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  • युध्द, राष्ट्र और राजा

    युध्द, राष्ट्र और राजा

    Bhanwar Meghwanshi

    एक दौर की बात है,
    एक देश था,एक राजा था
    चुना हुआ प्रतिनिधि
    पर उसे राजा होने का
    गुमान था।

    देश के लिए,देश के नाम पर
    उसने सब कुछ किया।
    कुर्बानियां दी,बलिदान किये
    शहादतें करवाई।
    वैसे ही,जैसे हर राजा करवाता है ।

    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ

    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार 
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां 
    होते रहे विस्फोट
    मरते रहे सैनिक
    बहता रहा लहू 
    चीखते रहे चैनल्स

    प्रजा 
    मनाती रही शोक
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प

    राजा 
    करता रहा राज 
    इसके अलावा वह 
    कर भी क्या सकता था बेचारा ?

    शहादत का ज्वार 
    उठता रहा,गिरता रहा
    कूटनीति का वार
    चलता रहा,छलता रहा।

    देशभक्त जनता
    सड़कों पर आ गई
    आक्रोश कर गया हद पार 
    युद्ध करो,युद्ध करो
    के नारे गूंजने लगे।

    जब युद्ध का उन्माद 
    फैल गया पूरे राष्ट्र में 
    तब राजा ने
    दुखी राष्ट्र को संबोधित किया
    आक्रोशित राष्ट्र के नाम सन्देश दिया

    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा गया चुनाव
    और राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में 
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया 
    और राष्ट्र ही राजा 
    इस तरह अवतरित हुआ
    ” राष्ट्र राज्य .”

    उसके बाद 
    फिर वहां 
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध

    Bhanwar Meghwanshi

  • हमारी दुनिया — Anand Kumar

    हमारी दुनिया — Anand Kumar

    ​Anand Kumar

    ​ये कविता एक प्रयास है असमानता के दुनिया भर के कुछ उदाहरणों को साथ लेते हुए। इसे पढ़े तब कल्पना करें की कोई अश्वेत या दलित या महिला कुछ कहना चाह रहे हैं या जिन्होंने भी समानता के लिए कुछ किया या सोचा,  उनकी सोच कैसी रही होगी, बदले की और किस तरह के बदले की।

    कविता के तकनीकी पहलुओं में गड़बडियो के लिए माफ़ी चाहता हूँ, पहला प्रयास है। आशा है इसमें आपको बताये गये तीनो लोग, अश्वेत दलित व महिला मिल जायेंगे। कविता मे हुई भूल चूक के लिए माफ़ी।

    ​हमारी दुनिया

    ​तुम्हारी दुनिया में न मैं था न थे सपने मेरे
    पीढ़ी दर पीढ़ी दफ़्न कर रहे थे तुम निशां मेरे
    हक़, सम्मान और आवाज़ छीन चुके थे तुम
    रोटी,पानी और ज़मीन भी बीन चुके थे तुम
    अफ़्रीका से उठा बाज़ारों में बेचा
    श्रम को मेरे तुमने खूब नोचा
    गर्म तेल से नहला रहे थे
    शहरों से भगा रहे थे
    और इसी बीच
    अपने ग्रंथों में भी
    मेरे वजूद को अपनी दुनिया के लिए भद्दा बता रहे थे तुम।

    घर में कैद किया
    या छिपा के रख लिया  
    कमतर हुँ ये गाये जा रहे थे तुम
    कमर तोड़ दी और आशा भी
    पर छिपाने को परदे बहुत सुनहरे लगाये जा रहे थे तुम
    बस यूँ कहुँ की जाने किस आदर्श पे चलके
    न जाने किसकी दुनिया बसा रहे थे तुम।

    पर मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    तुम्हारे आदर्शों को ठेंगा दिखने वाली होगी
    कैद न हो कोई
    पीछे न रह जाये कोई
    फिर कोई अपने घरों से उजाड़ा न जाये
    प्रेम की हवा पे पहरा न लगाया जाये  
    धर्म के आगे कोई बहरा न हो जाये
    कुछ ऐसी ही बातों की मटकी फिर न टूटे
    इसकी गारन्टी देने वाली होगी
    मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    आदर्शों को ठेंगा दिखाने वाली होगी।

    तुमने जो सब करने से रोका मुझे
    जैसा मेरा वजूद सोचा तुमने
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा
    जैसा किया उसके उलट कर दूंगा।
    अपने हक़ को तो तुमसे लड़ूंगा ही
    तुम्हारे हक की भी बात करूँगा
    बोलना भुलाया तुमने मेरा
    मैं तुम्हारा बोलना न भूलने दूंगा
    न रहना इस ग़लत फ़हमी में की सहूँगा अब
    पर तुम्हे भी सहने नहीं दूंगा
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा।

    विज्ञानं साहित्य और कला के आगे किसी को आने नहीं दूंगा
    खुद को सिखाऊंगा सीखूंगा गिरूंगा उठूंगा फिर से लिखूंगा
    पर इस बार किसी को किसी का वजूद कमतर न लिखने दूंगा
    अब इस दुनिया से जी भर के बदला लूंगा।

    माना कुछ पुरानी बातें भी लिख दी है
    सुधरे है हालात काफ़ी
    पर ये भी सच है कि अभी चलना है और दूर और काफ़ी
    तुम्हारी दुनिया में मैं न था
    पर हमारी दुनिया मै ऐसा न होगा।

    Anand Kumar

  • भंगण मां — Vijendra Diwach

    भंगण मां — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं एक औरत हूँ
    मेरी जाति मुझे भंगी बतायी गयी है,
    घर वालों ने बचपन से ही मुझे
    हाथों में झाड़ू पकड़ाई है,
    मेरी कमर में आभूषण के
    रूप में झाड़ू ही सजायी है।

    कोई मौसम नहीं देखते हैं
    बस निकल पड़ते हैं,
    कथित विद्वान चौक-रास्ते तो साफ करवाते हैं,
    लेकिन अपनी सामन्ती सोच पर कभी झाड़ू नहीं मारते हैं।

    गलियारे बुहारने पर मिल जाती है
    कुछ रोटियां और थोड़ा अनाज,
    कभी कोई बुलाकर पड़ोसियों को
    देता है पुराने कपड़ो का दान,
    खुला प्रदर्शन करके खुद ही खुद को
    समझता है बन्दा नवाज।

    एक सुबह
    जाने वाली बारात का बैंड-डीजे बज रहा था
    मेरी झाड़ू का तिनका-तिनका
    रात्रिभोज में कथित सभ्यजनों द्वारा फैलायी गयी
    गन्दगी पर चल रहा था,
    शादी की सफाई में
    कुछ हरी मिर्च और थोड़े टमाटर मिले,
    रात के थोड़े कचौरे-पकौड़े भी मिले,
    कुछ पकौड़े मुंह में डाले,
    कुछ परिवार के लिये थैले में डाले।

    एक बालक की नजर हम पर पड़ी,
    उसकी जुबान कुछ इस तरह से चली-
    मांजी ये कचौरे-पकौड़े बेसन के और कल के हैं,
    आप बीमार हो जाओगे,
    पेट बिगड़ जायेगा।

    मैंने भी उत्तर दिया-
    छप्पन भोग और खाने वालों के पेट खराब होते हैं,
    बेटा हमें कुछ नहीं होगा।

    वह फिर बोला-
    हरी मिर्च और टमाटर के बीज निकाल के खाना,
    सुना है इनके बीजों से पेट में पथरी बनती है,
    मैंने फिर जवाब दिया-
    बेटा जो पत्थर ही खाते हैं उनका क्या?
    ज़िन्दगी तो उनकी पत्थरों के सहारे ही चलती है।

    द्वार पर जाते ही
    सब कहते हैं भंगण मां आ गयी,
    ये मेरी तौहीन है या फिर मेरा सम्मान,
    मैं भी खुद को भंगण मां कहने लगी हूँ,
    भूल गयी मां-बाबा ने क्या रखा था मेरा असली नाम।

    आज भी हम शमशान घाट से कपड़े उठाते हैं,
    अर्थियों के कफनों से चादरें और कम्बले बनाते हैं,
    आधुनिक कहे जाने वाले युग में
    आज भी हम सामन्ती बेड़ियों में जकड़े जाते हैं,
    सभ्यता का ढोंग करके
    कुंठित लोग झूठे ही सभ्य होने का उत्सव मनाते हैं,
    ऐसे झूठे उत्सव केवल इंसानियत को छलाते हैं,
    एक नजर हम पर डालो
    देखों कैसे जीवन हम चलाते हैं।

    ये गलियारे तो हम सदियों से साफ कर रहे हैं,
    मगर समाज और देश के
    कथित विद्वानों अपने मन की भी सफाई करो,
    इंसान को इंसान समझों,
    सामान्य मानविकी को भी मानव स्वीकार करो,
    भंगी और हमारे जैसी अन्य मैला ढोंने वाली जातियों को,
    दिल अपना बड़ा करके
    माथे पर बल लाकर रोटी देने की जगह
    अपनेपन और शिक्षा का उपहार दो।
    हमने तुम्हारें घर गलियारों को बहुत साफ किया है,
    एक बार तुम भी हमारे घर गलियारों को देखों,
    अपनी आँखों की असली पट खोलो,
    हो यदि सच में तुम मानवीय तो
    देखकर हमारा ज़िंदगीनामा द्रवित हो तुम्हारा ह्रदय,
    तुम भी थोड़ा रो लो।

    हमारे बच्चों की कमर में झाड़ू की जगह
    कंधों पर किताबों का थैला हो,
    उनकी भी आँखों में सुंदर भविष्य का सपना हो,
    मानवता जगाने वाली शिक्षा से ही इनका वास्ता हो,
    ये चले हमेशा नैतिकता पर चाहे कैसा भी रास्ता हो।
    हमारी बेटियां भंगण मां नहीं अपने असली नामों से पहचानी जायें,
    हमारी बस्ती भी इंसानों की बस्ती समझी जायें।।

    Vijendra Diwach

  • विस्तृत

    विस्तृत

    Dheeraj Kumar

    जो था स्वयं विस्तृत
    ज्यादा विस्तार पाता हुआ
    विस्तारित हो चला…..

    स्वयं के भीतर 
    गहरे चलने की मार्ग की खोज का
    मार्ग प्रशस्त होता गया

    यद्यपि कि
    विस्तार का मार्ग से
    या, विस्तारित होने का चलने से
    प्रत्यक्ष या परोक्ष 
    कोई भी संबंध जोड़ना मुश्किल था
    तो भी….
    एक अदृश्य और अबूझ बंधन से
    मजबूती से बंधे हुए थे वे

    गहरे भीतर की हरेक यात्रा का
    ठहराव का बिन्दु
    समय के तीर की दिशा मे
    बहता ही चला गया……

    बहते जाने के क्रम मे
    मष्तिष्क या स्पेस की छननी मे
    आसन्न अवशेष के बचे रह जाने की संभावित अवधारणा
    ज्यों ज्यों तिरोहित होता गया
    अनजाना और अनदेखा सा 
    एक तल उभरने की 
    प्रक्रियागत रूझान सामने 
    दिखने लगा …..

    एक तल 
    जिसपर रूकने या पैर टिकाने की
    कोई संभावना या प्रायिकता 
    नही होनी थी
    बस
    स्वयं चलकर
    विस्तारित होते हुये
    विस्तृत हो जाना था….

    Dhiraj Kumar

  • खून का दबाव व मिठास

    खून का दबाव व मिठास

    Mukesh Kumar Sinha

    जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे 
    ढेरों परेशानियों संग 
    थी कुछ खुशियाँ भी हमारे हिस्से 
    जिनको सतरंगी नजरों के साथ 
    हमने महसूस कर
    बिखेरी खिलखिलाहटें

    कुछ अहमियत रखते अपनों के लिए 
    हम चमकती बिंदिया ही रहे
    उनके चौड़े माथे की

    इन्ही बीतते हुए समयों में 
    कुछ खूबियाँ ढूंढ कर सहेजी भी 
    कभी-कभी गुनगुनाते हुए 
    ढेरों कामों को निपटाया 
    तो, डायरियों में 
    कुछ आड़े-तिरछे शब्दों को जमा कर 
    लिख डाली थी कई सारी कवितायेँ 
    जिंदगी चली जा रही थी 
    चले जा रहे थे हम भी 
    सफ़र-हमसफ़र के छाँव तले

    पर तभी 
    जिंदगी अपने कार्यकुशलता के दवाब तले 
    कब कुलबुलाने लगी 
    कब रक्तवाहिनियों में बहते रक्त ने 
    दीवारों पर डाला दबाव
    अंदाजा तक नहीं लगा

    इन्ही कुछ समयों में 
    हुआ कुछ अलग सा परिवर्तन 
    क्योंकि 
    ताजिंदगी अपने मीठे स्वाभाव के लिए जाने गए 
    पर शायद अपने मीठे स्वाभाव को 
    पता नहीं कब 
    बहा दिया अपने ही धमनियों में 
    और वहां भी बहने लगी मिठास 
    दौड़ने लगी चीटियाँ रक्त के साथ

    अंततः
    फिर एक रोज 
    बैठे थे हरे केबिन में 
    स्टेथोस्कोप के साथ मुस्कुराते हुए 
    डॉक्टर ने 
    स्फाइगनोमैनोमीटर पर नजर अटकाए हुए 
    कर दी घोषणा कि
    बढ़ा है ब्लड प्रेशर 
    बढ़ गयी है मिठास आपके रक्त में 
    और पर्ची का बांया कोना 
    135/105 के साथ बढे हुए 
    पीपी फास्टिंग के साथ चिढ़ा रहा था हमें

    बदल चुकी ज़िन्दगी में
    ढेर सारी आशंकाओं के साथ प्राथमिकताएँ भी
    पीड़ा और खौफ़ की पुड़िया
    चुपके से बंधी मुट्ठी के बीच 
    उंगलियों की झिर्रियों से लगी झांकने
    डॉक्टर की हिदायतें व
    परहेज़ की लंबी फेहरिस्त
    मानो जीवन का नया सूत्र थमा 
    हाथ पकड़ उजाले में ले जा रही 
    माथे पर पसीने के बूँद 
    पसीजे हाथों से सहेजे
    आहिस्ता से पर्स के अंदर वाली तह में दबा
    इनडेपामाइड और एमिकोलन की पत्तियों से 
    हवा दी अपने चेहरे को

    फिर होंठो के कोनों से 
    मुस्कुराते हुए अपने से अपनों को देखा 
    और धीरे से कहा 
    बस इतना आश्वस्त करो 
    गर मुस्कुराते हुए हमें झेलो 
    तो झेल लेंगे इन 
    बेवजह के दुश्मनों को भी
    जो दोस्त बन बैठे हैं

    देख लेना, अगले सप्ताह 
    जब निकलेगा रक्त उंगली के पोर से
    तो उनमे नहीं होगी 
    मिठास 
    और न ही 
    माथे पर छमकेगा पसीना 
    रक्तचाप की वजह से

    अब सारा गुस्सा 
    पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी 
    बस हौले से हथेली को 
    दबा कर कह देना
    ‘आल इज वेल’
    और फिर हम डूब जाएंगे 
    अपनी मुस्कुराहटों संग 
    अपनी ही खास दुनिया में

    आखिर इतना तो सच है न कि
    बीपी शुगर से 
    ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम

    मानते हो न ऐसा !!

    Mukesh Kumar Sinha

  • बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    3 फरवरी, 2019 को ‘मीडिया विमर्श’ के आयोजन में होंगे सम्मानित


    हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘प्रेरणा’ (भोपाल) के संपादक अरुण तिवारी को दिया जाएगा। सम्मान समारोह 3 फरवरी, 2019 को गांधी भवन, भोपाल में दिन में 11 बजे आयोजित किया गया है। समारोह के मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार डा. हिमांशु द्विवेदी होंगे तथा अध्यक्षता प्रख्यात समालोचक डा. विजय बहादुर सिंह करेंगे। कार्यक्रम में मुख्यवक्ता के रूप में कथाकार श्री मुकेश वर्मा, विशिष्ट अतिथि के नाते व्यंग्यकार गिरीश पंकज और एटीजी मीडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अरविंद तिवारी मौजूद रहेगें।

    अरुण तिवारी  साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ संस्कृतिकर्मी, कवि एवं लेखक भी हैं। 21 वर्षों से वे समकालीन लेखन को समर्पित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रेरणा’ का संपादन कर रहे हैं। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार और मीडिया विद्यार्थी हिस्सा लेंगे। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव(पूर्व संपादकः नवभारत टाइम्स,मुंबई), रमेश नैयर (पूर्व निदेशकः छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी, रायपुर), तथा डा. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिवः इंदिरा गांधी कला केंद्र,दिल्ली) शामिल हैं।

    इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय, कला समय (भोपाल) के संपादक विनय उपाध्याय, संवेद (दिल्ली) के संपादक किशन कालजयी, अक्षरा (भोपाल) के संपादक कैलाशचंद्र पंत, अलाव (दिल्ली) के संपादक रामकुमार कृषक को दिया जा चुका है। सम्मान का यह ग्यारहवां वर्ष है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रुपए, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

    Arun Tiwari

  • लौटना होगा हमें भी − Ashish Pithiya ‘Farmer’

    लौटना होगा हमें भी − Ashish Pithiya ‘Farmer’

    Ashish Pithiya

    हमारे समाज मे मनुष्य सस्ती लोकप्रियता पाने के चक्कर में इतना स्वार्थी होता जा रहा जा रहा हैं कि जीवन जीने की मुलभुल चीजों का विनाश करने पर आ गया हैं और समाज व पर्यावरण के हित-अहित की चिंता किये बीना ही जीवन जीने के मूलभूत स्त्रोतों से नाश करने लगा हैं

    “लौटना होगा हमें भी”

    लौटना होगा हमें भी,
    उन मछुआरों की तरह,
    जो खाना ढूंढने जाते हैं, अपने घर से बीच समुन्दर,
    और लौट आते हैं वापिस, अपने घर खाना खाने को।
    लौटना होगा हमें भी,
    उन साँपो की तरह,
    जो गर्मी से बचने चले आते हैं, अपने बिलो से बाहर,
    और लौट जाते हैं वापिस, अपने बिलो में गर्मी से बचने को।
    लौटना होगा हमें भी,
    उन साइबेरियन पक्षियों की तरह,
    जो अपना अस्तित्व बचाने मिलों दूर से आते हैं,
    और लौट जाते हैं वापिस, अपना अस्तित्व बचाने को।
    बिलकुल वैसे ही,
    लौटना होगा हमें भी।
    ठीक उसी जगह जहाँ से ये सब शुरू हुआ था।
    साँस लेने के लिए, जंगलों की ओर
    पेट भरने के लिए, खेतों की ओर
    प्यास बुझाने के लिए, नदियों की ओर
    पर उससे भी पहले
    उन सारी नदियों को जिंदा करना होगा, जो मर गयी हैं।
    वे सारे जंगल फिर से लगाने होंगे, जिनको काटा गया है।
    उन सारे खेतों में फिर से फसल लगानी होगी, जो बंजर हो गये हैं।
    पर उससे भी पहले
    हमें मरना होगा इन जहरीली हवाओं में,
    हमें भूखा रहना होगा, आलिशान बड़ी बड़ी इमारतों में
    हमें प्यासा रहना होगा, इन चकाचौंध वाली दुनिया में
    पर उससे भी पहले
    हमें जीना होगा झूठमूठ के सारे ख्वाबों को,
    जिसके होने न होने से जीवन में कोई फर्क नही पड़ता।
    हमें खाना होगा सारे पैसे को
    जिसका भूख से कोई वास्ता नहीं।
    हमें तृप्त होना होगा उन सारी प्यासों से
    जिसका पानी से कोई रिश्ता नहीं।
    फिर लौटना होगा हमें भी।

    Ashish Pithiya ‘Farmer’


  • हिंदी फिल्मों में किन्नर व समलैंगिक समाज की उपस्थिति का विश्लेषण —Sangeeta Gandhi PhD

    हिंदी फिल्मों में किन्नर व समलैंगिक समाज की उपस्थिति का विश्लेषण —Sangeeta Gandhi PhD

    Sangeeta Gandhi PhD

    सिनेमा के विषय मूल रूप से सामाजिक,सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित होते हैं। समाज की प्रचलित मान्यताओं को ही अधिकतर सिनेमा में अभिव्यक्ति मिलती है। सामाजिक परिप्रेक्ष्यों से अलग हटकर चित्रण मुख्य धारा के हिंदी सिनेमा में गिना-चुना ही है। यही बात हिंदी फिल्मों में -किन्नर व समलैंगिक समाज के चित्रण के संदर्भ में भी कही जा सकती है। इस समाज पर बहुत अधिक फिल्में नहीं बनी। जो बनी भी हैं, वे या तो इस समाज की हास्यात्मक अभिव्यक्ति करती हैं। या मात्र उतेजक सामग्री परोसती हैं। कुछ गिनी चुनी फिल्में ही हैं, जिनमें समाज के ये उपेक्षित वर्ग सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।

    भारतीय सामाजिक सरंचना में किन्नर व समलैंगिक वर्ग सदैव हाशिये पर रहा है। भले ही इतिहास व मिथकों में बृहन्नला व शिखंडी जैसे चरित्र विद्यमान रहे हों। सामाजिक दृष्टि से तो ये वर्ग उपहास व विकृति के पर्याय रहे हैं। कानूनी दृष्टि से भी इन्हें उपेक्षित रखा गया है। किन्नर समाज सदा उपेक्षित रहा है। 15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर वर्ग को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी है। समलैंगिक अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की 1880 की धारा 377 को ढो रहे हैं।इस आधार पर उन्हें अपराधी माना जाता है और इस पर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने समलैंगिकता को प्राकृतिक वृत्ति घोषित कर दिया था पर भारत में अभी इन्हें पहचान मिलना बाकी है।

    फिल्में समाज का आईना होती हैं। समाज किन्नर, उभयलिंगी व समलैंगिक समाज को हाशिये पर रखता है। फिल्मों में भी इस समाज को मुख्यतः हास-परिहास वाले कॉमेडी पात्र के रूप में स्थान मिला है। अभिनेता महमूद की फ़िल्म ‘कुंवारा बाप’ में किन्नर समुदाय पर एक गीत फिल्माया गया है। इन्हें परम्परागत रूप में जन्म के अवसर पर गाते, नाचते दिखाया गया है। बहुत सी फिल्मों में किन्नर पात्र का चित्रण इसी रूप में मिलता है। विवाह, जन्म आदि के अवसर पर बधाई गीत गाते हुए ही अधिकांशतः नज़र आते हैं।

    हिंदी फिल्मों में ये वर्ग स्त्रैण गुणों से युक्त एक विदूषक के रूप में चित्रित होता आया है। सामाजिक ताने-बाने का असर फिल्मों पर भी होता है। समाज इनकी हंसी उड़ाता है तो फिल्मों में भी यह वर्ग हास्यात्मक अभिव्यक्ति पाता है।

    ‘कल हो न हो’ फ़िल्म में गे सम्बन्ध तो नहीं हैं पर ‘गे सीक्वेंस’ को कॉमेडी रूप में चित्रित किया गया है। वास्तविकता यह है कि समाज समलैंगिकता को विकृति मानता है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के सम्बन्ध कॉमेडी रूप में दर्शाए जाते हैं। ‘दोस्ताना’ फ़िल्म में अभिनेता अभिषेक बच्चन व जॉन अब्राहम समलैंगिक होने का नाटक करते हैं। यहां भी समलैंगिकता हास्य की वस्तु है। किन्नर वर्ग पर बनी फिल्मों में ‘शबनम मौसी’ प्रमुख है। यह फ़िल्म प्रथम किन्नर विधायक शबनम के जीवन पर आधारित है। उसके संघर्ष, पीड़ा का सजीव चित्रण फ़िल्म में हुआ है। अभिनेता आशुतोष राणा ने शबनम मौसी का किरदार निभाया है।

    किन्नर वर्ग पर आधारित दूसरी उल्लेखनीय फ़िल्म है ‘तमन्ना’। किन्नर टिकू व लड़की तमन्ना की कहानी पर आधारित यह फ़िल्म इस समाज को नई दृष्टि से देखने की सोच देती है। टिकू अनाथ लड़की तमन्ना को पालता है। कितनी तरह की कठिनाइयां उसके सामने आती हैं। परिस्थितियां कैसे उसे बार बार यह जताती हैं कि वो एक किन्नर है! इस पीड़ा की सशक्त अभिव्यक्ति इस फ़िल्म में मिलती है। अंततः फ़िल्म यह संदेश देती है कि किन्नर भी इंसान हैं। उन्हें इसी रूप में सम्मान दो। फ़िल्म में परेश रावल व पूजा बेदी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।

    1996 की फ़िल्म ‘दरमियान’ में 1940 के दशक की एक अभिनेत्री व उसके किन्नर पुत्र की कहानी है। अभिनेत्री अपने पुत्र को स्वीकार नहीं करती, उसे समाज से छुपा कर रखती है। कहानी पारम्परिक सोच को ही दर्शाती है। किरण खेर व आरिफ जकारिया ने फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।

    किन्नर वर्ग का एक बिल्कुल अलग रूप फ़िल्म ‘सड़क’ में मिलता है। इस फ़िल्म में किन्नर ‘महारानी’ का किरदार एक खलनायक है।एक क्रूर खलनायक जो नायक, नायिका का शत्रु है। परम्परागत किन्नर चित्रण से अलग यह नवीन प्रस्तुति थी। ऐसा लगता है कि जैसे किन्नर महारानी पात्र समाज से अपनी स्थिति का प्रतिशोध ले रहा है। मुख्य भूमिका सदाशिव अमरापुरकर ने निभाई थी। इसके बाद कुछ अन्य फिल्मों में भी किन्नर पात्र खलनायक के रूप में प्रदर्शित हुए।

    समलैंगिक सम्बन्धों को हमारा समाज व कानून भले मान्यता न देता हो पर इन सम्बन्धों पर पिछले कुछ वर्षों में बहुत सी फिल्में बनीं हैं। ये फिल्में बहुत सफल नहीं रहीं । इनकी एक बड़ी कमी है- इनमें सहज समलैंगिक सम्बन्ध दिखाने के स्थान पर मात्र उतेजक विषय वस्तु को लिया गया है।

    रागिनी एमएम एस 2, ओमर, आई कांट थिंक स्ट्रेट, बॉम्बे टाकीज़, गर्ल फ्रेंड  आदि फिल्में इसी प्रकार की हैं। रीमा कागती की फ़िल्म ‘हनीमून ट्रेवल्स’ समलैंगिक सम्बन्धों के बारे में एक मुद्दा उठाती है। यदि किसी गे का विवाह अपनी सोच से विपरीत स्त्री से हो जाये तो क्या परेशानियां आती हैं? इन प्रश्नों को इस फ़िल्म में दिखाया गया है।

    मधुर भंडारकर की फिल्मों ‘पेज 3’ व ‘फैशन’ में इन सम्बन्धों का एक नया पक्ष प्रस्तुत हुआ है। आगे बढ़ने व सफलता पाने के लिए समलैंगिक रिश्ते बनाना। ‘फैशन’ व ‘हीरोइन’ फिल्मों में परिस्थितिवश बने लेस्बियन रिश्ते प्रस्तुत हुए हैं।

    समलैंगिक लेस्बियन रिश्तों पर सबसे उल्लेखनीय फ़िल्म दीपा मेहता की ‘फायर’ है। 1996 कि ये फ़िल्म बहुत विवादित भी रही। इसे कई पुरस्कार भी मिले। शबाना आज़मी व नंदिता दास की इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं थीं। पितृसत्तात्मक समाज के दबे घुटे माहौल में पीड़ित दो स्त्रियाँ सारे बन्धन तोड़ देती हैं। पुरुषों से प्राप्त उपेक्षा उन्हें एक दूसरे के करीब लाती है।

    यहां महत्वपूर्ण यह है कि उनमें जन्मजात समलैंगिक वृति नहीं है। परिस्थितिवश एक दूसरे से प्राप्त सम्वेदना उन्हें इन सम्बन्धों के लिए प्रेरित करती है। पद्मावत फ़िल्म में अल्लाउदीन खिलजी व मलिक काफूर के ऐतिहासिक समलैंगिक रिश्तों को भी दिखाया गया है।

    हिंदी फिल्मों में किन्नर वर्ग व वैकल्पिक यौनिकता (उभयलिंगी, समलिंगी) वर्ग पर फिल्में तो बनी हैं पर इन वर्गों के संघर्ष, चेतना, पीड़ा को प्रचुरता से नहीं दर्शाया गया। इस समाज की पहचान, अस्मिता को केंद्र में रखकर इनकी शिक्षा, व्यवसाय, सामाजिक स्थान व स्वीकृति  पर आधारित फिल्मों का निर्माण अभी शेष है।

    Sangeeta Gandhi PhD

    शोध कार्य:
    • पाली -सम्वेदना और शिल्प
    • अमृतलाल नागर जी के उपन्यासों में सांस्कृतिक बोध
    सम्मान:
    • वनिका प्रकाशन व लघुकथा गागर में सागर की ओर से लघुकथा लहरी सम्मान से सम्मानित
    • साहित्य सागर व सत्यम प्रकाशन की ओर से काव्य गौरव व काव्य सागर सम्मान से सम्मानित
    प्रकाशित संग्रह:
    • दास्ताने किन्नर कहानी संग्रह में कहानी प्रकाशित
    • स्वाभिमान, नए पल्लव 2 संग्रह,आस पास से गुजरते हुए, समकालीन प्रेम विषयक लघुकथाएं, नई सदी की लघुकथाएँ, परिंदों के दरमियाँ, सहोदरी लघुकथा संग्रह में लघुकथाएँ प्रकाशित
    • सहोदरी सोपान 4 साझा काव्य संग्रह,मुसाफिर साझा काव्य संग्रह, समकालीन हिन्दी कविता संग्रह प्रकाशित
    • व्यंग्य प्रसंग ,कहानी प्रसंग ,कविता प्रसंग संग्रहों में क्रमशः व्यंग्य ,कहानी व कविताएँ प्रकाशित
    पत्रिकाएं:

    अविराम साहित्यिकी, आधुनिक साहित्य, लघुकथा कलश, दृष्टि, विभोम स्वर, शुभ तारिका, सरस्वती सुमन, शैल सूत्र, निकट, ककसाड़, शेषप्रश्न, अट्टहास, अनुगुंजन, नायिका, पर्तों की पड़ताल, सत्य की मशाल, सुरभि, नारी तू कल्याणी, प्रयास, अनुभव, सन्तुष्टि सेवा मासिक, बुन्देलखण्ड कनेक्ट, प्रणाम पर्यटन, आदि ज्ञान, नवल, क्राइम ऑफ नेशन, शतदल समय, पत्रिकाओं में कविता, लघुकथा, लेख, व्यंग्य प्रकाशित।

  • सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में ‘लोक’ —Prof Sanjay Dwivedi

    सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में ‘लोक’ —Prof Sanjay Dwivedi

    Prof Samjay Dwivedi

    जब समाज में गहरी सांस्कृतिक संवेदनहीनता जड़ें जमा चुकी हो और राजनीति अपने सर्वग्रासी चरित्र में सबसे हिंसक रूप से सामने हो, तो लोक और लोकजीवन की चिंताएं बेमानी हो जाती हैं। गहरी सांस्कृतिक निरक्षरता और जड़ता से भरे-पूरे नायक, लोक पर अपनी सांस्कृतिक चिंताएं थोपते हुए दिखते हैं। सबका अपना-अपना ‘लोक’ है और अपनी-अपनी नजर है। इस लोक का कोई इतिहास नहीं और कोई विचार नहीं है। उसकी सहज प्रवाही धारा के बरक्स अब ‘लोक’ को ‘लोकप्रिय’ बनाने और कुल मिलाकर ‘कौतुक’ बना देने के प्रयत्नों पर जोर है। शायद यही कारण है कि लोकसंस्कृति का भी कोई व्यवस्थित विमर्श हम आज तक खड़ा नहीं कर पाए हैं। कलाएं भी तटस्थ और यथास्थितिवादी होती हुई दिखती हैं।

    हम देखें तो लोक, समाज की सामूहिक शक्ति का प्रकटीकरण है। जबकि बाजार में हम अकेले होते हैं। ऐसे समय में लोकसंस्कृति का संरक्षण व रूपांतरण जरूरी है। संत विनोबा भावे ने हमें एक शब्द दिया- लोकनीति। एक शब्द है- लोकमंगल। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोकमंगल शब्द का उपयोग कई बार साहित्यिक संदर्भों में किया है। साहित्य, संस्कृति, कला या किसी भी ज्ञान का उद्देश्य लोकमंगल ही होना चाहिए। लोकमंगल में ही सभी कलाओं की मुक्ति है। अफसोस यह है कि लोक को जाने बिना तो तंत्र या जड़ नौकरशाही हमने विकसित की है। जिसकी आंखों में लोक के स्वप्न नहीं हैं। इसलिए हम देखते हैं कि राज अलग जा रहा है और समाज अलग। समाज और राज की यह दूरी हर दौर में बनी रही है। हमें देखना होगा कि मूक होने के बाद भी लोक की एक सामूहिक चेतना है। जड़ों में रचा-बसा मन ही इसे महसूस कर सकता है। यह लोक प्रबुद्ध है किंतु वाचाल नहीं है।  इसीलिए कहा जाता है कि लोकमानस के पास भाषा नहीं होती, भाव होते हैं। बाजार और मीडिया के इस शोर में लोकमन को पढ़ने का अवकाश भी किसके पास है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे, “हमारा जनसमूह निरक्षर है, मूर्ख नहीं।” लोक की मूल वृत्ति ही है- ‘आनंद’। लोक आनंद में ही विचरता है।

    हम देखें तो सारी लोकपरंपराएं, लोकाचार, लोक में व्याप्त गीत-संगीत, प्रर्दशन कलाएं आनंद के ही संसार को रचती और व्यापक बनाती हैं। यहां आनंद का आशय धन-वैभव से पैदा हुए आनंद से नहीं है। यह आनंद है ह्दय का आनंद। आंतरिक सुख और आनंद। जहां अभावों में भी एक मस्ती है। माटी की महक से ही जीवन महकता है। प्रकृति की ताल पर जीवन चलता और नाचता है। प्रकृति से संवाद की यह शैली जैसे-जैसे हमसे दूर जाती है हमारे दुख, तनाव और अवसाद बढ़ते चले जाते हैं। आनंद की उपस्थिति के लिए, उसे महसूसने के लिए शांति चाहिए। आनंद, शांति में ही पलता और विकसित होता है। शांति होती है, स्थिरता से। यह स्थिरता मन की भी है, जीवन की भी है और इसलिए शांत, आनंदमय जीवन हमारी परम आकांक्षा है। लोकमंगल की कामना इसलिए हमारी सबसे प्रिय कामना है, क्योंकि इसमें इस भूमि और राष्ट्र का भी मंगल है। इन अर्थों में लोकमंगल ही राष्ट्रमंगल है। जबकि आज बन रहे विश्वग्राम (ग्लोबल विलेज) में लोक कहां है? उसकी संस्कृति कहां है? उसके भाव कहां हैं? उसकी सांसें कहां हैं? उसके सपने कहां हैं? उसका राग कहां है? आप देखें तो हिंदी का हर बड़ा कवि लोक से आता है। तुलसी, नानक, रैदास, कबीर, मीराबाई, रहीम सब लोक से आते हैं। हमारा जो वैद्य है वह भी ‘कविराय’ है। लोक साहचर्य और संवाद की पाठशाला है। यहां आत्मीय संपर्क, समान संवेदना, समान अनुभूति और एकात्म फलता –फूलता है। यहां विभेद नहीं है। आत्मीयता यहां मूल तत्त्व है। ग्लोबल विलेज की अवधारणा एक अलग तरह की भावना है। जबकि लोक का संगीत आत्मा का संगीत है। लोक यहां अपने राग, रंग और भाव रचता है। वह मनुष्य के मन को छूता है और उससे संवाद करता है। नए बाजार की अवधारणा में लोक का विचार नहीं है। लोक को मिटाने की शर्त पर ही यह बाजार अपना विस्तार करता है। जल, जंगल और जमीन को यूं ही बाजार लोलुप निगाहों से नहीं देख रहा है। इसके कारण बहुत प्रकट और जाहिर हैं।

    हम विचार करें तो पाते हैं कि 1991 भारत में उदारीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू होने का साल है। यह साल सामाजिक मूल्यों और समाज के बदलाव का भी साल है। 1990 से लेकर 2019 तक बदलाव की यह गति तेज ही हुई है। भारत इन सालों में जितनी तेजी से बदला उतना सदियों में नहीं बदला। यह परिर्वतनों का समय भी था और मीडिया क्रांति का भी समय था। इस समय को ‘मूल्यहीनता के सबसे बेहतर समय’ के रूप में याद किया जाना चाहिए। यह समय एक कठिन समय था। जिसमें लोग जड़ों से उखड़ रहे थे। जंगलों से भगाए जा रहे थे। गांव के गांव लुप्त हो रहे थे या तथाकथित नगरीकरण के नकारात्मक प्रभावों से जूझ रहे थे। पूरी दुनिया को एक रंग में रंगने की जुगत और जुगाड़ें तेज हो रही थीं। बाजार के जादूगरों का हमला इसी लोक पर था, जो सहमा सा इसे देख रहा था। आज हमारा लोक जीवन अगर बाजार की इस चमक में कहीं दिखता है या प्रयोग हो रहा है तो कौतुक और तमाशे की तरह। वह तमाम चमकती चीजें में एक सजावटी चीजों की तरह है जिसे मौके-बेमौके दिखाया जाता है। आज का विश्वग्राम इसीलिए सर्वग्राही भी और सर्वग्रासी भी। उसके ग्रास में लोक भी है, भाव भी हैं, मन भी हैं, संवेदनाएं भी हैं। भारत के मन से कटे लोग भारत के फैसले ले रहे हैं। ऐसे कठिन समय में हमारे गांव सहमे हैं, नदियां सहमी हुई हैं, खेतों की मेड़ों पर बैठे किसान सहमे हुए हैं। इस लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलते देखना भी रोचक है। ‘कोलोनिजम आफ माइंड्स’(वैचारिक साम्राज्यवाद) का यह खेल सफल होता दिखता है। ‘विचारों की कंडीशनिंग’(अनुकूलन) की जा रही है। हमारी विविधता और बहुलता को खतरा साफ दिखता है। ‘भारत’ को जीना है तो उसे ‘भारत’ ही बनना होगा, पर इस आंधी में हमारे पैर टिकेंगें क्या, यह बड़ा सवाल है।

    Prof Sanjay Dwivedi

    अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,
    माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
    प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर,
    भोपाल-462011 (मध्यप्रदेश)

  • अंधेरा

    अंधेरा

    Dhiraj Kumar


    अंधेरा …..
    अत्यंत उदार और लचीला होता है
    प्रकाश को अपने सीने से
    आर पार जाने देने मे
    कोई तकलीफ नही होती उसे
    वो न तो प्रकाश को 
    पथ भ्रष्ट करता है
    और न ही दूषित……

    अंधेरा एक गहन चिन्तक की तरह
    अपने धुन मे मगन रहता है
    वो अचल है ,शाश्वत है ,निराकार है….
    उसे कोई फर्क नही पड़ता कि
    प्रकाश उसके बारे मे क्या सोचता है
    या उसके के साथ क्या सलूक 
    करने वाला है

    अलबत्ता…..
    प्रकाश हमेशा खुराफाती होता है
    अंधेरे का अकेलापन और शांति
    उसे अच्छा नही लगता 
    किसी भी तरीके से
    कोई न कोई चेहरा ढूंढ ही लेता है
    ताकि उपर पड़ कर 
    चेहरे को रौशन कर दे 
    ……और अंधेरे को तंग तबाह

    Dhiraj Kumar