चुकी है तभी तो बड़े से बड़े घोटाले भी इस देश के नागरिक की तन्द्रा भंग नहीं कर पा रहे । अगर व्यापम घोटाले की ही बात करें तो इसमें 2000 से ज्यादा गिरफ़्तारियाँ हुई, 55 एफआईआर,26 चार्ज शीट दाखिल हुई, 42 संदिग्ध मौतें इस मामले से जुड़े लोगों की हुई और 2500 से ज्यादा आरोपी हैं।
बात सिर्फ घोटाले तक सीमित नहीं है बात यह है कि जिस परीक्षा की तैयारी के लिए ही छात्रों के माता पिता द्वारा स्कूल फीस के अलावा कोचिंग सेन्टर वालों को मोटी फीस दी जाती है, पहली बार में सेलेक्शन नहीं होने पर ड्राप लिया जाता है और छात्रों द्वारा जी तोड़ मेहनत की जाती है उस परीक्षा की विश्वसनीयता क्या रह जाती है। जो छात्र 25 से 40 लाख खर्च करके डाँक्टर या इंजीनियर बनता है क्या वह नौकरी लगने पर अपने द्वारा की गई इन्वोस्टमेन्ट वसूलने पर नहीं लगाएगा? तो फिर यह भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह टूटेगा कैसे? और बात यह भी है कि जब तक योग्य व्यक्ति पदों पर नहीं होंगे तो देश आगे बढ़ेगा कैसे?
हमारी ये परीक्षाएँ और इनमें बिकने वाली डिग्रियाँ माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मेक इन इंडिया ‘ और स्किल्ड इंडिया जैसे प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाएँगीं ? किसी भी देश की तरक्की में शिक्षा और शिक्षित युवा का महत्वपूर्ण योगदान होता है लेकिन जब शिक्षा विभाग में ही भ्रष्टाचार की दीमक लग जाए तो युवा नहीं देश का भविष्य दांव पर लग जाता है।
न्यायालय के फैसले से जिन छात्रों ने गलत तरीके से परीक्षा उत्तीर्ण की उन्हें सजा मिली लेकिन पूर्ण न्याय तभी होगा जब इस प्रकार के कदम उठाए जाएं जिससे भविष्य में न तो किसी छात्र के साथ अन्याय हो और न ही कोई छात्र अनुचित तरीके से डिग्री हासिल कर पाए क्योंकि भविष्य तो दोनों का ही दांव पर लगता है किसी का उसी समय किसी का कुछ समय बाद जैसे कि ये 634 छात्र।
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हिंसा के घेरे में शिक्षा

मनुष्य की विकास यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण चीज शिक्षा ही रही है| अनेक चुनौतियों से गुजरती, नए-नए पायदान चढ़ती, कभी आगे बढ़ती, कभी भटकती शिक्षा आज एक खास मुकाम पर पहुंची है| लेकिन आज भी बहुत बड़ी आबादी के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ कुछ तथ्यों को रट लेना या कुछ धनराशि कमा लेने का जुगाड़ कर लेना ही है| शिक्षा क्या है, इसका उद्देश्य क्या है, इसके तौर-तरीके क्या हैं इस बारे में नई सोच, नए प्रयोग और नई दृष्टि का नितांत अभाव है| इस कारण से शिक्षा से जुड़ी एक बहुत गंभीर समस्या पैदा होती है कि विद्यार्थियों को अनुशासित कैसे किया जाए| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| धमकी, शारीरिक दंड और लालच को लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है बिना यह जाने और सोचे कि उसका मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे हम एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं|
सबसे पहली बात तो यह है कि जब शिक्षा को जीवन से काटा गया तभी उसमें हिंसा और जोर-जबरदस्ती की नींव पड़ गयी| बच्चे के लिए जीवन और शिक्षा अलग नहीं होते, दोनों साथ-साथ चलते हैं| अपने पर्यावरण को जानते-समझते, सीखते उसके मस्तिष्क का विकास होता है और उसके परिवार का कर्तव्य होता है कि ऐसा माहौल उपलब्ध कराए जहाँ वह सुरक्षा, सरलता और सहजता से चीजों को सीखे| इसमें कहीं भी हिंसा या जोर-जबरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं है| लेकिन इसका मतलब यह नहीं है बच्चे को फूलों पर रखना है और उसे जीवन का सामना करने लायक ही नहीं छोड़ा जाए|
कम्युनिकेशन के सभी आयामों से बच्चे का परिचय जरूरी है जिसमें किसी खतरे के आने पर जोर से की गयी आवाजें भी शामिल हैं| कुत्ते, बिल्ली तक खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं तो बिजली के सॉकेट के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाजों का मतलब समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे आग के पास से हटाकर उसके रोने को धैर्यपूर्वक बर्दाश्त करना क्रूरता है| जरूरत इस बात है कि हम कोई अथॉरिटी पैदा नहीं करें जिसके सामने बच्चे को झुकना हो| हम बच्चे के साथ-साथ सीखते हैं और दोनों जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ते हैं| हमारे पास कुछ ऐसा नहीं है जो स्पेशल हो और हमें बच्चे को देना हो, उलटे हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि हमारी कंडीशनिंग, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उसमें ट्रान्सफर न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ तकनीकी जानकारी है जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से समय-समय पर देते रहनी है|
अगर अभिभावक अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभाते और बच्चे के अंदर समस्याएं घर करती रहें तो ऐसा रूप ले लेती हैं कि बड़ी कक्षा तक आते-आते अध्यापक को उन्हें सम्भालना ही मुश्किल हो जाता है और उसके पास एक ही विकल्प रहता है वह है शारीरिक दंड| विद्यार्थी को मार-पीट कर वह काबू कर लेता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| लेकिन अगर वह शारीरिक दंड का प्रयोग न करे तो यह विद्यार्थी पूरी कक्षा में अराजकता फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा| इसका वास्तविक हल तो इन परिस्थितियों का सामना कर रहे शिक्षक को अपनी समझ, ज्ञान, सहनशीलता और प्रेम से खोजना होगा; यहाँ इस संबंध में सिर्फ कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला जा रहा है|
हमारे ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, उनमें न तो शिक्षण की समझ होती है और न अपने काम के लिए पैशन| जैसे-तैसे बला टाल कर उनको अपनी नौकरी निभानी होती है उनसे किसी रचनात्मकता, नए प्रयोग और विद्यार्थी और शिक्षण से प्रेम जैसी चीजों की उम्मीद करना रेत से तेल निकलने की आशा करने जैसा है|
अगर हमारे देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| रेडिओ से हम स्मार्ट एलसीडी टीवी तक पहुँच गए लेकिन पढाई के वही तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो पास, कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली वह सब भाड़ में| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| इन हालात में अगर किसी विद्यार्थी को पढ़ने में रूचि नहीं है तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है? इतने उबाऊ, घिसे-पिटे तरीकों से सिर्फ इंसान को कमाने की मशीन बनाने के लिए की जा रही पढ़ाई में सिर्फ औसत विद्यार्थी को ही रूचि हो सकती है| जो भी किसी तरह कि समस्या से ग्रस्त होगा या वाकई में पढ़ना चाहता होगा वह अगर पढ़ाई से भागे तो इसमें आश्चर्य कैसा?
विद्यार्थी सिर्फ कुछ घंटों के लिए अध्यापक के साथ रहता है, उससे ज्यादा समय वही अपने घर-परिवार के साथ बिताता है| अगर घर के सदस्य साथ न दें तो शिक्षक के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वह किस तरह विद्यार्थी को प्रेरित करे और सकारात्मकता से भर सही मार्ग पर लाए| लेकिन फिर भी वह कुछ उपायों पर विचार कर सकता है, जैसे :-
काउन्सलिंग – यह सब से प्रभावी तरीका है| इसके लिए विशेषज्ञ की जरूरत होती है लेकिन अगर विशेषज्ञ न हो तो शिक्षक खुद ही मनोविज्ञान, मानव व्यवहार और असामान्य मनोविज्ञान का अध्ययन करके उन बच्चों कि काउंसिलिंग करे| इसके लिए प्रतिदिन कुछ समय निश्चित करे जबकि वह समस्याग्रस्त बच्चों से बात करेगा| विद्यार्थी के ऐसे व्यवहार का कारण पता लगाना फिर उसका हल खोजना काउन्सलिंग का मूल उद्देश्य है|
संवाद – समस्या से पीड़ित और अनुशासनहीन बच्चों से संवाद टूट जाता है और वे सुनते ही नहीं इसलिए उनसे संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों को अलग-अलग कई सारे अध्यापकों के साथ उनसे संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए|
खेल – ऐसे बच्चों को खेल में लगाना उपयोगी सिद्ध हो सकता है| उनकी दिलचस्पी का पता लगा कर उनको उस खेल में लगाना उनको अनुशासित करने में सहायक होता है|
योग और ध्यान – योग और ध्यान काफी लाभदायक हो सकता है|
जिम्मेदारी देना – सावधानी से ऐसे बच्चों को थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी देना उनको अनुशासित करने में मददगार होता है| पढ़ाई के बाहर की जिम्मेदारी देना भी अच्छा प्रभाव डालता है|
विशेष प्रयोग – कुछ मनो-शारीरिक क्रियाएं इन बच्चो की ऊर्जा खर्च करने और फिर उनको शिक्षा देने में सहायक होती है| चीखने, नाचने, रस्साकसी, उछलने, कूदने, रस्सी कूदने, लटके हुए बैग पर घूंसे मारने वगैरह की प्रतियोगिता, अपनी पसंद का कुछ काम करने की प्रतियोगिता वगैरह|
घर-परिवार के सदस्यों से बात|
पढ़ाने के आधुनिक तरीकों का ज्ञान प्राप्त करना और फिर उस ढंग से पढ़ाने के कोशिश|
ग्रुप से टीम की प्रेरित करना – ऐसे विद्यार्थी अक्सर ग्रुप बना लेते हैं इसलिए उनकी ग्रुप से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखी जाए और उनको ग्रुप की भावना की बजाय टीम की भावना सिखाने की कोशिश कि जाए|
कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाना भी लाभकारी होता है|
ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| असली काम तो खुद अध्यापक को करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह यह जानता है उनके इस तरह के व्यवहार का कुछ कारण है और उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका है बस उस तरीके का पता लगाना है| जब एक स्पेशल एजुकेटर आक्रामक मानसिक विकलांग बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| ये कोई आसान काम नहीं लेकिन सिर्फ आसान काम ही किए जाते तो दुनिया में कुछ भी नया, खूबसूरत और बढ़िया नहीं होता|
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बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन –Sanjay Jothe
संजय जोठेब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।
सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।
वेदान्त या किसी भी अन्य आस्तिक दर्शन के अंधभक्तों से बात करते हुए बड़ा मजा आता है. कहते हैं ध्यान एक अनुभव है, इन्द्रियातीत अनुभव है. इसकी चर्चा नहीं की जा सकती इसे अनिर्वचनीय और अगम्य अनकहा ही रहने दो. अभी कल से एक प्रौढ़ और सुशिक्षित बुजुर्ग सज्जन से चर्चा चल रही थी. अंत में वे अपने सारे कमेंट्स डिलीट करके विदा हो गये और कह गये कि मैं कहता आंखन देखि, तुम शब्दों को संभालते रहो. कितनी ऊँची लगती है न उनकी बात ? लेकिन कितनी षड्यंत्रपूर्ण और बचकानी है असल में इसे देखिये. पहली बात तो वे कहते हैं कि इन्द्रियातीत अनुभव की चर्चा हो ही नहीं सकती, अब यहाँ गौर से देखिये अनुभव का मतलब ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान है, इन्द्रियातीत अनुभव नाम का वेदांती शब्द स्वयं वेदान्त की तरह असंभव शब्द है. वेदांत का अर्थ होता है ज्ञान का अंत – यह अर्थ है तो अनर्थ कि क्या परिभाषा हो सकती है? विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि ज्ञान या इन्फोर्मेशन या अनुभव या समझ (इस अर्थ में इन्फोर्मेशन) का कोई नाश नहीं होता. वेदान्त का अर्थ ही वेद (ज्ञान) का अंत है, इस तरह ज्ञान को नष्ट करने वाले दर्शन के रूप में वेदान्त का पूरे भारत पर क्या असर हुआ है वह समझ में आता है. हजारों साल तक अज्ञानी अन्धविश्वासी और गुलाम भारत तभी संभव है जब ज्ञान का सच ही में अंत कर दिया गया हो.
तो, वे सज्जन कह गए कि इन्द्रियातीत अनुभव या ज्ञान की चर्चा असंभव है. यह रसगुला चखने जैसा है कोई व्याख्या नहीं हो सकती. कुछ हद तक ये ठीक है लेकिन रसगुल्ले और मिठास के अनुभव को आधार बनाकर बहुत ठोस तर्क और तर्कपूर्ण अनुमान से बहुत कुछ जाना जा सकता है. इसी पर कोमन सेन्स और विवेक सहित कल्पनाशीलता टिकी हुई है जो कि किसी भी तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है.
कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव कामन सेन्स से बड़ा नहीं होता. हो ही नहीं सकता. कामन सेन्स ने ही वह विज्ञान तकनीक, सभ्यता, नैतिकता और सौन्दर्यबोध दिया है जिसने हमें इंसान बनाया है. अब इन इंसानों को गुलाम और अन्धविश्वासी बनाकर उलझाए रखने के लिए सबसे जरुरी काम क्या होगा?
निश्चित ही तब सबसे जरुरी काम होगा कि ज्ञान के आधार और उसकी संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए. सभी आस्तिक दर्शन और खासकर हिन्दू वेदान्त यही करता है. आजकल के बाबाओं को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, श्री श्री या मोरारी बापू जी या आसाराम बापूजी को देखिये. वे इन्द्रियों से हासिल ज्ञान को नाकाफी बताते हुए किसी अदृश्य अश्रव्य और अगम्य को अत्यधिक महत्व देते हैं और इस एक मास्टर स्ट्रोक से वे उस तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान, समाधी और निर्विचार सहित आनंद और अनुभव मात्र की व्याख्या का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं. इस तरह ज्ञान अनुभव और इनपर खडी सभी संभावनाओं की चाबी वे अपने पास रख लेते हैं और न सिर्फ अपना रोजगार बल्कि इस देश की जड़ता को भी सदियों सदियों तक बनाये रखते हैं.
क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि भारत में षड्दर्शन के बाद सातवाँ दर्शन क्यों पैदा नहीं हुआ? क्या दिक्कत है? यूरोप में तो हर दार्शनिक अपना नया स्कूल आफ थॉट आरंभ कर सकता है लेकिन यहाँ अरबिंदो, विवेकानन्द, शिवानन्द, योगानन्द सहित ओशो जैसे बाजीगरों को भी इन छः डब्बों में से कोई एक डब्बा पकड़ना होता है वरना वे भारतीय ज्ञान और दर्शन की छोटी सी और उधार ट्रेन से बाहर निकाल दिए जायेंगे.
लेकिन यूरोप में यह ट्रेन बहुत लंबी है. जितना चाहे उतना डब्बे जोड़ते जाइए. इसी से वहां नये ज्ञान विज्ञान तकनीक और सौंदर्यशास्त्र जन्म लेते ही रहते हैं. भारत की पूरी कहानी चार वर्ण और छः दर्शनों पर खत्म हो जाती है. यहाँ हाथ के पंजों की दस उँगलियों के परे कोई गिनती जाती ही नहीं. दस पर बस आ जाता है.
यह अगम्य और अनुभवातीत क्या है? अगर यह है तो आप या मैं या कोई और इसकी चर्चा कैसे कर रहा है? अगर यह इतना ही दूर और अगम्य है तो इसकी चर्चा क्यों करते हैं? ये आत्मा परमात्मा और समाधि की रात दिन की बकवास क्यों पिलाई जाती है? फिर जब कोई इनके बारे में सच में ही जिज्ञासा करे तो घबराकर कहेंगे कि ये सब अगम्य अगोचर है. अरे भाई जब ये अगम्य अगोचर अनिर्वचनीय है तो उसकी रात दिन मार्केटिंग और बकवास करते ही क्यों हो?
और ध्यान रखियेगा उसकी मार्केटिंग इस तरह की जाती है जैसे अभी ये बाबाजी आपके हाथ में निकालकर रख देंगे “अभी और यहीं” की भाषा में बात करेंगे और हजारों जन्म की साधना की बात भी करेंगे, गुरु की महिमा, शरणागती और गुरु शिष्य परम्परा की बात भी करेंगे.. ये ओशो रजनीश का सबसे मजेदार खेल रहा है. अमन और अनात्मा की संभावना पर जो ध्यान का अनुभव खड़ा है उसे आत्मा की बकवास के साथ सिखाते हैं. जब व्यक्ति सनातन आत्मा की चर्चा सुनकर “मैं” को मजबूत बना लेता है तब कहते हैं कि मैं से मुक्त होना ही सच्ची मुक्ति है.
अब यहाँ खेल देखिये एक तरफ आत्मा की सनातनता का सिद्धांत देकर आत्मा (मैं, मेरे होने के भाव) को मजबूत कर रहे हैं. फिर साधना सिखा रहे हैं कि इस मैं को विलीन कर दो, ये वेदान्त की जलेबी है. दूसरी तरफ बुद्ध को देखिये वे कहते हैं कि यह मैं होता ही नहीं इसे जान लो. तब इस मैं से मोह और आत्मभाव पैदा ही नहीं होगा. तब ध्यान समाधि या तादात्म्य हीनता एकदम आसान हो जाती है. लेकिन वेदान्त यह नहीं होने देता. वह सनातन आत्मा या मैं के भाव को ठोस खूंटे की तरफ गाड़ देता है फिर इसे विलीन करने का इलाज भी बता है. मतलब पहले कीचड में पाँव डलवाता है फिर स्नान भी करवाता है. इस प्रकार वेदांती हमाम और इसके ठेकेदारों का रोजगार बना रहता है.
अब ध्यान दीजिये मैं को विलीन करने की टेक्नोलोजी असल में बुद्ध की अनत्ता की या अनात्मा की टेक्नोलोजी हैं जिसे ये चुराकर आत्मा की टेक्नोलोजी के नाम से मार्केटिंग कर रहे हैं. ऊपर से तुर्रा ये कि अनत्ता या मैं के विलीन होने पर जो शून्य बच रहता है उसे ये “आत्मज्ञान” कहते हैं. हद्द है मूढ़ता की.
मतलब समझे आप? आत्मा को मिटाने पर जो ज्ञान हुआ उसे बुद्ध की तरह अनात्मा का ज्ञान कहने में ये डरते हैं कि कहीं चोरी न पकड़ी जाए. उसे ये अनात्मा न कहके आत्मा का ज्ञान कहते हैं. हालाँकि ये भली भाँती जानते हैं कि आत्मा या स्व के विलीन होने पर ही इनका मोक्ष या बुद्ध का निर्वाण घटित होता है और इसीलिये तःताकथित अध्यात्म या धर्म की सारी सफलताएं असल में अनात्मा की सफलता हैं. फिर भी इनका षड्यंत्र देखिये कि इसके बावजूद भी आत्मा और उसकी सनातनता का ढोल बजाना बंद नहीं करते. यह कितना शातिर और गहरा खेल है आप अनुमान लगाइए.
इतना स्पष्ट सा विरोधाभास क्या इन्हें नजर नहीं आता? बिलकुल नजर आता है. लेकिन दिक्कत ये है कि अगर ये समाधि या ध्यान के अनुभव को अनात्मा के अनुभव या स्व (मैं/मेरा) के निलंबित हो जाने के अनुभव की तरह प्रचारित करने लगें तो इनमे और बुद्ध में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. तब पूरे हिन्दू धर्म और वेदान्त को चोरी पकड़ी जायेगी.
इस खेल को गौर से देखिये और समझिये मित्रों. इस देश के शोषक धर्म पर इस स्तर से हमला करेंगे तो यह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा और बहुत प्रकार से हम शोषण और अंधविश्वासों को चुनौती दे सकेंगे. तब भारत में नैतिकता, विज्ञान, न्यायबोध और धम्म का मार्ग आसान हो सकेगा.
(लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)
– © संजय जोठे -
प्यार में बाजार
Amar Tripathi
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चारों तरफ प्रेम का परनाला बह रह रहा हैं—सोशल मीडिया में, रेडियो-टेलीविजन में, अखबारों में. युवाओं को फ़िल्मी गानों के माध्यम से प्रेम करने के लिए उकसाया जा रहा है, जिससे कहीं वे इस पचड़े में पड़े बिना ही 14 फरवरी न निकाल दें.
इस सबका वास्तव में वाजिब असर भी हुआ है, और इतना हुआ है कि वे अब जाग गए हैं और लगता है कि प्रेम करके ही मानेंगे और वह भी पूरे विधिविधान से. जो नौजवान अभी भी इस हल्ले में नहीं आ पा रहे हैं वे दूसरी तरफ जाकर “सस्कृति” नामक भैंस दुहने में लग गए हैं. वे इस बात से भी रुष्ट हैं कि बाजार उनके प्रतीकों जैसे लाठी, त्रिशूल और परदे को वैलेंटाइन वीक के आयोजनों में सही जगह नहीं देता. इसलिए वे प्रेमियों के साथ वही सुलूक करने में लग जाते हैं जो आज के लगभग १८०० साल पहले सेंट वैलेंटाइन के साथ तत्कालीन रोमन सम्राट ने किया था–यानी पिटाई.
बाजार की मार्फ़त ही पता चला है कि प्रेम करना और उसे जाहिर करना खासा खर्चे वाला काम है और यह सात दिन में स्टेप-बाई-स्टेप ही किया जा सकता है. गुलाब, चॉकलेट, टेडी और अन्य उपहारों के जोर से आप प्रस्ताव को गौर करने लायक बनाते हैं और फिर स्वीकृत हो जाने पर ‘हग’ या ‘किस’ करते हैं तब कहीं जाकर मामला जमता है, और प्रेम, जो अब तक शायद कहीं अटका हुआ था, अचानक हो बैठता है और बात आगे बढती है. अगर ये सब आपकी हैसियत के बाहर बैठता है तो आप और चाहे जो कर सकते हों, प्रेम तो बिलकुल नहीं कर सकते.
मगर इतना कर सकने की हैसियत के साथ आप चाहें तो “मेरी जां, जाने जिगर, इकरार, बेकरार, प्यार, यार, दिलदार, बहार, चन्ना जैसे बीस तीस शब्द जो बार-बार अलग अलग फ़िल्मी गानों में आकर आपको बचपन से परेशान करते रहे हैं उनको आपस में लपेट कर, कुछ कविता या शायरी टाइप के एक नये टॉप-अप वाउचर से अपने प्रेम की रिचार्ज वैल्यू बढ़ा सकते हैं.
यकीन न हो तो अपने यार/दिलदार से प्यार और पैसा में से किसी एक को चुनने को कहिये तो वह निश्चित रूप से आपको ही छोड़ देगा/देगी क्योंकि प्यार और पैसा आपस में कुछ इस तरह गुत्थम गुत्था हैं कि समझ में नहीं आता कि भला उनमें कुश्ती हो रही है या प्यार. हालाँकि दोनों में ख़ास फर्क भी नहीं है.
और ऐसा क्यों न हो? can you buy modafinil online legally www.guardianfueltech.com आखिर इसी काम के लिए और इसी मौसम में, अमेरिका में २० अरब डॉलर और इंग्लॅण्ड में डेढ़ अरब पौंड और इससे कुछ ही कम फ़्रांस में प्रेमी जन हर साल फरवरी में खर्च करते हैं तो हम क्यों पीछे रह जाएँ ?
वैसे बड़े धीरज का काम है कि अगर आप को प्यार हो जाए और आप उसके इजहार के लिए फरवरी का इंतज़ार करें… कम से कम ये मुझ जैसे नकारा आदमी के बस की बात तो नहीं.
Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2017/02/blog-post.html