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  • मानसिक बलात्कार

    मानसिक बलात्कार

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें को पैदा होने के दिन से भारतीय समाज में बच्चों के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना शुरू कर देता है जाता है।
    जब बच्चे के किसी कार्य से माता-पिता शिक्षक आदि को यदि जरा भी तकलीफ या जरा भी जिम्मेदारी बढ़ी महसूस होती है केवल तब ही बच्चे से पूर्ण व्यक्ति होने के अंदाज में डांटा फटकारा जाता है। अन्यथा हर एक स्थिति में बच्चों की आधिकारिक स्थिति व समझ को कुत्ते बिल्लियों से भी परे ही माना जाता है। कुल मिलाकर किसी भी क्षण बच्चे को पूर्ण मनुष्य माना ही नहीं जाता है।

    उसमें भी यदि बच्चा लड़की हो, या शोषित वर्ग से आता हो तब तो उनका अस्तित्व होना न होना एक बराबर है।

    बच्चे की सारी जिज्ञासाएं रोक कर जब आप उसे अध कच्ची नींद से उठा कर ऐसे स्कूल में भेज रहे होते है जहां उसे पूरे दिन बैठा रहना है, ऐसी चीजे सीखनी समझनी है जिनकी तरफ बढ़ना उसकी स्व रुचि से नहीं हुआ है तब आप अपने बच्चे को मानसिक पंगु बना रहे होते है।
    बच्चे को जब आप स्वत: खोजना, समझना , सीखना जिज्ञासाओं के साथ बढ़ने का माहैल उपलब्ध न करा कर, नौकरी आदि के लिए बाजारू शिक्षा में धकेल रहे होते है जहां उसे अपने साथ वाले बच्चों के साथ मैत्री भाव, सहयोगात्मक भाव न रख कर उनसे निरंतर प्रतियोगिता करनी है, जिसमें चाहे सभी कितनी ही अच्छी दौड़ लगा ले लेकिन रेस में जैसा कि होता है आगे रहना कुछ एक को ही है।
    बच्चे के जीवन का समय कीमती समय जब हम इस तरह के दवाब, पीड़ाओं बेमतलब की जबरदस्ती करवाने वाली मेहनत से गुजरवाते है तब हम उनके साथ मानसिक बलात्कार कर रहे होते है, अपनी हिंसा गुणात्मक रूप से बच्चों के ब्रेन में बलात्कारी ढंग से भर रहे होते है।

    जब हम लड़के और लड़की के पालन पोषण – उनके खाने पीने, कपड़े पहनने, काम करने, अधिकारों में अंतर कर रहे होते है उसी पल से हम लड़की केवल भोग्या है, लड़के को भोग करना है जैसी मानसिकता तैयार कर देते है।
    हमारे यहां बच्चों को पालन करने में ऐसा स्पेस ही नहीं छोड़ा जाता जहां बच्चों के ब्रेन के साथ जबरदस्त रूप से छेड़ छाड़ न की जाती है, मानो की धरती पर जीवन इसी सब कार्य के लिए हुआ हो, आने वाली पीढ़ियों का जीवन नष्ट या नरकमय बनाने में योगदान नहीं दिया तो जीवन व्यर्थ चला जाना है। हमारा जीवन जीने का कोई तरीका ट्रेनिंग ऐसी है ही नहीं बच्चों में बाकी मनुष्यों से अलगाव न पैदा करती हो, प्रेम पनपने की चिन्दी भर जगह की भी भ्रूण हत्या न कर देती हो।
    जब हम बच्चों में जातीय गर्व भर रहे होते है उसी पल हम उन्हें दूसरों से अलग कर रहे होते है, उनके अंदर द्वेष भर रहे होते है, दूसरे लोगों को दोयम मानने की मानसिकता भर रहे होते है।

    बच्चियों को बचपन से ही चूड़ी, चुन्नी, सिंदूर, पायल, बिछवा, कपड़ो के ढंग के साथ असुरक्षात्मक मानसिकता से बांध दिया जाता है। हमारे मानसिक बलात्कार इतने बारीक और चालाकी पूर्ण होते है कि केवल एक दरवाजा इस तरीके से खुला छोड़ा जाता है जिसमें व्यक्ति बचाव में भागता तो है लेकिन उसके लिए बिछाया हुआ एक अन्य जाल ही होता है जिसमें वह स्वतंत्रता के भ्रम में गुलामी वाला जीवन ही जीता है, स्वयं उसे महानता के रूप में प्रयोजित करता है।
    महिलाएं को पूरा जीवन इस तरह कंडीशन किया जाता है कि उसे अपने आपको इन्ही में सुरक्षित महसूस करने का विकल्प केवल छोड़ दिया जाता है।
    मतलब बचपन से लेकर अब तक केवल शोषण ही शोषण दोयम दर्जा और यहां आकर कुछ अलग है का भ्रम। शोषण करने के, बलात्कार करने के ऐसे तरीके जिसमें शोषित को पता ही न चले कि उसके साथ कुछ गलत भी हो रहा है, इतने गजब अमानवीय धूर्ततापूर्वक तरीके शायद ही किसी समाज में देखने को मिलते हो।

    बाकी छोड़िए हमने तो शादी के नाम पर शारीरक बलात्कार, वेश्या वृति के लिए एक सस्था ही तैयार कर कर दी है, आप इसके नियमों के तहत वह सब कीजिए जो करना है उल्टा सम्मान आपको दिया जायेगा।

    जिस समाज में मानसिक बलात्कारों की एक पूरी श्रंखला बनी हुई हो वह समाज हर स्तर पर कुंठित व हिंसक न होगा तो क्या होगा। ऐसे समाज में शारीरिक बलात्कारी पैदा नहीं होंगे तो क्या होंगे।

    आप इस सब को समाज को कोसना कह सकते है लेकिन मैं इसे बीमारी का देखना या बीमारी को डाइअग्नोज़ करना कहता हूँ। अभी तो हम बीमारी को महान बीमारी, विश्व गुरु बीमारी, दुनिया की सबसे अनूठी बीमारी मानने में ही फले फूलें जा रहे है, मानसिक बीमारियों को पूजने में ही लगे हुए है। महाराज बीमारी को बीमारी मानिए तो सही इलाज अपने आप चल कर समाज में आ जायेगा।

    किसी भी बीमारी का इलाज बीमारी वाले भाग को सुन्न कर देना या पैन किलर ले लेना नहीं होता है। चूंकि हम मानिसक बीमार है, हर पल तरह तरह के बलात्कारों को अपने जीवन में झेलते और करते आते है। यदि हम यह सोचते है कि हम जोर से चिल्लाने से, कठोर दंड आदि मांगने से अपने आप को छिपा ले जाएंगे या बचा ले जाएंगे तो हम रह रह कर हम अपनी प्रताड़नाएं ही केवल प्रदर्शित कर रहे होते है।
    महिलाओं, बच्चों के मानसिक बलात्कार करने को हम महान सभ्यता के नाम पर गौरान्वित होते रहेंगे तब तक कड़े कानूनों, दंड फंड की मांग भी करते ही रहेंगे दोहरे चरित्र को छिपाने के यही सब उपाय होते है।

    हम वास्तव में इलाज चाहते है तो जड़े निरंतर खोदती रहनी होगी तब तक खोदते रहनी होगी जब तक सामाजिक बीमारियों का मूल नहीं पकड़ लेते। अब हम बीमारी के उस स्तर पर भी नहीं है जहां पेन किलर फौरी राहत दे देता हो, इलाज तो बहुत दूर की बात है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • संघ परिवार (RSS) पोषित आर्थिक नीतियों से देश में गहराता आर्थिक संकट — Dr Surendra Singh Bisht

    संघ परिवार (RSS) पोषित आर्थिक नीतियों से देश में गहराता आर्थिक संकट — Dr Surendra Singh Bisht

    Dr Surendra Singh Bisht​

    ​सर्वप्रथम एक उद्घोषणा

    यह लेख संघ परिवार की आलोचना करने के लिए नहीं लिखा है, बल्कि इस लेख का उद्देश्य समाज को चेताना है और संघ परिवार के विवेक को झकझोरना है। मोटे तौर पर इस विषय में दो लेख पिछले वर्ष लिख चुका हूँ, पर तब संघ परिवार को सीधे आरोपी के पिंजड़े में नहीं खड़ा किया था। वैसे संघ परिवार से जुड़े अनेक लोग लेखक के शीर्षक को पढ़कर तुरंत प्रतिक्रिया देंगे कि संघ या संघ परिवार की कोई आर्थिक नीतियां नहीं हैं, इसलिए उनकी आर्थिक नीतियों के कारण देश में आर्थिक संकट कैसे हो सकता है ? पर जो संघ और संघ परिवार को नजदीक से जानते हैं वे संघ परिवार की घोषित आर्थिक नीतियों से भी सुपरिचित हैं। यहां पर संघ परिवार की (जिसमें भाजपा भी शामिल है) दो प्रमुख घोषित आर्थिक नीतियों और उनके दुष्परिणामों पर विचार करते हैं।

    1. जब संघ परिवार केंद्र की सत्ता से बाहर रहता है तब उसकी किसी भी प्रकार के विदेशी निवेश के विरोध की नीति और केन्द्र की सत्ता में आते ही सभी प्रकार के वांछित–अवांछित विदेशी निवेश के स्वागत की नीति के दुष्प्रभाव और
    2. ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ इस आर्थिक सिद्धांत के ढोल पीटने से उत्पन्न मानसिकता के दुष्परिणाम।

    संघ परिवार द्वारा अपनायी गयी इन दोनों नीतियों का मिलाजुला परिणाम देश के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रहा है, यही इस लेख का विषय है।

    संघ परिवार में भारतीय मुद्रा के मजबूत होने से देश की आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली बन जाने का भ्रामक दृष्टिकोण व्याप्त है। इस दृष्टिकोण का जनक कौन है और संघ परिवार ने कभी इस तरह का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया है, इसकी जानकारी नहीं है, पर वहां के अधिसंख्य विचारक इस दृष्टिकोण से ग्रसित हैं। आपने इस संदर्भ में कुछ भाजपा नेताओं के वक्तव्य भी सुने होंगे। एक नेता ने देश के आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के लिए 30 रुपये में 1 डॉलर हो जाने की सदिच्छा व्यक्त की थी, तो दूसरे नेता ने बहुत आगे जाते हुए 1 रुपया में 1 डॉलर की बात के भी तारे तोड़े हैं। भारतीय रुपये के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव को इन्होंने राष्ट्र के गौरव से जोड़कर एक मिथक पाल लिया है। विश्व बाजार में जब रुपये का मूल्य गिरता है तो इन संघ विचारकों की सांसें फूलने लगती हैं और इनकी गर्दन झुकने लगती है, पर अगर रुपये का मूल्य बढ़ता है तो इन संघ विचारकों का सीना फूलता है, और इनके मस्तक ऊंचे हो जाते हैं।

    2014 में जब संघ परिवार (भाजपा) की केंद्र में सरकार बनी तभी से इन्होंने विदेशी निवेश को भारत की आर्थिक विकास का सर्वोत्तम साधन माना है और उसके लिए हर प्रकार से प्रयासरत है। उनकी इस धारणा के कारण वे देश में वांछित – अवांछित विदेशी निवेश ला रहें हैं। आवश्यकता से अधिक विदेशी निवेश होने के कारण भारत का रुपया मजबूत बना हुआ है। अतिरिक्त विदेशी निवेश के कारण बाजार में रुपया मजबूत बना हुआ है, पर संघ परिवार की विचारधारा से ग्रसित लोगों को रुपये का मजबूत होना, उनके पुरुषार्थ का परिणाम लग रहा है।

    संघ परिवार द्वारा वांछित–अवांछित विदेशी निवेश के स्वागत और संघ परिवार की ‘”रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ वाली मानसिकता से कैसे देश में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है और देश को इस संकट से निकालने के लिए क्या सही सिद्धांत स्वीकारने चाहिए, इस पर कुछ विस्तार से विचार करते हैं।

    I) गोल्ड स्टैण्डर्ड समाप्त हुए दशकों बीत गए

    1930 तक राष्ट्रों की मुद्राएं सोने की इकाई से जुड़ी थीं, इसलिए उनका आधार था। पर 1930 की मंदी के बाद सभी देशों ने मुद्रा को सोने से अलग कर दिया, और अब उसके आधार नए आर्थिक संकल्पनाएँ और आर्थिक मापदंड हो गए। इसलिए मुद्रा का मूल्य घटना – बढ़ना बाजार में होने वाले लेनदेन पर आधारित हो गया और वह राष्ट्रीय अस्मिता का मापदंड नहीं रहा। इस नई व्यवस्था को निम्न उदाहरण से समझते हैं।

    1960 आते आते फ्रांस की मुद्रा का अवमूल्यन होते होते वह 100 फ्रैंक में 1 डॉलर के आसपास पहुंच गयी। फ्रांस ने 1960 में घोषित कर दिया कि आज से उसका नया 1 फ्रैंक पुराने 100 फ्रैंक के बराबर होगा। अगले दिन से फिर 1 फ्रैंक का मूल्य 1 डॉलर जितना हो गया। देश की अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ा, पर कुछ फ्रांसीसियों का आत्मगौरव भी बढ़ गया, क्योंकि अब 1 फ्रैंक में 1 डॉलर मिलने लग गया था। जो फ्रांस कर सकता था, उसे आगे टर्की ने भी किया और कभी भारत भी कर सकता है ! पर भारत मे कुछ लोग, जिसमें अधिकांश संघ परिवार से जुड़े हैं, वे इसी रुपये को मजबूत करना चाहते हैं, चाहे वैसे करते हुए देश दिवालिया हो जाये!

    II) मुद्रा युद्ध (Currency War) और मुद्रा घपला (Currency Manipulation)

    विश्व बाजार में वस्तुओं का मूल्य केवल उत्पादन लागत (Cost of Production) पर नहीं तय होते हैं, बल्कि जिस देश में वे बने, उस देश की मुद्रा के बाजार भाव पर भी निर्भर होते हैं। इसे संघ परिवार वाले अभी तक नहीं जानते हैं या उस तथ्य की उपेक्षा करते हैं।

    अर्थशास्त्र में एक शब्द प्रचलित है – करेंसी वॉर ! अर्थात मुद्रा युद्ध ! जब कोई देश या अनेक देश मंदी जैसे आर्थिक संकट के समय अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए और आयात को घटाने के लिए कृत्रिम रूप से अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करते हैं, तो उसे मुद्रा युद्ध कहते हैं। 1930 की महामंदी के समय अनेक देशों ने इस रणनीति को एक साथ अपनाया, जिस कारण से विश्व व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ। इसलिए अमेरिका में हुए ब्रेटनवुड समझौते में उस पर रोक लगाई गई। पर अनेक देश उस रणनीति को बड़ी होशियारी से और दीर्घकालिक तौर में अपनाते हैं, जिससे वे अन्य देशों की आंखों में अनेक वर्षों तक धूल झोंकने में सफल हो जाते हैं।

    अमेरिका आजकल चीन पर मुद्रा घपला ( Currency Manipulation) का आरोप लगा रहा है। वह भी करेंसी वॉर का छुपा रूप है। चीन ने 1980 से लेकर 2005 तक अपनी मुद्रा का लगातार अवमूल्यन होने दिया। 1980 में 1.53 युवान में 1 डॉलर से लेकर 2005 में 8 युवान में 1 डॉलर तक उसने धीरे धीरे अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया और उस कमजोर मुद्रा के सहारे विश्व बाजार पर कब्जा कर लिया। चीनी अर्थव्यवस्था मजबूत हो जाने के कारण 2005 के बाद युवान कुछ महंगा होते चला गया और 2015 तक 6 युवान में 1 डॉलर तक पहुंचा। लेकिन जैसे ही 2017 में अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार युद्ध घोषित किया, मजबूत अर्थव्यवस्था होने के बावजूद और अमेरिका के साथ 500 बिलियन डॉलर का व्यापार मुनाफा होते हुए भी उसने अपने युवान का अवमूल्यन प्रारम्भ कर दिया है, अब 6 युवान में 1 डॉलर की जगह पर 7 युवान में 1 डॉलर हो गया है, अर्थात उसने अपनी मुद्रा के मूल्य को लगभग 15% गिरा दिया है। पर भारत में संघ परिवार अन्य देशों से और आर्थिक इतिहास से कुछ नहीं सीखना चाहता है।

    III) मुद्रा युद्ध नए रूप में

    2008 में अमेरिका में वित्तीय संकट आया और उससे मंदी प्रारम्भ हुई। इस बार अमेरिका ने बदनाम हो चुके मुद्रा अवमूल्यन वाले करेंसी वॉर से मंदी का सामना नहीं किया। उसने मंदी से लड़ने के लिए एक नया औजार ईजाद किया – क्वांटिटेटिव ईसिंग ( Quantitative Easing) ! अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ने अतिरिक्त डॉलर का बड़े पैमाने पर मुद्रण करके उसे देश की अर्थव्यवस्था में उतार दिया और साथ ही बैंक ब्याज दरों को लगभग शून्य कर दिया। अतिरिक्त डॉलर को छापकर उस देश में लोगों के हाथ में अधिक पैसा दे दिया गया, उससे वस्तुओं की मांग बढ़ गयी और मंदी पर असर पड़ा। पर इसका एक परिणाम और हुआ, जिसका सबसे पहले ब्राजील के अर्थमंत्री ने 2010 में खुलासा किया। उन्होंने घोषित किया कि विश्व में एक नए प्रकार का करेंसी वॉर चल रहा है। कैसे? अमेरिका और यूरोप आदि विकसित देशों ने बहुत नई मुद्रा छापी और ब्याज दर अत्यल्प कर दी। अतः इन देशों के व्यापारियों ने वह अतिरिक्त धन अन्य विकासशील देशो में निवेश करना शुरू कर दिया। इससे उन देशों की मुद्रा का मूल्य बढ़ गया। उन विकासशील देशों की मुद्रा के मजबूत होने से उन देशों में आयात सस्ता हो गया और उन देशों से निर्यात महंगा! अर्थात अमेरिका आदि ने अपने आर्थिक संकट को भारत जैसे देशों के आर्थिक संकट में बदल दिया। इसे समझने में अनेक देश गच्चा खा गए और एक नए प्रकार के करेंसी वॉर के शिकार हो गए।

    भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने अमेरिका में एक खुले भाषण में इस खतरे के प्रति चेताया था। 2015 में उन्होंने कहा था – “विकसित देश मौद्रिक शिथिलता ( QE) के द्वारा उभरते देशों में अधिक निवेश करके उनकी मुद्रा को मजबूत करने में लगे हैं।” जो बात वे खुले मंच से कह रहे थे, उसे वह भारत सरकार को भी अवश्य कह रहे होंगे। पर यहां तो ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ वाले लोग सत्ताधारी थे। अतिरिक्त विदेशी निवेश से उनका रुपया मजबूत होने से उन्हें गौरव महसूस हो रहा था, अतः उन्हें करेंसी वॉर के शिकार होने की अनुभूति कहाँ से हो पाती!

    IV) जापान की मुद्रा को मजबूत करने से उसकी अर्थव्यवस्था में आ गया ठहराव

    आज जैसे चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका के लिए चुनौती बनी हुई है, वैसे 1980 के दशक में जापान की अर्थव्यवस्था बनी हुई थी। लग रहा था जापान जल्दी ही अमेरिका को पछाड़ देगा। पर वह चीन की तरह सैनिक शक्ति नहीं था। अमेरिका ने जापान पर आरोप लगाना शुरू किया कि उसने रणनीति बना कर अपनी मुद्रा को कमजोर बनाया है, जिससे जापान से निर्यात सस्ता हो और जापान में आयात महंगा हो। अतः उसे अपनी मुद्रा को मजबूत करना होगा। अंत में अमेरिका के न्यूयार्क शहर के प्लाजा होटल में एक समझौता हुआ, जिसमें जापान की मुद्रा को मजबूत करके 235 येन का 1 डॉलर से बढ़ाकर 150 येन में 1 डॉलर कर दिया गया। आगे 1990 आते आते 80 येन में 1 डॉलर हो गया। वहां अगर कोई संघ परिवार रहा होगा, तो येन के 150% से अधिक मजबूत हो जाने के लिए उसने होली – दिवाली एक साथ मनायी होगी ! पर येन के मजबूत हो जाने का क्या परिणाम हुआ। जापान में एक आर्थिक बुलबुला पैदा हुआ और उसके फूटने से जापान की अर्थव्यवस्था में ऐसा ठहराव आ गया कि उसके बाद उसे कोई अमेरिका का प्रतिद्वंदी अर्थव्यवस्था नहीं कहता है। जापान में उस दशक को आर्थिक दृष्टि से ‘गवांया दशक’ (Lost Decade) कहा जाता है।

    जापान के येन के मजबूत होने से अगर उसकी अर्थव्यवस्था बैठ गयी तो भारत में संघ परिवार किस आधार पर कहता है कि– “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत!”

    V) भंगुर अर्थव्यवस्था (Fragile Economy) में भारत की गणना

    मॉर्गन स्टैनले नामक संस्था के अर्थशास्त्री ने 2013 में विश्व की 5 अर्थव्यवस्थाओं का नामकरण भंगुर अर्थव्यवस्था ( Fragile Economy) किया था। उसमें ब्राजील, इंडोनेशिया, तुर्की और दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत को भी शामिल किया था। भंगुर अर्थव्यवस्था कहने के लिए उन्होंने कारण दिया था कि इन देशों को अपना व्यापार घाटा और विदेशी देनदारियां चुकाने के लिए विदेशी निवेश पर अति निर्भर रहना पड़ रहा है। उसके बाद 2014 में संघ परिवार की सरकार केंद्र में आयी, और देश को पहले से अधिक विदेशी निवेश पर निर्भर होना पड़ रहा है। 2018-19 में व्यापार घाटा (Trade Deficit) 150 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया था, इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत!” के सिद्धान्तवादियों की मानसिकता ने देश की अर्थव्यवस्था को कितना अधिक भंगुर (Fragile) अवस्था तक पहुंचा दिया है।

    उपरोक्त 5 तथ्यों के प्रकाश में अब शीर्षक में संघ परिवार द्वारा लागू आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम पर पुनः विचार करते हैं। कुछ पुनरुक्तियाँ होंगी, पर इसे फिर से समझने की कोशिश करते हैं।

    भारत के रुपये का बाजार भाव इस समय लगभग 70 रुपये में 1 डॉलर है। रिजर्व बैंक के अनुसार जिन 6 प्रमुख देशों के साथ भारत का व्यापार होता है, उन देशों की मुद्रा के साथ तुलना करने पर भारतीय रुपये का वास्तविक मूल्य (REER – Real Economic Exchange Rate) 120% था। अर्थात रुपये के बाजार भाव (Market Rate) उसके वास्तविक मूल्य (REER) से 20% अधिक था। 70 रुपये में 1 डॉलर बाजार भाव था तो वास्तविक भाव हुआ 84 रुपये में 1 डॉलर! अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर किसी मुद्रा का बाजार भाव उसके वास्तविक भाव से 5% कम – अधिक हो तो वह स्वस्थ दशा मानी जाती है। पर भारत का रुपया स्वस्थ दशा से कहीं अधिक महंगा बिक रहा है !

    संघ परिवार में हावी विचारकों के अनुसार रुपया मजबूत है, तो देश के हित में है । पर देश के जाने – माने अर्थशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं। वे आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने के लिए रुपये का उसके वास्तविक मूल्य से नीचे गिरना लाभदायी मानते हैं। आपने ऐसी सलाह देने वाले रघुराम राजन, जगदीश भगवती, अरविंद पनगढ़िया, शंकर आचार्य, राजवाड़े आदि अनेक अर्थशास्त्रियों के लेख समाचार पत्र–पत्रिकाओं में पढ़े होंगे। पर उनकी नेक सलाह का संघ परिवार में हावी विचारकों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

    रुपया का बाजार भाव 2014 से लगातार वास्तविक भाव से अधिक बना हुआ है। इसके कारण आयात सस्ता हो गया है, और निर्यात महंगा। रुपये के बाजार भाव के अधिक होने से आयात सस्ता हो गया है, जिससे देश में अनेक वस्तुओं का उत्पादन स्पर्धा में नहीं टिक पा रहा है, इसलिए उन्हें बनाने वाली कंपनियां या तो बंद हो रहीं हैं या बीमार पड़ गयीं हैं। इससे देश मे रोजगार घट रहा है। इसीप्रकार अन्य मुद्राओं के सामने रुपये के मजबूत होने से निर्यात महंगा हो गया है। अतः अन्य देशों से हमारे निर्यातक स्पर्धा नहीं कर पा रहें हैं। उस कारण भी निर्यात करने वाले कारखाने बीमार या बंद हो रहें हैं। जिससे रोजगार भी घट रहा है। सस्ता विदेशी माल के खपत से देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) बढ़ते हुए दिख रहा है पर रोजगार घट रहें हैं। इसीको रोजगार रहित वृद्धि (Employmentless Growth) कहा जा रहा है।

    जब निर्यात कम है और आयात अधिक है तो सामान्य अर्थशास्त्र के नियमानुसार रुपये का बाजार भाव उसके वास्तविक भाव से नीचे होना चाहिए था, पर भारत में 2014 से तो उल्टा दिखाई दिखाई दे रहा है। रुपया अपने वास्तविक मूल्य से बाजार में महंगा है। रुपये का अपने वास्तविक मूल्य (REER) से मजबूत बने रहना, वांछित – अवांछित विदेशी निवेश का परिणाम है, या अमेरिका, यूरोपीय देश, चीन आदि द्वारा प्रारम्भ नए मुद्रा युद्ध (Currency War) का परिणाम है, पर रुपया का मजबूत बने रहना देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार के मुद्रा युद्ध से अनभिज्ञ संघ परिवार के विचारक अपने ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत’ के कारण रुपये की मजबूती को अपनी विजय मान रहे हैं।

    अमेरिका यूरोप चीन आदि आर्थिक महासत्ताओं द्वारा मौद्रिक शिथिलता (QE) द्वारा जारी नए मुद्रा युद्ध का परिणाम है भारत में रुपया का मजबूत होना। भारत जैसे विकासशील देशों की मुद्रा मजबूत होने के कारण चीन आदि से सस्ते में आयात हो रहा है और भारत से निर्यात नहीं हो पा रहा है। ऊपर से विदेशी निवेश करने का उपकार और जता रहे हैं। और हमारे ‘रुपया मजबूत, तो देश मजबूत‘ वाले आत्ममुग्ध हैं कि हमारा रुपया भी मजबूत है और अधिक से अधिक विदेशी निवेश लाने में भी सफल हो रहें हैं!

    पर वास्तविकता क्या है? जब केंद्र में 2014 में भाजपा सत्तारूढ़ हुयी, तो उसने अगले 5 वर्षों में अर्थात 2019 तक वस्तुओं का निर्यात 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 2013-14 में भारत से वस्तुओं का निर्यात (Merchandise Export) 314 बिलियन डॉलर हुआ था। भाजपा सरकार के आने के बाद 2014-15 में 310 बिलियन डॉलर निर्यात हुआ। अगले वर्ष 2015-16 में केवल 266 बिलियन डॉलर का ही निर्यात हुआ। आगे 2016-17 में 275 बिलियन डॉलर हुआ। 2017-18 में 303 बिलियन डॉलर निर्यात हुआ। अब 2018-19 में जाकर 2013-14 से अधिक 330 बिलियन डॉलर निर्यात हो पाया है। अर्थात 2014 में जितना निर्यात किया था, लगभग उतना ही निर्यात भाजपा के 5 वर्ष के बाद हो पाया। इस विफलता का प्रमुख कारण है – भारतीय रुपये का अपने वास्तविक मूल्य से लगातार महंगा बने रहना!

    संघ परिवार द्वारा भ्रामक आर्थिक नीतियों से छुटकारा ही है उपाय

    संघ परिवार की नीति “रुपया मजबूत तो देश मजबूत” के कारण से हो रहे दुष्परिणामों को दूर करने के उपायों को समझने से पहले निम्न बातें स्पष्ट हो जाना आवश्यक है।

    1. ​भारत अन्य देशों की भांति विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य है। जब ऐसा नहीं था, तब हम आयात पर अपनी सुविधा के अनुसार आयात शुल्क लगा सकते थे। उस जमाने में 300 से 500% तक भी आयात शुल्क ( Custom Duty) लगाते थे। पर अब विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होने से अधिक आयात शुल्क नहीं लगा सकते। अतः रुपये की स्थिर दर (Fixed Rate) या रुपये का मजबूत होना अब देश के आयात को नियंत्रित करने के खिलाफ जाता है। जैसे आजकल केंद्र में संघ परिवार की मजबूत रुपये की नीति के कारण हो रहा है। अगर आयात को नियंत्रित करने के लिए विश्व व्यापार संगठन में बनी सहमति से अधिक आयात शुल्क लगाते हैं, तो अन्य देश भी भारत से होने वाले आयात पर शुल्क बढ़ा देंगे या विश्व व्यापार संगठन में भारत की शिकायतें करके निपटारा करेंगे। इसलिए अत्यधिक आयात शुल्क बढ़ाना अब सीमित विकल्प बचा है।
    2. आज की अर्थव्यवस्था, पश्चिम में विकसित अर्थशास्त्र के अनुसार चलती है। भारत भी लगभग उसी अर्थशास्त्र के नियमों को पालन करता है। पर अगर 99% उनके अर्थशास्त्र के नियम पाले, पर रुपये के बाजार में मूल्य को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश की, तो वह बात हमारे खिलाफ भी जा सकती है, जैसे आजकल संघ परिवार के मजबूत रुपये की नीति हमारे देशहित के खिलाफ जा रही है।
    3. आंतरिक बाजार में किसी वस्तु का बिक्री मूल्य उसके उत्पादन लागत पर निर्भर होता है, पर निर्यात करते समय उत्पादन लागत के साथ ही उस देश की मुद्रा का मूल्य भी उसके बिक्री मूल्य को प्रभावित करता है। अगर कोई मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य (REER) से अधिक मजबूत हो तो उससे उस देश से होने वाला निर्यात महंगा हो जाता है और महंगा होने से विश्व बाजार में स्पर्धा में पिछड़ जाता है, जैसे आजकल संघ परिवार की नीतियों के कारण हो रहा है।
    4. हम यहां पर रुपये के बाजार भाव को उसके वास्तविक भाव (REER) तक गिरने देने की वकालत कर रहें हैं, रुपये का उससे अधिक अवमूल्यन की सलाह नहीं दे रहें हैं। अतः विश्व का अन्य कोई देश हम पर मुद्रा घपला (Currency Manipulation) मुद्रा युद्ध (Currency War) का आरोप भी नहीं लगा सकता है। दुर्भाग्य से अधिकांश संघ विचारक रुपये को वास्तविक मूल्य तक नीचे गिरने देने की सलाह को रुपये का अवमूल्यन (Depriciation) करने की सलाह मानने की गलती करते हैं।
    5. रुपये का अपने वास्तविक मूल्य से मजबूत होने के आयात-निर्यात के अलावा और क्या परिणाम होते हैं? पहले रुपया के मजबूत होने के सकारात्मक का आभास करने वाले परिणाम कुछ परिणाम। भारत पेट्रोलियम पदार्थों के लिए 80% से अधिक आयात पर निर्भर है। इसलिए रुपया मजबूत होने से पेट्रोलियम सस्ता मिलता है। पेट्रोलियम के सस्ता मिलने का अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव यह होता है कि देश में उसके विकल्प उससे महंगे बने रहते हैं, इसलिए हमारी आयात पर निर्भरता बनी रहेगी। रुपया मजबूत रहने से देश द्वारा लिए विदेशी कर्ज रुपये के बाजार भाव से नहीं बढ़ता।पर आयात सस्ता और निर्यात महंगा होने से देश का व्यापार घाटा हमेशा बढ़ते रहता है। अतः रुपये के मजबूत रहने से जो विदेशी कर्ज नहीं बढ़ता है, वहीं व्यापार घाटे को भरने के लिए हमारी विदेशी निवेश पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। पहले व्यापार घाटे को पाटने के लिए विदेशों से ऋण लिया था 3 से 5% ब्याज पर, और अब रुपये के मजबूत होने से बढ़े व्यापार घाटा को पाटने के लिए अधिकाधिक विदेशी निवेश बुला रहें हैं। विदेशी निवेश आएगा 10 से 15% लाभांश की आशा में ! तो भारत के अधिक हित में क्या है – रुपये के मजबूती से बढ़ा व्यापार घाटा या रुपये के कमजोर होने से घटने वाला व्यापार घाटा? इसका विचार कौन करेगा?

    इन सब बातों के आधार पर हमें अमेरिका जैसे देशों द्वारा प्रारम्भ अभिनव मुद्रा युद्ध को पहचानना चाहिए, जिससे देश में आवश्यकता से अधिक विदेश निवेश हो रहा है, उस अधिक विदेशी निवेश के कारण हमारे देश की मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य से अधिक मूल्य पर बाजार में बिक रही है। इस प्रकार रुपये के मजबूत होने से आयात सस्ता हो गया है और निर्यात महंगा हो गया है। आयात सस्ता और निर्यात महंगा होने के कारण देश में पुराने उद्योग बीमार हो रहें हैं या बंद हो रहें हैं और नए उद्योग नहीं खुल पा रहें हैं।

    उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रख कर संघ परिवार की “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत” वाली मानसिकता से अर्थव्यवस्था पर हो रहे घातक दुष्परिणामों को समझ सकते हैं। संघ परिवार के विचारक भी उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करें और देश में गहरा रहे आर्थिक संकट से देश को उबारने में पहल कर सकते हैं। अमेरिका आदि द्वारा प्रारम्भ या संघ परिवार के “रुपया मजबूत, तो देश मजबूत” की मानसिकता के कारण या दोनों कारणों से आज भारत की मुद्रा अपने वास्तविक मूल्य से महंगी बिक रही है।

    भारत पर आए आर्थिक संकट को दूर करने के लिए रुपये को अपने वास्तविक मूल्य (REER) के आसपास तक नीचे गिरने देने की रणनीति बनाना और उस अमल करना ही एकमेव प्रमुख उपाय है। अभी आर्थिक संकट को दूर करने के लिए सरकार हड़बड़ी में कुछ उपाय कर रही है। उसमें अधिक विदेशी निवेश का स्वागत भारत के खिलाफ ही जाने वाला है, विदेश से आने वाली अतिरिक्त पूंजी भारतीय रुपये को और अधिक महंगा बनाने का काम करेगी, जो निकट भविष्य संकट को अधिक विकट करेगा। बिना रुपये को सस्ता किये देशी निवेश को बढ़ावा देने के बैंकों से सस्ता ऋण उपलब्ध कराने के लिए किए जा रहे उपाय भी अधिक फलदायी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि रुपये के मजबूत रहते विदेशों से सस्ता माल से बाजार पर कब्जा किये रहेंगे, रुपया मजबूत बने रहने से निर्यात कठिन बना रहेगा, इन दोनों कारणों से मांग में वृद्धि की संभावनाएं क्षीण होने से सस्ते ब्याज पर ऋण उपलब्ध होते हुए भी कोई उद्योगपति क्यों निवेश करेगा ? हां, भारत के बाजार पर कब्जा करने के लिए में अकूत लाभ कमाई विदेशी कंपनियां अवश्य कुछ वर्षों तक सस्ते में सामान या सेवाएं बेचने के निवेश करने का सामर्थ्य रखती हैं, जैसा आजकल दिखाई दे रहा है। अतः एक तरफ अवांछित विदेशी निवेश के मोहजाल से बचना होगा और दूसरी तरफ रुपये को उसके वास्तविक मूल्य (REER) तक गिरने देना होगा। तभी आर्थिक संकट को दूर करने के लिए किए जाने वाले अन्य उपाय भी वांछित फल देने में सफल हो पाएंगे।

    रुपये को अपने वास्तविक मूल्य (REER) तक नीचे गिरने देने से निम्न सकारात्मक परिणाम होंगे।

    1. ​आयात महंगा होगा, जिससे अनेक वस्तुओं का देश में उत्पादन स्पर्धा में टिकने लायक हो जाएगा। अतः देश में आयात कम होने के साथ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। अभी रुपया मजबूत होने कारण आयात सस्ता है, उस आयात के कारण देश में नहीं,विदेशों में रोजगार बढ़ रहें हैं।
    2. रुपया सस्ता होने से निर्यात भी सस्ता हो जाएगा। अतः अन्य देशों की अपेक्षा भारत की अनेक वस्तुएं सस्ती हो जाने से निर्यात बढ़ेगा, उस बढ़ते निर्यात के लिए देश में उत्पादन बढ़ेगा। उस उत्पादन के लिए देश में रोजगार भी बढ़ते जाएंगे।
    3. रुपये के अपने वास्तविक मूल्य तक कमजोर होने से आयात घटेगा और निर्यात बढ़ेगा, जिससे व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम होगा। अतः कम घाटे को भरने के लिए कम विदेशी पूंजी निवेश की आवश्यकता पड़ेगी। अतः अवांछित विदेशी पूंजी निवेश को स्वीकारने की लाचारी दूर होगी।

    लेख विस्तृत हुआ है, अनेक बातों को दोहराना पड़ा है। पर विदेशी अभिनव मुद्रा युद्ध से और सत्ताधारी संघ परिवार की मजबूत रुपये की मानसिकता से 2014 से देश की अर्थव्यवस्था पर घातक प्रभाव हुए हैं, और अब उन नीतियों से देश में मंदी का संकट गहरा गया रहा है।आने वाले कुछ वर्षों में अत्यधिक विदेशी निवेश के कारण भारत के विदेशी जाल में फंस जाने की संभावना भी बलवती हो रही है। संकट की गंभीरता के कारण अति विस्तार से सब बातों को रखना पड़ा है। सभी प्रबुद्धजनों से इस विषय पर अपने विचार अभिव्यक्त करने का अनुरोध है।

    राष्ट्रीय संयोजक – भारत अभ्युदय प्रतिष्ठान (वैकल्पिक नीतियों के लिए शोध, चिंतन व सामाजिक प्रयोगों पर कार्यरत बौद्धिक ​संस्थान)
    मुख्य संपादक – भारत अभ्युदय पत्रिका

    Dr Surendra Singh Bisht

  • कविता का उद्भव

    कविता का उद्भव

    Dr Vijayanand

    राष्ट्रीय अध्यक्ष

    भारतीय संस्कृति एवं साहित्य संस्थान,

    केंद्रीय विद्यापीठ मार्ग, प्रतिष्ठानपुर,

    प्रयागराज

    जब करुणा से बोझिल सूरज,

    उन्नत शिखरों पर चढ़ जाता। 

    निर्दोषों की आंहों, लाशों में,

    चंदा भी जब न अड़ पाता।।

    भू पर अधर्म की अति होती,

    तब राम अवतरण लेते हैं।

    सीतायें तब जन्मा करती,

    जब पाप घड़ो में भरते हैं।।

    जब पर्णकुटियों की सीताएं,

    सोने का लालच करती।

    तब तब रावण आ जाता है,

    सीताएं तभी हरी जाती।।

    फिर रावण- राम युद्ध होता,

    राम कथा बन जाती है।

    पर कौंचवध की करुणा से,

    ही कविता बन पाती है।।

    रामायण और महाभारत,

    साकेत और उर्वशी कथा।

    यामा और हल्दीघाटी,

    नई कविता की नई छटा।।

    करुणा की आंहें आंखों में, 

    आंखों से अश्रु उमड़ता हो,

    जन्मा करती तब ही कविता,

    जब शिवा समर में लड़ता हो।।

    शब्दों की धार लिए नदियां,

    जब सागर में मिल जाती हैं।

    तब महाकाव्य बन जाते हैं,

    कविताएं रास रचाती हैं।।

    कविता ही सीमाओं पर जब,

    सैनिक मन में लहराती है।

    तब निर्मम आतंकी जन को,

    गोली से मार गिराती है।।

    कविता की अपनी अकथ कथा,

    इधर उधर कविता कविता।

    करुणा से क्रोध जन्म लेता,

    ढ़लता चंदा, सविता कविता।।

    ऐसे जन्मा करती कविता,

    वैसे जन्मा करती कविता।

    कविता भी बन जाती कविता,

    कविता कविता कविता कविता।।

    कविता से जोश उमड़ता है,

    भर जाता बाहु बाहु में बल।

    भारत माता की रक्षा हित, 

    तन का लोहू करता कल कल।।

    मकरंद बना करती कविता,

    जय हिंद बना करती निर्भय।

    वंदे मातरम, हुआ करती,

    कविता! भारत माता की जय।।

    Vijayanand PhD

  • दुभाषिया

    दुभाषिया

    Kumar Vikram

    वो दो घरों में नहीं
    एक ही घर के
    दो कमरों में
    एक साथ रहता है
    या यूँ भी कह सकते हैं
    कि यदि माता व पिता
    दो अलग अलग भाषाएँ हैं
    तो बच्चा दुभाषिया है
    या दुभाषिया होना चाहिए
    वह सिरफ एक की भाषा नहीं बोल सकता
    अच्छा बच्चा अच्छा दुभाषिया ही होता है
    वो लफ़्ज़ों की जड़ता छोड़ सकता है
    वो बर्लिन की दीवार तोड़ सकता है
    हलांकि वो दोनों भाषाओं का ज्ञाता है
    इसीलिए दोनों जगह उपेक्षित है
    वो दोनों भाषा समझता है
    इसीलिए दोनों जगह समझा नहीं जाता है
    कुछ कुछ उन जासूसों की तरह
    जिनकी ज़रूरत शब्दों भावों के
    अंतहीन अन्धकारमय विकट गलियों से
    निकलने के लिए होती तो है
    पर जिनसे दोस्ती दिखाना ख़तरे से ख़ाली नहीं
    बल्कि उन्हें बीच चौराहे पर ‘दो-गला’ कह
    भाषा विद्रोही घोषित कर ही
    खुद को निज भाषा सेवी जताया जा सकता है

    Kumar Vikram

  • दिल्ली विश्वविधालय की छात्र राजनीति के चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए — Ramanand Sharma

    दिल्ली विश्वविधालय की छात्र राजनीति के चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए — Ramanand Sharma

    Ramanand Sharma

    जाति से शुरू होकर जाति पर खत्म होने वाली राजनीति यानी डूसू दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन, भारत में छात्र राजनीति को सबसे बड़ा मंच देने वाली संस्था है। जहां से अरुण जेटली विजय गोयल और न जाने कितने छात्र नेता निकलें जो आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े। भारत में छात्र राजनीति का इतिहास करीब 170 साल पुराना है, 1848 में दादाभाई नैरोजी जी ने ‘द स्टूडेंट साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसाइटी’ की स्थापना की। समयानुसार छात्र राजनीति की भूमिका बदलती रही है, आज़ादी के बाद देखें तो छात्र राजनीति हमेशा जन आंदोलनों के केंद्र में रही है। आज़ादी से पहले और आज के समय में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है कि छात्र राजनीति से निकले हुए तमाम लोग जो मुख्यधारा की राजनीति कर रहे हैं, आने वाली पीढ़ी को छात्र राजनीति करने से मना ही करते हैं। यहां भगत सिंह का कथन उल्लेखनीय है- “हमारा दुर्भाग्य है कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर जो अब शिक्षा मंत्री है स्कूल कॉलेजों के नाम पर एक सर्कुलर भेजता है कि कोई पढ़ने लिखने वाला लड़का पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेगा।”

    इस देश में छात्र राजनीति से निकले लोगों की संख्या को देखेंगे तो लगेगा कि केवल और केवल छात्र राजनीति से निकले लोग ही मुख्यधारा की राजनीति की दिशा एवं दशा को तय कर रहे हैं जैसे जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर जाकिर हुसैन, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, शरद यादव, सुशील मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, विजय गोयल। दिल्ली विश्वविद्यालय के लोकतंत्र का महापर्व जहां पर 1.4 लाख वोटर हैं जिसमें से मात्र 40% विद्यार्थी वोट देने आते हैं और इस बार यह अनुपात घटकर 36% हो गया है। ऐसे में क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि विद्यार्थियों में चुनाव को लेकर उत्साह नहीं है? इस बार चुनाव को देखने से पता चलता है कि विद्यार्थी महज अपने कॉलेज के चुनाव में प्रतिभाग करने के लिए लालायित रहता है उसे डूसू के चुनाव से उम्मीदें कम रहती हैं, क्या इसके पीछे यह कारण है की डूसू में लड़ने वाले सारे कैंडिडेट अपने आप को आम छात्र से नहीं जोड़ पा रहे हैं? क्या डूसू में ज़मीनी कार्यकर्ता नहीं आ रहे हैं?

    एक अध्ययन में पाया गया कि यहां हेलीकॉप्टर कैंडिडेट की संख्या प्रत्येक वर्ष बढ़ती ही जा रही है, संगठन ज़मीनी कार्यकर्ता को टिकट नहीं दे रहा है वो टिकट उस व्यक्ति को देता है जिसके पास अथाह दौलत है, संपत्ति है। बाहुबल के आधार पर कोर वोटर के रूप में बांट दिया गया है, जैसे एबीवीपी का मतलब मान लिया जाता है गुर्जर, ब्राम्हण फॉरवर्ड कास्ट का वोट बैंक। वहीं एनएसयूआई से तात्पर्य होता है जाट, यादव, मुस्लिम, बैकवर्ड कास्ट का वोट बैंक। आइसा से तात्पर्य होता है दलित पिछड़ा या वे तमाम लोग जो वैचारिक रूप से और धरातल स्तर पर अच्छा कार्य कर रहे हैं। नियोपूर्वांचल जब 2018 में कई साल बाद एबीवीपी पूर्वांचल के कैंडिडेट को टिकट देती है तो वह बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत हासिल करता है लेकिन एक बात विचारणीय है कि वे लोग जो गाजीपुर से हाजीपुर तक पूर्वांचल मानते हैं, वे लोग आखिर क्यों एबीवीपी के अलावा अन्य संगठनों का समर्थन नहीं करते। जब कोई भी कैंडिडेट एबीवीपी के सिवा अन्य संगठनों से पूर्वांचल की आइडेंटिटी पर चुनाव लड़ता है तो उसे समर्थन नहीं प्राप्त होता है, ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि पूर्वांचल का मतलब फॉरवर्ड कास्ट होता है? क्या पूर्वांचल से चुनाव लड़ने का अधिकार केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों के पास है जो तथाकथित उच्च जाति से आता है? क्या पूरा पूर्वांचल उसी के लिए एकत्रित होगा जिसके पास जातीय श्रेष्ठता होगी? क्यों जब कोई यादव या कुर्मी, धोबी या किसी और पिछड़े जाति का व्यक्ति पूर्वांचल की पहचान पर चुनाव लड़ता है तो उसे पूर्वांचली न कहकर यादव कम्युनिटी का बताया जाता है, कुर्मी कम्युनिटी का बताया जाता है और वहीं जब कोई ब्राह्मण, क्षत्रीय, भूमिहार या ऊंची जाति का व्यक्ति चुनाव लड़ता है तो उसे पूरे ‘पूर्वांचल का व्यक्ति’ बताया जाता है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? इसलिए क्योंकि वह जातीय रूप से श्रेष्ठ है या आर्थिक रूप से सक्षम है। पिछले वर्षों का आंकलन करें तो पता चलता है कि पूर्वांचल से कई कैंडिडेट तमाम संगठनों से आए, यहां तक कि 2017 में राजा चौधरी नाम का एक इंडिपेंडेंट कैंडिडेट भी चुनाव लड़ता है जिसके पास एजेंडा होता है, जो संघर्षमयी होता है लेकिन उसके पास पैसा नहीं होता, जातीय समीकरण नहीं होता, केवल इसलिए वह चुनाव हार जाता है। उस वक्त ‘पूर्वांचल की अस्मिता’ कहां खो जाती है? इन तमाम पिछड़े दलित शोषित लोगों के लिए पूर्वांचल की लहर क्यों नहीं चलती? क्या पूर्वांचल की लहर केवल आर्थिक संपन्न और जातीय श्रेष्ठ लोगों के लिए ही चलती रहेगी?

    संगठन की अस्मिता पर चोट–

    विगत सालों का चुनाव देखने से साफ ज़ाहिर होता है कि वोटिंग व्यक्ति के जातीय और उसके लॉबी के अनुसार होती आ रही है। संगठन को वोट नहीं पड़ रहे हैं। यही कारण है कि जब आप चुनाव परिणाम देखते हैं तो पाते हैं कि अध्यक्ष भारी मतों से विजयी होता है और वहीं उसी संगठन के अन्य प्रत्याशियों को काफ़ी कम मत प्राप्त होता है। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि लोगों को संगठन में दिलचस्पी नहीं है, केवल व्यक्ति में है। विगत वर्षों में सुनने में यह भी आया है कि एक ऑर्गेनाइजेशन का व्यक्ति दूसरे आर्गेनाइजेशन के व्यक्ति के साथ मिलकर चुनाव लड़ता है, इसका आशय स्पष्ट है कि संगठन के प्रति उसकी निष्ठा नहीं है उसे सिर्फ चुनाव जीतना है संगठन की विचारधारा से उसका कोई लेना देना है, उसे संगठन से मात्र टिकट मिलने की चाह रहती है। 

    कैंपस पॉलिटिक्स–

    नॉर्थ कैंपस:- एक ऐसा क्षेत्र जहां पर तमाम संगठन की शक्ति लगभग एक समान है क्योंकि डीयू की धरोहर देखें तो यहीं मिलती है जैसे हिन्दू कॉलेज की पार्लियामेंट व्यवस्था, मीरांडा का प्रेसिडेंशियल डिबेट, या यूं कहें फ्रीडम ऑफ स्पीच पर रामजस का तीखापन। 70 के दशक से देखें तो नॉर्थ कैंपस में लेफ्ट डोमिनेंट रहा है और यहां आज भी लेफ्ट को नॉर्थ कैंपस से अच्छे खासे वोट प्राप्त होते हैं वहीं एबीवीपी और एनएसयूआई भी पीछे नहीं हैं।

    साउथ कैंपस:- ऐसा कैंपस जहां पर कॉलेजों के बीच की दूरी को तय करने में करीबन 45 मिनट या डेढ़ घंटे का समय लगता है। इस कैंपस कि प्रसिद्धि का एक कारण व्यक्ति को चुनाव जीताने की शक्ति है। कारण स्पष्ट है कि यहां पर छात्रों की अधिक संख्या और कई आर्गेनाइजेशन यहां पर अभी तक अपनी शाख नहीं जमा पाए हैं। इलीट दिल्ली के इन कॉलजों की ‘राजनीति’ में सर्वहारा यूं ही दब जाता है और कई बार उसे दबा दिया जाता है। पूंजीवादी लोग सत्ता को अपने हाथ में ले लेते हैं। 

    -लेफ्ट क्यों नहीं आया?

    लेफ्ट के ना आने की वजह- लेफ्ट के पास दूसरे संगठनों के मुकाबले ह्यूमन रिसोर्सेस की कमी, लेफ्ट यूनिटी का एक ना होना, प्रचार प्रसार न कर पाना, हर एक व्यक्ति के पास सूचना के रूप में न पहुंच पाना, कैंपस संबंधित मुद्दों में हल के साथ न उपस्थित हो पाना। डूसू में 52 कॉलेज शामिल हैं और 5 दिन के भीतर ₹5000 के बजट में शायद ही कोई प्रत्याशी प्रचार प्रसार कर पाएगा क्योंकि इन कॉलेजों के बीच की दूरी लगभग दो घंटे की है यानी अर्थ और ह्यूमन रिसोर्सेस के बिना हर कॉलेज में पहुंच पाना मुश्किल है। जेएनयू में लेफ्ट एक होकर चुनाव लड़ती है जबकि डीयू लेफ्ट कई धड़ो में चुनाव लड़ती है जैसे एआइएसएफ, एसएफआई, डीएसएफ, आइसा इत्यादि, जो की लेफ्ट के वोट को बांटते हैं और जिस से सीधा फायदा विपक्ष को होता है। लेफ्ट अपना नरेटीव चलाने में नाकामयाब रहा है। 2015 के बाद देखें तो कोई भी व्यक्ति जब अपने आप को लेफ्ट विचार का समर्थक बताता है तो उसे एंटी-नेशनल के तौर पर देखा जाता है, यही कारण है कि गांव, दूर दराज से आए हुए तमाम लोग अपने आप को लेफ्ट आइडेंटिटी से जोड़ने से मना करते हैं। लेफ्ट जिस प्रकार से लिंगदोह को मानते हुए अपनी राजनीति कर रहा है यह भी एक रुकावट की तरह उसके सामने है जो की विपक्ष को फायदा पहुंचा रही है।

    – 2019 में क्या नया?

    पहली बार नॉर्थ कैंपस के हंसराज कॉलेज में प्रेसीडेंशियल स्पीच हुई जिसमें सबसे अच्छी स्पीच देने वाले कैंडिडेट को सबसे कम वोट मिला। वहां पर पहले से दो पैनल चलता था-पहला ‘चेंज पैनल’ और दूसरा ‘रेवोलुशन पैनल’। इस बार एक नया ‘नायाब पैनल’ लाया गया जो की फेयर पॉलिटिक्स मोटो के साथ चुनाव में उतरा। उसकी पहली सफलता यह होती है कि उसने हंसराज के इतिहास में पहली बार प्रेसिडेंशियल स्पीच कराई एवं नए मुद्दों के साथ चुनाव लड़ता है लेकिन इन तमाम चीजों का उसको कोई फायदा नहीं होता है, कॉलेज फिर से चुनती है लॉबी पॉलिटिक्स, जातीय पॉलिटिक्स और वह चुनती है ‘रेवोलुशन’ को। ऐसे में क्या हम यह माने कि कॉलेज में विद्यार्थी अभी भी लॉबी पॉलिटिक्स के इतर नहीं सोचना चाहते हैं?

    कई अरसे बाद डूसू में किसी मुसलमान कैंडिडेट को टिकट मिलता है खास बात यह है कि वह कैंडिडेट पूर्वांचल का था। जी हां वही पूर्वांचल जिसकी हवा पिछले वर्षों से चरम पर थी और इसी पूर्वांचल ने पिछले वर्ष एक कैंडिडेट (शक्ति)को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी लेकिन इस साल पूर्वांचल की हवा नहीं चल पाई। डूसू अपने पुराने जातीय आधार को नहीं बदल पाया उसने फिर से जाति और लॉबी पॉलिटिक्स को चुना।

    जहां पर हर साल एनएसयूआई प्रेसिडेंट पोस्ट पर जाट कैंडिडेट को लड़ाती थी लेकिन इस बार उसने एक प्रयोग किया उसने महिला कैंडिडेट को उतारा जो एक पिछड़े समाज से आती है लेकिन डीयू की जनाधार ने उसे भी खारिज किया और उसे महज 10000 वोट मिले। जबकि अमूमन देखा जाए तो एनएसयूआई को प्रेसिडेंट पोस्ट पर मिलने वाली वोटों की संख्या अक्सर 15,000 से ज्यादा ही होती थी। क्या यह वही डीयू है जहां पर इक्वलिटी का डिस्कोर्स चलता है ?

    क्या यह वही डीयू है जहां पर महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है?

    क्या यह वही डीयू है जहां पर महिला असिस्टेंट प्रोफेसर की संख्या अधिक है? अगर यह वही डीयू है तो एक महिला कैंडिडेट को क्यों नहीं अपनाता है क्यों उसे महज 10000 वोट मिलता है और वह फिर से उसी जातीय पॉलिटिक्स को जिसे वह वर्षों से ज़िंदा किए हुए हैं फिर से ज़िंदा रखता है।

    एक ऐसा कैंडिडेट जो संगठन का कई वर्षों से कार्यकर्ता रहा है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में भी संगठन के लिए विचारधारा के स्तर और लोगों के हित के लिए बहुत कार्य किए, वह व्यक्ति एक हेलीकॉप्टर कैंडिडेट से चुनाव हार जाता है। जबकि उसी संगठन के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार 19000 वोटों से चुनाव जीतते हैं क्या यह मान लिया जाए कि विचारधारा हार गई धनबल, जातीय समीकरण, क्षेत्रवाद जीत गया? पिछली बार डूसू के चुनाव को देखें तो लगता है कि पूरी दिल्ली पूर्वांचलमय हो गई थी। क्या उस धरती के पास इस बार के लिए कोई कैंडिडेट नहीं था। अगर आफताब जैसे लोग थे तो उन्हें डूसू में क्यों नहीं पहुंचाया गया? कई सालों बाद सीएलसी से लाल सलाम की आवाज आती है जो लोकतंत्र में विश्वास को बहुत मजबूत बनाती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है जिस दिन डूसू में लाल सलाम गूंजे। लोकतंत्र में सत्ता में परिवर्तन कब हो जाए कहा नहीं जा सकता। जाने कब ‘फर्श से अर्श’ तक का सफर पूरा हो जाए। लेकिन उसके लिए सबसे जरूरी है संघर्ष जो सही दिशा में जारी रहे। 

    विचारधारा के स्तर पर हम कितने मजबूत हैं यह एक उदाहरण से समझते हैं कुछ दिनों पहले एबीवीपी संगठन के कार्यकर्ता ने सावरकर, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक मूर्ति आर्ट फैकल्टी के गेट पर लगाई और कुछ दिनों बाद उसी संगठन के लोगों ने उस मूर्ति को हटा दिया उसी संगठन के लोग चुनाव में वोट मांगते हुए कहते हैं विपक्षी सावरकर को अपमानित करते हैं इसलिए आप एक होइए वोट दीजिए। 

    क्या मूर्ति को हटाना अपमान है या विचारधारा के स्तर पर विरोध करना? 

    एबीवीपी के 2018 के प्रेसिडेंट अंकिव की डिग्री चुनाव जीतने के बाद पता चलता फ़र्ज़ी है, जो की संगठन की नाकामी को प्रदर्शित करता है लेकिन इस चुनाव में उसका भी कोई नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं पड़ा। 

    क्या डीयू का छात्र डूसू के प्रत्याशीयों का चेहरा देखकर वोट देता है या संगठन को वोट देने जाता है या यूं कहें मोदी जी के चेहरे पर वोट देने जाता है?

    2019 में पिछले वर्ष के अपेक्षा अधिक नोटा का इस्तेमाल हुआ। प्रत्येक पद पर देखें तो नोटा पड़ने की संख्या अलग-अलग है और जीत का मार्जिन भी बहुत ज़्यादा अलग है। वहीं देखे तो अध्यक्ष के जीतने का मार्जिन 19000 है और उन्हें करीब बंद 29000 वोट मिलते हैं। जबकि उसी संगठन के तीन प्रत्याशी जो कि वाइस प्रेसिडेंट सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेट्री पर चुनाव लड़े थे उन्हें 20000 से भी कम वोट मिलते हैं जो यह दर्शाता है कि छात्र संगठन को देखकर वोट नहीं दिया है। वहीं पर एनएसयूआई के आशीष लांबा को भी करीबन 20000 वोट मिलते हैं क्या कारण रहा होगा की 20000 का मार्जिन केवल अक्षित दहिया और आशीष लांबा छू पाते हैं जबकि उसी संगठन के 3 प्रत्याशी 20000 के अंदर ही सीमट जाते हैं। जबकि जिसका एक कैंडिडेट 19 हज़ार वोट से जीत दर्ज करता है। डीयू में डूसू की वोटिंग प्रतिशत में आई गिरावट यह प्रदर्शित करती है कि लोगों के मन में डूसू के प्रति उत्साह और दिलचस्पी कम होती जा रही है। संगठन अपनी शाख लोगों के बीच मजबूत नहीं बना पा रही है। एक सर्वे से पता चला है कि छात्र कॉलेज में वोट देने जाते हैं इसी वजह से वह डूसू में वोट दे देते हैं, उसकी प्राथमिकता कॉलेज में वोट देना है। अगर डूसू का चुनाव कॉलेज के चुनाव के दिनांक के इतर रख दिया जाए तो हो सकता है कि डूसू की पोलिंग मात्र 10% रह जाए क्योंकि नोटा की बढ़ती संख्या पोलिंग की घटती संख्या प्रदर्शित कर रही है, कॉलेज के चुनाव ने ही डूसू के चुनाव को जिंदा बनाए रखा हुआ है। आखिर क्यों डूसू के निर्वाचित सदस्य प्रत्येक वर्ष की रिपोर्ट विद्यार्थी तक नहीं पहुंचाते हैं? 

    क्यों विश्वविद्यालय प्रशासन एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण नहीं करता जिसमें छात्र संगठन के द्वारा किए गए तमाम कार्यों को प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुंचाया जा सके?

    डिजिटल इंडिया के दौर में क्या यह संभव नहीं है? जबकि हम अपनी सारी एक्टिविटीज का ध्यान कॉलेज या डीयू की वेबसाइट से जान पाते हैं। क्या हम अपने छात्र प्रतिनिधि का एक प्रेसीडेंशियल स्पीच नहीं करा सकते? जब हर कॉलेज के प्राचार्य भारत के प्रेसिडेंट की स्पीच को सुनाने के लिए प्रबंध कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं विश्वविद्यालय के छात्र प्रतिनिधि का भाषण सुनवाने के लिए व्यवस्था करते हैं?

    जबकि कॉलेज स्तर पर आजकल अमूमन प्रत्येक कॉलेज में प्रेजिडेंटशियल स्पीच का आयोजन होता है।

    इसलिए विश्वविद्यालय को डूसू में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने के लिए इन मुद्दों पे ध्यान देना चाहिए और विद्यार्थियों के समक्ष छात्र प्रतिनिधियों का रिपोर्टकार्ड भी पेश करना चाहिए जिससे छात्र को अपना मत देने में दुविधा न हो और वे एक बेहतर उम्मीदवार का चयन कर सकें।

    Ramanand Sharma


  • चारुस्मिता

    चारुस्मिता

    ​Rajeshwar Vashistha

    मैं किसी पेड़ की तरह उगना चाहता हूँ!
    मेरे पास मजबूत जड़ है, तना भी और पत्ते भी
    पर मुझे नहीं मालूम
    कि मैं पीपल बनूँ, नीम बनूँ, बुरूँस बनूँ या देवदार?
    बस मैं एक ऐसा जादुई पेड़ बनना चाहता हूँ
    जिस पर चिड़िएँ, गिलहरियाँ,
    तितलिएँ और कोयल सब दिन-रात आएँ।

    चारुस्मिता ने कहा – सुनो पेड़,
    मुझे तुमसे प्रेम हो गया है।
    मेरे पास एक भरी-पूरी दुनिया है,
    खूबसूरत आँखें और मरमरी जिस्म है,
    प्रेम-कविताएँ भी लिख लेती हूँ।
    तुम जैसा प्रेमी मिल जाए
    तो लोग शताब्दियों तक याद करेंगे हमें!

    मैंने पूछा – मुझे सागौन या शीशम का पेड़ बनाना चाहती हो?
    ताकि मेरी लकड़ी पर अपनी तस्वीर बना कर
    उसके नीचे रुबाइयाते उमर खैयाम लिख सको!
    या यूक्लिप्ट्स जैसा कोई मुलायम पेड़,
    जिससे बने कागज़ पर छप सके तुम्हारी
    तुकबंदी की किताब?
    और उसके विमोचन के लिए
    अपनी धोती संभालता हुआ चला आए कोई मंत्री!

    उसने कहा – मैं जब प्रेम में होती हूँ
    किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देती।

    मेरे घर में असंख्य पेड़ पौधे हैं,
    सभी कुलीन और संभ्रांत!
    मैं हर सुबह अपनी चिड़ियों को दाना खिलाते हुए
    हर पेड़ की एक-एक पत्ती अपने पल्लू से साफ करती हूँ।
    हर नए खिले फूल का चित्र फेस-बुक पर अपडेट करती हूँ।
    दिन भर ब्ल्यू-रे प्लेयर पर बजाती हूँ
    बीथोवन की सिम्फनी!
    तुम भूल जाओगे जंगली पक्षियों की कर्कश आवाज़ें।

    मेरे पेड़ बिगड़ैल बच्चों की तरह ज़मीन पर नहीं लोटते,
    उनकी शाखों पर कव्वे और कबूतर बींट नहीं करते।
    उनकी जड़ों के पास विराजते हैं
    भाँति-भाँति की मुद्राओं में ढेर सारे गणेश
    कछुए और एंटीक कलाकृतियाँ।
    मैं, उनकी जड़ों को
    घर के मंदिर में, शिवलिंग पर चढ़ाए जल से
    स्वयं तृप्त करती हूँ।
    यहाँ अगर पेड़ मर भी जाएँ
    तो सीधे स्वर्ग जाते हैं!
    लोग मेरे अभिजात्य को
    मुहावरे की तरह इस्तेमाल करते हैं।

    मेरा प्रेम पाकर
    तुम दुनिया भर के पेड़ों की भीड़ से अलग हो जाओगे,
    तुम्हें लगेगा तुम कदम्ब के पेड़ हो
    और राधा तुम्हें अपनी बाहों में भर कर
    अलौकिक स्पर्श सुख दे रही है।
    मैं तुम्हें अपने पलँग के सिरहाने
    मक़बूल फ़िदा हुसैन की
    सरस्वती रिप्लीका के पास स्थापित करूँगी,
    लोग जानते हैं, मेरा घर एक सुंदर कला-क्षेत्र है!

    मुझे लगता है,
    हर पेड़ बाहें उठाकर पानी के लिए
    दिन भर ताकता रहता है सूरज की ओर।
    कौन साफ करता है उसकी पत्तियाँ?
    किसके तने पर मचलती हैं
    राधा की नाज़ुक सुंदर उँगलियाँ?
    किसकी छाया में नृत्य करते हैं शिशु गणेश?
    कौन से पेड़ के निकट रहती हैं सरस्वती?

    सुनेत्रा,
    तुम जल रही हो न मेरे भाग्य से?
    ———
    पगले, रो रही हूँ
    चारुस्मिता, तुम्हें बोंसाई बनाने जा रही है! 

    ​Rajeshwar Vashistha

    Rajeshwar Vashishth


  • भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज को जाति व्यवस्था ने इतना दमित और प्रदूषित किया है कि यहां रहने वाला व्यक्ति स्त्री या पुरुष प्रेम स्वतंत्रता का कहकरा भी नहीं समझते। भारतीय समाज समाजिक संस्कारों में प्रेम और स्वतंत्रता जैसे भावों की निरंतरता में भ्रूण हत्या करता चलता है, चला आया है। जिस समाज में इन भावों का ही कोई स्थान नहीं होगा वहां का व्यक्ति न तो सम्मान के बारे में कुछ जान समझ सकता है, न स्वाभिमान के बारे में और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में।
    समझना छोड़िए वह इनकी कल्पना भी नहीं कर सकता है।
    भारतीय समाज केवल और केवल शोषक और शोषित आधारित व्यवस्था पर चलने वाला दमनपूर्वक चलने वाला समाज है।
    यहां मान सम्मान स्वाभिमान का अर्थ केवल इतना है कि जो जो आपके शोषण तले आते है वह आपसे बराबरी में बात न करे, बराबरी में न खायें पिये, आपके जैसा ओढ़ना खाना पीना रहना न हो। स्वाभिमान पूरे तैश के साथ बरकार रखने के लिए सारे जतन इसी व्यवस्था को बनाये रखने के है।
    यहीं स्वाभिमान अपने से ऊपरी व्यवस्था के व्यक्ति, संस्था पर तुरन्त गायब भी हो जाता है क्योंकि जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का शोषण करता है उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था की कंडीशनिंग या अन्य कंडीशनिंग के कारण जायज ठहराता है चाहे वह अपने ही परिवार की स्त्री बच्चों तक सीमित हो वह अपने से ऊपरी व्यवस्था द्वारा किए गए शोषण को भी स्वीकार करेगा ही करेगा, स्वीकार न करने का कोई सवाल ही नहीं।
    जो समाज दमित हो स्वयं के प्रति एवं अपनो के प्रति ही क्रूर हो वहां अपने निजी स्वार्थों के लिए चापलूसी, धूर्तता ही काम करते है भले ही मान सम्मान अच्छे बर्ताव की पारिवारिक सम्बन्धों में भी कितनी ही परते ओढ़ ली जाये।

    चलते-चलते :-

    और बात ही क्या की हमारे समाज का मान-सम्मान स्वभिमान इतने ऊंचे दर्जे का है कि यह कभी बैंकों की लाइन में चुप-चाप लग जाता है। कभी KYC के नाम पर इज्जत बख़्शी जाती है कभी NRC के नाम पर। कभी अपनी ही मांगो के नाम पर लाठियां पड़ना।
    इसका सबसे ताजा उदाहरण है मोटर व्हीकल एक्ट के नाम पर गुंडागर्दी थोपना उससे भी बड़ी बात इसे स्वीकार कर लिया जाना। गिगयाने, मिमयाने की आदत तो हमें बचपन से ही डाल दी जाती है तो इस सब को भी स्वाभिमान से क्या ही जोड़ना।
    अब ऐसा तो है नहीं कि जो भी शासन प्रशासन है वह कहीं बाहर का हो और हम पर चीजें थोप रहा हो। अब तो हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था है तंत्र है दूसरे को तो इसका दोष दिया ही नहीं जा सकता।

    यदि समाज के आपसी संबंध ठीक हो, समाज गुंडागर्दी, शोषण शोषक पर आधारित समाज न हो तो ऐसा शासन प्रशासन अस्तित्व में आ ही नहीं सकता जिस पर अनाप शनाप अधिकार हो, लोगों के साथ अनाप शनाप व्यवहार कर सके, गुंडागर्दी थोप सके।
    चूंकि हम अभिशप्त है शोषक बनने को इसलिए शोषित होने को भी अभिशप्त ही है।

    अपवादों की बात ही क्या की जाये, हममें धूर्तता इतने गहरे में बैठती है कि हर व्यक्ति अपने को अपवाद ही समझता है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • विवशता के क्षणों में

    विवशता के क्षणों में

    ​Rajeshwar ​Vashistha

    पिता चाहते थे
    जब वह शाम को थक हार कर घर लौटें
    मैं बिना सहारे अपने पावों पर चल कर
    दरवाज़े तक आऊँ
    और वह मुझे गोद में उठा लें।
    पर बहुत दिनों तक ऐसा हो नहीं पाया।

    निराश पिता कुछ देर मुझे सहारा देकर चलाते
    माँ की गोद में डालते और फिर मुँह-हाथ धोकर
    चौंके में भोजन के लिए बैठ जाते।
    पंखा झलते हुए दादी धीरे से कहती –
    धीरज रखो, लड़के देर से चलना सीखते हैं।
    वे लड़कियाँ नहीं होते।

    मुझे लगता है गूँगा है यह लड़का,
    इशारों से बातें करता है।
    अपने भाई की बात से दुखी पिता
    मुझे छत पर ले जाकर
    आँ से माँ तक का ध्वनि परिवर्तन सिखाते।
    दादा जी कहते – लड़के देर से बोलना सीखते हैं।

    छोटी बहनें दौड़ कर माँ के पास आतीं
    और खाद्य-पदार्थों के नामों की झड़ी लगा देतीं।
    मुझे कभी समझ नहीं आए सब्ज़ियों और दालों के नाम
    रोटी, पराठे या पूड़ी में से क्या चुनूँ ।
    मेरे लिए खाने का अर्थ
    सदा भूख से लुका-छिपी खेलना ही रहा।

    मेरे अवसाद के क्षणों में वह मेरे निकट आई
    उसने मुझे धैर्य से सुना और नर्स की तरह कहा
    ज़िंदगी यहीं खत्म नहीं होती।
    मैं विस्मय से काँपा,
    प्रेम को व्यक्त करने में खो जाने का भय था।
    पर वह स्त्री थी इसलिए सब कुछ समझ गई।

    वह मेरे लिए प्रकृति की चुलबुली हँसी है,
    रात के धुँधलके में सम्मोहित करती
    रजनी गंधा के पुष्पों की गंध है,
    ब्रह्मा की पुष्करिणी में भरा प्रेम-अमृत है।

    पर मैं वही छोटा बच्चा हूँ
    जिसने सदा सभी को निराश किया है।

    सुनेत्रा,
    क्या पुरुषों की चिरंतन अपरिपक्वता ही
    स्त्रियों के दायित्वबोध की नियंता है!

    ​Rajeshwar ​Vashistha

    Rajeshwar Vashishth


  • बदमाश डायरी — Gourang

    बदमाश डायरी — Gourang

    Gourang

    “कौन हो तुम?”
    “वही तो खुद से पूछ रही हूँ।”
    “मतलब?” 
    “मतलब! क्या मतलब?” 
    “क्या क्या मतलब? शक्ल से तो मेंटल नहीं लगते, कपड़े भी तो दुरस्त ही हैं।”
    “चलो, यही सवाल मैं तुमसे करती हूँ, कौन हो तुम?” 
    “मैं! मैं शरत हूँ।” 
    “तो महज एक नाम हो बस?” 
    “क्या नाम? पढ़ा लिखा हूँ, नौकरी करता हूँ, अच्छा कमाता हूँ, इसी शहर का हूँ, यार दोस्त हैं, मौज मस्ती करता हूँ। इसी से तो पहचान है।” 
    “बस इतनी सी ही तो पहचान है। एक नाम, एक ठिकाना, कमाते हो। फिर एक अदद घर, बैंक बैलेन्स, समाजिकता, रुतबा, रसूख। ये ही तो?” 
    “और क्या होना होता है?” 
    “बताया न, वही खुद से पूछ रही हूँ। यह सब तो दूसरों के लिए है। खुद के लिए मैं क्या हूँ?”

    ………… ………… …………

    जैसा कि अक्सर होता है, खुद से बातें किए बिन मुझे नींद नहीं आती। डायरी हँसती है। दसियों बार मैंने खुद से पूछा, ये दस्तावेज़ किसलिए? किसके लिए? पर, जैसे होते हैं न कुछ बे सिर पैर की बातें, जिसके माने तब समझ नहीं आते, शायद बाद में आए। हँसती डायरी को देख मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ, साली चिढ़ाती बहुत है। 
    आज एक शरत नाम का लड़का मिल गया। मिल क्या गया, बस टकरा गया। अच्छा है, हैंडसम भी। मैं वर्कशॉप गई थी, शांतनुदा से मिलने। वही बुलाये थे अपने वर्कशॉप पर। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ गपशप होती है, फिर संगीत पर चर्चा होती है, कुछ सुर ताल भी हो जाता है। पर वे तो मिले नहीं, ये मिल गया। मैं वायोलिन के तार को अनमने ढंग से छेड़ रही थी, बेसुरा। शायद यही उसे चुभा होगा, बड़ी कर्कश आवाज में पूछ लिया, ‘कौन हो तुम?’ मेरे मन का बाहर निकल आया। क्या पता क्यों, मैंने उससे शास्त्रार्थ कर लिया। 
    मैं उकता रही थी। उसे वहीं वैसा ही छोड़ बाहर निकल आई।

    ……….. ……….. …………

    “आप तो बहुत अच्छा बंसी बजाते है!!” 
    “अरे रहस्यमयी जी? आप कब आई?” 
    “रहस्यमयी?” 
    “और नहीं तो क्या? उस दिन आपका नाम भी जान न पाया। पर आपसे मिलकर मैं भी रात भर सोचता रहा, खुद के लिए कौन हूँ मैं?” 
    “कुछ हल मिला?”
    “कहाँ? ले दे के यही बंसी ही मिला। मन बोला, मुरलीधर का मुरली ही बोलेगा।” 
    “वही। आपकी बंसी में जादू है।” 
    “और आप बहुत सेंसिबल हैं। पता है न, एक सेंसिबल लड़की इस दुनिया में बहुत दुर्लभ है।” 
    “ऐसा क्या?” 
    “और नहीं तो क्या? अपने आस पास ही देखिये, कितनी लड़कियाँ खुद से यह सवाल करती हैं?” 
    “शरत बाबू, अफसोस तो इसी का है। दुनिया यही सोचती है, चाहे वो कुछ भी करे, आखिर में उसे तो रोटियाँ ही सेकनी है।” 
    “नहीं, नहीं। सारी दुनिया बदल रही है। कुछ भी अब आखिर में नहीं हैं। आगे भी बहुत कुछ है, एक बहुत ही सार्थक कंट्रिब्यूशन है। और हाँ, सिकता, वारा, गार्गी, लोपामुद्रा केवल चूल्हा-चपाती तो न करते थे, अन्यथा आज भी याद न किए जाते।”

    …….. ………… …………

    शांतनुदा भले आदमी हैं। गुणग्राही हैं, संगीत से अटूट प्रेम करते हैं, संगीत चाहने वालों से भी। अभी शरत बाबू से बात ही कर रही थी कि अंदर आए। मुझे देखते ही चहके, ‘अरे इमन तुम उस दिन भाग क्यों गई? चलो, चलो आज और देर नहीं।’ कहते ही मुझे वायोलिन पकड़ा दिया। शरत बाबू के आगे थोड़ी झिझक हो रही थी पर शांतनुदा के आग्रह को टालना मुश्किल ही था। मन फिर खुद ही तैयार हो गया। मैं लम्बाडा के धुन बजाने लगी। धीरे धीरे आँखें बंद हो गई। अंतरयात्रा में उतर गई। मेरे दिमाग में सिर्फ लम्बाडा के धुन ही थे। बाकी सब से तो मैं कट ही गई। 
    आखिर में जब धुन समाप्त हुआ, मैंने आँखें खोली। आँखें खोलते ही शरत बाबू पर ही दृष्टि पड़ी। कितनी अनुराग भरी दृष्टि थी। मेरा दिल धडक गया। मैं नजर मिलाये न रह सकी। मुझे ठीक पता है, मेरे गाल अब भी गुलाबी हो रहे हैं। 
    डायरी फिर हँस रही है। पूछ रही है, ‘तुम’ से ‘आप’ का सफर? इमन में मध्यम तो तीव्र होता है न! षड़ज भी अवरोह में ही लगता है। घूम के लगता है, आखिर लगता ही है। 
    अब उसकी बंसी इमन ही बजाये तो फिर न कहना।

    डायरी बड़ी बदमाश है। सब कुछ जान लेती है……..

    Gourang

    Gourang


  • बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें हम पैदा करते है
    क्योंकि हमें करने होते है 
    समाज में अपना पुरुषत्व साबित करने को
    अपना स्त्रीत्व साबित करने को
    बच्चे चाहिए होते है हमें
    क्योकिं खोजते है अपनी मुक्ति
    पैदा हुए बच्चे से 
    दिखता है बहुत कोमल नाजुक सा मस्तिष्क जिसमें बींध सके अपने सपने
    निकाल सके अपनी खीज, गुस्सा , झुंझलाहटे
    एक तो ऐसा हो जिस पर समझे अपना पूर्ण अधिकार
    जिसको सुधारा जा सके मारा जा सके जो नहीं सीखता समझता 
    आपकी कहीं हर बात
    क्योंकि अपनी चेतना से भी रख देता है वह अपने पक्ष
    बच्चे चाहिए हमें
    ताकि कुछ मनोरंजन हो हमारा 
    उन पर कविता लिखने में
    उन्हें भीख मांगते देखने में
    उन्हें भूखे मरते देखने में 
    संवेदशीलता की चिपचिपाहट महसूस करने को
    मरें हुए बच्चों की लाशों को इधर उधर सकेरने में
    हम मार देते है निसंकोच बच्चियां
    यदि यह सब देना नहीं उनके हिस्से
    हमें चाहिए बच्चे कि वो बड़े हो
    और वो पैदा करे और बच्चें
    वहीं सब दोहराने को 
    जिसके लिए पैदा किया था उन्हें

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.