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  • विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    पिछले साल की बात है, एक मित्र के घर बारहवीं क्लास में टॉप किये एक बच्चे से बात हो रही थी. वो अपना कुत्ता लेकर उसके साथ खेल रहा था, अचानक उसका पैर एक किताब पर लगा और उसने “किताब के पैर छुए” कान भी पकड़े. खेलते हुए उसका पैर कुत्ते को भी लगा, उसने फिर कुत्ते के प्रति भी क्षमा व्यक्त की, मैंने पूछा कि ये क्यों? उसने कहा कि ये कुत्ता नहीं भेरू महाराज है. मैंने एक टीवी सीरियल में देखा था, एक देवता की तस्वीर में भी मैंने कुत्ते देखें हैं.

    मैंने उसकी किताब को गौर से देखा उसकी किताब पर नेम चिट में एक हवा में उड़ने वाले देवता की तस्वीर के बगल से उसका नाम लिखा हुआ था.

    मैंने पूछा ये किस तरह का जीव है? उसने कहा ये जीव नहीं भगवान् है जो हवा में उड़ सकते हैं.

    मैंने इस बात को इग्नोर करके उससे गुरुत्वाकर्षण के बारे में पूछा. उसने गुरुत्वाकर्षण का पूरा नियम एक सांस में बोलकर सुना दिया, फिर मैंने उससे पलायन वेग (एस्केप वेलोसिटी) और प्लेनेटरी मोशन पर कुछ पूछा उसने तुरंत दुसरी सांस में इनसे संबंधित सिद्धांत सुना दिए.

    ये सुनाते हुए वह बहुत प्रसन्न था, मैंने फिर पूछा कि एक राकेट को उड़ने और जमीन के गुरुत्व क्षेत्र से बाहर जाने में कितना समय और ऊर्जा लगती है? क्या यह ऊर्जा एक इंसान या जानवर में हो सकती है? उसने कहा नहीं इतनी ऊर्जा एक बड़ी मशीन में ही हो सकती है जैसे कि हवाई जहाज या राकेट.

    मैंने उससे फिर पूछा कि ये उड़ने वाले देवता कैसे उड़ते होंगे? उसे ये प्रश्न सुनकर बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ. उसने बड़ी सहजता से उत्तर दिया कि वे भगवान हैं और भगवान कुछ भी कर सकते हैं.

    मैंने फिर आखिर में पूछा कि क्या भगवान प्रकृति के नियम से भी बड़ा होता है? उसने कहा मुझे ये सब नहीं पता लेकिन भगवान जो चाहे वो कर सकते हैं.

    अभी देश भर में परीक्षा में टॉप कर रहे बच्चों की खबरें आ रही हैं और हर शहर में जश्न हो रहा है. जिन बच्चों ने टॉप किया है निश्चित ही वे बधाई के पात्र हैं. उन्होंने वास्तव में कड़ी मेहनत की है और जैसी भी शिक्षा उन्हें दी गयी उसमे वे ज्यादा अंक लाकर सफल हुए.

    लेकिन इन बच्चों की सफलता का वास्तविक मूल्य क्या है? क्या ये वास्तव में अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक बन पाते हैं? क्या इनकी शिक्षा – जो अधिकाँश अवसर पर विज्ञान विषयों के साथ होती है – इन्हें वैज्ञानिक चित्त और सोचने समझने की ताकत देती है?

    ये टॉपर बच्चे अक्सर ही रट्टू तोते होते हैं जिन्हें मौलिक चिंतन और विचार नहीं बल्कि विश्वास सिखाये जाते हैं, ये पश्चिमी बॉसेस के लिए अच्छे बाबू, टेक्नीशियनऔर मैनेजर साबित होते हैं ये खुद कुछ मौलिक नही कर पाते।

    परीक्षा परिणामों का यह जश्न मैं 20 सालों से देख रहा हूँ, और दावे से कह सकता हूँ कि इन टॉपर्स में से अधिकांश बच्चों को IIT, JEE, AIIMS इत्यादि की स्पेशल कोचिंग वाले भयानक दबाव वाले रट्टू और प्रतियोगी वातावरण में तैयार किया जाता है।

    ये बच्चे किसी ख़ास परीक्षा में पास होने के लिए तैयार किये जाते हैं, इनमे ज्ञान के प्रति, सीखने और समझने के प्रति कितना लगाव है ये एक अन्य तथ्य है जिसका कोई सीधा संबंध इन बच्चों की उपलब्धियों से नहीं है. ऐसे अधिकांश बच्चे धर्मभीरु, विचार की क्षमता से हींन, आलोचनात्मक चिंतन से अनजान और समाज, सँस्कृति और धर्म के ज्ञान से शून्य होते हैं।

    अधिकतर इन्हें प्रतियोगिता परीक्षाओं की स्पेशल कोचिंग में उच्चतर विज्ञान और गणित इत्यादि घोट घोटकर पिलाये जाते हैं और घर लौटते ही इन्हें मिथकशास्त्र और महाकाव्यों की तोता मैना की कहानियां पिलाई जाती हैं।

    न केवल ये मिथकों और महाकाव्यों में श्रद्धा रखते हैं बल्कि स्कूल कालेज या परिक्षा के लिए जाते समय प्रसाद चढाकर या मन्नत मांगकर भी जाते हैं. ये बच्चे एक तरफ ग्रेविटी, एस्केप वेलोसिटी इत्यादि रटते हैं और दुसरीं तरफ आसमान में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवताओं की पूजा भी करते हैं।

    ये एक भयानक किस्म का सामूहिक स्कीजोफेनिया है जिसमे एक ही तथ्य के प्रति कई विरोधाभासी जानकारियाँ और विश्वास लेकर बच्चे जी रहे हैं, वे ज्ञान के किसी भी आयाम में कुछ मौलिक नहीं खोज पाते. वे सिर्फ पहले से ही खोज ली गयी चीजों के अच्छे प्रबंधक या तकनीशियन या बाबू हो सकते हैं लेकिन विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन इत्यादि में कुछ नया नहीं दे पाते हैं.

    इन बच्चों का एक ही लक्ष्य होता है कि किस तरह से कोई परिक्षा पास करके जीवन भर के लिए कोई बड़ी डिग्री हासिल कर ली जाए और एक बड़ी कमाई तय कर ली जाए. इसके आगे पीछे जो कुछ है उससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता. अधिकाँश बच्चों में आरंभ में इस तरह की जिज्ञासा होती है लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे परिवारों के अंधविश्वास पूजा पाठ और कर्मकांड इन जिज्ञासाओं को मार डालते हैं.

    आप कल्पना कीजिये जिस परिवार में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवता की पूजा होती है उस घर का कोई बच्चा गुरुत्वाकर्षण के वर्तमान सिद्धांत में कोई कमी निकालकर उसे कभी चुनौती दे सकेगा? जो बच्चा मन्त्र की शक्ति से विराट रूप धर लिए किसी अवतार की पूजा करता आया है क्या वह जेनेटिक्स या जीव विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के कमियाँ खोजकर कुछ नया और मौलिक प्रपोज कर सकता है?

    निश्चित ही ऐसे बच्चे इस दिशा में अधिक सफल नहीं हो सकते. यह संभव भी नहीं है. जो मन आलोचनात्मक चिंतन कर सकता है वह परीलोक की कहानी को जीवन भर धोकर उसकी पूजा नहीं कर सकता. ये दो विपरीत बातें हैं.

    इसीलिये भारत के करोड़ों करोड़ बच्चे, जो किसी न किसी परिक्षा में पास होकर या टॉप करके निकलते रहे हैं उन्होंने ही मिलकर उस भारत को बनाया है जिसमे मंत्री नेता और अधिकारी लोग बारिश लाने के लिए हवन कर रहे हैं.

    उन्ही बच्चो ने ये भारत बनाया है जिसमे आज सीमाओं की रक्षा के लिए राष्ट्र रक्षा महायज्ञ हो रहा है और डिफेंस की टेक्नोलोजी फ्रांस और इजराइल से खरीदी जा रही है. उन्ही बच्चों के बावजूद आज वह भारत सामने है जिसमे गाय के नाम पर या लव जिहाद के नाम पर सरेआम लिंचिंग हो रही है.

    टॉपर बच्चो के जश्न के बीच इन बातो पर एक बार जरुर गौर कीजियेगा.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम नहीं –Jayant Jigyasu

    सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम नहीं –Jayant Jigyasu

    Jayant Jigyasu

    राजनीति विज्ञान के कौन-कौन धुरंधर हैं जो राजद के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन भी चाहते हैं, मगर मेरे मुंह से फूले-अंबेडकर-पेरियार- सावित्री-फ़ातिमा-लोहिया-लिमये-कर्पूरी-जगदेव-बीएनमंडल-लालू-शरद, आदि का नाम सुनकर उनके कानों में शीशे पिघलने जैसा अहसास होता है, मेरा कुछ लिखा देखकर उनकी आंखों को चुभता है। बिहार में वे छात्र राजद और एनएसयुआई के साथ पटना युनिवर्सिटी छोड़ कर बाक़ी सभी युनिवर्सिटी में चुनाव भी लड़ते हैं, मगर कुछ मंडन मिश्र और विदुषी भारती टाइप के लोग लालू-शरद को रातदिन कोसने से बाज भी नहीं आते।

    दोहरापन मेरे चरित्र में नहीं, बल्कि उन ज्ञानियों-ध्यानियों के डीएनए में है जो रात के अंधेरे में मामले डील करते हैं, मेरे जैसे लोग दिन के उजाले में सियासत करते हैं। जो बोलते हैं, डंके की चोट पर करते हैं। मैं न तो संस्कृति के नाम पर किसी की चरणवंदना करने में यक़ीन करता हूँ, न शर्त रखकर राजनीति करता हूँ। न किसी कंफ्यूजन में हूँ, न किसी ‘कंफ्यूज्ड’ पार्टी में। जहाँ जिस संगठन में हूँ, पूरी समझदारी से, पूरी ईमानदारी से।

    जिसको यह लगता है कि सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम हैं, उनकी समझदारी में कोई बड़ी भारी गड़बड़ी है। मेरे आगे किसी का पेंचपांच न चला है, न चलता है, न चलेगा। लुच्चई, गुंडई, चुगलई और थेथरई में एक्सपर्टिज़ हो सकती है तुम्हारी, पर करेज, कंविक्शन और इंटेग्रिटी कहां से ले आओगे?

    मैंने दो साल पहले ही कहा था कि जिस दिन सीताराम येचुरी लालू प्रसाद से, डी राजा राहुल गांधी से और डीपी त्रिपाठी शरद यादव से बतियाना-मिलना छोड़ देंगे, उस दिन मुझे कोई कहे। और, तब भी सियासत में किसी से संवाद और मुलाक़ात का सिलसिला हम तो नहीं ख़त्म करने वाले। कम्युनिज़म कब से इतना संकुचित और कुंठित हो गया? जिसे कम्युनिज़म का क भी नहीं पता, वो भी जहाँ-तहां लेक्चर देने लगता है। ज़माना ही जम्हूरों और जुमलेबाज़ों का है।

    कोई बहुत ज़्यादा दिन नहीं हुए, यही कोई डेढ़ दशक पहले सीताराम येचुरी लालू प्रसाद के साथ चुनाव प्रचार में मेरे गृहविधानसभा अलौली आए थे और अमेरिकी साज़िश व पूंजीवादी ख़तरे की ओर वहाँ की जनता का ध्यान आकृष्ट कर रहे थे। ढाई दशक पहले सूर्यनारायण सिंह के लिए लोकसभा चुनाव में और सत्यनारायण सिंह के लिए विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद वोट मांग रहे थे। जब वोट चाहिए, तो लालू प्रसाद-शरद यादव बहुत ठीक, जब अपनी जीत सुनिश्चित करनी हो तो गठबंधन की वकालत करो, लेकिन जब लालू प्रसाद बीमार पड़ें तो जयन्त उनके स्वस्थ होने की सद्कामना न व्यक्त करे। मगर, ज्ञानी-ध्यानी लोग अपना टिकट श्योर कराने के लिए उनकी परिक्रमा कर आए, जयन्त इसी दोहरी राजनीति और दोगली नीति की आरंभ से मुख़ालफ़त करता रहा है और आगे भी वह अपने उसूल पर अटल रहेगा।

    मैं क्या बोलता हूँ, यही तो बोलता हूँ कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने 6 (5+1) विश्वविद्यालय खोले जितने आज़ादी के बाद के उनके पहले के सारे मुख्यमंत्रियों ने मिलकर भी नहीं खोले। इसमें क्या तथ्यात्मक ग़लती है, ग़लत बोल रहा हूँ तो कोई चुनौती देके दिखाए या दुरुस्त करे। अगर यह कहता हूँ कि लालू प्रसाद के साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है, तो इसमें क्या ग़लत है, कोई साबित करे। जब यह कहता हूँ कि यह न्यायपालिका का फ़ैसला नहीं, ब्रह्मपालिका का फ़रमान है, तो उसमें मेरे अछरकटूआ व विशुद्ध दलाली पर आश्रित ‘कम्युनिस्ट’ मित्रों को बुरा क्यों लगता है! मत भूलिए, कि जनसमर्थन नहीं बल्कि जनप्रबंधन व मीडियाप्रबंधन की सियासत की उम्र लंबी नहीं होती। एक जातिविशेष का होने के चलते बिन कहे, बिन मांगे जो लाभ कुछ लोगों को मिल जा रहा है और वो बिन नंगे हुए सफ़ेदपोश बने घूमते फिर रहे हैं; उस पर किसी के लब क्यूं नहीं हिलते। कुछ लोग मर्यादा में रहें, तो अच्छा रहेगा।

    क्या यह सच नहीं है कि इसी युनिवर्सिटी के दो प्रेज़िडेंट कांग्रेस और एनसीपी में हैं? क्या यह झूठ है कि एक तीसरे प्रेज़िडेंट एक नेशनल पार्टी के प्रेज़िडेंट की स्पीच लिखते हैं? और, एक प्रेज़िडेंट कब, कहां, किस-किस से छुप-छुप के मिलने और वरदहस्त प्राप्त करने चले जाते हैं शुतुरमुर्गी चाल के साथ; यह किसी से छुपा है क्या!

    हम जिस किसी से मिलते हैं, रोशनी में मिलते हैं, दुनिया के सामने मिलते हैं, छात्र हित, शिक्षक हित, कर्मचारी हित, शोधहित, शिक्षा हित, विश्वविद्यालय हित और मानवता हित में मिलते हैं। मुझे किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं, और ऐरूगैरू-नत्थूखैरू से क्या! लेकिन, मेरे पास न तो सुब्ह-शाम ठकुरसुहाती करने का वक़्त है, न हाजरी लगाने का स्वभाव, न किसी का भाषण लिखने के दुर्दिन आए हैं। टीटीएम और फ्लैटरी करके न कभी कुछ चाहा है न किसी की कृपादृष्टि से यहाँ तक आया हूँ। जहाँ हूँ, वहाँ संघर्ष, प्रतिभा, जुनून और जज़्बे के चलते हूँ, किसी के रहमोकरम पर नहीं। न तो किसी ने खैरात में कुछ सौंपा है, न किसी ने मुझ पर कोई अहसान किया है। मैं निजी जीवन, समाज, संगठन या सियासत में जिस जगह खड़ा हूँ, वहाँ किसी का कृपापात्र बनकर नहीं हूँ। लेकिन, ऐसे कई कूपमंडूक, व्यभिचारी-दुराचारी-अत्याचारी लोग हैं इसी समाज में, जिन पर चंद लोगों की नज़रे-इनायत न हो तो वुजूद मिट जाए। जिनके निजी और सार्वजनिक जीवन में दोहरे आचरण, झूठ-फरेब और मनुवादी मानसिकता की कार्यसंस्कृति की कोई इंतहा ही नहीं।

    दीवारो-दर को सारे ही घर को बुरा लगा
    पत्ता हरा हुआ तो शजर को बुरा लगा। (नवाज़)

    Jayant Jigyasu

    Studied in,

    Indian Institute of Mass Communications, IIMC, Delhi

    JNU, Delhi

    St. Stephen’s College, Delhi

  • रण्डी साली : गाली या प्रेरणा

    Pradyumna Yadav

    पहली बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह करीब 8 साल की थी. घर में किसी ने गाली दी थी. शायद बड़ी या छोटी दादी में से कोई थी. घर का माहौल ऐसा था कि वहां गाली खाना और गाली देना आम बात थी. तब उसे रंडी का मतलब नहीं पता था. वो लड़कों के साथ लड़कों की तरह दिनभर उछलकूद करती थी. शायद ये बात दादी को ठीक नहीं लगी थी. इसीलिए उसे रंडी कहा गया.

    दूसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 14 साल की थी. उस समय वह लड़कियों की तरह रहना और लड़की होना सीख रही थी. वक्ष बहुत उभरे तो नहीं थे लेकिन इतने थे कि कपड़ो में उनका आकार दिखने लगा था. उस दिन वह पहली बार स्कूल में टाइट कपड़े पहनकर गयी थी. उसकी चाल ढाल बिल्कुल वही थी जिसे अब छोड़ने और बदलने की सीख दी जाने लगी थी. बड़ी क्लास के लड़कों को यह ठीक नहीं लगा. उनमें से किसी एक की दबी जुबान उस दिन खुल गयी – ‘रंडी है साली’.

    तीसरी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह 18 साल की थी. मुहल्ले के कुछ लड़कों ने उसे मुहल्ले के बाहर के दो दोस्तों के साथ बात करते हुए देख लिया था. उनकी नज़रों में ऐसी हिकारत थी कि वह भीतर तक सहम गयी थी. ‘ रंडी निकल गयी है ये. एक नहीं दो के साथ लगी पड़ी है. अपने मुहल्ले का नाम खराब कर दिया साली ने. ‘ उस दिन रंडी शब्द उसके कानों में देर तक गूंजता रहा.

    चौथी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह घर से लड़ झगड़ कर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए यूनिवर्सिटी में दाखिले की जिद करने लगी. उस समय वह 23 की थी. उस दिन उसने ऐसी जिद पकड़ी कि वह घर के बाहर ही धरने पर बैठ गयी. पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया. उसकी जिद जायज थी. इंट्रेस इक्जाम में उसे सातवीं रैंक मिली थी. उसने बड़ी मुश्किल से चोरी छिपे एंट्रेंस इक्जाम दिया था.

    उसकी जिद थी कि वह पढ़ेगी. उसे अभी शादी नहीं करनी. अगर किसी ने दबाव बनाया तो वह घर की चौखट पर ही जान दे देगी. मुहल्ले के शिक्षित बुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद घरवालों को झुकना पड़ा. लेकिन सभी बुजुर्ग ऐसे नहीं थे. उस दिन कईयों में आपसी खुसुरफुसुर हुई जो न चाहते हुए भी उसके कानों तक पहुंच गई – ‘रंडी है फलाने की लड़की. जाने कितनों लड़को से मिलती है. कई बार तो मैंने सामने से जाकर देख लिया है. लेकिन मजाल की वहां से हटे. लाज शर्म कुछ है ही नहीं. उल्टा मुझे ही घूर के देखती है. इसको बाहर इसलिए जाना है ताकि वहां खुलकर मुंह काला कर सके.’

    पांचवी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह अपने प्रेमी के साथ शहर में घूमते हुए देखी गयी. उम्र थी 25. वह बेधड़क अपने प्रेमी का हाथ अपने हाथों में लिए घूमती थी. उस दिन बाइक से गुजरते हुए एक लड़के ने चीखकर कहा था – ‘एक बार हमें भी छूने दे रंडी. हम क्या इससे बुरे हैं.’

    छठी बार उसे रंडी तब बोला गया जब वह डिप्टी एसपी पद के लिए चयनित हुई. उम्र थी 27 साल. पार्टी के लिए वह दोस्तो के साथ रेस्टोरेंट गयी थी. वहां उसे फिर वही शब्द सुनने को मिला. ‘अरे देख. ये रंडिया तो अधिकारी बन गयी. गज़ब भौकाल है साली का. हमी स्साला चुतिया बैठे हैं ‘

    पिछले पांच बार उस लड़की ने रंडी शब्द सुनने के बाद क्या किया , उसने नहीं बताया था. लेकिन इस बार क्या हुआ, वो सब कुछ उसने बेहद गर्व के साथ बताया.

    वह अपनी सीट से उठी और लड़के का कॉलर पकड़ के चार तमाचे जड़ दिए. उसने लड़के को ऐसा धक्का दिया कि वह अपनी सीट समेत ज़मीन पर लुढ़क गया. लड़के के दोस्त उसका आक्रामक रवैया देखकर चंपत हो गए. उस दिन लड़की ने उस लड़के को बहुत देर तक गालियां दी. उस पर लात घूंसे बरसाती रही. शायद 27 साल की उम्र तक उसने जो भी सहा था सब उस दिन ही फूट पड़ा. आखिर में पुलिस के आने के बाद ही लड़की ने उस लड़के को छोड़ा.

    उस दिन उसे गुस्से के साथ पछतावा और गर्व भी था. मैंने पहली बार किसी इंसान में एक साथ इतनी भावनाएं देखी थी. उसमें 27 साल की उम्र तक जो भी झेला गया था , सबका गुस्सा भरा हुआ था. उसे यह पछतावा भी था कि वह 27 साल की उम्र में पहली बार रंडी कहने पर किसी का विरोध कर पाई. इतना समय लग गया उसे. उसे इस बात का गर्व भी था कि पहली बार उसने विरोध किया. ऐसा विरोध कि आसपास सब दंग रह गए.

    उस दिन के बाद उसे किसी बेहद सामान्य या किसी बड़ी बात के चलते कितनी बार रंडी बोला गया उसे याद नहीं था. उसने रंडी बोले जाने की वजह से कितनों की खबर ली ये भी उसे याद नहीं था.

    अब जब वो अपनी बीती जिंदगी कि ये सारी बातें बताती है तो उसे रंडी गाली नहीं बल्कि प्रेरणा लगती है. वह कहती है कि मैं नाहक ही गुस्सा हो जाया करती थी. रंडी कोई गाली नहीं है. रंडी मेरे लिए प्रेरणा है. मुझे जितनी बार रंडी बोला गया उतनी बार मेरा रंडी के प्रति सम्मान बढ़ता गया.

    मैं आज जो भी हूँ वह महिलाओं के खिलाफ , समाज के तयशुदा मानकों को तोड़कर हूं. मैंने जब भी ऐसा कुछ किया मुझे रंडी कहा गया. मुझे आज कोई रंडी कहे तो गर्व होगा. मैं खुद को चरित्रवान और सभ्य-सुशील महिला की बजाय रंडी कहलवाना पसंद करूंगी. रंडी सिर्फ शब्द नहीं है. रंडी उस व्यवस्था से विद्रोह है जिससे निकलकर मैंने अपनी जिंदगी जीने के तौर तरीके खुद तय किये हैं.

    Pradyumna Yadav


  • गालियां अचानक इतनी मुकद्दस क्यों हो गई हैं बख़्तरबंद स्टूडियो से रणभेरी बजाने वालों के लिए? –Tribhuvan

    गालियां अचानक इतनी मुकद्दस क्यों हो गई हैं बख़्तरबंद स्टूडियो से रणभेरी बजाने वालों के लिए? –Tribhuvan

    Tribhuvan

    मैंने सुना और पढ़ा है कि इस धरती पर संस्कृति का सूत्रपात उस व्यक्ति ने किया, जिसने सबसे पहली गाली दी।

    लेकिन लगता है, गालियां अचानक और भी मुक़द्दस हो गई हैं। निहायत ही अक़ीदत से एक नेशनल टीवी चैनल इस पर इस तरह पढ़ी जा रही हैं कि पूरी व्यवस्था इस देश में एक ही बंदे के ख़िलाफ़ हो गई है। मैंने पत्रकारिता में आज तक यह नहीं देखा कि किसी व्यक्ति ने अपने ऊपर फेंकी जा रही गालियों को इस तरह किसी ने ख़बर बनाया हो। ऐसा एक बार अरुण शौरी साहब ने अवश्य किया था, जब चौधरी देवीलाल ने उन्हें फ़ोन पर बहन.. कहा था और शौरी साहब ने उसे इंडियन एक्सप्रेस ने वैसा का वैसा फ़्रंट पेज पर छापा भी था।

    लेकिन क्या आजकल चल रही इस ख़बर और उस रुदन में कोई अंतर है, जो पिछले दिनों गुजरात चुनाव में सुनाई दिया था? जिसमें कई बार बहुत गुस्सैल और कई बार बहुत रोतली भाषा में कहा गया कि देखो मेरे देशवासियो, मुझे इन लोगों ने नीच कहा। मनूं नीच कह्यो! नीच कहा, वह तो समझ में आता है कि एक ऐसा शख्स था, जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए, क्योंकि वह केंद्र में मंत्री रहा है। यह भी समझ में आता है कि देश का उपप्रधानमंत्री जब किसी के साथ लूज़ टॉक करे तो वह ख़बर बनती है।

    और यहां जब सब लोग जानते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रियों के ट्विटर और फ़ेसबुक एकाउंट कुछ खास कि़स्म के लोग चलाते हैं। क्या किसी मंत्री या प्रधानमंत्री के पास वाक़ई इतना टाइम है कि वह इतने ट्वीट पढ़े या उनका जवाब दे? यह सब जानते हैं कि यह सब काम मंत्रियों के इर्दगिर्द के लोग करते हैं। और आजकल इन चीज़ों की बाढ़ आई हुई है।

    अगर गालियां किसी व्यक्ति के इर्दगिर्द रोशनी या अंधेरे की दीवार खड़ी हो जाने का प्रमाण हैं तो मेरे ख़याल से इस आधार पर न तो कोई नरेंद्र मोदी को छू सकता आैर न ही राहुल गांधी को। गालियां खाने में तो राहुल गांधी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारी ही पड़ेंगे। ये ही क्यों, मीडिया की कई हस्तियां जितनी गालियां खाती हैं, उनका कोई हिसाब ही नहीं है। आप कई सुनाम पत्रकारों के ट्वीटर हैंडल देखेंगे तो परिचय में मिलेगा : प्रेस्टीट्यूट, पाकिस्तानी, देशद्रोही, आईएसआई एजेंट, पेड मीडिया आदि आदि। आप पत्रकार हैं और कुछ लिखेंगे तो लोग ऐसी प्रतिक्रियाएं भी देंगे। ऐसा कौन पत्रकार है, जो निर्भीकता से लिखता है और उसे गालियां नहीं पड़ती हों। आए दिन ऐसा लोगों के साथ होता है। आपको अगर गालियों से इतना ही भय लगता है तो आप ऐसे पेशे में हैं ही क्यों? और ऐसी स्टोरी करते ही क्यों है? अगर करते हैं तो दिलीप मंडल की तरह गालियों का आनंद लेना भी सीखें और उन्हें सार्वजनिक भी करते रहें। या फिर मेरी तरह डिलीट करके आनंद लेते रहें।

    गाली दरअसल निराशा और हताशा की भाषा है और पराजित लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अगर गाली पर आप परेशान होने लगे तो संभव है कि निराशा आपके भीतर भी गहरा रही है। गालियां बताती हैं कि गोली देने वाले के माता-पिता, उसके घर का आंगन, उसके गांव या शहर की संस्कृति और संस्कार कैसे हैं। मां-बहन करने वाले ऐसे कायर लोगों की ज़मात हमें अपने इर्दगिर्द कितना मिलती है। ये किस दल में नहीं हैं? किसी विचारधारा में नहीं है? या फिर किस धर्म में नहीं हैं? या कि किस देश में नहीं हैं? अब सब लोग मारवाड़ से तो हैं नहीं कि बोलेंगे, ऐंकर शाब थारे हिर माथे म्हारे जूतो बिराजै, जे थे म्हारे मोदी शाब ने फेर कीं कैयो तो! लेकिन ऐसी गाली पर आपको भी क्या मज़ा आएगा!

    सोशल मीडिया ने एक बड़ा बदलाव किया है। हम अपनी हर बात सोशल मीडिया के माध्म से हर व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते हैं, लेकिन उसकी बात लेना नहीं चाहते। यह कैसे संभव है?

    हमारे सब बंद रोशनदान, खिड़कियां और दरवाज़े खुल गए हैं और गलियों का सारा कचरा घरों में उड़कर आ रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू तो कब से गालियां खा रहे हैं। क्या महात्मा गांधी को गालियां नहीं पड़ रही हैं? सोशल मीडिया का तब तो काेेई अस्तित्व ही न था। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक महिला नेताओं को क्या नहीं गरियाया जाता? क्या वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी या अन्य महिलाएं उससे बच जाती हैं? क्या अमर्त्य सेन को गालियां नहीं दी गईं?

    ऐसा कौन है, जिसे गाली नहीं दी जा रही है? आप मोदी की तारीफ़ कर दें, तत्काल आपको गालियां शुरू हो जाएंगी। जो व्यक्ति स्वयं गालियों से इतना परेशान हो रहा है, क्या वह स्वयं अपने प्रतिद्वंद्वी साथियों को गोदी मीडिया नहीं कहता? यह क्या है? क्या किसी हमपेशा पत्रकार को गोदी मीडिया कहना गाली नहीं है? आपको तो जो गालियां दे रहे हैं, वे सबके सब चवन्ने हैं, लेकिन आप तो चवन्ने नहीं, एक प्रतिष्ठित मीडिया के बहुत ही ज़हीन शहीन और ऐसे पत्रकार हैं, जो साहसिक पत्रकारिता के आयाम छूने की कोशिशें बहुत बार करते हैं, लेकिन नहीं कर पाते, क्योंकि आप आत्ममुग्धता का शिकार बन जाते हैं।

    प्रश्न है कि क्या वर्चुअल संसार की गालियों और धमकियों को वह दर्जा मिलना चाहिए, जो वास्तव में गालियां और धमकियां होती हैं? अाप एक बार इस देश के सुदूर इलाकों में जाइए और देखिए कि माफ़िया, एसपी, थानेदार, सरपंच, विधायक या किसी क्षेत्रीय क्षत्रप के ख़िलाफ़ लिखना और वहीं रहना कितना जोख़िम का काम है? ये लोग ट्रेक्टर या जीप के पीछे बांधकर घसीटते हैं और तब कोई नेशनल चैनल एक शब्द भी नहीं बोलता।

    जिन पत्रकारों को गालियां और धमकियां मिलती हैं, वे बख्तरबंद दफ्तरों से बख्तरबंद कारों और बख्तरबंद घरों में न तो रहते हैं और न चलते हैं। वे इस देश की सड़कों पर इस देश की गलियों में आम लोगों के बीच रहते हैं। वे मार खाते हैं। वे गोलियां खाते हैं। वे नौकरियों से निकाल दिए जाते हैं। उन पर कार, जीप या ट्रक चढ़ा दिए जाते हैं। लेकिन उनके लिए कहीं कोई ऐसा नहीं होता जो वर्चुअल गालियों और धमकियों को तो इतना गंभीरता से लें और असली धमकियों और गोलियों की चर्चा भी नहीं करें।

    पत्रकारिता न तो विरोध की राजनीतिक भाषा है और न ही धर्म सुधार आंदोलन का हिस्सा। यह निहायत ही अक़ीदत से किया जाने वाला काम है। वह स्वयं तो सारा दिन आलीशान बख़्तरबंद स्टूडियो से देश भर के अख़बारों में कथित छोटे और लोकल पत्रकारों की दसियों बार की गई खबरों को नए सिरे से लच्छेदार भाषा की पैकेजिंग में परोसकर अपने आपकी पगड़ी पर मोरपंख लगा लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि उनके अपने ही साथी उसी दिल्ली में लू के थपेड़े खाते हुए चिड़ियाघर के पिंजरों से बंद बंगलों में बैठे नेताओं की बाइट या न्यूज बटोरने के लिए लू और शीतलहर में किसी तपस्वी से एक पांव पर खड़े पत्रकारिता करते हैं आैर अपने धर्म को निभाते हैं। न कोई आत्ममुग्धता और न किसी की गाली और गोली से परवाह। और जो बख्तरबंद महल की पत्रकारिता करता है वह जय हिन्द!

    जैसे दिल्ली के वीवीआईपी बख्तरबंद नेता, वैसे ही दिल्ली के ये वीवीआईपी बख्तरबंद पत्रकार! नींव की ईंटों को कौन याद करता है, जब कंगूरों के शोर से देश में अनुगूंज पैदा करने की कोशिशें होने लगें।

    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

    अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

    Tribhuvan


    इस समय देश में तीन तरह के नागरिक हैं।

    एक वे जिन्हें जो कुछ कर्नाटक में हुआ, वह बहुत अच्छा लग रहा है। ये सबके सब या तो कांग्रेसी माइंडसेट के लोग हैं या फिर भाजपा के विरोधी लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचे लोग हैं।

    एक वे जिन्हें वह अच्छा लगा, जो बिहार, गोवा, मेघालय, जम्मू और कश्मीर में आदि में हुआ और उन्हें सिर्फ़ कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस का सरकार बनाना बुरा लगा, ये भाजपा और आरएसएस के लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये भी सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचा लोग हैं। इनका भी अपना कोई विवेक नहीं हैं आैर इनकी हालत हांकी जा रही भेड़ाें से कुछ अलग नहीं है, जैसा कि बिलकुल ऊपर की श्रेणी वाले लेागों के साथ है। इसमें आप दिल्ली की आम आदमी पार्टी, बहन मायावती की बसपा, वामपंथी दलों या अकाली मित्रों या अन्ना-वन्नाद्रमुक किसी को भी ले शामिल कर सकते हैं। कोई और भी दल संभव है। आरजेडी, जेडीयू, जेडीएस आदि आदि। कोई भी। सबके सब।

    इस समय देश को एक तीसरी तरह की श्रेणी के लाेगों की ज़रूरत है। जो ग़लत को ग़लत और अनैतिक को अनैतिक कह सकें। ये देश में न के बराबर लोग हैं। अगर हमें अपने देश और देश की व्यवस्था को अच्छा बनाना है तो इस श्रेणी में हमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ज़रूरत है। चमचे बनो तो देश के बनो। मानवता के बनो। इस धरती के बनो। राजनीतिक व्यवस्था में अनैतिकता, झूठ-फ़रेब और आपराधिक मानसिकता से वर्चस्व स्थापित करके सत्ता हासिल करने वाले लिप्सुओं के पीछे देश को बर्बाद करने के षडयंत्र में क्याें शामिल हो रहे हो?

    अगर राजस्थान में 51 साल पहले लोकतंत्र को प्रहसन बना देने वाली कांग्रेस आपके सामने है तो गोवा, बिहार, मेघालय और कर्नाटक में लोकतंत्र का चीरहरण करने वाली भाजपा भी आपके सामने है। क्या इनमें कोई फ़र्क है?

    अगर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें पांच साल पहले बढ़ना ग़लत था तो वह आज भी है। अगर किसानों की दुर्दशा के लिए दस साल पहले प्रश्न उठ रहे थे तो वे आज भी उठने चाहिए। अगर पंद्रह साल पहले नोटबंद करना देश के साथ खिलवाड़ करना था तो वह आज भी है। अगर आज से बीस साल पहले किसी आतंकवादी घटना पर हमें सरकार बिना रीढ़ और बिना हड़डी की एक कमज़ोर अनैतिक लगती थी तो वह आज भी है। आख़िर ऐसा क्या है कि हम नागरिकों की बुद्धि में कोई राजनीतिक दल या कोई विचारधारा ऐसा इंजेक्शन लगा देती है कि आपके या हमारे विवेक और राज्यपाल के विवेक में कोई फ़र्क नहीं रह जाता? और आप ऐसा आचरण करने लगते हैं, मानो आप किसी के खिलौने, किसी की कठपुतली या किसी मदारी के सिखाए हुए बंदर हों! क्या ऐसा होना चाहिए। ऐसे जितने भी मेरे मित्र या बंधु हैं, सबसके सब ज़हीन और जीनियस हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे किसी के अनचाने या अनचाहे ही दुष्टतापूर्ण कामों के प्रशंसक बन जाते हैं।

    आओ, मित्रो, हम सब देश के सजग नागरिक बनें, तटस्थ रहें और ग़लत को ग़लत कहें। अगर हम में यह साहस नहीं है और हम किसी एक के खेमे में हैं तो हम में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिस लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है। और हां, याद रखें कि भेड़ तो भेड़ है। उसे कुदरत ने बनाया ही वैसा है। लेकिन आपको तो प्रकृति ने एक बहुत बेहतरीन मस्तिष्क और एक अतुलनीय हृदय दिया हुआ है, जिसे अच्छे और बुरे की पूरी पहचान करने की क्षमता से आपूरित किया गया है। और फिर भी आप बहुत गर्व के साथ किसी खेमे की भेड़ बनना पसंद करते हैं तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

    और अगर आप शिक्षक, वकील, पत्रकार, लेखक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश आदि में से कुछ हैं तो यह और भी शर्मनाक है।

    क्षमा करें, मुझे यह कड़ी भाषा इस्तेमाल करने की इज़ाज़त अपनी भारत माता से मिली हुई है।

    Tribhuvan


    Credits: Tribhuvan’s Facebook

  • हत्या-बलात् का स्वर्ण युग  –Kumar Vikram

    हत्या-बलात् का स्वर्ण युग –Kumar Vikram

    Kumar Vikram

    ऐसा नहीं है कि उस स्वर्ण युग में
    पल प्रति पल सुबह-शाम दिन प्रति दिन
    हत्याएँ व बलात्कार ही होते रहते थे
    कई कई दिन यूँ ही बिना किसी घटना के भी निकल जाते थे  

    पर इस युग की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती
    कोर्ट कचहरी घरों में टीवी अख़बारों में
    सड़क शासन प्रशासन लेखकों कवियों
    आकाश पताल में
    अच्छी हत्या व ब्लात् कैसे हो

    इसपर निरंतर बहस
    तर्क वितर्क लेख प्रतिलेख
    का संगीत हमारे सामने बजता रहना था
    नैतिकता और वाक् पटुता के नए आयाम बनाती हुई
    बिलकुल एक नई संस्कृति 

    जिससे कोर्ट पूछता है
    ‘इस हत्या को कैसे अंजाम दिया जाएगा?’
    और पूरी गंभीरता से उत्तर दिया जाता था

    ‘हमारे पास कई उपाय हैं
    ट्रक से कुचल कर या फिर गोलियाँ बरसाकर
    या फिर चाय में ज़हर देकर
    बस कुछ मोहलत मिल जाए
    बलात् के हमारे अपने मोडुल्य हैं
    पड़ोसियों के घरों से खींचकर लाई जाएँगी
    सात आठ नौ दस जितनी की भी ज़रूरत हो
    बस कुछ मोहलत मिल जाए’

    और सब को हत्या और बलात् के
    मुकर्रर दिन का रहता है इंतज़ार  
    पर ऐसा कुछ होता नहीं है
    बल्कि ऐसा ही आभास होता है 

    क्योंकि हत्या-बलात् के उस स्वर्ण युग की
    सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी
    कि सब अच्छी हत्या-बलात् कैसे हो
    इसपर ही चिंतन-मनन हो

    Kumar Vikram

  • सेलेब्रिटी एक्टिविज़्म : फेमिनिज़्म का सेफ्टी वाल्व –Apoorva Pratap Singh

    Apoorva Pratap Singh

    एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर से पूछा गया कि कास्टिंग काउच होता है या नहीं ? वो ढीठ की तरह मुस्कुराते हुए बात को घुमाती रही पर उत्तर नहीं दिया पूछने वाले ने कहा कि सिर्फ यस या नो में उत्तर दे दीजिए पर स्वरा भास्कर जो लम्बी चिट्ठी पत्री या सो कॉल्ड एक्टिविज़्म आउट्रेज करने का समय निकाल लेती हैं उनसे हां या ना, वो भी न हुआ बोलीं कि मेरी फिल्म के बारे में बात कीजिये !!! भंसाली को चिट्ठी लिखना जल में रह कर मगर से बैर नहीं होता लेकिन कास्टिंग काउच पर कुछ कहना यकीनन उनके इंडस्ट्री में निजी हितों को प्रभावित करता !!

    स्वरा हिपोक्रेट हैं यह पिछले दो साल से सबको पता है इस तथ्य से जिसको दिक्कत हो उस पर सिर्फ तरस खा सकते हैं । 

    ट्रेलर में एक जगह सोनम बॉयफ्रेंड से कह रही है कि “जाके अपनी माँ से ही शादी कर ले, मदर लवर” !!! ये साफ़ साफ़ गालियों का यूफेमिज़्म हैं !! माँ से शादी करने का अर्थ क्या होता है ? 
    करीना कपूर एक जगह ‘मिस पुरी’ से मिसेज़ मल्होत्रा बनने को ले कर घबराई हुईं है जो कि खुद ही करीना कपूर ‘खान’ बनी बैठी हैं ! इवन इन लोगों की इंटर रिलिजियस शादियों में भी बच्चे का नाम पति के धर्म से ही होता है जैसे कि ‘तैमूर’ या खुद ‘सैफ’ ही !!

    स्वरा जो 3 महीने पहले योनि मात्र महसूस कर रही थीं अब चूत शब्द गाली की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं !! कंगना जो रजत शर्मा के शो में सलमान की बजरंगी भाईजान ठुकराने के दावे ठोंक रहीं, उन्होंने सलमान की ही ‘रेडी’ में दो मिनट का ही रोल किया था !!

    कंगना ने जब अपनी निजी खुन्नस निकाली थी जिसे यहां लोग क्रांतिकारी और फेमिनिज़्म बता रहे थे तब मैंने अपना पॉइंट उनके एंटी रखा तब कहीं किसी ने मुझे या मेरी जैसी लड़कियों (जो प्रो कंगना नहीं थी) को कहा कि यह औरतें मर्दवादी हैं, आदमियों की जी हुजूरी करती हैं, शातिर हैं वगैरह !!

    तो मुझे यह कहना है कि आप लोग इतनी ढिठाई लाते कहां से हैं और आपको किसी को भी झंडाबरदार बनाने की इतनी जल्दी क्यों है ?? आपको आपके पॉइंट या जिसे आप फेमिनिज़्म कहते हैं उस पर/का किसी स्वरा या कंगना को ठप्पा लगवाने की ज़रूरत ही क्या है ? आप को इतना इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स क्यों है ? आप को अपने में आत्म विश्वास क्यों नहीं है ? आप के पास खुद का कोई एंगल क्यों नहीं होता ? आप गुटों में ‘सोचना’ इतना क्यों भाता है ?

    समझती हूं कि पोस्ट लिखना ख़ब्त है आपकी और कोई भी सतही मुद्दा जिस पर पोस्ट लिख कर कुछ ऑर्गेज़्म टाइप का मज़ा आ जाता है उस पे आप लिख देते हैं पर इतनी भड़भड़ाहट क्यों हैं तमगे देने की !!! 

    शेहला राशिद मत बनिये, वो लिवइन पर du में रैली निकालते हैं जैसे कि यही औरतों की सबसे बड़ी दिक्कत है, इस पर काम हो गया तो औरतें पिटना बन्द हो जाएंगी, उनकी वेजेज़ बराबर हो जाएंगी, वो साक्षर हो जाएंगी वगैरह !!
    इस तरह की रैलियां और यह सेलेब्रिटी टाइप एक्टिविस्ट केवल सेफ्टी वाल्व होते हैं जो असल मुद्दे तक पहुंचने नहीं देते न ही इनके लिए इनका कोई मोल है !! पर यहां फेसबुकिये किरान्तिकारियों की आरती उतारनी चाहिए !!

    मैं शायद आपसे भी बड़ी मूर्ख हूं क्या पता आपसे भी बड़ी शातिर हूं !! मैं जो भी हूं लेकिन काम की बात यह है कि आप एक नम्बर के मूर्ख हैं या शातिर !!

    मुझे स्वरा और कंगनाओं से कोई मतलब नहीं हैं ! लेकिन यहां के जो मसखरे हैं, (स्वरा की भाषा में कहें तो चूतियों से कह सकती हूं लेकिन अभी नहीं कहूँगी)उनसे दो बातें कभी कभी ज़रूरी हो जाती हैं और मैं इन की अपने जैसे लोगों पर लगाये आरोपों को बिलकुल पर्सनली लेती हूं !! आप लोगों को डिमोटिवेट करना इसलिए जरूरी समझती हूं क्योंकि अगर नहीं किया तो आपसे अलग राय रखने वालों का तो आप जनाज़ा निकाल देंगे !

    Apoorva Pratap Singh


    Apoorva Pratap Singh

  • भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है.

    कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है.

    इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो.

    उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है. भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है.

    इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है.

    भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी.

    इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है. आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं.

    अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है.

    इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है.

    उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है.

    बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है.

    बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये.

    इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं.

    वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.
    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?
    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है.

    हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं.

    ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती.

    आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है.

    इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं.

    युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है. अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है.

    इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है. इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें.

    ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं. आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं.

    ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं. अगर धोती कुर्ता या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक न होगा.

    लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

    Sanjay Shramanjothe

  • झूठ झूठ झूठ –Ramesh Chand Sharma

    झूठ झूठ झूठ –Ramesh Chand Sharma

    Ramesh Chand Sharma

    झूठ झूठ झूठ,
    झूठ पर फिर झूठ, 
    कितनी झूठ, कैसी झूठ, 
    रंग बदलती मेरी झूठ,
    जितनी चाहो उतनी झूठ, 
    झूठ पर नहीं दूंगा छूट,
    बनी झूठ, बनाई झूठ, 
    झूठी झूठ सच्ची झूठ, 
    लौटके वापिस आई झूठ,
    मुफ्त में दे रहा झूठ,
    जितनी लूटे, लूट ले झूठ,
    झूठ ले लो झूठ, 
    बेच रहा मैं खुली झूठ,
    कच्ची झूठ पक्की झूठ,
    ये है पकी पकाई झूठ, 
    बासी झूठ ताजी झूठ, 
    तली तलाई सूखी झूठ, 
    खट्टी मिठी चरपरी झूठ,
    जूते चप्पल खाई झूठ, 
    मेरी अपनी बनाई झूठ, 
    तोड मरोड बनाई झूठ,
    गाली डण्डे खाई झूठ, 
    फिर भी समझ नहीं आई झूठ, 
    अभी नई बना दूं झूठ,
    खरी खोटी छोटी झूठ, 
    पतली मोटी लम्बी झूठ, 
    जैसी चाहो वैसी झूठ, 
    नई और बना दूं झूठ,
    समझी समझाई यह है झूठ, 
    तेरे समझ न आई झूठ,
    तू रहेगा हरदम ठूंठ, 
    ले लो झूठ ले लो झूठ,
    यह नफरत फैलाती झूठ,
    बडे बडे को धूल चटाती झूठ,
    छोटे को बडा बनाती झूठ,
    नामर्द को मर्द बनाती झूठ,
    यह वोट दिलाती झूठ,
    किसी को नेता बनाती झूठ,
    नोटों को कागज बनाती झूठ,
    अपने को दूर हटाती झूठ, 
    भ्रष्टाचारी को गले लगाती झूठ,
    गुण्डों को पास बुलाती झूठ,
    स्वार्थी को गले लगाती झूठ,
    पैट्रोल के दाम बढाती झूठ,
    मंहगाई गले लगाती झूठ, 
    मंहगे को सस्ता बताती झूठ,
    खूब विदेश घुमाती झूठ,
    लूटेरों को विदेश भगाती झूठ,
    बडे बडे भवन बनाती झूठ,
    लोगों का खून पी जाती झूठ,
    कभी नहीं शरमाती झूठ,
    झूठों को गले लगाती झूठ,
    सत्ता के लिए सबसे हाथ मिलाती झूठ,
    सबको मूर्ख बनाती झूठ,
    कहीं नजर नहीं आती झूठ,
    सब जगह पहुंच जाती झूठ,
    अपने को धर्म बताती झूठ,
    कहीं धर्म स्थल गिराती झूठ,
    कहीं धर्म स्थल बनवाएगी झूठ,
    यहां झूठ, वहां झूठ,
    सब जगह पहुंच जाना चाहती झूठ,
    दंगा फसाद फैलाती झूठ,
    उन्मादी लोग बनाती झूठ,
    लोगों के गले कटाती झूठ,
    रोजगार विहीन बनाती झूठ,
    सच को झूठ बनाती झूठ,
    कभी संसद में भी घुस जाती झूठ,
    अपने को पाक साफ बताती झूठ,
    विपक्ष से घबराती झूठ,
    जोर जोर से चिल्लाती झूठ,
    कभी घडियाली आंसू बहाती झूठ,
    आश्वासन खूब देती झूठ,
    कुर्सी के चिपकी है झूठ,
    अपने को गरीब बताती झूठ,
    लाखों का सूट पहनती झूठ,
    पल पल रंग बदलती झूठ,
    मंहगे कपडे सिलाती झूठ,
    अपना पीछा कब छोडेंगी झूठ,
    संगठित होकर तेजी से रूठ,
    तभी पीछा छोडेंगी झूठ।

    Ramesh Chand Sharma

  • अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    अगले माह वह अपना अस्सी वा जन्मदिवस मना रहे होते लेकिन प्रकति के नियमो के आगे हम सभी मजबूर है. बाबा साहेब आंबेडकर के विचारो को समर्पित और बौध साहित्य के विद्वान डॉ धर्म कीर्ति का कल रात को नयी दिल्ली के एक अस्पताल में  देहांत हो गया. वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. उनकी प्रमुख पुस्तकों में कुछ इस प्रकार से हैं: महान बौद्ध दार्शनिक, बुद्ध का समाज शास्त्र, बुद्ध का निति शास्त्र, बुद्ध कालीन वर्णव्यवस्था और जाति, महान मनोचिकिस्तक बुद्ध, जाति विध्वंसक भगवान बुद्ध, मै नास्तिक क्यों, बौध धर्म हिन्दू धर्म की शाखा नहीं, गाँधी और गांधीवाद की दार्शनिक समीक्षा, मानवाधिकारों के पुरौधा डॉ बी आर आंबेडकर, महान बुद्धिवादी दार्शनिक डॉ अम्बेडकर आदि. विभिन्न बौध विद्वानों और दार्शनिको पर तो उन्होंने तमाम पुस्तके लिखी. बाबा साहेब के शिक्षा और वैचारिक क्रांति को उन्होंने अपने जीवन में जैसे उतार ही दिया था इसलिए तमाम बौध साहित्य न केवल पढ़ डाला अपितु उसमे महारत भी हासिल की.

    आगरा की ऐतिहासिक धरती में पैदा हुए डॉ धर्मकीर्ति के परिवार के लोग आर्य समाज से प्रभावित थे और बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बौध धर्म में आने की कॉल को सबसे पहले स्वीकारने वाले लोगो में थे. १९५६ में जब बाबा साहेब आंबेडकर आगरा के प्रसिद्ध रामलीला मैदान में आये तो उन्होंने लोगो को बुद्ध धर्म ग्रहण करने की बात कही थे. उसी समय बाबा साहेब आंबेडकर ने डॉ धर्मकीर्ति के घर के पास एक बुद्ध विहार का उद्घाटन भी किया. उस समय तक गाँव में एक शिव मंदिर था लेकिन आर्य समाज का असर होने से बहुत से गाँव-वासी वैसे भी मूर्ति पूजा नहीं करते थे इसलिए जब बाबा साहेब ने बौध धम्म दीक्षा की बात कही तो लोग तैयार हो गए लेकिन कुछ एक लोग इसके विरोध में थे लेकिन अंत में गाँव में लोगो ने शिव मंदिर को हटा बुद्ध विहार की स्थापना की ताकि बाबा साहेब के आह्वाहान का सही अर्थो में स्वागत हो सके.

    डॉ धर्म कीर्ति ने बाबा साहेब की ऐतहासिक रैली में भाग लिया और उनके जीवन में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के विचारो का अत्यधिक प्रभाव पड़ा. पिछले वर्ष दिसंबर में मैंने उनका एक बेहद बड़ा साक्षात्कार लिया तो उन्होंने अपने जीवन के अनछुए पहलुओ के बारे में विस्तार से जानकारी दी.वह बताते है के जब बाबा साहेब ने प्रबुद्ध भारत की बात कही तो ये केवल दलितों के लिए ही नहीं थी वह चाहते थे के सवर्ण हिन्दू से भी कह रहे थे के यदि वे मानवता की सेवा और कल्याण चाहते है तो बुद्ध धम्म में आकर अपने में बदलाव लाये. बुध विहार में जहा पूरे मार्ग में बाबा साहेब के स्वागत में गुलाब के पंखुड़िया बिछी हुई थी, बाबा साहेब ने कहा के हिन्दुओ की तरह बुद्ध की पूजा मत करो. धम्म में मार्ग में मत आओ यदि आप बुद्ध को ढंग से समझे नहीं हो .यदि आप बुद्ध के मार्ग पर नहीं चल सकते तो विश्व्-व्यापी परिवर्तन नहीं ला पाओगे.

    आगरा के इसी रामलीला मैदान में बाबा साहेब की आँखों में आंसू छलके थे जब उन्होंने कहा था समाज के  पढ़े लिखे लोगो ने उनकी उम्मीद के अनुसार काम नहीं किया. डॉ धर्मकीर्ति बताते है के हां ये बात सही है के बाबा साहेब ने ये बात कही के मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगो ने मुझे धोखा दिया क्योंकि वे सत्ता के साथ समझौता करते थे और सफल होने के बाद समाज से नहीं जुड़े. सफलता के बाद व्यक्ति हमारे संघर्षो को नहीं पहचानता इसलिए आत्मगौरव कभी भी अहंकार में बदल सकता है. बाबा साहेब आत्मसम्मान चाहते थे लेकिन उसके अहंकार में बदल जाने के खतरे के बारे में लोगो को हमेशा आगाह करते रहते थे.

    वे कहते है: ‘मै शिक्षा विभाग में एडिशनल डायरेक्टर पद से रिटायर हुआ. मेरा बेटा एक बड़ा एक आर्टिस्ट है. मेरी बेटी ने शोध किया और वो एक सम्मानित पद पर है. यदि मै गाँव में होता तो केवल खेती कर रहा होता. आज मै जो कुछ हूँ बाबा साहेब के कारण हूँ. लेकिन इसी हकीकत को स्वीकार करने में लोग हिचकते है’.

    Dr Dharmkirti

    ‘मैंने तीन विषयो में पी एच डी की, एक विषय में डी लिट् किया और एक में डी लिट् फिर से कर रहा हूँ, कोई विश्विद्यालयो और शोध संस्थानों में में लेक्चर दिए है. करीब ९० से अधिक पुस्तके लिखी है. क्योंकि मेरे मन में ये बात घर कर गयी के मुझे बाबा साहेब के मार्ग पर चलना है, ज्ञान का मार्ग. इसलिए मै हमेशा ऐसी कोशिश करता रहा’.

    जब मैंने उनसे पूछा के तीन पी एच डी करने के पीछे क्या कारण था तो उन्होंने इससे सम्बंधित मज़ेदार वाकिया बताया . वह कहते है : “ मैंने आगरा विश्वविद्यालय से अपनी पहली पी एच डी की थी. एक दिन मै दिल्ली विश्विद्यालय के बुद्धिस्ट डिपार्टमेंट में बैठा था. एक मित्र ने पूछा तो मैंने बताया के मैंने आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की है तो उन्होंने मजाक में मेरी बात को लिया और कहा के अगर असल पी एच डी करनी है तो यहाँ से करके दिखाओ. अब उन दिनों दिल्ली में पी एच डी करने के लिए पहले एम् फिल करनी होती थी जो मैंने नहीं की थी इसलिए मैंने एम् फिल का फार्म भरा और उसे पूरा किया. अगले वर्ष मैंने पी एच डी के लिए एनरोल किया और उसे एक वर्ष के अन्दर ही करके दे दिया. थीसिस लिखना मेरे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी इसलिए आसानी से लिख दी. कुछ वर्षो बाद किसी सज्जन ने मुझे ताना मारा के मेरा विषय तो दर्शन है लेकिन उसमे कोई शोध नहीं है तो मैंने मेरठ विश्विद्यालय से उसे भी कर लिया.

    1963  से डॉ धर्म कीर्ति ने आगरा के प्रसिद्ध बलवंत सिंह राजपूत कालेज में दर्शन शास्त्र विभाग में पढ़ाना शुरू किया जो के उस दौर में बहुत बड़ी बात थी. मैंने उनसे पुछा के क्या कभी उन्हें कालेज में जातिवाद नजर आया तो उन्होंने बताया के नहीं. हाँ एक घटना का जिक्र करके उन्होंने बताया के ‘कालेज के ऑफिस के सामने पानी पीने का एक घड़ा रखा रहता था जिससे सभी अध्यापक लोग पानी पीते थे लेकिन कालेज के क्लर्क ने मुझे वहा पानी पीने से साफ़ मना कर दिया. मैंने इसकी शिकायत वह के प्रचानाचार्य डाक्टर आर के सिंह से की जिन्होंने उस क्लर्क को बहुत बुरी तरह से झाड लगाईं के उसके बाद से वह प्रश्न ही ख़त्म हो गया’.

    प्रारंभिक दौर के अम्बेडकरवादी विचारो से परिपक्व और कार्य प्रणाली में व्यवहारिक थे. वे किसी भी किस्म के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं थे. मैंने भगवान् दास जी, एल आर बाली आदि के साक्षत्कार भी किये और सभी से पता चला के उनका झुकाव बे सभी शुरूआती दौर में आर्य समाजी थे और अपने अन्दर प्रगतिशील विचारो के लिए बहुत हद तक आर्य समाज को भी जिम्मेवार बताते है. उसके अलावा सभी अपना झुकाव वामपंथ की और मानते थे हालाँकि सभी ने भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों में जातिगत भेदभाव के विषय में व्यापक तौर पर लिखा और उसकी आलोचना भी की.

    आगरा में राहुल संकृत्यायन जी का भी आना जाना लगा रहता था. डॉ धर्म कीर्ति जी बताते हैं के उनके राहुल जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे. वो कहते है राहुल जी ने एक बार कहा के जिसे मूर्ख बनना हो तो संस्कृत पढ़ सकता है. मैंने तो वो उम्र पार कर ली जब लोगो को मुर्ख बनाया जा सकता है. उनका कहना था का लिपि का कोई मूल्य नहीं होता. मुख्य महत्त्व तो उसमे मौजूद विचारों का है. सारे वेद , उपनिषद, पुराण, स्मृतिया संस्कृत में हैं इसलिए कोई मनुष्य इन्हें पढ़ेगा तो विचारों को पढने के लिए ही जाएगा लिपि नहीं और जो इन्हें पढ़ेगा वो तो पागल हो जाएगा.”

    राहुल जी के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए वह कहते हैं : राहुल जी आगरा में किसी ऋषिकेश चतुर्वेदी के घर पे आया जाया करते थे और वहीँ से वह हमारे बुद्ध विहार में आते थे. एक दिन ऋषिकेश जी ने उनसे पूछ लिया के कहा जा रहे हो तो उन्होंने बताया के मैं बुद्ध विहार जा रहा हूँ तो चतुर्वेदी जी ने शायद कोई जातिसूचक टिपण्णी कर दी . राहुल जी से रहा नहीं गया बोले ‘ पांच हज़ार साल से तुम उनको मारते आये हो, अपमानित किये हो तो कुछ नहीं और आज यदि वो तुमको गाली भी दे दे, या तुम्हारी गर्दन भी काट दे तो भी ये बहुत कम होगा. उसके बाद वह हमेशा ही हमारे बुद्ध विहार में ही ठहरे’.

    डाक्टर धर्म कीर्ति ने मुझे भदंत आनंद कौत्यल्यायन के साथ भी अपने संस्मरण सुनाये. ऐसा लगता था के वह अम्बेडकरी आन्दोलन के महतवपूर्ण इतिहास को अपने में समेंटे हुए थे इसलिए मेरे लिए यह जरुरी था के सबको दस्तावेजीकरण कर सकू.

    डॉ धर्मकीर्ति को बौध दार्शिनिक धर्मकीर्ति ने बहुत प्रभावित किया और इसी कारण उन्होंने अपना नाम धर्म कीर्ति रखा. दरअसल उनके बचपन का नाम कालीचरण था. इस विषय में चर्चा करते हुए वह बताते हैं :

    “मेरा नाम कालीचरण था. मेरे पिता जी आर्य समाजी थे. पंडित काली चरण शास्त्री नामक एक आर्य समाजी विद्वान थे जो संस्कृत, फ़ारसी और अरबी के विद्वान थे. मेरे पिता भी मुझे उन जैसा बनाना चाहते थे इसलिए मेरा नाम कालीचरण रख दिया. जब मैंने एम् ए और पी एच डी कर ली तो बी पी मौर्या ने मुझे सलाह दी के मैं अपना नाम बदल दूं. वो कहते थे के तुमने तो १९५६ में ही बुद्धिस्ट हो गए लेकिन नाम अभी भी वही चल रहा है इसलिए तुम्हे इसे बदलना चाहिए. मुझे भी ये नाम पसंद नहीं था. सवाल यह था का नया नाम क्या हो ? धर्म कीर्ति छटवी शताब्दी में नालंदा में एक बौध दार्शनिक थे. वह मूलतः केरला के रहने वाले ब्राह्मण थे जिन्होंने बुद्ध धर्म में आकर अपना नाम धर्मकीर्ति रखा. मैंने भी उनसे प्रभवित होकर अपना नाम आधिकारिक तौर पर १९९६ में धर्म कीर्ति रख दिया.”

    मैंने पूछा आचार्य धर्मकीर्ति ने उनको कैसे प्रभावित किया तो डॉ धर्म कीर्ति उनका एक प्रमुख बात बताते है: यदि कोई वेदों को प्रमाण मानता है, और फिर उनके आधार पर ये मानता है के ईश्वर ने पृथ्वी की रचना की है, स्नान करके धर्म की पूर्ती होती है, कोई जातिवाद को मानते हुए छुआछूत करता है के ये ईश्वर की देन है, और पाप को नष्ट करने के लिए शरीर को कोई कष्ट देता है, तो इन लोगो की प्रज्ञा नष्ट हो गयी है. ये पांच चिन्ह मूर्खो की पहचान है.

    डॉ धर्मकीर्ति का बौध धर्म और दर्शन पर गहन अध्ययन था. उनके विचारों पर राहुल संकृत्यायन और भदंत आनंद कौत्स्य्लायान का भी असर दिखाई देता है. वह मानते थे के बौध धर्म को भी ब्राह्मणों ने घेर लिया और ऐसी बातो को इसमें डालने की कोशिश की जो बुद्ध ने कभी कही ही नहीं.

    मजेदार बात यह के डॉ धर्म कीर्ति ने भूदान आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी की. मैंने उनसे पुछा आखिर विनोबा के अध्यात्म को उन्होंने कैसे स्वीकार कर लिया जब वह अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़े हुए हैं तो उनका जवाब साफ़ था. वह बोले के मैं विनोबा के साथ उनके अध्यात्म के कारण नहीं अपितु भूदान आन्दोलन के कारण जुडा. मुझे लगा के हमारे लोगो को जमीन की जरुरत है और ऐसे में यदि कोई व्यक्ति आन्दोलन कर रहा हो जिससे हमारे समाज को लाभ होता हो तो क्या बुराई है. और इस आन्दोलन के चलते उन्होंने बहुत से लोगो को भूमि आवंटन करवाने में सहयोग किया.

    डॉ धर्मकीर्ति ने जीवन पर्यंत अपने सिद्धांतो से समझौता नहीं किया. वह बी पी मौर्या के बहुत करीब थे लेकिन जब मौर्या ने भाजपा का दामन थामा तो उन्होंने साथ देने से इनकार कर दिया. भाजपा के लोगो ने उन्हें अपने पास बुलाने के बहुत प्रयास किये. वह कहते है के दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री श्री साहेब सिंह वर्मा ने उन्हें अपने यहाँ चाय पर बुलाया और उन्हें भाजपा में शामिल होने के दावत दी और राज्य सभा की सद्स्त्यता, या किसी कमीशन का पदभार या किसी राज्य का राज्यपाल आदि का प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया.

    Dr Dharmkirti and Vidya Bhushan Rawat

    डाक्टर धर्मकीर्ति के पास विचारों और अनुभव का खजाना था. उनके जाने से अम्बेडकरी मिशन को बहुत अधिक हानि हुई है क्योंकि इस उम्र में भी उनमे मैंने पूरी ऊर्जा पाई. वह लगातार अध्ययन कर रहे थे और लिख भी रहे थे , इसलिए अचानक से उनका चले  जाना बहुत दुखदायी है. ऐसे समय में जब देश में दलितों के उपर हमले हैं और मनुवादी ताकते भिन्न भिन्न तरीको से सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और दलितों और अन्य प्रगतिशील मानववादी ताकतों पर हमला कर रही है, डॉ धर्मकीर्ति के ओजस्वी बाते उनको ताकत और उर्जा प्रदान करती. मुझे ख़ुशी है के मैं उनसे मिल पाया और लम्बी बात हो सकी.

    Vidya Bhushan Rawat