Category: आपके आलेख

  • आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया

    Shayak Alok

    पढ़ते पढ़ते ही मैंने पाया कि मेरे प्रिय कई लेखक वगैरह अपने समकालीन दूसरे लेखकों-समीक्षकों-इतर साहित्यिकों को लेकर एक पूर्वग्रह-आक्रामक भाव में भी रहते हैं. कई बार वे मुखर उन्हें कोसते पीटते भी नजर आते हैं. मैंने पाया कि यह लक्षण मुझमें भी है. आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया.

    1.

    समीक्षाओं आलोचनाओं से नहीं
    न ही अफवाहों से
    उस झूठ से भी नहीं जो तुम्हारे चेहरे को सफ़ेद करता है
    न व्यंग्य के कहकहों से
    मुझे शापित करती तुम्हारी आहों कराहों से
    न ही गालियाँ बकने .. धमकाने से
    न पीठ पर
    चाक़ू खंजर चलाने से
    दाखिल खारिज के खेल से भी नहीं
    तुम्हें मारना हो अगर मुझे
    मुझे तुम्हारे जैसा बना दो.

    2.

    मूर्ख पाठकों
    और पूर्वाग्रही कवि मित्रों
    को
    रखो दो किनारों पर
    और तौलो
    बराबर की माप
    ‘क्या कहते हैं कि संतुलन’
    दो चार कविताओं को
    इधर उधर रख देने से आ जाएगा.

    3.

    मेरे लिखे शब्द
    जब मुझे ही भ्रमित करते हैं
    तब मेरा एक सींग निकल आता
    है
    इन्हीं मान्यताओं व शर्तों
    पर
    मैंने कुछ कवियों में एक
    पूंछ को निकलते देखा है.

    4.

    मेरे वैचारिक
    खूंटे से बंधी है मेरे समय की बकरी
    जबकि उनके उनके हाथ
    उनके समय के भेड़ियों की पीठ
    सहलाते हुए
    वे मरेंगे, भेड़िये मरेंगे या फिर बकरी.

    5.

    कवि,
    वे पहले
    तुम्हें अनदेखा करेंगे
    वे फिर
    तुम्हें सहलायेंगे .. शब्दों से बहलाएँगे
    वे फिर तुम्हारी हाड़ मांस की कविताओं को चबायेंगे
    अपने मुंह के खून तुम्हारी आस्तीन में छुपायेंगे
    कवि, वे फिर तुमपर आरोप लगायेंगे
    बहाने में कविता को कवि से बचायेंगे
    सियारों की सियासत में
    लोमड़ियों से भी सावधान रहना कवि
    वक़्त की अदालत में इन सबके खाल उघाड़े जायेंगे ..

  • न्यायालयों को महिलाओं से काम करने के लिए पूछना चाहिए बजाय पतियों को रहरखाव का भुगतान करने का आदेश देने के

    Rajesh Vakharia

    आपने पितृसत्ता (patriarchy) को महिलाओं पर अनेक तरह की पाबन्दी लगाने और नुक्सान पहुँचाने के बारे में शायद सुना होगा परन्तु अभी पुरुषों के अधिकार में काम करने वाले कार्यकर्ता भी पितृसत्ता के खिलाफ अपनी आवाज़ उठा रहे हैं उकना मानना यह है कि आज कल के कोर्ट महिलाओं को आधुनिक विशेषाधिकार तो दे चुके हैंपरन्तु पुरुषों को पितृसत्तात्मक (patriarchal) भूमिकाओं में बाँध रखा है |

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति को पत्नी के रखरखाव के भुगतान के लिए व्यवस्था करनी होगी भले ही उसके पास कोई नौकरी नहीं हो | “कभी कभीदलील(बैलवास्तव में पति कहता है कि उसके पास पत्नी के रखरहव के लिया कोई साधन नहीं है,क्योंकि उसकी नौकरी चली गइ है या उसका व्यवसाय अच्छी तरह से नहीं चल रहा है यह केवल बुरे बहाने है जिन्हे कानून स्वीआर नहीं करता |” बेंच ने कहा।

    सुप्रीम कोर्ट को समझना चाईए कि भारत के अधिकतर पुरुषों के पास सरकारी नौकरी करने वालों की तरह स्थायी नौकरी नहीं हैजिसमे नियमित रूप में वतन मिलता हो अदालतों का चक्कर काटकेकाटके पुरुषों की नौकरीआं चली जाती है उसके बाद वह जो काम लेते हैउसमे उनकी पहले से काम कमाई होती है |

    भारतीय न्यायपालिका अपनी इस सोच में बहुत पारंपरिक जिसके अनुसार पुरुष का कर्त्तव्य प्रदाता का हैऔर महिला का कर्त्तव्य घर पे रहना हमने अदालतों को कभी यह पूछते हुए नहीं देखा कि एक औरत बहार जाएअपनी जीविका खुद कमाए |

    धारा ४९८अ (498a) के लिए नौकरी खोते पुरुष

    अब एक दिनअक्सर महिलाएं अपने पति और ससुराल वालों को परेशान करने और पैसे निकलवाने के लिए खंड 498a (४९८अजैसे आपराधिक कानूनों का दुरूपयोग करती हैंअदालतें उसे महीनों या वर्षों तक ज़मानत नहीं देती हैजिसके कारण उसे और परिवार जनों को वकीलोंपुलिस आदि के आगेपीछे घुमते हुए खूब परेशानियां उठानी पढ़ती हैंअंत मेंवह अपनी ज़मानत करने के चक्कर में अपनी सारी बचत और नौकरी भी खो देता हैन्यायालय इस पहलु पर कभी भी विचार नहीं करते और उसे पत्नी के रखरखाव का भुगतान करने का आदेश देता हैं यद्यपि वह न्यायपालिका के काम करने के तरीके की वझे से बेरोजगार है|

    खंड 498a के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के निचले न्यायपालिका के बहरे कानों पर गिर गया है। अबअदालतों एक मात्र झगड़ा या पत्नी के साथ मतभेद के लिए हत्या के प्रयास मामला पुरूषों पर दर्ज कर रही है|” , राजेश वखारियासेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन के अध्यक्ष (SIFF) कहते हैं।

    वह कहते हैं कि कई ऐसे उदहारण है जिसमे आदमी को देश एक छोर से दूसरे छोर ज़मानत की सुनवाई में भाग लेने के लिए १० बार आनेजाने की ज़रूरत पढ़ीइन सब का कारन यह था की अदालतों ने ज़मानत देने का फैसला स्थगित कर दिया था|

    सुप्रीम कोर्ट को यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए जमानत की सुनवाई के स्थगन द्वारा उत्पीड़न की वजह से नौकरियों ना चली जाए|

    सुप्रीम कोर्ट को पहले जमीनी वास्तविकताओं और अदालतों के चक्कर काटते गरीबमध्यम वर्ग के लोगों की परिशानियों की ओऱ ध्यान देना चाइये नाकि सिर्फ परंपरागत कर्तव्यों की याद दिलाने की बजाये|

    कानून की भी अत्यंत पारम्परिक व्याख्या

    लाखों महिलाएं आज परंपरागत कर्तव्यों से मुक्त होना चाहती है और अदालतों नें इस आधुनिक सोच को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। परन्तु रखरखाव कानूनों की सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या आज भी अत्यंत पारंपरिक और पितृसत्तात्मक है। आज के आधुनिक युग में जब एक ओर महिलाओं के विकल्प और स्वतंत्रता के बारे में बात की जा रही है वहीँ अदालतों का पुरुषों से अपनेअपने पारंपरिक कर्तव्यों को पूरा करने की उम्मीद रखना दोहरा मापदंड है|

    ” न्यायपालिका को पुरुषों को पारंपरिक कर्तव्य से पुरुषों को मुक्त करना होगा अगर वोह महिलाओं की आकांक्षाओं के प्रति गैरपरंपरागत दृष्टिकोण रख रही हैमहिलाओं के लिए आधुनिक विशेषाधिकार देनाजबकि पुरुषों को पारंपरिक उम्मीदों से बंधे हैं– ये दोहरे मापदंड हैं।“, ज्योति तिवारीसेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन के प्रवक्ता कहती हैं।

    हाल ही मेंभारत के विधि आयोग ने कानून मंत्रालय को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसमे यह सुझाव था कि हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन किया जाये कि यदि पति विकलांग है या पत्नी को बनाए रखने के लिए कमाने में असमर्थ हैतो तलाक के दौरान युवा महिला के रखरखाव उपलब्ध कराने का दैत्व्य वृद्ध ससुराल वाले उठाये|

    पुरुषों समाज पर सभी पारंपरिक बोझ क्यों डाले जाये जबकिसमाज और न्यायपालिका महिलाओं को आधुनिक विशेषाधिकार देने में लगी है ?”, ज्योति तिवारी पूछती है|

    अधिकांश पश्चिमी देशों में परिवार न्यायालय एकमुश्त महिलाओं के लिए रखरखाव की अवधारणा को ख़ारिज कर चुकी हैयह सही समय हैभारतीय सरकारों और परिवार अदालतें पारंपरिक पितृसत्तात्मक सिद्धांतों का अभ्यास करना बंद करेंपुरुषों आधुनिक बनने और पितृसत्तात्मक उम्मीदों को पूरा करने के दबाव से बहुत परेशान है| ” कहती है ज्योति |

  • सुठारी गाँव में मनाया गया नदी संरक्षण दिवस

    14 मार्च 2015 को सुठारी मे अंतराष्ट्र्रीय नदी संरक्षण दिवस के अवसरपर सुठारी एवम सुराना के हिंड्न जल बिरादरी के सद्स्यों ने हिंड्ण नदी के जिर्णोधार एवम प्रदुषण मुक्ती हेतु श्पथ ली | और दुषीत भू जल के दूषपरिणामो पर चर्चा भी की | जल बिरादरी सद्स्य अवनीष यादव ने बताया कि इंसान अपने तुछ लाभों के लिये प्रकृति यानी नदी, तलाबों, जंगलों का अधाधुंध विदोहन कर रहा है, जिस कारण आज वह प्रकृति के कोप भाजन का भी पात्र बन रहा है | उन्होंने बताया कि गाजियाबाद का बदला मौसम मिसाज इसका उदाहरण है | बिन मौसम बरसात आज गाजियाबाद के ग्रामीणों की फसलों को बर्बाद कर रही है तो उसकी वजह खुद किसान भी है| आज किसान, नदी केबाढ क्षेत्र व विभिन्न जलमग्ण भूमि को नदी से छीन कर अवैध रूप से खेत बनाना चाह्ता है बिना यह समझे कि प्रकृति से किया गया खिलवाड उसके खेतों की फसलों के साथ उसको भी बर्बाद कर देगा | जल बिरादरी सद्स्य रामपाल यादव ने बताया कि नदियां पृथ्वी रुपी हमारी धरती मां की जल-धमनियां है, यदि इन धमनियों यानी नदी व इसके जल क्षेत्र को नुकसान पहुचाया जायेगा तो हमारी धरती मां बिमार पड जायेगी और फसलों के रुप में हमारा पालन पोषण करने वाली हमारी धरती मां, हमें कुछ भी देने में असमर्थ हो जायेगी | आकाल, सुखा, महमारी वे जरीयें से जिनसे प्रकृति हमारे द्वारा पैदा किये असुंतलन को दुरुस्त करती है | अत: इन सबसे बचने का एक हि उपाय है कि हम सभी ग्रामीण प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरुक बने | इस हेतु हिंड्न जलबिरादरी सतत प्रयास कर रही है और आप भी इन प्रयासों का हिस्सा बने |

    सौभग्यवश सुठारी खेडा का स्थाप्ना दिवस भी 14 मार्च को होने के कारण जलबिरादरी साथियों सहित सुठारीवासी युवाओं ने केक काट कर इस दिन को यादगार बनाया | सुठारी ग्राम वासीयुवा राहुल यादव ने बताया कि सुठारी वासियों की वंशावली भाटों द्वारा सुरक्षित रखीजाती है | इसके आधार पर ही हमें पुरातत्विक ग्राम सुठारी के स्थाप्ना की सही तारीख का ज्ञान हुआ | दीपक यादव ने बतायाकि सुठारी 14 मार्च 1452 ई. को सोहनगढ के जाग्सी द्वारा अपनी पत्नी मोहनदेयी (बुलद्शहर निवासी) के साथ हिंड्न नदी के निकट के ऊच्चे टीले पर बसाया जो आज भी वही विद्यमान है | हिंड्न नदी के जल ने कितने ही गांवों को बाढ से लीला हो लेकिन सुठारी हमेशा हिंड्न की कृपा का पात्र बना रहा है | अत: हिंड्न नदी के समुचित सम्मान एवम संरक्षण का दायित्व भी सुठारी वासियों का ही बनता है | इसी उद्देशय से हम सुठारी खेडा का स्थाप्ना दिवस व अंतराष्ट्र्रीय नदी संरक्षण दिवस अब हर साल एक साथ14 मार्च को बनाते रहेंगे ताकि हमारी आने वाली और आज की पीढी हमारी संस्कृति तथापर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील बने |अन्य साथीयों मेंअमित, सचिन, विकास, जितेंदर, अंकित, लोकेश, जयपाल, योगिंद्र, उपेंद्र, सन्नी, छोटू आदि मौजूद रहे|

  • ‘Enjoy & Be Happy…’ लिखकर पति ने कर ली आत्‍महत्‍या

    Rajesh Vakharia

    पति अपनी पत्‍नी से प्रताडि़त होकर सुसाइड करने से पहले परिजनों, दोस्‍तों और प्रशासन के लिए सुसाइड नोट छोड़ गया है। जो कि कुछ इस प्रकार है- भारत में इस तरह का कानून क्‍यों बना, जिसमें एक लड़की के मौखिक बयान को सच मानकर संबंधित सभी लोगों को परेशान किया जाता है। दूसरे पक्ष को तो अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया जाता है। लड़की के सिर्फ मौखिक बयान पर ही दूसरों को आरोपी बना दिया जाता है। पति कहता है कि, कोई नहीं, एंज्‍वॉय एंड बी हैप्पी इन योर लाइफ। लास्ट रिक्वेस्ट, प्लीज लीव माई ऑल फैमिली मेंबर्स।’

    झांसी. दहेज प्रथा के मामले में एक बैंक कर्मचारी अवधेश ने फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली। पति अपनी पत्‍नी से प्रताडि़त होकर सुसाइड करने से पहले परिजनों, दोस्‍तों और प्रशासन के लिए सुसाइड नोट छोड़ गया है। जो कि कुछ इस प्रकार है- भारत में इस तरह का कानून क्‍यों बना, जिसमें एक लड़की के मौखिक बयान को सच मानकर संबंधित सभी लोगों को परेशान किया जाता है। दूसरे पक्ष को तो अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया जाता है। लड़की के सिर्फ मौखिक बयान पर ही दूसरों को आरोपी बना दिया जाता है। पति कहता है कि, कोई नहीं, एंज्‍वॉय एंड बी हैप्पी इन योर लाइफ। लास्ट रिक्वेस्ट, प्लीज लीव माई ऑल फैमिली मेंबर्स।’

    आत्‍महत्‍या करने से पहले पति द्वारा लिखा गया सुसाइड नोट।

    सुसाइड नोट में लिखा है कि, जिस दरवाजे कभी पुलिस नहीं आई, अब वहां हर दिन पुलिस आती है। मेरे माता-पिता को पुलिस थाने उठाकर ले जाती है। दफ्तर में मेरी इज्‍जत सभी के सामने उछाल दी गई। पति ने लिखा है कि वह सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक के काम को बेहद पसंद करता था। शादी से पहले जीवन खुशियों से भरा था, लेकिन शादी होते ही जिंदगी नर्क बन गई।

    पति ने अपने सुसाइड नोट में यह भी लिखा है कि उसकी पत्‍नी उन्‍नति और भाई अभिषेक ने उस पर दहेज के झूठे आरोप लगाए। वे कहते हैं कि शादी में 20 लाख रुपए नकद और अन्‍य कीमती सामान लिए गए, जो कि झूठ है। मेरे पिता पर यौन शोषण का आरोप लगाने की धमकी दी गई। मेरे चेहरे पर तेजाब से हमला करने की भी धमकियां मिली। इतना कुछ होने के बाद भी कानून ने कुछ नहीं किया।

    सुसाइड नोट में अंतिम में लिखा है कि- मम्‍मी-पापा प्‍लीज मुझे माफ कर देना और अपना ख्‍याल रखना। यदि आप लोग खुश नहीं रहेंगे तो मेरी आत्‍मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। किसी के भी आंखों में आंसू मुझे सदैव तकलीफ देते रहेंगे। मैं उन लोगों को हमेशा याद रखूंगा, जो मेरे बुरे वक्‍त में भी मेरे साथ थे। इस सुसाइड नोट में महिला थाना, सीओ, एसएसपी, डीआईजी, आईजी, मानवाधिकार और महिला आयोग को भी नामित किया गया है।

  • देव भूमि उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में बन रहा सभी सुविधाओं से संपन्न ”आदर्श गौ निवास”

    ”नयाल सनातनी” एवम् सर्वदलीय गौरक्षा मंच

    सर्वदलीय गौरक्षा IMG-20150208-WA0031मंच की प्रेस विज्ञप्ति बताया गया है की ”माँ नन्द एवं नैना देवी” के पुण्य भूमि नैनीताल जिल्ले के हल्द्वानी में मंच की ओर से आदर्श गौ-निवास ”श्री गिरधर गोपाल गौशाला” रजिस्टर्ड का निर्माण कार्य बहुत तेजी से हो रहा है। जल्द ही उत्तरखंड के मुख्य मंत्री जी से इस गौ-निवास के उद्घाटन की कोशिस जारी है। गौशाला में वर्तमान में तीन सेड बन चुके है, जिनके लगभग 100 गौवंश के लिए पर्याप्त स्थान है। साथ ही सहयोग से आगे 45 x 30 का  पक्का गौ-निवास भी बनाने का विचार है जिसमे पहले माले पर 16 संस्कार केंद्र एवं गौ आधारित प्रसिक्षण केंद्र स्थापना की योजना है । साथ ही कुट्टी- हरा -सुखा चारे हेतु एक बड़े कमरे का निर्माण भी पूर्ण हो चूका है।  गौशाला में एक सुन्दर रेम्प बना कर उच्च स्थान में श्री गिरधर गोपाल भगवान का पहाड़ की आकार का सुन्दर मंदिर निर्माण चल रहा है, जो गौशाला के साथ-साथ गौभक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा। गौशाला समिति के अनुसार गौशाला में पहाड़ की देशी गौवंश को संग्रक्षित करने के आलावा यहाँ पर देश भर की 28 प्रजाति की देशी गौवंश की ब्रिड को संग्रक्षित करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस आदर्श गौशाला के प्रारम्भ के बाद जल्द ही ”सर्वदलीय गौरक्षा मंच” पुरे उत्तराखण्ड के हर जिल्ले में एक आदर्श गौ-निवास की स्थापना की योजना पर भी कार्य कर रही है ताकि आवारा और ग्राम वासियों के लिए बेकार गौवंश को संगरक्षण दिया जा सके। पुरे देश में गौवंश पर हो रहे अत्याचार की तरह यहाँ पहाड़ में भी गौवंश को गावं से निकाल कर जंगलों में छोड़ दिया जा रहा है। यह छोड़ा हुआ गौवंश या तो बाघ शेर का निवाला बनाता है,या कसाई इन्हें उठा ले जाते है। कुछ घटनाएँ तो येसी सुनने में आई खेतो का नुकसान होता देख ग्राम वासी गौवंश को जंगल में किसी पेड़ पर कस कर बाध कर आ जाते है जिससे गौवंश भूख प्यास से अपने प्राण त्याग देते है। इस सब परिस्तिथियों को देख कर ही मंच ने अब पहाड़ में गौ सेवा का कार्य सुरु किया है क्योकि शहर में सेवा और सहयोगी बहुत हो जाते है पर गावँ में सहयोग ही महान पुण्य का कार्य है।

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    देव भूमि उत्तराखण्ड की गिरधर गोपाल गौशाला को करें यथा शक्ति सहयोग आपका 100 रुपये का भी सहयोग एक विशाल गौशाला बनाने और गौसेवा में मददगार होगा …. …

    सनातनी विचार !

    गौ-निवास-गोष्ठ एवं आदर्श गौशाला ( 33 करोड़ देवी – देवताओं का देवालय ) जहाँ सिर्फ देश, भारतीय प्रजाति के गौवंश हो में किया गया सतकर्म करोड़ों-करोड़ों गुना आधिक फल देता है। ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” !

    जैसे —–

    1 – पुंसवन संस्कार ! गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। यह ”पुंसवन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ -शाला में अनेको गौमाताओं और नंदी बैल, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    2 –  सीमन्तोन्नयन संस्कार !  सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

     यह ”सीमन्तोन्नयन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    3 – नामकरण ! जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। अगर यह ”नामकरण संस्कार” स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    4 – निष्क्रमण संस्कार ! दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश निष्क्रमण का अभिप्राय है। 

    बाहर निकलकर इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन, 33 कोटि देवी देवताओं को धारण करने वाली गौमाताओं का दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण कराया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। विद्द्वानो के मतानुसार इस संस्कार के बाद माँ के दूध के आलावा गौमाता का दूध भी दिया जाना सुरु किया जाता है।

    इस ”निष्क्रमण संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    5 – अन्नप्राशन संस्कार ! इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर अपनी माता एवं गौमाता के दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। गौ दुग्ध से बनी खीर और मिठाईयां शिशु के अन्नग्रहण में अत्यधिक शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। इस ”अन्नप्राशन संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    6 – चूड़ाकर्म संस्कार ! चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ-माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार अगर किसी पवित्र वातावरण वाले गौष्ठ या गौनिवास में सम्पन्न हो तो बहुत उत्तम माना गया है।

    इस ” चूड़ाकर्म संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    7 – विद्यारम्भ संस्कार ! विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। इस ”विद्यारम्भ संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में कराएँ तो बालक अनेकों गुना विद्द्वान विद्यार्थी होता है। 

    8 –  कर्णवेध संस्कार ! हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।

    यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।इस ”कर्णवेध संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

    9 –  यज्ञोपवीत संस्कार ! यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में ब्रह्मलीन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी आदि अनेको विद्द्वानो ने भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध किया है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है। इस पवित्र ”यज्ञोपवीत संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होता  है। 

    10  – वेदारम्भ संस्कार ! ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

    इस अति महत्वपूर्ण ”वेदारम्भ संस्कार”  की सुरुवात विद्द्वान आचार्य महोदय के श्रीमुख से स्वच्छ, सुन्दर वातावरण वाली गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। क्योकि सनातन धर्म के अनुसार ”गौमाता” के सानिंध्य में किया गया वेद पाठ 33 करोड़ देवी-देवताओं के सानिंध्य में किया गया पाठ माना जाता है। 

    11 – केशान्त संस्कार ! गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

    पहले गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

    12 – समावर्तन संस्कार !  गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें गौ-मूत्र, गंगा-जल,गुलाब-जल, सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

     पहले तो गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

    13 –  विवाह संस्कार ! प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

    हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। हमारे देवभूमि उत्तराखण्ड के अलावा भी आज देश भर में कई प्रान्तों में रात्रि तमाम गोष्ठ यानि गौनिवास में शादी-विवाह करते है। ताकि 33 कोटि प्रत्यक्ष देवी-देवताओं का (गौमाता ) आशीर्वाद इस विवाह को मिल सके। जो सुसंस्कारी परिवार है उन्होंने ये परम्परा आज भी नहीं छोड़ी है। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। पहले प्रतेक घर में एक गोष्ट या गौ निवास होता था पर अब समय बदल गया है इसलिए इस ”विवाह संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों के पवित्र सानिंध्य में ”सात फेरे” करायें तो विवाह गठबंधन सात जन्म तक सुरक्षित रहता है यह मान्यता है हमारे सनातन शास्त्रों की जो सदा सत्य ही होती है।  

    14 – अन्त्येष्टि संस्कार ! यहाँ तक की अंतिम संस्कार में भी बैतरणी पार करने हेतु गौ-दान और ”गौमाता” के पूछ पकड़ा कर मृतक शरीर को गौ-लोक धाम की, वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति करायी जाती है। जिससे जीव की आत्मा फिर 84 के फेरे में यानि ”पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनं”

    भज गोविन्दं, भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते !!  आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने लिखा —

    बार-बार जन्म लेने का दुःख, बार-बार मरने का दुःख और बार-बार माँ के पेट में रहने का दुःख क्यों भोग रहा है ? अरे मूढ़मति !! (इन दुखों को समाप्त करने के लिए) 33 करोड़ देवी-देवताओं का शुद्द निवास स्थान गौशाला में बैठ कर श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, या अपने-अपने इष्ट को भजों। —

     इस तरह सनातन धर्म के प्रतेक संस्कार में गौमाता एवं गौवंश का अतिमहत्वपूर्ण स्थान था, है, रहेगा। यहाँ तक की किसी कारण वस किसी के पितर नीच योनी में चले गयें है,या प्रेत योनी में गये अपने ही पितर पुरे परिवार को परेशान करते है तो सनातन शास्त्रों के अनुसार एक नंदी बैल को छोड़ा जाता है। गौदान किया जाता है। पर आज के समय में नंदी बैल को खुला छोड़ने का मतलब कसाई- गौहत्यारों को दावत देना और पाप को मोल लेना है। इसलिए आज का मानव भी अपने पितरों की तारण-तरन के निमित गाय, बछिया, बछड़े  या नंदी बैल का दान किसी सुरक्षित,पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर गौशाला में करें तो वही पुण्य प्राप्त कर सकता है जो वेद पुराणों में वर्णित है । इसीलिए कहाँ गया है ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” —–

  • 7 नवम्बर गौ मैराथन में दिल्ली चलो

    सर्वदलीय गौरक्षा मंच

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    7 नवम्बर गौ मैराथन में दिल्ली चलो ! ये सभी गौ-भक्त, संत – महंत शंकराचार्यों के आलावा हजारों लोग पधारेंगे जंतर मंतर पर 1966 के गौ भक्तों शहीदों को श्रधांजलि देने ..

    गौ-प्राण संत गोपाल दास जी महाराज एवं अनेक संत 30 अक्टूबर से ही दिल्ली जंतर-मन्त्रर पर गौ माता के लिए पूर्ण रूप से अनसन पर बैठ जा रहे है। 7 नवम्बर को या उससे पहले भी जो वहां कभी भी उस तीर्थ में आना चाहे रात्रि को भी दिल्ली में स्थान ना मिलने के कारण तो वहाँ रह सकते है टेंट के अन्दर। यह वह स्थान है, जहाँ हमारे हजारों संतो, गौ-भक्तों को तत्कालीन सरकार ने 7 नवमबर 1966 को गौ-माता का हक़ मांगने पर शहीद कर दिए था। यह द्रश्य २०१३ का है जब भी हम यहाँ धरने पर थे गौ माता को राष्ट्रिय प्राणी घोषित कराने और सभी देश भर के गौ-भक्त संत वहां पधारें थे जिनको गौमाता की पीड़ा दिखती है।

    विश्व के इतिहास में पहली बार एक दौड़ गौमाता के लिए पुरा हिंदुस्तान दौडे़ंगा गौ माता के लिए 7 नवंबर 2014 दिन शुक्रवार को गौभक्त शहीद दिवस के उपलक्ष्य में और देश के गौ वंश को बचाने के लिए जन जागरूकता अभियान एवं गौ मैराथन दौड़ का आयोजन किया जा रहा है जिसमें पुरा देश एक सन्देश के साथ दौड़ेगा गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करो “गौ वंश को बचाना है और देश को आगे बढ़ाना है”।

    7 नवम्बर को गौ मैराथन !

    ठीक 8 बजे सभी गौ-प्रेमी मित्रों जन्तर मन्तर से गौ-मैराथन शुरू होगी और भगवान दास रोड,तिलक रोड,मंडी हॉऊस, बाराखम्बा रोड होकर जंतर – मन्त्रर पर गौ-भक्त शहीद स्थल पर पहुचंगे और गौ-भक्त शहीदों को अपनी श्रधा सुमन अर्पण करने के बाद जंतर-मंतर पर जगद गुरु शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज जी एवं संत गोपाल दास जी महाराज के पवित्र सानिंध्य में गौ-माता के प्रति अपने – अपने उद्गार रखंगे एवं प्रेस के माध्यम से सरकार के सामने गौ-माता को राष्ट्रिय प्राणी ( राष्ट्र माता) का दर्जा दिया जाय यह मांग रखेंगे . इसके ठीक दस बजे सर्वदलीय गौ रक्षा मंच का एक प्रतिनिधि मंडल माननीय प्रधान मंत्री एवं महामहिम राष्ट्रपति जी एवं गृह मंत्री जी को ज्ञापन देंगे …10721281_10204937565816695_1447144588_n

    संत गोपाल दास जी महारा?

    मैं भी दौडुंगा गौ माता के लिए, आप भी दौडे़ंगे गौ माता के लिए, हम सब दौडे़ंगे गौ माता के लिए, पूरी दिल्ली दौडे़ंगी गौ माता के लिए, पुरा देश दौड़ेगा गौ माता के लिए।

    वन्दे गौ मातरम् गौ रक्षा परमो धर्मः जय गौमाता की।

    निवेदक सर्वदलीय गौरक्षा मंच
    हमें चाहिए गौ हत्या मुक्त हिंदुस्तान

  • आत्मविश्वास और सम्मान का नया औज़ार: इनकम रिटर्न

    कोई भी देश-समाज अपनी उत्पादक शक्तियों की पहचान, आंकलन और सम्मान द्वारा ही विकास की सीढियां चढ़ता है. इस मामले में हमारे यहाँ एक गंभीर चूक हुई है. भारत में दो महत्वपूर्ण उत्पादक वर्ग इस से अछूते रह गए जो उनके हाशिये पर छूटे/ढकेले रहने का सम्भवतः बड़ा कारण है. इसका कुप्रभाव इन वर्गों के आत्मविश्वास, सम्मान और विकास की कमी के रूप में साफ़ दिखाई देता है.

    यह दो वर्ग हैं :
    १. घरेलू-महिलाएं.
    २. कृषि क्षेत्र में मजदूर-किसान.

    आय-व्यय-मुनाफे का आकलन अभी भारत में बहुत ही छोटे वर्ग विशेष तक सीमित है. मध्यम दर्जे और ऊपर के व्यवसायी व् नौकरीपेशा (दर्ज) लोग ही इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं.वह भी लगभग मजबूरी में. बाकी बचे लोगों के लिए यह एक बहुत ही जटिल तकनीकी हौआ है और सुनते ही इस सरदर्द को येन-केन-प्रकारेण टालने की कोशिशें जोर मारने लगती हैं. छोटे व्यवसाइयों और उत्पादकों का एक बड़ा वर्ग इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखता है. आय का टैक्स से जुड़ा होना भी एक अड़ंगा है. मुझे लगता है कि “इनकम टैक्स रिटर्न” से इतर इस छूटे हुए वर्ग के लिए यदि सिर्फ “इनकम-रिटर्न” की नयी प्रक्रिया सृजित की जा सके तो क्रांतिकारी बदलाव हो सकते हैं.

    तकनीकि-क्रान्ति के युग में इस कल्पना को साकार कर पाना मुश्किल बिलकुल भी नहीं है. shop.viavisolutions.com एक गृहणी टोल-फ्री नम्बर पर फोन मिलाती है. उसके स्वागत के साथ कंप्यूटरिकृत सिस्टम द्वारा कुछ निश्चित सूचनाएं ली जाती हैं जिससे उसका प्रोफाइल तैयार होता है. इस प्रोफाइल में फिर विभिन्न प्रतिमानों के अनुसार उनके द्वारा किये जाने वाले दैनिक कार्य, घंटे आदि सूचनाएं दर्ज होती हैं और मिनटों में ही स्वतः उक्त व्यक्ति को स्वयं द्वारा किये गए श्रम का आंकलन उसकी अनुमानित कीमत के रूप में प्राप्त हो जाता है.

    ऐसी ही व्यवस्था हर वर्ग के लिए भिन्न प्रतिमानों/ घटकों के आधार पर की जा सकती है ताकि व्यय और आय की स्पष्ट समझ विकसित हो सके. निश्चित ही यह प्रक्रिया घाटे को कम करने और आय को बढाने की दिशा में एकाउंटिंग के प्रति अनजान और उदासीन वर्ग के लिए एक कामयाब नुस्खा साबित हो सकती है.

    सरकारों में यदि ईक्षा-शक्ति हो तो क्या ऐसा सम्भव नहीं है ?
    क्या इस प्रक्रिया के लागू होने से उत्पादक-शक्तियों और देश-समाज के कदम तेज़ी से गुणात्मक बदलाव की तरफ नहीं बढ़ जायेंगे?

  • न्यायपूर्ण-व्यवहार – रवि प्रकाश सिन्हा

    Ravi-Praksh-Sinhaभारत में २८ राज्यों और ७ केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाले सभी १.२४८+ अरब लोगों सहित धरती में २०६ देशों में रहने वाले सभी ७.२५६+ अरब लोग यदि अपने सभी संपर्क/सम्बन्ध को “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक निर्वाह करने लग जाए तो क्या कोइ “अपराध” धरती में हो सकता है……….. विचार करें …………सादर ………. शुभकामना

    ०१-
    सम्पूर्ण-समग्र अस्तित्व/सह-अस्तित्व/ब्रह्माण्ड की हर एक इकाई, प्रत्येक इकाई पर/में/से/के लिए प्रतिबिंबित/अनुबिम्बित/प्रत्यानुबिम्बित है।  सम्पूर्ण अस्तित्व के होने में हर एक इकाई की भागीदारी है, और किसी एक इकाई के होने में सम्पूर्ण अस्तित्व की भागीदारी है.

    ब्रह्माण्ड का यह सह-अस्तित्व स्वरूप “स्वयं” में “प्रमाण” के रूप में होता है, और यही प्रमाण जीन में संगीतमयता-एकरूपता-एकसूत्रता-एकात्मता-तालमेल के रूप में “प्रमाणित” होता है.

    ०२-
    माता-पिता-संतान, गुरू-शिष्य, भाई-बहन, मित्र आदि संबोधन, केवल सम्बन्ध निर्वाह “क्रिया” का नामकरण/संज्ञा ही है, किसी व्यक्ति-विशेष का नामकरण नहीं …….. ये “क्रिया” शास्वत (नित्य-निरंतर) है। अर्थात सम्बन्ध भी शास्वत (नित्य-निरंतर) ही है, अर्थात बने हुए ही हैं, उन्हें केवल जैसा है उसे वैसा ही जानना/समझना, स्वीकारना (मानना), पहचानना और निर्वाह करना है.

    ०३-
    जिज्ञासा= सुख-शान्ति-संतोष-आनंद-परमानंद-चिदानंद-ब्रह्मानंद पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =विचार, वचन, व्यवहार, कार्य में एकसूत्रता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =अनुभव-प्रमाण-बोध-संकल्प-चिंतन-चित्रण(इक्षा)-तुलना-विश्लेषण-आस्वादन-चयन(निर्णय)-मेधस-शरीर-प्रकृति(भौतिक-रासायनिक)-अस्तित्व में संगीतमयता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =स्वयं(मन)-शरीर-सम्बन्ध-परिवार-समाज-राष्ट्र-अन्तर्राष्ट्र-विश्व-प्रकृति-धरती-ब्रह्माण्ड-अस्तितिवा में एकात्मता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =शिक्षा-संसका, न्याय-सुरक्षा, स्वास्थ्य-संयम, उत्पादन-कार्य, विनिमय-कोष आयामों में तालमेल पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
    =अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है वैसा ही जानना/समाझ्ना और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”.

    ०४-
    जहां “पार” लग जाए वह “परिवार”
    जहां हम निश्चिन्त होकर विशवास पूर्वक (अभयता=भय मुक्त) रह सकें वह “परिवार”
    जहां प्रतेक सम्बन्ध-परस्परता का निर्वाह “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक होता हो वह “परिवार”
    परिवार = (सूक्ष्मतम/न्यूनतम स्वरूप) अनेक मनुष्यों द्वारा सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए “सहोदर (शरीर के आधार पर)” परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहयोगिता-सहभागिता-प्रयोजनीयता पूर्वक निर्वाह क्रिया का नामकरण/संज्ञा “परिवार”
    परिवार का व्यापक/वास्तविक स्वरूप “सहोदर (शरीर के आधार पर)” से मुक्त “मानसिकता” के रूप में “अनन्यता” के स्वरूप में सम्पूर्ण विश्व मानव जाती “एक परिवार”

    ०५-
    जो सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित करे सो मित्र (एकोदरवत्), अर्थात “सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “मित्र” (एकोदरवत्).

    ०६-
    मित्र = केवल और केवल भाई/बहन इससे भिन्न कुछ भी नहीं ………. सहोदर (एक माता-पिता की संतान) नहीं होने की स्थिति को संबोधित करने के लिए “मित्र” संबोधन, मित्र की वास्तविकता केवल भाई/बहन के स्वरूप में ही है अर्थात, धरती में “मित्र” संबोधन से संबोधित सभी व्यक्ति मूलतः भाई/बहन ही हैं, इससे भिन्न कुछ भी नहीं …… विचार करें

    ०७-
    जो समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो बहन, अर्थात “समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “बहन”

    ०८-
    जो समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो भाई, अर्थात “समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “भाई”

    ०९-
    जो जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करे सो शिष्य, अर्थात “जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “शिष्य”

    १०-
    जो प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा तृप्त/शांत करे सो गुरू, अर्थात “प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा त्रिप्ती क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “गुरू”

    ११-
    जो अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करे सो संतान, अर्थात “अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “संतान”

    १२-
    जो संरक्षण करे सो पिता, अर्थात “संरक्षण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “पिता”
    जो पोषण करे सो माँ, अर्थात “पोषण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “माता”
    अस्तित्व (समग्र-सम्पूर्ण), सह-अस्तित्व, ब्रह्माण्ड, धरती, प्रकृति, विश्व, अन्तर्राष्ट्र, राष्ट्र, समाज, परिवार, सम्बन्ध, व्यक्ति, शरीर, मन, अस्तित्व (स्वयं).

    १३-
    मनुष्य ने लिखी किताब……….प्रमाण कौन……..मनुष्य या किताब…
    मनुष्य ने बनायी मशीन………प्रमाण कौन……..मनुष्य या मशीन….
    मनुष्य ने बोले शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…………प्रमाण कौन……….मनुष्य या शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…..
    प्रमाण अथवा महत्वपूर्ण और बड़ा कौन………..मनुष्य-स्वयं या उसके द्वारा लिखी, रची, बनायी, बोली गयी चीजें……..

    १४-
    संविधान की मूल उद्देशिका:- “न्याय”,

    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पात्रता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की क्षमता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की योग्यता को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व को पहचानना,
    सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के अनुसार निर्वाह करना,
    सम्बन्ध/परस्परता में पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के निर्वाह से प्राप्त फल-परिणाम का परस्पर अपेक्षा एवं पूरकता के आधार पर मूल्यांकन करना,
    सम्बन्ध/परस्परता में किये गए मूल्यांकन का निष्कर्ष परस्पर-अपेक्षा-पूरकता के अनुरूप होने के फलस्वरूप दोनों सम्बन्धियों का तृप्त होना अर्थात उभय-तृप्त होना.
    सम्बन्ध/परस्परता में इस प्रकार से उभय-सुख होना, उत्सवित होना = न्याय.
    सम्बन्ध/परस्परता में न्याय होना = व्यवहार.

    जाँचिये कि “न्याय” कोर्ट में हो सकता है क्या…….

    १५-
    कौन ज्यादा समझदार है या कम ना-समझ ……

    पढ़ा-लिखा-उच्च डिग्रीधारी और ज्यादातर बीमार आदमी…..
    अनपढ़-निरक्षर बिना डिग्री वाला और ज्यादातर स्वस्थ आदमी……..

    १६-
    वर्त्तमान की समीक्षा :—–

    १. व्यापार-तंत्र = कृषी-बागवानी-पशुपालन-आपसी-लेन-देन सहित बेईमानी, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, लूट, प्रकृति+मानव का शोषण, उत्पादन, उद्द्योग, विपणन, मुद्रा-विनिमय, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……

    २. राज-तंत्र = सरकार-शासन-प्रशासन सहित भीड़, गिरोह, कबीला, मुखिया, राजा, प्रतिनिधि, बन्दूक-द्रोही-विद्रोही-आतंकवादी-पुलिश-सेना, संस्था, संगठन, एन०जी०ओ०, दल, लोक, प्रजा, जन, गण, साम्यवादी, समाजवादी, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……..

    ३. धर्म-तंत्र = व्यवस्था-अव्यवस्था सहित पूजा-पद्धति, भक्ति-उपासना, साधना, ध्यान-योग, आस्था, विचार, वाद, मत, पंथ, समुदाय, सम्प्रदाय, …., …., ….-तंत्र, आदि और इन सब के द्वारा “नियंत्रित”……..

    ४. शिक्षा-तंत्र = विद्यालय सहित प्रचार – कविता, कहानी, किताब, मीडिया/पत्रकारिता (प्रिंट, ऑडियो, विडिओ), इन्टरनेट (गूगल, फेसबुक, ट्विटर, सोशल-मीडिया, …., …., आदि), स्मार्टफोन, टोपी, ड्रेस, झंडा, पर्चा, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, टी-वी, सिनेमा, …., आदि, प्रदर्शन – नाटक, नौटंकी, नाच, हुड़दंग, हंगामा, धरना, अनशन, चर्चा, गोष्ठी, सभी व्यक्तिगत (शारीरिक+मानसिक)/पारिवारिक/सामाजिक/राष्ट्रीय/वैश्विक/प्राकृतिक -गतिविधियाँ एवं उत्सव, पर्व, त्यौहार, जयन्ती, मेला, रैली, आन्दोलन, ,…., …., ….-तंत्र, आदि इन चारों के द्वारा “नियंत्रित”

    नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र का मकडजाल:

    जिससे टीचर्स की मानसिकता अथवा टीचर्स को मानसिक तौर पर “गुलाम” बनाया जा सके. जिससे मानसिक तौर पर अथवा “गुलाम” मानसिकता के अथवा “रोबोट” नागरिक बनाया जा सके, जो “स्वतन्त्र” रूप से कभी भी सोच ही न सकें और इसप्रकार के नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र के मकडजाल के सही, अच्छे और सार्वभौम रूप से कल्याणकारी होने और उसके संवैधानिकता का मूल्यांकन नहीं कर सके, जिससे इन चारों तंत्रों को अपने कार्यक्रमों को संचालित करने में कोइ बाधा न आये और उनके जरूरत के अनुसार कार्य-शक्ति “मशीनीकृत-आदमी” मिल सके.

    १. व्यापार-तंत्र को कामगार अर्थात सामान्य-मजदूर, कम-स्किल्ड-मजदूर, उच्च-शिक्षित/स्किल्ड-मजदूर और लाभ को अधिकतम कर सकने वाले विशेषज्ञ,

    २. राज-तंत्र को कर्मचारी, नौकरशाह और लोक/प्रजा/जन/गण/मन को बल पूर्वक नियंत्रित कर सकने वाले विशेषज्ञ,

    ३. धर्म-तंत्र को अन्धानुकरण करने वाले अनुयायी, भक्त, कार्यकर्ता, सेवादार और सम्मोहित कर सकने वाले वाक्पटु विशेषज्ञ,

    ४. शिक्षा-तंत्र को टीचर्स जिनकी मानसिकता “गुलाम” जैसी हो और दूसरों के मानसिकता को “गुलाम” बनाने वाले विशेषज्ञ.

    मिल सकें………….इसके समाधान हेतु शिक्षा के समग्र-सम्पूर्ण-सार्वभौम स्वरूप/प्रारूप के प्रस्ताव पर विचार करें ………….शुभकामना ………………

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    रवि प्रकाश सिंन्हा
    प्राथमिक शिक्षा परिषद में अध्यापक हैं

  • होमई व्यरवाल्ला Homai Vyarawalla

    UNKNOWN PHOTOGRAPHER  Homai Vyarawalla with her Speed Graphic Camera on her shoulder.Gelatin silver print. Alkazi Collection of Photography

    होमई व्यरवाल्ला भारत की पहली महिला पेशेवर प्रेस-फोटोग्राफर थीं और उन राजनेताओं से कम प्रसिद्ध न थीं जिनकी तस्वीरें उन्होंने उतारी. फोटोग्राफी के प्रति उनका प्रेम भी अपने पति श्री मानेकशा व्यरावल्ला के सानिध्य और प्रेम में अंकुरित हुआ. मानेकशा खुद एक पेशेवर फोटोग्राफर थे और उन्होंने होमई को फोटोग्राफी की बुनियादी बारीकियों से परिचित कराया. संयोगवश 1930 फोटो-जगत का एक ख़ास दौर था जब होमई ने फोटोग्राफी जगत में प्रवेश किया. नयी तकनीकी ने कैमरे को स्टूडियो की बंदिशों से से मुक्त कर दिया था और भारतीय फोटोग्राफर आत्मनिर्भर होने लगे थे. “द बॉम्बे क्रोनिकल” और “द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया” ने, जो छायाचित्रों को विशेष महत्व देते थे, होमई के छायाचित्रों को अपने पन्नों में स्थान दे एक नयी पहचान दी.

    होमई ने आज़ादी से पहले और बाद के सैकड़ों अनमोल पलों को अपने कैमरे में कैद किया. जवाहरलाल नेहरु उनके पसंदीदा विषय थे. फ्लैश चमकने के कारण एक बार उन्हें गांधी जी की डांट भी खानी पड़ी कि इस लड़की को तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक यह मुझे अँधा न कर दे. ख़ास क्षणों को बगैर चूके तस्वीरों में जज़्ब करने की गज़ब की दृष्टि थी होमई के पास जो हमेशा-हमेशा के लिए देशवासियों के लिए धरोहर बनी रहेगी.

    1970 में होमई ने फोटोग्राफी से सन्यास ले लिया.

     

  • गांधी का हत्यारा विचार नहीं पूर्वाग्रह युक्त मिज़ाज तैयार करता है

    Bimal

    आज कई फेसबुक पोस्टों से आभास हुआ कि अतिवादी दलित-पिछड़ा हों या वामपंथी दोनों ही गांधी के कट्टर विरोध में खड़े हैं. गाँधी की आलोचना नहीं बल्कि गांधी को गरियाते-लांछन लगाते ये पोस्ट और कमेन्ट वस्तुतः बिना किसी नुक्ते के हेर-फेर के संघ की साजिश का कॉपी-पेस्ट ही दिखाई देते हैं. रत्ती भर भी फर्क नहीं. यह भी बताया जाता है कि उनके द्वारा बताये जा रहे किस्से-कहानियाँ जो किसी कुंठित दिमाग की बीमार कल्पना के सिवाय कुछ नहीं, किसी साजिश के तहत पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं हैं.

    मुझे गहरा संदेह है कि इन विद्द्व्त जनों ने वास्तव में कभी स्वयं आंबेडकर, गांधी या मार्क्स को पढने के बाद यह धारणा बनायी होगी. इसके उलट वो खुद मुझे एक साजिश का शिकार नजर आते हैं जिसमें अल्प-वयस्क चेतना को पहले शुद्धतावाद के नाम पर बख्तरबंद किया जाता है और फिर उसमें ढेर सारे पूर्वाग्रहों का कूड़ा-भूंसा ठूंस प्रचारक में तब्दील कर दिया जाता है . फिर वह ताजिंदगी नकार में जीता हुआ विष-वमन करता स्वयं और देश-समाज के लिए आत्मघाती दस्ते का हिस्सा बन जिन्दा-शहीद हो जाता है.

    गांधी का हत्यारा विचार नहीं पूर्वाग्रह युक्त मिज़ाज तैयार करता है.

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    छोटा था. पांचवी-छठी में पढता होऊंगा. दादी गाँव से शहर हमारे पास आयीं थीं कुछ दिनों के लिए. तीखे-नाक नक्श , गोरा रंग और झक्क सफ़ेद बॉब-कट कटे हुए बाल . चेहरे पर अनगिनत खूबसूरत झुर्रियां जो बारीक से बारीक मनोभावों को भी लुटाती चलें. प्यार से कोई उन्हें इंदिरा गांधी कहता तो कोई महारानी विक्टोरिया. अपनी भाषा बोलतीं और अपनी ही समझतीं. हम बच्चे इस झंझट में न पड़ उनके भावों को ही पढ़ काम चला लेते. एक दुपहर मैं खेल रहा था और लगा दादी शायद बोरियत महसूस कर रही हैं. हफ्ते भर से ज्यादा हो गए थे उन्हें आये और अब शायद उनका मन ज्यादा उचाट होने लगा था. मैंने लकड़ी के डब्बे वाला ब्लैक-एंड-वाइट टीवी ऑन कर दिया ताकि उनका मन बहल जाए. एकलौता दूरदर्शन लोक-गीत-संगीत का कोई कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था. दादी को मोतियाबिंद था…वो ध्यान लगा कर सुनने लगीं और मैं पास ही खेलता रहा. थोड़ी देर में दादी आयीं मेरे पास और कुछ कहा. मेरी समझ में न आया तो देखा कार्यक्रम खत्म हो चुका था. दादी बार-बार कुछ कहतीं जा रही थीं लेकिन मेरे पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा था. फिर वो खुद ही झट तेज़ी से रसोई की तरफ गयीं और थोड़ा सा चूड़ा-गुड निकाल लायीं और मुझे देते हुए कहा, ” देई दा”. मैंने पुछा, “किसे?”. उन्होंने टीवी की तरफ इशारा किया और समझते ही मैं ठहाका लगा रहा था. दादी मुझे विस्मित ताक रहीं थीं.

    आज सोच रहा हूँ बापू भी तो उन्हीं की पीढ़ी के थे .उन्होंने उस पीढ़ी को आज़ादी का ज्ञान कराया जो आज की पीढ़ी से बहुत ज्यादा भोली-भाली और सुविधा विपन्न थी. जो अपने गाँव के सीवान को ही देश की सीमा कहती और जानती थी.

    सत्य और अहिंसा के नये रास्ते ने वाकई चमत्कार किया था.


    सिद्धार्थ विमल