Sanjay Jothe
गौतम बुद्ध की परम्परा, उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत गहराई से चाल चली गयी थी. पिछली सदी में डॉ. अंबेडकर सहित आज के इंडोलोजिस्ट्स भी यह बात सिद्ध कर चुके हैं कि एक धीमा और बहुत बारीक षड्यंत्र ब्राह्मणों के द्वारा फैलाया गया. श्रमण बौद्ध परम्परा जो कि इस शरीर और मन सहित इन दोनों के सम्मिलित परिणाम – व्यक्तित्व को अस्थाई मानती थी उस परम्परा में ऐसी मिलावट की गयी जो बाद में सनातन आत्मा को सही सिद्ध करने लगी.
गौतम बुद्ध सनातन आत्मा के सिद्धांत को नकारते हैं. सनातन आत्मा असल में वेदान्त और ब्राह्मणवाद का केन्द्रीय सिद्धांत है. इसी से पुनर्जन्म और विस्तारित कर्म का सिद्धांत निकलता है. यह सिद्धांत यह बताता है कि कोई आदमी मरकर एक से दुसरे जन्म में अपने मन, व्यक्तित्व, प्रवृत्तियों इत्यादि को लेकर जाता है और दुसरे शरीर या जन्म में फिर से अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है.
इसके विपरीत गौतम बुद्ध सिखाते हैं कि ऐसी कोई आत्मा नहीं होती जो एक से दुसरे जन्म में अपने पूरे व्यक्तित्व और संस्कारों को लेकर जाती हो. बुद्ध तो यहाँ तक कहते हैं कि अभी इसी जिन्दगी में आप अपने शरीर और व्यक्तित्व को कई बार बदलते हैं वह शरीर और वह स्व पल पल बदलता है.
यही बुद्ध का केन्द्रीय सिद्धांत – अनित्यता है. इस अनित्यता के सिद्धांत के अनुसार पूरी प्रकृति कम्पायमान है. भौतिक पदार्थ, चार महाभूत (धरती, जल,वायु, अग्नि) सब निरंतर कम्पायमान हैं और शरीर और मन भी निरंतर बदलता रहता है. ऐसे में हमारे सामने नजर आ रहे किसी एक व्यक्ति का कोई ठोस व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती. वह व्यक्ति कोई नयी भाषा नया व्यवहार सीखकर अपने आपको पूरी तरह बदल सकता है. अभी वह व्यक्ति सामान्य बातचीत कर रहा है और दो मिनट में वह क्रोधी और हत्यारा बन सकता है. उसका शरीर भी रोज किये जा रहे भोजन से निरंतर बदल रहा है.
ऐसे में बदलते शरीर और बदलते मन के परिणाम में जन्मा यह स्व या यह आत्म या यह व्यक्तित्व सनातन कैसे हो सकता है?
वेदान्त इसके विपरीत जाते हुए कहता है कि आत्मा सनातन होती है. जो कुछ पिछले जन्म में किया गया वह उस आत्मा के साथ पूरी तरह जुड़ जाता है इसीलिये पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम भुगतना होता है. इसीलिये आज जो गरीब बीमार और शोषित है उसे अपने कर्म ठीक करने चाहिए. उसने किसी पिछले जन्म में कोई पाप कर्म किया होगा इसलिए वह गरीब और दुखी है. वेदांती यह भी बताते हैं कि पूर्व जन्मों की अनंत श्रंखला में किये गए महापाप के कारण ही कोई व्यक्ति शूद्र या चांडाल बनता है और पूर्व जन्मों के दान पुण्य वृत तप इत्यादि के कारण ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण बनता है.
यह सिद्धांत भारत में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता आया है. ऐसे सिद्धान्तकारों से पूछना चाहिए कि पिछले जन्म में पुण्यकर्म करने वाले लोग ही अगर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य बनते रहे हैं तो उनके सैकड़ों जन्मों में किये गये दान, तप और पुण्य के बावजूद इस वर्तमान जन्म में आकर वे छुआछूत,घृणा, शोषण और दमन क्यों करने लगते हैं? उनकी अपनी सनातन आत्मा के पूर्व जन्म के सभी अच्छे संस्कार इस जन्म में अचानक निरस्त क्यों हो जा रहे हैं? उनका दान पुण्य उनका सदाचरण अचानक इस जन्म में घृणा और जातीय हत्याओं और बलात्कारों में क्यों बदल जा रहा है?
ऐसे सवालों के जवाब आज तक कोई वेदांती बाबा नहीं दे पाया है.
दुर्भाग्य से ऐसे वेदांती बाबा बहुत पुराने समय से ही दलितों बहुजनों और आदिवासी समाज में भी घुसकर सनातन आत्मा का सिद्धांत सिखाते रहे हैं. पहले वे अनपढ़ लोगों को कर्मकांड व्रत उपवास मान मनौती सिखाते हैं. और इन्ही में से शिक्षित हो रहे और जागरूक हो रहे लोगों को वे ध्यान समाधि साधना के जाल में फसाते आये हैं. दलित बहुजन और आदिवासी समाज के शिक्षित सम्पन्न वर्ग को अध्यात्म और ध्यान समाधी के नाम पर फिर से वाही सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखाया जा रहा है. यह बहुत पुरानी चाल है. यह आज फिर से सफल होती नजर आ रही है.
अभी हमारे समय में भी कई बाबा और आचार्य सक्रीय हैं. आजकल कुछ लोग विपस्सना के नाम पर फिर से सनातन आत्मा का वेदांती सिद्धांत दलितों बहुजनों को सिखा रहे हैं. कई किस्म के सद्गुरु और बाबा दलितों बहुजनों के शिक्षित युवाओं को ध्यान समाधि सिखाने के लिए बुला रहे हैं और आजकल बुद्ध के नाम का और विपस्सना के नाम का भी भारी उपयोग कर रहे हैं. ऐसे विपस्सना सिखाने वाले गुरु असल में बुद्ध और डॉ अंबेडकर ज्योतिबा फूले के आन्दोलन को बहुत गहराई से कमजोर कर रहे हैं.
आजकल के ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव सहित कुछ विपस्सना गुरु और उनके हजारों विपस्सी साधक दावा कर रहे हैं कि बुध्द पूर्व जन्म के ब्राह्मण थे। वे कह रहे हैं कि सिर्फ बुध्द ही नहीं बल्कि डॉ. अंबेडकर और आप, मैं भी कई जन्मों में ब्राह्मण रह चुके हैं। इस पूरी चर्चा में जो केंद्रीय प्रश्न उभरता है वो ये कि जब बुध्द और डॉ अंबेडकर सहित ज्योतिबा फूले और पेरियार आदि ने स्व के अस्तित्व और स्व के पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकार दिया है तो ये विपस्सी लोग किसके समर्थन में खड़े हैं? क्या ये बुध्द, डॉ आंबेडकर और फूले के समर्थक हैं? क्या ये उनके मिशन के सहयोगी हैं?
आज तक एक भी विपस्सी साधक ने अभी तक यह व्याख्या नही की है कि जब आत्म या स्व है ही नहीं तो उसका पुनर्जन्म कैसे होता है? इधर उधर की बात करके समय बर्बाद करते हैं। ये विशुध्द ब्राह्मणवादी तकनीक है जो बुद्ध और अंबेडकर के आंदोलन को कमजोर करने के लिए बुनी गयी है।
डॉ आंबेडकर के अपने आंदोलन में उनके अपने लोगों के बीच वेदांती और ब्राह्मणवादी गुरुओ की शिक्षा का असर नजर आने लगा है। ये लोग बुध्द के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं और डॉ आंबेडकर की स्थापनाओं का विरोध कर रहे हैं। आप लोग अपनी आंखों के सामने देख सकते हैं कि किस तरह दलित बहुजन समाज के भीतर के अंधविश्वास लोग अपने ही हाथों से अंबेडकरी आंदोलन को बर्बाद कर रहै है।
आज बाबा साहेब अंबेडकर और भगवान बुद्ध के आन्दोलन को इन्हें “अंदरूनी” दुश्मनों से खतरा है जो विपस्सना के नाम पर सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखा रहे हैं. और सबसे बड़ी दुःख की बात ये है कि इस षड्यंत्र की कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही है.


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