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  • ऑस्ट्रेलिया व लाकडाउन — Vivek Umrao

    ऑस्ट्रेलिया व लाकडाउन — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री दुनिया के एकमात्र नेता हैं, जिन्होंने अपने देशवासियों से अपनी पहली बातचीत में ही बिलकुल स्पष्ट कहा कि यह जो हो रहा है वह मानव जाति के इतिहास में नहीं हुआ। हम नहीं जानते कि हमें कब तक इससे लड़ना पड़ेगा, लेकिन हम लड़ेंगे, हम देश के लोग साथ मिलकर लड़ेंगे।

    ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पहले दिन से ही साफ कहा कि हो सकता है कि हमें 6 महीने लड़ना पड़े, 12 महीने लड़ना या और अधिक। हमें कुछ नहीं मालूम कि कब तक लड़ना पड़ेगा। लेकिन हम लड़ते रहेंगे। हम एक दूसरे की देखभाल करते हुए, एक दूसरे पर विश्वास करते हुए लड़ते रहेंगे। पहले दिन से ही ऑस्ट्रेलिया सरकार ने जो भी योजनाएं, रणनीतियां व निर्णय बनाए/लिए वे कम से कम 6 महीने का समयावधि मानकर लिए।

    ऑस्ट्रेलिया के दूरदर्शी प्रधानमंत्री ने पहले ही दिन से देश का खजाना लोगों के लिए खोल दिया। उनका कहना रहा कि यदि ऐसी ऐतिहासिक परिस्थितियों में भी देश का संसाधन देश के लोगों के लिए काम नहीं आएगा तो कब आएगा। उन्होंने लोगों को भरोसा दिया कि चिंता की बात नहीं है, ऑस्ट्रेलिया इतना भोजन का उत्पादन करता है जितना ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से कई गुना अधिक जनसंख्या के लिए पर्याप्त से अधिक होता है, इसलिए हमें कितना भी लंबा लड़ते रहना पड़े हमें भोजन की परेशानी नहीं होगी।

    सरकार समझ गई थी कि कोरोना क्या बला है, इसलिए ऑस्ट्रेलिया सरकार ने पहले दिन से हीला हवाली नहीं किया। स्थितियां बिगड़ने का या दूसरे देश क्या कर रहे हैं का इंतजार नहीं किया। ऑस्ट्रेलिया सरकार ने दुनिया के देशों की नकल नहीं की। अपने देश के संसाधन, व्यवस्थाओं, लोगों व स्थितियों के आधार पर निर्णय लिए। दूसरे देशों में किए जा रहे ट्रायल और एरर को लगातार ऑब्जर्व किया ताकि निर्णय लेने में कम से कम गलतियां हों।

    इटली में बूढ़े लोगों की ताबड़तोड़ मौतें देखकर, ऑस्ट्रेलिया सरकार ने पहले दिन से ही अपने देश के बूढ़े लोगों को सुरक्षित रखने के इंतजामात किए। दक्षिण कोरिया में रातोंरात कम्युनिटी टू कम्युनिटी संक्रमण को देखकर कम्युनिटी टू कम्युनिटी संक्रमण से जितनी अधिक देर तक बचा जा सके, बचा जाए का प्रयास किया।

    ऑस्ट्रेलिया में पहला केस जनवरी के अंत में मिला, जाहिर है कि ऑस्ट्रेलिया में टेस्टिंग शुरू हो चुकी थी। केस मिलते ही सतर्कता के साथ बढ़ते हुए दायरों के साथ टेस्टिंग शुरू हो गई। सतर्कता व समय रहते सावधान रहने के कारण कोरोना का फैलाव नियंत्रण में चल रहा था।

    जो काम सबसे पहले किया वह था, लोगों के लिए कोरोना को लेकर अतिरिक्त योजनाएं, सुविधाएं इत्यादि लागू करना। उसके बाद लोगों को सुझाव दिए गए कि कोरोना से बचाव के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए। लोगों को कोरोना के संदर्भ में जागरूक किया गया।

    राज्यों में कोरोना को लेकर स्वास्थ्य आपातकाल अलर्ट जारी हो गए। लोगों को सुझाव दिए जाने लगे कि कैसे कोरोना संक्रमण का फैलाव की गति कम की जा सकती है।

    ऑस्ट्रेलिया में तीन चौथाई केस उन लोगों के हैं जो बाहर से ऑस्ट्रेलिया आए। यह बात इसलिए कही जा सकती है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने लोगों में कोरोना की टेस्टिंग में कोताही नहीं की। लगातार व अधिक से अधिक टेस्टिंग करता रहा। दुनिया में सबसे अधिक, गति व बारीकी से टेस्टिंग करने वाला देश है।

    लापरवाही व चूक

    सबकुछ नियंत्रण में चल रहा था लेकिन छोटी सी चूक व लापरवाही हो गई, जिसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

    लापरवाही यह हुई कि अलर्ट जारी होने व सरकार की सलाह जारी होने के बावजूद लगभग 2700 लोग समुद्री क्रूज शिप में न्यूजीलैंड घूमने चले गए। इन लोगों ने यही सोचा होगा कि ऑस्ट्रेलिया सतर्क है, न्यूजीलैंड सतर्क है, इसलिए न्यूजीलैंड घूमने जाने में कुछ नहीं होगा। चूक यह हुई कि जब ये लोग 10-12 दिन बाद ऑस्ट्रेलिया के सिडनी पोर्ट पर उतरते हैं तो सिडनी पोर्ट ने सोचा कि ये लोग ऑस्ट्रेलिया से न्यूजीलैंड ही तो गए थे। कोरोना संक्रमण नहीं हुआ होगा। ये 2700 लोग विभिन्न राज्यों से थे, अपने-अपने स्थानों को चले गए।

    मालूम पड़ा कि इनमें से लगभग एक चौथाई लोग कोरोना से न्यूजीलैंड से आते समय संक्रमित हो चुके थे, लक्षण बाद में दिखना शुरु हुए। चूंकि ये लोग लक्षण न दिखने के कारण एक दो दिन सामान्य जीवन जी रहे थे इसलिए इनके कारण कम्युनिटी टु कम्युनिटी संक्रमण का खतरा बढ़ गया। इसी घटना के बाद सरकार ने सलाह की बजाय विदेश यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया। सरकार ने कहा कि आप लोगों से जो लापरवाही हुई, वह नहीं होनी चाहिए थी। आपने ऑस्ट्रेलिया के कई क्षेत्रों में कम्युनिटी टु कम्युनिटी संक्रमण का खतरा बढ़ा दिया है। 

    ऑस्ट्रेलिया में अभी तक लाकडाउन नहीं हैं

    ऑस्ट्रेलिया में अभी तक लाकडाउन नहीं है। बहुत लोग भारतीय सोशल मीडिया में पिछले कई दिनों से बता रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया में 6 महीने का लाकडाउन हो गया है। जितना दावे से लोग बता रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कोई बड़ी बात नहीं कि ऐसी बात भारत का मीडिया भी बता रहा हो। मैं भारत के अखबार पढ़ता नहीं सो जानकारी नहीं। जो मेरे मित्र लोग संपादक हैं, जब वे कोई अपने अखबारों/मैगजीनों की कोई लिंक भेजते हैं तो जरूर पढ़ने का प्रयास करता हूं, मुझे विश्वास रहता है कि मेरे संपादक व पत्रकार मित्र मेरे पास कोई फालतू या अंडबंड चीज नहीं भेजेंगे।

    सबसे बड़ी बात यह कि ऑस्ट्रेलिया सरकार ने लोगों के साथ लगातार संवाद किया, लोगों को अंधेरे में रख कर निर्णय नहीं लिए, छोटी सी छोटी बात से लोगों को अवगत कराया। वैसे भी ऑस्ट्रेलिया में जो लोकतंत्र व्यवस्था है उसमें सरकार राजा व लोग प्रजा नहीं होते। सरकार लोगों की प्रतिनिधि होतीं हैं, प्रतिनिधि मतलब लोगों का प्रतिनिधि, इसलिए लोगों को विश्वास में लिए बिना लोगों के संदर्भ में सरकार अचानक निर्णय लेकर लोगों पर कुछ थोप नहीं सकती है।

    इसलिए ऐसा बिलकुल भी संभव नहीं कि एक दिन अचानक सरकार घोषणा कर दे कि पूरे देश में लाकडाउन हो गया है। कई ऐसे शहर हैं जहां लोग मानसिक रूप से लाकडाउन के लिए तैयार हो रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि लाकडाउन न हो, क्योंकि सरकार जानती है कि एक बार लाकडाउन हुआ तो महीनों-महीनों चलता ही रहेगा।

    लेकिन फिर भी क्रूज-शिप से घूमने गए लोगों की लापरवाही व सिडनी की पोर्ट अथारिटी की छोटी सी चूक ने कम्युनिटी टू कम्युनिटी संक्रमण का खतरा बढ़ा दिया है, यदि स्थितियां नियंत्रण में नहीं आती हैं तो कुछ शहरों व कुछ राज्यों में लाकडाउन हो सकता है।

    ऑस्ट्रेलिया में लाकडाउन नहीं है। जितनी तैयारी के साथ ऑस्ट्रेलिया चल रहा है, यदि लाकडाउन हो भी जाता है तो लोगों को परेशानी कम से कम होनी है, अफरातफरी नहीं होनी है। लोगों को विश्वास में लेकर लाकडाउन होगा, इतना स्मूथली होगा कि लोगों को महसूस तक नहीं होगा कि उनके यहां लाकडाउन है।


    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • यदि हम यह समझ पाएं कि लाकडाउन कोरोना संक्रमण को खतम नहीं करता, तब ही हम बहुत कुछ सोचने समझने के लिए तैयार हो पाएंगे — Vivek Umrao

    यदि हम यह समझ पाएं कि लाकडाउन कोरोना संक्रमण को खतम नहीं करता, तब ही हम बहुत कुछ सोचने समझने के लिए तैयार हो पाएंगे — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    दुनिया में ऐसे भी देश हैं जहां के लोगों को यह लगता है कि लाकडाउन से कोरोना का इलाज हो जाता है या लाकडाउन कोरोना को खतम कर देता है। नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है। लाकडाउन कोरोना को खतम नहीं करता, न ही इलाज करता है।

    दरअसल जब किसी स्थान, शहर या देश में कोरोना का संक्रमण कोरोना से संक्रमित मानव के संपर्क में आए बिना ही, मतलब कम्युनिटी टू कम्युनिटी, होना शुरू हो जाता है तब मामला भयंकर रूप से अनियंत्रित होना शुरु हो जाता है। यदि यह किसी शहर, राज्य या देश में शुरू हो चुका है तो कोरोना के संक्रमण को अनियंत्रित होने से नहीं रोका जा सकता है। जिन शहरों, इलाकों व देशों में कोरोना संक्रमित कुछ लोग भी यदि एक दो दिन भी छुट्टा घूम लेते हैं, तो पता भी नहीं चलता लेकिन मामला बहुत अधिक फैलना शुरू हो जाता है। पता लगते-लगते देर हो चुकी होती है। इसीलिए टेस्टिंग बहुत जरूरी होती है ताकि कोरोना संक्रमित लोगों को दूसरे लोगों में मिश्रित होने से रोका जा सके।

    मनुष्यों से, वस्तुओं से होना शुरू हो जाता है, पता नहीं चलता कि संक्रमण का स्रोत मनुष्य है या वस्तु। संक्रमण है कि फैलता रहता है। जब कम्युनिटी टू कम्युनिटी संक्रमण होना शुरु हो चुका होता है, तो कुछ समय बाद स्थितियां अनियंत्रित होने लगतीं हैं। तब लाकडाउन किया जाता है, ताकि जब लोग बाहर निकलेंगे ही नहीं। बाहर निकलकर किसी वस्तु या मनुष्य के संपर्क में आएंगे ही नहीं तो संक्रमित नहीं होंगे। लाकडाउन इसीलिए किया जाता है।

    लेकिन यदि लाकडाउन में संक्रमित लोगों को बाकी लोगों से अलग नहीं किया गया तो लाकडाउन बैकफायर कर जाता है।

    क्योंकि जो संक्रमित है वह अपने साथ रह रहे दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर देता है। इस कोरोना वायरस के साथ समस्या यह है कि बहुत लोगों में संक्रमण के बावजूद लक्षण नहीं दीखते हैं। बहुत लोगों में कुछ दिनों बाद लक्षण दीखते हैं। लेकिन ये लोग दूसरे लोगों को उसी दिन मतलब पहले दिन से संक्रमित कर रहे होते हैं, जिस दिन उनके शरीर में किसी वस्तु या मानव के संपर्क में आने के बाद वायरस प्रवेश करता है।

    इसीलिए कोरोना के लिए टेस्टिंग सबसे अहम बात होती है। टेस्टिंग होने से सतर्कता बरती जा सकती है, कम्युनिटी टु कम्युनिटी फैलाव से बचा जा सकता है, या विलंबित किया जा सकता है ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। लोगों को मानसिक रूप से भविष्य में होने वाले लाकडाउन जैसी स्थितियों के लिए तैयार किया जा सके ताकि लोगों को असुविधा न हो या कम से कम हो।

    लाकडाउन इसलिए होता है ताकि लोग संक्रमित मनुष्य या संक्रमित वस्तु के संपर्क में आने से बचें। लेकिन यदि संक्रमित मनुष्यों की छटनी नहीं होगी तो संक्रमण की प्रक्रिया चलती ही रहेगी। जिनको संक्रमण नहीं हुआ है, उनको आज नहीं कल होगा ही। जो संक्रमण से ठीक हो चुके हैं, उनको फिर से होगा।

    जो देश जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी के प्रथम सप्ताह तक भी नहीं चेते थे, कोरोना को गंभीरता से नहीं लिया था। वहां के लोगों ने सतर्कता नहीं बरती थी। तो वहां कुछ दिनों में ही संक्रमण कम्युनिटी टू कम्युनिटी होना शुरू हो गया था।

    वह बात अलग है कि देश कोरोना की टेस्टिंग ही न करें और घोषणाएं करते रहें कि उनके यहां कोरोना के लोग नहीं हैं या कम हैं, फिर यही आकड़े WHO को देते रहें। WHO दुनिया के देशों में सीधी टेस्टिंग नहीं कर रहा है जो उसके पास अपने खुद के आकड़े होंगे, WHO के पास वही आकड़े हैं जो किसी देश की सरकार से उसको मिलते हैं। यही कारण है कि WHO के पास जो भी आकड़े हैं, उनकी सत्यता व प्रामाणिकता इस पर आधारित होते हैं कि उस देश ने कितनी व किस तरह से टेस्टिंग की है। मान लीजिए कि किसी देश ने टेस्टिंग ही नहीं की तो उस देश के आकड़े भी कम आएंगे भले ही उस देश में हजारों कोरोना केस हर रोज बढ़ रहे हों।

    कोरोना संक्रमण की गंभीरता को जानिए, समझिए, सोच का दायरा बदलिए, जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलिए।

    इसलिए भले ही आपने पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण करना ही सीखा हो, लोगों को जूते की नोक पर रखना ही सीखा हो। भले ही हिंसा करके, झूठ बोल कर, फरेब करके आपने संपत्तियां खड़ी की हों, बड़े आदमी बने हों। भले ही करप्शन करके बने हों, भले ही तीन तिकड़म करके बने हों। इन सबको ही आपने जीवन की प्रैक्टिकलिटी माना हो, यही आपको जीवन का तरीका लगता हो। इसलिए इनसे बाहर निकल कर सोचने, समझने व जीने की औकात आपकी न हो।

    मेरी एक बात मानिए कि भले ही आपके बस की नहीं हो, लेकिन हो सके तो संवेदनशील होने का प्रयास कीजिए। क्योंकि एक समय ऐसा आएगा जब आपके बचने की संभावना सबसे कम होगी और जिन्हें आप मनुष्य तक नहीं मानते, उनके बचने की संभावनाएं आपकी तुलना में बहुत अधिक होंगी।

    आज नहीं तो कल, एक महीने बाद, दो महीने बाद, तीन महीने बाद, चार महीने बाद, पांच महीने बाद। कभी न कभी तो उन लोगों को भी भोजन व वस्तुओं की कमी पड़ेगी ही, जिनको आज लग रहा है कि उनको कमी नहीं पड़ेगी, यदि पड़ी तो पैसे से खरीद लेंगे।

    मान लीजिए कल को किसानों ने पैसे के बदले आपको या सरकार को अपना उत्पाद बेचने से मना कर दिया। तो क्या सेना से गोली चलवा कर किसानों का सामान लूटिएगा, सेना का अधिकतर जवान गांव का होता है, क्या वे अपने ही माता पिता चाचा चाची बुआ फूफा मामा मामी दाई बाबा नाना नानी की गोली चला कर हत्याएं करके आपको भोजन उपलब्ध कराएंगे?

    हो सकता है कि मेरी बातें आपको मेरा पागलपन लगता हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि आप यह मान बैठे हैं कि लाकडाउन से सब ठीक हो जाएगा। कुछ दिनों की परेशानी के बाद आप पुराने ढर्रे पर जीवन जीना शुरू कर देंगे। आपको यह भी लगता है कि गर्मी आने पर सब ठीक हो जाएगा। आप बिलकुल गलत सोचते हैं। मेरी बात नोट कर लीजिए, सबकुछ पहले जैसा नहीं होगा, पुराने ढर्रे जैसा नहीं होगा। रही बात कोरोना की तो साल दो साल तो कोरोना का कहर मंडराता ही रहेगा।

    यदि आपको यह लगता है कि कुछ सप्ताहों के लाकडाउन के बाद सबकुछ पुराने जैसे ढर्रे में आ जाएगा तो आपमें दृष्टि नहीं है, आपमें देख पाने की औकात ही ही नहीं है। यदि आपको लगता है कि भले ही लाकडाउन से कुछ न होगा लेकिन गर्मी से हो जाएगा। गर्मी आते ही एक झटके में रातों रात कोरोना का संक्रमण खतम हो जाएगा और सबकुछ पुराने जैसा हो जाएगा तो आपमें बिलकुल भी दृष्टि नहीं है।

    मान भी लीजिए कि गर्मी कोरोना को खतम देती है, तब भी आप पुराने ढर्रे पर नहीं लौट पाएंगे। क्योंकि दुनिया के हर देश में गर्मी नहीं होती। वैसे भी आधी दुनिया में सर्दी होगी। तो कोरोना जीवित रहेगा।

    जितनी सुख सुविधाएं आप भोगते हैं, आपका देश उन पर आत्मनिर्भर हो ऐसा जरूरी नहीं है। जरूरी नहीं कि सभी खाद्य पदार्थों पर आपका देश आत्मनिर्भर हो ही। जरूरी नहीं कि जिन दवाओं व चिकित्सकीय सुविधाओं का आप उपभोग करते हैं, उन पर आपका देश आत्मनिर्भर हो ही। जरूरी नहीं कि जिस विज्ञान व तकनीक पर आप निर्भर हैं, उन पर आपका देश आत्मनिर्भर हो ही।

    जरूरी नहीं कि जिस लग्जरी व सुविधाओं में आप रहने के आदी हो चुके हैं। या जिन वस्तुओं के मालिक होने पर आप खुद को दूसरों से बड़ा आदमी होने के अहंकार में जीते हैं, उन वस्तुओं की सप्लाई ही न हो आपके देश को। वस्तुएं तो एक न एक दिन खराब होंगी ही। तब क्या करेंगे आप?

    कोरोना जैसी परिस्थितियां मानव जाति के लिए विरली घटनाएं हैं, इनसे चलताऊ व रूटीन मानसिकता, सोच, रणनीतियों, तौर तरीकों इत्यादि से नहीं निपटा जा सकता है। व्यापक व दूरदृष्टि चाहिए होती है। क्योंकि जो कभी हुआ ही नहीं, उससे रूटीन व चलताऊ ढंग से कैसे निपटा जा सकता है।

    इसलिए जरूरत होती है कि अपने जीवन में जो भी रूटीन में सीखा समझा है, जो भी चलताऊ जाना समझा सीखा है। जिन तौर तरीकों से समस्याएं हल करते आए हैं। जिन तौर तरीकों से सफलता पाते आए हैं। यूनिवर्सिटी में पाई गई डिग्रियों, की जा रही नौकरियों, जमा की गई संपत्तियों, कब्जाई गई संपत्तियों, पद प्रतिष्ठा व सेलिब्रिटिज्म इत्यादि के अहंकार व कंडीशनिंग से बाहर आकर जीवन को समझना की चेष्टा की जाए। यह मानव जाति के लिए बहुत सारी परिभाषाओं को पुनर्भाषित करने का ऐतिहासिक अवसर है।

    मुझे आशा है कि इस वायरस के चंगुल से हम एक साल या दो साल या तीन साल में निकल ही आएंगे, लेकिन हो सकता है कि भविष्य में इससे भी भयानक वायरस के चंगुल में फंस सकते हैं, जिससे निकल ही न पाएं। इसलिए मानव जाति को परिभाषाएं, सोच, मानसिकता व जीवन शैली बदलने का अवसर मिला है, जिसे खोना नहीं चाहिए।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • कोरोना संक्रमण-लाकडाउन क्या होता है, आइए जानते समझते हैं — Vivek Umrao

    कोरोना संक्रमण-लाकडाउन क्या होता है, आइए जानते समझते हैं — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    अभी जो लाकडाउन दुनिया के अनेक देशों में चल रहे हैं, कुछ देशो में तो पिछले अनेक सप्ताहों से चल रहे हैं, नहीं पता कि कब तक चलेंगे।  जिन देशों में सरकारें अपने लोगों को विश्वास में लेकर चलतीं हैं, उन देशों ने लोगों से कह रखा है कि नहीं पता कि लाकडाउन कब तक चलेंगे।  कोरोना (COVID-19) ने दुनिया को घुटनों पर लाकर खड़ा कर दिया है। मानव इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ।

    यही कारण हैं कि दुनिया के उन देशों में जहां व्यवस्था सामंती प्रवृत्ति की नहीं है। उन देशों के प्रशासन, लोगों के साथ बहुत ही अधिक मानवीय व विश्वसनीय व्यवहार कर रहे हैं। ताकि सबको साथ लेकर कोरोना से अंतिम सांस तक लड़ा जा सके। जिन देशों की व्यवस्थाओं का चरित्र सामंती है, उन देशों के प्रशासन को चूंकि सामंती प्रवृत्ति से इतर कुछ करना आता ही नहीं है, तो पुराने ढर्रे से ही चल रहे हैं।

    मैं इस लेख पर चर्चा करना चाहता हूं कि लाकडाउन है क्या और क्यों। यह लाकडाउन आपराधिक कृत्य के लिए नहीं है, कि अनेक लोगों ने आपराधिक कृत्य किए हैं, इसलिए लाकडाउन किया गया है। दरअसल देशों में लाकडाउन कोरोना के संक्रमण की गति को धीमा करने के लिए या संक्रमण से हर संभव बचने के लिए किए जा रहे हैं। इसलिए मैं इसे संक्रमण-लाकडाउन कह रहा हूं।

    कोरोना वायरस का संक्रमण मानव से मानव फैलता है। मानव से मानव फैलने का यह मतलब नहीं कि कोई मानव दूसरे मानव को छुए ही। अलग-अलग धातुओं पर कोरोना वायरस के जीवित रहने की आयु अलग-अलग होती है। इसलिए यदि किसी वस्तु को किसी कोरोना वाले मानव ने छुआ या प्रयोग किया है तो उस वस्तु पर कोरोना वायरस आ सकता है, अब यदि उस वस्तु को कोई दूसरा मानव छूता है या प्रयोग करता है तो कोरोना वायरस उस मानव पर आ जाता है।

    इसी प्रकार यदि कोई कोरोना वाला मानव छींकता है, खांसता है या जम्हाई लेता है तो निकलने वाली वायु इत्यादि के माध्यम से कोरोना दूसरे मानव तक पहुंच जाता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि जिन लोगों को संक्रमण है, वे लोग मास्क जरूर पहनें ताकि उनके मुंह व नाक से निकलने वाले विषाणु दूसरे मानव तक न पहुंच पाएं क्योंकि वायु की गति व तीव्रता कम हो जाती है।

    मास्क पहने होने के बावजूद वायु के माध्यम से कोरोना वायरस दूसरे मानव तक पहुंच सकता है, इसीलिए अलग-अलग देशों के मानकों के आधार पर एक मानव से दूसरे मानव के बीच की दूरी एक से डेढ़ मीटर की दूरी रखने की बात की जाती है, जिसे पाश्चात्य देशों में सोशल डिस्टेंसिंग कहा जाता है।

    कोरोना वायरस के कारण लाकडाउन की जरूरत क्यों पड़ी

    विकसित देश उन देशों में से हैं जहां चीन से लोगों के आवागमन के कारण कोरोना का प्रवेश सबसे पहले हुआ। चूंकि इस तरह की घटना मानव जाति के लिए ऐतिहासिक घटना है और यह बिलकुल अलग चरित्र का वायरस था।

    जब तक इस वायरस के चरित्र को जाना समझा जाता, तब तक स्थितियां हाथ से निकल चुकी थीं। इटली में बुजुर्गों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण और उनमें संक्रमण शुरू हो जाने के कारण सैकड़ों मौतें होना शुरू हो गईं जो कि इन देशों के लोगों के लिए अप्रत्याशित घटनाएं थीं। दुनिया में ऐसे देश भी हैं जहां सामान्य बीमारियों से भी हजारों लोगों के हर दिन मरते रहने से भी देश के लोगों को फर्क नहीं पड़ता।

    कोरोना का संक्रमण लगातार फैल रहा था। लोग कितना भी सतर्क रहते, कितना भी जागरूक रहते, संक्रमण इतना अदिक फैल चुका था कि कहां से कहां फैल रहा था पता ही नहीं चल रहा था। इसलिए यह कोशिश की गई कि यदि मानव की गतिविधियां ही बिलकुल न्यूनतम कर दी जाएं तो कोरोना वायरस को प्रसार करने के अवसर बहुत ही कम मिलेंगे जिससे कि संक्रमण की गति कम हो सकेगी।

    इसीलिए लाकडाउन का विचार लाया गया। जब लोग गतिविधि ही नहीं करेंगे तो किसी वस्तु या मानव को संक्रमित नहीं करेंगे और न ही उनसे संक्रमित होंगे। इसीलिए लोगों की गतिविधियों को मूलभूत सुविधाओं तक सीमित कर दिया गया।

    इसलिए इन देशों में लाकडाउन करना पड़ा। फिर इन देशों की देखादेखी दूसरे अनेक देशों ने भी लाकडाउन करना शुरू किया।

    विभिन्न देश मोटा-मोटी दो प्रकार से लाकडाउन कर रहे हैं

    जो विकसित देश हैं, जिन देशों में व्यवहारिक लोकतंत्र है, लोगों को विश्वास में लिए बिना निर्णय नहीं लिए जाते। जहां लोगों व सरकारों के बीच राजा व प्रजा जैसा रिश्ता न होकर, लोक व लोकप्रतिनिधि जैसा रिश्ता होता है। ऐसे देशों ने लाकडाउन धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से किया, योजना बनाते हुए किया ताकि देश के लोगों को कम से कम असुविधा हो, लोगों में अफरातफरी का माहौल न हो, लोग वैसे ही डरे हुए हैं। 

    ये देश कोरोना का चरित्र समझ चुके थे और जान चुके थे कि लाकडाउन इस वायरस का इलाज नहीं है, केवल फैलने की गति को नियंत्रित किया जा सकता है। ये देश यह भी जानते थे कि नहीं मालूम कि कब तक लाकडाउन की स्थिति में रहना पड़े। इन देशों ने अपने लोगों को विश्वास में लिया और चरणबद्ध तरीके से लाकडाउन किया। लाकडाउन के समय में दीर्घकालिक व चरणबद्ध योजनाओं के साथ। 

    इन देशों ने यह भी सोचा कि जब लोग कामकाज छोड़कर लाकडाउन रहेंगे तो उनके जीवन की जरूरतों का क्या होगा तो इन देशों ने अपने देशों की तिजोरियों के दरवाजे खोल दिए। लोगों की गाढ़ी मेहनत से कमाया गया देश का संसाधन, जिस समय देश के लोगों को सबसे अधिक जरूरत है, तब भी काम नहीं आएगा तो फिर देश व देश की व्यवस्था का मतलब ही क्या रह जाता है।

    दूसरे वे देश हैं जहां कागज में भले ही लोकतंत्र हो लेकिन व्यवहारिक लोकतंत्र के मूल्य सतही हैं या नहीं है। व्यवहारिक चरित्र सामंती है। ऐसे देशों ने एक झटके में लाकडाउन लागू किया। लोगों को समझ ही नहीं आया कि देश को लाकडाउन का मतलब है क्या, कब तक रहेगा, इसके लाभ क्या हैं। लाकडाउन के कारण होने वाली असुविधाओं के बारे में, अफरातफरी के बारे में कोई चिंता नहीं की गई, यह मान लिया गया कि लोग सभी प्रकार की असुविधाएं झेल लेंगे।

    इनमें से अधिकतर देशों को पता ही नहीं कि संक्रमण-लाकडाउन क्यों व कैसे होना चाहिए। मानव जाति की इस विरली ऐतिहासिक घटना को भी बहुत ही चलताऊ तरीके लेते हुए, विकसित देशों की देखादेखी बिना ठोस योजनाओं व रणनीतियों के उल्टा-सीधा जो समझ आता है, नकल उतार कर चल रहे हैं। अपने देश के लोगों के सामने नहीं स्वीकारते लेकिन समाधान के लिए विकसित देशों की ही ओर ताक रहे हैं।

    लाकडाउन के समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखिए, वरना लाकडाउन का कोई मतलब ही नहीं

    कोरोना वायरस के फैलने की गति कम करने के लिए अवसरों को कम करने के लिए, लाकडाउन किया जाता है। लाकडाउन इसलिए होता है ताकि वायरस को एक मानव से दूसरे मानव में जाने के अवसर कम से कम मिलें या न के बराबर मिलें। इसीलिए दुनिया के देशों को अपने आपको लाकडाउन करना पड़ा है। जब मानव एक दूसरे के संपर्क में आएगा ही नहीं तो संक्रमण की गति अपने आप धीमी होगी। जब मानव घर से बाहर निकलेगा ही नहीं, तो वस्तुओं को भी संक्रमित नहीं करेगा, इसलिए मानव से वस्तु फिर वस्तु से मानव रूपी संक्रमण भी नहीं होगा।

    कोरोना संक्रमण की गति को कम करने के लिए किया जाने वाला लाकडाउन एक बहुत स्वअनुशासित व सतर्कता वाली क्रिया है। इसमें हमारा यह प्रयास हमेशा हर पल रहता है कि न तो हम संक्रमित हों, न ही संक्रमित करें।

    इसके लिए हमें बहुत सारी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। हमें यह पक्का मालूम होना चाहिए कि हम जिस घर में रह रहे हैं उस घर में कोई भी कोरोना से संक्रमित नहीं है। क्योंकि यदि कोई भी संक्रमित है तो हम उसके द्वारा संक्रमित होंगे ही और घर के दूसरे लोगों को भी करेंगे।

    हम यदि जीवन से जुड़ी जरूरतों के लिए भी यदि घर से बाहर निकल रहे हैं तो हमारी एक चूक या तो हमें संक्रमित कर सकती है या हमारे द्वारा किसी और को संक्रमित कर सकती है। मैं इन संदर्भ में अपनी बात को कुछ उदाहरणों के द्वारा रख रहा हूं, आप इसी तरह के अनेक उदाहरण स्वयं से अंदाजा लगाते हुए समझ सकते हैं −

    • मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं और सब्जी वाले, दूध वाले, फल वाले, किराना स्टोर जाते हैं तो आपके पहले यदि किसी संक्रमित मानव ने उस दुकानदार से कोई सामान लिया हो और यदि उस दुकान का काउंटर या दुकानदार का हाथ या दुकान की कोई वस्तु छुई हो, और उसके कुछ घंटे बाद आप उस वस्तु को या काउंटर को या दुकानदार के हाथ को छूते हैं तो आप संक्रमित हो जाते हैं। वह दुकानदार भी संक्रमित हो चुका होगा।

    • मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं, आपको पुलिस रोकती है और आपकी लाठी से पिटाई करती है। यदि उस लाठी से आपको पीटने के पहले पुलिस ने जिस मानव को पीटा था यदि वह मानव कोरोना संक्रमित है तो आप भी उस लाठी के द्वारा संक्रमित हो जाते हैं। क्योंकि लाठी की चोट सहलाने के लिए आप पिटाई वाले स्थान पर (जहां कोरोना वायरस है) हाथ लगाएंगे, फिर आंखो के आंसू पोछने या किसी कारण से मुंह या नाक में हाथ लगाएंगे तो आप संक्रमित हो जाएंगे।

    • मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं और पुलिस आपकी मोटरसाइकिल या कार रोकती है, आपकी कार या मोटरसाइकिल की चाभी छूती है या आपके गालों या शरीर पर कहीं मारती है, तो भले ही पुलिस ने दस्ताने पहन रखे हों लेकिन यदि पुलिस ने आपकी पिटाई के कुछ घंटे पहले भी किसी ऐसे मानव की पिटाई की है या उसकी गाड़ी की चाभी छुई है जो कोरोना से संक्रमित हो तो  पुलिस ने आपको भी कोरोना से संक्रमित कर दिया। इस घटना में विषाणु के संवहन में दस्ताना माध्यम का काम करता है।

    कोरोना के बारे में कुछ बाते हमें बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि कोरोना के लक्षण भले ही 14 दिनों में दिखना शुरू हों लेकिन कोरोना पहले दिन से ही दूसरों को संक्रमित कर रहा होता है। बहुत लोगों में कोरोना से संक्रमित होने के बावजूद संक्रमण के लक्षण नहीं दिखाई पड़ते हैं। लक्षण भले ही न दिखाई पड़े लेकिन संक्रमित मानव दूसरे मानवों को संक्रमित कर रहा होता है।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • देश का लाक-डाउन — Vivek Umrao

    देश का लाक-डाउन — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    जाहिर है कि लाक-डाउन का निर्णय लिया गया क्योंकि सरकार को यह मालूम होगा ही कि कोरोना फैल रहा है और नियंत्रण के बाहर हो रहा है। कम टेस्टिंग करने के कारण व टेस्टिंग के संसाधन न होने के कारण, कोरोना से प्रभावित लोगों की संख्या कागजी आकड़ों में भले ही बहुत कम हो लेकिन वास्तविक संख्या बहुत अधिक होगी। संक्रमण लगातार फैल रहा होगा।

    इतना तो तय है कि यदि क्रमश़ः बढ़ने की बजाय इतनी हड़बड़ी में पूरे देश का लाक-डाउन का निर्णय लिया गया है, तो जाहिर है कि सरकार के पास गोपनीय जानकारियां होंगी ही कि भारत में कोरोना तेजी से फैल रहा है और स्थिति बहुत भयंकर होने वाली है। सरकार का तीन सप्ताह का लाक-डाउन करने का निर्णय का स्वागत है। निश्चित तौर पर वर्तमान परिस्थितियों में इतनी हड़बड़ी में किया गया लाक-डाउन ही अंतिम विकल्प बचता है।

    आप लोगों का, आप लोगों के परिवारों का, आप लोगों के रिश्तेदारों का तथा सामाजिक शुभचिंतक होने के नाते मैं कुछ तथ्य रखना चाह रहा हूं, निवेदन है कि पूरा लेख पढ़ें। यह आपकी अपनी ईमानदारी, समझ व दृष्टि पर छोड़ता हूं कि आप किस रूप में लेते हैं। गंभीर चर्चा करेंगे तो अच्छा लगेगा।

    यदि आपको सोचना समझना नहीं आता हो केवल गाली गलौच ही करना आता हो या आप चुनावी राजनीति व राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर कुछ देख सुन ही नहीं पाते हैं तो गाली गलौच भी करना चाहें तो कर सकते हैं। आप अपने वास्तविक चरित्र के अनुसार ढोंग की जरूरत महसूस किए बिना व्यवहार कर सकते हैं।

    एक बात तो बिलकुल ही स्पष्ट है कि देश में कोरोना से संक्रमित लोगों की लगातार अनियंत्रित रूप से बढ़ती संख्या के कारण ही पूरे देश को लाक-डाउन किया गया। अन्यथा कोई कारण हो ही नहीं सकता कि हड़बड़ी में बिना तैयारी के, बिना लोगों को विश्वास में लिए हुए पूरे देश को इस तरह लाक-डाउन कर दिया जाए।

    मेरे कई मित्र मुझसे आज भी कुतर्क देते हुए बहस कर रहे थे कि देश में कोरोना नियंत्रित है और संक्रमित लोगों की संख्या न के बराबर है। जबकि मेरा कहना था कि जब टेस्टिंग नहीं हो रही है तो कैसे मालूम कि कितने लोग संक्रमित हैं या नहीं। जिसे हम संक्रमित नहीं मानते होंगे, वह भी संक्रमण फैला रहा होगा। संक्रमण की श्रंखला तेज गति से चल रही होगी।

    लाक-डाउन की घोषणा से यह तो साफ हो गया कि मेरा अंदाजा बिलकुल सही था कि देश में कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है, नियंत्रण से बाहर जा रहा है। आम आदमी को भले ही जानकारी न हो, लेकिन सरकार के पास गोपनीय सूचनाएं होंगी। इसीलिए लाक-डाउन जो कि अंतिम विकल्प होता है, उसका प्रयोग करना बचता है।

    अब सवाल यह है कि लाक डाउन कोरोना के संक्रमण की फैलने की गति को कम करता है या कोरोना को नष्ट करता है।

    अभी तक दुनिया के देशों में हुए प्रयोगों के आधार पर यही निकल कर आता है कि लाक डाउन कोरोना का संक्रमण फैलने की गति कम करने में सहयोगी होता है बशर्ते कोरोना से संक्रमित लोगों की छटनी ठीक से की गई हो। यह जानने के लिए टेस्टिंग सबसे जरूरी तत्व होता है। यदि छटनी ठीक से नहीं हुई है और लोग अजागरूक हैं, वैज्ञानिक तथ्यों से अपरिचित हैं तो लाक डाउन संक्रमण की गति कम करने में सहयोगी की भूमिका निभा पाने में सफल नहीं हो पाता है।

    जो लोग कोरोना से संक्रमित हैं, या जिन लोगों के अंदर कोरोना पहुंच चुका है और आगे आने वाले दिनों में लक्षण दीखने वाले हैं या जिन लोगों में कोरोना होगा लेकिन लक्षण नहीं दीखेगे तब भी ये लोगों को संक्रमित करते रहेंगे। यदि अधिक से अधिक इन लोगों की टेस्टिंग करके आइसोलेट नहीं किया जाता, तो लाक-डाउन प्रभावी नहीं रह सकता।

    चूंकि संक्रमित लोगों लोगों को उनके परिवार वालों या मकान मालिकों या मित्रों या रिश्तेदारों के साथ ही रहना होगा। तो लाक डाउन के बावजूद संक्रमण की चेन-प्रक्रिया चलती रहेगी। इस चेन-प्रक्रिया का एक बड़ा प्रतिशत तो लाक-डाउन की अवधि खतम होने के समय संक्रमण की शुरुआत में होगा, जो लाक डाउन की अवधि के बाद देश के लोगों को फिर से संक्रमित करना शुरू कर देगा।

    इटली में जब गांव-गांव में हर एक आदमी की टेस्टिंग करके संक्रमित लोगों को एक समूह में रखा गया और गैर संक्रमित लोगों को बिलकुल अलग रखा गया, तब स्थितियां नियंत्रण में आनी शुरू हुईं। 

    लाक डाउन तभी बेहतर प्रभावी हो सकता है जब संक्रमित लोगों की छटनी की जाए।

    भारत में सोशल डिस्टेंसिंग करना/करवाना बहुत बड़ी समस्या है

    हड़बड़ी में हुए लाक-डाउन से देश के करोड़ों लोगों को तैयारी करने का अवसर नहीं मिल पाया होगा। तो वे लोग दो चार दिनों या कुछ बाद में किसी न किसी तीन तिकड़म से अपने लिए आवश्यक वस्तुओं का इंतजाम करना चाहेंगे। देश की हर गली मोहल्ले, हर घर की सेवा तो देश की पुलिस नहीं ही कर सकती है।

    शहरों की हर गली कूचे में लोगों को आपस में मिलने जुलने से कैसे रोका जाएगा जब लोगों को पता ही नहीं कोरोना क्या है, गंभीरता से परिचित ही नहीं। क्योंकि कोरोना के खतरों के प्रति लोगों को जागरूक ही नहीं किया गया। सोशल मीडिया में जिन लोगों ने जागरूक करने का प्रयास किया गया तो उनको पूर्वाग्रहों के कारण हतोत्साहित किया गया, गाली गलौच की गई, तिरस्कार किया गया।

    व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी में नए-नए नुस्खे बताए गए, सड़कछाप विज्ञान लेखकों की रद्दी किताबों के पन्नों में कोरोना का इलाज खोज कर बताया गया। बहुत लोगों को तो यह लगता है कि हूटर बजा कर, गौमूत्र पीकर, थाली बजाकर, छतों पर लगने वाली टीन की चादरों को लाठी से पीटकर शोर मचाने से कोरोना दुम दबाकर भाग जाता है।

    ऐसे अजागरूक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण हीन लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे लोग चोरी छिपे तीन-तिकड़म से आपस में नहीं मिलेंगे जुलेंगे और सोशल डिस्टेंस मेंटेन रखेंगे, हाइजीन रहेंगे।

    भारत के लाखों गांवों में लाक-डाउन का क्या मतलब रहेगा? वहां लोगों को एक दूसरे से मिलने से कैसे रोका जाएगा? कस्बों में कैसे रोका जाएगा? यदि इन इलाकों में दो चार कोरोना संक्रमित लोग पहुंच गए होंगे तो क्या होगा।

    देश के पास न तो इतनी पुलिस है, न ही इतनी सेना कि हर गली कूचे पर नजर रख सके। मान लीजिए कि नजर रख भी ले तो क्या लोगों को गोली मारी जाएगी, केवल इस बात पर कि वे एक दूसरे से मिल रहे थे।

    सब लोग तो जमाखोर नहीं हैं, तो देश के ऐसे करोड़ों लोग जो जमाखोर नहीं हैं, जो रोज कुआं खोदते हैं, रोज पानी पीते हैं, जो रोज 100 ग्राम तेल खरीद कर खाना पकाते हैं, वे तीन सप्ताह तक अपने खाने पीने का इंतजाम कैसे करेंगे।

    ऐसा भी तो नहीं है कि हर दुकानदार के पास तीन सप्ताह की जरूरतों का स्टाक हो ही। बहुत दुकानदार साप्ताहिक खरीदारी करते हैं। देश के हर आदमी को तो बड़े-बड़े माल उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे लोग एक दूसरे से मिलने व समस्याओं को हल करने का जोड़तोड़ लगाएंगे ही।

    यह काल्पनिक व फिजूल बात है कि इन सबकी परवाह जिला प्रशासन या पुलिस करेगी। कोरोना लोगों को बीमार करता है, न कि नौकरशाही को रातोंरात जिम्मेदार, जवाबदेह, लोकतांत्रिक मूल्यों का धनी व संवेदनशील बनाता है।

    −−−

    ऐसा तो है नहीं कि कोरोना तीन सप्ताह में अपने आप नष्ट हो जाता हो। ऊपर से जब संक्रमित लोगों की टेस्टिंग करके छटनी ही नहीं की गई, ऊपर से संक्रमित लोग गैर-संक्रमित के साथ ही रहेंगे, तो संक्रमण फैलता ही रहेगा।

    यदि लाक डाउन न होता तो, कई विकल्पों पर विचार विमर्श हो सकता था। लेकिन चूंकि लाक डाउन हो चुका है, तो सरकार को चाहिए कि वह घोषणा करे कि हो सकता है कि लाक डाउन लंबे समय तक भी चल सकता है।

    सरकार को ईमानदारी से यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि लाक डाउन कोरोना के संक्रमण फैलने की गति को धीमा करने के लिए है। लाक डाउन कोरोना को नष्ट नहीं करता है, यह कोरोना का इलाज नहीं है, न ही नष्ट करने का नुस्खा है। 

    वरना भारत के लोग तो ऐसे हैं कि यदि देश का पीएम धन्यवाद ज्ञापन करने का कोई नुस्खा बताता है तो लोग उसको कोरोना को नष्ट करने का नुस्खा खुद ही मानकर वेदों व विज्ञान के नए-नए व अजीबो-गरीब नियम व सिद्धांत बता कर विश्लेषित करने लगते हैं। और लोगों की नासमझी की परिणति एक दिन के जनता कर्फ्यू से तीन सप्ताह के लाक डाउन में हो जाती है।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • कोरोना वैक्सीन की खोज — Vivek Umrao

    कोरोना वैक्सीन की खोज — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    इस लेख की शुरुआत में मैं यही कहूंगा कि कोरोना के बारे में अवैज्ञानिक, अतथ्यात्मक व मार्केटिंग स्टंट वाली अफवाहों से बचें। यदि आपको गंभीर दस्तावेजों को पढ़ने का शौक है, स्वाध्याय का शौक है और आप लगातार साल दर साल यह करते आ रहे हैं तो आपको बहुत बातों का सटीक अनुमान होता रहता है। इससे बहुत बड़ा लाभ अवैज्ञानिक, अतथ्यात्मक व मार्केटिंग स्टंट वाली अफवाहों व चोचलेबाजी से अप्रभावित रहने में भी मिलता है।

    साइंस

    दुनिया का विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है, एक छोटे से न दिखने वाले कण से लाखों साल पहले के जीव व पादप इत्यादि की बनावट, चरित्र इत्यादि विस्तार से मालूम पड़ जाता है, बारीक से बारीक बातें मालूम पड़ जाती हैं। यह तक मालूम पड़ जाता है कि पीढ़ियों पहले आपके खानदान में किसको क्या गंभीर बीमारी थी। विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है। यही कारण है कि लोग दहशत में नहीं हैं, उनको पता है कि कोरोना का स्थाई समाधान मानव खोज ही लेगा।

    चीन में दिसंबर में कोरोना शुरू हुआ, चीन ने इस वायरस का जेनेटिक स्ट्रक्चर दुनिया के विकसित देशों के साथ साझा किया। इसलिए दुनिया में कोरोना वायरस फैलने के पहले ही विकसित देश इस वायरस का तोड़ निकालने के लिए शोध शुरू कर चुके थे। चीन के बाहर दुनिया में पहला कोरोना केस 16 जनवरी को जापान में था। लेकिन 16 जनवरी के पहले ही शोध शुरू हो चुके थे।

    दुनिया में जो देश वास्तव में विज्ञान व तकनीक में आगे हैं, (यहां नकल करने वाले व अप्रत्यक्ष-चोरी करके विज्ञान व तकनीक में आगे दिखने का ढकोसला करने वाले देशों की बात नहीं की जा रही है), उन देशों में कोरोना की वैक्सीन का काम बहुत पहले शुरू हो चुका था। दुनिया की 30 से अधिक मेडिकल साइंस की धुरंधर कंपनियां व संस्थान शोधों पर लगे हुए हैं।

    वैक्सीन का विकास

    बहुत ऐसे संदेश आ रहे हैं कि फलाने देश के फलाने ने यह कहा वह कहा, फलाने देश ने नया शोध करके फला लक्षण बताए। यह लक्षण बताए वह लक्षण बताए। ऐसी बातों पर ध्यान देकर भयभीत न होइए, केवल यह मानिए कि जहां आप हैं वहां आपको जानकारी नहीं उपलब्ध कराई गई या आप जहां रहते हैं वहां के व्यवस्था-तंत्र को ही जानकारियां नहीं हैं।

    लक्षण-वक्षण बहुत ही चिरकुट टाइप की साधारण बाते हैं, आज के विज्ञान के सामने। कुछ ही समय में पूरा जेनेटिक स्ट्रक्चर खोद कर निकाल लिया जाता है। और भी न जाने क्या-क्या। विश्वास कीजिए मानव जाति विज्ञान में काफी आगे हैं, और सक्षम भी। 

    वैक्सीन का गहरा व सूक्ष्म विज्ञान होता है। पहले वैक्सीन विकसित करने में 10-15-20 वर्ष जैसा लंबा समय लगता था, लेकिन अब विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है। वैक्सीन विकसित होने में इतना लंबा समय नहीं लगता है। 

    वैक्सीन की खोज एक विस्तृत व अनेक चरणों की प्रक्रिया होती है। कई चरणों को के बाद मानव शरीर पर ट्रायल तक पहुंचा जाता है। मानव शरीर पर ट्रायल के चरण में कई चरण होते हैं। ऐसे ही उठाकर मानव शरीर पर ट्रायल नहीं कर दिया जाता है। विकसित देशों में बहुत सख्त कानून व गाइलाइन होती हैं, ऐसे ही नहीं कोई कंपनी या शोध संस्थान मानव शरीर पर ट्रायल नहीं कर सकता है। ठोस वैज्ञानिक तथ्यों व शोधों पर आधारित प्रक्रियाएं होती हैं। कोई भी वैक्सीन अधकचरे ज्ञान के आधार पर नहीं बनाई जा सकती है, वरना वैक्सीन ही नहीं होगी, प्रक्रिया ही आगे नहीं बढ़ेगी।

    अमेरिका में मानव शरीर पर पहले चरण के ट्रायल की पहली डोज चार लोगों को दी जा चुकी है, दूसरी डोज लगभग एक महीने के अंतराल पर दी जाएगी।

    जर्मनी, चीन, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में कंपनियां व संस्थान शोध करने में लगे हैं। लगभग सभी के शोध प्रि-क्लीनिकल ट्रायल के स्टेज पर चल रहे हैं। इनमें से अधिकतर अगले महीने मतलब अप्रैल में मानव शरीर पर ट्रायल शुरू कर देंगे। मानव शरीर पर वैक्सीन के ट्रायल में कई चरण होते हैं। लंबी प्रक्रिया होती है, आशा है कि हमारा उन्नत विज्ञान कुछ कम अधिक लगभग एक साल की अवधि में वैक्सीन का विकास कर लेगा।

    दुनिया के लोगों के लिए वैक्सीन की उपलब्धतता

    देशों के लोग, सरकारें व वैज्ञानिक चाहते हैं कि उनके लोगों के लिए वैक्सीन सहजता से उपलब्ध हो, इसलिए विज्ञान में अग्रणी देशों की कंपनियां, संस्थान व सरकारें दूसरे देशों की कंपनियों व संस्थानों के साथ संधियां करना चाहते हैं। शोधों में सहयोग करना चाहते हैं, ताकि उनके देश में बिना बाधा के लोगों के लिए वैक्सीन उपलब्ध हो।

    कोरोना वायरस ने दुनिया की हालत खराब कर रखी है। देश के देश बंद पड़े हैं। देश विदेश की यात्रा करना छोड़िए, लोगों के अपने घरों से बाहर निकलकर घूमने में पाबंदी है। यही कारण है कि हो सकता हो कि हड़बड़ी में आकर ट्रंप जैसे अगंभीर व सतही सोच वाले नेता ने किसी जर्मनी कंपनी को कोई प्रस्ताव दिया हो। यह मामला कितना सच है यह भी नहीं पता। क्योंकि हो सकता हो कि जर्मन कंपनी ने योरपियन यूनियन से फंड पाने के लिए यह सब चोचलेबाजी की हो, क्योंकि इस कंपनी को इसके बाद सैकड़ों करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया।

    जर्मन कंपनियों ने अब तक मानव शरीर पर ट्रायल नहीं शुरू किया है जबकि अमेरिका शुरू कर चुका है। इसलिए यदि मान लिया जाए कि ट्रंप ने ऐसा कोई प्रस्ताव दिया भी था तो ट्रंप की योजना यही रही होगी कि यदि जर्मनी वाले पहले वैक्सीन बना लेते हैं तो अमेरिका के लोगों को सहजता से उपलब्ध हो।

    ऑस्ट्रेलिया में भी 50 से अधिक कंपनियां व शोध संस्थान जनवरी से जुटे पड़े हैं। वैक्सीन की खोज का काम सप्ताहों से प्रि-क्लीनिकल चरण पर चल रहा है। आशा है कि अप्रैल के आसपास मानव शरीर पर ट्रायल शुरू हो जाएगा।

    ऑस्ट्रेलिया ने 2009 में स्वाइन-फ्लू की सिंगल डोज वैक्सीन की खोज दुनिया में सबसे पहले की थी, हो सकता है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन की खोज में भी बाजी मार ले जाए। देखिए क्या होता है।

    वैक्सीन कोई भी देश खोजे, लेकिन विकसित देशों के बाहर दुनिया के आम समाज के लोगों के लिए वैक्सीन की उपलब्धतता में लंबा समय लगेगा क्योंकि पहले देश अपने देश के लोगों के लिए खपत पूरी करेंगे फिर दूसरे देशों के बारे में सोचेंगे।

    मैं तो चाहता हूं कि दुनिया के कई देश कुछ अंतराल से एक साथ वैक्सीन खोज लें ताकि दुनिया के सभी देशों के आम लोगों तक वैक्सीन खोज के बाद जल्द से जल्द पहुंच पाए, लोगों को तकलीफ से, जीवन के खतरों से जल्द से जल्द निजात मिले। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक हमें कोरोना से सतर्क रहना होगा, बिना चूके, बिना थके, बिना डरे, लगातार। और कोई विकल्प नहीं है, हवाई बातों व लफ्फाजियों को दूर से ही प्रणाम करते रहना है। 

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • आइए समझते हैं कि कोरोना (COVID-19) कैसे फैलता है और क्यों दुनिया को घुटने पर ला रखा है — Vivek Umrao

    आइए समझते हैं कि कोरोना (COVID-19) कैसे फैलता है और क्यों दुनिया को घुटने पर ला रखा है — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    इस लेख को पूरा व ढंग से, वे लोग जरूर ध्यान से पढ़ें जो कोरोना के बारे में सोशल मीडिया व व्हाट्सअप में ज्ञान देते रहते हैं या व्हाट्अप जैसी यूनिविर्सिटी से ज्ञान लेते रहते हैं या कोरोना के संदर्भ में लफ्फाजियों व कल्पनाओं पर विश्वास करते हैं। यह लेख कोरोना कैसे फैलता है इत्यादि के संदर्भ में कुछ ईमानदार जानकारी देने के लिए है।

    कोरोना वायरस ऐसा वायरस है जिसने दुनिया के देशों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। अनेक देशों के लोगों को घरों में बंद हो जाने के लिए मजबूर कर दिया है, देश के देश लाकडाउन हो चुके हैं। कब तक बंद रहेंगे, इसका कोई अंदाजा नहीं। जो विकसित देश हैं, वे जानते हैं कि यह 6 महीने या एक साल या दो साल या अधिक भी हो सकता है।

    यह वायरस ऐसा वायरस है जो मानव जाति को लंबे समय तक दहशत में जीने के लिए बाध्य कर देगा, लोग अपनी अगली पीढ़ियों को इसकी कहानियां सुनाएंगे। यह ऐतिहासिक वायरस है, मानव जाति को लंबे समय तक याद रहेगा। यह वायरस लोगों को अपनी जीवन शैली व मानसिकता बदलने के लिए बाध्य करेगा। इसलिए बकैती, लफ्फाजी व खोखले ज्ञान व समझ के अहंकार से बाहर आकर जानने समझने की चेष्टा कीजिए।

    भारत के नेताओं, नौकरशाहों, लोगों व व्यवस्था तंत्रों की तरह मुझे भी भारत के लोगों के शरीर की जहरीले कीटाणुओं को ढोने की क्षमता पर पूरा भरोसा है कि यह वायरस बहुत अधिक फर्क नहीं डालेगा। लेकिन जो लोग स्वास्थ्य व जीवन के प्रति थोड़ा सा भी जागरूक व ईमानदार हैं, वे इस पोस्ट को अपने दिमाग में भली-भांति उतार लें और सतर्कता बरतें, लगातार बरतें, तब तक बरतें जब तक इसका तोड़ नहीं निकला आता। 6 महीने, साल भर, सवा साल, डेढ़ साल, दो साल, या अधिक भी। जरा सा चूके कि काम खतम।

    कोरोना वायरस

    कोरोना वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैलता है न कि वायु से। कोई मनुष्य कोरोना वायरस से संक्रमित है, यह समझने में 14-15 दिन तक भी लग जाते हैं। बहुत लोगों को तो कुछ दिन तक पता ही नहीं चलता कि वे कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। कुछ लोगों में कोरोना वायरस होता है, लेकिन कोई विशेष लक्षण नहीं दिखाता है, फिर अचानक वह व्यक्ति भयंकर रूप से पीड़ित हो जाता है, कुछ मर भी जाते हैं।

    लक्षण दिखे या न दिखें लेकिन यदि किसी मनुष्य के शरीर में कोरोना वायरस है, लेकिन वह मनुष्य कोरोना वायरस का संवाहक बना रहता है, उस मनुष्य के संपर्क में आने वाले दूसरे मनुष्यों पर पहुंचता रहता है और पहले वाले मनुष्य में भी बना रहता है। कोरोना वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैलता है। चूंकि कोरोना वायरस से कोई मनुष्य संक्रमित है, यह समझने में ही कुछ दिन का समय लग जाता है इसलिए पता चलने तक अनजाने ही वह मनुष्य दूसरे मनुष्यों को कोरोना वायरस से संक्रमित करता रहता है। पता चलने के बाद भी यदि स्वयं को एकांतवासी नहीं करता है तो दूसरों को जानबूझकर संक्रमित करता रहता है। जिन मनुष्यों में कोरोना का वायरस है, उनमें तो रहेगा ही जब तक वे ठीक नहीं होते हैं। जिन मनुष्यों में कोरोना वायरस है, वे जब भी किसी मनुष्य के संपर्क में आएंगे उसको कोरोना वायरस देंगे। यही श्रंखला चलती रहती है।

    मान लीजिए आपको कोरोना है और आपको यह पता चलने में कुछ दिन का समय लग गया, तब तक आप अपने परिवार, अपनी पति/पत्नी/माता/पिता/बच्चों को दे चुके होंगे, और वे भी आगे इस वायरस को बढ़ा चुके होंगे। यदि किसी एक व्यक्ति को भी कोरोना वायरस हुआ तो वह सैकड़ों तक पहुंचा सकता है, यह पता चलते-चलते महीनों गुजर चुके होंगे और यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

    सैनेटाइजर का प्रयोग, मुंह में मास्क पहनने, हथेलियों की बजाय कुहनी का प्रयोग करना, डेढ़ से दो मीटर की दूरी बनाकर रहने इत्यादि-इत्यादि जैसे तामझाम इसीलिए हैं ताकि इस वायरस के फैलने की गति कम रहे। यह सब केवल इस वायरस के फैलाव की गति को कम करने के प्रयास हैं। यह सब तब तक करना पड़ेगा जब तक इस वायरस का स्थाई समाधान नहीं खोज लिया जाता है।

    कोरोना वायरस मनुष्य के शरीर से बाहर धातुओं में, कपड़ों में या अन्य वस्तुओं में भी कुछ घंटे जीवित रहता है। यदि कोरोना से संक्रमित मनुष्य ने किसी वस्तु को स्पर्श किया है या उपयोग किया है तो बहुत बड़ी संभावना रहती है कि उस वस्तु पर वायरस पहुंच गया है। यदि उस वस्तु पर उपस्थित कोरोना वायरस नष्ट नहीं हुआ है तो यदि कोई दूसरा मनुष्य उस वस्तु का स्पर्श या उपयोग करता है, तो उस मनुष्य में कोरोना वायरस पहुंच जाएगा और वह मनुष्य भी कोरोना वायरस का संवाहक बन जाएगा जब तक वह ठीक नहीं होगा या मरेगा नहीं। अलग-अलग पदार्थों से बनी वस्तुओं पर कोरोना वायरस के जीवित रहने का समय भिन्न-भिन्न है।

    मिथक

    ऐसा बिलकुल नहीं है कि यदि आपने अपने आपको 14 दिनों के लिए कमरे में बंद कर लिया या एक दो दिन घर से बाहर नहीं निकले या घर से कामकाज किया। तो कुछ दिनों में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा, और आप आराम से बाहर निकल कर पहले जैसे सामान्य ढर्रे पर अपना जीवन जी सकते हैं। नहीं बिलकुल नहीं, जब तक इस वायरस का स्थाई समाधान नहीं होता तब तक आपको लगातार सतर्क रहना पड़ेगा, वह भी बिना चूक किए, आपकी एक चूक इस वायरस को हजारों अवसर दे देगी।

    कोरोना वायरस से बचने के केवल दो तरीके हैं। या तो आप कोरोना का ऐसा स्थाई इलाज खोज लें जिससे आपका शरीर हमेशा के लिए कोरोना वायरस से इम्यूनिटी पा जाए। या जब तक आपके समाज में एक भी व्यक्ति को कोरोना है तब तक आप सतर्क रहें, क्योंकि आपको बिलकुल भी अंदाजा नहीं कि कोरोना के फैलाव की दिशा, दशा व श्रंखला कहां से कहां तक पहुंच चुकी है।

    संभव नहीं लेकिन मान लीजिए कि किसी देश जहां की जनसंख्या बहुत कम हो, और उस देश ने आने वाले कुछ महीनों में अपने देश के अंदर उपस्थित हर एक कोरोना वाले व्यक्ति को ठीक कर लिया या उस देश में कोरोना से संक्रमित लोग मर गए। तब ही उस देश में कोरोना का संक्रमण रोका जा सकता है। लेकिन यदि वह देश अपने देश की सीमाएं आवागमन के लिए खोल देता है तो यह वायरस दूसरे देशों से आकर फिर से उस देश में फैलना शुरू कर देगा।

    इन सबसे यह वायरस क्या है, आप अंदाजा लगा लीजिए।

    क्या करना चाहिए

    एक बात गांठ बांध लीजिए कि जब तक आपके देश में एक भी कोरोना संक्रमित व्यक्ति है तब तक आपको सतर्क रहना है, बेहद सतर्क रहना है। लफ्फाजी, बकैती इत्यादि कूड़े के ढेर में डालिए। यही इस वायरस का यथार्थ है।

    आपको बहुत अधिक जागरूक होने की जरूरत है। आपको लफ्फाजी व बकैती से बाहर आने की जरूरत है। मिथकों से बाहर आने की जरूरत है। टटपुंजिए तर्कों से बाहर आने की जरूरत है।

    दुनिया के देश ऐसे ही नहीं लाक-डाउन हो रहे हैं। वे बिना बकैती के भली-भांति समझ चुके हैं कि यह वायरस क्या है। ये देश जानते हैं कि इस वायरस को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इसके फैलने की गति धीमी की जा सकती है। फैलने की गति धीमी करने के लिए इन देशों से जो बन पड़ रहा है वह कर रहे हैं।

    एक दूसरे देशों से ये देश सीख रहे हैं। उदाहरण के लिए योरप के कई देशों ने स्कूल बंद किए, बाद में मालूम पड़ा कि स्कूल बंद करने से कोई लाभ नहीं हुआ तो स्कूल फिर से शुरू करने पर विचार कर रहे हैं। कई देशों ने इस अनुभव से सबक लिया और स्कूल बंद ही नहीं किए। फैलाव की गति रोकने के लिए अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं, चूक होने की संभावनाओं न के बराबर, चूक मतलब हजारों लोगों का जीवन खतरे में।

    जो गंभीर देश व समाज हैं वे जानते हैं कि लाक-डाउन व घरों में बंद रहने जैसी स्थितियां 6 महीने या एक साल या अधिक समय तक भी रह सकती हैं।

    जिन देशों की सरकारों व लोगों ने इस वायरस का चरित्र समझने व बचाव के लिए सतर्कता करने में देरी कर दी, उनके यहां स्थितियां अनियंत्रित हो गईं। जिन देशों ने समय रहते अपने आपको सतर्क कर लिया, वहां इसके फैलने की गति धीमी है लेकिन फैलना वहां भी है बस इस वायरस का स्थाई तोड़ निकलने तक फैलाव की गति कम रखी जा सकती है। जिन देशों की जनसंख्या बहुत अधिक है, लोगों को परवाह नहीं है व व्यवस्था तंत्र ऐसा है जो असंवेदनशील है गैर-जिम्मेदार है गैर-जवाबदेह है, वहां स्थितियां बेकाबू होने तक सबकुछ सही है इसी फर्जी कल्पना में लोग जीते रहेंगे।

    दिमाग से निकाल दीजिए कि सरकारें रातोंरात या कुछ दिनों में इस वायरस को खतम कर सकतीं हैं। नहीं बिलकुल नहीं, सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं। सरकारें सिर्फ ऐसी योजनाएं व नियम बना सकतीं हैं कि इस वायरस के फैलने की गति कम हो। सरकारें लोगों को आर्थिक रूप से राहत दे सकतीं हैं ताकि लोगों को अपने भोजन व जिंदा रहने के लिए ऐसे कामकाज न करने पड़ें जिससे दूसरे मनुष्यों के संपर्क में आना पड़े और इस वायरस के फैलने की गति बढ़े।

    हम और आप कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कि इस वायरस की गंभीरता को समझें। जब तक इस वायरस का स्थाई समाधान नहीं निकलता, तब तक स्वयं को लगातार सतर्क रखें। ऐसा आपको 6 महीने, एक साल, दो साल तक भी करते रहना पड़ सकता है।

    हम और आप व सरकारें सिर्फ इस वायरस के फैलने की गति को धीमा कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। दुनिया के देशों की सरकारें व लोग सिर्फ यही कर रहे हैं। दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष लोग सप्ताहों पहले ही अपने-अपने देश के लोगों से यह सब बातें ईमानदारी से कह चुके हैं। साथ ही अपने-अपने देश के लोगों को हर दूसरे तीसरे दिन ईमानदारी से अपडेट देते रहते हैं ताकि लोगों किसी भ्रम में न रहें, जागरूक रहें, लोगों को पता रहे कि उनको किससे निपटना है।

    यदि आप, अपने आपको, अपने परिवार को, अपने समाज को, अपने देश को सच में प्रेम करते हैं, फालतू में राष्ट्रप्रेमी होने का टटपुंजिया ढोंग नहीं करते हैं तो एक बात बिलकुल पक्का कर लीजिए कि आपको इस वायरस को बहुत गंभीरता से लेना है। बिना डरे हुए, लंबे समय के लिए अपनी मानसिक तैयारी बनानी है। देश व समाज के सभी लोगों को ईमानदारी के साथ तब तक खड़े रहना पड़ेगा, जब तक इस वायरस का स्थाई समाधान नहीं निकलता है।

    इसलिए हम और आप पीढ़ी दर पीढ़ी जैसी भी सोच के साथ जीते आ रहे हों। हमें राजनैतिक स्वार्थों, बकैतियों, लफ्फाजियों, ढोंग, झूठ, फरेब व ढकोसलों पर न तो विश्वास करना है, न ही अपने आपको लिप्त करना है। हमें मजबूती के साथ एक दूसरे के साथ खड़े रहना है। सामाजिक ईमानदारी, जिम्मेदारी, विश्वास व जवाबदेही के बिना इस वायरस के फैलने की गति धीमी नहीं की जा सकती है।

    कोरोना वायरस बहुत प्रकार के होते हैं, इस पोस्ट में कोरोना वायरस का मतलब उस कोरोना वायरस से है जिसने पूरी दुनिया में ऐसा कोहराम मचा रखा है कि देशों को घुटने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • प्रतिहिंसा आधारित विकृत नारीवाद बनाम हिंसक व विकृत मातृत्व — Vivek Umrao

    प्रतिहिंसा आधारित विकृत नारीवाद बनाम हिंसक व विकृत मातृत्व — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    आमुख

    दरअसल समाज विकास की ओर दो तरीके से चलता है।

    • स्वयं के भीतर से इवाल्व होते हुए, या
    • विकसित समाजों की नकल उतारते हुए, ढोंग करते हुए, ढकोसले का आवरण ओढ़ते हुए।

    जो समाज अपने भीतर से इवाल्व होते हैं, वे पीढ़ी दर पीढ़ी बहुत कुछ सीखते समझते परिमार्जित होते हुए चलते हैं। उनमें तर्कसंगतता, वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समाधान व सततता के प्रति समझ व दृष्टि भी स्वतः सीखने समझने की लंबी प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप विकसित होती चली जाती है।

    जो समाज नकल उतारते हैं। उनमें तर्कसंगतता, वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समाधान व सततता का बुरी तरह अभाव रहता है। जिनके पास कुछ दिमाग हुआ वह अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए तर्क-तर्क की पुंगी बजाते रहते हैं, इन मूर्खों व दंभियों को यह भी समझ नहीं होती कि बिना वस्तुनिष्ठता के तर्क का कोई मायने नहीं होता, ऐसा तर्क कूड़े के ढेर में डालने लायक भी नहीं होता, क्योंकि कूड़े की जैविकता को नष्ट करके विषैला बना देता है।

    लोकतंत्र हो या आर्थिक विकास या वैज्ञानिक विकास, भारतीय समाज ने अपने भीतर से धीरे-धीरे इवाल्व नहीं किया है, बल्कि नकल करके ढकोसले करते हुए ऊपरी आवरण ओढ़ लिया है। ऊपरी आवरण ओढ़ने के बाद भीतरी विकास की बात इसलिए बेमानी हो जाती है क्योंकि जिस बीमार मानसिकता के कारण ऊपरी आवरण ओढ़ा जाता है, वही मानसिकता ऊपरी आवरण की कशमकश में लिप्त रहती है। ऊपरी आवरण को बनाए व बचाए रखने के लिए भीतरी असलियत को वीभत्स तरीके से ढकने मूंदने का काम होता है। इसलिए मन में यह भ्रम बनाया जाता है कि आवरण ही असलियत है।

    यह कुछ उसी तरह है जैसे जब कोई विदेशी बड़ा राजनेता आता है तो हम ईटों या फलेक्स या कपड़ों या ऐसी दीवारें बनाते हैं जिससे हमारे देश की गरीबी न दिखे, हमारा लीचड़पना न दिखे। हम इस गलतफहमी में रहते हैं कि हमने आवरण से ढक दिया है, हमने ढोंग कर लिया है ढकोसला कर लिया है तो हमारी असलियत छुप गई है बदल गई है, हम ऐसे व्यवहार करने लगते हैं मानो हमारी असलियत यही आवरण हो।

    हम अपने आवरण व ढोंग को अपनी प्रतिष्ठा, गौरव, पहचान का मुद्दा बना लेते हैं। क्योंकि ज्यों ही हम आवरण व ढोंग को हटाते हैं तो हम बुरी तरह नंगे हो चुके होते हैं। इसलिए हम आवरण व ढोंग को ही अपनी उपलब्धियां व जीवन शैली मानने लगते हैं, अपने आपको आवरण व ढोंग के साथ बुरी तरह से जकड़ लेते हैं। तर्क गढ़ते हैं। सततता, वस्तिनिष्ठता की संभावनाओं के भ्रूण तक को नष्ट करने की जुगत में लग जाते हैं।

    योरप समाज व्यक्तिनिष्ठ नहीं है, वह वस्तुनिष्ठता पर आधारित चिंतन व विचारशीलता से चलता है। हमारा समाज व्यक्तिनिष्ठ है, हमारा चिंतन मनन विचारशीलता व्यक्तिनिष्ठता से चलता है, हमारी तर्कशीलता वस्तुनिष्ठ नहीं होती। योरप मार्क्स को ईश्वर नहीं मानता क्योंकि योरप समाज जानता है कि मार्क्स के विचार जादू से या आसमानी ताकत से नहीं आए, बल्कि मार्क्स के पैदा होने से भी बहुत पहले से ही ऐसे चिंतन शुरू हो चुके थे, मार्क्स के चिंतन से बेहतर चिंतन हो चुके थे, मार्क्स के समय संयोग व अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य ऐसा रहा कि मार्क्स की मार्केटिंग अच्छी हो गई।

    मार्क्स की जबरदस्त मार्केटिंग के बावजूद योरप समाज भ्रम या दुविधा में नहीं रहा। जब दुनिया के कई देश मार्क्स-मार्क्स, कम्युनिज्म-कम्युनिज्म का ढोंग चिल्ला रहे थे, और कम्युनिज्म का खोखला चोला ओढ़ कर केंद्रीय सत्ताओं का वीभत्स व भुरभुरा माडल खड़ा कर रहे थे।

    तब योरप समाज अपने भीतर बेहतर लोकतंत्र की ओर धीरे-धीरे समझते बूझते लड़खड़ाते सीखते इवाल्व हो रहा था। आज योरप के समाज में लोकतंत्र लगातार परिष्कृत हो रहा है। इनके लोकतंत्र में समाजवाद भी है, साम्यवाद भी है, लोकतंत्र भी है।

    प्रतिहिंसक विकृत नारीवाद

    ऐसा ही नारीवाद के मसले पर हुआ। योरप में नारीवाद अपने भीतर से इवाल्व हुआ, जबकि हमारे भारत जैसे देशों में समाज ने नारीवाद की नकल उतारी, आवरण पहना, ढोंग किया, ढकोसला किया। योरप का नारीवाद प्रतिहिंसा पर आधारित नहीं है। जबकि हमारा नारीवाद प्रतिहिंसा पर ही आधारित है। योरप के नारीवाद में वस्तुनिष्ठता है, हमारे नारीवाद में व्यक्तिनिष्ठता है।

    द सेकंड सेक्स की लेखिका योरप की थी, लेकिन उसे योरप में नारीवाद का आदर्श नहीं माना गया। लेकिन दुनिया के कई देशों के समाजों में सीमोन को नारीवाद का आदर्श माना गया, द सेकंड सेक्स किताब को नारीवाद की गीता के रूप में स्थापित किया गया। कारण वही था, क्योंकि हमारा नारीवाद हमारे भीतर से इवाल्व नहीं हुआ था, हमने नकल किया ढोंग किया ढकोसला किया।

    हमारा नारीवाद भी नकल, आवरण, ढोंग व ढकोसले पर आधारित है। यही कारण है कि हमारे भारतीय समाज में नारीवादी-स्त्री का नारीवाद घृणा, प्रतिक्रिया व प्रतिहिंसा पर आधारित है। नारीवादी-पुरुष का नारीवाद लफ्फाजी, ढोंग व सतहीपन पर आधारित है। दोनों तरफ से भयंकर रूप से विकृत है। ऐसा विकृत-नारीवाद सस्टेनेबल व हारमोनिक समाज की ओर कतई नहीं बढ़ सकता, बढ़ता ही नहीं है।

    योरप का नारीवाद नारी की महानता व विशिष्टता के मिथकों पर आधारित न होकर समानता पर आधारित है, तालमेल पर आधारित है, यही कारण है कि स्त्री पुरुष के संबंधो में दबाव नहीं है, प्रतिहिंसा नहीं है, घृणा नहीं है। प्रतिहिंसा व घृणा न होने के कारण ही नारीवाद विकृत-मातृत्व का वाहक नहीं बन पाता।

    योरप के नारीवाद का आधार मनुष्य को समान मानना है। स्त्री मनुष्य है, पुरुष मनुष्य है, इसलिए दोनो समान हैं, सीधा सरल सपाट विचार। यही कारण है कि स्त्री को ही नहीं नवजात शिशुओं तक के अधिकार का हनन नहीं। नवजात शिशु छोड़िए गर्भ में रहने वाले बच्चों के प्रति संवेदना रहती है, उनके साथ प्राकृतिक अन्याय नहीं हो, इसका ध्यान रखा जाता है।

    प्रतिहिंसा पर आधारित नारीवाद इतना विकृत होता है कि बच्चों के प्रति गहरी संवेदनशीलता नहीं विकसित होने देता है, उल्टे उन्हें हिंसक बनाता है। जैसे नारीवाद नकल, ढोंग व आवरण पर आधारित होता है वैसे ही बच्चों के प्रति विचारशीलता व संवेदनशीलता भी नकल व ढोंग आधारित होती है। बिना मौलिक समझ व्यवहार में प्रामाणिकता के ही लोग अपने आपको बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ मानकर खूब ज्ञान बांटते रहते हैं। लेकिन यदि इनके जीवन की सुरक्षा व व्यवस्था-तंत्र में छेड़छाड़ कर दीजिए, बच्चों के प्रति संवेदनशीलता व विचारशीलता की असलियत बाहर आकर फूटने लगती है।

    हिंसक विकृतमातृत्व

    प्रतिहिंसा आधारित नारीवाद न केवल विकृत मातृत्व को पोषित करता है, वरन हिंसक व अप्राकृतिक प्रसव को भी प्रतिष्ठित करता है। विकृत नारीवाद का आधार मनुष्य रूपी समानता की बजाय प्रतिहिंसा होने के कारण स्त्री को इतना कुंठित, विकृत व हिंसक बना देता है कि स्त्री अपने ही बच्चों के प्रसव के लिए हिंसक व अप्राकृतिक तरीकों का प्रयोग करती है और गौरव महसूस करती है। उसको अपने बच्चों के प्राकृतिक विकास व तालमेल से मतलब नहीं होता, क्योंकि उसे तो प्रतिहिंसा को प्राथमिकता के साथ जीना होता है।

    योरप का समाज जिसने नारीवाद, लोकतंत्र, व्यक्तिगत निजता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लगभग शून्य से विकसित करते हुए बहुत अधिक परिमार्जित किया, विकसित किया। जबकि भारत जैसे देशों के समाज नकल, ढोंग व ढकोसले इत्यादि को ही जीवन शैली मानकर लिप्त हो गए।

    योरप समाज वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से अकल्पनीय आगे है। चाहे तो हर महिला आपरेशन से बच्चा पैदा कर सकती है, बहुत ही सामान्य सी बात है। इसके बावजूद योरप समाज बच्चों के प्रसव की प्राकृतिक व्यवस्था में छेड़छाड़ तब तक नहीं करता जब तक कि जच्चा-बच्चा के जीवन को वास्तव में खतरा न हो।

    योरप के अनेक देश तो ऐसे हैं जो प्रसव वाली महिला के घर में नर्स भेजते हैं जो प्राकृतिक तरीके से बच्चा पैदा करवाती है। ये देश चाहें तो अस्पतालों में भी प्राकृतिक प्रसव करा सकते हैं, लेकिन इन देशों का मानना है कि मां व बच्चे के मनोविज्ञान से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। योरप के अनेक देश ऐसे हैं जो महिला को अस्पतालों में कई दिन भर्ती रखते हैं लेकिन प्रसव प्राकृतिक तरीके से होता है। 

    तकनीकी रूप से इतना अधिक विकसित समाज, आर्थिक रूप से बहुत ही अधिक विकसित समाज, ऐसा क्यों करता है? जिस समाज की महिलाओं ने नारीवाद का बिगुल फूंका, दुनिया को नारीवाद की समझ दी, कि आज नारीवाद बहुत ही अधिक ऊंचे पायदानों पर खड़ा है। महिलाएं पुरुषों के साथ ही नहीं, आगे बढ़कर खड़ी हैं। ऐसा समाज व ऐसे समाज की महिलाएं नारीवाद के नाम पर प्राकृतिक प्रसव की बजाय, बिना शारीरिक पीड़ा वाला आपरेशन करके बच्चा पैदा करने को प्रतिष्ठित क्यों नहीं करतीं हैं?

    कारण सिर्फ यह है कि योरप का नारीवाद समाज के भीतर से इवाल्व हुआ है, किसी दूसरे समाज की बेढंगी नकल नहीं है, फूहड़ ढोंग नहीं है, सतही आवरण नहीं है, ढकोसला नहीं है, प्रतिहिंसा व शोषण पर आधारित नहीं है। इसी कारण योरप का समाज अपनी पीढ़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहता है। जिम्मेदारी महसूस करता है, ईमानदारी महसूस करता है।

    हिंसक अप्राकृतिक प्रसव

    गर्भावस्था, भ्रूण में बच्चे का विकास व प्रसव यह सब कुछ प्राकृतिक नियमों व व्यवस्थाओं के तहत होता है, जब तक कि जानबूझकर छेड़छाड़ न किया जाए।

    प्रसव की लंबी व व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। प्रसव में होने वाली विभिन्न प्रकार की असुविधाओं व पीड़ाओं को छोड़कर भारत जैसे समाजों के स्त्री व पुरुषों को, प्रसव से जुड़े विज्ञान व प्राकृतिक व्यवस्था की समझ ही नहीं होती है। जो होती भी है वह मिथकों पर आधारित होती है, बहुत चलताऊ होती है। परिणाम यह होता है कि प्राकृतिक-प्रसव का संबंध गर्भाशय के फैलने सिकुड़ने व योनिद्वार के खुलने इत्यादि के कारण से होने वाली शारीरिक पीड़ाओं तक ही सीमित कर दिया जाता है।

    गर्भ में बच्चे का विकास व प्रसव प्रकृति की अद्वितीय व ऑटोमेटेड व्यवस्थाओं में से है। प्रसव के समय विभिन्न प्रकार की फैलने सिकुड़ने की भाषाओं व कोडों के आधार पर शरीर बहुत प्रकार के ऐसे तत्व बच्चे को स्थानांतरित करता है जो उसके पूरे जीवन का विकास तय करते हैं। प्रकृति ने स्त्री के शरीर को प्रसव के समय व बाद में ऐसे कई प्रकार के अद्वितीय हार्मोन्स व तत्वों की सुविधा दी है जो उसके शारीरिक दर्द को सहन करने की ताकत देते हैं।

    बच्चा जब प्राकृतिक रूप से पैदा होता है तो शरीर व बच्चे के बीच तालमेल होता है, हर एक पल की गतिविधि व्यवस्थित तरीके से संपन्न होती है। बच्चे को माता से झटके से अलग नहीं किया जाता है, बच्चे व माता के शरीर के साथ समन्वय रहता है। दोनों एक दूसरे को हर पल महसूस करते रहते हैं।

    योरप समाज तो बच्चे व माता के मध्य तालमेल व प्राकृतिक नियमों को कम से कम छेड़ने के लिए कई कदम और आगे बढ़ चुका है। बच्चे के योनि से बाहर आते ही, तुरंत उसी पल माता के नंगे शरीर के ऊपर डाल दिया है ताकि बच्चा माता के शरीर की सुगंध, गर्माहट व अहसास पाता रहे।

    आपरेशन के द्वारा पैदा होने वाले बच्चों की माता के शरीर का बच्चे के प्रसव के साथ प्राकृतिक तालमेल नहीं हो पाता। प्राकृतिक ऑटोमेटेड ढांचे व व्यवस्था को तोड़ दिया जाता है। आपरेशन के समय माता को इंजेक्शन दिए जाते हैं, आपरेशन के बाद माता ढेरों दवाएं खाती रहती है, जिनमें से अधिकतर हाई-डोज वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं होती हैं। इंजेक्शन से लेकर दवाओं तक यह सभी अप्राकृतिक तत्व माता के शरीर से दूध के माध्यम से नवजात शिशु को पहुंचते रहते हैं। बहुत बार ऐसे आपरेशनों का साइड-इफेक्ट महिला आजीवन किसी न किसी बीमारी या शारीरिक असुविधा के रूप में झेलती रहती है।

    योरप की अधिकतर महिलाएं तो प्राकृतिक प्रसव के बाद पेन-किलर तक नहीं लेती हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों को मिलने वाले दूध में इन दवाओं का प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहतीं हैं। यह महिलाएं ऐसा इसलिए सोच व कर पाती हैं क्योंकि उनका नारीवाद नकल नहीं है, ढोंग नहीं है, ढकोसला नहीं है, प्रतिहिंसा पर आधारित नहीं है।

    भारत जैसे देशों में तो आपरेशन से पैदा होने वाले बहुत बच्चों को मां का स्पर्श तक नहीं प्राप्त होता है, कई-कई दिनों तक मां का दूध तक नहीं प्राप्त होता है। कई-कई दिनों तक नवजात शिशुओं को आईसीयू में रखा जाता है। मां का पेट काटकर बच्चे को जबरदस्ती खींच कर बाहर निकालने के बाद बच्चे व माता का संबंध ही तोड़ दिया जाता है, यही कारण है कि अधिकतर बच्चों को आईसीयू में रखने जैसा घिनौना कुकृत्य करना पड़ता है।

    जिन लोगों को प्रसव विज्ञान, जच्चा-बच्चा विज्ञान की वास्तव में समझ है, और वे लोग ईमानदार हैं, ढोंगी नहीं हैं, ढकोसलेबाज नहीं हैं। उनको पता है कि प्रसव के समय प्राकृतिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करना कितना वीभत्स, हिंसक व हानिकारक है। बच्चे के जीवन का पूरा का पूरा मनोविज्ञान तक बदल जाता है, भले ही हमें आभास न हो।

    जिस समाज में बच्चा बढ़ा होकर नौकरी पा जाए, पैसा कमाने लगे, यही जीवन का लक्ष्य हो, सबकुछ यही सब से तय होता हो। उस समाज व माता-पिता को क्या अहसास होगा कि उनके बच्चे ने प्रसव के समय आजीवन के लिए क्या खो दिया?

    स्त्री हो या पुरुष या समाज, यदि प्राकृतिक प्रसव की बजाय कृत्रिम प्रसव की वकालत करते हैं, तो ये लोग बहुत ही अधिक हिंसक, विकृत व मनोवैज्ञानिक बीमार मानसिकता के लोग होते हैं। और ऐसी बीमार मानसिकता की प्रतिष्ठा का मुख्य कारक-आधार प्रतिहिंसा आधारित विकृत-नारीवाद होता है। 

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    Prof Puneet Shukla

    ​तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इस बात पर पीट दिया
    क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं मानी।

    तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिए मार दिया या छोड़ दिया
    क्योंकि उन्होंने अपनी पसन्द का जीवनसाथी चुना।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये नफ़रत किया
    क्योंकि वे दूसरे धर्म, जाति या विचारधारा के व्यक्ति थे।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये सज़ा दिया
    क्योंकि उनके पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ की थीं।

    तुम
    अगर इस तरह क्षमा माँगोगे तो
    तुम्हारी ग़लतियों में सुधार नहीं होगा
    लेकिन, यह संसार थोड़ा सा सुधर जायेगा
    और, आने वाली पीढ़ियों के लिये
    रहने लायक एक अच्छी दुनिया का निर्माण शुरू होगा।

    Prof Puneet Shukla

  • सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    Ashish Sagar
    Environment Representative,
    Ground Report India

    उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में बुंदेलखंड के 101 तालाबों के पुनरुद्धार-खुदाई कार्यो की वर्तमान भाजपा सरकार ने स्थानीय लोगों द्वारा की गई अनियमितता की जांच की मांग को स्वीकार करते हुए जांच शुरू कराई। महोबा के चंदेलकालीन 56 बड़े तालाबों में 100 करोड़ रुपये से हुआ था मिट्टी निकासी का काम। जलनिगम /सिंचाई विभाग महोबा के अधिशाषी अभियंता समेत तीन अभियंताओं पर कार्यवाही की जा चुकी है।

    मुख्यबिंदु

    • तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने महोबा के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का ब्रांड अम्बेसडर जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा को बनाया था, मिला था यश भारती सम्मान
    • सम्मान पाने वालों को 50 हजार रुपये मासिक पेंशन दिए जाने का एलान था जिसे मौजूदा सरकार ने बन्द कर दिया है।
    • अखिलेश यादव के कार्यकाल में महोबा सहित बाँदा में सिंचाई प्रखंड / जलनिगम ने टेंडरिंग व्यवस्था कर जेसीबी के द्वारा तालाबों का गहरीकरण कार्य किया गया था।
    • अधिकारियों की सेटिंग से काम पाए कार्यदाई ठेकेदारों ने लाखों रुपये की मिट्टी तालाबों से निकाल कर बेची थी।


    सीएम योगी की सरकार में महोबा के चरखारी से बीजेपी नेता गंगाचरण राजपूत ने हाई कोर्ट में पीआईएल दायर की और चरखारी समेत महोबा के 56 तालाबों में मिट्टी खुदाई कार्य की अनियमितता में जांच की मांग की थी। सीएम योगी ने बीते मई माह में पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता अंबिका सिंह के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच कराई, इसकी रिपोर्ट सीएम को प्रेषित की गई है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 मई-जून माह में 100 करोड़ की लागत से अकेले महोबा में 56 तालाब मसलन शहर के कीरत सागर (पुरातत्व के संरक्षण में), मदन सागर, कल्याण सागर, किराड़ी, कुलपहाड़ तहसील के मोहन तालाब, बड़ा तालाब, बेला सागर, पचपहरा, उर्वरा, सिजहरी, पवा, राजमोहन सिंह तालाब, बिलखी, दाऊपुरा, चरखारी नगर के चंदेल कालीन कोठी ताल, जय सागर, विजय सागर, मलखान सागर, रपट तलैया, गुमान बिहारी सागर, वंशिया, गोला घाट, श्रीनगर तहसील के तालाब में बड़े स्तर पर सिल्ट-गाद हटाने के नाम पर मिट्टी खुदाई का कार्य मशीनों से हुआ था। गौरतलब है तब भी कार्यदाई संस्था जलनिगम -सिंचाई प्रखंड सहित ठेकेदार पर मिट्टी खोदने, मिट्टी बेच लेने के आरोप लगे और शिकायत किसानों ने की थी लेकिन मामला दबाया गया था।

    वर्ष 2016 जून में बुंदेलखंड के भयावह सूखा और अखिलेश सरकार के इन तालाबों का पुनरुद्धार कार्य देखने देश के बड़े पत्रकार फील्ड विजिट पर आए थे। रिपोटिंग के वक्त वरिष्ठ पत्रकारों यथा श्री अरबिंद कुमार सिंह (राज्यसभा संवाददाता दिल्ली), बीबीसी हिंदी लखनऊ के रीजनल हेड समीर आत्मज मिश्रा, तत्कालीन समय ओपीनियन पोस्ट की विशेष संवाददाता संध्या द्विवेदी (अब आजतक डिजीटल कार्यरत) ने महोबा के इन तालाबों सहित झाँसी, बाँदा, चित्रकूट के पाठा बीहड़ों, मध्यप्रदेश के पन्ना जनपद में शिवराज सरकार के तालाबों का रिवाइवल कार्य देखा था।

    मध्यप्रदेश (एमपी) के ज़िला पन्ना में भी तालाबों की खुदाई मिट्टी निकासी मानव श्रम की बनिस्बत जेसीबी से हुई थी। जबकि शासन की मंशा थी यह कार्य मजदूरों से लिया जाए ताकि सूखा प्रभावित क्षेत्र में जलसंकट समाधान के साथ मौसमी रोजगार भी मिले। कमोवेश जो टेंडरिंग तरीका यूपी बुंदेलखंड के बाँदा, महोबा में हुआ वही मध्यप्रदेश के पन्ना में हुआ।

    आज यूपी बुंदेलखंड के यह बे-पानी तालाब एक जनपद महोबा में ही 100 करोड़ रुपये खर्च कर जांच की गिरफ्त में है। बड़ी बात है पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने इन तालाबों पर खर्च धनराशि और बुंदेलखंड को पानीदार बनाने की कवायद को विधानसभा चुनाव के दौरान हर बड़े समाचार पत्रों में जलपुरुष के साथ विज्ञापन देकर चुनावी माहौल बनाया था।

    जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा

    यहां तक कि स्वयं जलपुरुष ने महोबा के मदन सागर में श्रमदान की प्रतीकात्मक रस्में फावड़ा चलाकर पूरी की थी। समूचे बुंदेलखंड में पानी पिलाने की यह रणनीति लखनऊ से दिल्ली तक कौतूहल का विषय बनी थी। महत्वपूर्ण तथ्य है कि महोबा के कीरत सागर में खुदाई के बाद पौधरोपण कार्य हुआ जो चरखारी में भी किया गया। उरई की संस्था परमार्थ ने यह कार्य तत्कालीन डीएम वीरेश्वर सिंह के साथ किया। यह अलग बात है आज कीरत सागर समेत चरखारी के तालाबों में न पौधों की सलामती रही और न इन सभी तालाबों में एजेंडा प्रोजेक्ट के मुताबिक रौनक ज़िंदा बची।

    मुख्यमंत्री योगी ने बुंदेलखंड के 101 तालाबों की जांच रिपोर्ट तलब कर महोबा के कीरत सागर में पुनरुद्धार कार्य मे अनियमितता बरतने वाले तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सिंचाई कार्य मंडल बाँदा डीएस सचान,तत्कालीन अधिशासी अभियंता सिंचाई प्रखंड महोबा विशंभर को निलंबित कर अनुशासनिक कार्यवाही के आदेश दिए है। इनके अतिरिक्त तत्कालीन मुख्य अभियंता (बेतवा) सिंचाई विभाग झाँसी, नवनीत कुमार (सेवानिवृत्त) के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश किया है। इन पर परियोजना स्वीकृति लागत 197.76 लाख के सापेक्ष 508.11 लाख की तकनीकी स्वीकृति का बगैर अनुबंध काम कराने का आरोप है। बुंदेलखंड को तत्कालीन समय गोद लेने वाले आज दूसरे अभियान में व्यस्त है और तालाबों पर भ्रस्टाचार की जांच हो रही है।

    हकीकत ये कि इस 100 करोड़ के बंदर-बांट की तरह यदि बाँदा के तत्कालीन जिलाधिकारी (डीएम) हीरालाल के ‘कुआँ तालाब जियाओ’ भूजल बढ़ाओ-पेयजल बचाओ (लिम्का बुक रिकॉर्ड) की भी जांच हो जाये तो पूत के पांव पालने में दिखते है वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है। फिलहाल बुंदेलखंड की ये कागजी तालाब रिवाइवल गतिविधि कार्यवाही की जद में हैं।

    आशीष सागर, पर्यावरणविद व पत्रकार

  • Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    साढ़े तीन वर्षीय आदि पूरी एबीसीडी जानते हैं, किस अक्षर को किस ध्वनि के साथ पढ़ते हैं, यह भी जानते हैं। इसलिए अब शब्दों को एबीसीडी अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ लेते हैं। एबीसीडी के अक्षरों को पहचानने, ध्वनि को समझना व शब्दों को अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ना। यह सब आदि ने अपने आप सीखा है। मैंने या डा० क्लेयर ने कभी आदि को कुछ रटाया नहीं है, न ही आदि ऐसे किसी स्कूल जाते हैं जहां यह सब सिखाया पढ़ाया रटाया जाता हो।

    आदि ने यह सबकुछ अपने आप खेल-खेल में सीखा है। आदि पिछले कई महीनों से अपना नाम लिख लेते हैं। आजकल अपने आप एबीसीडी लिखने का अभ्यास भी करते रहते हैं। अंको को भी लिखने का अभ्यास करते रहते हैं। आदि यह सब अपने आप खेल-खेल में मस्ती से सीखते समझते रहते हैं। मैं या डा० क्लेयर कभी भी आदि पर कभी भी किसी प्रकार का दबाव नहीं डालते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.