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  • गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज हजारों सालों से यौनिक नैतिकता का पाठ पढ़ाता आया है। भारतीय समाज अलग अलग तरीकों से, धूर्तता से यौनिकता को सुरक्षित करता आया है.

    हम यौन शुचिता के नाम पर स्त्री को इतना संस्कारित कर चुके है कभी जौहर के रूप में कभी सती प्रथा के नाम पर स्वयं को जलाती आई है। और यदि कोई शारीरिक पीड़ा के कारण ही सही इस संस्कार से बाहर आना चाहती रही उन्हें हम स्वयं ही आग में झोकते आये है।

    यौन शुचिता के नाम पर हमने विधवाओं को भयंकर उत्पीड़न की स्थिति में डाला, यह यौन नैतिकता का ही पाठ था जिसने उन्हें उस स्थिति को स्वीकार करना बनाया। ऐसी स्थिति में भी यदि कोई महिला अपनी शारीरिक जरूरतों के कारण किसी के साथ सम्बन्ध बनाती भी है तब भी वह जो नैतिकता उसके अंदर प्रतिष्ठित है के कारण अपने आप को पाप का भागीदार समझती है, अपनी स्थिति को ठीक समझती है।

    बाल विवाह के रूप में हमने यौन शुचिता के माध्यम से ही गुलामी व यौन शोषण थोपा।

    घर से बाहर निकलने न देने के नाम पर हमारी यहीं कुंठित मानसिकता को मान सम्मान के नाम पर जीना रहा। कपड़े जो शरीर को सर्दी गर्मी धूल मिट्टी शरीर को कुछ आराम सुरक्षा देने के लिए प्रयोग होने थे उन तक में हमने इतनी सेक्स, लैंगिक नैतिकता घुसेड़ दी कि अमूनन तो कोई स्त्री और कई पुरुष इससे बाहर ही नहीं आ पाते यह मानिये जीवन का शायद कोई हिस्सा हमने ऐसा छोड़ा जहां से मस्तिष्क के बच निकलने की कोई संभावना हो।

    हमने अपने ग्रंथों में पूजा पाठ तक में स्त्री को देवी बनाया, उसमें यौन नैतिकता की इतनी गुलामी अपराधबोध भरा की देवी प्रतिष्ठित बातों से अलग जरा भी कुछ कर रही है तो उससे बड़ी पापिन कोई नहीं है। 
    सामाजिक संस्कारों से अलग कोई स्त्री जरा भी जाये या फिर पुरुष की भी उसमें सहमती रही हो लेकिन जैसे ही वह भोग बंद हो या फिर आपको न मिल कर किसी और को मिल रहा हो तो देवी से तो पाप हुआ ही है आप कुल्टा, रण्डी, चरित्रहीन जैसे तमगे जब मनमर्जी किसी स्त्री पर थोप सकते हो.

    गुड टच और बैड टच भी ऊपर की गई चर्चाओं की तरह का ही शारीरिक दैवीयकरण है केवल रैपर अलग है.

    हम यौन शिक्षा पर कभी काम नहीं करेंगे, हम बच्चों के साथ कभी इतने मित्रवत नहीं हो पायेंगे कि वह अपनी परेशानियाँ भी हम से खुल कर कह सके लेकिन बच्चे के खुले मस्तिष्क को भय और यौन कुंठाओं के दलदल में जरुर ले जायेंगे. ऊपर से माता-पिता खासकर माताओं का यह तुर्रा कि हमें भी सिखाया गया है हम पर तो कोई फर्क नहीं. जबकि यहीं फर्क उनका जीवन निर्धारित कर चुका होता है खुद के जीवन को नरक बना चुका होता है. लेकिन उस बात को रुककर देखने, स्वीकार करने को तैयार हो तब न. यदि समाज बच्चों और स्त्रियों के लिए असुरक्षात्मक है, बालात्कारी मानसिकता का है तो गुड टच बैड टच से समाज सही दिशा में कैसे चला जायेगा? समाज में तो हत्याएं भी होती है, चोरी, भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अपराध होते है बच्चों को इन सब के आधार पर फिर लड़ने मारने की ट्रेनिंग भी देनी चाहिए; चाकू ,पिस्तौल जैसे हथियार भी देने चाहिए, हर जगह कैमरे लगे रहने चाहिए. ऐसा ही बहुत कुछ होना चाहिए ऊपर जो सब बताया गया है इन तर्क के आधार पर तो फिर वैसा होना भी क्या गलत?

    समाज असुरक्षित है तो इसे असुरक्षित बनाया किसने है, क्यों बच्चों को इतनी नैतिकताओं में रखने के बावजूद समाज कुंठित है, आपराधिक है. यह बहुत ही गंभीर मसला है कि फिर जैसा समाज हमने बनाया उसी समाज के आपराधिक कारणों को आधार बना कर उन सब कारकों को और मजबूत करते रहें जो इस सब की वजह से ऐसे समाज का निर्माण करते हो जहां कोई भी एक दूसरे पर विश्वास न करता हो, भय के माहौल में जीते हो, अपराध बोध, असुरक्षा और यौन कुंठाओं को जीते हो.

    इन सबके पीछे केवल और केवल एक ही बात निकल कर सामने आती है कि पुरुष या माता-पिता की संपत्ति के रूप में स्त्री/बच्चों को प्रयोजित/प्रतिष्ठित किया जाता रहें. स्त्री अपने आप को भोग्या माने, उत्पाद माने, उसका हर एक क्रिया कलाप निर्णय पुरुष के नजरिये के आधार पर हो. हमारे यहाँ पुरूषों को यह बैठा कर नहीं सीखाया जाता है कि तुम्हें स्त्री को नियंत्रित करना है चाहें वह तुम्हारी बहन हो, माता हो, पत्नी हो या बेटी हो. जब हमारे ईश्वर, देवता भी स्त्रियों का शोषण करने के बाद, बालात्कार करने के बाद पूजनीय है, समाज और हमारें दैवीय ग्रन्थों में यौन शुचिता प्रतिष्ठित है, समाज में किसी भी प्रकार का खुलापन है ही नहीं, रत्ती भर भी जगह मस्तिष्क के विकास की छोड़ी ही नहीं जाती तब पुरुष को अलग से कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, स्वत: ही भोगने वाली, नियंत्रित करने वाली सामंती मानसिकता अपने लिए जगह बनाती चली जाती है.

    चलते-चलते :-

    यौन शुचिता का जाल इतना गहरा हैं कि बहुत सी महिलाएं स्त्रीवाद के नाम पर पुरूषों से नफ़रत करती है और उनके जीवन जीने का आधार एक बार फिर से पुरुष का नजरिया ही हो जाता है.

    हमारे समाज में आपसी संबंधो में प्रेम, मैत्री, सहअस्तित्व, सहजता, स्वतन्त्रता, ज़िम्मेदारी के पनपने की इतनी बारीकी से भ्रूण हत्या की जाती है कि एक तरफ पुरुष स्त्री को केवल यौन रूप से लगातार भोगते रहने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाता है और स्त्री अपनी यौन शुचिता से ऊपर नहीं उठ पाती, अपने सम्बन्धों को खुल कर नहीं जी पाती. ऐसा ही समाज में स्त्री पुरुष संबंधो में ईमानदार न हो कर धूर्तता, दिखावे को बहुत बारीकी से प्रेम के नाम पर जीता है कुछ समय बाद एक दूसरे का सर फोड़ता है और इसी प्रकार के संबंधो की चकरघिन्नी चलाये रखता है. इस तरह की मानसिकता में ही किसी समाज में शादी के नाम पर चलने वाली वेश्यावृति, व्यापार, सत्ता लंबे समय तक टिके रह सकते है. एक स्वतंत्र, जिम्मेदार, सामूहिक रूप से अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने वाले समाज/संबंधो के बनने का आधार कभी डर नहीं हो सकता. हम जितना अपने भोग के लिए डरेंगे उतना ही तंत्र मजबूत होगा, उतने ही हम झूठे मनोरंजन, नफ़रत में और डूबेंगे और अपने अधिकार, स्वतंत्रता, निर्वहन और भी अधिक मुश्किल हालातों में डालते रहेंगे.

    अपवाद हर जगह है मनुष्य में सोच समझ जागने, किसी भी प्रकार की विकृत मानसिकता से निकलने की सम्भावना भी हर जगह है, यदि हम वास्तव में अपने बच्चों की सुरक्षा, स्वस्थ समाज के लिए प्रतिबद्ध है तब हमें अपने डर, नफ़रत से बाहर आना ही होगा, बहुत कुछ सामजिक रूप से झेलना ही होगा बशर्ते यह सब बिना ढोंग के हो, हम जो है उसे प्रतिष्ठित करने के बजाय उसे ईमानदारी से स्वीकार कर उसका अवलोकन करें, और कोई विकल्प है भी नहीं.
    बाकी यदि किसी को भी लिखा पढने में असुविधा या चोट लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ.

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.  



  • उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    लोगों की जिस सोच, इच्छा, उम्मीद और मांग के साथ भाजपा सत्ता में आई थी, भाजपा सरकार वही कर रही है। लोगों ने भाजपा को वोट न तो नौकरियों के लिए दिया था, न जीवन स्तर बेहतर करने के लिए दिया था, और न ही भारत को कोई आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए दिया था।

    हमने भाजपा को वोट दिया था देश को विश्वगुरु बनाने के लिए, देश को हिन्दूराष्ट्र बनाने के लिए, मुल्लों को औक़ात में रखने के लिए, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन वाला विकास करने लिए, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे छोटे पड़ोसियों पर धौंस जमाकर रखने के लिए (ताकि अमेरिका और चीन की चाटुकारिता करने में अहम् को जो चोट पहुँचती है उसकी भरपाई की जा सके), पुराने गौरवशाली भारतवर्ष की पुनर्थापना के लिए, राम राज के लिए …. आदि आदि। असली कारण यही और इसी तरह के थे। बाकी बोला और सुना बहुत कुछ गया है मगर वह सब सिर्फ बोलने और सुनने के लिए था। बोलने वाला भी और सुनने वाला भी दोनों जानते हैं इसमें सच क्या है और लफ़्फ़ाज़ी कितनी है।

    लोकसभा चुनावों में विभिन्न दलों को कुल कॉर्पोरेट फंडिंग लगभग 1100 करोड़ हुई। इसमें 1000 करोड़ के आसपास भाजपा के लिए हुई और 100 करोड़ में बाकी सारी पार्टियां। तो जाहिर है व्यापारियों और पूंजीपतियों ने इकतरफा भाजपा को चुना था। आगे फिर चुनेंगे इसलिए जो दो- चार बिज़नेसमैन हल्ला मचा रहे हैं वह सब नौटंकी है। जिसे सीधा नुकसान हुआ है सिर्फ उसी को तकलीफ है बाकी सब खुश हैं। लेकिन ऐसा तो पूरे समाज का ही हाल है। जिसने सीधा सीधा कोई नुकसान झेला है बस वही विरोध कर रहा है बाकी सब खुश हैं। परोक्ष नुकसान के लिए दूसरे कई कारण उन्हें समझा दिए गए हैं या खुद उन्होंने गढ़ लिए हैं।

    सरकारी आंकड़ों में कश्मीर, मानव विकास सूचकांक के हर मामले में गुजरात से कहीं आगे है। आखिर फिर कौन सा विकास हम कश्मीर में देखना, करना चाहते हैं? तो असली बात यह है कि भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ मानव विकास सूचकांक जैसा कोई भी विकास कभी रहा ही नहीं है। भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ है गाड़ियां,  बंगले, पुल, मॉल, ऊँची ऊँची बिल्डिंगें, बड़े बड़े उद्योगपति जो दुनिया के टॉप 10 में आते हों…. आदि ।

    भले ही यह सब भोगने वाले 2-4 % लोग ही हों। बाकी इस उम्मीद में इस विकास का समर्थन करते जाते हैं कि कभी कोई चमत्कार होगा और हम नहीं तो हमारे बच्चे इन गाड़ियों में घूमेंगे, ऐसे उद्योगपति बनेंगे, ऐसे बंगलों में रहेंगे ..आदि आदि। इसीलिए बचपन से हम अपने बच्चों के दिमाग में यही सब भरते जाते हैं।

    तो कश्मीर में भी अब यही विकास होगा। मानव विकास सूचकांक में तो बांग्लादेश और श्रीलंका ने भी हाल फ़िलहाल हमें पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कुछ अपवाद को छोड़कर किसी भारतीय को इससे कोई समस्या हुई क्या? हमें तो चीन बनना है, अमेरिका बनना है यहाँ तक कि इज़राइल बनना है … वह भी कोरी लफ़्फ़ाजी और ढकोसले के बूते ।भूटान के बारे में आप सर्वे करा लीजिए, कुछ अपवाद छोड़कर हर भारतीय उसे बहुत गरीब और पिछड़ा देश कहेगा।

    इसका सीधा अर्थ है कि हम इंसानों के जीवन और जीवन स्तर को कतई प्राथमिकता नहीं देते। और जो समाज जीवन स्तर को प्राथमिकता नहीं देता वह निहायत ढोंगी,क्रूर,सामंती और अलोकतांत्रिक होता है। और ये सारे गुण हममे हैं। और एक ढोंगी, क्रूर और सामंती समाज अपने में से सबसे बड़े ढोंगी, सबसे ज़्यादा क्रूर और सबसे अधिक सामंती प्रवृत्ति के व्यक्तियों को ही अपने नेता के रूप में चुनेगा।

    यह सच है कि कोई सरकार, कोई नेता जादू करके देश में सब कुछ अचानक ठीक नहीं कर सकता वैसे ही सच यह भी है कि कोई नेता या सरकार अचानक जादू से सबकुछ बरबाद भी नहीं कर सकती। मोदी या भाजपा पर ही सारा दोष मढ़ देना देना असली समस्याओं से मुँह चुराना है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि ये लक्षण समाज के अंदर कहीं गहरे बैठे हुए थे जो माकूल वातावरण पाकर मुखर रूप में बाहर आ गए। यह देश यह समाज सही अर्थों में विकास तभी कर सकेगा जब लोग ढोंग की बजाय ईमानदारी से जीवन मूल्यों को अहमियत देना शुरू करेंगे। वर्ना हम जिधर जा रहे हैं वहां आगे ब्राज़ील है अफगानिस्तान है सीरिया है।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जब हम मानव (human) के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में मानव के अतिरिक्त धरती पर बसने वाले अन्य जीवनों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने देश के बारे में बात करते हैं तब धरती पर बसे अन्य तमाम देशों के हित और उनमे बसने वाले तमाम लोगों के हित हमारी सोच का कितना बड़ा हिस्सा होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने राज्य के बारे में सोचते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी राज्यों और उनमे बसने वाले लोगों के हित कितने शामिल हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने क्षेत्र/भाषा/संस्कृति आदि के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी क्षेत्रों/भाषाओँ/संस्कृतियों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    अपने को केंद्र मानकर अपने हित दूसरों पर थोपना, अपने आप को केंद्र में रख कर अपने सही गलत को बाकी सबका सही-गलत मान लेना, अपने को केंद्र मानकर अपनी विकास की परिभाषा को बाकी सब की विकास की परिभाषा समझ लेना आदि-आदि मानवता नहीं है. सामंतवाद है, जाहिलियत है ।

    अपनी बहुचर्चित किताब ‘सेपियन्स’ में युवाल नोआ हरारी ने एक बात कही है, जो बहुत महत्वपूर्ण है – “विलुप्त होने की कगार पर खड़ी गैंडों की एक प्रजाति का आखिरी गैंडा जंगल में अपनी स्वतंत्रता के साथ कहीं ज़्यादा खुश होगा, बजाय उन लाखों-करोड़ों बछड़ों के जो अपना जीवन एक बाड़े में काट देते हैं और आखिर में काट दिए जाते हैं “

    भारत के गृह मंत्री ने राज्य सभा में जो भाषण पिलाया उसका लब्बो लुआब यह है कि कश्मीर के लोग खुश नहीं हैं, वहां विकास नहीं हो रहा है, वहां शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल बदहाल है। और ख़ुशी, विकास और शिक्षा स्वास्थ्य की परिभाषा भी अमित शाह वाली, भाजपा वाली, पूंजीपतियों वाली।

    एक कश्मीरी अपनी ख़ुशी और विकास को कैसे परिभाषित करता है यह मायने नहीं रखता।

    विकास की यह परिभाषा यहीं नहीं रुकेगी। विकास की यह परिभाषा समूचे उतर-पूर्व और सारे आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी ही तबाही मचाएगी। देश में एक ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ लोग हर साल भूख से न मरते हों, ठण्ड से न मरते हों,लू से न मरते हों, बाढ़ से न मरते हों ,हत्याएं बलात्कार लूट न होती हो। लेकिन कश्मीर का विकास नहीं हो पा रहा यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

    अधिकांश भारतीय समाज ने कश्मीर के साथ हुई ज्यादिती पर जैसी प्रतिक्रिया दी है उसे देख कर मैं इस बात से पूरी तरह मुतमईन हूँ कि भारतीय समाज सामंती है और घोर अलोकतांत्रिक है।

    यह समाज इसी लायक है कि भारत आर्थिक और सामरिक रूप से हमेशा कमज़ोर रहे। यह समाज जिस तरह की अमानवीय, कट्टर सामंती सोच के साथ आज है ऐसी स्थिति में अगर भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत हुआ तो हम बांग्लादेश,पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि पडोसी देशों के लोगों का जीना हराम कर देंगे।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

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  • समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जिन दो किसानों के खेत एक दूसरे से लगे हुए होते हैं उन दोनों किसानों के खेतों के बीच में एक मेढ़ होती है, जो दोनों के लिए साझी होती है,और वह पतला सा ज़मीन का टुकड़ा दोनों का साझा होता है । कुछ अपवाद मामलों को छोड़कर अधिकतर किसान खेत जोतते समय हर बार थोड़ी थोड़ी मेढ़ खुरचते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है कि मेढ़ के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है। फिर दोनों किसान आपसी सहमति से दोबारा मेढ़ बनाते हैं। जो खेत सड़क किनारे होते हैं या नहर किनारे होते हैं उन खेतों के मालिक किसान हर बार जुताई करते हुए थोड़ी सड़क या नहर की तरफ की ज़मीन या खेत से लगी कोई भी सार्वजनिक ज़मीन खुरचते जाते हैं।

    ऐसा नहीं है कि दो चार इंच ज़मीन से पैदावार में कोई अंतर आता है। लेकिन मामला मानसिकता का है।

    कस्बों में शहरों में लोग जब अपने घर बनाते हैं तो जो ज़मीन उन्होंने खरीदी होती है, उस ज़मीन के बिलकुल बाहरी छोर पर दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं। कोशश तो यह होती है कि जहाँ तक संभव हो दीवार बाहर खड़ी कर लो। पार्कों और गलियों में कब्ज़ा कर लेना बहुत सामान्य घटना है। घर के आगे सड़क तक की ज़मीन तो अपनी ही होती है उसपर कोई शक नहीं होता किसी को।

    बेचारे फ़्लैट वाले ज़मीन कब्ज़ा नहीं पाते तो हवा में जितना संभव हो स्ट्रक्चर बढ़ा कर कुछ नहीं तो गमले ही रख लेते हैं।

    कुल मिलाकर कहना यह है कि हम लोग; सार्वजनिक ज़मीन या साझे की ज़मीन या वह ज़मीन जो किसी भी तरह से विवादित है या जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं है या जिसकी है वह कमज़ोर है मजबूती से अपना दावा नहीं कर पा रहा; ऐसी हर उस ज़मीन पर कब्ज़ा ज़माना अपना अधिकार समझते हैं। और यह सच सिर्फ ज़मीन तक सीमित नहीं है, यह हर तरह की चल अचल संपत्ति, वस्तुओं, लोगों आदि सब के लिए उतना ही सच है।

    हम अभी तक एक समाज के तौर पर सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक जिम्मेदारी की सोच का विकास नहीं कर पाए हैं। एक देश की तरह सोचना तो बहुत दूर की बात है। हमारे लिए देश/प्रदेश/जिले आदि ज़मीन का टुकड़ा मात्र हैं।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • पहचान — Nishant Rana

    पहचान — Nishant Rana

    Nishant Rana

    मैं खुद ही खुद का हौंसला हूँ
    मैं अकेला ही खुद के लिए खड़ा हूँ
    मैं शौक से लड़ा, मैं खौफ से लड़ा
    मैं भूत से लड़ा मैं भविष्य से लड़ा
    मैं दिन रात सुबहो शाम से लड़ा
    मैं जात धर्म ऊंचनीच भेदभाव से लड़ा
    भारी थी सबसे लड़ाई वो
    जब मैं अपने आप से लड़ा

    जरूरी नहीं इकरंगा हो अकेलापन
    बीतने दो पतझड़ मैं रंग हज़ार हूँ

    केवल न शौर्य की बात हो
    न केवल गर्व की बात हो
    प्रेम की भी बात हो
    सहजता की भी बात हो
    बीती जो लड़ाइयां
    यह न मेरी पहचान हो
    सुबह की लाली की बात हो
    दमकती शाम की धूल की बात हो
    पंछियों की बात हो, नदियों की बात हो
    न हो लड़ाइयां इसकी भी बात हो
    कैसे जिया जीवन
    संबंधों की बात हो।
    सब पहचान से परे
    नितांत अकेले मरने की बात हो

    Nishant Rana

  • दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    समाज दो तरह के नियमों से चलता है एक लिखित नियम और दूसरे अलिखित नियम। दुनिया में अलिखित नियम पहले आए और लिखित नियम (संविधान के रूप में या किन्ही अन्य रूप में) बहुत बाद में आए।

    किसी भी समाज की सामूहिक चेतना, विवेक,संवेदनशीलता,लोकतांत्रिक सोच आदि को जांचने के कई पैमाने होंगे लेकिन लिखित और अलिखित कानूनों के बीच का अनुपात और उनका प्रकार मेरी नज़र में सबसे प्रभावी तरीका है।

    जो समाज जितना परिपक्व होता है उसे उतने कम और उदार लिखित नियमों की ज़रुरत पड़ती है। जो समाज जितना अपरिपक्व और अराजक होता है उसके लिए उतने ज़्यादा और कठोर लिखित नियमों की आवश्यकता होती है। एक परिपक्व समाज के अलिखित कानून संवेदनात्मक/लोकतांत्रिक/तार्किक होते हैं और उनका पालन भी बहुत ही सहजता के साथ होता है।

    ‘जॉर्ज सेबिलिस’ और ‘डोमिनिक जे. नार्डी’ ने OECD (आर्गेनाईजेशन फॉर इकनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेन्ट) देशों के संविधानों की लम्बाई (शब्द संख्या के आधार पर ) और GDP एवं भ्रष्टाचार के बीच संबंधों को दर्शाने वाले अपने तथ्यात्मक और तार्किक लेख में दो निष्कर्ष मोटे तौर पर स्थापित किये हैं। ( A Long Constitution is a (Positively) Bad Constitution: Evidence from OECD Countries)

    1. बड़े संविधान वाले देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का स्तर नीचे रहने और भ्रष्टाचार ज्यादा होने की प्रवृत्ति होती है। प्रति व्यक्ति जीडीपी पर संवैधानिक लंबाई का प्रभाव जारी रहता है, भले ही भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो।
    2. लम्बे संविधानों में संशोधन करना अधिक कठिन होता है फिर भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि छोटे संविधानों की तुलना में इन्हे अधिक बार संशोधित किया जाता है।

    संविधान की लंबाई और संशोधनों के बीच संबंध के बारे में लुत्ज़ ने शंका जताई थी कि बड़े संविधानों को अधिक बार संशोधित किया जाएगा, क्योंकि उनमें विस्तृत प्रावधान शामिल होने की संभावना है जो समय के साथ अप्रचलित होने का जोखिम रखते हैं। जब ऐसे प्रावधान सत्ताधारी बहुमत के कार्यों को प्रतिबंधित करते हैं, तो उन्हें या तो संशोधित किया जाएगा या पूरी तरह से हटा दिया जाएगा। नेग्रेट्टो ने लैटिन अमेरिका के लिए लुत्ज की भविष्यवाणियों की पुष्टि की।

    समाज जैसे-जैसे परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे लिखित कानूनों की आवश्यकता कम होती जाती है। कई कानून तो सिर्फ कागज़ में रह जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए सरकार या सत्ता को कोई प्रयास नहीं करना होता है। समाज को नियंत्रित करने वाले नए कानूनों की आवश्यकता नहीं होती यानी व्यवहारिक रूप में अलिखित कानूनों का अनुपात बढ़ता जाता है। नए कानून या नियम उन्ही क्षेत्रों में बनाने पड़ते हैं जो क्षेत्र नए विकसित हुए होते हैं, उदाहरण के लिए साइबर क़ानून।

    इसके उलट अगर समाज अपरिपक्व हो रहा है तो आये दिन सरकार या सत्ता द्वारा नए नए क़ानून बनाये जाते हैं या अदालतों द्वारा बार बार परिभाषित किए जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए तमाम तरह की संस्थाएं खड़ी की जाती हैं और कठोर दंड के प्रावधान करने पड़ते हैं। अर्थात लिखित कानूनों/ नियमों का अनुपात बढ़ता जाता है और दंड की कठोरता भी उसी अनुपात में बढ़ती है। साथ ही साथ कई नियम और कानून जो अर्से से निष्क्रिय पड़े थे उन्हें भी पुनर्जीवित किया जाता है।

    किसी भी देश में अविश्वास का स्तर जितना ज़्यादा होता है उस देश में आर्थिक विकास की दर उसी अनुपात में कम होती है। ऐसे देश संविधान की लम्बाई का उपयोग अविश्वास की राजनीतिक संस्कृति के लिए एक प्रॉक्सी के तौर पर करते हैं। चूंकि संविधान बनाने वाले लोग या समिति अविश्वास के चलते दूसरे राजनीतिक दलों या सदस्यों को विवश रखना चाहते हैं इसलिए अधिक अविश्वास वाले देश अधिक विस्तृत कानून लिखने की संभावना रखते हैं।

    भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है यानी जब संविधान बना तब हम दुनिया के कुछ सबसे अपरिपक्व और अविश्वास से भरपूर समाज में से एक थे इसलिए इतने बड़े संविधान की आवश्यकता हुई। लेकिन इससे भी भयावह पहलू यह है कि संविधान बनने के बाद से नियमों और कानूनों की संख्या और सज़ाओं की कठोरता में बढ़ोतरी ही हुई है। यानी हम एक समाज के तौर पर कतई परिपक्व नहीं हुए हैं।

    एक उदाहरण के साथ मैं अपनी बात ख़त्म करूँगा। मैं नॉएडा में रहता हूँ और यहाँ अभी तक चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल तो हैं लेकिन उसे तोड़ने पर चालान करने के लिए ट्रैफिक पुलिस नहीं है ,इसके उलट दिल्ली में हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस तैनात रहती है। आपने सिग्नल ब्रेक किया नहीं कि तुरंत आपको दंड मिलेगा। तो वही लोग जो दिल्ली में हर ट्रैफिक रूल फॉलो करते हैं, नॉएडा में घुसने के बाद बड़े इत्मीनान से सिग्नल ब्रेक करते हुए चलते हैं। जिससे अराजकता फैलती है।

    यानी लिखित नियम भी समाज कितना मानता है यह भी एक बड़ा पहलू है। जो समाज लिखित नियम भी सिर्फ दंड मिलने के डर से मानता है वह अलिखित नियम कितना मानता होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं बेटी
    इस धरती पर आई,
    मेरी मां मुझे इस संसार में लेकर आई,
    लेकिन मेरी मां नारी होकर भी मुझे नहीं समझ पायी,
    मेरे लड़की रूप में पैदा होने पर
    नारी ने ही रो-रोकर आंखें सुजाई।

    कहते हो मिश्र की सभ्यता में नारी का सम्मान था,
    राजा की कुर्सी के उत्तराधिकार पर बेटी का हक था,
    लेकिन बताओ
    भाई की बहन से शादी,
    यहां यह कौनसा मेल था?
    यह तो सब पुरुषों का
    बहन के हाथों से सत्ता पाने का खेल था,
    कहते हैं मैं पहले आदमी द्वारा पूजी जाती थी,
    लेकिन इस आदमी ने कैसे मुझे पूजा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    रामराज्य के राम ने मुझे
    सीता के रूप में अपवित्र कहकर वन में भेजा,
    तथाकथित महान विद्वानों की सभा में
    मुझे द्रोपदी के रूप में लूटा।
    सबने देखा
    धृतराष्ट्र की अंधी जैसी आंखो ने भी देखा,
    दोनों ही जगह पर
    मेरा ही दमन करने की साजिशें रची गयी,
    लेकिन अपने को बड़े-बड़े गुरु-धर्मगुरु
    और महान कहने वालों की जुबान ना खुली,
    क्योंकि सबको सत्ता के साथ सुख भोगना था,
    मुझे किस-किस कृष्ण के आगे हाथ फैलाना पड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मध्यकाल में मुझे मीरा के रूप में सताया है,
    यहां भी मैं रजिया के रूप में शासिका बनी तो
    मुल्ला-मौलवियों ने स्त्री होने की वजह से,
    मैं शासिका नहीं बन सकती ऐसा फरमान फ़रमाया है,
    मैं नहीं हटी तो पुरुष मानसिकता ने
    सत्ता की शक्ति के लिये,
    मुझे मार के हटाया है।

    अपने को खुदा के बन्दे कहने वालों ने
    तीन तलाक कहकर ठुकराया है,
    बुर्के में ढका है मुझे,
    मेरे स्वतंत्र विचारों को दफनाया है,
    सबने मिलकर मुझे
    जिंदा ही सती के रूप में जलाया है,
    अपनी इज्जत के लिये
    मैंने आग में अपना जौहर कराया है।

    आधुनिक युग वालों ने तो
    और भी बर्बर जुल्म ढायें हैं,
    मुझे लूटने के लिये
    पशुता से भी क्रूर तरीके अपनायें है,
    हर युग में मुझे ही दैहिक अग्निपरीक्षा से क्यों गुजरना पड़ा,
    कैसे मैंने खुद का वजूद बचाया
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    जब मैं जन्म लेती थी,
    एक मां-बाप के घर हम नौ-नौ बहनें पैदा हो जाती,
    लेकिन मां-बाप को कुल चलाने के लिये बेटे की चाहत होती,
    कैसे ऐसे माहौल में हम बहनें बिना प्यार के जी पाती,
    कितना रोता मेरा हीवड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कुछ समय पहले ही
    कुछ मां-बाप मुझे जन्मते ही
    जिंदा ही कलश में रखकर किसी नदी में बहा देते,
    या फिर गड्डा खोदकर जिंदा ही दबा देते,

    कितना मेरा जी ता तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कितना मेरा जी था तड़पाया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आज भी मुझे
    जब लोगों को पता चले कि गर्भ में बेटी है,
    सब मिलकर मार देते हैं,
    जन्मते ही किसी नाले में
    या फिर कहीं झाड़ियों में फेंक देते हैं,
    धरती पर आने से पहले कसूर क्या था मेरा,
    यही ना कि मैं लड़की थी,
    नहीं था पेट में लड़का,
    क्या मैंने सहा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    कभी लगता है
    अब स्थिति कुछ ठीक है,
    लेकिन जब जाती हूं स्कूल-कॉलेजों में,
    हर गली,हर कोने पर कई आंखों ने मेरे शरीर को ताड़ा,
    कई नामर्दों की पुरुष मानसिकता ने अपनी गन्दी नजरों से
    मेरी शारीरिक बनावट का एक्सरे खींच डाला,
    मुझे लगा कैसा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पहनावे पर सवाल खड़े किये जाते हैं,
    पर अपनी सोच के कभी निरीक्षण नहीं किये जाते हैं,
    कपड़ों पर सवाल उठाने वाले
    मन्दिर-मस्जिदों में दो-दो साल की मासूमों से
    रेप के जुर्म में पकड़े जाते हैं,
    अरे आदमी तेरी सोच गन्दी है
    और ढीला है तेरे मनरूपी पायजामे का नाड़ा,
    मैं एक मासूम बच्ची थी,
    क्या मेरे पर बीती
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    सब कहते हैं तुम लड़की हो,
    कमजोर हो,
    अपने साथ में बदमाशों के लिये मिर्च स्प्रे रखो,
    आठ-दस वर्ष की मासूम यह सब क्या जाने कि
    कौन बदमाश है,
    कौन है शैतान,
    अब तो बाप भी गोद में लेता है
    तो लगता है
    आ गया फिर कोई हैवान,
    आदमी तेरी आत्मा और दिमाग में है सब सड़ा-सड़ा,
    बचपन मेरा कैसे खोया,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरे पैदा होते ही
    तैयारी शुरू कर देते हैं मेरी शादी की,
    बालविवाह करके मेरा,
    घड़ी तय कर देते हैं मेरी बर्बादी की,
    मजबूरी में बचपन में दुल्हन बनना पड़ा,
    मेरे बालमन पर क्या असर पड़ा
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    मेरी शादी घर के बड़े ही तय करते हैं,
    ना मुझसे मेरे मन की पूछते हैं
    यदि शक्ल मेरी अच्छी नहीं तो वरमाला में देखते ही,
    मेरे जीवनसाथी बनने वाले ने मुंह मुझसे मोड़ा,
    यदि उसने दबाव में शादी कर भी ली तो
    प्रेम वाला नाता हमेशा के लिये तोड़ा,
    सब मेरे फिजिकली शरीर और सूरत देखते हैं,
    ना किसी ने मेरे गुण देखे,
    ना कोई मेरी सीरत देखते हैं,
    अरे ओ जीवनसाथी बनने वाले मर्द,
    मैंने भी तो बिना सोचे समझे तेरे संग अपना रिश्ता जोड़ा,
    अपना आंगन,अपने परिचितों को छोड़कर
    तुम जैसे अजनबी का हाथ पकड़ा,
    ओ मर्द?तुमने ना मेरी रूह देखी,
    क्या बीता मुझ पर
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    नारी शक्ति की पूजा करते हो,
    लेकिन घर में ‘कन्या ना आ जाये’
    ऐसे मन्त्र पढ़कर कन्या से
    पीछा छुड़ाने की जुगत लगाते हो,
    मनुष्य होकर क्यों खुद को पशु बनाते हो,
    पशु भी जेंडर भेदभाव तो नहीं करते हैं,
    तुम मनुष्य होने का ढोंग करके
    प्रकृति को छलाने की कोशिश करते हो,
    मां-पत्नी तो चाहते हो,
    लेकिन बेटी को गर्भ में ही मारते हो,
    अरे आदमी!मर गया है तेरी इंसानियत का कीड़ा,
    आगे मुझे बढ़ना है,
    रुकना अब मुझे जंचता नहीं,
    मुझे बढने नहीं देते हो आगे
    तभी तुमने राह में मेरी डाला है रोड़ा,
    इससे कितनी हुई मुझे पीड़ा,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    अरे नर मेरे जिन दो अंगों के पीछे तु है पड़ा,
    उनमें से एक से मैंने तुझे जन्म दिया,
    दूसरे से मैंने तुम्हें दूध पिलाकर यह जीवन दिया,
    फिर भी तु मेरी आत्मा की परवाह किये बगैर,
    मुझे भोग्या बनाने के पीछे है पड़ा,
    तु यह सब बहुत गलत करता है,
    क्यों तुमने अपने इस अंतर्मन को नहीं झिंझोड़ा,
    मेरी आत्मा कैसे रोती है,
    ये तो जाणे मेरा जीवड़ा।

    आओ मुझे सम्मान दो,
    सच्ची नियत से साथ दो,
    अपनी गन्दी नजरों को उतार दो,
    इंसानियत वाला दिल बना लो,
    मेरे मां-बाबा आप दहेज के पैसों से
    मुझे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होने दो,
    परिवार में जेंडर भेदभाव मिटा दो,
    मेरी एक बहन कल्पना चावला की तरह
    मेरे सपनों के पंखों को एक नई उड़ान दो।

    अब मैं नारी अपने लक्ष्य खुद बनाऊंगी,
    टक्कर तो तब भी दी थी शास्त्रार्थों में
    याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानियों को गार्गी के रूप में,
    जब हारने लगे मेरे आगे तो
    धमकियां दी की मैं चुप हो जाऊं,
    नहीं तो मेरा सिर तोड़ दिया जायेगा,
    अब सच के लिये चुप नहीं रहूंगी,
    सच्चाई और मानवता की आवाज बनूंगी,
    मेरे ऊपर लगाये गए प्रतिबन्धों के ऊपर से रास्ता नया बनाऊंगी,
    नारी हूं,नर-नारी को साथ लेकर चलूंगी,
    बार-बार गिरकर,उठकर फिर चलूंगी।

    अब यह नारी आगे बढेगी,
    खुद को मनुष्य मानकर परतन्त्रता की जंजीरें तोड़ेगी,
    अरे आदमी देख लेना इतनी ऊचाइयों पर पहुंच जाऊंगी,
    मेरे कद के बराबर आने के लिये
    आरक्षण जैसी व्यवस्था याद आएगी।

    मेरी राह में लगा देना पहरा कितना भी कड़ा,
    आदमी को मनुष्य के स्तर पर पहुंचाकर खुश होगा मेरा हीवड़ा,
    औरत हूं ना
    प्रकृति का दु:ख कैसे ना जाणे मेरा जीवड़ा।।

    Vijendra Diwach

  • नफरत हारती रहे — Pankaj Chaturvedi

    नफरत हारती रहे — Pankaj Chaturvedi

    ​Pankaj Chaturvedi

    पुरानी दिल्ली ने हरा दिया नफरत को, अभी एक हफ्ता पहले पुरानी दिल्ली ने लाल कुआँ में एक साधारण से झगड़े को कुछ बहरी लोगों ने साम्प्रदायिक रंग दिया और कुछ देश द्रोहियों ने एक मंदिर में तोड़ फोड की थी, तनाव था लेकिन आज पुश्तों से साथ रहने वाले पुरानी दिल्ली के लोगों ने एक साथ आ कर शानदार मिसाल पेश की। अमन कमेटी के लोगों ने शोभा यात्रा निकाल रहे लोगों के लिए खाना और पानी का भी इंतजाम किया है।

    आज सुबह दस बजे से हौज क़ाज़ी में एक शोभा यात्रा निकाली गयी जिसमे मंदिर में दुर्गा की नई प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा किया गया, इस जुलुस में मुस्लिम समाज सबसे आगे शहनाई बजा रहा है, जगह जगह मुस्लिम समाज ने जुलुस के स्वागत के लिए व्यवस्था कि, फतेहपुरी मस्जिद के इमाम मस्जिद के सामने जुलुस का स्वागत करना चाहते थे लेकिन किसी “ऊपर” से आये आदेश के बाद उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया, फिर भी दोनों धर्म के लोग साथ साथ मंदिर तक गए और जता दिया कि सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। यही नहीं, दूसरे समुदाय के लोगों ने शोभा यात्रा निकाल रहे लोगों का स्वागत फूल बरसा कर किया। इसके अलावा भाई-चारे की मिसाल पेश करते हुए लोगों ने प्रसाद भी बंटवाया।

    ​Photo credits- ANI

    ​Pankaj Chaturvedi

    ​Author, Freelance Journalist, Environmentalist

    ​Associate Editor – Hindi, National Book Trust​, Ministry of Human Resource Development, Govt. of India

  • फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe 

    आर्टिकल 15 एक अच्छी फिल्म है, सभी मित्रों को जरुर देखनी चाहिए. इसमें कई खूबियाँ और कई कमियाँ है. यहाँ जब मैं इसे अच्छी फिल्म कह रहा हूँ तो इसका यही अर्थ है कि यह बहुत सारी दिशाओं में विचार करने को विवश करती है. कोई भी फिल्म या रचना एक आयाम में ही अपने निर्णयों को री-इन्फोर्स करती है तो वह अच्छी रचना या फिल्म नहीं कही जा सकती. समाज, और विशेष रूप से भारत का समाज एसा नहीं है जिसमे कोई एक आयाम में सोचकर किसी विश्लेषण या निर्णय तक पहुंचा जा सकता हो. एक ‘डायनेमिक कोम्प्लेक्सिटी’ है जिसके बीच हर अच्छी और बुरी चीज पनपती और चलती आई है. इस कारण किसी भी अच्छी या बुरी चीज का न तो एक सरल सा कारण है न एक सरल सा परिणाम ही है. इसीलिये इन चीजों या समस्याओं से मुक्त होने का कोई ‘एक स्वर्णिम सूत्र’ भी नहीं हो सकता.


    कुल मिलाकर इस फिल्म में जो मुख्य स्वर है वह है ‘भारत की हजारों साल पुरानी सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने की तीव्र इच्छा’. अब ये इच्छा किसके दिल में और क्यों जन्म ले रही है ये बात अधिक महत्वपूर्ण है. ये इच्छा सबसे पहले तो अतिशूद्रों या दलितों के दिल में जन्म ले रही है जो इस व्यवस्था से केवल नुकसान ही उठाते आये हैं. लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था में बीच के पायदान पर बैठे लोगों शुद्र या ओबीसी में ये इच्छा बिलकुल नहीं है. ये वो लोग हैं जिन्हें इससे कुछ फायदा है और कुछ नुक्सान है, ये लोग सबसे ज्यादा असमंजस में हैं. ये असल में ओबीसी तबका है. इन बीच के लोगों को इस व्यवस्था से फायदा हो रहा है उन्हें इस व्यवस्था में बदलाव की नहीं बल्कि उतने सुधार की जरूरत है जितने से उनका खुद का शोषण रुक जाए लेकिन वे दूसरों का शोषण करना बदस्तूर जारी रखें. यही ‘ग्रेडेड इन-इक्वालिटी’ का चमत्कार है जिस पर बाबा साहेब अंबेडकर के अनुसार भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है. बाबा साहेब के इस वक्तव्य को आगे बढायें तो समझ में आता है कि यही भारत का धर्म और राजनीति भी है, इसीलिये उन्होंने राजनीति बदलने की भरसक कोशिशें करने के बाद अंत में धर्म बदलने की सलाह दी थी जिस पर दुर्भाग्य से आज भी दलित वंचित समुदाय अमल नहीं कर पा रहे हैं.फिल्म में इस जाति व्यवस्था की सडांध को बदलने की तीव्र इच्छा एक दूसरे तबके में भी दिख रही है. ये तबका वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा हुआ है. उसी तबके से नायक और नायक की प्रेयसी आती है. ये नायक ब्राह्मण है और यूरोप में उच्च शिक्षा हासिल किया हुआ है, दिल्ली के सुरक्षित महलों से निकलकर यूरोप के सभ्य समाज में पढने जाता है और अचानक भारत के बर्बर और असभ्य समाज के गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता है.
    ऐसे में स्थिति बदलने की जो तीव्र इच्छा पैदा होती है उसके दो कारण हैं. 


    पहला कारण ये कि वो अभी तक जिस देश समाज और धर्म को अपना समझकर उसमे सम्मान का अनुभव करता था वो देश, समाज और धर्म कुछ और ही शक्ल लेकर सामने आ रहा है. इस देश, समाज और धर्म की जब वो यूरोप के सभ्य समाज से तुलना करता है तो उसे ग्लानि होती है, नायक का अहंकार चोटिल होता है. इसी अवस्था में उसकी प्रेयसी भी है वह भी दलित वंचित समुदाय से नहीं आती बल्कि एक सवर्ण प्रष्ठभूमि से आती है और लिबरल वाम तबके की नारीवादी है. इन दोनों के लिए विकास और सभ्यता की परिभाषाएं भारत के बाहर से आई हुई हैं. ये बड़ी अच्छी बात है. इसी अन्दर बाहर की तुलना ने उपनिवेश काल में भारत के समाज को सभ्य बनाने की शुरुआत की थी. दूसरा कारण ये कि जिस सभ्य यूरोपीय समाज से नायक आ रहा है उससे तुलना करने के लिए या उससे अपने देश की नैतिकता की बराबरी करने के लिए उसे सुदूर अतीत या परम्परा के कोई चीज नहीं मिलती. उसे सभ्यता और नैतिकता का आश्वासन देने वाली जो एकमात्र चीज मिलती है वह है भारत का संविधान. इसी को आधार बनाने के लिए वह तैयार हो जाता है और आगे की लड़ाई लड़ता है. अब ये गजब की बात है ये दोनों कारण असल में यूरोप से आ रहे हैं. यहाँ नोट किया जाये कि संविधान भी यूरोपीय लिबरल मूल्यों से प्रेरित है और उसमे हर कदम पर बर्बर भारतीय समाज की प्राचीन परम्पराओं और नियमों से दूर जाने कि स्पष्ट पृवृत्ति है.


    फिल्म का नायक भारत में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में जब अपने राष्ट्र और धर्म पर ‘पौरुष भरे गर्व’ को चूर-चूर होता देख रहा होता है तभी उसकी प्रेयसी उसके गर्व को एक अन्य कोमल और नारीवादी आयाम से चोट मारती है. यूरोप के सभ्य समाज से भारत की तुलना कर रहा यह नायक ठीक इसी समय बारी बारी से उन लोगों से मुखातिब होता है जो पूरे शोषक हैं, जो आधे शोषक आधे शोषित हैं और अंत मे वो उन लोगों से भी मुखातिब होता है जो सौ प्रतिशत शोषित हैं.

    कहानी आगे बढती है. पित्रसत्ता, पुरुषसत्ता, जातीय दंभ को परम्परा और पवित्र शास्त्रों, भगवानों के उद्धरण से जायज ठहराते हुए यह स्थापित किया जाता है कि ये शोषण जो हो रहा है वह असल में आ कहाँ से रहा है.

    इसके बाद शोषित लोगों की बुरी हालत को भी समझाया जाता है. ‘औकात’ शब्द बार-बार आता है जो असल में भारत के धार्मिक राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धुरी है. शोषण का मूल आधार ‘औकात’ का होना या न होना ही है लेकिन ये जब अभिव्यक्त होता है तो आर्थिक आधार पर होता है. ‘औकात’ भारत के धर्म और शास्त्रों ने पहले ही तय कर दी है और औकात तय करने के बाद स्वाभाविक रूप से उभरने वाली सामाजिक व्यवस्था का पालन करना और करवाना हर जाति की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन जाति है.

    इस जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने से नीची जाति का अपमान करना, मजदूरी कम देना, पिटाई करना, बलात्कार करना, गंदे कामों में लगाए रखना, भयभीत कुपोषित बनाए रखना इत्यादि इत्यादि धर्म और शास्त्रों के अनुसार जायज काम हैं जो कि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए स्वयं इश्वर या ब्रह्म ने बताये हैं.

    अपने देश, समाज या धर्म को इस नायक ने गलती से जिस रूमानियत में कुछ और ही समझ लिया था, वो जमीन पर हकीकत में कुछ और ही निकलता है. इससे उसे और उसकी प्रेयसी को चोट लगती है. पूरी फिल्म में यह चोट बार बार शोर मचाती है. साथ ही अछूत या अस्पृश्य जातियों से आने वाले गरीब और असहाय लोगों का रुदन और विलाप भी इसमें बहुत कलाकारी और सावधानी से उभारा गया है. 

    इस फिल्म में कई सारे उल्लेख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आते हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण, रोहित वेमुला प्रकरण, खैरलांजी काण्ड, अतीत के महाकाव्यों से उभर रहे पात्र और इन सबके साथ ही उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीती के कई सारे बिंब एकसाथ समानांतर बहते हैं और इस देश और इसके समाज के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं.

    इन समानांतर बह रहे बिंबों के बीच यूरोप के सभ्य समाज से सभ्यता और ज्ञान की सुगंध लेकर अचानक भारतीय समाज की सडांध में आ गिरने वाले नायक को अपने गर्व और नैतिकता को बचाने के लिए एकमात्र उम्मीद भारत के संविधान में नजर आती है. मेरे लिए यही इस फिल्म का केन्द्रीय बिंदु है जहाँ से फिल्म में और फिल्म के बाहर भी सब कुछ बदल जाता है.

    इस फिल्म में कुछ कमजोरियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं. एक सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी में है. शोषित वर्ग के अर्थात दलितों वंचितों के नायकों और मुक्तिकामियों को यहाँ कमजोर और असहाय बताया गया है. वे हमेशा रोते सिसकते रहते हैं जैसे कि यूरोप अमेरिका से आने वाले किसी सवर्ण द्विज मसीहा का इंतज़ार कर रहे हैं. उनके अपने संघर्ष का कोई परिणाम तभी निकल सकता है जब कि शोषक अर्थात सवर्ण द्विज तबके या जातियों में ही जन्मा कोई मसीहा यूरोप से सभ्य होकर भारत आएगा और उनकी मदद करेगा. एक तरह से दलितों वंचितों की मुक्ति की संभावना सवर्ण द्विजों के प्रयासों और सदिच्छा पर ही निर्भर है.

    ये निर्भरता पीड़ित करती है. इसका कारण समझना भी आसान है. असल में यह फिल्म उन लोगों के लिए बनाई गयी है जो स्वयं जातिगत शोषण की इस डिजाइन में फायदा उठा रहे हैं. ये फिल्म उनके ह्रदय परिवर्तन कि दृष्टी से बनाई गयी है. इसीलिये शोषकों के जातीय अहंकार को इतनी भी चोट न लगे जाए कि हृदयाघात ही हो जाए. हृदय परिवर्तन के लिए सच्चाई को उजागर करते हुए उसे सुरक्षित सीमाओं में रखना होता है ताकि हृदयाघात ही न हो जाए. शोषकों के ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद और इंतज़ार करने का यह आग्रह इस फिल्म की कहानी में एक ऐसी मजबूरी बनकर उभरता है जो बहुत निराश करती है. इतिहास में जाकर अगर हम गांधी और अंबेडकर की अप्रोच के बीच के तनाव को देखें तो यह वाही तनाव है. गांधी ह्रदय परिवर्तन चाहते हैं और अंबेडकर व्यवस्था- परिवर्तन और धर्म परिवर्तन चाहते हैं.

    ये सुरक्षित सीमा बनाये रखना बिजनेस और मार्केटिंग के नजरिये से भी जरुरी है. सीधी सी बात है आपके प्रोडक्ट को खरीदने वाले लोगों की नैतिकता और धर्म पर बेरहम चोट नहीं पहुंचाई जा सकती. एक सुरक्षित सी ‘चपत’ लगाकर प्यार से आग्रह करना फायदेमंद है. यही इस फिल्म में भी किया गया है. अंत में इस फिल्म को देखने वाला ‘कास्ट ब्लाइंड’ तबका अगर अपनी विरासत धर्म और समाज पर रत्ती भर भी गर्व न कर सके तो वो सिनेमा हाल में बैठे बैठे ही टूट जायेगा. नायक और नायिका तो संविधान में गर्व करते हुए स्वयं को बचा लेते हैं लेकिन आम सवर्ण भारतीयों से इतनी उम्मीद नहीं की जा सकती. उन्हें अंतिम रूप से गर्व करने के लिए संविधान नहीं दिया जा सकता. वे जिस एकमात्र चीज में गर्व कर सकते हैं वो बात ये है कि “चलो अतीत में हमने जो भी गलत किया लेकिन वर्तमान में या भविष्य में इसे ठीक भी हम ही करेंगे”.

    यही वो केन्द्रीय बात है जो मुझे पीड़ित करती है. शोषित की ‘एजेंसी’ या ‘कर्ता होने की संभावना’ को व्यवस्था या ‘स्ट्रक्चर’ फिर से निगल लेता है. यहाँ दलितों शोषितों को सन्देश ये दिया जा रहा है कि शोषण भी हम ही करेंगे और तुम्हे मुक्त भी हम ही करेंगे. तुम बैठकर रामलीला देखते रहो.

    अभी भी भारत का समाज इतना सभ्य नहीं हो सका है कि वो स्त्रीयों की आजादी का श्रेय किसी स्त्री को दे सके. या दलितों- ट्राइबल्स की मुक्ति का श्रेय खुद दलितों या ट्राइबल नेताओं को दे सके. भारत का सवर्ण द्विज पुरुष आज भी स्त्रीयों का मुक्तिदाता खुद बनना चाहता है, साथ अवर्णों, दलितों और वंचितों को मुक्त करने का श्रेय स्वयं ही लेना चाहता है. इसका एक गहरा कारण है. जब शोषक तबके से आने वाले लिबरल नायक वंचितों को मुक्त करने वाली इबारत लिखते हैं तो वे व्यवस्था में कोस्मेटिक बदलाव कर आपद धर्म निभाते हैं.

    वे शोषण के कील मुहांसों का फौरी इलाज करके निकल जाते हैं ताकि इस समाज की शिराओं में बह रहा जहरीला और दूषित रक्त ही पूरी तरह न बदल जाए. स्मृति शास्त्रों में दी गयी व्यवस्था कोई पूरी तरह न उखाड़ दे, इसके लिए पहले ही आगे दौड़कर चलताऊ बदलाव कर दीजिये. इस तरह महान बनने का श्रेय भी मिल जाएगा और प्राचीन व्यवस्था भी जस की जस बनी रहेगी. फिर जब समय अनुकूल होगा तो स्मृतियों को कानून की तरह लागू करने का कोई रास्ता निकाल लेंगे.

    इस तरह ये चलताऊ सुधार असल में शोषण की पीड़ा से भी अधिक खतरनाक होता है. कील मुहांसों का इलाज करके सामाजिक व्यवस्था के मूल आधार, उसके रक्त अर्थात उसके धर्म और नैतिकता को न बदलते हुए चलताऊ सुधार ले आना एक षड्यंत्र है. इसके जरिये धर्म, शास्त्र और नैतिकता की मूल प्रस्तावनाओं को तात्कालिक चोटों से बचाया जाता है. ये भारतीय द्विजों का सबसे बड़ा षड्यंत्र है.

    राजा राममोहन रॉय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशव चन्द्र या गांधी जैसे सुधारकों ने आज तक भारत में यही किया है. वे इस देश के धर्म दर्शन और नैतिकता पर उतनी ही चोट लगाते हैं जितनी कि यूरोपीय सभ्यता को एकोमोडेट करने के लिए जरुरी हो. वे उससे एक इंच भी आगे नहीं जाते. इसके विपरीत अंबेडकर, कबीर, फूले, पेरियार और ललई सिंह यादव जैसे क्रांतिकारी इससे कहीं आगे जाकर इस धर्म और इसकी नैतिकता पर ही चोट करते हैं ताकि जहरीले पेड़ की जड़ ही सूख जाए. द्विज क्रांतिकारी जहरीले पेड़ के पत्ते और फल नष्ट करते हैं लेकिन उसकी जड़ पर प्रहार नहीं करते.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • कश्मीर का भारत में विलय: महान उपलब्धि है!! — Dr Surendra Bisht

    कश्मीर का भारत में विलय: महान उपलब्धि है!! — Dr Surendra Bisht

    ​Dr Surendra Singh Bisht

    सनातन समाज का पतन होने के कारण भारत का अंतिम विभाजन 1947 में हुआ। पतनशील सनातन समाज के कारण केवल दो पीढ़ी पूर्व मुस्लिम बने जिन्ना इस विभाजन के शिल्पकार बने! 1940 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग में भारत विभाजन का प्रस्ताव पारित कराया। खिलाफत के बाद सनातन धर्म के महान नेताओं जैसे महामना मालवीय, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, लाला हरदयाल, कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर आदि के द्वारा व्यक्त की गई आशंका को ही जिन्ना मूर्त्त रूप दे रहा था। 8 अगस्त 1942 को “अंग्रेजों’ भारत छोड़ो” आंदोलन की घोषणा वाले भाषण में गांधीजी ने कहा – ”मुसलमानों की जो जायज मांग है, वह जिन्ना की जेब में है। या मानो प्रत्येक मुसलमान की जेब में है। पाकिस्तान तब संभव है, जब आजादी आएगी। अतः आजादी की लड़ाई में साथ दो। जितना जायज है, उतना मिल जाएगा, उससे एक इंच भी अधिक पाने के लिए लड़ना होगा।”

    न मुस्लिम लीग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए और न ही अधिकांश मुसलमान। 1943 में राजगोपालाचारी जेल में जाकर गांधीजी से मिले। उन्होंने भारत विभाजन के प्रस्ताव पर गांधीजी की सहमति ली। राजाजी ने भारत विभाजन कैसे हो, इसका एक प्रारूप सबके विचारार्थ प्रस्तुत किया। उसे जिन्ना को भी भेजा। आगे गांधीजी जेल से बाहर आये। गांधीजी भारत के भविष्य पर बात करने जिन्ना को मिले। राजाजी का दस्तावेज साथ ले गए थे। पर जिन्ना उस पर तैयार नहीं हुए। जिन्ना पूरा पंजाब, पूरा बंगाल सहित असम और कश्मीर के साथ मिलाकर पाकिस्तान बनाने पर अड़े रहे। “चतुर बनिया” गांधी से जिन्ना बचते रहे और अंग्रेजों पर भरोसा करते रहे। उसी में गांधीजी ने दबाव बनाने के लिए सार्वजनिक बयान देना शुरू कर दिया – ‘भारत विभाजन मेरी लाश पर होगा!’ अंग्रेज जल्दी भारत छोड़कर जाना चाहते थे, गांधी और कांग्रेस की सहमति के बिना वे देश को आजादी नहीं दे पा रहे थे और भारत को तोड़े बिना भी नहीं जाना चाहते थे। अब अंग्रेजों ने जिन्ना को दबाया कि जो मिल रहा है, ले लो, नहीं तो वो भी नहीं मिलेगा। अंत में गांधी की सहमति से बनी राजाजी योजना के अनुसार ही जून 1947 में भारत विभाजन अंग्रेजों और जिन्ना को स्वीकारना पड़ा। योजना अनुसार, नेहरू के पुरुषार्थ के बावजूद सिंध का एक जिला, थारपारकर को भारत मे नहीं मिलाया जा सका !

    जिन्ना उस आधे अधूरे मिले पाकिस्तान से आहत था। सत्ता हस्तांतरण समझौते के अनुसार देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में मिलने के लिए स्वतंत्र थी। अब जिन्ना कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का षड्यंत्र में लग गए। गांधी – नेहरू भी जिन्ना की बची नाक काटने के लिए आतुर थे। स्वतंत्रता से पहले ही जुलाई 1947 में आपसी विचार (माउंटबेटन, गांधी, नेहरू और पटेल के बीच) के बाद गांधीजी पहली बार कश्मीर पहुंचे। घोषित उद्देश्य महाराजा से शेख अब्दुल्ला को रिहा करने की मांग थी। गांधीजी महाराजा से मिले और कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग रखी। महाराजा तुरंत तैयार नहीं हुए। शाम को महारानी को मिलने बुलाया गया। नेहरू द्वारा भेजी गई फ़ाइल उन्हें दिखाई गई। फ़ाइल देखने के बाद महारानी ने कहा – मुझे क्या करना है ? गांधीजी ने कहा कि मैं लौटने से पहले महाराजा से कश्मीर के भारत में विलय पर सहमति लेना चाहता हूँ। अगले दिन महाराजा ने गांधीजी को मौखिक आश्वासन दे दिया। गांधीजी ने लौटते समय ट्रैन में रिपोर्ट लिखी और नेहरू को भेज दी।

    रियासतों का विलय गांधीजी ने सरदार पटेल को सौंपा था। मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर के भारत में विलय के प्रति सरदार पटेल अनिच्छुक थे। वे व्यवहारिक राजनेता थे इसलिए वे मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर को हमेशा का सरदर्द पालना मान रहे थे। पर कुछ समय बाद जिन्ना ने गलती कर दी। सरदार पटेल के गुजरात की हिन्दू बहुसंख्या वाली जूनागढ़ रियासत को पाकिस्तान में विलय के समझौते पर जिन्ना ने हस्ताक्षर कर दिए। अब सरदार पटेल को बहाना मिल गया। उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी।

    तभी प्रधानमंत्री नेहरू को गुप्त समाचार मिला कि पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने के लिए सेना घुसाने वाला है। नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिख कर नाराजगी व्यक्त की कि विलय समझौते में देरी क्यों हो रही है, जल्दी करो, पाकिस्तान सेना घुसा सकता है। कुछ ही दिनों में पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के पास पहुंच गई, तब आनन फानन में कश्मीर विलय पर हस्ताक्षर हुए। गांधी ने जनरल करियप्पा को आशीर्वाद देकर कश्मीर भेजा। कुछ सामाजिक संगठनों ने श्रीनगर हवाई अड्डे को दुरुस्त करने जैसा मामूली सहयोग भी दिया। सेना ने कश्मीर में पहुंच कर श्रीनगर को बचा लिया।

    अब माउंटबेटन बीच में आ गए। उन्होंने नेहरू पर दबाव बनाया। बीच का रास्ता पर अनौपचारिक (और अघोषित भी) समझौता कर दिया। नेहरू ने तब कश्मीर का मामला सरदार पटेल से निकाल कर अपने हाथ में ले लिया। सेना को रोककर कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले को संयुक्त राष्ट्र संघ में नेहरू ले गए। गांधी और सरदार पटेल उससे बहुत नाराज हुए पर तब तक गलती हो चुकी थी।

    बाद में एक नराधम ने गांधी की हत्या कर दी। सरदार पटेल कमजोर पड़ गए। आगे 1950 में असमय ही सरदार पटेल का देहांत हो गया। कश्मीर समस्या पर पूर्णविराम नहीं लग पाया। तब से कश्मीर के बहाने पाकिस्तान को पीटने का लगातार मौका भारत को मिल रहा है।

    जिन्ना को छोटा से छोटा पाकिस्तान देने की गांधी की कूटनीति और नेहरू के कश्मीर प्रेम का परिणाम है कश्मीर का भारत में विलय! सरदार पटेल और नेहरू की कुछ गलतियों के कारण पूरा कश्मीर भारत मे नहीं मिला सके। सरदार पटेल ने कश्मीर विलय में जो देरी का अपराध किया और नेहरू ने पाकिस्तानी आक्रमण के बाद माउंटबेटन की बात मानकर कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने की गलती की, उसके कारण एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान में अभी भी है। पर मुस्लिम बहुल होते हुए कश्मीर का भारत में विलय तत्कालीन नेताओं की महान उपलब्धि है।

    जिन संगठनों और नेताओं की महत्वकांक्षा के आड़े गांधीजी आ गए, उन्होंने अपने अनुयायियों के दिल- दिमाग में गांधी के विषय में अनेक असत्य बातें घुसा दीं हैं। उसी में गांधी को भगवान मानने वाले सरदार पटेल को महान बताया जा रहा है और पटेल के भगवान को खलनायक सिद्ध किया जा रहा है। कश्मीर के विलय के विषय में दुष्प्रचार भी उसी का हिस्सा है।

    ​Dr Surendra Singh Bisht

    राष्ट्रीय संयोजक – भारत अभ्युदय प्रतिष्ठान (वैकल्पिक नीतियों के लिए शोध, चिंतन व सामाजिक प्रयोगों पर कार्यरत बौद्धिक ​संस्थान)
    मुख्य संपादक – भारत अभ्युदय पत्रिका