भारत में स्वास्थय सेवाओं का हाल — Prof Abhishek K Pandey

Abhishek Kumar Pandey

Assistant Professor

Department of Botany,

Kalinga University, Raipur, Chhattisgarh

पूरे विश्व के साथ- साथ भारत की लड़ाई भी कोरोना से चल रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व और उनकी दूरदर्शिता के कारण भारत यूरोप जैसी विस्फोटक स्थिति का सामना नहीं कर रहा नहीं तो हालात बद से बदतर होते तथा किसी भी सरकार के लिए इसका सामना करना बिल्कुल असंभव हो जाता वर्तमान में इस लेख के लिखे जाने तक देश में सिर्फ 50000 कोरोना संक्रमित केस है और 15000 लोग स्वस्थ होकर अपने घर जा चुके हैं  संभव है कि भारत सितम्बर अक्टूबर तक कोरोना से विजय प्राप्त कर लेगा l कोरोना को लेकर जिस तरीके की संवेदनशीलता भारत सरकार और राज्य सरकारों ने दिखाई है वह निसंदेह प्रशंसा के योग्य है परंतु इस संवेदनशीलता को सभी सरकारों को लंबे समय तक बनाए रखने की जरूरत है क्योंकि देश में मौजूद स्वास्थ्य सेवाएं भी मरणासन्न अवस्था में ही चल रही है।

कोरोना के बहाने ही सही अब यह सही वक्त है जब हम अपनी स्वास्थय सुविधाओं को लेकर संजीदा हो l स्वास्थ सुविधाओं को लेकर वर्तमान स्थिति कोई खूबसूरत तस्वीर पेश नहीं करती, पूरा देश डॉक्टरों की भयानक कमी से जूझ रहा है भारत में प्रति 11000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर है जबकि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक यह आंकड़ा प्रति डाक्टर 1000 व्यक्तियों का होना चाहिए था, बिहार में यह आंकड़ा 24000 लोगों के बीच एक डॉक्टर तक पहुंच जाता है, सभी सरकारी अस्पतालों में अपनी  4-5 घंटे की ओपीडी ड्यूटी के दौरान औसतन दो से ढाई सौ मरीजों को देखते हैं, जिस दबाव और हड़बड़ाहट में वह मरीजों को निपटाते हैं उसमें से कितने मरीज उचित स्वास्थ्य परामर्श पा पाते हैं यह ध्यान देने योग्य बात है । देश में कई अस्पतालों में बिस्तरो की भारी कमी है हर दूसरे दिन अस्पताल के वार्डो के बाहर मरीजों के लेटे रहने की सूचना आती रहती हैl इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार देश के सरकारी अस्पतालों में एक बेड पर दो मरीजों को रखना पड़ जाता है और डॉक्टर काम के बोझ के तले दबे रहते हैं । देश की अधिकांश ग्रामीण जनता स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर विश्वास करने के लिए विवश हैं l डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 57 फ़ीसदी एलोपैथिक डॉक्टरों के पास मेडिकल योग्यता नहीं है बिहार और झारखंड में यह आंकड़ा और भी डराता है, जहां प्रति लाख लोगों पर औसतन 15% डॉक्टर ही मेडिकल योग्यता रखते हैंl

कई सारे जिलों में ऑपरेशन थिएटर की भी व्यवस्था नहीं है प्रसुताओं की देखभाल के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है एक्स-रे अल्ट्रासाउंड मशीनों की भारी कमी है राजकीय अस्पतालों में इन जांचों के लिए एक एक महीने की बाद की तारीखे मिलती है l दिल्ली एम्स में तो जहां लोग दूर-दूर से स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए आते हैं तथा कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीड़ित होते हैं, वहां उनको छह छह महीने बाद की तारीख दी जाती हैl

भारत में असाध्य रोगों की बात की जाए तो लगभग 10 लाख लोग प्रतिवर्ष कैंसर से मर जाते हैं lमलेरिया जैसी साधारण बीमारी से भी भारत में मरने वालों का आंकड़ा दो लाख से ऊपर है वही ट्यूबरक्लोसिस से मरने वालों की संख्या में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है l इसी तरीके से एचआईवी संक्रमितो की संख्या भारत में 21 लाख के आसपास है l  डायबिटीज से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या नित नए रिकॉर्ड बना रही है भारत में एक अनुमान के मुताबिक 10 करोङ व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित हैं  आईसीएमआर के रिसर्च सर्वे के मुताबिक इनमें से 65% लोग ऐसे हैं जिनकी उम्र 25 वर्ष से कम है l इसी तरीके से हर 35 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु हार्ट अटैक की वजह से हो जाती है इस बीमारी में भी भारत दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से विश्व का सिरमौर बना हुआ है । कोरोना एक वैश्विक बीमारी है लेकिन इस देश में आम बीमारियों से भी मृत्यु दर कोई कम नहीं है, भारत में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में बच्चे उल्टी दस्त और डायरिया के शिकार हो जाते हैं।

भारत में 1.3 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए महज 1000000 एलोपैथिक डॉक्टर हैं, इनमें से सिर्फ 1.1 लाख डॉक्टर ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्रों में काम करते हैं l देश में कहने के लिए तो 16 एम्स है लेकिन इनकी स्थिति थर्ड ग्रेड अस्पतालों जैसी ही है इनमें से कई सारे एम्स आधी अधूरी सुविधाओं के साथ चल रहे हैं दिल्ली एम्स को छोड़कर लगभग सभी एम्स में कई महत्वपूर्ण विभागों का निर्माण भी अभी तक नहीं हुआ है, अधिकांश संस्थानों में कार्डियोलॉजी नेफ्रोलॉजी एंडोक्रिनोलॉजी न्यूरो सर्जरी प्लास्टिक सर्जरी जैसे विभाग खाली है एक दो एम्स में तो आईसीयू का निर्माण भी नहीं हुआ है पटना एम्स में तो प्रसूति गृह रक्त बैंक और आपातकालीन सेवाएं भी उपलब्ध नहीं है कहने के लिए तो यह एक एम्स है परंतु सुविधाओं के नाम पर एम्स जैसा कुछ भी नहीं है पूरे एम्स में सिर्फ एक एक्सरे  मशीन है । इसी तरीके से रायपुर एम्स में अट्ठारह सौ नर्सिंग स्टाफ के मुकाबले केवल 200 नर्सिंग स्टाफ है, वही भुवनेश्वर एम्स 68 फैकल्टी मेंबर्स के बलबूते पर चल रहा हैl

सभी अस्पतालों में मूलभूत सुविधाएं जैसे कि स्ट्रेचर व्हील चेयर जांच केन्द्र पैथोलॉजी सेंटर अल्ट्रासाउंड एक्स-रे और बिस्तरो की भारी कमी है । मैंने व्यक्तिगत रूप से रायपुर के भीमराव अम्बेडकर मेमोरियल अस्पताल में पैथोलॉजी के एक कर्मचारी को बगैर माइक्रो पिपेट की टिप को बदलें बगैर एक साथ कई सैंपल लेते हुए देखा ऐसी जांच से क्या हासिल होगा यह सोचने वाली बात है।

अगर देश में निजी अस्पतालों की बात की जाए तो उनका व्यवहार इस व्यवस्था में कहीं भी विश्वास नहीं जगाता अभी 1 साल पहले गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से पीड़ित एक बच्चे का इलाज 16 दिन चला जिसका बिल 1500000 आया इसी तरीके से बेंगलुरु के अपोलो अस्पताल में एक एक महिला की 9 बार कीमोथेरेपी और तीन बार सर्जरी कर दी गई जबकि उसको कैंसर था ही नहीं l इस देश में दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से निजी अस्पताल अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए सिर्फ लूट और खसोट में ही लगे हुए।

केंद्र और राज्य सरकारें अपने बजट का बहुत मामूली हिस्सा स्वास्थ्य के मद में खर्च करती हैं जिसकी वजह से बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं भी लोगों को मिल नहीं पा रही है भारत दक्षिण एशिया में स्वास्थ्य में बांग्लादेश के बाद सबसे कम खर्च करने वाला देश है जो अपनी जीडीपी का महज एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च करता है इस मामले में हम भूटान श्रीलंका नेपाल और मालदीव जैसे देशों से भी गए गुजरे हैं l मेडिकल जर्नल लिंसेट के अनुसार भारत स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और जनसामान्य तक उसकी पहुंच के मामले में 145 वें स्थान पर है।

भारत सरकार ने 2019-2020 में स्वास्थ्य क्षेत्र में 69 हजार करोड़ के बजट का आवंटन किया है, जबकि देश की स्वास्थ्य प्रणाली को जीवन दान देने के लिए इससे 10 गुने के स्वास्थ्य बजट की आवश्यकता थी, भारत सरकार ने 64 सौ करोड़ रुपए की व्यवस्था आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए की निसंदेह उस मायनों में यह योजना अच्छी कही जा सकती है लेकिन अगर देश में स्थित अस्पतालों की स्थिति नहीं सुधरी तो निश्चित रूप से यह योजना बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों को ही फायदा पहुंचाएगी l इसी तरीके से सरकार का लक्ष्य है देश के हर जिलों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खोलने का है, वहीं सरकार ने अमेरिका से आने वालें स्टंट की कीमतों पर नियंत्रण लगाया है निसंदेह यह दो फैसले भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अच्छे कहे जा सकते हैं लेकिन अभी दिल्ली दूर है सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है तभी हम भविष्य में आने वाली किसी भी स्वास्थ्य आपदा से निपटने लायक खुद को बना पाएंगे।