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  • बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं

    Durga Shankar Kasar

    बेटियाँ चावल उछाल
    बिना पलटे,
    महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं।

    छोड़ जाती है बुक शेल्फ में,
    कव्हर पर अपना नाम लिखी किताबें।
    दीवार पर टंगी खूबसूरत आइल पेंटिंग के एक कोने पर लिखा अपना नाम।
    खामोशी से नर्म एहसासों की निशानियां,
    छोड़ जाती है ……
    बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

    रसोई में नए फैशन की क्राकरी खरीद,
    अपने पसंद की सलीके से बैठक सजा,
    अलमारियों में आउट डेटेड ड्रेस छोड़,
    तमाम नयी खरीदादारी सूटकेस में ले,
    मन आँगन की तुलसी में दबा जाती हैं …
    बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

    सूने सूने कमरों में उनका स्पर्श,
    पूजा घर की रंगोली में उंगलियों की महक,
    बिरहन दीवारों पर बचपन की निशानियाँ,
    घर आँगन पनीली आँखों में भर,
    महावर लगे पैरों से दहलीज़ लांघ जाती है…

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

    एल्बम में अपनी मुस्कुराती तस्वीरें,
    कुछ धूल लगे मैडल और कप,
    आँगन में गेंदे की क्यारियाँ उसकी निशानी,
    गुड़ियों को पहनाकर एक साड़ी पुरानी,
    उदास खिलौने आले में औंधे मुँह लुढ़के,
    घर भर में वीरानी घोल जाती हैं ….

    बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

    टी वी पर शादी की सी डी देखते देखते,
    पापा हट जाते जब जब विदाई आती है।
    सारा बचपन अपने तकिये के अंदर दबा,
    जिम्मेदारी की चुनर ओढ़ चली जाती हैं।
    बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे विदा हो जाती हैं।

    (तमाम बेटियों को समर्पित)

    Durga Shankar Kasar

  • बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस संयंत्र ने बदली ज़िन्दगी — Firdaus Khan

    बायो गैस ने लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना दिया है. देश के अनेक गांवों में अब महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर खाना नहीं पकातीं, क्योंकि उनकी रसोई में अब बायो गैस पहुंच चुकी है. मध्य प्रदेश को ही लें. यहां के शहडोल ज़िले के कई गांवों में अब चूल्हे बायो गैस से ही जल रहे हैं. जंगल को बचाने के लिए सरकार ने आदिवासी बहुल इस ज़िले के गांवों में जागरुकता मुहिम शुरू की. नतीजतन, गांव महरोई समेत कई गांवों में बायो गैस संयंत्र लगाए गए और फिर बायो गैस चूल्हे जलने लगे. अब आदिवासी महिलाओं को ईंधन की लड़की लेने के लिए जंगल में नहीं जाना पड़ता, जिससे वे काफ़ी ख़ुश हैं.

    उत्तर प्रदेश के लखनऊ ज़िले के गांव बिजनौर के जय सिंह को बायो गैस संयंत्र से दिन-रात बिजली मिल रही है, जिससे वह अपनी डेयरी की सभी मशीनें चलाते हैं. उनका कहना है कि उनका 140 घन मीटर का गैस संयंत्र है, जिसे लगवाने में तक़रीबन 22 लाख रुपये ख़र्च हुए. उनके पास 150 पशु हैं, जिनसे रोज़ लगभग एक हज़ार लीटर दूध मिलता है. साथ ही रोज़ लगभग 1500 किलो गोबर मिलता है. इस गोबर को वह बिजली बनाने में इस्तेमाल करते हैं. बायो गैस संयंत्र से मिली गैस से 30 किलोवॉट का जेनरेटर चलाकर 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं. अपने संयंत्र से बनाई गई बिजली से ही वह पशुओं का दूध दुहने वाली स्वचालित मिल्किंग मशीन, पशुओं के चारा काटने की मशीन और दूध की पैकिंग करने की मशीन को संचालित करते हैं. इसी बिजली से उन्होंने गेहूं पीसने की बड़ी मशीन भी लगा रखी है, जिसमें पूरे गांव का गेहूं पीसा जाता है. इसके अलावा उन्हें खाद भी मिल रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बायो गैस संयंत्र किसानों और ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं. इनसे जहां रसोईघरों को ईंधन मिल रहा है, बिजली के रूप में रौशनी मिल रही है, वहीं खेतों को खाद भी मिल रही है. आज देशभर में छोटे स्तर पर तक़रीबन 33 लाख बायो गैस संयंत्र काम कर रहे हैं.

    राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले के की सीमलवाड़ा भेमईगांव में महिलाएं बायो गैस के चूल्हे पर ही खाना बनाती हैं. गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है. इसीलिए हर घर में पशु हैं. पहले महिलाएं गोबर के उपले बनाकर चूल्हे में जलाती थीं. जहां उपले बनाने में उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी, वहीं इन्हें चूल्हें में जलाने पर धुआं भी होता था. नब्बे की दहाई में गांव में बायो गैस क्रांति आई. ज़िला परिषद के ज़रिये गांव में बायो गैस संयंत्र लगाए गए. ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी और एलपीजी के मुक़ाबले बायो गैस बेहद सस्ती है. इससे उन्हें अच्छी खाद भी मिल रही है. मध्‍यप्रदेश के खंडवा ज़िले के ग्राम बड़गांव पिपलौद ऐड़ा का युवक शुभम बायो गैस से आटा चक्की चला रहा है.

    कुछ महीने पहले दुग्ध संघ ने ग्राम बड़गांव पिपलौद में डेयरी समिति बनाई गई. इसमें 20 सदस्यों को नर्मदा झाबुआ ग्रामीण बैंक के माध्यम से दुग्ध उत्पादन के लिए गाय दी गई हैं. इसी समिति के सदस्य आत्मराम परसराम तिरोले ने भी चार गाय लेकर दूध उत्पादन शुरू किया. इन गायों से रोज़ काफ़ी गोबर जमा हो जाता था. उनके बेटे शुभम ने बायो गैस संयंत्र लगवा लिया, जिससे उन्हें रसोई के लिए बायो गैस मिलने लगी. फिर उसने कबाड़े में से एक डीज़ल इंजन और आटा चक्की ख़रीदी और इन्हें ठीक करा लिया. अब वह बायो गैस से इंजन चला रहा है और इस इंजन से आटा चक्की चल रही है. बायो गैस से ही वह चारा काटने की मशीन भी चला रहा है.

    पिछ्ले जून माह में दिल्ली जल बोर्ड ने कोंडली में सीवरेज शोधन संयंत्र में बायोगैस से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है. सीवरेज के शोधन से निकलने वाली बायो गैस का इस्तेमाल अब बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा. इससे दिल्ली जल बोर्ड को अपने सालाना 20 करोड़ रुपये के बिजली के बिलों से राहत मिलेगी. बायो गैस से बिजली उत्पादन करने की इस प्रक्रिया को मॉडल के तौर पर शुरू किया गया है. अगर यह प्रयोग कामयाब रहता है, तो आने वाले वक़्त में जल बोर्ड अपने सभी सीवरेज शोधन संयंत्रों में बायो गैस से बिजली उत्पादन का काम शुरू करेगा. यह ईको फ्रेंडली तरीक़ा प्रदूषण के स्तर में भी कमी लाएगा. कोंडली में बायो गैस से 10 हज़ार किलोवाट बिजली पैदा की जा रही है. इससे जल बोर्ड अपनी बिजली की 35 फ़ीसद ज़रूरत पूरी कर पा रहा है.

    ग़ौरतलब है कि देश में बायो गैस संयंत्रों को बढ़ावा देने के लिए साल 1981-82 में राष्ट्रीय बायो गैस परियोजना शुरू की गई. यह अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग की महत्वपूर्ण परियोजना है. इसका मक़सद ग्रामीण क्षेत्रों में अपारंपरिक ऊर्जा के नये विकल्पों को बढ़ावा देकर पर्यावरण की सुरक्षा करना है. इसके अलावा बायो गैस संयंत्र की स्थापना में सहायता देकर ऊर्जा संरक्षण पर ज़ोर देना, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को धुएं से होने वाली बीमारियों से बचाना और उच्च कोटि की गोबर खाद के उत्पादन में बढ़ोतरी कर कृषि को बढ़ावा देना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है. इसके कार्यक्रम के तहत घरेलू और सामुदायिक दो प्रकार के संयंत्रों की स्थापना की जाती है. यह कार्यक्रम राज्य सरकारों और केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनों, राज्यों के निगमित व पंजीकृत निकायों आदि द्वारा चलाया जा रहा है. ग़ैर सरकारी संगठन भी इसके क्रियान्वयन में मदद कर रहे हैं. वाणिज्यिक और सहकारी बैंक बायो गैस संयंत्रों की स्थापना के लिए क़र्ज़ मुहैया करा रहे हैं. जिन ग्रामीणों के पास चार से ज़्यादा बड़े पशु जैसे भैंस, गाय या बैल हों, इस संयंत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए इच्छुक व्यक्ति को बायो गैस संयंत्र लगाने का प्रार्थना पत्र ग्राम पंचायत विकास अधिकारी/ खंड विकास अधिकारी को पूरे विवरण के साथ देना होता है

    बायो गैस पर्यावरण के अनुकूल है और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. बायो गैस के इस्तेमाल से लकड़ी की बचत होती है और पेड़ कटने से बच जाते हैं. महिलाओं को चूल्हे के धुएं से निजात मिल जाती है, जिससे उनकी सेहत ठीक रहती है. बायो गैस के उत्पादन के लिए ज़रूरी कच्चे माल यानी गोबर आदि की आपूर्ति गांवों से ही पूरी हो जाती है.

    विशेषज्ञों के मुताबिक़ बायो गैस संयंत्र लगवाते वक़्त सावधानी बरतनी चाहिए. बायो गैस से छोटे से छोटा प्लांट लगाने के लिए कम से कम दो या तीन पशु होने चाहिए. गैस संयंत्र का आकार गोबर की दैनिक मिलने वाली मात्रा को ध्यान में रखकर करना चाहिए. बायो गैस संयंत्र गैस इस्तेमाल करने की जगह के नज़दीक स्थापित करना चाहिए, ताकि गैस अच्छे दबाव पर मिलती रहे. बायो गैस संयंत्र लगवाने के लिए निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट और ईंटें बढ़िया क़िस्म की होनी चाहिए. छत से किसी तरह की लीकेज नहीं होनी चाहिए. बायो गैस संयंत्र किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में ही बनवाना चाहिए. यह भी ध्यान रहे कि बायो गैस संयंत्र की 15 मीटर की परिधि में कोई पेयजल स्रोत न हो. गैस पाइप और अन्य उपकरणों की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए. गोबर की सूखी परत बनने से रोकने के लिए गोबर डालने और गोबर निकलने का पाइप ढका रहना चाहिए. यह संयंत्र निर्देशानुसार चलाने से वर्षों तक चल सकते हैं, जिससे गैस और खाद दोनों काफ़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं.

    बायो गैस संयंत्र की स्थापना के बाद इसे गोबर और पानी के घोल से भर दिया जाता है. इसके बाद गैस की निकासी का पाइप बंद करके 10-15 दिन छोड़ दिया जाता है. जब गोबर की निकासी वाली जगह से गोबर बाहर आना शुरू हो जाता है, तो हर रोज़ संयंत्र में ताज़ा गोबर सही मात्रा में डाला जाता है. इस तरह बायो गैस और खाद तैयार होती है. बायो गैस संयंत्र में गोबर की क्रिया के बाद 25 फ़ीसद ठोस पदार्थ गैस के रूप में बदल जाता है और 75 फ़ीसद खाद बन जाता है. यह खाद खेती के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें नाइट्रोजन डेढ़ से से दो फ़ीसद फ़ास्फ़ोरस एक और पोटाश भी एक फ़ीसद तक होता है. बायो गैस संयंत्रों से मिलने वाली गैसों में 55 से 66 फ़ीसद मीथेन, 35 से 40 फ़ीसद कार्बनडाई ऒक्साइड और अन्य गैसें होती हैं. ये खाद खेतों के लिए बेहद उपयोगी है. इससे उत्पादन में काफ़ी बढ़ोतरी होती है.

    कोड़े-कर्कट से भी बायो गैस बनाई जा सकती है. देशभर की सब्ज़ी मंडियों में हर रोज़ बहुत-सा कूड़ा जमा हो जाता है, जिनमें फल-सब्ज़ियों के पत्ते, डंठल और ख़राब फल- सब्ज़ियां शामिल होती हैं. ज़्यादातर मंडियों में ये कचरा कई-कई दिन तक पड़ा सड़ता रहता है. अगर इनका इस्तेमाल बायो गैस बनाने में किया जाए, तो इससे कई फ़ायदे होंगे. इससे जहां कचरे से निजात मिलेगी, वहीं बायो गैस और खाद भी प्राप्त होगी. पंजाब कांग्रेस कमेटी के सचिव मंजीत सिंह सरोआ ने पंजाब सरकार को सलाह दी है कि वह हर सब्ज़ी मंडी के समीप बायोगैस प्लांट लगाए, जिससे पैदा हुई बायो गैस की सप्लाई मंडी की दुकानों या आसपास के रिहायशी इलाक़ों में की जा सके.

    काबिले-ग़ौर है कि ऊर्जा के पेट्रोलियम, कोयला जैसे पारंपरिक स्रोत सीमित हैं. इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जैव-ऊर्जा जैसे ग़ैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. बायो गैस संयंत्र के अनेक फ़ायदे हैं. इसे लगाने से किसानों को ईंधन और खाद दोनों की बचत होती है. बेरोज़गार युवा बायो गैस संयंत्र लगाकर स्वरोज़गार अर्जित कर सकते हैं. इससे डेयरी उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, दूध बढ़ेगा और आमदनी बढ़ेगी. है न बायो गैस संयंत्र फ़ायदे का सौदा.

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    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • पर्यटन : पछवादून, उत्तराखंड — Sanjay Jain

    पर्यटन : पछवादून, उत्तराखंड — Sanjay Jain

    Sanjay Jain

    शनिवार छुट्टी का दिन था। तीन दिनों से लगातार भारी बारिश ने घर में कैद किया हुआ था। दोपहर 1:00 बजे के करीब बारिश थोड़ी हल्की हुई नाश्ता भोजन सब हो चुका था सो स्कूटी निकाली और चल पड़ा भीगने के लिए भीगी हुई प्रकृति के रंगों को महसूस करने के लिए। तेज बारिश सीधी आंखों पर पड़ती है पर यह फुहारे थी, स्कूटी चलाने के लिए एकदम संतुलित मात्रा। जा पहुंचा घर से 2 किलोमीटर दूर जमना किनारे नाव घाट। भारी बारिश के बाद उफनती, इठलाती जमना नदी। बीच टापू पर कुछ बगुला भगत अपना शिकार कर रहे थे। कुछ देर बाद कुछ कोए भी इनकी दावत में शामिल हो गए। अब सब मिलकर शिकार करने लगे थे, कोई रंगभेद नहीं काले और सफेद का!!

    आस-पास के गांव वाले पानी में बह कर आई हुई लकड़ियों को ललचाई नजरों से देख रहे थे। लेकिन वहां पर पानी का बहाव बहुत तेज था वरना वह नदी में घुसकर लकड़िया निकाल लाते। नदी किनारे बिना प्लास्टर वाले मकान में दरारें उभर आई थी, उसे खाली किया जा रहा था। रात में ढहने की आशंका थ। बच्चे बूढ़े लड़कियां मर्द सब आ रहे थे उफनते दरिया को देखने के लिए। पहाड़ों पर से बादल भी नीचे उतर आए थे जमुना जी के पांव धोने के लिए। बच्चे नंबर प्लेट वाली साइकिल लेकर घूम रहे थे। हल्की बारिश जारी थी। लोग आ जा रहे थे। यहां से 5 किलोमीटर दूर डाकपत्थर बैराज की ओर चल पड़ा। विराज के पास गरमा गरम समोसे देख कर ठिठक गया। भीगने पर चाय और गरम समोसे ने मौसम का आनंद दुगना कर दिया। दोनों स्वाद बने हुए थे।

    बैराज पर किसी मेले की तरह का मंजर था। जमुना के उफान का नजारा लेने के लिए बच्चे औरत मर्द शहरी देहाती सब आए थे, बुर्के वाली भी थी और बेपर्दा भी हिंदू मुसलमान सब। प्रकृति सबको जोड़ देती है ना कोई रंगभेद करती है ना धर्म भेद। हर की पौड़ी गंगा पर शायद ही कोई मुस्लिम जाता हो, लेकिन यहां सब धर्म के लोग थे। सब के कैमरे निकले हुए थे,धड़ाधड़ सेल्फीयां!! जमुना के साथ फोटुएं!!! बैराज पर बने पार्कों में कोई नहीं जाना चाहता था।

    भुट्टे चाय और पकौड़ी वाले भी अपना-अपना हिस्सा बांट रहे थे। पुल पार 12-15 के झुंडों में युवक नदी से लकड़ियां निकाल रहे थे, बड़े-बड़े स्लीपर भी थे। घर की औरतें और बच्चे भी मदद कर रहे थे आखिर उन्हें भी सर्दियों में लकड़ियां जलानी थी। घोड़ा बग्गी भैंसा बुग्गी टेंपो मोटरसाइकिल सब लकड़ियां ढोने में लगी हुई थी। छोटे-छोटे झगड़े भी थे लकड़ी के लिए। तूने क्यों उठाई मेरी लकड़ी मैंने निकालकर इकट्ठी की थी। ड्रिफ्ट वुड के लिए भी लकड़ी देखने लगा लेकिन कोई शेप नहीं मिली। उन्हें लकड़ियां निकालता छोड़ सात किलोमीटर दूर बॉर्डर पार कर हिमाचल के किल्लोड़ गाँव की तरफ निकल गया।

    टोंस नदी के किनारे खड़ी चढ़ाई और भारी बरसात में पूरी सड़क बैठ कर कच्चे रास्ते में तब्दील हो गई थी। स्कूटी बहुत संभल-संभलकर चलानी पड़ी। आखिर मंजिल आ ही गई। तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी सुंदरता से भरपूर किल्लोड़ घाटी! आसपास में मेरी सबसे प्रिय जगह। गजब की शांति। शहर के शोर और ट्रैफिक की चकचक से दूर। कभी-कभी एक आद बस या स्कूटर मोटरसाइकिल आ जाती है या जानवरों के लिए चारा पत्ती लेकर जाती महिलाएं। मैं जूते निकाल कर पैराफिट पर बैठ गया और प्रकृति को आत्मसात करने की कोशिश करने लगा। थोड़ी देर बाद लेट गया। ठंडी ठंडी हवा और कीटों का मधुर संगीत जैसे देव लोक।

    इस शांति को भंग किया शाम 6:00 बजे से मंदिर के लाउडस्पीकर ने, देवता रुष्ट ना हो। इसलिए गांव वालों ने नया मंदिर बना लिया था महासू देवता का। पूरी घाटी में भजन नुमा बजते रहे। उस नीरव शांति में थोड़ी देर ऐसे भी झेला। विकास यहां तक पहुंचने लगा है। पास ही देवदार के जंगल के बीच एक ही स्कूटी खड़ी थी। आसपास निगाह दौड़ाई कोई नहीं तभी ऊपर पहाड़ी पर प्रेमी जोड़े का अक्स दिखाई दिया ऐसी जगह जहां से कोई उन्हें नहीं देख सके, लेकिन वह सब को देख सकते थे प्रेमियों के लिए मुफीद जगह। अंधेरा होने लगा था। किल्लोड़ का पांच सात दुकानों का बाजार जहां दुकान पर पेंसिल जूते से लेकर सीमेंट तक हर जरूरत की वस्तु मिल जाती थी, बिना किसी तामझाम के। मैंने एक और चाय और नमकीन ली। अब अंधेरा होने लगा था। वापस चला तो रास्ते में जिन झरनों को छोड़ आया था वह मुझे वापस जाने से रोकने लगे खैर उन झरनों का भी आतिथ्य  स्वीकार किया, और उनका जल ग्रहण किया। बारिश कुछ देर रुकने के बाद फिर शुरू हो गई थी, भीग चुका था। वापसी में बैराज पर फिर चाय की तलब लगी। गरम चाय और समोसे ने अपने अंदाज में समा बांध दिया। कोयलों पर सिंकते भुट्टों के बिना भीगना कैसे पूरा होता। अंततः बरसात में बह गई सड़क और टूटे गड्ढों के बीच घर वापसी। प्रकृति का आनंद लेना हो तो समय का बिल्कुल ख्याल ना रखें, जल्दबाजी ना करें, सुबह 7:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक का लक्ष्य लेकर चलें। खाना-पीना घर से साथ ले जाएं या वहीं गरम चाय समोसे सुड़कें। अकेले या केवल एक और साथी हो जो प्रकृति को आत्मसात कर सके तो बेहतर होगा। इसलिए निकल पड़ो घर से बरसते बादलों के बीच साइकिल या स्कूटी उठाकर या फिर पैदल ही, पर कारों में  तो बिल्कुल नहीं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मात्र चालीस किलोमीटर की दूरी पर पछवादून में यह सौंदर्य बिखरा हुआ है आइए और आनंद उठाइए।!!!!

    Sanjay Jain


  • EVM बनाम बैलेट पेपर : जनशक्ति लोकतंत्र को किससे कितना ख़तरा

    Nishant Rana

    जीत के बावजूद राहुल गांधी के EVM पर अपना स्टैंड पहले की तरह ही क्लियर करने वाले बयान का स्वागत किया जाना चाहिए।

    हम अपने अधिकार की बात में भी राजनैतिक पार्टियों के भोपू की तरह बजने लगे है! हम भारतीयों की आदत है पक्ष और विपक्ष चुनने की इस चक्कर में कई बार हम अपना पक्ष भूल जाते है। लोकतंत्र और चुनाव किसी भी देश में वहां की राजनैतिक पार्टियों की बपौती नहीं होते है। भारत में भी नहीं है।

    सत्ता के केंद्र में रहने वाले या फिर सत्ता प्राप्त करने वाले लोगों में कितने लोग है जो वास्तव में जनता के लिए सही नीतियां बनाने के लिए आते है। यह तो जन शक्ति है जो हर पांच साल में आपको सत्ता (शक्ति) से बेदखल कर सकती है यदि यह शक्ति जनता के पास न हो तो इन्हीं लोगों में से कितने लोग अपनी ओढ़ी हुई विनम्रता क्या नहीं छोड़ देंगे। शोषण करने में क्या कोई कोर कसर छोड़ेंगे !

    शक्ति के बदलाव की यह ताकत हमें बहुत ही कम समय के लिए कई वर्षों के बाद मिलती है हमारे वोट से, चुनावी प्रक्रिया से। चुनाव ही है जो हमें हमारा सहीं गलत चुनने की आजादी देता है।

    हमारा किसी पार्टी के पक्ष को समर्थन हमें कितना भी सुरक्षित महसूस करवाता हो, भले ही हमारा कितना भी मन करता हो कि चुनाव की जरूरत ही क्या है बस हमारा फलाना नेता ही सदा सदा के लिए बना रहे, लेकिन वास्तविकता यहीं है कि हमें हमारे इस भाव के मजबूत होने की शक्ति भी चुनने और चुने हुए को हटा देने के अधिकार से ही आती है, आप के पास शक्ति है इसलिए आपके भावों को तसल्ली देना या उन कामों को करना जिनके लिए आपने उन्हें चुना है उनकी मजबूरी है। यदि यह अधिकार न हो तो देव तुल्य नेता जी ठेंगा दिखाने में देर न लगायेंगे।

    भले ही हम अपने अपने पक्ष पर बहुत कट्टरता से जुड़े हो, पसन्द ना पंसद के आधार पर रोज एक दूसरे का सिर फोड़ते हो लेकिन यह अधिकार ही हमसे ले लिया जाए या फिर चुनाव होने का चुने जाने की प्रक्रिया में हमें केवल क्या दिखावे के लिए शामिल किया जाए !


    कांग्रेस जब सत्ता में थी बीजेपी ने EVM का खूब विरोध किया बाकायदा किताब तक लिखीं गई लेकिन सत्ता में मौजूद कांग्रेस के कान पर जूं तक न रेंगी। वहीं जब बीजेपी सत्ता में आई तो कांग्रेस ने हार EVM का रोना रोया, भाजपा ने अब EVM को पाक साफ कर दिया।
    अब ऐसा तो है नहीं कि दोनों ही झूठ बोल रहे हो, दोनों ही सत्ता का स्वाद चख चुके है सो EVM में क्या खेल हो सकता है को भी करीब से जानते होंगे तभी तो सत्ता प्राप्त होते ही EVM दोनों पार्टी के लिए सही हो जाती है और सत्ता जाते ही पहला शक EVM पर जाता है।

    लेकिन हम क्या अपनी शक्ति के लिए क्या केवल राजनैतिक पार्टियों के विरोध या सवाल करने तक ही सीमित है!

    EVM के पक्ष में कुछ और भी तर्क सुनने को मिलते है जिन्हें सुनकर लगता है कि यह लोग अभी जानते ही नहीं है कि भारत में वोटिंग में क्या क्या होता है या जानबूझकर आंख बंद रखना चाहते है, आइए देखते है ऐसे ही तर्कों के पीछे कितनी गहराई है या केवल एक सतही बातों को बहुत बड़ा करके पेश किया जा रहा है-

    वोट गिनने की सहूलियत को बार बार गिनाया जाता है

    पूरी चुनावी प्रक्रिया कई महीने चलती है क्या उतने दिन बिना परेशान हुए लोग काम करते है।
    पुलिस में सिपाही पूरा पूरा दिन भाग दौड़ वाली पब्लिक डीलिंग वाली ड्यूटी करते है। सेना के जवान और न जाने कितने विभागों के लोग दिन रात एक करके अपने अपने काम करते है। 
    यदि फिर भी लगता है कि वोट गिनना जिस भी विभाग के जिम्मे आता है बहुत भारी काम है तो इसके लिए अलग से वैकेंसी निकाली जाए। आप 1000 जगह निकालिए लाखों आवेदन न आए तब कहियेगा।
    और जब किसी भी देश के लिए चुनाव और चुनावी प्रक्रिया का एक दम निष्पक्षता से होना बहुत ही गंभीर मसला हो तो थोड़ी बहुत देर होने में भी क्या बुराई है।

    बैलेट पेपर पर बूथ कैप्चरिंग होती थी 

    जो समय के साथ बहुत हद तक सुधर चुकी थी लेकिन सबको पता है बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग EVM पर भी वैसे ही होती है। बैलेट पेपर में बदलाव में बहुत ही छोटे स्तर पर किसी विधानसभा क्षेत्र के भी एक आध जगह पर ही सम्भव था।
    EVM पर यह खतरा राष्ट्रीय स्तर पर सभी के सभी बूथ पर सम्भव है (यहां रिमोट कंट्रोल , ब्लूटूथ, हैकिंग जैसी टटपूंजिया चीज की बात नहीं हो रही)

    VVPAT से सुधार संभव है 

    VVPAT भी उन खतरों से सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता है जिनकी अभी तक बात होती आई है और यदि गिनती करके ही मिलान करना है तो बैलेट पेपर गिनने में ही क्या बुराई है?
    और यदि गिनती नहीं करनी है, केवल मतदाता को गोली देनी है तो जरूरी नहीं है प्रिंट होकर जो आया हो वहीं इनपुट में गया हो।

    EVM बहुत सुरक्षा में और कैमरों की निगरानी में रहती है
    बैलेट पेपर भी बहुत सुरक्षा और कैमरों की निगरानी में रखे जा सकते है।

    EVM की हैकिंग होने की संभावना बहुत कम है, लेकिन संभावना है। यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में माना है।

    टेक्नोलॉजी को नकारना, विज्ञान में पीछे जाना मूर्खता है और जब ऑनलाइन मनी ट्रांसक्शन और ATM में लोगों को भरोसा हो सकता है तो EVM को भी भरोसे मंद बनाया जा सकता है

    दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। दोनों बिल्कुल अलग चीजे है।मनी ट्रांजेक्शन फ्रॉड पकड़ में आ जाता है क्योंकि  हमें पता होता है कि अकॉउंट में कितना रुपया है, ट्रांजेक्शन हिस्ट्री का रिकॉर्ड रहता है। जबकि EVM में जो भी  संख्या दर्ज हों रही है उसका पता नहीं चल सकता कि डिजिट किस तरह मूव कर रही है या अंको को किस तरह से मूव करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। 
    बैलेट पेपर पर आपको पता है आपका ठप्पा कहीं लग गया तो लग गया। अब कोई पूरा बैलेट बॉक्स ही बदले तो अलग बात है। पूरा बैलेट बॉक्स बदला जा सकता है तो EVM भी बदली जा सकती है।
    लेकिन EVM आपको भरोसा नहीं दे सकती कि आपने जो बटन दबाया है वोट वहीं दर्ज हुआ हो।
    मत दर्ज करने से लेकर परिणाम तक के बीच का छिपाव ही इसका प्रयोग लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बनता है.
    और EVM को इससे अधिक पारदर्शी बनाने का मतलब है मतदाता या चुनाव की गोपनीयता को भंग करना.
    EVM का प्रयोग न करने को विज्ञान में पीछे जाना ऐसे जता दिया जाता है जैसे केवल EVM के प्रयोग न करने के कारण सीधे पाषाण युग में पहुँच जायेंगे। विज्ञान में आगे बढ़ना है तो EVM भी क्यों सीधे मोबाइल आदि से ही मताधिकार का प्रयोग हो जाया करे इतने तामझाम की भी क्या जरूरत है !
    वोटों की गिनती के अलग EVM कोई नई सहूलियत नहीं देता है।
    और केवल गिनती की सहूलियत के लिए लोकतंत्र पर खतरे को नजरंदाज तो नहीं ही किया जा  सकता है.

    चलते-चलते :-

    असल सवाल तो EVM पर हमारा होना चाहिए। भाजपा को सौ साल तक हम चुने या कांग्रेस मुक्त भारत हम करे यह अधिकार जनता के पास हमेशा रहना चाहिए लेकिन जब एक चीज निष्पक्षता, स्पष्टता पर हमें शक है भले ही हमारी मूर्खता के कारण हमें शक है, हम नहीं हुए उतने डिजिटल की मशीन में घुस कर देखे कि कौन से प्रोग्राम चिप किस तरह से काम कर रहे है, एक एक वोट पर डिज़ाइन है या फिर सौ-हज़ार या फिर जो भी संख्या निर्धारित है की वोट संख्या के बाद हर तीसरे या पांचवे वोट पर प्रोग्राम किया हुआ है. चिप ही तो है किसी भी तरह से किसी भी संख्या के बाद से प्रोग्राम कि जा सकती है।
    हो सकता है इलेक्शन कमीशन के प्रमुख तक को न पता हो कहाँ क्या कैसे कब डिज़ाइन किया हुआ है, तब उस चीज को जबर्दश्ती हम पर थोपने का कारण क्या है !

    Nishant Rana


    Nishant Rana

  • लोकतंत्र बिकता है – Vijendra Diwach

    पांच साल में एक बार तमाशा लगता है,
    नेता वोट के लिये घर घर झांकता है,
    ना भाषा का होश ना मर्यादा का तोल
    गुंडे मव्वाली ओढ लेते हैं नेता का रोल
    जनता बजाती ताली है
    जनता ही ऐसे गुंडे खङे करती है।
    तभी तो 
    लोकतंत्र बिकता है।

    वोट के लिये
    लोगों के गले में देशी ठर्रा डाला जाता है,
    थाली में कुत्तों की बोटी,
    जेब में दो चार सौ रुपये की गड्डी,
    इस तरह लोकतंत्र में 
    दो कोङी के भाव इंसान बिकता है,
    कहीं वोट बंदूक लाठी की नोंक पर पङता है,
    लोकतंत्र बिकता है।

    मेरा भारत महान,
    करके सुरापान,
    बेकार कर देता है अपना अमूल्य मतदान,
    अपनी जाति,
    अपने धर्म,
    अपने नाते रिश्तेदार,
    इन सबसे करके लगाव,
    साधने अपने निजी स्वार्थ,
    देता है बुरे लोगों का साथ,
    जीतकर ऐसे फर्जी नेता
    देते हैं झूठे आश्वासन
    और दूर से ही हिलाते हैं हाथ।
    लोकतंत्र बिकता है।

    दिखाकर झूठे सब्जबाग,
    नेता जा टिकता है विधानसभा और संसद में,
    वहां कुत्तों की तरह लङते हैं,
    कुत्ते भी इस नाटक के आगे पानी भरते हैं,
    नेता ऐसे ही जनता की कमाई खर्च करते हैं।

    हे विद्वान देशवासियों!
    आप चुनावी मौसम में
    पाकर दारु की बोतल,
    लेकर हजार पांच सौ रुपये,
    मदमस्त होकर होश ना खोइये,
    ये चुनावी मौसम तो
    चार दिन की चांदनी है
    फिर अंधेरी रात है,
    इसलिये भारत का भविष्य न बिगाङिये।

    ऐसा ही ढर्रा यदि चलेगा,
    जनता को नेता ऐसे ही छलेगा,
    अपने कर्त्तव्य और अधिकार के लिये
    अब भी न जागे तो 
    देश सामंतवादिता से ही चलेगा,
    जागो, नहीं तो लोकतंत्र बिकता है 
    और बिकता रहेगा।

    Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

  • अहंकार हार गया और राहुल जीत गए –Firdaus Khan

    अहंकार को एक दिन टूटना ही होता है। अहंकार की नियति ही टूटना है। इतिहास गवाह है कि किसी का भी अहंकार कभी ज़्यादा वक़्त तक नहीं रहा। इस अहंकार की वजह से बड़ी-बड़ी सल्तनतें नेस्तनाबूद हो गईं। किसी हुकूमत को बदलते हुए वक़्त नहीं लगता। बस देर होती है अवाम के जागने की। जिस दिन अवाम बेदार हो जाती है, जाग जाती है, उसी दिन से हुक्मरानों के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं, उनका ज़वाल (पतन) शुरू हो जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी यही तो हुआ। यहां अहंकार हार गया और विनम्रता जीत गई। चुनाव नतीजों वाले दिन शाम को हुई प्रेस कॊन्फ़्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि हम किसी को देश से मिटाना नहीं चाहते। हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे। मैं मोदी जी का धन्यवाद करता हूं, जिनसे मैंने यह सीखा कि एक पॉलिटिशियन होने के नाते मुझे क्या नहीं कहना या करना चाहिए।

    ये राहुल गांधी का धैर्य, विनम्रता और शालीनता ही है कि उन्होंने विपरीत हालात का हिम्मत से मुक़ाबला किया। जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए गए, चुनावों में नाकामी मिलने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया गया, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने कभी अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी, अपने संस्कार नहीं छोड़े। उन्होंने अपने विरोधियों के लिए भी कभी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने मिज़ोरम और तेलंगाना में जीतने वाले दलों को मुबारकबाद दी। चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को शुभकामनाएं दीं। अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ। विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकर्ता बब्बर शेर हैं। राहुल गांधी में हार को क़ुबूल करने की हिम्मत भी है। पिछले चुनावों में नाकामी मिलने पर उन्होंने हार का ज़िम्मा ख़ुद लिया। ये सब बातें ही तो हैं, जो उन्हें महान बनाती हैं और ये साबित करती हैं कि उनमें एक महान नेता के सभी गुण मौजूद हैं।

    अमूमन देखा जाता है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है, तो उसे घमंड हो जाता है। राजनेता बेलगाम हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता उनकी मुट्ठी में है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उन्हें टोकने, रोकने वाला कोई नहीं है। साल 2014 के आम चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्हें ख़ूब सब्ज़ बाग़ दिखाए थे, लेकिन सत्ता में आते ही अपने वादों से उलट काम किया। भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी। भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले मामले सामने आने लगे। भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। किसानों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है। जो लोग काम कर रहे थे, वे भी रोज़ी-रोटी के लिए तरसने लगे। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है। ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के मुताबिक़ पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है। राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया था। ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला करते रहे हैं। इतना ही नहीं भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल लड़ाकू विमान सौदे पर भी राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

    दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र की मोदी सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है। वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है। खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं। मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है। दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं। ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है। सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है। वैसे भी प्रधानमंत्री ख़ुद कह चुके हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है।

    ऐसे मुश्किल दौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अवाम के साथ खड़े हैं। वे लगातार बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अलख जगाए हुए हैं। अवाम को भी समझ में आ गया है कि उनसे झूठे वादे करके उन्हें ठगा गया। इसलिए अब जनता उन वादों के बारे में सवाल करने लगी है। जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था। कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था। कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके भारत में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे।

    अवाम अब जागने लगी है। इसी का नतीजा है कि उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंका और कांग्रेस को हुकूमत सौंप दी। अवाम राहुल गांधी पर यक़ीन करने लगी है। वह समझ चुकी है कि कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रख सकती है। कांग्रेस के राज में ही सब मिलजुल कर चैन-अमन के साथ रह सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस विनाश में नहीं, विकास में यक़ीन रखती है। जनता अब बदलाव चाहती है।

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    Gourang

    अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने लगा। अजीब स्टेशन है, इस वक्त भी भीड़ बेशुमार है। लोग जगह बनाते हुए तेजी से गुजर रहे हैं। एक उम्र दराज औरत मुझसे तेज निकलकर आगे चली गई। जाते जाते बड़बड़ाई – ‘स्टेशन कोई टुरिस्ट प्लेस नहीं कि आराम से चलो, लोग समझते नहीं।’ इससे पहले कि मैं समझता यह डायलॉग किसके लिए गिफ्ट है, एक चालीस के करीब औरत ने ट्राली बैग से मुझे धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बचा। वो बड़बड़ाई – ‘लगता है मैं स्टेशन में चलने का कोचिंग सेंटर खोल दूँ, खूब चलेगा।’ मैं अभी इस सदमें गोता खा ही रहा था कि टिकट कलेक्टर ने मुझे टोक दिया – “ए जरा टिकट दिखाईये।” 
    मैं और हड़बड़ाया। चालीस के करीब औरत ने फिर कहा – “टिकट बाबू, जरा ठीक से टाइट करियेगा, बहुत स्मार्ट बन रहा है।” 
    टिकट कलेक्टर मुझ पर और ज़ोर देकर देखा और बोला – ‘निकालो, निकालो।’ 
    मैं हकलाया फिर बोला – “मैं तो धन्य हो गया, इतने दिनों में पहली बार किसी ने टिकट देखने की मर्जी दिखाई।”
    वो बोला – “साईड में आओ।” 
    मैं उसके साथ किनारे पर आ गया। फिर मोबाइल निकालकर एम-टिकट दिखाया। वह चिढ़ गया और बोला – “टिकट है तो इतना नाटक क्यों किया?” 
    “कितना नाटक?” मैंने मजा लेते हुए कहा। 
    वह घूर कर मुझे देखा। मैंने उसकी परवाह न करते हुए बोला – “उस लड़की के पास टिकट नहीं थी, तुम गलत चुनाव कर बैठे।” फिर मैं लंबे डग भरते निकल आया। मुझे खूब अंदाजा था कि मेरे पीठ पीछे टिकट कलेक्टर के आँखों से अंगार निकल रहे होंगे।

    स्टेशन के बाहर आकर मैंने प्री पैड टैक्सी के काउंटर पर लाईन लगाई। पर कोई भी टैक्सी मौजूद नहीं थी। काउंटर बॉय बोला – “इंतजार करिए।” 
    मैंने आसमान की ओर देखा। बादलों ने तारों को छुपा लिया था। टैक्सी के न मिलने की वजह समझ आई। एक तो रात फिर बारिश के अंदेशे ने शहर को थमा दिया था। 
    कुछ सोचने के बाद मैंने मोबाइल निकाला, उबेर पर लोकेशन टाइप कर रिक्वेस्ट डाल दिया। आस पास कोई भी टैक्सी न दिखी ऐप्प में। समय कोई बीस मिनट। खैर, वही सही। मैंने कन्फ़र्म कर दिया। कोई आठ मिनट में सुमन नाम दिख गया, टैक्सी नंबर भी उभर आया। मैंने कॉल नंबर ढूंढ कॉल कर दिया। रिंग होता रहा पर उधर से उठाया नहीं। ऐसा ही होता है, शहर को अभी न्यूयार्क होने में बरसों देरी है। फिर मैंने आसमान की ओर देखा, बिजली चमकने शुरू हो गए थे। भीड़ बारिश देख स्टेशन कॉम्प्लेक्स पर ही ठहर गई थी। अभी मैं दुबारा रिंग करने ही वाला था कि बूँदा बाँदी शुरू हो गई। फिर बादल भी गरजने लगे। कुछ देर मैं ठिठका। अभी वापस स्टेशन कॉम्प्लेक्स में लौट जाऊँ कि नहीं सोच ही रहा था, ठीक तभी टैक्सी वाले ने कॉल बैक किया। क्या आश्चर्य !! यह तो पहली बार हुआ। मैंने कॉल रिसीव किया और कड़कते हुए पूछा – “कहाँ पर हैं?” इनसे कड़क व्यवहार ही काम आता है। 
    उधर से एक घरघराती सी आवाज आई – “ऐप्प आपसे दस मिनट की दूरी दिखा रहा है। उधर बारिश शुरू हो गई?” आवाज कुछ पतली सी थी। बारिश की आवाज में सुनने में तकलीफ हो रही थी। 
    मैंने रूखा सा जवाब दिया – “हाँ। मैं इधर शेड पर खड़ा हूँ।” मैं शेड की ओर बढ़ता हुआ बोला। 
    उधर से फिर आवाज आई – “दस मिनट।” और कॉल कट गई। 
    बारिश ज़ोरों से शुरू हो गई थी। इंतजार के अलावा और कुछ बचा न था। मैं मोबाइल पर मेसेज स्क्रोल करता हुआ वक्त काटने लगा। कुछ देर बाद एक टैक्सी थमने की आवाज आई। मैंने सर उठाया। नंबर वही था। किसी तरह दौड़कर बारिश में भींगते हुए मैं टैक्सी में बैठा। ड्राइवर ने कन्फ़र्म किया – “गौरांग? लोकेशन गड़िया? 
    मैं चौंककर सर उठाया। अब पतली आवाज का रहस्य खुला। वो कोई तीस साल की औरत थी। मेरा मुँह खुला रह गया। मैं बस पूछा – “आप?”
    “कोई तकलीफ?” आवाज आई। 
    मैं संभला और बोला – “नहीं।” चलिये।” अब मेरी आवाज नरम और मीठी थी। 
    मैंने बैक मिरर पर नजर डाली। वो भी मुझे ही देख रही थी। अच्छी सूरत थी। पर सूखी सी थी। शायद रात को खाया न हो, मैंने सोचा। मुझे याद आया, खाया तो मैं भी नहीं था।। मैंने गौर किया, बारिश में वो दक्षता से ड्राइव कर रही थी। मैं मुस्कुराया। वो नहीं मुस्कुराई। मुझे तकलीफ हुई। 
    मैं धीरे से बोला – “सॉरी।” 
    “किस बात का?” वो पूछी। 
    “मेरी आवाज बहुत रूखी थी। दरअसल किसी और का गुस्सा आप पर निकल आया।” मैंने संजीदगी से कहा। अब वो मुस्कुराई। तभी गाड़ी रेड सिग्नल पर खड़ी हो गई।
    “इतनी रात गए गाड़ी चलाते आपको………” 
    उसने बात बीच में ही काट दिया – “लड़की हूँ, टैक्सी ड्राइवर हूँ, मर्दाना काम है। देर रात के झमेले हैं। अच्छे बुरे पसिंजर भी मिलते हैं। ऑड लोकेशन्स भी होते हैं। सब है। पर मेरा पेशा मेरा चुना हुआ है, चैलेंज है तो है। सबको बार बार जवाब देते देते थक जाती हूँ।” मैं हड़बड़ाया। मैं फिर मुस्कुराया। मगर वो फिर नहीं मुस्कुराई। 
    सिग्नल हरा हो गया। उसने गियर बदला, ऐक्सिलेटर पर दबाव डाला। गाड़ी सड़क पर फिसलने लगी। खामोशी ने पाँव पसार दिये। 

    कुछ दूर जाते ही मुझे दूर से वह डॉमिनो का काउंटर दिख गया। मुझे पता था, यह देर रात तक खुला रहता है। मैं चिल्लाया – रोको, रोको। गाड़ी बाएँ रोको।” 
    वो हड़बड़ाते हुए कस कर ब्रेक मार गाडी साईड में खड़ी कर पूछी – “क्या हुआ?” 
    मैं डॉमिनो की ओर इशारा कर बोला – “बस एक मिनट। बहुत भूख लगी है।” वो कुछ गुस्सा, कुछ निराशा भाव लिए देखी। मगर कुछ बोली नहीं। मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए उसे देखा, वो अपने होठों पर जीभ फिरा रही थी। 
    बारिश घट गई थी। बस कुछ बूँदा बाँदी ही चल रही थी। कोई दस मिनट में मैं लौटा। वो बहुत गुस्से में दिखी। इसके पहले कि कुछ कहती मैं उसे एक पैकेट और कोक के बोतल पकड़ाते हुये कहा – “बस दो मिनट ही लगेंगे। ये उन्होंने गर्म कर दिये हैं।” वो अब मुझे आश्चर्य से देखने लगी। 
    मैं अब पूरे अधिकार से कहा – “जल्द खा लीजिये। लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही भूख लगती है।” उसने अब थाम लिया। उसके चेहरे की शिकन अब मिट चुकी थी। मैं अंदर बैठ खाने लगा और उसे मिरर में देखा। वो संतोष से खाने लगी, आँखें पनियाई हुई थी। वो भी सचमुच बहुत भूखी थी।

    कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी। मैं बाहर रात के शहर को देखने लगा। अधिकतर दुकानें बंद ही थी। बत्तियों से रोशन सड़कें, बड़े बड़े होर्डिंग्स सब तेजी से गुजरने लगे। अचानक मैंने महसूस किया, वो मुझे मिरर से देख रही थी। मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराई। मैं मुस्कुराया। फिर मैं रात के शहर को देखने लगा। कुछ देर बाद मेरा डेस्टिनेशन आ जाएगा। 

    यूँ ही सोचते सोचते ओवर ब्रीज क्रॉस हो गया। अचानक मैंने देखा वो मुझे फिर मिरर से देख रही थी। मैंने भी उसे फिर मिरर में देखा। मैं मुस्कुराया। वो झेंप कर मुस्कुराई जैसे चोरी पकड़ी गई हो। मैं भी मुस्कुराया। अब हम दोनों मुस्कुराते हुए मिरर में ही देखने लगे। वो कभी सड़क तो कभी मिरर पर देख रही थी। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
    कुछ देर बाद अचानक गाड़ी रुक गई। मैंने मिरर में सवालिया निगाहों से देखा। वो हँसी और बोली – “कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं।” 
    मैंने देखा, मेरा डेस्टिनेशन आ चुका था। टैक्सी से निकल उसके पैसे चुकाए। फिर उसकी आँखों में झाँक उसे कहा – “थैंक्यू।” वो भी मेरी नजरों से नजर मिलाई और सर हिलाई। 
    मैं घूमकर अपने कैंपस की ओर जाने लगा। कुछ दूर जा अचानक मुझे सुनाई दिया – “सुनिए!” 
    मैं सुन घूम खड़ा हुआ। वो पूछी – “आपकी शादी हो गई है?”
    मैं मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया। थोड़ी देर मुझे देखने के बाद वो भी मुस्कुराई और सर हिलाई। मैं खड़ा रहा।

    टैक्सी स्टार्ट हुई और तेजी से निकल गई।

    Gourang


    Gourang

  • मैं तुम हूँ

    मैं तुम हूँ

    Puneet Shukla

    मैं तुम्हें जानता हूँ
    मैं उसे भी जानता हूँ
    मैं सबको जानता हूँ।

    तुम उसे जानते हो
    तुम मुझे नहीं जानते
    तुम मुझे जान ही नहीं सकते।

    तुम मुझे नहीं जानते, 
    इसका मतलब यह नहीं कि तुम असमर्थ हो
    दरअसल मुझे जाना ही नहीं जा सकता।

    मुझे देखना
    तुम्हें देखना है
    तुम तुमको नहीं देख सकते।

    जो न देखा जा सके
    जो न जाना जा सके
    वह मैं हूँ।

    जहाँ शब्द मौन हो जाएँ
    जहाँ इन्द्रियाँ जवाब दे जाएँ
    वहाँ मैं हूँ।

    तुम 
    अपने तक पहुँच जाओ
    तो मुझ तक भी पहुँच जाओगे।

    मैं 
    वह सुगन्ध हूँ
    जो पुष्प के अन्तर में है।

    मैं 
    तुम 
    हूँ।

    Puneet Shukla

  • विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    Sanjay Shramanjothe

    एक दिन पश्चिम का विज्ञान भारत घूमने आया. भारत के ज्ञानपुर में आते ही उसने भारत की “संस्कृति देवी” और भारत के “इतिहास बाबू” को कुश आसन पर पद्मासन में बैठे गहन धार्मिक (गधा) विमर्श करते हुए देखा. ये दोनों जुड़वा भाई बहन थे.

    थोड़ी देर उसने उनकी बातें सुनने की कोशिश की लेकिन संस्कृत भाषा के सूत्रों और मन्त्रों से भरी बातचीत वो समझ न सका. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने नवागंतुक को देखकर नमस्कार किया और उनका आपस में परिचय हुआ.

    विज्ञान से पूछा गया कि आप कहाँ से आये हैं आपका वर्ण कुल गोत्र और जाति क्या है?

    विज्ञान ये प्रश्न समझ नहीं सका… वर्ण जाति कुल गोत्र आदि के महान भारतीय आविष्कारों से परिचित न था।

    लेकिन संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने जिद पकड़ ली उन्होंने कहा कि “भद्रपुरुष जब तक हम वर्ण गोत्र और जाति न जान लें तब तक हमारी धमनियों में रक्त जमा रहता है, हमारा भोजन नहीं पचता हमारा मल मूत्र विसर्जन भी रुक जाता है”

    ऐसी भीषण अवस्था देखकर विज्ञान को दया आई, वो बोला “मैं पश्चिम देश से आया हूँ मेरे पिता का नाम प्रयोग और माता का नाम जिज्ञासा है. मैं असल में वर्ण संकर हूँ मेरे माता पिता के अन्य कई मित्र सहयोगी हैं जो एकसाथ रहते हैं, कौशल, साहस, सहकार, सभ्यता और खोज और आविष्कार ये सब हमारे परिवार में इकट्ठे रहते हैं, आप समझ लें मैं इन सबको माता पिता समान समझता हूँ”

    अब वर्ण संकर शब्द सुनते ही भारतीय संस्कृति और इतिहास ने नाक भौं सिकोड़ ली लेकिन ऊपर ऊपर सभ्य बने रहे, भारतीय मेजबानों को ये बात समझ न आई कि ये “प्रयोग” क्या होता है और “जिज्ञासा” क्या होती है, साहस, सहकार सभ्यता भी उनके लिए बिल्कुल नए नाम थे. फिर भी वे मूढ़ नजर नहीं आना चाहते थे इसलिए बनावटी हसी हंसते हुए बोले “अच्छा अच्छा हम इन्हें जानते हैं, खूब जानते हैं”.

    विज्ञान ने साहस बटोरते हुए मेजबानों के माता पिता का नाम पूछा तो दोनों मेजबान बोले “हमारे माता पिता दोनों एक ही हैं, न सिर्फ माता पिता बल्कि वे ही हमारे दादा दादी पितामह महापितामह इत्यादि भी हैं, वे ही हमारे अतीत हैं और वे ही हमारे भविष्य भी हैं.”

    अब विज्ञान चक्कर खाकर गिरने को हुआ. उसने पूछा ये क्या गजब की बात कर रह हैं आप ऐसा कैसे हो सकता है?

    संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बड़ी सयानी हंसी हँसते हुए बोले “महाशय आप इस पुण्यभूमि पर नए नए आये हैं अभी तो चमत्कारों की शुरुआत भर है”. विज्ञान हाँफते हुए बोला कि ठीक है मैं सदैव नए ज्ञान को सीखने का प्रयास करता हूँ अब कृपया अपने माता पिता का नाम तो बताइये. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने दोनों हाथों से अपने कान छूते हुए आँख बंद करके एक स्वर में कहा “पुराण हमारी माता है और पुराण ही हमारा पिता है, वही अतीत है वही भविष्य भी है”

    विज्ञान ने ये “पुराण” शब्द पहली बार सुना था, वो सहज जिज्ञासा करते हुए पूछने लगा कि ये उभयलिंगि प्राणी हमारे देश में नहीं होता ये प्राणी, मतलब अपने माता पिता करते क्या हैं? मेजबान बोले “ वे स्वयं कुछ नहीं करते बल्कि जो कुछ भी दूसरों का किया धरा है उसे अपने श्रीमुख से संस्कृत सुभाषित बनाकर बोल देते हैं. वे जो बोलते हैं उसी को हम वचनामृत समझकर गृहण करते हैं और उसी का चरणामृत इस पुण्यभूमि पर बांटते निकल पड़ते हैं”

    विज्ञान की उत्सुकता बढती गयी. उसने कहा कि ये तो गजब की बात है क्या आप मुझे पुराण जी से मिलवा सकते हैं? संस्कृति देवी और इतिहास बाबु बोले “हाँ-हाँ क्यों नहीं वे अभी लोटा लेकर जंगल मैदान गए हैं निपट के आ जाएँ फिर यहीं बैठकर तत्वचर्चा करते हैं”

    पांच मिनट बाद ही पुराण महाशय ढीली धोती, खडाऊ, लोटा और जनेऊ संभाले हुए और संस्कृत मन्त्र बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे. उनके आज्ञाकारी पुत्र-पुत्री ने उनके चरण स्पर्श किये. विज्ञान ने उनसे हाथ मिलाना चाहा

    लेकिन मंत्रपाठी पुराण जी ने दूर से ही नमस्कार किया और जींस टीशर्ट पहने खड़े इस गौर वर्ण युवक को घूरने लगे. इतिहास बाबू ने परिचय दिया “ये विज्ञान महाशय हैं, पश्चिम देश से आये हैं. सौभाग्यवती जिज्ञासा देवी और चिरंजीव प्रयोग बाबु के सुपुत्र हैं यहाँ पुण्यभूमि पर आपसे तत्वचर्चा कर धर्मलाभ लेने आये हैं”

    जिज्ञासा और प्रयोग का नाम सुनकर पुराण जी भी कुछ समझ न पाए लेकिन विश्वगुरु की गर्वीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले “अच्छा अच्छा … जिज्ञासा और प्रयोग … जानते हैं … खूब जानते हैं इन्हें … ये पहले भारत वर्ष में ही रहते थे, यहीं अपने सत्यनारायण महाराज के मंदिर के पीछे वाली गली में. हमने इन्हें अपनी गोद में खिलाया है” …

    विज्ञान बाबु ये सुनकर गदगद हो गये कि चलो परिचय का कोई तो सूत्र निकल आया, लेकिन वे इस चमत्कार को समझ न सके. वहीँ संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने अपने पिता के दुबारा चरण छुए और अपने चमत्कारी पिता पर गर्व से फूल बरसाए…

    क्रमशः…

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    Pushpraj

    भारतीय पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र और भारत के लोक की रक्षा करनी है तो इस पत्रकारिता को अपने आईकॉन चुनने होंगे। भगत सिंह के लेख छापने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह की शहादत के दो दिन बाद ही अपनी शहादत क्यों दी थी।क्या प्रताप के संपादक अपने एक स्तंभकार की शहादत से प्रेरित होकर दंगाईयों के सामने खड़े हो गए थे।अगर भगत सिंह ही गणेश शंकर विद्यार्थी की  शहादत के प्रेरक थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी और भगत सिंह को अपना हीरो मानने वाले मुफस्सिल पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की शहादत को भारतीय पत्रकारिता किस तरह भुला सकती है। मैं पत्रकारिता के नियंताओं से करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूँ कि सिरसा में 21 नवंबर 2002 को हर हाल में सच कहने की जिद में शहीद हुए पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के शहादत दिवस को “पत्रकारिता प्रेरणा दिवस” के रूप में आयोजित किया जाए। शहीद छत्रपति के शहादत की 16 वीं वर्षी पर सिरसा(हरियाणा) में छत्रपति के अनुगामियों की ओर से एक स्मृति सभा जरूर आयोजित है पर भारतीय प्रेस परिषद, भारत के पत्रकार संगठन, संस्थान छत्रपति से अब तक अनजान क्यों हैं?

    अपनी शहादत के बाद 15 वर्षो बाद रामचन्द्र छत्रपति पिछले वर्ष 2017 के अगस्त माह में तब मुख्यधारा की मीडिया में चर्चे में आए थे, जब हरियाणा में देवताधारी-बलात्कारी को जेल भेजा गया था।तथाकथित देवता गुरमीत (राम-रहीम) के जेल जाने के बाद जिस तरह की हिंसा भड़काई गई और जिस तरह हिंसा को रोकने के लिए सेना की मदद ली गई, यह वाकया दुनियाँ की मीडिया में जितना चर्चित हुआ। काश, इस तथाकथित देवता को पहली बार बलात्कारी घोषित करने वाले रामचन्द्र छत्रपति की आवाज उनकी शहादत के बाद सुन ली गई होती। अंग्रेजी पत्रकारिता पर आरोप है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अक्सर भारत की समस्याओं को अंग्रेज हुकूमत की तरह देखती है। लेकिन हम पूछते हैं कि हिंदी पत्रकारिता ने 16 वर्ष पूर्व सिरसा में शहीद हुए एक पत्रकार की शहादत को तब राष्ट्रीय महत्व क्यों नहीं प्रदान किया था।साध्वियों के साथ बलात्कार, साध्वी के भाई की हत्या,बलात्कार को उजागर करने वाले पत्रकार की हत्या,400 साधुओं को नपुंसक बनाने के सिद्ध हो चुके आरोपों के अभियुक्त राम रहीम को क्या भारतीय मीडिया अभी भी दुनियाँ का सबसे बड़ा खूनी राक्षस घोषित करने के लिए तैयार है?दुनियाँ में क्या इससे बड़े क्रूर, हवशी, राक्षस की कथा आपने सुनी है? क्या देवी-देवताओं वाले राष्ट्र में मीडिया के आकाओं के दिल में इस बलात्कारी -बाबा के प्रति कोई आस्था कायम है? भारत के नारीवादी संगठन जो मीटू अभियान में ज्यादा जोर लगा रहे हैं, वे सिरसा के इस मामले को दुनियाँ का सबसे बड़ा बलात्कार कांड घोषित करने में मुहूर्त का इंतजार क्यों कर रहे हैं?

    मैं 2003 में पहली बार मेधा पाटकर के साथ जनांदोलनों की एक राष्ट्रव्यापी यात्रा के दौरान सिरसा पहुँचा था तो प्रसिद्ध समाजशास्त्री योगेंद्र यादव जो हरियाणा में यात्रा के मगर्दर्शक थे, उन्होंने तब बताया था कि “सिरसा में हमारे मित्र रामचन्द्र छत्रपति ने इस तरह सच लिखने की जिद के साथ अपनी शहादत दी है।”मुझे तब यह जानकारी भी मिली कि तत्कालीन भारत के प्रसिद्ध संपादक प्रभाष जोशी ने रामचन्द्र छत्रपति की शहादत के बाद सिरसा की यात्रा की है और छत्रपति के कातिलों को ललकारते हुए कहा है कि “हमारी पत्रकारिता के समक्ष छोटे-छोटे हिटलर खड़े हैं, अगर हम इन हिटलरों से युद्ध नहीं रचेंगे तो हमारी यह प्यारी पत्रकारिता नष्ट हो जाएगी”।प्रभाष जोशी की चेतावनी को हमने अपनी चुनौती मान ली और हम 15 वर्षों से सिरसा को बकोध्यानम देख रहे हैं। 2004 में हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक मृणाल पाण्डेय ने अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ में मेरा आलेख प्रकाशित कराया था, जिसकी हजारों प्रति तब हरियाणा में पाठकों की माँग पर अलग से भेजी गई थी। उस विशिष्ट आलेख का शीर्षक था-“रामचन्द्र छत्रपति की शहादत का मतलब पूरा सच।”संपादकीय पृष्ठ की अपनी सीमा होती है, बावजूद किसी हिंदी अख़बार ने पहली बार छत्रपति की शहादत को इस तरह प्रस्तुत किया था।मैंने 2004 में राम रहीम के सच्चा सौदा डेरा के अंदर प्रवेश करने का साहस जुटाया था। मैंने डेरा के अंदर एक-एक हिस्से को अपनी आँखों से देखने की कोशिश की थी पर देवता के गुफा के बाहर आकर मेरे कदम रूक गए थे या सिहर गए थे। देवता के मायालोक में तमाम विहंगम दृश्य, तिलिस्म, चमत्कार देखने के बावजूद मैंने गुफा द्वार से लौटकर आज से 14 वर्ष पूर्व जो डायरी लिखी थी, उसके कुछ हिस्से को रामबहादुर राय के संपादकत्व मेधा प्रथम प्रवक्ता और योगेंद्र यादव के संपादकत्व वाले सामयिक वार्ता ने प्रकाशित किया था। छत्रपति की शहादत के एक दशक पूरे होने पर संतोष भारतीय ने चौथी दुनियाँ में उस सिरसा डायरी को अक्षरशः प्रकाशित किया था, बावजूद मैं दावे के साथ कह रहा हूँ कि मेरी उस सिरसा डायरी को गंभीरता से नहीं लिया गया।शायद इस मान्यता की वजह से भी कि शहादत को पत्रकारिता का वसूल नहीं बनाना चाहिए या इस वजह से कि जिन्हें देवता मानकर राष्ट्र के प्रधानमंत्री नमन करते हों, उनके भाल पर हमारी पत्रकारिता की वजह से कोई खरोंच ना आए।

    रामचन्द्र छत्रपति खेती-किसानी से जुड़े एक मुफस्सिल पत्रकार थे। उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के लिए जिला संवाददाता का कार्य किया था। वे संवाददाता के रूप में अपने शहर सिरसा स्थित “सच्चा सौदा डेरा” के झूठ को विशेष महत्व देना चाहते थे। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अपने प्राथमिक विषय को प्राथमिकता ना मिलने की वजह से उन्होंने खेती-किसानी के पसीने की ताकत से वर्ष 2000 में दैनिक समाचार पत्र”पूरा सच” की शुरूआत की थी। 30 मई 2002 को “पूरा सच” में छपा था -“धर्म के नाम पर किए जा रहे हैं,साध्वियों के जीवन बर्बाद”। इस खबर ने हरियाणा-पंजाब की वादियों में तूफान मचा दिया था। डेरा भक्तों के द्वारा हरियाणा-पंजाब के शहरों में हो रहे हिंसा के  प्रभाव में चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरा सच की इस खबर के आधार पर सीबीआई जाँच का आदेश दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह एक अविस्मरणीय अध्याय है कि एक मुफस्सिल अखबार की खबर के आधार पर उच्च न्यायालय ने स्वतः स्फूर्त सीबीआई जाँच का आदेश दिया हो। इस घटना के बाद भी “पूरा सच” के संपादक की सुरक्षा के प्रति राज्य ने कोई सुध नहीं ली। रामचन्द्र छत्रपति को राम रहीम के द्वारा नियुक्त अपराधियों ने गोली मारी, शासन ने बेहतर ईलाज की जिम्मेवारी नहीं ली औऱ हमले के 27 दिन बाद 21 नवम्बर को छत्रपति ने अपोलो दिल्ली में दम तोड़ दिया। छत्रपति की हत्या के नामजद अभियुक्त गुरमीत राम-रहीम ने इस हत्या के विरूद्ध सीबीआई जाँच को बार-बार रोकने व प्रभावित करने की कोशिश की पर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति के अनुरोध पर न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर  सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए तो अब सारी गवाहियों के बाद साध्वी बलात्कारों के अभियुक्त गुरमीत जल्दी ही छत्रपति की हत्या के अभियोग में 20 वर्षों की जेल या फाँसी की सजा पाने के लिए मजबूर होंगे। छत्रपति के न्याय के संघर्ष में विश्वास है कि जल्दी ही जीत हासिल हो।

    Ramchandra Chhatrapati (In Portrait) and His Son Anshul Chhatrapati

    “पूरा सच” के संस्थापक संपादक ने ढाई साल की छोटी सी अवधि में अपने अखबार को बहुत लंबी उमर दे दी। पुत्र ने संपादक पिता के बताए नक्से कदम पर अख़बार के संपादन के साथ-साथ मुकदमे की पैरवी को एकसूत्री लक्ष्य मान लिया। पूरा सच डेरा के कुकृत्यों को लगातार उजागर करता रहा। शहादत की विरासत पर खड़े अख़बार ने कभी मुड़ कर देखना जरूरी नहीं समझा। गुरू गोविंद सिंह जी का रूप धारण कर भक्तों को अमृत छकाने की खबर को भी पहली बार अंशुल छत्रपति के संपादन में पूरा सच ने ही उजागर किया। लेकिन अंशुल ने अपनी सुरक्षा के प्रति सावधानियां बरती। पूरा सच ने ही एक कामपिपासु बाबा के हवस में 400 साधुओं को नपुंसक बनाने की खबर को पहली बार उजागर किया। अंशुल ने विवेकपूर्ण सावधानी यह बरती की कि कभी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर अपने किए से कीर्तिमान प्राप्ति करने की चेष्टा नहीं की।साध्वी बलात्कार मामला, अपने पिता की हत्या,साध्वी के भाई की हत्या सहित साधु नपुंसक मामलों में अलग-अलग सीबीआई जांच के लिए गवाही जुटाने, योग्य अधिवक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी अंशुल ने अपने कंधे पर ली।जिम्मेवारियों के वजन से अंशुल का कंधा ना टूटा पर अंशुल का घर बिक गया। पूरा सच को अर्थाभाव की वजह से 4 साल पहले बंद करना पड़ा है।जो पत्रकारिता को सबसे कमजोर की आवाज मानते हैं, उनके लिए रामचन्द्र छत्रपति बेहतर आईकॉन हो सकते हैं। मैंने अपने आईकॉन से आपको परिचित कराया।यहाँ दुनियाँ की सबसे ऊँची मूर्ति तो आपको नहीं मिलेगी, दुनियाँ के सबसे बडे सेक्स स्कैंडल को उजागर करते हुए शहादत देने वाले एक संपादक की कीर्ति मिलेगी। पत्रकारिता को बदलने की लीक दिल्ली से नहीं, सिरसा से शुरू होती है। मेरे लिए सिरसा इस समय पत्रकारिता का तीर्थ हो चुका है, आईये आप भी मेरे तीर्थ को अपना तीर्थ बनाइये।

    आनंद बाजार के पत्रकार सुब्रतो बसु को 2018 का रामचन्द्र छत्रपति सम्मान

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के सुधि प्रशंसक पिछले 8 वर्षों से भारत में साहित्य और पत्रकारिता में जन-प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध लेखक-पत्रकारों को रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में “छत्रपति सम्मान” से सम्मानित करते हैं। सिरसा के प्राध्यापक, अधिवक्ता, साहित्यकारों की पहल पर गठित “संवाद सिरसा” ने 2010 से छत्रपति के शहादत दिवस के अवसर पर सिरसा में छत्रपति की स्मृति सभा आयोजित कर छत्रपति सम्मान देने की परंपरा कायम की है। प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर 2012 में छत्रपति सम्मान से सम्मानित हुए थे। कुलदीप नैयर के साथ-साथ रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी, उर्मिलेश, गुरदयाल सिंह, जगमोहन सिंह छत्रपति सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। सुब्रतो बसु को बिहार में सरिता -महेश की शहादत से पूर्व उनके सामाजिक कर्म को आनन्द बाजार में पहली बार कवरेज करने के लिए ” IFJ Award” मिल चुका है। सुब्रतो आनंद बाजार कोलकाता में स्थानीय क्षेत्रीय संपादक हैं और इन्होंने अपने अखबार में रामचन्द्र छत्रपति की शहादत से जुड़ी पृष्ठभूमि को कई किस्तों में लिखा था।

    कुलदीप नैयर को सिरसा आने से रोकने के लिए गुप्तचर एजेंसियों के द्वारा सूचना भिजवाई गई थी। कुलदीप नैयर के सम्मान प्राप्त कर दिल्ली पहुंचने के बाद डेरा भक्तों ने सिरसा में गुरुद्वारा के ग्रंथी की गाड़ी में आगजनी क़र शहर में कर्फ्यू कायम करवाया था। कुलदीप नैयर ने सिरसा में अभिभूत होकर कहा था-मैं छत्रपति को भारतीय पत्रकारिता के भीतर भगत सिंह की तरह देख रहा हूँ इसलिए कि मैंने लाहौर में भगत सिंह के शहादत स्थल पर खड़ा होकर जिस तरह महसूस किया था,उसी तरह का अहसास आज सिरसा आकर महसूस हो रहा है।

    पुष्पराज

    जनांदोलनों को लिखने वाले यायावर पत्रकार और चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक