मानवाधिकार का वर्तमान संदर्भ और पुलिस-प्रशासन की भूमिका —— Ashok Kumar Verma

Ashok Kumar Verma IPS (Rtd)
Writer
MA (Philosophy), Allahabad University

पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के प्रकरण आजकल प्रायः रोज़ ही देखने, सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं। जनसामान्य के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार, मारपीट, उत्पीड़न, यातना  आदि के प्रकरण समाचार-पत्रों की अक्सर सुर्खियाँ बनते रहते हैं। मारपीट और यातना के कुछ प्रकरणों में पीड़ित की मृत्यु तक हो जाती है। मृत्युवाले प्रकरणों में कुछ दिन अख़बार और मीडिया में चर्चा होता है। साथ ही, विरोध, आन्दोलन, धरना-प्रदर्शन आदि का क्रम भी चलता है। समय के साथ कुछ प्रकरण सरकार द्वारा की गयी कार्रवाई और दी गयी सहूलियतों से पीड़ित पक्ष के संतुष्ट हो जाने के कारण और कुछ पीड़ित पक्ष के शिकायत करते-करते थक या ऊब जाने के कारण शांत हो जाते हैं। जनता और प्रेस-मीडिया भी पुराने प्रकरण को भूल जाते हैं। प्रतिदिन इतने नये प्रकरण आते रहते हैं कि पुराने याद रखना असंभव हो जाता है। फिर जहाँ विविधता नहीं, वहाँ सरसता भी नहीं रहती है। पाठकों की रुचि बनाये रखने के लिए बदलाव आवश्यक है। यही रोज़मर्रा की हमारी सामाजिक ज़िंदगी है। 

गोरखपुर के रामगढ़ताल क्षेत्र में दिनांक 27 सितम्बर, 2021 को होटल कृष्णा पैलेस में चेकिंग के दौरान पुलिस द्वारा की गयी मारपीट के कारण कानपुर के व्यवसायी मनीष गुप्ता की मृत्यु हो गयी। प्रभारी निरीक्षक और चौकी प्रभारी सहित छह उत्तरदायी पुलिसकर्मियों को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए निलंबित कर दिया गया। इन सभी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अभियोग भी पंजीकृत हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस प्रकरण की जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन किया है तथा निष्पक्षता की दृष्टि से प्रकरण को गोरखपुर से कानपुर स्थानांतरित कर दिया है। साथ ही, सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश करते हुए प्रकरण को भारत सरकार को भी संदर्भित कर दिया गया है। शासन ने मृतक की पत्नी को कानपुर विकास प्राधिकरण में ओएसडी बनाने तथा उसके परिवार को 40 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है। 

यही घटनाक्रम है, जो इस तरह की घटना के बाद सामान्यतः घटित होता है। इन सब के बाद सबकुछ पूर्ववत् चलने लगता है। न पुलिस बदलती है, न प्रेस-मीडिया और न ही जनता। हमारे सामाजिक जीवन का यही ढर्रा आम हो चला है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। हर नयी घटना में एक नया मृतक होता है और उसका परिवार होता है, लेकिन, रोने-बिलखने, तड़पने, आँसुओं, दुःख-दर्द आदि में कोई बदलाव नहीं होता। आख़िर, यह सब हमारी नियति में अब तक क्यों है, आज यही सबसे बड़ा सवाल है? देश को आज़ाद हुए तो बहुत लम्बा अर्सा गुज़र गया है। बावजूद इसके स्थितियाँ क्यों नहीं बदलीं? पुलिस द्वारा मारने-पीटने, दुर्व्यवहार करने की उसकी प्रवृत्ति और प्रकृति अब तक क्यों नहीं बदली? पुलिस लोक का सेवक क्यों नहीं बन सकी? पुलिस का रूपांतरण क्यों नहीं हुआ? सच्चे अर्थों में लोकतंत्र हमारे यहाँ क्यों नहीं विकसित हो पाया? मानवगरिमा अभी तक हमारे समाज के लिए चिंतन का महत्त्वपूर्ण विषय क्यों नहीं बनी?

आज़ादी के बाद पुलिस का चरित्र बदलना चाहिए था, मगर अफ़सोस की बात है कि  उसके मूल चरित्र में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया। सामान्यतः आरोप लगता है कि जनसामान्य के साथ अभी भी पुलिस का रवैया तानाशाहीवाला ही होता है, उनके साथ वह भेदभाव करती है, उनसे मित्रवत् व्यवहार नहीं करती है और सबसे बढ़कर अपने अधिकारों का वह दुरुपयोग करती है। वास्तव में यह स्थिति पुलिस की ही नहीं है, सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था की है। सब कुछ स्वतंत्रता के पूर्व जैसा ही चल रहा है। बस, अंगरेज़ों के स्थान पर हमारे अपने देश के लोग शासक बन गये हैं। हमारे अपने शासकों को अपनी सत्ता, अपने लोगों और वर्ग का हित ही सर्वोपरि है। लोक आज भी सो रहा है। उसको जगाने के कोई सार्थक और ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं हुए। कारण स्पष्ट है, लोक के जागने से शासकवर्ग की सत्ता को चुनौती मिलने की सम्भावना होती है। इसीलिए हमारे देश में लोक को इतना जागरूक ही नहीं बनाया गया कि वह भाग्यवाद, नियतिवाद, कृपा, अंधविश्वास, आदि से मुक्त होकर अपने अधिकारों-कर्तव्यों और देश-दुनिया को जान-समझ सके। लोकतंत्र क्या है, इसे जान सके। वह आज भी जनप्रतिनिधि, शासन-तंत्र के अधिकारियों, पुलिस आदि को भाग्यविधाता और स्वयं को उनका सेवक मानता है। उसे यह मालूम ही नहीं है कि पुलिस या प्रशासन उसकी सेवा के लिए हैं। उसे सामाजिक न्याय, मानवगरिमा, समता, आदि उदात्त लोकतांत्रिक मूल्यों की जानकारी ही नहीं है। प्रेस और मीडिया का कर्तव्य लोगों को शिक्षित करना, उनकी रुचि का परिष्कार करना और चीज़ों को पारदर्शी तरीके से लोक के सामने प्रस्तुत करना है। संविधान, लोकतंत्र, गणतंत्र, समाजवाद, आदि के संबंध में जनसामान्य को जानकारी देने जैसे अपने पुनीत कर्तव्य से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले प्रेस और मीडिया ने अपना मुँह मोड़ रखा है।

हमारा समाज अत्यंत जटिल है। जाति-वर्ण-वर्ग के भेद और उनका प्रभुत्व और वर्चस्व और उनके हित हमारे समाज को जटिल बनाते हैं। असमानता, निर्धनता, अज्ञानता और ग़रीबी इस जटिलता को और जटिल बनाती हैं। प्रभुता-वर्चस्व-संपन्न कोई भी वर्ग अपनी विशिष्टता को देश और समाजहित में त्यागने और छोड़ने को तैयार नहीं है। देशभक्ति का अर्थ उसके लिए बहुत सीमित है। उसे नहीं मालूम कि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों से बनता है। देश में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में उसकी कोई रुचि नहीं है। कई बार अपने सोच और कार्यों से वह इन बुराइयों को संरक्षण भी देता है। जापान के प्रभुता-संपन्न वर्ग ने उन्नीसवीं शताब्दी में देशहित के लिए अपने विशेषाधिकार छोड़ दिये थे। मध्यकाल की जड़ता को त्याग आज वह उन्नत और आधुनिक राष्ट्र है। वहाँ नर्सरी के बच्चे कई किमी दूर अकेले पढ़ने जाते-आते हैं। हमारे यहाँ इस तरह की कल्पना करना भी संभव नहीं है। जाति, वर्ण, भेदभाव, असमानता, ग़रीबी, आदि बुराइयाँ आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। अग्रसोची और अग्रदर्शी की जगह हमारे समाज को अतीतोन्मुखी और आत्ममुग्धता का शिकार बनाया जाता है। जबकि माना जाता है परिवर्तन ही जीवन है। परन्तु अतीत के प्रति हमारी मुग्धता हमें समय के अनुसार नूतन, नवीन और अद्यतन नहीं बनने देती। अतीत को आदर्श मानकर हम परिवर्तन की राह रोक देते हैं। जब तक हमारा समाज समतामूलक, विवेकसंपन्न, समावेशी और आधुनिक नहीं बनता, तब तक पुलिस के क्या, शासनतंत्र के किसी भी अंग के चरित्र में कोई मौलिक परिवर्तन संभव नहीं है।    

आज़ादी के बाद पुलिस ही नहीं, शासन के सभी अंगों में पुरानी प्रणाली का ही हमारे देश में प्रचलन है। उसमें कोई ख़ास परिवर्तन नहीं किया गया। पुलिस सुधारों के लिए गठित विभिन्न पुलिस आयोगों की आख्याएँ और संस्तुतियाँ फाइलों में बंद धूल फाँक रही हैं। सीमा सुरक्षा बल, उ.प्र. पुलिस और असम पुलिस के प्रमुख सेवानिवृत्त आईपीएस श्री प्रकाश सिंह की 1996 में दाखिल एक पीआईएल में माननीय उच्चतम न्यायालय का 2006 में आदेश हो जाने के बाद भी अधिकतर राज्यों ने पुलिस सुधारों संबंधी न्यायालय के निर्देशों को आंशिक रूप से ही लागू किया गया है। पुलिस राज्यसूची का विषय है। पूर्ण रूप से लागू करने का नैतिक बल अभी तक किसी राज्य सरकार ने नहीं दिखाया। जबकि इन निर्देशों को लागू करना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि तमाम सरकारें अपने-अपने हिसाब से पुलिस का इस्तेमाल करती रहती हैं। किसी भी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उन्नति के लिए पुलिस व्यवस्था में निरंतर सुधार होना आवश्यक है। इससे वह लोक और समय की अपेक्षाओं के अनुरूप ढलती और नयी होती रहती है। 

हमारी पुलिस कमोबेश सन् 1861 ई. के इंडियन कौंसिल्स एक्ट के अनुसार अब भी चल रही है। यूनाइटेड किंगडम, यानी ग्रेट ब्रिटेन, ने भारत में जो पुलिस-व्यवस्था लागू की, वह ब्रिटेनवाली पुलिस-व्यवस्था नहीं है। अगर भारत में लागू की गयी पुलिस-व्यवस्था अच्छी होती, तो ब्रिटेन में भी वह अवश्य लागू होती। लेकिन, ऐसा नहीं है। वहाँ भारतवाली पुलिस-व्यवस्था नहीं है। सामान्य मामलों को वहाँ सामुदायिक पुलिस देखती है और विशेष मामलों को मेट्रोपॉलिटन पुलिस। वहाँ केवल आरक्षी के पद पर ही भर्ती होती है। आरक्षी ही प्रोन्नत होकर चीफ़ ऑफ़ कांस्टेबल, यानी हमारे यहाँ का डीजीपी, बनता है। वह जनता और अपने विभाग की समस्याओं, परेशानियों और अपेक्षाओं का जानकर होता है। यह अनुभव देश-काल और लोक की अपेक्षाओं के अनुरूप उचित और उपयुक्त निर्णय लेने में उसकी मदद करता है। अंगरेज़ों ने अपने देश में तो यह व्यवस्था रखी, लेकिन हमारे देश के लिए उन्होंने अलग व्यवस्था की। आख़िर, उन्होंने ऐसा क्यों किया? आज तक यह सामान्य-सी बात हमारी समझ में नहीं आयी। साफ़ सी बात है, क्योंकि उनको हम पर शासन करना था। हमारा कल्याण उनका उद्देश्य नहीं था, उनका उद्देश्य शासन-तंत्र को मज़बूत और स्थायी बनाये रखना था। ऐसे में आज़ादी के बाद हमारी कोई विवशता न थी और न है कि हम उनकी व्यवस्था को आज क़ायम रखें। अब हमें नयी पुलिसव्यवस्था चाहिए, जिसका सोच आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप हो। हमारे यहाँ जिन चार रैंकों में भर्ती होती हैं, वे हैं, आरक्षी, उपनिरीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक और आईपीएस। यह व्यवस्था कुछ वर्ण-व्यवस्था-जैसी है। इस पदानुक्रम में हर ऊपरवाला नीचेवाले को अपने से कमतर मानता है, जबकि आतंकवाद के दौरान पंजाब में कुछ आरक्षी पुलिस अधीक्षक बनाये गये और उन्होंने अपना दायित्व उसी तरह निभाया, जैसे अन्य अधिकारियों ने। इस प्रकार हमारी पुलिस का चरित्र लोकतंत्र के अनुरूप नहीं बदला और न ही ऐसा कोई प्रयास ही हुआ। 

पुलिस आज भी सत्ता की मुखापेक्षी है। जनता के प्रति उसकी दृष्टि अंगरेज़ों के समय की जैसी ही है। सत्तायें अब भी पुलिस और अन्य संस्थाओं का उपयोग अपने हित में करती रहती हैं। व्यवस्था के नाम पर सत्ता भेदभाव, दमन, उत्पीड़न, आदि परंपरागत तरीकों का उपयोग करती रहती है। वह पुलिस और शासन की सभी संस्थाओं का उपयोग जनसामान्य की सुरक्षा और सेवा के लिए न करके, अपने लिए करती है। वह विपक्षी और असहमत लोगों के विरुद्ध पुलिस का नहीं, सम्पूर्ण प्रशासनिक तंत्र का डराने-धमकाने और 'ठीक' करने के लिए दुरुपयोग करती है। जब तक हमारा समाज नहीं बदलता, सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा। स्वतंत्रता के बाद भी पुलिस और प्रशासन का चरित्र सामंती और औपनिवेशिक है। लोककल्याणकारी व्यवस्था के अनुकूल और अनुरूप उसमें बदलाव नहीं हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण, मगर सच है कि हमारे समाज का सोच अभी भी सामन्ती है। इसी के चलते हमारे देश में पुलिस का एक बड़ा हिस्सा वीआईपी और वीवीआईपी की सुरक्षा में लगा रहता है। गनर, शैडो, आदि को प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता है, जबकि एक लोकतान्त्रिक देश में ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। ऐसी स्थिति में पुलिस से लोकहित, लोकन्याय और लोककल्याण की अपेक्षा करना बेमानी है।

मेरे एक मित्र विवेक उमराव, जो ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया इंटरनेशनल जर्नल के संपादक हैं, आस्ट्रेलिया के कैनबरा में रहते हैं। वे बताते रहते हैं कि 'जनप्रतिनिधि ही नहीं, यहाँ नौकरशाह, न्यायीधीश या सरकारी कर्मचारी मतलब सरकारी-तंत्र का कोई भी यदि करप्शन करता है या करप्शन से जुड़ा कारक निकलता है, तो उसकी  सीधे बरखास्तगी होती है। नौकरी तो जाती ही है, ऊपर से मुकदमें चलते हैं, सजा होती है,  अलग से। पुलिस का बड़े से बड़ा अधिकारी भी यहाँ के सबसे ग़रीब आदमी के ऊपर हाथ उठाना तो दूर, तू-तड़ाक से बात तक नहीं कर सकता है, बिना सम्मान दिये बात तक नहीं कर सकता है। दुनिया के  जिन देशों में भी लोकतंत्र या शासनव्यवस्था परिपक्व है, वहाँ लोक सबसे बड़ा होता है। सरकार व प्रशासन लोक के लिए प्रबंधन-तंत्र होते हैं। सरकार व प्रशासन लोक के लिए होते हैं, सीधे तौर पर उनके लिए जवाबदेह होते हैं।' सच्चे अर्थों में यही एक समर्थ एवं प्रभावी लोकतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था की पहचान है।

Ashok Kumar Verma

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