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  • दूध को भी दूहने का खेल

    दूध को भी दूहने का खेल

    Kashyap Kishor Mishra

    “रोटी तेल नमक प्याज दाल दही घी” एक सामान्य भारतीय किसान की थाली इतने से पूरी हो जाती थी । पर सरकार बहादुर तो सरकार बहादुर ठहरी । रोटी का आटा ब्रान्डेड हुआ, सरसो तेल के खिलाफ सधे कदमों से चले व्यापारिक चालों नें कब रिफाइंड तेल को सरसो तेल का स्थानापन्न बना दिया पता न चला ।

    नमक के साथ आयोडीन का खेला हुआ और रूपये दो रुपये किलो का नमक पच्चीस पचास और सौ रुपये किलो तक बिक रहा है, जिसमें वैक्यूम पैक्ड तक के शब्द जाल शामिल हैं । प्याज का हाल यह कि किसान के खेत में बिकने को तरसती प्याज सड़कों पर फेंक दी जाती है और पहली बारिश के साथ उसकी गिनती कब मंहगी सब्जी में बदल जाती है पता नहीं चलता, पर इस खेल का खिलाड़ी किसान नहीं आढ़तिया होता है और किसान सिर्फ़ अपनी बदहाली रोता है । दाल तो पता नहीं कब से अमीरों की थाल की शोभा बन चुकी है । आखिर में बचे दही और घी जिसका जरिया दूध है ।

    हालांकि कारपोरेट स्पान्सर्ड हमारी सरकार बहादुर, चाहे वो बजाज और बिड़ला की पोषित कांग्रेसी सरकारें रहीं हों या अडाणी अम्बानी पोषित भाजपा सरकारें सबने दूध को पैक्ड और ब्रान्डेड करने की बड़ी कोशिश की पर बात बनी नहीं ।

    कारपोरेट घरानों की दूध के बाजार पर गहरी नजर रही पर ग्वालों से पोषित दूध वितरण प्रणाली में कारपोरेट जगत चाह कर भी अपनी अनुमान के मुताबिक मुनाफा नहीं बना पाया । हांलाकि इस मूल्क में दूध तक को दूह लेने के निराले खेल चलते रहे हैं, मसलन एक आम पैक्ड दूध का इस्तेमाल करने वाला भारतीय यह जानता ही नहीं कि जिस टोन्ड मिल्क का वो इस्तेमाल करता है वो शुद्ध रुप से एक भारतिय जुगाड़ है, यह विशुद्ध भारतिय जुगाड़ू दूध है, जिसमें भैंस का स्कीम्ड दूध, पाऊडर दूध, पानी और और भी बहुत कुछ मिला दूध बना दिया जाता है ।

    एक आम भारतीय जिसे पाश्चुरीकृत और टोन्ड दूध का फर्क नहीं पता, उसे नहीं पता कि होमोनाइज्ड और स्कीम्ड के मानी क्या है वो बस एक फर्क जानता है फुल क्रीम दूध मंहगा होता है क्योंकि उसमें क्रीम निकाला नहीं जाता और बाकी दूध सस्ते होते हैं क्योंकि उनसे क्रीम निकाल ली जाती है । हालांकि सत्य यह भी नहीं है । उसे टोन्ड और प्राकृतिक दूध के फर्क से भी शायद ही मतलब हो, पर बात इससे बन नहीं रही थी ।

    बाजार के खिलाड़ियों की दूध से कमाई की कोशिशों पर ग्वालों का दूध पानी फेर देता था लिहाजा सरकार बहादुर नें अबकी बार एक आजमाया और सफल तरीका अजमाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं जिसका नाम है “मिल्क फोर्टीफिकेशन” ।

    आदमी के भीतर के डर को बाजार में तब्दील करने का खेल पुराना है । नमक और आयोडीन नमक का फर्क और उससे की जा रही मुनाफाखोरी इसका सीधा उदाहरण है ठीक उसी तरह दूध में भी और पोषक तत्व जोड़ कर इसके बाजारीकरण का खेल “मिल्क फोर्टीफिकेशन” है ।

    इसे यूं समझें, एक रुपये किलो से कम कीमत पर मौजूद सामान्य नमक बेचना अपराध है लिहाज़ा उससे बीस पच्चीस गुना महंगी कीमत पर उपभोक्ता आयोडीन युक्त नमक खरीदता है ठीक वैसे ही सरकार बहादुर की चाल है कि दूध में कुछ पोषक तत्वों को मिलाकर बिना फोर्टिफाइड किए दूध न बेचा जाए ।

    दूध के इस फोर्टीफिकेशन की प्रक्रिया दूध को नमक की तरह पूरी तरह एक ब्रान्डेड उत्पाद में बदल देगी और गौ पालकों द्वारा दूध का बेचा जाना, चूँकि वह फोर्टिफाइड नहीं होगा, एक गैरकानूनी कृत्य होगा ।

    सरकार बहादुर बड़े व्यापारिक घरानों के सांठगांठ से बड़े सधे कदमों से भय का बाजार बनाने लगी है जो जल्दी ही आपके सामने होगा, पर एक जागरूक तबके में सरकार की मंशा भांप विरोध भी शुरू हो चुका है । एप्पल कारपोरेशन के पूर्व वैज्ञानिक और वैदिक ट्री फांउडेशन के अध्यक्ष अभिनव गोस्वामी सवाल खड़े करते हैं कि दूध अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है फिर इसे और फोर्टिफाइड करने की अनिवार्यता किसानों से उनके उत्पाद को छीनकर बाजार के हवाले कर देना है ।

    अनिवार्य फोर्टिफिकेशन के विरोधी मुखर हैं और वो सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करने लगे हैं पर बड़ा सवाल एक किसान और इस मुल्क के आम गृहस्थ का है कि क्या सरकारें सिर्फ और सिर्फ आम आदमी के निवाले को मंहगा और और मंहगा करते जाने के लिए ही हैं या बाजार से इतर एक किसान के हक को भी सोचती हैं ।

    Kashyap Kishor Mishra


    Kashyap Kishor Mishra

  • सच की रोशनी, झूठ के अँधेरे

    सच की रोशनी, झूठ के अँधेरे

    Kanupriya

    मृत्यु के साथ जुड़ी सबसे बड़ी बात ये होती है कि शव आपके सामने होता है, साक्षात सत्य की तरह, भ्रम की कोई गुंजाइश नही. सत्य के साथ सबसे बड़ी बात ये कि चाहे उसका स्वाद कैसा भी क्यो न हो वो स्वीकारा जा सकता है, उसे गले लगाकर जीवन मे पुनः लौटा जा सकता है. राम नाम सत्य है या नही पता नही, मगर सत्य एक बड़ी राहत होता है, झूठ और भ्रम में आप आशा निराशा के बीच झूलते रहते हैं, जूझते, लड़ते और पीड़ा में रहते हैं, ये सारी लड़ाई दरअसल सत्य के उद्घाटन के लिये है, फिर वो चाहे जैसा क्यो न बेहद शांति लेकर आता है.

    इन दिनों जाने क्यों वेन्या की बहुत याद आई, डॉक्टर्स ने साफ कह दिया था कोई उम्मीद नही मगर मैं एक उम्मीद के लिये लड़ती रही, वो 24 घण्टे में से 18 घण्टे मेरी गोद मे होती और मैं इंटरनेट पर स्टेम सेल से लेकर जाने किन किन तकनीकों से ब्रेन की रिकवरी के बारे में पागलो की तरह पढती रहती, मैंने उसके ब्रेन डैमेज का सच जानकर भी स्वीकार नही किया. क्या होता अगर मैं इंटरनेट बन्द करके उससे ढेर सारी एकतरफा बातें करती, उसे बेहद प्यार करती, क्या इंटरनेट पर उसके लिये समाधान ढूँढती माँ उसे कितना प्यार करती है वो कभी जान पाई?

    गहरी पीड़ाएँ, गहरी उदासी कभी कभी गहरे भ्रमों का द्योतक होती है. अफ्रीका में कपड़े के फुटबॉल से गन्दी झुग्गी में खेलते हुए बच्चो की खुशी और आनन्द का सिरा पकड़ने की कोशिश करती थी तो सोचती थी क्या हमारा समाज परम्परा से हमे भ्रमो में रहना सिखाता है? राम नाम सत्य कहने वाला समाज राम नाम पर कितना बड़ा भ्रम खड़ा करता है जो सिवा पीड़ा, तकलीफ और घृणा के कुछ पैदा नही करता, क्या सत्य कभी ये सबकुछ उतपन्न कर सकता है.

    जिनकी जिंदगियों की प्रत्यक्षतः वाट लगी होती है उनके भीतर जीवन का वो कौनसा स्रोत होता है जो उनके चेहरे पर खुशी बनकर चमकता है, क्या वो बिना बड़े बड़े ज्ञानोपदेश पढ़े सत्य को स्वीकारने और गले लगाने जैसी सबसे कठिन साधना सरलता से अनजाने में साध चुके होते हैं?

    हमारा समाज जाने कितने असत्यों का निर्माण करता है, जिंदगी जाने कितने भ्रम बुनती है, हमे परम्पराओ के टूटने से डर लगता है, धर्म की अवधारणा के खण्डित होने से डर लगता है, जाति का नियम टूटने से डर लगता है, हम व्यक्तिगत जीवन के भ्रमो के टूटने से डरते रहते हैं, और इस तरह एक समाज के तौर पर और व्यक्ति के तौर पर मानो किसी प्रेत योनि की तरह हम अनन्त जूझन, अंतहीन पीड़ाओं और व्यर्थ संघर्षों से गुजरते एक भ्रम से दूसरे भ्रम के बीच भटकते रहते हैं और राहत नही मिलती. हम अपने बनाये असत्यों के खण्डित होने और सत्य से जुड़ी पीड़ा से इतना डरते हैं कि उसके द्वार को खोलना स्थगित करते रहते है.

    मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा सम्भवतः अनन्त पीड़ा के बाद पैदा हुए शिशु के सुंदर मुख की तरह है, जिसके बाद सारी पीड़ा भूल जाती है और उस प्रेम, सुख और शांति के लिए ज़रूरी है कि हम मृत्यु से, व्याप्त अवधारणाओं के खंडन से, सत्य का द्वार खोलने से डरे नही. भय से बड़ा सम्भवतः हमारा शत्रु कोई नही.

    नोट: यह पोस्ट मृत्य से उपजी है मगर इस पोस्ट का अटल बिहारी जी की मृत्यु से कोई सम्बन्ध नही, न इसे केरल के बाढ़पीड़ितों के प्रति किसी असम्वेदना का द्योतक समझा जाये.

    Kanupriya

    Kanupriya


  • मुल्ला तो औकात मा है!

    मुल्ला तो औकात मा है!

    Ajay Kabir

    खेतवा सारे बैल चरि गए,
    घरे न आवा अनाज।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    नोटबन्दी मा छुटि नौकरी,
    पेट मा परि गा लात।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    ई टैक्स, उ टैक्स, जीएस टैक्स,
    दुकान मा परि गा ताला।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    शिक्षामित्र भये कंगाल,
    खाई न जा रही है दाल।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    पढ़ाई भई इतना महंगी,
    कि गई हाथ से छूट।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा है।

    नही चुका पाइन जो ब्याज,
    बप्पा खाय लिहिन सल्फास।
    कौनो बात नही,
    मुल्ला तो औकात मा हैं।

    चहुँ ओर हो रहा विकास,
    आखिर मुल्ला तो औकात मा हैं।

    Ajay Kabir

  • गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    गाय कटने से बाढ़ नहीं आती अंधभक्तों !

    Bhanwar Meghwanshi

    कुछ लोग केरल आपदा को गाय से जोड़ रहे है तो कुछ सबरीमाला मन्दिर में स्त्री प्रवेश से ।

    दोनो ही तरह के बंदबुद्धि भक्तों को यह समझना पड़ेगा कि ऐसी अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बातें सिर्फ जबानी जुमलेबाजी करने तक ही ठीक हो सकती है ,वरना तर्क की कसौटी पर तो यह कतई खरी नहीं उतरती है ।

    इस भक्त प्रजाति को कहना चाहता हूं कि गायें सिर्फ केरल में ही नही कटती ,गोवा ,बंगाल और पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यो सहित विश्व भर के सैंकड़ों देशों में गौकशी होती है । वहां पर अभी सब कुछ सामान्य है ।

    जिन्हें लगता है कि यह सबरीमाला मन्दिर की वजह से हुआ है, उनको भी अपने मस्तिष्क को खोलना होगा कि दुनियाभर के तमाम मंदिरों व अन्य धर्मस्थलों में स्त्रियां प्रविष्ट होती है, वहां कोई दिक्कत नहीं है।

    केरल की बाढ़ अत्यधिक बारिश की वजह से है ,यह कुदरत का निजाम है, इसकी चपेट में आस्तिक नास्तिक सब है ,जो गाय को पूजते है वो भी डूब रहे है और जो गाय खाते हैं वो भी, जो मन्दिर जाते है वह भी मर रहे है और जो ईश्वर में यकीन नहीं रखते है वो भी, जो पानी के कहर से बचे हुये है, वो सभी आराम से जिंदा है।

    बाढ़ के वैज्ञानिक कारण है, यह गौहत्या अथवा सबरीमाला से जुड़ा हुआ मामला नहीं है, यह समय केरल के मुसीबतजदा भारतीयों की मदद करने का है, गाय और सबरीमाला के नाम पर मूर्खतापूर्ण बातें करने का नहीं है।

    यह बाढ़ केरल के हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आस्तिक, नास्तिक, कम्युनिष्ट, कांग्रेसी, भाजपाई सबको लील रहा है, बिना विचारधारा का फरक किये, बिना धर्म, जाति पूछे। इसलिए अगर कुछ कर सके तो कीजिये, नहीं कर सकते है तो चुप रहिये, मगर ऐसी बेहूदी बातें मत कीजिये। यह वक़्त केरल के साथ खड़े होकर सच्चे भारतीय होने का फर्ज अदा करने का है, अपनी मूर्खता दिखाने का नहीं।

    Bhanwar Meghwanshi


    Bhanwar Meghwanshi

  • स्पेस

    स्पेस

    Dhiraj Kumar

    वहाँ कुछ भी नही होना था
    ऐसा कुछ मानना भी था
    और वहाँ कुछ था भी नही
    ऐसा मान भी लिया गया

    वहाँ मगर बहुत कुछ था
    इतना ज्यादा कि 
    पृथ्वी जैसी चीज का निशान ढूंढना
    नामुमकिन !

    वहाँ स्पेस था,टाइम था 
    डार्क मैटर था ,डार्क एनर्जी था ….
    और भी न जाने क्या क्या था ….

    तज्जुब कि….
    जो स्पेस-टाइम का 
    चार विमाओं वाला फेब्रिक 
    निरंतर फैल रहा था ……

    और तो और…..
    यह जो स्पेस-टाइम से बुना हुआ
    जो फैब्रिक था 
    उसमे ब्लैक होलों के टक्कर से
    या जुड़वा न्यूट्रॉन तारों के
    परस्पर घूर्णन से
    तरंग भी उठता था 
    बिल्कुल तलाब मे डाले गये 
    कंकड़ से उठने वाले तरंग की तरह

    वहाँ ….
    पहले भी बहुत कुछ था
    अब भी बहुत कुछ हो रहा है…..

    किसी द्वारा कुछ मानने या
    न मानने से क्या फर्क पड़ता है !
    वहाँ अभी भी बहुत कुछ होना है 

    Dhiraj Kumar

  • एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    Sanjiv Kumar Sharma

    (सिगरेट, शराब या असुरक्षित सेक्स प्राणघाती भी हो सकता है)

    जहां इंटरव्यू होना था वह एक आलीशान कमरा था। फर्श पर बेहतरीन कार्पेट, दीवारों पर नायाब पेटिंग्स, छत पर टंगा भव्य झाड़फानूस और अनेक खूबसूरत लाइटें; साथ में भव्य सोफे और देवदार की कांच लगी नक्काशीदार दर्शनीय मेज। दीवार पर बनी लकड़ी की अल्मारियों में किताबें, शोपीस और खूबसूरत मूर्तियां।

    जब अनीता जी इंटरव्यू के लिए आकर बैठी तो लगा कोई महारानी बैठी है। मैरून रंग की बेशकीमती सिल्क की साड़ी, मैचिंग स्लीवलेस ब्लाउज, गले में छोटा सा लेकिन रत्नजडि़त हार और एक हाथ में राडो की घड़ी तो दूसरे हाथ में सिर्फ एक हीरे का कंगन। तीखे नाक-नक्श और संतुलित मेकअप, करीने से कटे कंधों पर बिखरे घने बाल, व्यायाम से साधा हुआ सुगठित शरीर और साथ में इतनी गहरी मुस्कान कि पता लगाना मुश्किल, बनावटी है या असली।

    देखिए जरा समय के पाबंद रहिए और समय से अपना इंटरव्यू खत्म कीजिए। मैं समय की भारतीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखती, मेरे लिए एक-एक मिनट कीमती है। – अनीता जी ने घड़ी देखते हुए कहा। मुस्कराहट के साथ स्वर में ऐसी सख्ती दुर्लभ होती है।

    मैंने पैड संभाला और मोबाइल का रेकॉर्डर चालू करके मेज पर रख दिया। मेज पर रखा कॉफी का कप उठा कर एक सिप लिया और पहला सवाल पूछा।

    जी बिलकुल! तो मेरा पहला सवाल है कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आयीं?

    देखिए मेरा इस प्रोफेशन में आना कोई बड़ी घटना नहीं है। जब दुनिया मुद्रा, आई मीन करेंसी, के चारों ओर घूम रही है तो हर इंसान की ये मजबूरी है कि वह कोई ऐसा काम करे जिसके बदले में उसे पैसे मिलें वर्ना वो चाहे आईन्स्टीन हो या मोजार्ट उसे धकिया कर हाशिए पर फैंक दिया जाएगा। मुद्रा एक प्रतीक थी, सुविधा के लिए बनायी गयी थी। लेकिन प्रतीक की जगह वह खुद ही सब कुछ बन बैठी, जैसे आप अपने पिता की मूर्ति बना लें और उसे ही अपने बाप समझें। और पैसे मिलने का एक ही तरीका है कि हम अपना कुछ बेचें। जब हम बाजार में बेचने निकलते हैं तो ज्यादातर दुकानें कबाडि़यों की नजर आती है जो ’क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘रंगीली रातों’ को एक ही भाव खरीदते हैं। ऐसे में फिर आपके पास यही रास्ता बचता है कि आप धूर्त हो जाएं और वो बेचें जो आपके पास है ही नहीं या किसी और का छीनें। इसलिए मुझे लगा अपना जमीर बेचने से अच्छा है कि हम अपना जिस्म बेचें। कम से कम अपने खुद के सामने तो नजर उठा कर बात कर सकेंगे। मैंने इस प्रोफेशन में आने का डिसीजन लिया और मुझे इस पर गर्व है।

    आपको गर्व है?? आपको किसी तरह का शर्म का अहसास नहीं होता?

    क्या बकवास कर रहे हैं आप? इसमें शर्म की क्या बात है? शर्म की बात तो तब होती जब मैं किसी सरकारी नौकरी में जाकर देश की बर्बादी में हाथ बंटाती या लुटेरे कारपोरेट के समूह में शामिल हो जाती। मल्टी नैशनल कंपनी में अपना दिमाग बेचकर जिंदगी होम करने वाले हाइली पेड बंधुआ मजदूरों से मैं लाख गुना बेहतर हूं। अपनी मर्जी से काम करती हूं, अपनी शर्तों पर काम करती हूं। किसी को धोखा नहीं देती। मैं एक एन्ट्रप्रेन्योर हूं, इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है। कानूनी काम करती हूं और पूरा टैक्स भरती हूं।

    कानूनी?

    जी हां कानूनी! अगर आपकों कानूनों की जानकारी नहीं है तो पहले थोड़ा पढ़ कर आएं फिर इस पर बात करेंगे।

    अच्छा ये बताइए आपकी धर्म और ईश्वर के बारे में क्या धारणा है? आप किसे मानती हैं?

    निहायत वाफियात सवाल है। इससे बेहतर सवाल होता कि आप ये पूछते कि मैं कौन-सा सेनेटरी नैपकिन या किस कंपनी की हेयर रिमूविंग क्रीम इस्तेमाल करती हूं। देखिए, धर्म एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और उसका कोई छोटे-से-छोटा भाग भी प्रकट हो रहा है तो वह अश्लीलता है।

    आपने कभी शादी, परिवार के बारे में सोचा है?

    जी हां कई बार सोचा है लेकिन हर बार मन नकारात्मक भावों से भर गया है। देखिए जिस ढंग से हमारे यहां शादियां होती हैं वो बड़ा घिनौना है। जाति, धर्म, लालच और अन्याय उसमें इस तरह भरा है कि किसी जागरुक व्यक्ति के लिए शादी करना आसान नहीं है। सामाजिक मान्यता प्राप्त और थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा और पेंशन वगैरह की सुविधा प्राप्त वेश्याओं को पत्नी कहा जाता है। लेकिन उनके पास कॉल गर्ल्स जैसे अधिकार नहीं होते। रही परिवार की बात, तो मेरा परिवार बहुत बड़ा है और उसमें ज्यादातर सदस्य जैनेटिक रूप से नहीं जुड़े हैं। जैनेटिक परिवार तो मजबूरी और स्वार्थ की डोर से बंधे होते हैं।

    देश के हालात पर आपकी राय?

    देखिए इस सवाल की इतनी बेइज्जती हो चुकी है कि मैं इसका जवाब नहीं देना चाहूंगी। हर आदमी चाहे वो कितना ही जाहिल और निकम्मा क्यों न हो इस सवाल का जवाब एक्सपर्ट की तरह देता है।

    समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?

    हमारे समाज के ऊपर दो सबसे बड़े घाव हैं – मौत और सेक्स। इन्हीं दो से भागता है और इन्हीं दोनों के फोबिया और मेनिया के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पूरी जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। शायद इसे ही कबीर ने ‘दुई पाटन के बीच साझा बचा न कोय’ कहा है| जो इलाज किए गए वो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक निकले। लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म ने सेक्स का सहारा लिया और खाने, पीने, सोने जैसी साधारण और सहज चीज को टैबू करके उसे असाधारण ताकत दे दी और ‘फ्रैंकस्टीन’ बना दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी गालियों से लेकर विज्ञापनों या फिल्मों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक हर चीज सेक्स से सन गयी। कभी आपने चूहों के स्ट्रिप शोज़ देखें हैं? हमारी पूरी पीढ़ी ही इन्टरनेट के सामने बैठ गयी दूसरों को सेक्स करता हुआ देखने के लिए। उससे भी तृप्ति नहीं मिली तो आज वीभत्स से वीभत्स तरीके खोज रही है सेक्स के। इन्टरनेट के लिए सैक्स कर रही है! मौत के लिए तो मैं कुछ नहीं कर सकती लेकिन सेक्स को लेकर बने इस कैंसर के लिए मैं कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करती हूं। एक हीलर की तरह काम करती हूं। कई लोगों को मैंने ठीक किया है। सीनियर सिटीजन्स और डिफरेन्टली एबल्ड लोगों के साथ भी मैंने कई बार बिना किसी फीस के काम किया है।

    बलात्कार के मामलों पर आपका क्या कहना है?

    ये सवाल भी अपनी गरिमा खो चुका है। सब के सब या तो बलात्कार कर रहे हैं या बलात्कार पर अपनी राय दे रहे हैं। एक बीमार समाज का सबसे खास लक्षण बलात्कार होता है। जब बीमारी है तो लक्षण भी रहेंगे। फिलहाल बीमारी को दूर करने की मंशा मुझे तो कहीं दिखती नहीं।

    अच्छा इंटरव्यू के लिए आपका धन्यवाद। मेरा किसी से अपायंटमेंट है, मुझे अब जाना होगा। आप कॉफी और लेंगे? – अनीता जी अचानक घड़ी देखते हुए बोलीं।

    नहीं कॉफी तो नहीं! लेकिन मैडम कुछ सवाल रह गए हैं।

    कोई बात नहीं! उन्हें अगली बार के लिए रखिए। नमस्ते। हैव अ नाइस डे।

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • समय

    समय

    Mukesh Kumar Sinha

    1.
    मिट्टी हो रहे 
    हैं समय के साथ 
    भूल जाना तो नियति है
    पर याद रखना, 
    अंकुर फूटेंगे फिर कभी

    बस मन को नम रखना
    ताकि सहेजे पल, 
    खिलखिला पड़े, 
    तुम्हारे होंठो पर !!

    2.
    प्रेमसिक्त ललछौं भोर से 
    डूबते गुलाबी सूरज तक का 
    बीता हुआ समय

    पाँव भारी कर गया उन्मुक्त जवां दिलों को 
    कि अब रिश्ता उम्मीद से है !

    3.
    दस्तक समय की 
    बताने को आतुर, कि
    चूक चुके हो तुम

    याद रखना 
    नहीं होता कोई अपना!

    4.
    जिंदगी की धूप छाँव में
    कुछ तो हरियाली होगी ही

    बहती जा रही समय की 
    इस नदी में
    प्रेम के कुछ द्वीप तो होंगे ही

    5.
    हथेली पर पगडंडी सी रेखाएँ 
    और घड़ी की सुइयां
    बदस्तूर 
    बढ़ते हुए बता रही हैं

    बदलते समय के साथ, 
    बदलेगी जिंदगी
    उम्मीद बनाये निहार रहा हूँ ।

    6
    समय, 
    तेरी लकीरें 
    क्यों खारिज कर देती है 
    मुझे हरबार!

    Mukesh Kumar Sinha

  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या मोदी जी के विरोध के मायने लोकतांत्रिक होना जरूरी नहीं

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सन् 2014 के लोकसभा चुनावों के लगभग दो वर्षों पहले से लोकतंत्र की गूढ़ समझ रखने वाला लोकतांत्रिक व्यक्ति हो पाना बहुत ही अधिक सरल हो गया है। मोदी जी का विरोध कीजिए, गाली दीजिए या व्हाट्सअप फेसबुक ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर ऐसे संदेशों को कापी पेस्ट फारवर्ड कीजिए। इतना करते ही व्यक्ति लोकतांत्रिक हो जाता है।

    यह बिलकुल वैसा ही है जैसे मोदी जी का समर्थन करते ही व्यक्ति राष्ट्रप्रेमी, हिंदुत्व की असल समझ रखने वाला व कर्मठ हो जाता है।

    इन चरित्रों में अंतर क्या है यह समझ के बाहर है क्योंकि ऊपरी पैकिंग भले ही अलग रंग की हो लेकिन चरित्र तो बिलकुल एक ही है। चरित्र समान होने के कारण क्या फर्क पड़ता है कि मोदी जी के विरोधी हैं या समर्थक हैं क्योंकि पोषित तो समान सामाजिक मूल्य ही किए जा रहे हैं। इन समान चरित्रों में भी अंतर उन लोगों को दिख सकता है जिन्हें यह लगता है कि किसी लोकतांत्रिक देश में किस पार्टी की सरकार है, इस बात से उस देश व समाज के चरित्र का निर्माण होता है।

    यदि ऐसा होता तो किसी लोकतांत्रिक देश में कभी किसी दूसरी पार्टी की सरकार आनी ही नहीं चाहिए। यदि ऐसा होता तो भारत में हमेशा कांग्रेस की ही सरकार देश व प्रत्येक राज्य में लगातार ही बनती रहती। यदि ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश में मायावती जी की सरकार आने के बाद उन्हीं की बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा तो अखिलेश यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी। यदि ऐसा होता तो बिहार में 15 वर्षों तक सरकार रहने के बाद लालू प्रसाद यादव जी की सरकार बनी रहनी चाहिए थी, क्योंकि उनको तो उनके भक्तों/समर्थकों द्वारा सामाजिक न्याय का मसीहा भी कहा जाता है।

    लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि सच यही है कि किसी लोकतांत्रिक देश में सरकारें उस देश व समाज के लोगों की सोच समझ व चरित्र का प्रतिबिंब होतीं हैं। भारतीय समाज, परिवार, नौकरशाही व सरकारों का चरित्र मूल में अलोकतांत्रिक व सामंती है। समाज की इकाई के व्यक्ति के रूप में हमारे जीवन में झूठ, ढोंग व दोहरापन इत्यादि ही हमारे वास्तविक चरित्र हैं। समाज ही नहीं परिवार की इकाई के रूप में भी हम कमोबेश इसी चरित्र के हैं। हमें व्यक्ति, परिवार व समाज के रूप में अपने चरित्र को बदलने की मूलभूत जरूरत है। हमारा ऐसा करना ही वास्तविक क्रांति/परिवर्तन है। वास्तव में यही कर पाना ही क्रांति है। बिना ऐसा किए, रोज सरकारों को बदलते रहिए, रोज सरकारों को दोष दीजिए, रोज सरकारों को गाली दीजिए, रोज क्रांति गढ़िए अपनी पीठ ठोकिए अपने अंदर अहंकार को जीते रहिए। लेकिन ऊपरी पैकिंग के रंगों के अलावा कुछ नहीं बदलेगा।

    चलते-चलते:

    यदि मोदी जी से किसी पार्टी का होने की बजाय देश के लोगों का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा की जाती है जबकि देश का प्रधानमंत्री किसी न किसी पार्टी का प्रतिनिधित्व तो करता ही है वरना कोई प्रधानमंत्री ही नहीं बन सकता। जो लोग जो मोदी जी से देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं। वही लोग देश के पूर्व राष्ट्रपति माननीय प्रणव मुखर्जी जी के द्वारा एक स्वयंसेवी संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आमंत्रण को स्वीकार किए जाने का पानी पी-पी कर विरोध करते हैं। जबकि भारत के संविधान के अनुसार देश का राष्ट्रपति किसी भी पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। मतलब यह कि हम मोदी जी से तो देश का प्रधानमंत्री होने की अपेक्षा करते हैं लेकिन प्रणव मुखर्जी जी को देश का राष्ट्रपति होने के कारण बुरा भला कहते हैं। गजब का ढोंग व दोगलापन हममें कूट-कूट कर भरा है।

    राहुल गाँधी जी को मैं लोकतांत्रिक समझ वाला राजनेता मानता आया हूँ, इस मुद्दे पर उनके व्यवहार ने उनके प्रति मेरी मान्यता को पुष्ट ही किया है। उनको धन्यवाद। संघ द्वारा भारत के पूर्व राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। माननीय प्रणव मुखर्जी जी द्वारा आमंत्रण को स्वीकार करने के लिए धन्यवाद। यह घटना एक लोकतांत्रिक घटना थी।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • मीडिया में महिला — Vandana Dave

    मीडिया में महिला — Vandana Dave

    Vandana Dave

    वैसे तो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखना चाहिए कि मीडिया महिला और पुरूष में बँटा हुआ हो। मीडिया का काम लिंगभेद को समाप्त करना है न कि इसको बढ़ावा देना।

    महिलाओं को लेकर विश्वभर में अनेकों पत्र पत्रिकाएँ निकलती हैं। इनके कंटेंट को देखा जाए तो सालों से वही घिसापिटा चला आ रहा है। खूबसूरती, फैशन,पति, परिवार, घर, खाना आदि।

    अखबारों में भी इन्हीं विषयों के इर्द गिर्द नारी परिशिष्ट लगभग हर अखबार निकालता है। 

    अब प्रश्न उठता है कि यदि हम लिंगभेद समाप्त करना चाहते हैं तो क्या महिलाओं की अलग से पत्र पत्रिकाएँ निकालना आवश्यक है ? कोई भी अखबार या पत्रिका पाठको के लिए होना चाहिए। नर या नारी के लिए नहीं। यदि ऐसा होता है तो पुरूष व स्त्री को लेकर जुगुप्सा की भावना भी धीरे धीरे खत्म होती जाएगी। अकसर देखा गया है कि पुरूष स्त्रियों की पत्रिकाएँ बङे चाव से पढ़ते हैं। स्त्रियों से जुङे मुद्दे उनके लिए चटपटे होते हैं। 

    अखबार या पत्रिकाएँ आम पाठक के लिए होंगी तो दोनों के व्यवहार या उनकी समस्या को लेकर समान प्लेटफार्म पर बात होगी। इससे महिला पुरूष के बीच रहस्य की दूरी समाप्त होगी और समाज में सहज और स्वस्थ वातावरण निर्मित होगा।

    स्त्री सौंदर्य के बहुत बङे बाज़ार ने  मीडिया में स्त्री व पुरूष के भेदभाव को बढ़ाया है। वे कभी नहीं चाहते कि औरतें मेकअप की दुनिया से बाहर आकर अपने असली स्वरूप को जाने। इन कम्पनियों से मिलने वाले विज्ञापनों  के कारण मीडिया में स्त्री विशेष पर अलग से सामग्री छापी जाती रही है। मीडिया को स्वहित के बजाय समाज हित में इस सोच को बदलना होगा साथ ही पढ़ी लिखी महिलाओं को भी चाहिए कि वें स्त्रियों पर आधारित ऐसी पत्रिकाएँ लेने से बचें जो सिर्फ पति को खुश कैसे रखें या सास बहू का रिश्ता कैसे अच्छा हो या फिर लिपिस्टिक का कौन सा शेड आपकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देगा जैसी बातों से आपके  प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं। 

    लङकियाँ हर क्षेत्र में दखल दे रही हैं। बाहरी जगत से लगातार जुङती जा रही है ऐसे में इनके लिए जरूरी है कि ससुराल के परम्परागत तौर तरीकों में बदलाव हो। उसे पत्नी, बहू या अन्य रिश्तों में  बाँटकर उसके व्यवहार को परखा न जाए। रिश्ते थोपने का सिलसिला बंद होना चाहिए। यूँ भी पढ़ाई लिखाई हर रिश्ते को निभाने का सलीका देती है न कि ऐसी पत्रिकाओं में छपे आलेख। एक लङकी का जीवन विवाह के बाद प्रभावित न हो। उसे स्वाभाविक जीवन जीने की स्वतंत्रता मिल सके। इस दिशा में  मीडिया की भूमिका ऐसे माहौल को निर्मित करने में काफी कारगर सिद्ध हो सकती है। स्त्री पुरूष से जुङे असली मुद्दों पर समानरूप से चर्चा करनी आवश्यक है।

    आश्चर्यजनकरूप से अखबारों की पौरुष सोच गाहे बगाहे नज़र आती है। पत्रकारों द्वारा महिला हस्ती से किए जाने वाले प्रश्न इस माध्यम की संकीर्ण सोच को दर्शाती है

    यदि हम रोजमर्रा के संचार माध्यमों की नज़र से स्त्री को देखें तो वो कमज़ोर, बेबस, पीङित या उत्पीड़ित ही नज़र आती है

    बङा ताज्जुब होता है इस तरह की खबर पढ़ते हुए की मरने वालों में महिला, बच्चे और बुजुर्ग भी थे। इसका क्या मतलब है ये क्या कहना चाहते हैं। क्या औरतें भी बच्चों और वृद्धों के समान कमज़ोर होती है इसलिए उन्हें इनके साथ रखा जाता है। माना कि महिलाओं की शारीरिक बनावट पुरूष की तुलना में नाजुक प्रकृति की होती है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वें कमज़ोर होती हैं। समय आने पर वें अपनी शारीरिक ताकत का अहसास करा देती है। रानी  लक्ष्मीबाई, दुर्गावती जैसी अनेकों नारियाँ यौद्धा के रूप में इतिहास में दर्ज है।

    पिछले ओलम्पिक में हमारे देश की साक्षी, सिंधु, सानिया ने पुरूष प्रधान खेलों में जीत हासिल कर सबको चकित कर दिया था। स्त्री की सबसे बङी ताकत उसका मनोबल होता है। 

    ऐसे ही एक और खबर अकसर पढ़ने में आती है अकेली महिला पाकर वारदात को अँजाम दिया।

    इस तरह की खबरें पढ़कर हर महिला को अपने स्त्री होने का भय सताने लगता है उसका आत्मविश्वास कमज़ोर होता है। अकेले पुरूष के साथ भी घटना घटित हो सकती है किन्तु अखबारी नजरिया पूर्वाग्रह से ग्रसित होने से महिला के कमजोर होने को सार्वजनिक स्वीकारोक्ति प्रदान करता है। ऐसे में अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं और वे इस प्रकार के शिकार की फिराक में रहते हैं।

    मीडिया को ऐसी खबरें देने से रोकना होगा जो स्त्री को कमज़ोर करती है।

    अब कुछ मीडिया की संकीर्णता के नमूने 

    पिछले दिनों न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री माँ बनी। तब पत्रकारों ने उनसे प्रश्न किया कि आप नवजात बच्चे की माँ होने के साथ प्रधानमंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को कैसे निभाएंगी। इसके जवाब में वहाँ की प्रधानमंत्री ने औरतों में मल्टीटास्किंग जैसी खूबियों की बात कही। ऐसे ही कुछ समय पूर्व  भारत की महिला क्रिकेट की एक पूर्व कप्तान से पत्रकार ने जब यह पूछा कि आप किस पुरूष क्रिकेटर से प्रभावित है तो उसने जवाब दिया आपने कभी किसी पुरूष क्रिकेटर से इस तरह का प्रश्न किया कि वो किस महिला क्रिकेटर से प्रभावित है।

    एक ऐसा ही वाकया इन्दिरा गाँधी के साथ भी हुआ था जब उनसे पत्रकारों ने पूछा एक स्त्री होने के नाते आप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी कैसे निभाएंगी। तब श्रीमती गाँधी ने कहा था हमारे देश में पीएम, सीएम और डीएम होना महत्वपूर्ण हैं। इस पद पर स्त्री है या पुरूष मायने नहीं रखता। कहने का तात्पर्य यह है कि आज का मीडिया भी औरतों  की शीर्ष स्तर पर सामाजिक भागीदारी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा। इनके लिए वे खबरें ही महत्वपूर्ण होती है जिसमें महिला उत्पीड़न हो। ऐसी खबरों की अखबारों में तादाद इतनी ज्यादा होती है कि लगता है समाज में महिला अत्यधिक असुरक्षित है।

    मीडिया को स्त्री के प्रति हिंसा, दुराचार, दुर्व्यवहार के प्रति संवेदनशील होना चाहिए न की इसे सनसनीखेज बनाकर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

    संचार माध्यमों को सामाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए भूमिका तय करनी होगी व लिंगात्मक भेदभाव से मुक्त लेखनी द्वारा समाज को भी इस कोङ से मुक्त करना होगा।

    Vandana Dave

    पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

    फेसबुक पर मुण्डेर पेज संचालित 
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  • इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

    इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

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    बहुत साल पहले की बात है। उन दिनों में स्कूली छात्र था और कम्युनिस्ट शब्द पहली बार कानों में पड़ा था। यह शब्द प्रयुक्त किया था एक सरदार साहेब ने, जिन्हें मैं नानाजी कहा करता था।

    वे दिखने में साधु जैसे थे, क्योंकि वे सिख वेशभूषा में रहने के बावजूद बालों को अक्सर खुला रखा करते और गले में होती सफेद मोतियों की एक सुंदर माला। घर में कारें-जीपें बहुत थीं, लेकिन मेरे बाबा से मिलने के लिए वे घोड़े पर आते थे। दोनों की दोस्ती की वजह घोड़े, उपनिषद चर्चा और सिख-इस्लाम या दार्शनिक विषय हुआ करते थे। वे उपनिषदों की बहुत सी कहानियां बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करते थे।

    मैं अभी उनका नाम भूल गया हूं, लेकिन वे बानियावाला गांव से आया करते थे। उस गांव के सरदार मस्तानसिंह मुझे आज भी बहुत याद हैं। गांव का नाम बानियावाला था, लेकिन गांव पूरी तरह सिखों का था। उस गांव में मैंने कभी कोई बानिया नहीं देखा। बानिया यानी बनिया। यह गांव कई कारणों में मेरे दिलोदिमाग़ में है। वह सरदार साहब ही थी, जिन्होंने मुझे छठी कक्षा में “भोजप्रबंध” लाकर दिया था और कहा था कि मैं इसे कंठस्थ कर लूं। कपड़े की ज़िल्द और ख़ास गंध वाले पीले पन्ने वाली वह किताब आज भी हमारे घर की थाती है।

    “भोजप्रबंध” संस्कृत साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है। यह लोककवि बल्लाल की अनुपम रचना है। इसमें राजा भाेज की राजसभा के बहुत से सुंदर और सम्मोहक कथानक हैं। यह कृति बताती है कि शासकों को क्यों साहित्य में पारंगत होना चाहिए। लेकिन एक विद्या व्यसनी किसान सिख को जब मैं इस तरह देखता था तो ऐसा लगता था कि किसी पुराने कालखंड से कोई ऋषि चला आया है।

    इस ग्रंथ का वह श्लोक मुझे आज भी कंठस्थ है, जिसमें राजा भोज ने टटं टटंटं टटटं टटंटम् बोला और कालिदास ने समस्यापूर्ति यों की : राजाभिषेके मदविह्वलाया, हस्ताच्युतो हेमघटो युवत्या:; सोपानमार्गेषु करोति शब्दं टटं टटंटं टटटं टटंटम्!

    ख़ैर, बातचीत चल रही थी, कम्युनिज्म की। मेरे बार-बार प्रश्नों पर वे समझाने लगे : जैसे ये आंगन है। ये वेहड़ा है। तुहाडा ते साडा खेत है। ए घोड़ेे ऐं। ए मज्झां ते गाइयां ऐं…ये सबके सांझे हैं। मेरे बात पल्ले नहीं पड़ी। मुझे ये लगता था कि पूरे गांव का सब कुछ साझा ही है, क्योंकि हमारे घर से दूध और मक्खन मेरे दोस्त आकर ले जाते हैं और मैं किसी भी घर से जाकर गन्ने, फल और सब्जियां ले आता हूं या दे आता हूं। हमारा खेत दूर था। इसलिए चार क्यारे लूसण और दो क्यारे बरसीम पड़ोस के किसी खेत में बो लेते थे। बाबा ने कई लोगों को साथ लेकर आंदाेलन चलाया और गांव में स्कूल खुल रहा था; लेकिन वह बना उस जगह जो पांच-छह गांवों के बीच समान दूरी पर थी।

    लेकिन मुझे उनकी एक बात बहुत आसानी से समझ आ गई : सभी रिश्ते बहुत साफ़ सुथरे और इनसाफ़ की बुनियाद और न्याय की अाधारशिला पर टिके होते थे। (हां-हां, दोनों का मतलब एक ही होता है!) लेकिन वे ऐसे ही बोला करते थे। वे आैम प्रकाश चौटाला की तरह, लेकिन चौटाला से भी बहुत पहले से “यक़ीन, भरोसा और विश्वास” बोला करते थे। हर किसी से योग्यता और क़ाबिलियत के अनुसार काम और हर किसी को उसकी ज़रूरत और अावश्यकता के अनुसार पैसा। अब तुम चाहो तो मेहनत-मज़ूरी कर लो और चाहो तो हवाई जहाज उड़ाओ या फिर किताबें लिखो। कालिदास बनकर समस्या पूर्ति करो। मेरे ये बात बिलकुल पल्ले नहीं पड़ी। उनके शब्द आज भी वैसे के वैसे याद हैं।

    आख़िर में उन्होंने समझाया : देखो, मान लो तुम चार भाई हो। सब काम करेंगे अपनी क़ाबिलियत और जुगत से, लेकिन जो खेत में होगा, वह सबको बराबर मिलेगा। इस तरह वे कई चीज़ें समझा रहे थे। यह सही है कि न तो वे कम्युनिस्ट थे और न ही मेरे बाबा। न ही मैं कभी कम्युनिस्ट बना और न ही सरदार साहब की संतानें। सबके भीतर पता नहीं कौन कौन आवाज़ें लगाता है। लेकिन कभी किसी सांप्रदायिक, मताग्रही, जातिवादी या राष्ट्रवादी को उन्होंने न पसंद किया और न कभी अपने आसपास फटकने दिया। कई संकीर्ण मुल्ला-मौलवियों, पंडितों-ज्योतिषियों, मिशनरियों, ग्रंथियों आदि से दो-दो हाथ करते ही देखा। हमारी रगों में भी वही लहू बहुत जीवंत होकर बह रहा है।

    लेकिन कुछ समय बाद जब उन सरदार साहब की मां का देहांत हुआ तो मैं भी बाबा के साथ घोड़े पर बैठकर गया। उस दिन वे बोले : बेटा, आज तेरे उस दिन वाले प्रश्न का उत्तर मेरे पास बहुत ज़ोरदार है। हर मां होती है सच्ची कम्युनिस्ट! तुम मां को समझ लो तो कम्युनिज्म समझ आ जाएगा। देख, मैं नकम्मा (निकम्मा) कोई काम नहीं करता। सारा दिन वेहला (बेकार) घूमता रहा। किताबें पढ़ता। साधु बना। मेरे भाई खेत में खटते। लेकिन मां ने सदा सबको एक जैसी रोटी दी, मक्खन में लिबड़-लिबड़ के। सरों का साग दिया घ्यो से तर करके। मैंनूं भी वही दूध का बड़ा छन्ना और खेत में खटने वालों को भी वही सब। एक जैसा पैसा, एक जैसा प्यार।

    वे बोले : हमारे घरों में जो जमाईं ऊंचे पदों पर थे उनको भी वही शगुन और सम्मान दिया। जैसा उनको वैसा ही सरीके-कबीले के कम पढ़े लिखे दामादों को। सबके साथ बराबर। एक भाई ने बड़ी पैळी (खेत) बना ली और एक के पास कम रही तो भी मां के लिए दोनों बराबर रहे। न प्यार में फर्क, न दूध के गलास में और दही के कटोरे में। मुझ नकम्मे को अगर मक्खन बिना रोटी चंगी नहीं लगती थी तो वह हमारे बड़े भाई के हिस्से का भी मक्खन हमें देती थी।

    वे कह रहे थे : और वेखो तुम, तुम्हारी मां भी ऐसी ही होगी और तुम्हारे प्यो की मां भी वैसी ही हाेगी। मां की मां भी और दुनिया की हर मां। हर मां की नीति fairest of all principles होती है : from each according to his ability, to each according to his needs! एबिलिटी के अनुसार काम और ज़रूरत के अनुसार अवदान!

    और कमाल वेखो : मां के इस फै़सले पर न कभी बाप की घुड़की चली और न कभी ताए की गालियां कुछ कर पाईं! बाप तो पूरी हिटलरशाही चलाता है। एक ही घर हिटलरशाही भी तब कुछ ठीक कर पाती है अगर मां का कम्युनिज्म साथ हो। मां भी अगर हिटलर हो जाए तो फिर आंगन का तो हिरोशिमा बनना तय ही है, वेहड़ा भी नागसाकी हो ही जाऊगा!

    वे बोले : देख, घर से मां चली गई, कम्युनिज्म चला गया! बस हिटलरशाही रह गई। वह रुआबदार आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंज रही है आैर सिख वेशभूषा के कारण उनका ऋषितुल्य चेहरा मेरी आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। मानो, वे कह रहे हों : कम्युनिज्म चला गया, मां चली गई! (कम्युनिज्म का अर्थ यहां सीपीआई-सीपीएम आदि के शासन से नहीं लगाया जाए। जैसे कि आरएसएस ब्रैंड विचारधारा या इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट या भोलेभाले लोगों को ठगने वाले ईसाइयों की गतिविधियों को हम धर्म नहीं कह सकते।)

    Tribhuvan