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  • जनता को मूर्ख बनाते हैं — Ramesh Chand Sharma

    जनता को मूर्ख बनाते हैं — Ramesh Chand Sharma

    Ramesh Chand Sharma

    सावधान जनता समझ रही है
    स्वदेशी के गीत गाते थे,
    स्वदेशी नाम से ललचाते थे,
    स्वदेशी आन्दोलन चलाते थे,
    सड़कों पर नजर आते थे,
    अफवाह, झूठ खूब फैलाते है,
    अब क्या कर रहे हो भाई।।

    बिना बुलाए आते थे,
    झूठा संवाद चलाते थे,
    झूठी कसमें खाते थे,
    नारे खूब लगाते थे,
    सत्ता के लिए छटपटाते थे,
    सत्ता कैसे भी पाते है।।

    जनता को मूर्ख बनाते है,
    ढोंग खूब रचाते है,
    वादे नहीं निभाते है,
    जुमले उन्हें बताते है,
    अपने को भगत कहलाते है,
    अब चेहरा सामने आया है।।

    सत्ता जब से हाथ आई,
    स्वदेशी की खत्म लडाई,
    भूले कसमें थी जो खाई,
    औढली अब नई रजाई,
    रंगीन सियार की कहानी याद आई,
    अब सत्ता का मजा उड़ाते है।।

    जान गए सब भाई बहना,
    पहनें बैठे सत्ता का गहना,
    मौज मस्ती में सीखा जीना,
    अब स्वदेशी की बात नहीं कहना,
    जनता को है अब दुःख सहना,
    इनके हाथ लगी मोटी मलाई है।।

    ढूढ़ लिया अब नया काम,
    पडौसी का काम तमाम,
    छात्रों पर बंदूकें तान,
    अर्बन नक्सली बदनाम,
    हाथ लगा दंड भेद साम दाम,
    नफरत, हिंसा फैलाते है।।

    हाथ लगे अब नए भेद,
    काट रहे आम जनता के खेत,
    गंगा मैया की बेच रहे रेत,
    सन्यासियों के दिए गले रेत,
    काम एक नहीं करते नेक,
    भ्रम भयंकर फैलाते है।।

    अपने ही लोगों को बांटे,
    दुनिया के करें सैर सपाटे,
    मजदूर किसान का गला काटे,
    जनता खाए मुंह पर चांटे,
    धनपतियों के पैर चाटे,
    अपने भर रहे गोदाम।।

    खत्म हो गई क्या मंहगाई,
    रुपए की क्या दशा बनाई,
    जीएसटी नोटबंदी एफडीआई,
    जेबें भर कर करी कमाई,
    लोग कह रहे राम दुहाई,
    इनको जरा नहीं शर्म आई,
    ऐसा राम राज्य लाये है।।

    एक योगी बन गया लाला,
    एक बने प्रदेश के आला,
    गौ माता ढूढे ग्वाला,
    मांस निर्यात में बना देश आला,
    दबके कर रहे धंधा काला,
    खूब डकारी काली कमाई है।।

    भय भेद भूख नफरत बढ़ाई,
    भूल गए अपनी लडाई,
    अमेरिका से सवारी बुलाई,
    कोरोना की बारी आई,
    दूसरों के सिर मंढी बुराई,
    शिक्षा ऐसी पाई है।।

    आँखों में पड़ गए जाले,
    जनता के मुंह में छाले,
    दुश्मन हमने कैसे पाले,
    जीने के पड़ गए लाले,
    इनसे देश संभले ना संभाले,
    घोप दिए छाती में भाले,
    सत्यानाश किया भारी है।।

    कम्पनी बेचीं, कारखाने बेचे,
    रेल बेचीं प्लेटफार्म बेचे,
    कोयले की खान बेची,
    अपनी शान आन बेची,
    फायदे वाली दुकान बेची,
    अब आगे किसकी बारी,
    अक्ल गई इनकी मारी,
    बचने की खुद करो तैयारीII

    Ramesh Chand Sharma

  • शाम ए गम की कसम, आज  ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    शाम ए गम की कसम, आज ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    1922-12-11 to 2021-07-07

    दिलीप कुमार हिनुद्स्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा नाम जिसे देख कर हम बड़े हुए और सिनेमा के रुपहले परदे पर जो नायको का नायक था. दिलीप कुमार उस युग का प्रतीक भी है जिसकी नीव आज़ादी के आन्दोलन के दौरान पडी और जिसे अपनी वैचारिक निष्ठा से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सींचा. किसी भी देश काल का सिनेमा उस देश की समकालीन राजनैतिक परिद्रश्य से प्रभावित होता है. भारत के लिए ये एक बड़ी बात थी के देश का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति के हाथो में था जो वैज्ञानिक चिंतन, मानववाद, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक था. वो दौर था जब हिन्दुस्तानी सिनेमा हमारे रास्ट्रीय मूल्यों से प्रेरणा लेकर लोगो के दिलो में अपनी जगह बना रहा था. ये वो दौर है जब दिलीप कुमार के साथ राज कपूर और देव आनंद ने सिनेमा के रुपहले परदे पर देश को एकता और सकारात्मकता का सन्देश देना शुरू किया. शैलेन्द्र, साहिर और मजरूह ने अपनी लेखनी से एक से बढ़ कर एक गीत लिख डाले जो साहित्य और कविता के किसाब से भी उत्कृष्ट दर्जे का माना जा सकता है. ये वो दौर था जब तलत महमूद, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, हेमंत कुमार, गीता दत्त, नूरजहां, लता मंगेशकर, मन्ना डे, आशा भोंसले और किशोरकुमार की कर्णप्रिय आवाज ने लोगो को अपना दीवाना बना दिया था. नौशाद, शंकर जयकिशन, गुलाम मोहम्मद, सी रामचंद्र, सचिन देव बर्मन, ओ पी नैय्यर, मदन मोहन आदि के संगीत ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी धूम मचा दी थी.

    धर्म के नाम पर पाकिस्तान बनने के बावजूद भी भारतीय राजनैतिक नेतृत्व ने भारत में पनप रही घृणा का मुकाबला वैचारिक तौर पर ही किया और इस दौर में सिनेमा ने प्रधानमंत्री नेहरु के उस धर्मनिरपेक्ष विचार को आत्मसात कर लिया इसलिए रोमांस में बदलाव की झलक दिखाई देती है. बम्बई सिनेमा की नगरी थी और आज इसे बॉलीवुड कहते है और कुछ लोग इसे ‘हिंदी’ सिनेमा भी कहते है लेकिन जिनलोगो ने इस सिनेमा की नीव का पत्थर रखा और इसे आज घर घर तक पहुंचाया, इसकी सबसे बेहतरीन क्लासिकल फिल्मे दी उनमे से अधिकाँश की मातृभाषा हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार ११ दिसंबर १९२२, देवानंद, २६ सितम्बर १९२३ और राज कपूर १४ दिसंबर १९२४ की पैदाइश है और सभी की पैत्रिक गांव आज के पाकिस्तान में है. दिलीप कुमार और राज कपूर की दोस्ती सिनेमा में व्यक्तिगत रिश्तो की महत्ता का सबसे बड़ा उदाहरण है. आम तौर पर राज कपूर और दिलीप कुमार को उस दौर का प्रतिद्वंदी माना जाता था. एक रोमांस का बादशाह था तो दूसरा दर्द का. देवानंद की छवि इन दोनों से भिन्न थी क्योंकि उन्होंने अपनी छवि को शहरी ही बना के रखा. इन तीनो महान कलाकारों की प्रथम भाषा भी हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार और राज कपूर के परिवार पेशावर के प्रख्यात किस्सा खिवानी बाजार के निवासी थे जहा पर २३ अप्रेल १९३० को देश के जाबांज वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और गढ़वाल राइफल्स के ७२ जवानो ने खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदाई खिद्म्गर आन्दोलन के लोगो पर गोली चलने के ब्रिटिश हुकूमत के आदेश को मानने से इंकार कर दिया. उसी पेशावर की क्रांतिकारी धरती से कपूर परिवार ओर खान परिवार बम्बई आ चुका था. राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर थिएटर में काम करते थे और दिलीप कुमार के पिटा फलो का ब्यापार करते थे. राज कपूर और दिलीप कुमार दोनों बम्बई के खालसा कालेज के छात्र रहे और दोनों की दोस्ती बेहद मजबूत थी.

    १९४४ में युसूफ खान को प्रक्यात नायिका देविका रानी ने जब ज्वार भाटा फिल्म के लिए ब्रेक दिया तो उन्हें दो नाम सुझाए गए : एक नाम था जहाँगीर और दूसरा था दिलीप कुमार. युसूफ खान को दिलीप कुमार नाम ज्यादा पसंद आया और उन्होंने सिनेमा के लिए इसे अपना लिया. धीरे धीरे उनकी शक्शियत ऐसे बनी के सारी दुनिया उन्हें दिलीप कुमार के नाम से ही जाने लगी. लेकिन कई बार लोग इन बातो की बारीकी नहीं समझते और अपनी अपनी सुविधाओं के हिसाब से लोगो का मूल्याङ्कन करते है. बहुत से लोग ये कहते है उस दौर में किसी भी फिल्म स्टार की सफलता के लिए ‘हिन्दू’ नाम होना जरुरी था इसलिए बहुत से मुस्लिम कलाकारों ने हिन्दू नाम अपनाया और इनमे दिलीप कुमार, मधुबाला और मीना कुमारी का नाम बहुत जोर शोर से लिया जाता है. लोग उदहारण देके कहते है आज सलमान खान, शाहरुख और आमीर को अपना नाम बदलने की जरुरत नहीं है लेकिन ये सब मात्र भ्रान्तिया और कपोल कल्पनाये है. आखिर नर्गिस, वहीदा रहमान, नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, खुर्शीद, सुरैय्या, नूरजहा, महबूब खान, कमाल अमरोही, साहिर लुधियानवी आदि को अपना नाम बदलने की जरुरत पड़ती. दिलीप साहेब ने इन बातो को पहले ही खारिज कर दिया था.

    दिलीप कुमार को देखना मतलब कला को देखना था. उनकी डायलोग डिलीवरी, उनके हाव भाव , शब्दों का उच्चारण सभी कमाल का था. इसलिए उनके यदि कला का साहित्यकार कहा जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. क्योंकि सिनेमा जिस स्वर्णिम दौर में वह थे उसमे सभी ने अपनी कलात्मक स्वायतत्ता को बचा के रखा और नतीजा हुआ के देश को बेहतरीन सिनेमा मिला. जब राज कपूर ने आवारा, श्री चारसौ बीस, आह, आग, जिस देश में गंगा बहती है बनाई तो दिलीप साहेब ने आन, मेला, नयादौर, मधुमति, तराना, आजाद, यहूदी, लीडर, गोपी, बैराग, आदि फिल्मे दी. कोई भी फिल्म अज भी उतनी ही जवा है जितनी उस दौर में थी. जहा रात की तन्हाई में तलत महमूद की मखमली आवाज में दिलीप कुमार को ‘ए मेरे दिल कही और चल हो या शाम ए गम की कसम आज ग़मगीन है हम, सीने में सुलगते है अरमान, आँखों में उदासी छाई है, ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहा कोई न हो, गाते सुनते है तो लगता है वो हमारे दिल की बात कह रहे है. एक दौर था उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ का टाइटल दे दिया गया और उनकी फिल्मो को देखकर बाहर आते समय लोगो की आँखों में आंसू और सिसकिया ही होती थी. इस प्रकार के गंभीर रोल करते करते उन्होंने अपने को नए सांचे में भी ढाला और वो था नेहरूवियन भारत का सपना. नया दौर( १९५७) ने उनके और हम सबको एक नयी दिशा दे दी. वो उम्मीद की किरण जो आज भी ज़िंदा है. साहिर ने कलम का कमाल किया तो ओई पी नैयर ने अपने संगीत से ऐसा समा बंधा के आज भी नया दौर और उसके गीत हम सबके के दिलो की धड़कन हैं और फिल्म का विषय तो ऐसा के ‘निजीकरण’ ओर मशीनीकरण के खतरों को सबसे बेहतरीन तरीके से यही फिल्म समझा सकती है. जिन्होंने दिलीप साहब का ‘दर्द’ देखा, नया दौर में एक बिलकुल नया रूप देखा. आज भी शादी विवाह में जो गीत सबसे ज्यादा बजता है वो है ‘ ये देश है वीर जवानो का, अलबेलो का मस्तानो का’…. मै समझता हूँ के कोई भी देशभक्ति गीत इतना पोपुलर नहीं हुआ के वो शादियों में सबसे ज्यादा बजे. इस फ़िल्म में दिलीप कुमार वैजयंतीमाला पर फिल्माया ‘ मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार’ और ‘उड़े जब जब जुल्फे तेरी’ आज भी किसी भी नए गाने से ज्यादा रोमांटिक और जवान है. आज जिस प्रकार से हमारे अधिकारों पर अतिक्रमण है उसके विरुद्ध कैसे संघर्ष करे और जीते ये ‘साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाना’ से समझा जा सकता. एक फ्रेम में दिलीप कुमार और वैजयन्तीमाला को देखना बेहद सुखद अनुभूति है.

    नया दौर के बाद आई ‘मधुमति’ ने भी अपने झंडे गाड़े. सलिल चौधरी के कर्णप्रिय संगीत और मुकेश की बेहद खूबसूरत आवाज ने दिलीप कुमार वैजयन्तीमाला की जोड़ी को फिर सिरमाथे लिया. ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं’ या दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा, आजा रे परदेशी, मै तो कब से खडी इस पार ने इस फिल्म की ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा दिए थे.

    दरअसल वो दौर हिन्दुस्तानी सिनेमा का स्वर्णिम युग ऐसे ही नहीं बन गया था. हर एक लीड स्टार की पूरी एक टीम थी जिसके साथ मिलकर पूरी फिल्म को ‘बुना’ जाता था. हर एक किरदार महत्वपूर्ण होता था और फिल्म में कहानीकार, गीतकार और संगीतकार की बेहद अहम् भूमिका होती थी. राजकपूर शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, लता मंगेशकर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मुकेश एक बड़ी टीम थी और राज कपूर अभी भी अपने इन ‘संगी साथियो’ के बिना कोई भी बात नहीं रखते थे. हालांकि दिलीप कुमार इस मामले में अपने मित्र राजकपूर की तरह नहीं थे और उन्होंने अपने को केवल अभिनय तक सीमित रखा था लेकिन उनकी फिल्मो में नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, शकील बदायुनी, साहिर लुधियानवी भी लगभग मज़बूत हिससा थे लेकिन दिलीप साहेब के लिए केवल रफ़ी साहब ने खूबसूरत गाने दिए ऐसा नहीं है. वर्षो तक तलत महमूद ने उनकी ट्रेजेडी किंग की छवि को मज़बूत किया तो मुखेस ने फ्निल्म यहूदी में ‘ ये मेरा दीवानापन है या, मेला में गाये जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है गाकर उसे और मज़बूत किया. रफ़ी साहेब की आवाज तो ऐसा लगता है दिलीप साहेब के लिए बनी थी. ‘आज पुरानी राहो से कोई मुझे आवाज न दे’.. पूरी फिल्म देखकर और दिलीप कुमार को परदे पर गाता देखकर आपका कलेजा मुंह पर आ जाता है. मुझे नहीं लगता के इतना इंटेंस सीन करने के क्षमता अभी किसी में दिखाई देती है.

    पहले सिनेमा एक पैकेज था जिसमे सबके रोल थे और इसलिए कभी स्टोरी तो कभी संगीत फिल्मो को हिट बना देते थे और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह से ढल जाते थे. एक एक फिल्मे बनाने में सालो लगते थे लेकिन जो अंतिम प्रोडक्ट आता था वो अविश्मर्नीयं होता था. मुग़ले आज़म में दिलीप साहेब की भूमिका लाजवाब थी लेकिन क्या अकबर के रोल में पृथ्वीराज कपूर कही कम नज़र आये. मधुबाला ने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और मुहोब्बत की झूठी कहानी पे रोये में जो अभिनय किया वो बेहतरीन था. नौशाद के संगीत, लता मंगेशकर की बेहद हृदयस्पर्शी आवाज ने इस फिल्म को एक सम्पूर्ण फिल्म बनाया. निर्माता के आसिफ ने पैसो की चिंता किये बिना बड़े बड़े सेट तैयार किये और पूरी फिल्म को बनने में तीन वर्ष के करीब लगे. आज किसी के पास इतना समय नहीं है के इतना समय लगाए. नौशाद ने एक बार बताया के प्यार किया तो डरना क्या गाने को कंपोज़ करने में उन्हें पूरी रात लग गयी. आज एक गायक एक दिन में कई गाने का देते है. किसी भी पुरानी क्लासिकल फिल्म को देख लीजिये तो आपको पूरा टीम वर्क दिखाई देता है और हर एक किरदार की अपनी अहमियत है.

    आज ‘क्षेत्रीय’ सिनेमा का दौर भी है. उत्तर प्रदेश बिहार की अवधी- भोजपुरी फिल्मो की खूब कमाई हो रही है, गाने भी अश्लील और भोंडे आ रहे है लेकिन भारत के दो महान कलाकारों के जो सबसे अच्छे दोस्त भी थे, की दो फिल्मे हर एक कला प्रेमी को देखनी चाहिए तो पता चलेगा के वैसे फिल्मे और गीत क्यों नहीं लिखे जाते. दिलीप कुमार वैजयंतीमाला की गंगा जमुना १९६१ में आई और राज कपूर वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी कसम १९६६ में आई. दोनों फिल्म में उत्तर प्रदेश-बिहार के ग्रामीण पृष्ठभूमि बेहद संजीदा तरीके से दिखाई गयी है. मोहम्मद रफ़ी के ‘नैन लड़ जाई है, मनवा माँ कसक होइबे करी पर दिलीप कुमार का डांस आपको बिलकुल पूर्वांचल की उस दुनिया में ले चलता है जहा मिठास है, मेहनत है और प्यार भी है. दूसरी और मुकेश के गाये गीत ‘सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बांचे, करम न बांचे कोई, पर राज कपूर जिस प्रकार से गा रहे है वो हमें बिहार के उन इलाको में ले चलते है जो हम फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों में पढ़ते है. हालांकि तीसरी कसम रेणु की कहानी पर आधारित शैलेन्द्र की फिल्म थी जिसे जनता न पसंद नहीं किया हालांकि आलोचकों की पसंद बनी रही और आज भी एक क्लासिक फिल्म मानी जाती है. सवाल ये है के ऐसी फिल्मो के लिए आपको न केवल दिलीप कुमार या राज कपूर चाहिए अपितु रेणु, शैलेन्द्र, रफ़ी, मुकेश, नौशाद , शंकर जय किशन जैसे दिल से काम करने वाले लोग भी चाहिए.

    दिलीप कुमार आज के दौर में उस स्वर्णिम युग से हमारा साक्षात्कार कराने वाले अंतिम अभिनेता है. उनके प्यारे दोस्त राज कपूर २ जून १९८८ को और देव आनंद ३ सितम्बर २०११ को दिवंगत हो चुके है. शैलेन्द्र, साहिर, नौशाद, शंकर जयकिशन भी नहीं है. दिलीप साहब उस काल की महानतम तिकड़ी के अंतिम लिंक थे.

    आज दिलीप साहेब की मौत के बाद भारतीय मीडिया के पास वैसे लोग नहीं थे जो उनकी उप्लाभ्दियो और विचारधारा पर ईमानदारी से चर्चा कर सके. मीडिया ने उनके जाने की खबर से ज्यादा ताबज्जोह मोदी के मंत्री परिषद् के फेर बदल को दिया. इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती है जब आप एक ऐसे अदाकार की मौत पर भी चार ढंग के आलोचकों या कलाकारो को लेकर बात नहीं कर सकते. मुझे इसमें भी साजिश नज़र आती है और वो ये के दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर आपको हमारी गंगा जमुनी संस्कृति पर चर्चा करनी पड़ेगी. उनको फिल्मो और संगीत पर बात करेंगे तो के आसिफ, महबूब खान, नौशाद, साहिर, शकील बदायुनी और मोहम्मद रफ़ी का जिक्र भी आयेगा. उनकी विचारधारा को पढेंगे तो नेहरु को याद करना पडेगा और समाजवाद का जिक्र करना पडेगा. दिलीप कुमार भारतीया सामाजिक परिवेश को समझते थे इसलिए डाक्टर आंबेडकर को भी जानते थे. महाराष्ट्र के भीतर उन्होंने ओ बी सी यानी पसमांदा मुसलमानों के सवाल पर बड़ी बड़े सभाओं में हिस्सा लिया और सरकार से उनके लिए आरक्षण व्यवस्था की मांग की. दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर उर्दू और मुस्लिम समुदाय का भारतीया सिनेमा में योगदान पर चर्चा करनी पड़ती जो राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटने वालो के लिए पचाना मुश्किल था. जो अपने धर्म और संस्कृति की बात करते हैं उन्हें भी ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’, सुख के सब साथी दुःख में ना कोय’ , आना है तो आरह में कुछ देर नहीं है या राम चन्द्र कह गए सिया से ‘ में दिलीप कुमार ने किस प्रकार का सधा हुआ अभिनय किया है के कोई उनके नज़दीक में नहीं फटक सकता.

    दिलीप कुमार का अभिनय और व्यक्तित्व हमें ये बात भी याद दिलाएगा के कला तभी खिलती है जब वह समाज की सड़ी गली परम्पराओं को चुनौती दे सके, जब वह विचार में देश काल की सीमाओं को पार करे और जब उसका लक्ष्य बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय हो. दिलीप कुमार के अपने समकालीन कलाकारों और उनकी वैचारिक निष्ठाओ को छोड़ दे बाद के दौर में वैचारिक निष्ठा का वो दौर ख़त्म हो गया फिर भी गुरुदत्त, संजीव कुमार, बलराज साहनी , नर्गिस दत्त, सुनील दत्त, मीना कुमारी, नूतन, वहीदा रहमान जैसे कलाकार अपनी कला और सामजिक संदेशो के चलते हमेशा ज़िंदा रहेंगे. दिलीप कुमार को ईमानदारी से याद करने का मतलब होगा आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी पृष्ठभूमि को भी याद करना जिसकी नीव डाक्टर बाबा साहेब आंबेडकर और जवाहर लाल नेहरु ने रखी जहा सबके लिए आगे बढ़ने के अवसर हों और किसी को भी उसकी धार्मिक या जातीय पहचान के आधार पर किसी भी प्रकार के अधिकारों से वंचित न किया जाये.

    दिलीप साहेब की महान विरासत को हमारा सलाम

    Vidya Bhushan Rawat

  • क्या वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ? — Dr Surendra Bisht

    क्या वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ? — Dr Surendra Bisht

    Dr Surendra Bisht

    भारतीय परंपरा में उपलब्ध सबसे प्राचीन सप्तर्षि संवत है जो 6777 ईसा पूर्व (6777 BCE) से प्रारंभ होता है। इसकी जानकारी पुराणों में उपलब्ध है और पंडित चंद्रकांत बाली जी का निष्कर्ष है कि इसे यूनानी इतिहासकारों ने भी लिखकर सुरक्षित किया है। उन्नीसवीं सदी (1883) में ‘बुक ऑफ इंडियन इराज’ के लेखक कंनिंगघम ने भी इस 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ होने वाले सप्तर्षि संवत को अपनी पुस्तक में स्थान दिया है।

    जब से चंद्रकांत बाली जी के लेखों में मैंने सप्तर्षि संवत के विषय में पढ़ना शुरू किया तो मेरे मन में एक प्रश्न अनेक बार उठा – सप्तर्षि संवत 6777 ईसा पूर्व इसी वर्ष से क्यों प्रारम्भ किया गया ? इसका उत्तर ढूंढने का मैंने प्रयत्न किया पर मुझे कोई उत्तर नहीं मिला। वह 6770 ईसा पूर्व से भी शुरू किया जा सकता था, या 7800 ईसा पूर्व से शुरू किया जा सकता था या 6600 ईसा पूर्व से भी शुरू किया जा सकता था ? ऐसे अनेक प्रश्न मन में आये। 6777 ईसा पूर्व में ऐसी कौन सी घटना हुई कि उसी वर्ष से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ ?

    इस प्रश्न का कुछ उत्तर मुझे पंडित बाली जी के ही एक अन्य लेख में मिलता प्रतीत हो रहा था। पर कल जब मैंने श्री ब्लॉगपोस्ट (bharatbhumika.blogspot) पर भारत के प्राचीन इतिहास पर लेख पढ़ा तो मुझे लगा कि वर्षों से जो निष्कर्ष मैं निकालने की कोशिश कर रहा था, वह उसके अधिक नजदीक पहुंचते हुए दिखने लगा। इस पर कुछ विचार करते हैं।

    पंडित भगवत दत्त जी ने ‘भारतवर्ष का बृहद इतिहास’ में सैकड़ों प्रमाणों को एकत्र किया है। उसी में है मेगस्थनीज की इंडिका के प्रमाण। उन प्रमाणों के आधार पर पंडित चंद्रकांत बाली जी ने एक लेख लिखा – ‘यूनानी इतिहासकारों के भारतीय कालसन्दर्भ’। इसमें 3-4 संदर्भ हैं, पर जो अधिक सुस्पष्ट है उसे देखते हैं।

    “From the time of Father Bacchus to Alexander the Great, their Kings are reckoned at 154 whose reigns extend over 6451 years and three months.” (Pliny)

    अर्थात फादर बैकस से सिकंदर महान तक भारतीयों के अनुसार उनके 154 राजा हो गए हैं और उनके राज्यकाल को 6451 वर्ष और 3 महीने बीत चुके हैं।

    इस पर बाली जी पंडित भगवत दत्त जी का वाक्य भी साथ में लिखते हैं – ‘ यह वर्ष संख्या मेगस्थनीज ने भारत के राजवृत्तों से ली । इसमें थोड़ी सी भूल हो सकती है अधिक नहीं।’ साथ में बाली जी अपनी बात जोड़ते हैं – ‘हम बड़ी दृढ़ता से घोषित करते हैं कि यूनानी इतिहासकारों के भारतीय काल संदर्भ सर्वथा आप्त हैं।’ अगर सिकंदर महान के समय भारत में 154 वां राजा प्रतिष्ठित था तो प्रथम राजा कौन था ? स्वाभाविक है वैवस्वत मनु प्रथम राजा थे। पर इसका विवेचन बाली जी के लेखों में नहीं मिल रहा था । पर बाली जी ने यह जरूर लिखा है कि 6451 वर्ष अवश्य सप्तर्षि संवत के हैं।

    इसी बीच कल ही मैंने एक ब्लॉगपोस्ट पढ़ी – भारतभूमिका। उसमें फिर यूनानी इतिहासकारों का उपरोक्त काल संदर्भ दिया है। साथ में इस लेख में यह भी लिखा है कि अगर गुप्त राजा चंद्रगुप्त से पीछे गिनते हैं तो बीच के काल में हुए विदेशी राजाओं को छोड़ दें तो चंद्रगुप्त से वैवस्वत मनु तक 154 राजा बैठते हैं। जिनमें दशरथ पुत्र राम 65 वें हैं और महाभारत में भाग लेने वाले इक्ष्वाकु वंश के बृहदबल 98 वें राजा हैं। अतः मेरे मन में जो समाधान था कि 154 राजाओं में पहले राजा वैवस्वत मनु थे, उसे एक अन्य विद्वान ने भी स्वीकार किया है।

    उपरोक्त बातों के कारण मैं सप्तर्षि संवत के विषय में मन में उठने वाले सवालों के समाधान के नजदीक पहुंच गया। यूनानी इतिहासकार लिखते हैं 154 राजा हो गए और उनका काल 6451 वर्ष और 3 महीने हो गया है। हम सब जानते हैं मेगस्थनीज 3 री शताब्दी ईसा पूर्व में भारत आया था। अगर उपरोक्त दो विद्वानों का कहना 100% सही है कि ये 6451 वर्ष सप्तर्षि संवत के हैं और प्रथम राजा वैवस्वत मनु थे तो इन दो तथ्यों से क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं ?

    पहला निष्कर्ष तो हम यह निकाल सकते हैं कि मेगस्थनीज किस वर्ष में उपरोक्त लेख लिखा होगा ? 6777 ईसा पूर्व में से 6451 वर्ष घटाते हैं तो 326 ईसा पूर्व निकलता है, जो इतिहासकारों के अनुसार सटीक है क्योंकि मेगस्थनीज 321 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त के राज्याभिषेक का भी उल्लेख करता है।

    हमारे लिए दूसरा निष्कर्ष महत्वपूर्ण है जिसे मैं सबके सम्मुख रखना चाहता हूँ। यूनानी इतिहासकारों का 320-30 ईसा पूर्व में लिखना कि भारत के 154 राजाओं का अबतक 6451 वर्ष कार्यकाल हुआ है और उसी के साथ भारतीय परंपरा में 6777 ईसा पूर्व में सप्तर्षि संवत का प्रारंभ होना, इन दोनों तथ्यों को जोड़कर देखते हैं, तो उससे हम एक निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ सप्तर्षि संवत इसलिए प्रारम्भ हुआ क्योंकि उस वर्ष वैवस्वत मनु का राज्याभिषेक हुआ था। अर्थात सप्तर्षि संवत का प्रारंभ और भारत में राज्यव्यवस्था का प्रारंभ आपस मे जुड़े हुए तथ्य हैं।

    6777 ईसा पूर्व से सप्तर्षि संवत प्रारम्भ हुआ क्योंकि उसी वर्ष में वैवस्वत मनु का राज्याभिषेक हुआ था, और इसीलिए 6770 या 6800 या 6600 आदि से सप्तर्षि संवत का प्रारंभ नहीं हुआ। अगर यह निष्कर्ष कि 6777 ईसा पूर्व से प्रारंभ सप्तर्षि संवत का प्रारंभ वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक वर्ष से प्रारंभ हुआ है, तो शायद यह निष्कर्ष भारतीय इतिहास की अनेक समस्याओं और गुत्थियों को सुलझाने में सहयोगी हो जाएगा।

    अब एक प्रश्न है कि उपरोक्त वैवस्वत मनु कौन हैं ? प्राचीन ग्रंथों में अनेक मनु वर्णित हैं। पहले वे मनु हैं जो सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के मानसपुत्र लिखे गए हैं। फिर सात मन्वंतर के प्रारंभ में एक एक मनु लिखे गए हैं। फिर जलप्रलय के समय सृष्टि के बीज बचाने वाले मनु भी ग्रंथों में वर्णित है। इन सबसे भिन्न एक मनु और हैं जिनका वर्णन रामायण, महाभारत, कौटिल्य अर्थशास्त्र में आदि राजा के रूप में है। महाभारत में इस विषय को विस्तार से लिखा है। आप सभी जानते हैं कि महाभारत में लिखा है कि आदि युग में -‘ न कोई राजा था, न राज्य था, न कोई दंड देने वाला था और न ही कोई दंड पाने वाला, सभी धर्म के अनुसार परस्पर की रक्षा करते थे।’ पर बाद जनसंख्या बढ़ी, लोगों में संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी, इसलिए अनाचार भी बढ़ने लगे। ऋषियों ने इन अधर्म जन्य अराजकता पर विचार किया और राज्य संस्था के गठन का निर्णय किया। उन ऋषियों ने अपने में से ही महर्षि मनु को अपना पहला राजा नियुक्त किया। उसी राजा के पुत्र थे इक्षवाकु और पुत्री थी इला। इक्षवाकु से आगे इक्ष्वाकु वंश चला जिसे सूर्यवंश भी कहते हैं। और इला का पुरुरवा से ऎल वंश चला, जिसे चंद्रवंश भी कहते हैं। महाभारत में जिस मनु को पहला राजा बनाने का साक्ष्य उपलब्ध है, वे ही हमारे 154 राजाओं में प्रथम राजा वैवस्वत मनु हैं।

    हमने अपनी बात संक्षेप में रखा दी है। बाकी भविष्य की गोद में।

    Dr Surendra Singh Bisht

  • सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    सरकारी नौकरी प्रतियोगी परीक्षा के छात्र की कहानी — Er Akhilesh Pradhan

    Er Akhilesh Pradhan

    अगर पाठक भावुक कर देने वाले किसी लेख की उम्मीद में हैं तो आपको इस लेख का पहला पैराग्राफ ही निराश कर सकता है, इसलिए आप यहीं से पढ़ना बंद कर सकते हैं।

    एक प्रतियोगी परीक्षा का छात्र ग्रेजुएट होने के बाद जिस दिन सरकारी नौकरी की चाह में कोंचिग/ट्यूशन लेना शुरू करता है। पहले दिन से ही उसके भीतर की अभूतपूर्व संभावनाओं का ह्रास होना शुरू हो जाता है। प्रतियोगिता शब्द का महत्व उसे पहले दिन से ही समझा दिया जाता है कि यह एक ऐसी लंबी रेस है, जिसमें पूरी सहजता से, विनम्रता से अपने आसपास के वातावरण को, उसमें उपस्थित सभी तत्वों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ना है। उतना ही देखना सुनना जानना है जितना आपकी इस रेस के लिए आवश्यक है। इसके अलावा आपको निरंतर छंटनी करने की प्रक्रिया से गुजरना है।

    आगे बढ़ने की इस कसौटी में आपको सबसे पहले अपनी सामाजिकता गिरवीं रखनी होती है। परिवार, मित्र, समाज इन सबको कुछ समय के लिए किनारे रखना होता है, क्योंकि इस अंधी रेस में अमूमन माना‌ यह जाता है कि आप जिस समाज का हिस्सा हैं वह इतना असंवेदनशील है कि वहाँ ये तत्व आपकी बेशकीमती पढ़ाई में आवश्यक व्यवधान पैदा करने के लिए ही बने हुए हैं। यह मानते हुए भी छात्र समाजशास्त्र का क,ख,ग समझ लेता है। पढ़ाई के दौरान ऐसे विरोधाभास आपको हर शास्त्र में मिलते हैं चाहे वह भौतिकशास्त्र हो, खगोलशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र हो, अर्थशास्त्र हो या फिर दर्शनशास्त्र। आप इन विरोधाभासों के बीच बुरी तरीके से उलझते जाते हैं, लेकिन आपको इसका इंच मात्र भी आभास नहीं होने दिया जाता है क्योंकि नौकरी पा लेने की महत्वाकांक्षा को आपके मस्तिष्क में एक ऐसे चिप की भांति फिट कर दिया जाता है जो समय-समय पर आपके लिए खाद पानी का काम करता है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। आपके भीतर जो संभावनाओं के भ्रूण पैदा हो सकते थे, वे जन्म से पूर्व ही मृत्यु को प्यारे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अपने भीतर की संभावनाओं को मूर्त रूप में बचाना ठीक कुछ वैसा ही है कि पानी में आप तैर भी रहे हैं और अपने शरीर में आपको पानी की बूंदों का स्पर्श तक नहीं चाहिए।

    एक प्रतियोगी छात्र अपने पूरी तैयारी के दौरान अगर किसी शब्द से सबसे ज्यादा मुखातिब होता है तो वह है “वस्तुनिष्ठ” या “आॅब्जेक्टिव” । मूलमंत्र यह है कि जितना वह वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से धींगामुस्ती करेगा, उसके प्रमेय को समझेगा, उतनी शीघ्रता से वह कुछ हासिल कर जाएगा। लेकिन इसमें भी आप विडम्बना देखें कि वह आजीवन इस शब्द का का मर्म ही समझ नहीं पाता है। क्योंकि संभावनाओं के समुद्र को सोखने की तैयारी पहले दिन से ही शुरू हो जाती है।

    उदाहरण के लिए देखें कि एक प्रतियोगी छात्र के सम्मुख किताबों के बाद दूसरी सबसे जरूरी चीज न्यूजपेपर होती है। न्यूजपेपर पढ़ने की भी उसे कला बताई जाती है, यहाँ भी उसे नजरबंद किया जाता है, जैसे आपको सिर्फ रूटिन तरीके से संपादकीय ही पढ़ना है और इसके अलावा देश-विदेश, खेल और अर्थशास्त्र से जुड़ी कुछ छुटपुट खबरें। इसके अलावा आपको देश, समाज, मोहल्ले की तमाम घटनाओं को पढ़ना छोड़िए, उनके प्रति उपेक्षा रखनी होती है, प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात हो गई, आपको सोचने की भी मनाही होती है, क्योंकि इससे आपके मशीन बनने का कोई खास संबंध नहीं होता है। वास्तव में होना यह चाहिए कि आपको दृष्टा भाव से वस्तुनिष्ठता के साथ घटनाओं को देखना सीखाना चाहिए लेकिन होता इसका उल्टा है आपको सबजेक्टिव बनाया जाता है, गलती से कहीं आप सबजेक्ट से अलग भटकने का प्रयास भी करते हैं तो आपको उलाहना दी जाती है, ताकि आप सीधे से लाइन पर आ जाएं। यहीं से आपकी ऑब्जेक्टिविटी की धज्जियाँ उड़नी शुरू हो जाती है।

    वस्तुनिष्ठता को लेकर अभी हाल-फिलहाल का एक उदाहरण देता हूं-

    मेरा एक बचपन का मित्र है, मित्र कम भाई ज्यादा है, रेल्वे में कार्यरत है, अभी जब ट्रेन में हो रही अव्यवस्थाओं की वजह से सैकड़ों मजदूरों की मौत हुई, तो उस पेपर कटिंग को मैंने सोशल मीडिया में अपलोड किया, मेरे मित्र की प्रतिक्रिया यह रही – “हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, हमें स्याह पहलू को हटाकर, उस अच्छे पहलू को भी देखना चाहिए कि लाखों मजदूर घर भी तो पहुंचे हैं।” मैं अपने मित्र की इस प्रतिक्रिया से अवाक रह गया। मैंने जवाब में कहा – कहो तो घर पहुंचने वाले लोगों की संख्या से मौतों की संख्या को भाग देकर प्रतिशत निकालें। सीधी सपाट चीज है, हम ऐसे क्यों हो गये हैं कि एक इंसान की मृत्यु भी हमें दिखाई नहीं देती है, मृत्यु मृत्यु है बस, अब हम इसमें भी ऐसे सिक्के पहलू जैसे बेफिजूल के तर्क घुसेड़ेंगे क्या। मित्र ने फिर कहा – रेल्वे की जो क्षमता है वह उस हिसाब से अपना बेस्ट दे रही है। मित्र के इस जवाब के बाद मेरे पास अब बोलने के लिए कुछ नहीं रह गया था। गलती मेरे मित्र की भी नहीं है, वह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है, वह उतना ही सोच पाता है, जितना उसे सोचने के लिए कहा जाता है, सोच के स्तर पर भी वह सीमा नहीं लांघ पाता है। अन्यथा एक रेल्वे कर्मचारी से इतर उसके भीतर का एक आम इंसान यह कहता कि इतने लोगों की मौत एक बहुत बड़ी मानवीय चूक है, रेल्वे के लिए यह शर्मिंदगी का विषय है, रेल्वे को इसके लिए बकायदा माफी माँगनी चाहिए। वह शोक जताता, पीड़ा होती उसे, यह पीड़ा उसके शब्दों से उभर कर आती, एक रेल्वे कर्मचारी होने के नाते वह ग्लानि से भर जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उल्टे उसने जस्टिफाई किया, क्योंकि चीजों को जस का तस देखने के विरूध्द जो आवश्यक प्रतिबंध होते हैं वह व्यवस्था ने बहुत पहले ही उस पर लगा दिए हैं। दोष उसका नहीं है, उसकी ट्रेनिंग ही ऐसी हुई है। इसलिए वह चाहकर भी आॅब्जेक्टिव नहीं हो पाता है, शायद सबजेक्टिव होना ही उसकी नियति में है।

    वास्तव में देखा जाए तो सही को सही और गलत को गलत देखना एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की डिक्शनरी में होता ही नहीं है, भले वह इनके होने करने का प्रपंच कर सकता है, लेकिन धरातल में ऐसा कुछ नहीं होता है। असल में उसकी डिक्शनरी में होती है विवेचना, समालोचना, चैक एंड बैलेंस, योग्यता, सफलता और इस जैसी ढेरों लोकलुभावन शब्दावलियाँ, जो आगे जाकर उसे मशीनरी में फिट करती हैं, जिसकी वह आजीवन पालना करता है।

    जिजीविषा से भरे, कुछ विरले, कुछ एक अपवाद स्वरूप मेरे मित्र हैं, जो सरकारी नौकरी में हैं, वे बार-बार कहते हैं – हमारी ट्रेनिंग में ही हमें शोषणकारी तंत्र की पृष्ठभूमि समझा दी जाती है, असल‌ में प्रबंधन के नाम पर हम कुप्रबंधन के विशेषज्ञ होते हैं। हमें ईशारों में ही समझा दिया जाता है कि व्यवस्था के नाम पर हमें निरंतर अव्यवस्था को सुचारू रूप से संभालना है। हमें वस्तुस्थिति को “दृष्टा भाव” से नहीं वरन् “समता भाव” से देखना होता है, ट्रेनिंग के दौरान ही जब हमें यही सब सिखाया जाता है तो आगे जाकर हममें से अधिकांश लोग दफ्तर या फील्ड में क्या क्या करते होंगे अंदाजा लगा लीजिए। मैं उनकी इस बात पर असहमति जताते हुए इतना ही कहूंगा कि “आपकी ट्रेनिंग उसी दिन से शुरू हो जाती है जब आप सरकारी नौकरी की तैयारी के इस दलदल में कूदते हैं, ट्रेनिंग ऐसा औपचारिक पड़ाव है, जहाँ आपके व्यक्तित्व का अंतिम प्रमाणीकरण होता है।”

    Er Akhilesh Pradhan

  • कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

    कोरोना :: लाकडाउन बनाम प्रवासी महापलायन — Bimal Siddharth

    Bimal Siddharth

    मज़दूरों का पलायन जब शुरू हुआ तो मुझे भी लगा कि उन्हें लॉक डाउन का पालन करना चाहिए। जहाँ हैं वहीं रुक कर करोना संक्रमण को रोकना चाहिए। लॉक डाउन का प्रधानमंत्री का फ़ैसला भी जायज़ लगा था। लगा कि सरकार करोना संकट के प्रति गम्भीर है और युद्ध स्तर पर योजनाएँ बनाते हुए कार्यवाई करेगी। किसी भी वाइरस संक्रमण को रोकने का पहला क़दम टेस्टिंग है। इसके बग़ैर आपको पता ही नहीं चल सकता कि कौन व्यक्ति संक्रमित है और कौन नहीं। लॉक डाउन के बावजूद यदि लोग आवश्यक कामों से बाहर निकल रहे हैं, लेनदेन कर रहे हैं तो संक्रमण की सम्भावना बनी ही रहेगी। टेस्टिंग के अभाव में संक्रमित व्यक्ति अनजाने ही फैलाव का कारण बनता रहेगा। लॉक डाउन तो महज़ संक्रमण की तेज़ गति को स्लो डाउन करने की एक रणनीति है। दुनिया की सभी जागरूक और ज़िम्मेवार सरकारें ऐसा ही कर रही थीं। लॉक डाउन किया। समय रहते टेस्टिंग और उपचार की समुचित व्यवस्था की और करोना से युद्ध में उतर पड़े।

    लॉक डाउन एक ऐतिहासिक घटना थी। अचानक एकसाथ पूरे देश- समाज का स्थिर हो जाना कोई सामान्य बात नहीं थी। दो चार छह दिन तो इस अजीबोग़रीब स्थिति से तालमेल बनाते ही निकल गए। ख़बरों से पता चलता रहा कि पुलिस सक्रिय है। सख़्ती से लॉक डाउन का पालन करा रही है। पब्लिक भी जागरूकता के साथ सहयोग कर रही है। लोग बेहद ज़रूरी काम से ही बाहर निकल रहे हैं। मास्क सबने लगा रखा है। सोशल डिसटेंसिंग का पालन हो रहा है। करोना और पुलिस के डर ने बहुत तेज़ी से एक नयी सामाजिक व्यवस्था को आकार दे डाला है।

    लेकिन टेस्टिंग? कई दिन बीत जाने के बावजूद यह सिरे से ग़ायब थी। यदा कदा थर्मल स्क्रीनिंग की बात ही सुनाई पड़ी। थर्मल स्क्रीनिंग से करोना संक्रमित का पता नहीं चल सकता, इसका ख़ुलासा भी कई दिनों बाद हुआ। टेस्टिंग किट के अभाव की बात आई। मन में सवाल उठा कि इस अभाव को दूर कर पाने में हम क्या असक्षम हैं? कुछ लक्षणों को नाप सकने वाला कोई भी उपकरण रौकेट साइंस तो नहीं! फिर रौकेट साइंस में भी हम कम तो नहीं। ख़बर पढ़ी कि गाड़ियाँ बनाने वाली कम्पनी महिंद्रा के तकनीशियनों ने दो ढाई दिनों में ही वेंटिलेटर बना डाला है। वेंटिलेटर तो एक जटिल और संवेदनशील उपकरण है जिसकी बाज़ार क़ीमत चार- पाँच लाख रुपए है। कम्पनी के प्रमुख ने कहा कि वे मानवता और देशहित में इसे साढ़े सात हज़ार रुपए में ही उपलब्ध करा सकते हैं। फिर ख़बर आई कि पुणे में एक महिला चिकित्सा वैज्ञानिक ने टेस्टिंग किट भी बना डाला है जो काफ़ी कम समय में सटीक परिणाम दे पाने में सक्षम है। सुखद संयोग देखिए कि इस टेस्टिंग किट को जन्म देने के अगले दिन ही महिला वैज्ञानिक ने अपने बच्चे को जन्म दिया।

    प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री केयर्स फ़ण्ड की स्थापना करते हुए देशवासियों से आर्थिक सहयोग का आह्वान किया। महज़ कुछ दिनों में बड़े कारपोरेट घरानों से लेकर आम नागरिकों ने कई हज़ार करोड़ रुपए का सहयोग कर डाला। देश का हर नागरिक, छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, अपनी क्षमतापूर्वक करोना से लड़ने के लिए एकजुट था। राजनीतिक विरोधी भी अपने वैचारिक मतभेद को किनारे रख सरकार के साथ खड़े थे। प्रधानमन्त्री के हर आह्वान को लोगों ने पूरी आस्था से निभाया। थाली बजाओ, थाली बजाया। दीप जलाओ, दीप जलाया।

    प्रधानमंत्री ने क्या किया?

    प्रधानमंत्री ने समय नष्ट किया। इस आपदा से लड़ने के लिए समय ही सबसे बड़ी पूँजी थी। अमूल्य समय नष्ट होता रहा और प्रधानमंत्री हर हफ़्ते दस दिन बाद टीवी पर अवतरित हो चमत्कार का आश्वासन देते रहे मानो लॉक डाउन के ब्रहमास्त्र से ही करोना ख़त्म हो जाएगा। व्यापक टेस्टिंग को सम्भव बनाने के लिए कोई पहलकदमी ही नहीं ली गयी। मेक इन इण्डिया का नारा देने वाले ने इतने विशाल संसाधनों वाले देश पर भरोसा कर ख़ुद उत्पादन करने की बजाय टेस्टिंग किट आयात किया। बढ़ी हुई क़ीमतों पर घटिया किट्स का आयात, जिन्हें आते ही रिजेक्ट करना पड़ा। यदि विज़न होता तो समय रहते आप आशा जैसे फूट सोलज़र्स, शिक्षकों की बड़ी फ़ौज, सरकारी कर्मचारियों की पढ़ी लिखी सक्षम जमात, तीनों सेनाओं की ताक़त, लाखों की संख्या में छोटे मंझोले और बड़े उद्योगों को नियोजित कर सारे उपकरण और टास्क फ़ोर्स तैयार कर सकते थे। मोहल्ले- मोहल्ले गाँव- गाँव टीम नियुक्त कर टेस्टिंग शुरू कर सकते थे। प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ करने की बजाय हेलीकाप्टरों से फूल बरसवाए और अगले हफ़्ते तक एक बार फिर अदृश्य हो गए।

    सन दो हज़ार एक की जनगणना के हिसाब से देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में जा कर कामकाज करने वालों की संख्या सैंतिस करोड़ थी। इनमें से अधिसंख्य दिहाड़ी मज़दूर या फुटपाथों पर ठेला खोमचा लगाने वाले होंगे। इनकी आय बेहद सीमित होगी जिसका अधिकांश हिस्सा वे अपने घरों को भेजते जाते होंगे। आमतौर पर महानगरों में ये संख्या किराए के नर्क में रहती है। लॉकडाउन में जब आय की सारी सम्भावनाएँ ख़त्म हो चुकी हों और टीवी अख़बार रातदिन करोना के भूत से डराते जा रहे हों, वह मदद और हौसले के बिना कब तक टिक पाता? प्रधानमंत्री ने दोनों नहीं दिया। सिर्फ़ प्रवचन दिया। उसके पाँव उखड़ने लगे तो घर तक पहुँचने का साधन भी नहीं दिया। जब वह स्वयं की व्यवस्था- अव्यवस्था से निकल पड़ा तो उसे जहाँ तहाँ रोक पुलिस से पिटवाया ज़रूर गया।

    भारतीय रेल सामान्य तौर पर हर रोज़ सवा दो करोड़ लोगों को यात्रा कराती है। प्रधानमंत्री चाहते तो क्या पूरी अप्रवासी आबादी को विश्वास में लेकर दो चार हफ़्तों में सुकून और सुरक्षा से घर तक पहुँचवा नहीं सकते थे? क्या रेल राष्ट्र की धरोहर नहीं है? क्या रेल ने अपने कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है या फिर तनख़्वाह बन्द कर दी है? अभी भी महापलायन और प्रताड़ना जारी है। लोगों को राज्य की सीमा पर रोका और पीटा जा रहा है। मदद करने वालों को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी, आप की राजनीति किस बात से प्रेरित है जो निरीह आबादी की ऐसी दुर्गति पर उतारू है?

    अब जब अराजक पलायन ने सोशल डिसटेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा दी हैं तब क्या पता करोना कितना कहाँ जा रहा है?

  • भारत में स्वास्थय सेवाओं का हाल — Prof Abhishek K Pandey

    भारत में स्वास्थय सेवाओं का हाल — Prof Abhishek K Pandey

    Abhishek Kumar Pandey

    Assistant Professor

    Department of Botany,

    Kalinga University, Raipur, Chhattisgarh

    पूरे विश्व के साथ- साथ भारत की लड़ाई भी कोरोना से चल रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व और उनकी दूरदर्शिता के कारण भारत यूरोप जैसी विस्फोटक स्थिति का सामना नहीं कर रहा नहीं तो हालात बद से बदतर होते तथा किसी भी सरकार के लिए इसका सामना करना बिल्कुल असंभव हो जाता वर्तमान में इस लेख के लिखे जाने तक देश में सिर्फ 50000 कोरोना संक्रमित केस है और 15000 लोग स्वस्थ होकर अपने घर जा चुके हैं  संभव है कि भारत सितम्बर अक्टूबर तक कोरोना से विजय प्राप्त कर लेगा l कोरोना को लेकर जिस तरीके की संवेदनशीलता भारत सरकार और राज्य सरकारों ने दिखाई है वह निसंदेह प्रशंसा के योग्य है परंतु इस संवेदनशीलता को सभी सरकारों को लंबे समय तक बनाए रखने की जरूरत है क्योंकि देश में मौजूद स्वास्थ्य सेवाएं भी मरणासन्न अवस्था में ही चल रही है।

    कोरोना के बहाने ही सही अब यह सही वक्त है जब हम अपनी स्वास्थय सुविधाओं को लेकर संजीदा हो l स्वास्थ सुविधाओं को लेकर वर्तमान स्थिति कोई खूबसूरत तस्वीर पेश नहीं करती, पूरा देश डॉक्टरों की भयानक कमी से जूझ रहा है भारत में प्रति 11000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर है जबकि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक यह आंकड़ा प्रति डाक्टर 1000 व्यक्तियों का होना चाहिए था, बिहार में यह आंकड़ा 24000 लोगों के बीच एक डॉक्टर तक पहुंच जाता है, सभी सरकारी अस्पतालों में अपनी  4-5 घंटे की ओपीडी ड्यूटी के दौरान औसतन दो से ढाई सौ मरीजों को देखते हैं, जिस दबाव और हड़बड़ाहट में वह मरीजों को निपटाते हैं उसमें से कितने मरीज उचित स्वास्थ्य परामर्श पा पाते हैं यह ध्यान देने योग्य बात है । देश में कई अस्पतालों में बिस्तरो की भारी कमी है हर दूसरे दिन अस्पताल के वार्डो के बाहर मरीजों के लेटे रहने की सूचना आती रहती हैl इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार देश के सरकारी अस्पतालों में एक बेड पर दो मरीजों को रखना पड़ जाता है और डॉक्टर काम के बोझ के तले दबे रहते हैं । देश की अधिकांश ग्रामीण जनता स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर विश्वास करने के लिए विवश हैं l डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 57 फ़ीसदी एलोपैथिक डॉक्टरों के पास मेडिकल योग्यता नहीं है बिहार और झारखंड में यह आंकड़ा और भी डराता है, जहां प्रति लाख लोगों पर औसतन 15% डॉक्टर ही मेडिकल योग्यता रखते हैंl

    कई सारे जिलों में ऑपरेशन थिएटर की भी व्यवस्था नहीं है प्रसुताओं की देखभाल के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है एक्स-रे अल्ट्रासाउंड मशीनों की भारी कमी है राजकीय अस्पतालों में इन जांचों के लिए एक एक महीने की बाद की तारीखे मिलती है l दिल्ली एम्स में तो जहां लोग दूर-दूर से स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए आते हैं तथा कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीड़ित होते हैं, वहां उनको छह छह महीने बाद की तारीख दी जाती हैl

    भारत में असाध्य रोगों की बात की जाए तो लगभग 10 लाख लोग प्रतिवर्ष कैंसर से मर जाते हैं lमलेरिया जैसी साधारण बीमारी से भी भारत में मरने वालों का आंकड़ा दो लाख से ऊपर है वही ट्यूबरक्लोसिस से मरने वालों की संख्या में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है l इसी तरीके से एचआईवी संक्रमितो की संख्या भारत में 21 लाख के आसपास है l  डायबिटीज से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या नित नए रिकॉर्ड बना रही है भारत में एक अनुमान के मुताबिक 10 करोङ व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित हैं  आईसीएमआर के रिसर्च सर्वे के मुताबिक इनमें से 65% लोग ऐसे हैं जिनकी उम्र 25 वर्ष से कम है l इसी तरीके से हर 35 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु हार्ट अटैक की वजह से हो जाती है इस बीमारी में भी भारत दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से विश्व का सिरमौर बना हुआ है । कोरोना एक वैश्विक बीमारी है लेकिन इस देश में आम बीमारियों से भी मृत्यु दर कोई कम नहीं है, भारत में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में बच्चे उल्टी दस्त और डायरिया के शिकार हो जाते हैं।

    भारत में 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए महज 1000000 एलोपैथिक डॉक्टर हैं, इनमें से सिर्फ 1.1 लाख डॉक्टर ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्रों में काम करते हैं l देश में कहने के लिए तो 16 एम्स है लेकिन इनकी स्थिति थर्ड ग्रेड अस्पतालों जैसी ही है इनमें से कई सारे एम्स आधी अधूरी सुविधाओं के साथ चल रहे हैं दिल्ली एम्स को छोड़कर लगभग सभी एम्स में कई महत्वपूर्ण विभागों का निर्माण भी अभी तक नहीं हुआ है, अधिकांश संस्थानों में कार्डियोलॉजी नेफ्रोलॉजी एंडोक्रिनोलॉजी न्यूरो सर्जरी प्लास्टिक सर्जरी जैसे विभाग खाली है एक दो एम्स में तो आईसीयू का निर्माण भी नहीं हुआ है पटना एम्स में तो प्रसूति गृह रक्त बैंक और आपातकालीन सेवाएं भी उपलब्ध नहीं है कहने के लिए तो यह एक एम्स है परंतु सुविधाओं के नाम पर एम्स जैसा कुछ भी नहीं है पूरे एम्स में सिर्फ एक एक्सरे  मशीन है । इसी तरीके से रायपुर एम्स में अट्ठारह सौ नर्सिंग स्टाफ के मुकाबले केवल 200 नर्सिंग स्टाफ है, वही भुवनेश्वर एम्स 68 फैकल्टी मेंबर्स के बलबूते पर चल रहा हैl

    सभी अस्पतालों में मूलभूत सुविधाएं जैसे कि स्ट्रेचर व्हील चेयर जांच केन्द्र पैथोलॉजी सेंटर अल्ट्रासाउंड एक्स-रे और बिस्तरो की भारी कमी है । मैंने व्यक्तिगत रूप से रायपुर के भीमराव अम्बेडकर मेमोरियल अस्पताल में पैथोलॉजी के एक कर्मचारी को बगैर माइक्रो पिपेट की टिप को बदलें बगैर एक साथ कई सैंपल लेते हुए देखा ऐसी जांच से क्या हासिल होगा यह सोचने वाली बात है।

    अगर देश में निजी अस्पतालों की बात की जाए तो उनका व्यवहार इस व्यवस्था में कहीं भी विश्वास नहीं जगाता अभी 1 साल पहले गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से पीड़ित एक बच्चे का इलाज 16 दिन चला जिसका बिल 1500000 आया इसी तरीके से बेंगलुरु के अपोलो अस्पताल में एक एक महिला की 9 बार कीमोथेरेपी और तीन बार सर्जरी कर दी गई जबकि उसको कैंसर था ही नहीं l इस देश में दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से निजी अस्पताल अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए सिर्फ लूट और खसोट में ही लगे हुए।

    केंद्र और राज्य सरकारें अपने बजट का बहुत मामूली हिस्सा स्वास्थ्य के मद में खर्च करती हैं जिसकी वजह से बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं भी लोगों को मिल नहीं पा रही है भारत दक्षिण एशिया में स्वास्थ्य में बांग्लादेश के बाद सबसे कम खर्च करने वाला देश है जो अपनी जीडीपी का महज एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च करता है इस मामले में हम भूटान श्रीलंका नेपाल और मालदीव जैसे देशों से भी गए गुजरे हैं l मेडिकल जर्नल लिंसेट के अनुसार भारत स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और जनसामान्य तक उसकी पहुंच के मामले में 145 वें स्थान पर है।

    भारत सरकार ने 2019-2020 में स्वास्थ्य क्षेत्र में 69 हजार करोड़ के बजट का आवंटन किया है, जबकि देश की स्वास्थ्य प्रणाली को जीवन दान देने के लिए इससे 10 गुने के स्वास्थ्य बजट की आवश्यकता थी, भारत सरकार ने 64 सौ करोड़ रुपए की व्यवस्था आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए की निसंदेह उस मायनों में यह योजना अच्छी कही जा सकती है लेकिन अगर देश में स्थित अस्पतालों की स्थिति नहीं सुधरी तो निश्चित रूप से यह योजना बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों को ही फायदा पहुंचाएगी l इसी तरीके से सरकार का लक्ष्य है देश के हर जिलों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खोलने का है, वहीं सरकार ने अमेरिका से आने वालें स्टंट की कीमतों पर नियंत्रण लगाया है निसंदेह यह दो फैसले भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अच्छे कहे जा सकते हैं लेकिन अभी दिल्ली दूर है सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है तभी हम भविष्य में आने वाली किसी भी स्वास्थ्य आपदा से निपटने लायक खुद को बना पाएंगे।

  • तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    तुम अपने बच्चों से तुरंत क्षमा मांगो — Prof Puneet Shukla

    Prof Puneet Shukla

    ​तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इस बात पर पीट दिया
    क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं मानी।

    तुम
    अपने उन बच्चों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिए मार दिया या छोड़ दिया
    क्योंकि उन्होंने अपनी पसन्द का जीवनसाथी चुना।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये नफ़रत किया
    क्योंकि वे दूसरे धर्म, जाति या विचारधारा के व्यक्ति थे।

    तुम
    अपने उन पड़ोसियों से
    तुरन्त क्षमा माँगो
    जिनको तुमने
    केवल इसलिये सज़ा दिया
    क्योंकि उनके पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ की थीं।

    तुम
    अगर इस तरह क्षमा माँगोगे तो
    तुम्हारी ग़लतियों में सुधार नहीं होगा
    लेकिन, यह संसार थोड़ा सा सुधर जायेगा
    और, आने वाली पीढ़ियों के लिये
    रहने लायक एक अच्छी दुनिया का निर्माण शुरू होगा।

    Prof Puneet Shukla

  • सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    सौ से अधिक तालाबों के पुनरुद्धार व निर्माण कार्यों में भयंकर भ्रष्टाचार की जांच : जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा थे ब्रांड अम्बेसडर — Ashish Sagar

    Ashish Sagar
    Environment Representative,
    Ground Report India

    उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में बुंदेलखंड के 101 तालाबों के पुनरुद्धार-खुदाई कार्यो की वर्तमान भाजपा सरकार ने स्थानीय लोगों द्वारा की गई अनियमितता की जांच की मांग को स्वीकार करते हुए जांच शुरू कराई। महोबा के चंदेलकालीन 56 बड़े तालाबों में 100 करोड़ रुपये से हुआ था मिट्टी निकासी का काम। जलनिगम /सिंचाई विभाग महोबा के अधिशाषी अभियंता समेत तीन अभियंताओं पर कार्यवाही की जा चुकी है।

    मुख्यबिंदु

    • तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने महोबा के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का ब्रांड अम्बेसडर जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा को बनाया था, मिला था यश भारती सम्मान
    • सम्मान पाने वालों को 50 हजार रुपये मासिक पेंशन दिए जाने का एलान था जिसे मौजूदा सरकार ने बन्द कर दिया है।
    • अखिलेश यादव के कार्यकाल में महोबा सहित बाँदा में सिंचाई प्रखंड / जलनिगम ने टेंडरिंग व्यवस्था कर जेसीबी के द्वारा तालाबों का गहरीकरण कार्य किया गया था।
    • अधिकारियों की सेटिंग से काम पाए कार्यदाई ठेकेदारों ने लाखों रुपये की मिट्टी तालाबों से निकाल कर बेची थी।


    सीएम योगी की सरकार में महोबा के चरखारी से बीजेपी नेता गंगाचरण राजपूत ने हाई कोर्ट में पीआईएल दायर की और चरखारी समेत महोबा के 56 तालाबों में मिट्टी खुदाई कार्य की अनियमितता में जांच की मांग की थी। सीएम योगी ने बीते मई माह में पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता अंबिका सिंह के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच कराई, इसकी रिपोर्ट सीएम को प्रेषित की गई है।

    उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 मई-जून माह में 100 करोड़ की लागत से अकेले महोबा में 56 तालाब मसलन शहर के कीरत सागर (पुरातत्व के संरक्षण में), मदन सागर, कल्याण सागर, किराड़ी, कुलपहाड़ तहसील के मोहन तालाब, बड़ा तालाब, बेला सागर, पचपहरा, उर्वरा, सिजहरी, पवा, राजमोहन सिंह तालाब, बिलखी, दाऊपुरा, चरखारी नगर के चंदेल कालीन कोठी ताल, जय सागर, विजय सागर, मलखान सागर, रपट तलैया, गुमान बिहारी सागर, वंशिया, गोला घाट, श्रीनगर तहसील के तालाब में बड़े स्तर पर सिल्ट-गाद हटाने के नाम पर मिट्टी खुदाई का कार्य मशीनों से हुआ था। गौरतलब है तब भी कार्यदाई संस्था जलनिगम -सिंचाई प्रखंड सहित ठेकेदार पर मिट्टी खोदने, मिट्टी बेच लेने के आरोप लगे और शिकायत किसानों ने की थी लेकिन मामला दबाया गया था।

    वर्ष 2016 जून में बुंदेलखंड के भयावह सूखा और अखिलेश सरकार के इन तालाबों का पुनरुद्धार कार्य देखने देश के बड़े पत्रकार फील्ड विजिट पर आए थे। रिपोटिंग के वक्त वरिष्ठ पत्रकारों यथा श्री अरबिंद कुमार सिंह (राज्यसभा संवाददाता दिल्ली), बीबीसी हिंदी लखनऊ के रीजनल हेड समीर आत्मज मिश्रा, तत्कालीन समय ओपीनियन पोस्ट की विशेष संवाददाता संध्या द्विवेदी (अब आजतक डिजीटल कार्यरत) ने महोबा के इन तालाबों सहित झाँसी, बाँदा, चित्रकूट के पाठा बीहड़ों, मध्यप्रदेश के पन्ना जनपद में शिवराज सरकार के तालाबों का रिवाइवल कार्य देखा था।

    मध्यप्रदेश (एमपी) के ज़िला पन्ना में भी तालाबों की खुदाई मिट्टी निकासी मानव श्रम की बनिस्बत जेसीबी से हुई थी। जबकि शासन की मंशा थी यह कार्य मजदूरों से लिया जाए ताकि सूखा प्रभावित क्षेत्र में जलसंकट समाधान के साथ मौसमी रोजगार भी मिले। कमोवेश जो टेंडरिंग तरीका यूपी बुंदेलखंड के बाँदा, महोबा में हुआ वही मध्यप्रदेश के पन्ना में हुआ।

    आज यूपी बुंदेलखंड के यह बे-पानी तालाब एक जनपद महोबा में ही 100 करोड़ रुपये खर्च कर जांच की गिरफ्त में है। बड़ी बात है पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने इन तालाबों पर खर्च धनराशि और बुंदेलखंड को पानीदार बनाने की कवायद को विधानसभा चुनाव के दौरान हर बड़े समाचार पत्रों में जलपुरुष के साथ विज्ञापन देकर चुनावी माहौल बनाया था।

    जलपुरुष राजेंद्र सिंह राणा

    यहां तक कि स्वयं जलपुरुष ने महोबा के मदन सागर में श्रमदान की प्रतीकात्मक रस्में फावड़ा चलाकर पूरी की थी। समूचे बुंदेलखंड में पानी पिलाने की यह रणनीति लखनऊ से दिल्ली तक कौतूहल का विषय बनी थी। महत्वपूर्ण तथ्य है कि महोबा के कीरत सागर में खुदाई के बाद पौधरोपण कार्य हुआ जो चरखारी में भी किया गया। उरई की संस्था परमार्थ ने यह कार्य तत्कालीन डीएम वीरेश्वर सिंह के साथ किया। यह अलग बात है आज कीरत सागर समेत चरखारी के तालाबों में न पौधों की सलामती रही और न इन सभी तालाबों में एजेंडा प्रोजेक्ट के मुताबिक रौनक ज़िंदा बची।

    मुख्यमंत्री योगी ने बुंदेलखंड के 101 तालाबों की जांच रिपोर्ट तलब कर महोबा के कीरत सागर में पुनरुद्धार कार्य मे अनियमितता बरतने वाले तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सिंचाई कार्य मंडल बाँदा डीएस सचान,तत्कालीन अधिशासी अभियंता सिंचाई प्रखंड महोबा विशंभर को निलंबित कर अनुशासनिक कार्यवाही के आदेश दिए है। इनके अतिरिक्त तत्कालीन मुख्य अभियंता (बेतवा) सिंचाई विभाग झाँसी, नवनीत कुमार (सेवानिवृत्त) के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश किया है। इन पर परियोजना स्वीकृति लागत 197.76 लाख के सापेक्ष 508.11 लाख की तकनीकी स्वीकृति का बगैर अनुबंध काम कराने का आरोप है। बुंदेलखंड को तत्कालीन समय गोद लेने वाले आज दूसरे अभियान में व्यस्त है और तालाबों पर भ्रस्टाचार की जांच हो रही है।

    हकीकत ये कि इस 100 करोड़ के बंदर-बांट की तरह यदि बाँदा के तत्कालीन जिलाधिकारी (डीएम) हीरालाल के ‘कुआँ तालाब जियाओ’ भूजल बढ़ाओ-पेयजल बचाओ (लिम्का बुक रिकॉर्ड) की भी जांच हो जाये तो पूत के पांव पालने में दिखते है वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है। फिलहाल बुंदेलखंड की ये कागजी तालाब रिवाइवल गतिविधि कार्यवाही की जद में हैं।

    आशीष सागर, पर्यावरणविद व पत्रकार

  • जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    जेएनयू विरोध के नाम पर मुख्यत: हमें जो सुनाई दिखाई पड़ता है वह यह है कि जेएनयू में लड़के लड़कियां सेक्स कर लेते है, कंडोम का प्रयोग किया जाता है, किसी खास राजनैतिक विचारधारा को ज्यादा सपोर्ट करते है, देश विरोधी गतिविधियां होती है आदि आदि बातों को आगे बढाते हुए करते है।
    ऐसा करने वाले अधिकतर लोग जो हमें दिखाई पड़ते है वह भी किसी राजनैतिक विचारधारा के पक्ष में झुके होने के कारण ऐसा कर रहे होते है व साथ के साथ अपनी कुंठित मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे होते है। इस तरह एक विरोध वाले खुद निजी जीवन में धूर्त, व्यभिचारी, भृष्ट, महिलाओं, बच्चों का शोषण करने वाले व धार्मिक व जातिवादी मद में अंधे होते है। मैं कई ऐसे लोगों को जानता रहा हूँ जो रिश्तों के नाम पर खूब लड़कियों का शोषण करते रहे, जिम्मेदारियों के नाम पर भागते रहे, अबॉर्शन जैसी चीजें भी कराते रहे।
    इस तरह के तर्क इनके ही जैसी मानसिकता वालो को खूब संतुष्ट करते है।
    लेकिन
    इस तरह के तर्क जेएनयू का पक्ष लिए जाने का कारण भी बन जाते है। इन्हीं तर्कों के कारण कि देखिए लोग किस तरह से विरोध कर रहे है और अपना पक्ष विरोधी के विपरीत वाले पक्ष को चुन लेते है।
    अब मेरा सवाल ये है कि जेएनयू में क्या किसी बाहर देश के लोग आते है इसी देश समाज से आते है तो वह क्यों नहीं इसी तरह की मानसिकता वाले हो सकते। इससे भी बढ़ कर धूर्तता यदि चालाक हो जाए तो ऐसे विरोध को अपने पक्ष में क्यों नहीं भुना सकते?

    इस तरह के तर्क से पक्ष हो या विपक्ष वस्तुनिष्ठ तार्किकता तो गायब हो ही जाती है।

    आप जेएनयू के समर्थन कीजिये जो एक तरफ वाले गाली गलौज को हो हुड़दंग के साथ जत्थे के साथ हाजिर हो जाते है। आप विपक्ष लिखिए तो आपको सीधे उठा कर पहले वालो की कैटेगरी में रख दिया जाता है।
    बहुत लोग जेएनयू के विरोध में इसलिये भी बात नहीं रख पाते कि एक तो अपनी इमेज का खतरा उपर से एक पक्ष तो कम से कम आपके साथ चल ही रहा था उनकी नाराजगी क्यों झेलनी। लाइक वगैरह कम हुए तो क्रांति कम हो जानी।

    जेनयू का पक्ष लीजिए या विपक्ष लेकिन कई ऐसे पहलू है जिन पर बात ही नहीं की जाती है

    सबसे पहले बात करते है पुलिस द्वारा उत्पीड़न की। भारत में पुलिस के काम करने की शैली और चरित्र की बात की जाये तो दिल्ली पुलिस को बाकी राज्यों की पुलिस की अपेक्षा कम बर्बर, कम भ्रष्ट माना जाता है। मान लेते है कि ऐसा नहीं भी है केवल दिल्ली पुलिस अपने आप को प्रायोजित कर जाती है। बाकी राज्यों की पुलिस तो अपनी इमेज को प्रायोजित करने के लिए भी तैयार नहीं है। यदि पुलिस का व्यवहार सारी मीडिया के सामने इस प्रकार का है तो यही पुलिस का व्यवहार बाकी राज्यों में बाकी छात्रों के साथ किस प्रकार का होता होगा इसकी केवल कल्पना भर कर लीजिए। नौकरशाही का व्यवहार आपके राजनैतिक पक्ष को तो ध्यान में नहीं ही रखता है यह तो आप भी जानते ही होंगे। आम आदमी किसी भी राजनैतिक पक्ष का हो नौकरशाही उसके साथ कीड़े मकोड़े वाला ही व्यवहार करती है। हर राज्य में सालों से छात्र प्रशासनिक उत्पीड़न झेल रहे होते है कितनों को ही कई कई सालों तक जेल में सड़ा दिया जाता है, हाथ पैर तोड़ कर घर बैठा दिया जाता है। यदि आप बाकी जगह से तुलना करेंगे तो बाकी जगहों को देखते हुए आप यह भी कह सकते है कि यहाँ तो कुछ होता ही नहीं है। यह सुविधा भी केवल जेनयू को ही प्राप्त है कि हर छोटी बड़ी बात पर अटेन्शन लेते है उसका लाभ उठाते है।

    जेनयू को मैं एक सामंती चरित्र का संस्थान मानता हूँ बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में कुछ जातियों को सामंती अधिकार व लाभ प्राप्त है।
    जेनयू के लिए कोई विषय मुद्दा केवल और केवल तब बनता है जब बात जरा सी भी इस संस्थान को मिलने वाले लाभ या अधिकार पर आती है। इसी बात को ये सभी लोगों का मुद्दा बना देते है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि जब तक शोषित वर्ग का शोषण हो रहा मारा पीटा जा रहा सही गलत जैसे भी एनकाउन्टर हो रहा तो ठीक लेकिन जैसे ही जाति विशेष या धर्म की बात आयेगी तो इस समस्या को सबकी समस्या बता कर मुद्दा बनाया जायेगा।

    जैसे कुछ जाति विशेष को मिली सुविधाओं के कारण भारत महान, विश्व गुरु का ढोल पीटा जाता है लेकिन भारतीय समाज को गर्त में ले जाने वाले लोग भी यहीं है वैसे ही जो सुविधाएं लाभ हर एक ब्लॉक स्तर पर होनी चाहिए थी, हर एक जगह के बच्चों को बराबर पढ़ने के अधिकार इतनी ही सुविधाएं होनी चाहिए थी वह कुछ संस्थानों तक समेट कर रख दी। इन बातों का पक्ष जेनयू कभी नहीं लेता, लेगा भी कैसे खुद के महान होने का, कंपटीशन की छंटनी से पैदा हुई विशिष्ठता का स्वाद फिर कैसे मिलेगा।

    चूंकि आज तक विशेष सुविधाएं व लाभ कुछ ही संस्थानों को मिलते रहे है तो अधिकतर कलेक्टर, सचिव आदि इन्हीं संस्थानों से निकल कर आते रहे है। एक बार भी इन लोगों ने इन पदों पर मिलने वाले लाभ, सामंती आधिकारों पर प्रश्न उठाया हो तो बताया जाए। सवाल उठा ही नहीं सकते क्योंकि अपने आप को मिले लाभ आधिकारों को यह खुद की महानता और मेरिट के आधार पर डीजर्व करना मानते आये है, जब पूरी ट्रेनिंग जातिव्यवस्था की तरह भ्रष्टता को दैवीय अधिकार मानने से रही है तो पूरा जीवन खुद को महान समझते हुए भ्रष्टता को अपना अधिकार मानते हुए क्यों न जियेंगे। चूंकि मुख्य पदों पर आजादी के बाद से ही इन्हीं संस्थानों से लोग आते रहे है तो नीति बनाने से ले कर नीतियाँ लागू करने वाले पदों पर रहे है तो क्यों न माना जाये कि देश की ऐसी तैसी करने में इन्हीं लोगों का मुख्य योगदान रहा है।

    किसी संस्थान कि गुणवत्ता का आधार यह तो बिल्कुल नहीं होता कि उस संस्थान के लोग नौकरियों पर व देश विदेश में कितना सेट होते रहे, मेरिट भी गुणवत्ता का आधार नहीं होता है यह नौकरशाही के व्यवहार से साफ साफ दिख ही जाता है और जब नौकरिया यहाँ के लोगों के लिए है तो यही के लोग नौकरियां करेंगे गुणवत्ता के आधार पर विदेश से तो लोग बुलाए नहीं जायेंगे। यहीं कारण है जिन सस्थानों को भारत में नंबर एक दो तीन बोला जाता है उनकी गिनती पूरी दुनिया में 500 तक नहीं होती है। यहाँ यह समझ लेना भी होगा कि किसी संस्था को अच्छे संस्था का दर्जा इस लिए नहीं मिल जाता है कि वह बड़ी बिल्डिंग के साथ खड़ा हुआ संस्थान है, भारत गिनती के संस्थानों में सुविधाएं है भारी फंड आदि की व्यवस्था है असल गुणवत्ता का मालूम ही तब पड़ता है जब हजारों कि संख्या में ऐसे संस्थान हो। छंटनी प्रतियोगिताओं के आधार पर कॉलेज में एडमिशन से लेकर नौकरियों तक में लोगो का लिया जाना कभी गुणवत्ता हो ही नहीं सकता। उल्टा सामंती मानसिकता विशिष्ठता को प्रयोजित ही करेगा।

    पूरी दुनिया में यूनिवर्सिटी की रैंकिंग वहां के छात्रों द्वारा शोध पत्रों की संख्या और गुणवत्ता पर आधारित होती है। यह वह डॉक्टरेट पेपर होते है जो कठोर समीक्षाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय ख्याति के जर्नल में प्रकाशित होते है। इन सब में आप दूर दूर तक नहीं आते है बात करते है आप मेरिट की, विद्वता की, चिंतनशीलता की। नौकरी लगवा देने से एक संस्थान महान हो जाता है तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता है, भाषण बाजी करना चिंतन या काम करना होता है तब भी कहने को कुछ रह ही नहीं जाता है।
    यदि सोशल मीडिया की बयार में बह कर मान ही लिया जाये कि जेएनयू जैसे संस्थान से हर साल हजारों की संख्या में चिन्तनशील लोग निकलते ही रहते है तो देश छोड़ दीजिए, यहीं बता दीजिए दिल्ली के बगल में ही कूड़ा प्रबंधन के लिए कितना काम किया है, दिल्ली के बगल में ही विस्थापित मजदूरों की बस्तियां है वहां के बच्चों के लिए शिक्षा पर क्या काम किया है? यमुना की साफ सफाई जल प्रबंधन पर ही कुछ बता दिया जाये। अपने गांवों में जाकर क्या किया है यह ही बता दिया जाये।
    नौकरी लगाना, विदेशों में सैटल होने के अवसर तलाशना, समाधान या रचनात्मक विकास के बारे में जरा भी विचार न करते हुए विरोध के ढोंग को जीना ही क्या विद्वता और क्रांति होता है?

    गांव देहात का व्यक्ति यह नहीं देखता कि आप कितने बड़े लेख लिखते है कितना महान करुणामय लिखते बोलते है।
    वह यह भी नहीं देख पाता कि तमाम भोग सुविधाओं के पीछे आपका भी जीवन दयनीय परिस्थितियों व शोषण से भरा हुआ है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आप उन लोगों के लिए काम करते है जो उसके शोषण के लिए सीधे जिम्मेदार है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आपको दिया जाने वाला मोटा पैसा उससे ही धूर्तता से लेकर आपकी जेब में आपको सहलाने के लिए डाल दिया जाता है। वह देखता है आपके जीये जाने वाले जीवन को, आपके द्वारा प्रायोजित महान जीवन को और वह लग जाता है अपने जीवन बच्चों को इसी सब की तरफ धकेलने में।
    कोरी भावुकता, अहंकार, रोमांटिक क्रांति के पीछे लेखक, पत्रकार, समाजिक कार्यकर्ता आदि अपने समाज को गर्त में धकेलने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
    आप यह मानने को तैयार ही नहीं है कि समाज से अलगाव आपने अपनी सामंती सोच और फूहड़ताओ के कारण अपने आप को अलग मानने की मानसिकता , सेलेब्रिटिज्म को जीने के लिए किया। बिना व्यवहारिक ज्ञान के, जीवन में उतारे बिना, समाज के साथ जुड़े बिना, बिना सुधारात्मक दिशा में काम किये एक दूसरे को पहनाए हुए विद्वता के तमगे निर्लज्जता से अधिक कुछ नहीं होते।
    और देश में माहौल बनाने को राजनैतिक पार्टियों को भुनाने को फिर जब इतना सब तैयार मिल ही रहा तो केवल अन्ना हजारे टेक्निक ही थोड़े न है। ऐसी जगहों से बे-सिर पैर तरीको से केवल विरोध दर्ज करवा लीजिए लोग खुद ब खुद इनके विपक्ष में हामी भर कर तैयार बैठ ही जाते है। ऐसे विरोध के लिए तो राजनैतिक पार्टियां क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियां, राष्ट्रीय स्तर पर नेता तक खड़े कर देती है/बना देती है/प्रयोजित कर देती है आप तो फिर भी एक शिक्षण संस्थान है।

    चलते-चलते :-

    देश में शिक्षा स्वास्थ्य एक दम मुफ्त होना चाहिए एक समाज अपने देश के व्यक्तियों के लिए, बच्चों के लिए कम से कम इतना संवेदनशील तो होना ही चाहिए, लेकिन चलिए साथ के साथ यह भी देख लेते है कि जब हम जेएनयू में शिक्षा की फीस बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे होते है तो यह भी देखना बनता ही न देश में 12वी तक शिक्षा लगभग फ्री ही रही है, सरकारी अस्पतालों में इलाज बेहद कम रुपयों में उपलब्ध रहा ही तो इन सब कि आज जो हालत है, सर्विस का स्तर जो एक निम्न से निम्नतम स्तर पर जाने पर लगा हुआ है इसके जिम्मेदार क्या विदेशों में रहने वाले लोग है। इसके जिम्मेदार उनमें नौकरियां करने वाले लोग जितने है उससे कहीं ज्यादा हम है। हमारा बच्चा कम फीस में गरीब तबकों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकता है? महंगी फीस नहीं देंगे, महंगे ट्यूशन नहीं लगवाएंगे, कोचिंग नहीं करवाएंगे तो जिम्मेदार माता पिता होने का एहसास कहां से होगा ?
    सामंतवादी मानसिकता बहुत बारीक चीज होती है। थोथी संवेदनशीलता दिखाने से यह ढक नहीं जाती है।
    यदि हमने अपने आपको सरकारी बेसिक शिक्षा के साथ अपने बच्चों को जोड़ा होता , सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से खुद को जोड़ा होता तो क्या ये सब सुधारात्मक दिशा में नहीं बढ़ गए होते। यहां तक कि प्राइवेट स्कूल, अस्पताल भी मजबूर होते सरकार के अंतर्गत ही काम करने को। सरकारे भी उसी स्वभाव की होती जो इन क्षेत्रों के प्रति जिम्मेदारी से काम करती। पूरा ढांचा ही अलग स्वभाव का होता, जब हमारा स्वभाव ही सामंतवादी है, दोगला है तो सरकारों भी ऐसे ही होनी है बिल्कुल कोई अंतर होना ही नहीं है। इन बातों का लेफ्ट राइट मानसिकता से कोई मतलब ही नहीं है।
    इस तरह ढोंग को अपने जीवन में जीते हुए जब हम विरोध प्रदर्शन और समाज को गालियां दे रहे होते है तब हर तरह से समाज का नुकसान ही करते है चाहे यह जानबूझ कर किये जा रहे हो या अनजाने में। आप जेएनयू जैसे संस्थानों के पक्ष में लगातार खड़े रहते है मैं भी पूछता हूँ आपके ही दूर दराज के गांव देहात के लोग जिन्होंने इनके एडमिशन फॉर्म के बारे में भी नहीं सुन रखा होता उनकी क्या गलती कि वह इन संस्थानो से महंगी फीस भरे, शोषण झेले, कम सुविधाओं में रहे। आप क्यों नहीं इस बात का पक्ष लेते कि या तो हर जिले, ब्लॉक स्तर पर अच्छी यूनिवर्सिटी हो या सबको एक जैसा ट्रीटमेंट मिले।

    वास्तविक क्रांति आपके जीवन के भीतर से उपजती है, यह आपकी जीवन शैली जीवन व्यवस्था को बदल कर रख देती है इस क्रांति का सामना करने के लिए वास्तविक ऊर्जा और हिम्मत की जरूरत पड़ती है, जब हम क्रांति को अपने जीवन में नहीं उतार पाते तब क्रांति के रोमांस से ही अपना मनोरंजन करके खुद के कुछ होने का एहसास कराया जाता है। बिना अपवाद भारत के अधिकतर आंदोलन इसी तरह की प्रयोजित रोमांटिक क्रांति के चरित्र के ही होते है इसीलिए देश समाज वहीं रहता है नेता, लेखक, पत्रकार, ब्यूरोकेट अपने अपने खांचों में जिस व्यवस्था से लड़ने का दिखावा करते है उसी को मजबूत करते हुए सफलता की सीढ़िया चढ़ते चले जाते है और समाज और ज्यादा गर्त में इसी तरह के व्यक्तित्वों का निर्माण करता हुआ बढ़ता चला जाता है। 

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • नया राष्ट्रगान

    नया राष्ट्रगान

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    अपने अतीत की महानता के मिथ्या गर्व में डूबा एक देश था
    किसी दूसरी आकाशगंगा में
    किसी और ग्रह पर
    किसी और प्रजाति के लोगों का

    उनकी भाषा से हिंदी में भावानुवाद किया जाए तो कुछ यूँ होगा कि-
    वे खुद को विश्व गुरु मानते थे

    ख़ैर
    उनकी भाषा में उनका भी हमारी तरह एक राष्ट्रगान था
    जैसे हमारा अपना ‘जन गण मन’
    उनका संविधान था
    संसद थी समूचे लोकतंत्र जैसी कोई व्यवस्था थी

    तो वाक़या वहाँ का है
    दूर किसी और आकाशगंगा के किसी ग्रह के किसी एलियन समाज का
    सहूलियत के लिए हम हिंदी भावानुवाद कर लेते हैं
    सहूलियत के लिए हम अपने देश के तंत्र के चश्मे से उनके तंत्र और उस लोक को देख लेते हैं
    अंत में फिर यह तो याद रखना ही है कि यह कहीं और की बात है..

    ~~~

    नए राष्ट्र में जनता सारी राष्ट्रभक्त हो
    राष्ट्र्गान भी नया हो
    इसके साथ प्रधानमंत्री ने रखी
    और एक इच्छा –
    ‘चारण-भाषा ‘
    गूंज रही थीं दोनो सदनों
    में मेज़ों की
    थपथपाहटें

    जन-गण-मन के
    अधिनायक
    विजयी रहे हैं हर मोर्चे पर
    नए राष्ट्र के भाग्य विधाता तो हम हैं ही
    इस पर नहीं
    किसी को अब संदेह
    लिहाज़ा
    बेमतलब हैं ऐसी बातें
    अश्वमेघ को थामे
    चक्रवर्ती गृहमंत्री
    ने ललकारा

    फिर
    विदेश मंत्री ने रखा
    जान मारू सुझाव-हम विश्वगुरू हैं
    क्यों हो फिर हमको मंज़ूर
    वसुधैव कुटुम्बकम से
    एक बालिश्त कम
    राष्ट्र्गान में नाम हों अपने सभी पड़ोसी
    मुल्क़ों के
    आख़िर
    गौरवशाली अतीत में वे सब इसी राष्ट्र का
    हिस्सा थे और
    सम्पूर्ण विश्व को एक दिन इसी राष्ट्र का हिस्सा होना ही है

    खड़े हुए तब जाने-माने
    पर्यावरणविद्
    राज्यसभा की मिली थी कुर्सी
    जिनको
    पिछले साल
    इन्होंने प्रदूषण में किसान और
    मज़दूरों की साज़िश का पर्दाफ़ाश किया था
    एक और पर्दाफ़ाश उन्होंने किया –
    कि
    नदियों का विकास में योगदान अब नहीं रहा
    सो
    नदियों के नाम न रखे जाएँ
    राष्ट्र्गान में

    रक्षा मंत्री ने समंदरों और पर्वतों की
    घनघोर आलोचना कर डाली
    वित्तमंत्री ने की
    ताक़ीद कहीं नोटबंदी और जीएसटी
    धोखे से भी छूट न जाएँ

    सभी सदस्यों ने बारी बारी से
    रखे अपने सुझाव
    और
    सबसे अंत में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव
    महामहिम राष्ट्रपति ने भिजवाया –
    राष्ट्रगान में केवल मंगलवार नहीं सातो दिन रखवाए जाएँ.

    राष्ट्रगान फिर लिखा गया कवियों की भीड़ में
    और हज़ारों पत्रकार एंकर
    टेलीवीजन
    और अख़बारों में बता रहे थे
    दुनिया में सबसे बेहतर
    अपना राष्ट्रगान है
    अनगिनत कट्टर राष्ट्रभक्त नायक नायिकाओं ने फिर
    भव्य राममंदिर के विशाल प्रांगण में
    इस नए राष्ट्र के नए राष्ट्रगान को
    पंचम स्वर में गाया

    ~~~

    मगर यह तो भूलने वाली बात नहीं है कि
    यह तो करोड़ों अरबों प्रकाश वर्ष दूर की बात है

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).