सुकमा बड्डे अबुझमाड़ क्षेत्र की पहली मुरिया आदिवासी लड़की है जिसने स्नातक किया है। सुकमा बड्डे ने रामकृष्ण मिशन के आवासीय छात्रावास में रहकर 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 12वीं के बाद भिलाई के संस्थान से नर्सिंग में B.Sc स्नातक किया।
सुकमा बड्डे ने अपनी इच्छा के लिए कि वह अबुझमाड़ में जरूरतमंद लोगों के लिए काम करेगी, शहर में रहकर नौकरी करते हुए आरामदेह व सुरक्षित जीवन जी पाने की संभावनाओं पर कभी विचार ही नहीं किया। विचार ही नहीं किया कि उसके पास छत्तीसगढ़ की राजधानी में घर हो सकता है, वह महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाने जा सकती है, कार खरीद सकती है, ग्लैमर का जीवन जी सकती है।
सुकमा बड्डे जो विशेष आदिवासी क्षेत्र से है, विशेष आरक्षण की सुविधा का प्रयोग करते हुए किसी शहर में नौकरी पाना उसके लिए बहुत मुश्किल नहीं था। लेकिन स्नातक के बाद इन संभावनाओं को तिलांजलि देते हुए वह अबुझमाड़ लौटी। उसने स्वास्थ्य विभाग में नर्स की नौकरी के लिए आवेदन दिया, जो भी कारण रहा हो लेकिन उसके आवेदन को स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने अस्वीकृत कर दिया।
Sukma Badde
लगभग दो वर्ष पूर्व जब टामन सिंह सोनवानी जिलाधिकारी होते हुए भी अबुझमाड़ के गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगवाते घूम रहे थे। तब सुकमा बड्डे उनसे मिली और नर्स की नौकरी की मांग की। टामन सिंह सोनवानी को बड़ा ताज्जुब हुआ जब उनको मालूम पड़ा कि अबुझमाड़ जैसे क्षेत्रों की माड़िया आदिवासी लड़की ने इतना पढ़ाई की है। उनको लगा कि उनको इस लड़की का सहयोग करना चाहिए। उन्होंने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सुकमा बड्डे को नारायणपुर जिला अस्पताल में नर्स की नौकरी दिलवा दी।
नौकरी पाने के अगले दिन सुकमा बड्डे नारायणपुर जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी के पास आती है और कहती है कि वह जिला अस्पताल में नौकरी नहीं करना चाहती है वह तो अपने क्षेत्र के पिछड़े गावों की सेवा करना चाहती है।
ऐसी भावना व कार्य करने का जज्बा देखकर सुकमा बड्डे का स्थानांतरण अबुझमाड़ के गावों में कर दिया गया। सुकमा बड्डे उत्साह व जज्बे के साथ गांवों के लोगों की सेवा में लगी हुई हैं। एक ऐसी लड़की जिसने बेहतर जीवन की संभावनाओं को त्याग कर अबुझमाड़ जैसे शताब्दियों से अपवर्जित क्षेत्र में स्वेच्छा व जिद से जाकर आदिवासियों की सेवा करने का भाव रखा। उस सुकमा बड्डे को माओवादी क्रांतिकारी प्रशासन का इंफारमर कहते हुए धमकी देते हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न रहने के कारण असमय अपनी माता को खो चुकी सुकमा बड्डे का अपराध क्या सिर्फ यह है कि वह जागरूक है, उसमें पढाई करने का जज्बा था और उसने अपने जीवन में एक निर्णय लिया कि उसको अपने इलाके में लोगों के स्वास्थ्य के लिए जीवन समर्पित करना है ताकि उसकी माता जैसा दर्द औरों को न झेलना पड़े। इस निर्णय के लिए उसने पढ़ाई पढ़ी, शहरों में नौकरी करके आरामदेह जीवन यापन करने की संभावनाओं को त्यागा। नारायणपुर जिला अस्पताल में लगी सरकारी नौकरी नहीं करने की इच्छा जाहिर की।
ऐसी सेवाभावी व दृढ़ निश्चयी लड़की को तो सलाम करना चाहिए। सुकमा बड्डे को कोटि-कोटि सलाम।
He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
महाराजा गंगासिंह गंगनहर निकालकर आए और भगीरथ की तरह साबित हुए। यह मिथक जाने कब से चल रहा है। जिसकी सत्ता होती है, इतिहासकार भी उसके दास होते हैं। आप बस एक बार एक मिथक बस साबित कर दीजिए, फिर बाकी काम हम पत्रकार मुफ़्त में करते रहेंगे। ये मिथक फिर चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक कितने ही क्यों न हों। हर युग की अपनी रामायण और हर युग के अपने राम होते हैं। हर सम्राट, हर बादशाह और लोकतांत्रिक शासक तक अपने आपको गौरवान्वित करने की आत्मप्रशंसा से बाज नहीं आते। उन्हें स्वयं एहसास नहीं होता तो हर राम को उनका तुलसीदास तलाश कर ही लेता है।
गंगनहर और गंगानगर के इतिहास को लेकर मैं बीकानेर के अभिलेखागार से लेकर दिल्ली में तीन मूर्ति भवन के नेहरू मेमोरियल संग्रहालय तक की बहुत ख़ाक छान चुका हूं। इस पर मेरी एक किताब भी कंप्यूटर के किसी कोने में पड़ी है। तथ्य ये है कि 1876 से 1878 के बीच भयावना अकाल पूरे हिंदुस्तान में पड़ा था। यह ग्रेट फेमीन के नाम से इतिहास में कुख्यात है। इंपीरियल गजट ऑव इंडिया के थर्ड वॉल्यूम (1907 में प्रकाशित) के अनुसार इस अकाल ने देश के छह लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने बाहुपाश में ले लिया था। इसमें पांच करोड़ 85 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए थे और 55 लाख लोग भूखों मर गए थे। पंजाब और नॉर्थ प्रोविंस में आठ लाख और राजपूताने में कोई 20 लाख काल कवलित हुए। किसी को अनाज का दाना नहीं मिला और किसी को पानी की बूंद। मारे भूख के लोग मरे हुए जानवरों तक को खा गए या कीकर-जांटी के पेड़ों की छाल चबा-चबाकर मर गए।
लार्ड नार्थब्रुक
इस अकाल ने दक्षिण भारत के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। इस अकाल ने ब्रिटिश सरकार के संवेदनहीन लोगों तक को बुरी तरह हिला दिया था। उन दिनों लॉर्ड नार्थब्रुक वायसरॉय थे। लेकिन वे 1876 में चले गए थे। लेकिन इस अकाल का सामना किया लार्ड लिटन ने, जो 1876 से 1880 तक वायसरॉय रहे। लॉर्ड नार्थ ब्रुक और लॉर्ड लिटन की डायरियाें में दर्ज टिप्पणियां रोंगटे खड़े कर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि भारतीय राजे-महाराजे, जिन्हें हमने आज लोकतांत्रिक कालखंड में सिर के ऊपर बिठा रखा है, कितना गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे थे। इन देशी शासकों और उनके सलाहकारों ने इस तांडव को भाग्य से जोड़कर अपने फर्ज़ से किस तरह मुंह मोड़ लिया था। आप भरोसा नहीं करेंगे, अगर उस समय जातिभेद से ऊपर उठकर काम करने वाला अंगरेज़ अमला नहीं होता तो दलितों और कथित अछूतों की जो हालत होती, वह अकल्पनीय थी। और बहुत हद तक रही भी।
लार्ड रोबर्ट लिटन
ख़ैर, उन्हीं दिनों लॉर्ड लिटन के बाद जब मार्केस ऑव रिपन वायसरॉय बनकर आए तो उन्होंने अकाल से निबटने की बड़ी योजना बनाई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे विदेशी, भारत विरोधी और क्रूरशासक थे। उन दिनों उत्तर भारत के राजपूताना और बहावलनगर रियासतों में भुखमरी बहुत बढ़ गई थी। यहां के लाेगों ने पंजाब और नॉर्थवेस्ट प्रोविंस में चोरियां, डाके और बलात्कार शुरू कर दिए थे। आखिर बूभुक्षितों किं न करोति पापम् वाली स्थिति हो गई। यानी कि भूख से लड़ता आदमी कौन सा अपराध नहीं करता है! ऐसे हालात में जब पंजाब और ये प्रोविंस त्राहिमाम़् कर बैठे तो रिपन ने एक बड़ा सर्वे करवाया कि आखिर इस लॉ लेसनेस की स्थिति का कारण क्या है? वे किसी विदेशी सरकार या अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गए। इस सर्वे को बहुत बुद्धमत्ता से सोशियो-इकोनॉमिक सोच वाले लोगों ने बड़े शानदार तरीके से किया और निष्कर्ष निकला कि अगर बहावलनगर और बीकानेर रियासतों में लोगों की बहबूदी की कोई परियोजना बने तो ये लोग बस जाएं और अपराध घटें।
लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन
राजनीतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने मुकम्मल येाजना बनाकर कहा कि अगर सतलुज का पानी इन दोनों इलाकों में पहुंचा दिया जाए तो लोग खेती करेंगे और लोग खुशहाल हो जाएंगे। अर्ल ऑव डफरिन ने कोशिश की, लेकिन डूंगरसिंह नहीं मानें। वे बीकानेर के महाराजा था। मार्क्वेस ऑव लैंड्स डाउने ने भी कोशिश की, लेकिन उनके समय में एक बड़ी उम्मीद थी। उन दिनों बीकानेर कोई स्वतंत्र रियासत नहीं थी, जैसे उदयपुर, जोधपुर या जयपुर हुअा करती थी। बीकानेर में भले शासक डूंगरसिंह या गंगासिंह रहे, लेकिन वहां ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल का काम करती थी। यही मूल शासक थी। नाम मात्र को डूंगरसिंह और गंगासिंह थे। यह काउंसिल भारत सरकार तय करती थी। यानी बीकानेर सीधे तौर पर ब्रिटिश डाेमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल से गवर्न होता था। बहरहाल, इसी काउंसिल ने डूंगरसिंह के समय ही गंगासिंह को मेयो कॉलेज में पढ़ाने, ऑक्सफॉर्ड भेजने और उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना तय किया था। ये राजपरिवार के नहीं, ब्रिटिश काउंसिल के फैसले थे। और इसके बाद अंगरेज़ों का पढ़ाया गंगासिंह जब शासक बना तो वह अंगरेज़ के फैसले हूबहू लेने लगा। जैसे आर्यसमाज के सुधारकों को बीकानेर से देशनिकाला देना। जैसे आज़ादी की मांग करने वालों को बाहर निकालना और स्कूल तक नहीं खुलने देना।
महाराज गंगा सिंह
लेकिन चूंकि अंगरेजों को अपने प्रोविंस में अपराध कम करने थे, इसलिए उन्होंने बजरिए गंगासिंह बीकानेर नहर का प्रोजेक्ट बनवाया और पूरा करवाया। यह लॉर्ड चेम्सफॉर्ड के समय यानी 1916 से 1921 के बीच बना। आपको यह भी याद दिलाता चलूं कि एक भयावना अकाल 1918-1919 के बीच भी पड़ा था। इस दौरान लॉर्ड चेम्सफॉर्ड वायसरॉय थे। इस काल ने भी उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जो विकराल कहर बरपाया, वह अवर्णनीय है। इसके नतीजे भी घोर मानवहंता रहे। इस तरह बार-बार अकाल पड़ना और बार-बार अंगरेज़ों के सीधे शासन वाले उत्तर भारतीय पंजाब और साथ लगते प्रोविंसेज में जब अपराध बेकाबू हुए तो अंगरेज़ प्रशासन की यह धारणा सुदृढ़ हुई कि अगर इन अपराधों को नियंत्रित करना है तो उन इलाकों में नए रोज़गार पैदा करने होंगे, जहां से ये आपराधिक मानसिकता पैदा हो रही है। ऐसे लोगों को रोज़गार से जोड़ना होगा, जिनकी मानसिकता इस ओर चुंबकीय ढंग से आकर्षित हो रही है। इस सोच से सतलुज का पानी बीकानेर रियासत में भेजने का फैसला हुआ। यह सिर्फ़ बीकानेर नहीं, बहावलनगर और फ़ीरोज़पुर के लिए भी हुआ। इन तीनों के लिए नहरें निकाली गईं।
आपको हैरानी होगी, 1923 में बीकानेर नहर, जिसे हम आजकल गंगकैनाल कहते हैं, वह 1925 में बनकर तैयार हो गई। दो साल में। यह काम अंगरेज़ों ने किया। भारतीय मज़दूरों का पसीना इस नहर में आज भी बहता है। गंगनहर के पानी में उन लाखों मजदूरों के उस पसीने की महक आज भी आती है। बीकानेर रियासत की प्रशासनिक और इंजीनियरिंग क्षमता जवाब दे गई तो पंजाब से अंगरेज़ सरकार ने जीडी रुडकिन और एक कमिश्नर, जिनका नाम फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा है, दो लोगों काे भेजा। इन दोनों ने गंगनहर के निकलने के साथ-साथ कालोनाइजेशन का काम शुरू किया और 1ए, दो ए, एक बीबी, चार बीबी, एक केके, दो केके, 25 एमएल, 24 एमएल, 8 टीके, पांच केके, 36 एलएनपी आदि आदि जैसे चकों के नाम हाउटलेट्स के, जिन्हें हम मोघा कहते हैं, हिसाब से निकाले। मेरा अपना गांव चक 25 एमएल है। मुख्य गंगनगर पर बने सुलेमान की हैड की शोभा और सम्मोहन आज भी कम नहीं होता है। सुलेमान की हैड का 1925 में बना पुल अभी कुछ साल तक जस का तस था। अब शायद वहां नया पुल बन गया है। लेकिन राखी और चूने के उस कमाल के सामने आधुनिक इंजीनियरिंग मारे शर्म के अपना चेहरा तो छुपा ही लेती होगी।
लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग
लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन
महाराजा गंगासिंह से ज्यादा तो अर्ल ऑव रीडिंग और लार्ड इरविन ने किया। इन दोनों वायसरॉय ने 1921 से 1926 और 1926 से 1931 के बीच गंगनहर के लिए जो किया, वह रिकॉर्ड पर है। लार्ड इरविन तो 26 अक्टूबर 1927 के दिन फीरोज़पुर हैड पर बीकानेर नहर में पानी प्रवाहित करने के उद्घाटन के मौके पर माैजूद थे।द्ध गंगासिुह के साथ-साथ इस मौके पर मदन मोहन मालवीय जी को भी विशेष तौर पर बुलवाया गया था। आपको इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि गंगानगर का स्थापना दिवस 26 अक्टूबर नहीं है। यह तो पानी प्रवाहित करने का दिन है। इसे स्थापना दिवस का नाम एक स्वच्छेचारी कलेक्टर करणीसिंह ने कुछ साल पहले दिलाने की कोशिश की थी। इन करणीसिंह को गंगानगर के सरदार सुच्चासिंह ने चूरू से लाकर बड़ी कोशिशों से खुद पढाया लिखाया और कलेक्टर के आेहदे तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन यह बंदा जब कलेक्टर बनकर आया तो इन्होंने गंगानगर के लोगों को बहुत निराशा किया। जनप्रतिनिधियों को सम्मान देना तो दूर, इनमें किसी प्रतिष्ठित नागरिक से पेश आने की शालीनता के मानदंडों को भी ताक पर रख दिया था।
इन नहरों को निकालने का अंगरेज़ सरकार का मक़सद वाकई में न केवल पूरा हुआ, बल्कि ये हमारे आधुनिक प्रशासकों और आईएएस अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि वे किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझें। अंगरेज़ों से हमें यह सीख तो लेनी ही चाहिए कि उनकी तरह अगर हम काम करें तो हम समस्याओं को दूर कर सकते हैं, अपराधों से लड़ सकते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने राजों-महाराजों की झूठी प्रशस्तियां कब तक पढ़ते रहेंगे और विदेशी आक्रांत के रूप में आए अंगरेज़ प्रशासकों की खूबियों और अच्छाइयों को निष्पक्ष होकर ग्रहण करने का काम कब करेंगे? हमें अपनी क्रूरताएं सदा करुणा के निर्झर लगती हैं। हमें अपनी मूर्खताएं बुद्धिमत्ता की प्रज्वलित ज्योतियां प्रतीत होती हैं। हमें अपने खलनायक दिव्य आत्माएं लगती हैं। लेकिन सच यही है कि आज हम एक आज़ाद और सबल देश हैं। हमें हर चीज़ को क्रिटकली ही देखना चाहिए। गंगनहर लाना तो दूर, गंगनहर का कनसेप्ट तक गंगासिंह के दिमाग में नहीं आ सकता था। यह अंगरेज़ों का काम था और उन्होंने किया। अंगरेज़ों ने गंगनहर ला दी, लेकिन गंगासिंह से लेकर आज के शासक तक पानी का सही बटवारा नहीं करवा सके। हमारे इंजीनियरों ने अपनी इंजीनियरिंग की समस्त मेधा को कलंकित कर दिया है। हमारे प्रशासनिक अधिकारी किसानों को कभी सही पानी नहीं दिला पाए। किसान मुड़ढ़ और टेल के पाटों में कारुणिक ढंग से पिस रहा है।
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त्रिभुवन की अनुमति से उनकी फेसबुक प्रोफाइल से लिया गया
गुजरात से अपना मांग पत्र लेकर दो गाएं दिल्ली स्थित 7-लोककल्याण मार्ग (उर्फ़ सेवन रेस कोर्स रोड) के लिए निकली थीं। उदयपुर आते-आते वे थककर चूर हो गईं और भूख से बिलबिला उठीं। कई जगह तलाशने के बाद जब खाना नहीं मिला तो वे एक कंटेनर में मुंह मारने लगीं और अपने सिर फंसा बैठीं। हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित राव ने जब फोटो खींचने की कोशिश की तो एक गाय ने धीरे से अपने गले में बंधा एक लिफ़ाफ़ा भरी आंखों से थमा दिया। इस लिफ़ाफ़े को खोला तो इसमें एक विनय- पत्रिका निकली, जो इस प्रकार है :-
धेनु मां का आप सबको आशीर्वाद। हम भारत के हृदय का मर्मस्थल हैं। हमारा महत्त्व तो आप नहीं जानते। हमारा महत्त्व जानना हो तो आप उन नीरद सी. चौधरी की “दॅ कॉण्टीनेंट ऑव सरसी” पढ़ो; जिन नीरद चौधरी को आप सब सदैव गाली ही देते हैं, लेकिन उन्हें कुछ पढ़ो तो आपको हमारा भी पता चले। नीरद लिखते हैं : गाय आर्यों के साथ भारत आई। आर्यों का सौंदर्यबोध बहुत विकसित था और वे गायों और सांडों की सुंदरता से बहुत प्रभावित थे। दरअसल एक हृष्टपुष्ट सुंदर गाय या सांड से अधिक सुंदर प्राणी इस दुनिया में है भी नहीं। उसका चिकना सफेद रंग, तीखे नाक-नक्श, विवेकमयी भाव-भंगिमा और उसकी रंभाहट उसे एक विचित्र सतयुगी और सतोगुणी सात्विकता वाली आभा प्रदान करती है।
हम गाय ही एक ऐसा प्राणी है, जिसकी प्रशस्ति वेदों आैर उपनिषदों में बिखरी पड़ी है। यह एक प्राणी ऐसा है, जो पशुत्व से ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। प्रकृति के जीवों की यही एक कृति ऐसी है, जो आज तक भारतीय उप महाद्वीप में मानव जीवन को मां के बाद सबसे अधिक दुग्धपान करवाकर जीवनीशक्ति देती आई है। गाय ने ही हमारे खेतों में अपने बेटों को किसान बेटों के साथ लगाकर शस्य-श्यामल धरती में बदला। लेकिन अनादिकाल से गायों की आंखों में एक करुणा छलछलाती दिखाई देती है, जो साफ़ कहती है कि कभी उसके बेटों को जुए में जोत कर आहत किया गया तो आज वह एक पल कसाई के हाथ से छूटती है तो अगले ही पल कसाई से भी अधिक क्रूर भूख से जूझने को छोड़ दी जाती है।
हम यह विनय पत्रिका लिख रही हैं कि क्या हमारे हित में गोभक्तों की यह सरकार और गोभक्तों का यह अपार संगठन हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संघ परिवार के भारतीय जनता पार्टी सहित सभी अानुषांगिक संगठन हम गाय के लिए कुछ करने को तैयार हैं? क्या ये सभी संगठन अपने-अपने संविधान में नहीं बना सकते कि इनके किसी भी संगठन के सदस्य होने के लिए गाय का पालन ज़रूरी होगा। वह घर में नहीं पाल सकता तो उसके लिए किसी गोशाला में उस गाय के पालन लायक पैसा देगा।
विधानसभा का टिकट सिर्फ़ उसी व्यक्ति को मिलेगा, जो कम से कम 100 गायों को नियमित रूप से पाल रहा होगा। लोकसभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो कम से कम 250 गायों के पालन लायक गोशाला का संचालन करवा रहा होगा। राज्य सभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो 500 गायों की क्षमता वाली गोशाला का बेहतर प्रबंधन अपने स्तर पर करवा रहा होगा। और राज्य सरकार में वही व्यक्ति मंत्री बनेगा, जो 1000 गायों और केंद्र में वह जो 2500 गायों से ज्यादा की क्षमता वाली गोशालाओं का शानदार संचालन करवा रहे होंगे।
भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था प्रकट करने आैर गोमाता की सेवा करने का इससे इतर और क्या श्रेष्ठ उपाय हो सकता है? यह क़दम उठाना इन सब लोगों की नैतिक जवाबदेही भी है, क्योंकि ये लोग जिस गोमाता के नाम पर वोट मांग रहे और देशवासियों की सहानुभूति बटोरकर चुनाव में जीत दर्ज कर रहे हैं, उसके लिए गोमाता की प्रति इनको अपना उत्तरदायित्व निभाना जरूरी है। आख़िर अगर आप अपनी निष्ठाओं को रचनात्मक रूप तो देना ही चाहिए।
ये लोग यह प्रतिज्ञा ख़ुद भी करें और आप जैसे लोगों से भी करवाएं कि आप केवल गाय का घी खाएंगे। गाय का ही दूध पिएंगे। दही या पनीर वही लेंगे, जो गाय के दूध से बना हो। मिठाई वही खरीदेंगे, जो गोघृत से बनी हो। हम सिर्फ़ उसी होटल में रुकेंगे, जो गाय के दूध को ही इस्तेमाल करता हो। हम सिर्फ़ उसी विमान में सवारी करेंगे, जो गाय के दूध का प्रयोग करता हो। हम सिर्फ़ उसी को वोट देंगे, जिसके घर गायें बंधी हों।
यह भी संकल्प लें कि हम ऐसे चमड़े से बनी किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करेंगे, जो गाय का हो। हम ऐसे किसी देश से मित्रता नहीं करेंगे, जो गोमांस का प्रयोग करता हो। हम ऐसे किसी व्यक्ति से हाथ नहीं मिलाएंगे, जो गोमांस खाता हो। हम ऐसे देश में जाकर अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं समझेंगे, जहां गोमाता कटती हो। हम ऐसे देशों के ऐसे होटलों में तो रुकेंगे ही नहीं, जिनके किचन में गोमांस पकता हो! हम अपने बच्चों को ऐसे देशी-विदेशी संस्थानों में पढ़ने नहीं भेजेंगे, जहां गोमांस का प्रचलन हो!
मुझे लगता है, ये बेटे हम गोमाताओं के लिए भी वैसा ही दिखावटी प्रेम रखते हैं, जैसा आजकल के बेटे रखते हैं। अपने वेतन से पांच रुपए मां के खाते में जमा नहीं कराते, लेकिन मदर्स डे पर मां की बड़ी-बड़ी तसवीरें लेंगे, सेल्फी खिंचवाएंगे! सच तो ये है कि मुझ गोमाता से प्रेम और सैद्धांधिक आबद्धता रखने वाले लाेग हैं ही नहीं ये। कुछ लोग हम गायों के नाम पर देश का वातावरण तो ख़राब करना चाहते हैं, लेकिन हम गाय के प्रति उनके मन में वैसी सैद्धांतिक दृढ़़ता नहीं है, जो वास्तविक और एक पवित्र गोप्रेमी हृदय में होनी चाहिए। अगर होती तो वे ऊपर लिखी हुई प्रतिज्ञाएं करते। हम गाय को आज कचरे के ढेरों पर भूख से लड़ने और सड़कों पर मरने को निष्ठुर नहीं छोड़ देते। हमारी दुर्दशा को लेकर लोगों का दुहरा आचरण देखकर मन में करुण रुदन हो उठता है। हमारा निवेदन है कि हम गायों को आप जीवन, मरण, इहलोक और परलोक मानना बंद करो। हम गायों का भजन, पूजन, साधन आैर आराधन अब समाप्त करो। बहुत पाखंड हो लिया। अगर कुछ कर सकते हो तो हमारी हालत सुधारने के लिए कुछ करो। और जो हमने कही हैं, वे संकल्प लो। नहीं तो हमारा नाम लेना बंद करो।
पुनश्च:
और हॉं सुनो, तुम सब पूत कपूत हो सकते हो, लेकिन हम माता कभी कुमाता नहीं होंगी!!!
मुझसे बहुत लोग असहमत रहते हैं इसके बावजूद मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि बस्तर में रमण सिंह जी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ प्रशासन संघर्ष-समाधान के लिए दीर्घकालिक रचनात्मक समाधान-प्रयासों के साथ प्रयासरत है। समाधान के लिए किए गए प्रयासों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि जो जमीन पर कार्य करने जा रहा है, वह व्यक्ति कैसा है, उसकी सोच, उसकी मानसिकता, उसकी क्षमता, उसका अपना व्यक्तिगत संकल्प, इच्छाशक्ति व दृढ़ता का स्तर क्या है। बस्तर संभाग के जिलों में ऐसे कई अधिकारी पहुंचे जिन्होंने अपने जीवन की सुरक्षा को ताक पर रखते हुए रचनात्मक-समाधान की ओर के प्रयासों के लिए वास्तव में जमीनी इतिहास रच दिया। ऐसे अधिकारियों को बस्तर में भेजे जाने के लिए, उनको प्रयास करने देने के लिए, दिशा-निर्देशन के लिए, प्रोत्साहन आदि के लिए निःसंदेह मुख्यमंत्री रमण सिंह जी, उनकी सलाहकार टोली व नौकरशाह आदि धन्यवाद के पात्र हैं।
Raman Singh, the Chief Minister Chhattisgarh
आधुनिक बस्तर में इतिहास रचने वाले अधिकारियों में एक नाम टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली का आता है। टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली के कामों की तासीर समझ पाने के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि उन्होंने काम किन परिस्थितियों में किया और कर रहे हैं।
टामन सिंह सोनवानी लगभग ढाई साल पहले बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के जिलाधिकारी बनाए गए। नारायणपुर जिला क्या है, इस जिले में जिलाधिकारी या प्रशासन में होने का मतलब क्या है, यह समझने के लिए नारायणपुर जिला जिसके कुल क्षेत्रफल का लगभग 90% भाग घना जंगली क्षेत्र है, के “अबुझमाड़” को समझना पड़ेगा।
“अबुझमाड़”
“अबुझमाड़”, छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र में लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का एक ऐसा इलाका जिसे आधुनिक काल में भारत में आदिवासियों का वास्तविक घर कहा जा सकता है जो बाहरी दुनिया से अछूता है। बाहरी दुनिया से कितना अछूता है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सन् 2009 में मुख्यमंत्री रमण सिंह जी के निर्देश पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे से मुक्त किया। अबुझमाड़ क्षेत्र कई दशकों तक प्रतिबंधित क्षेत्र रहा, जो लोग इस क्षेत्र के नहीं थे उन लोगों का प्रवेश इस क्षेत्र में प्रतिबंधित रहा।
यह क्षेत्र आजादी के कुछ दशकों बाद आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया, इसलिए बाहरी दुनिया से अछूता हो गया हो, ऐसा नहीं है। अंग्रेज जिन्होंने दुनिया के कई देश खोजे, उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों को खोज लिया उन अंग्रेजों के शासन काल में भी लगभग डेढ़ सौ साल पहले जमीनी सर्वे किए जाने के बावजूद यह क्षेत्र अपवर्जित घोषित रहा।
आदिवासियों की स्थानीय भाषा में “अबुझमाड़” का मतलब अज्ञात पहाड़ियां होता है। बहुत अधिक घने जंगलों, पहाड़ियों व इन्द्रावती नदी के कारण अबुझमाड़ बाहरी दुनिया से सदैव ही अलग थलग रहा है। बाहरी दुनिया से पूरी तरह अछूते अबुझमाड़ क्षेत्र में पहुंचने के लिए साधन केवल दुर्गम जंगली रास्ते रहे हैं इसलिए यहां प्रशासन की पहुंच तक नहीं रही, विकास की योजनाओं का पहुंचाना तो कल्पनातीत बात रही है। यह सबसे प्रमुख कारण रहा कि यह क्षेत्र माओवाद का सबसे मजबूत व मुख्य गढ़ बन गया।
अबुझमाड़ क्षेत्र में अभी भी सिर्फ पैदल व साइकिल से ही पहुंचना संभव है। माओवादियों ने अबुझमाड़ जो उनका मुख्य गढ़ है को प्रशासनिक पहुंच से सुरक्षित करने के लिए यहां पहुंचने वाली जंगली पंगडंडियों वाले रास्तों में विस्फोटक सुरंगों (लैंड माइंस) आदि का प्रयोग बहुतायत से किया, ताकि प्रशासन व सुरक्षा बल यहां तक न पहुंच सकें।
टामन सिंह सोनवानी व उनकी टीम के कार्य
Taman Singh Sonwani IAS
जिन इलाकों में कार, बस, जीप, मोटरगाड़ी आदि पहुंचने के रास्ते ही नहीं उन इलाकों में जिलाधिकारी द्वारा प्रशासन की टोली के साथ माओवादियों के धमकी देने के बावजूद पैदल व साइकिल आदि से किसी तरह पहुंचते हुए, माओवादियों के झंडा बैनर लगे स्थानों में अपनी जान की बिना परवाह करते हुए बैठकर आदिवासियों के साथ विकास की योजनाओं के संदर्भ में चर्चाएं की, समाग्री वितरण कराया, डाक्टरों की टोलियों को भी साथ ले जाकर चिकित्सा शिविर कराए।
माओवादियों की समानांतर सरकार वाले इलाकों में जाकर आदिवासियों से विकास कार्यों व योजनाओं की चर्चा करना, उनका विश्वास अर्जित करके विकास के कार्यों को इतने दुर्गम स्थानों पर उनके दरवाजे तक पहुंचाना; निरंतर प्रयास, संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता व टोली भावना के साथ काम करने का ही परिणाम हो सकता है।
आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए पेयजल, चिकित्सा शिविर, सोलर-ऊर्जा वाली लाइट आदि जैसी मूलभूत सुविधाओं से शुरुआत की गई। इन सुविधाओं का विरोध माओवादी भी नहीं कर पाए क्योंकि उनको भी पानी व प्रकाश आदि चाहिए। इन सुविधाओं से बढ़ते हुए कृषि, आर्थिक विकास, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) व 20 वर्ष पहले विद्युत वितरण की योजनाओं को माओवादियोँ द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद, आज 20 वर्ष पश्चात उन योजनाओं को चलाने की स्थिति तक पहुंचे।
अब स्थिति यह है कि सड़कों का भी निर्माण शुरू हो रहा है, पुल और पुलियाएं बन रही हैं जिसके कारण आर्थिक विकास व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और बेहतर कर पाने में मदद मिल रही है तथा शताब्दियों से अपवर्जित इस इलाके को बाहरी दुनिया से जोड़ा भी जा सकेगा। इन सड़कों के निर्माण में मुश्किलों का अनुमान लगाने के लिए एक उदाहरण यह समझा जाए कि सिर्फ 26 किलोमीटर सड़क के निर्माण के लिए 23-24 पुल बनाने पड़ते हैं, कई घाट बनाने पड़ते हैं, औसतन लगभग हर एक किलोमीटर पर एक पुल। पुल व सड़क बनाने की सामग्री, यंत्र, इंजीनियर, मजदूर आदि का पहुंच पाना वह भी ऐसे दुर्गम व अशांत क्षेत्र में।
नारायणपुर जिले में 176 राजस्व ग्रामों सहित कुल लगभग 400 गांव हैं। जिनमें से अबुझमाड़ क्षेत्र के 100 से अधिक गांवों में तामन सिंह सोनावनी व उनकी प्रशासनिक टोली द्वारा रचनात्मकता का इतिहास लिख दिया गया है। इन गांवों को जोड़ने के लिए, संपर्क में लाने के लिए पुल-पुलियों का बहुत अधिक निर्माण कराया गया है।
स्वास्थ्य व पेयजल :
आदिवासी लोग नदियों, चुओं, नालों, पहाड़ी झरने से आदि से पानी ढोकर घर लाते थे घरेलू प्रयोग के लिए, यही पानी पीते भी थे। टामन सिंह सोनवानी ने 100 से अधिक गांवों में सोलर-पंप लगवाकर पेयजल उपलब्ध करवाया। हर गांव से कुछ युवाओं को सोलर-पंप का प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे सोलर-पंप का संचालन व देखभाल कर पाएं। इन गांवों में सोलर ऊर्जा से प्रकाश की व्यवस्था भी की गई है।
सीमित वनोपज पर निर्भर आदिवासी समाज के बच्चे, महिलाए व वयस्क सभी कुपोषित हैं। तामन सिंह ने गर्भवती महिलाओं व बच्चों को कुपोषण से बचाने का बीड़ा उठाया और गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं व बच्चों को सुपोषित आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई। स्वास्थ्य की जांच होती है, जांच में जिन पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है उनके सप्लीमेंट्स दिए जाते हैं।
दुर्गमता के कारण अबुझमाड़ के गांवों में पहुंचना सरल नहीं, इसलिए दुपहिया वाहनों में चलंत चिकित्सा केंद्र संचालित किए जाते हैं। चिकित्सा से संबंधित जितना आवश्यक सामान दुपहिया में लाद पाना संभव होता है उतना लाद कर गांव-गांव पहुंच कर लोगों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराई जाती है। जहां जहां पुल पुलिया बनने से संपर्क रास्ते बनते जा रहे हैं वहां और बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाने लगीं हैं।
Sukma Badde
आदिवासी युवती “सुकमा बड्डे” :
अबुझमाड़ के इलाके की एक आदिवासी लड़की, वह पहली माड़िया लड़की है जिसने नर्सिंग की पढाई करने के बाद अपने ही समाज के लोगों के लिए काम करने की इच्छा जाहिर की तो टामन सिंह सोनवानी ने सहयोग किया। सुकमा बड्डे नाम की यह पढ़ी लिखी युवती जिसने कितनी भयंकर तकलीफों से पढाई पढ़ी होगी, किसी शहर में सरकारी नौकरी करते हुए चकाचौंध, शहर में घर, कार, अपनी संतानों की बेहतर शिक्षा आदि सुविधाओं का भोग कर सकती थी। लेकिन उसने स्वेच्छा से यह निर्णय लिया कि उसको अबुझमाड़ के बिना सुविधा वाले दुर्गम गावों में अपने समाज के स्वास्थ्य के लिए काम करना है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली, PDS :
दुर्गम स्थानों व रास्ते न होने के कारण आदिवासी लगभग 60 किलोमीटर पैदल चलकर 35 किलो का राशन लेने आते थे। केवल राशन लेने आने के लिए आने जाने में कई-कई दिन लगते थे। जंगली व पहाड़ी रास्तों में 35-35 किलो का वजन शरीर पर लाद कर चलना पड़ता था। टामन सिंह सोनवानी ने सार्वजिनक वितरण प्रणाली के केंद्र लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित करने की योजना बनाई। प्रशासन के द्वारा अबुझमाड़ में इतने अंदर की दूरी तक घुस कर काम करने की कुव्वत इसलिए आ पाई क्योंकि वह आदिवासियों का विश्वास जीत पाने में सफल रहा और योजनाओं को वास्तव में आदिवासियों तक पहुंचाया।
कृषि, पानी, लिवलीहुड कालेज, दुग्ध-उद्योग व रोजगार के अवसरों से आर्थिक विकास :
अबुझमाड़ में आदिवासी पेंडा कृषि करते आए हैं। पेंडा कृषि का मतलब जो अपने आप उग वो उग गया, बीज को जमीन पर ऐसे ही बिखेर दिया जो उगना हुआ वह उग गया। पेड़ों से बीज गिर कर जिन बीजों को स्वतः उगना हुआ वे उग गए। वन संपदा को बीन कर एकत्र करना। यही सब मिलाजुला कर कहलाती है पेंडा कृषि।
प्रशासन ने आदिवासियों को कृषि का प्रशिक्षण दिलवाया। अब किसान मक्का लगा रहे हैं, सब्जियों की खेती कर रहे हैं, बागवानी लगा रहे हैं। किसानों को बाजार उपलब्ध करवाया जा रहा है। किसानों के परिवारों को पोषण वाला भोजन प्राप्त हो रहा है और आय भी हो रही है। आर्थिक विकास हो रहा है। क्रय-विक्रय शक्ति बढ़ रही है।
किसानों को खेती करने के लिए पानी की कमी न हो, कृषि योग्य जमीन उपलब्ध हो इसलिए नदीं नालों में जगह-जगह छोटे-छोटे चेकडैम बनवाए गए हैं ताकि पूरे वर्ष खेती करने के लिए किसानों को पानी उपलब्ध रहे।
आदिवासी युवाओं की समितियां बनाकर डेयरी खोलीं गईं हैं। गायों की देखभाल करने का प्रशिक्षण दिलवाया गया है। दूध के विपणन के लिए आदिवासी बच्चों के लिए विद्यालयों, छात्रावासों व सुरक्षा बलों के कैपों आदि में आपूर्ति होती है।
विभिन्न प्रकार के रोजगारों के लिए प्रशिक्षण देने के लिए जिला मुख्यालय में लिवलीहुड कालेज की स्थापना की गई। यहां से निकली कई आदिवासी महिलाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बैंगलोर जैसे शहरों में नौकरियां दीं। इनमें से कुछ वापस आकर लिवलीहुड कालेज में ही प्रशिक्षण देने का काम करने लगीं क्योंकि उनको महसूस हुआ कि उनको अपने समाज के लिए काम करना चाहिए।
जंगल में रहने के कारण, असुविधाओं में रहने के कारण उनके शरीर का स्टेमिना अच्छा होता है लेकिन सुरक्षा बलों की फिजिकल फिटनेस आदि जैसी परीक्षाएं कैसे उत्तीर्ण करें यह कुछ पता नहीं होता। इसलिए जिला मुख्यालय में सुरक्षा बलों में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए छात्रावास सहित प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया है। प्रशिक्षकगण व प्रशिक्षुगण यहीं रहते हैं और सिखाते सीखते हैं। सरकार ने बस्तर के आदिवासियों के लिए बस्तर बटालियन की स्थापना की है। यह भी यहां के आदिवासियों को दुनिया व मुख्यधारा से जोड़ने का दूरदर्शी प्रयास है।
Taman Singh Sonwani driving motorcycle
दुर्गम गांवों में स्वयं मोटरसाइकिल चलाकर लोगों के पास पहुंचने वाले नारायणपुर के जिलाधिकारी तामन सिंह सोनवानी कहते हैं कि रेडियो बहुत कुछ बदलता है। रेडियो बहुत सहजता से प्रयोग किया जा सकता है, बहुत तामझाम की जरूरत नहीं होती, हाथ में लेकर टहलते हुए भी सुना जा सकता है। इसलिए गावों में उन्होंने युवाओं को रेडियो उपलब्ध कराए हैं ताकि उन तक विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की जानकारियां पहुंचती रहें। लोकतंत्र पर उनका विश्वास बने। देखने में आया है कि प्रधानमंत्री की मन की बात व मुख्यमंत्री का गोठ आदि कार्यक्रमों को भी सुनते हैं, फिर सहमति असहमति के साथ आपस में चर्चा करते हैं। रेडियो को कैसे संवाद का सशक्त माध्यम बनाया जा सके ऐसी योजनाओं पर विचार व काम चल रहा है।
सुपर मार्केट :
अबुझमाड़ के ओरछा नामक स्थान में जो ब्लाक मुख्यालय भी है, में सुपर मार्केट की स्थापना की गई। सुपर मार्केट की स्थापना के पहले स्थानीय आदिवासी युवाओं को सामान रखरखाव, लेखा-जोखा व विपणन आदि का प्रशिक्षण दिया गया। सुपर मार्केट का संचालन करने के लिए आदिवासी युवाओं की समिति बनाई गई।
सुपर मार्केट की स्थापना दो प्रमुख कारणों से की गई। एक, दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को सरलता से उपलब्ध कराने के लिए जिनको लाने के लिए दुर्गम रास्तों में बहुत तकलीफें झेल कर मुख्यालय के बाजार तक आना पड़ता था। दो, किसान कृषि-उत्पाद का सरलता से विपणन कर सके, आदिवासी शिल्प आदि का सरलता से विपणन हो सके।
रोजमर्रा के सामानों, वन-उपज, कृषि उपज, आदिवासी शिल्पकला आदि सामानों संग्रह, विपणन आदि करने के लिए सुपर मार्केट में सुपर मार्केट में गोदाम व दुकान की स्थापना की गई। इसी तरह की सुपरमार्केट अबुझमाड़ के अन्य स्थानों में भी स्थापित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है।
शिक्षा :
Taman Singh Sonwani IAS with tribal students
माओवादी इलाकों में बच्चों व बच्चियों को माओवादी प्लाटून या दलम में भर्ती करने के लिए ले जाया जाता है। स्कूलों व शिक्षा आश्रमों को चलने नहीं दिया जाता है। गांव बहुत दूर-दूर व विरले बसे हुए हैं। इसलिए ओरछा ब्लाक में अंदर के गावों में एक प्रयोग किया गया है। आठ अलग-अलग गांवो के स्कूलों व आश्रमों को मिलाकर एक स्थान पर बड़े आश्रम की स्थापना करके “आठ-आश्रम” बनाया गया है। ये आठ गांव 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर थे, बहुत ही दुर्गम गांव।
स्कूलों व आश्रमों में आधुनिक तकनीक वाली टेलीविजन भी लगवाएं गए हैं ताकि बच्चे देखकर, सुनकर सीख सकें। बाहरी दुनिया से अनजान न रहें। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं ताकि बच्चों का व्यक्तित्व विकास हो, आत्मविश्वास विकसित हो।
दसवीं बारहवीं के बच्चे शिक्षक न होने की वहज से गणित व विज्ञान आदि जैसे विषयों में बहुत कमजोर रहते हैं। शिक्षक बीहड़ों में जाकर नहीं पढ़ाना चाहते हैं, इसलिए आउटसोर्सिंग करके नारायणपुर जिला मुख्यालय में कुछ भवन दिए गए हैं जहां छात्र व शिक्षक रहते हुए पढ़ते व पढ़ाते हैं। एक छात्र ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की मुख्य प्रवेश परीक्षा में अर्हता प्राप्त की।
चलते-चलते
Taman Singh Sonwani IAS
टामन सिंह सोनवानी से यह पूछने पर कि इतने असंभव क्षेत्र में इतने काम कैसे कर पाए। वे विनम्रता से जवाब देते हैं कि उन्होंने नहीं किया। ये काम इसलिए हो पाए क्योंकि प्रशासन में उनको मिली टोली बहुत अच्छी है और काम करना चाहती है। उन्होंने कहा कि पुलिस की सोच भी रचनात्मक समाधान की है इसलिए प्रशासन के साथ तालमेल अच्छा व संपूरकता का रहता है। टामन सिंह सोनवानी उपलब्धियों के श्रेय का बड़ा हिस्सा पुलिस व उनके अधिकारियों को देते हुए कहते हैं कि सिविक एक्शन प्रोग्राम के प्रति पुलिस बहुत गंभीर है। इस कार्यक्रम के तहत पुलिस अधीक्षक गांव-गांव प्रशासन के साथ लोगों से मिलने जाते हैं, चर्चा करते हैं, संभव हुआ तो वहीं समस्याओं का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, यहां तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यवहारिक रूप से सुदृढ़ व सरल बनाने में भी पुलिस का योगदान रहा।
He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.
For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.
He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.
ओमप्रकाश बंसल नहीं रहे। वे प्रशांत ज्योति के संपादक थे। उनके नाम से नेता, अफ़सर और बड़े-बड़े लोग ख़ौफ़ खाते थे। किसी के भी ख़िलाफ़ ख़बर हो, रोकने का प्रश्न ही नहीं। इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि उनके पिता को एक बार पुलिस ने सट्टा करते हुए गिरफ़्तार कर लिया तो उन्होंने क्राइम रिपोर्टर के रूप में अपने पिता के भी ख़िलाफ़ ख़बर लिखी। उनके एक भाई सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे, उनके बारे में भी कई बार ख़बरें छपीं। किसी का कितना भी बड़ा विज्ञापन उनके अख़बार में छप रहा हो, ख़बर न रुकती थी और न डायल्यूट होती थी। फ़्रंट की है तो फ़्रंट पर छपेगी और अंदर की है तो अंदर। विज्ञप्ति को पहले पेज पर तो क्या, भीतर के किसी पेज पर भी जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। वे देश के संभवत: ऐसे अकेले पत्रकार थे, जिसने के बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया।
मैंने अपनी पत्रकारिता प्रशांत ज्योति से शुरू की थी। यानी वह मेरे लिए पहली तनख़्वाह वाला अख़बार था। औम जी के किस्से कहीं से भी शुरू करो, ख़त्म नहीं होंगे। वे अनूठे जीवंत कैरेक्टर थे। क्राइम का वैसा रिपोर्टर मैंने कहीं नहीं देखा। किसी जगह पर पेड़ कटने की ख़बर आज भी हम लोगों के लिए कोई बड़ी ख़बर नहीं होती, लेकिन उन्होंने कुछ पेड़ कटे तो सिंचाई विभाग के तीन इंजीनियरों को जेल दिखाकर दम लिया। एक डाॅक्टर थीं कृष्णा गेदर। कलेक्टर थे आरएस गलूंडिया। गेदर से आंख में दर्द की दवा लाए तो 120 रुपए का बिल पास करवा लिया। उन दिनों आरटीआई वारटीआई नहीं हुआ करती थी। बंसल जी ने डोक्यूमेंट्स लिये, ख़बर छापी और कार्रवाई शुरू कर दी। गलूंडिया जी ने बंसल जी से आख़िरी क्षणों में माफ़ी न मांगी होती तो वे जेल में हाेते। लेकिन भाई रेवतीरमण ने उनका जितना साथ दिया और जिस दौर में दिया, वह कोई और नहीं दे सकता था।
उनके कुछ किस्से तो ग़ज़ब ही हैं। जैसे :
कहां जा रहा है?
फ़ोन करने।
तो ये फ़ोन है या बेरिये की…।
अरे, वो बाहर करना था।
एसटीडी?
नहीं, आईएसडी।
तो क्या हुआ? इसमें आईएसडी भी है, मिस्टर।
मेरी तनख्वाह है छह सौ और आईएसडी का बिल आएगा 900 का।
फ़ुकरिया समझा है क्या? आेए, बाहर नहीं जाएगा। ले पकड़ फ़ोन। कर यहीं से। बाहर कभी आईएसडी करने गया तो ये रही बंदूक, गोली मार दूंगा!
एक माननीया : बंसल जी, मुझे आज अापके …ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं बैठने दिया।
क्यूं?
बोला, तू कहां की पत्रकार है? तू तो विज्ञापन का काम करती है।
हम्मममम ….कौन है रे अंदर। अरे सक्सेना!
..आज से संपादक सुदर्शना शर्मा….और डिक्लेयरेशन क्लियर होने से पहले प्रेसलाइन में उसी दिन से संपादक का नाम बदल गया।
नगर परिषद के चुनाव थे। एक बहुत बड़े ट्रांस्पोर्टर चुनाव में उतरे। चुनाव कार्यालय पुरानी धानमंडी में खोला। ठीक प्रशांत ज्योति के सामने। सुबह-सुबह लाउड स्पीकर शुरू। बंसल जी को सिरदर्द की पुरानी प्रॉब्लम थी। दोपहर दो बजे आए।
बोले : ये क्या है? दो-चार बार सेठ जी से अनुरोध किया कि स्पीकर हटा लें। नहीं माने तो उन्होंने कलेक्टर को फ़ोन लगाया। बोले : कलेक्टर साहब, दो घंटे में या तो ये लाउडस्पीकर हटा दो। नहीं तो मैं तुम्हारी ….में लगा दूंगा!जिला कलेक्टर ने कोतवाली पुलिस को भेजा कि जाओ इस जाहिल को गिरफ़्तार करके लाओ। कोतवाल माफ़ी मांगते हुए आए और इस बीच किसी ने कलेक्टर को समझा दिया कि आप अपमान का घूंट व्हिस्की समझकर पी जाओ। नहीं तो कल आपके दिक्कत हो सकती है। उन्होंने कहा : मैंने ऐसा क्या किया है? सामने अॉफ़िसर ने समझाया : सर, वो आपकी घड़साना वाली ज़मीन के काग़ज़ उनके ही पास हैं! उसी दिन शाम को कलेक्टर का संदेशवाहक प्रशांत ज्योति कार्यालय में था और कलेक्टर साहब विनयावनत मुद्रा में। लाउडस्पीकर तो कभी का उतर चुका था।
प्रशांत ज्योति का पुराना कार्यालय धानक धर्मशाला में एक ऊंचे चबूतरे पर हुआ करता था। उसे बंसल जी अधिकारपूर्वक "मेरा थड़ा" कहा करते थे। उन्हें छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाया करता था तो सामने बैठे रिपोर्टर हो या कोई बड़े सेठ जी, बोलते थे : उतर मेरै थड़ै ऊं!!! और उनका यह तकियाकलाम तब भी था जब वे धानमंडी के भूतल में अपनी मित्र के साथ बैठे रहते थे!
इतिहास और धर्म से संबंधित पुस्तकों के वे बेहद शौकीन थे। उन्होंने एक बार मेरे पास एक ऐटलस देखा।
बोले : कितने का है?
मैंने कहा : 9000 का।
बोले : ले चेक। दे दे।
मैंने मना किया तो बोले : पता बता। मंगवा के दे। ये ले चेक।
किताब चाहे कम्युनिज्म की हो या कौटिल्य की, खूबी बता दो तो बंदे से भले 50,000 रुपए ले लो।
वे एक नेकदिल इनसान थे। फक्कड़ थे। भावुक थे। कोई चाहे उन्हें किसी अपराधी के पक्ष में मोड़ दे या साधु के। कई लाेगों ने उन्हें झूठे अत्याचारों के किस्से सुनाकर कई बार गलत ख़बरें भी छपवाईं और बाद में मैंने बंसल जी को रोते हुए भी देखा।
कई बार वे 360 डिग्री घूम जाया करते थे। अगर कोई तथ्य ला दे तो। इस तरह की उनकी आदतों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका भी। लेकिन वे जिस पर भरोसा करते थे उस पर इतना करते थे कि वह चाहे उन्हें कुछ भी कह दे और कर दे, लेकिन अगर किसी ने उन्हें कुछ भर दिया तो आज का सोना कल की राख भी हाे सकता था। वे विचलनों और विद्रोहों के बीच संतुलन साधने की चालाकी नहीं जानते थे। वे किसी एक व्यक्ति के साथ अत्याचार होने पर पूरी कम्युनिटी से भिड़ जाते थे और इसीलिए वे औमप्रकाश बंसल थे। वे अफ़सरों से भिड़ते भी थे, लेकिन उनके साथ खड़े भी हो जाते थे। राजस्थान के टॉप ब्यूरोक्रैट रामलुभाया जिन दिनों कलेक्टर थे, उन्होंने अस्पताल को सुधारने का बीड़ा उठाया तो सब अख़बार वाले डॉक्टरों के साथ थे, लेकिन बंसल अकेले रामलुभाया के साथ।
गंगानगर में पुरी के जगदगुरु शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ आए थे। उन दिनों सती विवाद चल रहा था। निरंजन देव सती समर्थक थे और कह रहे थे कि वेदों में सती का समर्थन है। बंसल जी ने मुझे बुलवाया। बोले : आपके पिताजी से पूछो कि वेदों में सती का समर्थन है क्या? मैंने बताया कि वे कह रहे हैं नहीं है। बोले : इस शंकराचार्य के खिलाफ केस भी करवाना है और इसे भगाना भी है। करीब दस हमने खबरें लिखीं। शंकराचार्य से प्रश्न पूछते। वे रात को जवाब देते। लेकिन पांच दिन बाद ही हमारी खबरों को लेकर पुलिस ने केस दर्ज किया और शंकराचार्य रातोरात भाग गए। उस दौर में पूरा मीडिया एक साथ था और शंकराचार्य अकेले पड़ गए।
ख़बरों में वे किसी को नहीं बख्शते थे। किसी समय कम्युनिस्ट उनके दोस्त हुआ करते थे। आज भी हैं। लेकिन उन्होंने एक ख़बर निकाली जब सीपीएम नेता हेतराम बेनीवाल सीटू के नेता हुआ करते थे और जेसीटी मैनेजमेंट ने उनके बेटे की शादी में 51000 रुपए का बान दिया था।
कानून की वैसी बारीकियां मैंने किसी संपादक में नहीं देखीं। क्राइम इन्वेस्टिगेशन की वैसी हूक शायद ही किसी में हो। पुलिस से आगे और ज्यादा तथ्यों के साथ। कई उलझे हुए मर्डर केसों में उन्होंने जांच की धारा बदल दी। कानून और पत्रकारिता मिलकर किसी का कितना फ़ायदा कर सकते हैं, यह चीज़ उन्होंने बार-बार साबित की।
एक बार एक दोस्त को उन्होंने पूरा अख़बार संभालने को दे दिया। कुछ दिन बाद दोस्त दिखाई नहीं दिए। मैंने पूछा : ….कहां हैं? वे इधर-उधर देखने लगे। फिर भीतर आवाज़ दी : …कहां है? जल्दी लाओ कहां है? ….कुछ देर बाद अंदर से एक कंपोजीटर ब्लेड लेकर बाहर आया। मैं हंसा। गुस्से से बोले : हंसता क्याें है? मैंने कहा : ये तो ब्लेड है। बोले : नहीं, ये ब्लेड नहीं है। ये तो …..है! बाद में उन्होंने एक्सप्लेन किया कि वो आपका बंदा दिन भर इस ब्लेड से दूसरे अखबारों की खबरें काटकर यहां दिया करता था तो मैंने उस दिन से उन्हें कहा, तुम जाओ और आज से ये ब्लेड प्रशांत ज्योति का न्यूज एडिटर!
वे बच्चे की तरह सरल स्वभाव भी थे। एक बार उनका अपने एक पुराने मित्र से झगड़ा हो गया और ऐसा हुआ कि बस पूछो मत। मैंने उनसे पूछा : आप तो दोस्त थे। ये गिरावट कैसे? बोले : उसने मेरी कपड़े की दुकान बंद करवाकर पान का खोखा शुरू करवा दिया। इसलिए। मैंने कहा : आप पहले कपड़े की दुकान करते थे? वे बोले : नहीं। मैं डेली अख़बार निकालता था। ये बोला : देख बंसल, विज्ञापन तो डेली मैं भी इत्ता ई आवैगा और वीकली मैं भी इत्ता ई। क्यूं खरचो करै? तो मैंने उसकी सलाह मानकर अखबार को डेली से वीकली कर दिया। यानी कपड़े की दुकान को पान के खोखे में बदल दिया। मैंने कहा : ये तो आपकी गलती है। आपने उनकी बात क्यों मानी? बोले : यार ये तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं। मैं तो जो कोई आता है। उसी की मान लेता हूं! मैंने कहा : आपका दोस्त कहता है : आप रात को पेटीकोट पहनकर घूमते हो! वे बहुत हंसे। बोले : यार पुराना दोस्त है। वही अंदर की बात जान सकता है! मुझे लगा, वे गुस्से से भर उठेंगे। लेकिन उन्होंने जोर से हंसते हुए बताया : यार, मैं लुंगी बांधता था। मेरा पेट बड़ा था। लुंगी खुल जाती थी। ये चौधरी ने सलाह दी : यार बंसल, तेरी ये लुंगी बार-बार खुल जाती है। तू इसे आगे से सिलवा ले। मैंने सिलवा ली। ये फिर भी गिरती रही। वो बोला : यार तू इसका नेफ़ा बनवा और नाला डाल ले। मैंने उसकी वो बात भी मान ली। …फिर कई दिन बाद साला मजाक करने लगा : यार ये तेरा पेटीकोट!!! अब देख…तू फिर मुझे कहेगा कि ये भी ग़लती मेरी ही ही है। चल उतर मेरे थड़े से!!!
साहित्य को वे बहुत सम्मान से देखते थे। उन्होंने रविवार का पूरा अख़बार ही साहित्य को समर्पित कर रखा था। ऐसे कई मौके आए जब हमने पहले पन्ने पर हिन्दी की बेहतरीन रचनाएं छापीं।
उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। लेकिन एक पहलू ऐसा है, जो शायद औमप्रकाश बंसल ही कर सकते थे। इन विषयों पर फ़िल्मों में काल्पनिक पात्रों को जीने वाले हीरो तो करते रहे हैं, लेकिन आम जीवन में वैसा दुस्साहस करना हर किसी के बस की बात नहीं। अपने जीवन में उठाया उनका यह कदम उनमें लाख अवगुण हों तो भी उन्हें ढांप लेता है और उन्हें मेरी नज़र में उन्हें एक नायक की छवि प्रदान करता है।
आज बंसल नहीं रहे, बात इतनी सी नहीं है। वह अनगढ़ और अनचीन्हा व्यक्तित्व नहीं रहा। एक अदभुत चरित्र नहीं रहा। एक असाधारण व्यक्ति नहीं रहा। उनके साथ ही मेरे शहर की जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा चला गया, जिसमें दसों रस समान वेग से बहते थे।
उरी में भारतीय सेना के 18 जवानों के मारे जाने की घटना के जवाब में भारत द्वारा नियंत्रण रेखा के पार जो सैनिक कार्यवाही की गई, उसकी वाहवाही के शोर में कश्मीर के लोगों की व्यथा छुप सी गई है। भारत और पाकिस्तान के बीच जितनी भी झड़पें हुई हैं, उनके केंद्र में कश्मीर रहा है। भारत का कहना है कि कश्मीर उसका अविभाज्य हिस्सा है और धरती की कोई ताकत कश्मीर को उससे छीन नहीं सकती। दूसरी ओर, पाकिस्तान, कश्मीर के भारत में विलय के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करता है। पाकिस्तान का कहना है कि चूंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए।
आतंकी हमलावरों द्वारा उरी में 18 भारतीय सैनिकों को मार दिए जाने के बाद से यह मुद्दा अखबारों की सुर्खियों में आ गया। दरअसल, घटनाक्रम की शुरूआत हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की सेना के साथ एक मुठभेड़ में मौत के साथ हुई। इस घटना पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। जहां मीडिया ने इसे घाटी में सक्रिय अतिवादियों से मुकाबला करने में भारतीय सेना की बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, वहीं कश्मीर के लोगों का एक तबका इसके विरोध में सड़कों पर उतर आया। विरोध की अभिव्यक्ति का मुख्य तरीका पुलिस और सेना के जवानों पर पत्थरबाजी है। इसके बाद हुए घटनाक्रम में लगभग 80 लोग मारे गए और 9,000 से ज्यादा घायल हुए। इनमें से अधिकांश को पेलेट से चोटे लगीं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षाबल करते हैं। कई अपनी आंखे खो बैठे हैं और अन्यों को शरीर के विभिन्न अंगों में गंभीर चोटें आईं। पुलिस और सेना के जवान भी घायल हुए। राज्य में कफ्र्यू लगा दिया गया और यह राज्य में अब तक का सबसे लंबा कर्फ्यू था।
सरकार द्वारा शांति स्थापना के लिए कई प्रयास किए गए। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर गए और वहां के नेताओं से बातचीत की। भारत सरकार और गृहमंत्री का कहना है कि वे अलगाववादी नेताओं से बात नहीं करेंगे। जब एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल घाटी गया तब प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों जैसे सीताराम येचुरी और डी राजा ने अलगाववादी नेता गिलानी से बातचीत करने की कोशिश की परंतु उन्होंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।
लगभग दो माह बाद कर्फ्यू उठा लिया गया परंतु स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है। उरी में आतंकी हमले के बाद पूरा फोकस आतंकवाद के मुद्दे पर हो गया है। जहां तक कश्मीर के हालात का सवाल है, सरकार का कहना है कि गड़बड़ी फैलाने वाले घाटी की आबादी का पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें पाकिस्तान भड़का रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी में जो हालात हैं, उसके लिए पाकिस्तान भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। हमारे पड़ोसी देश के नेता इस मुद्दे पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं। परंतु यह भी सच है कि कश्मीरी लोगों में लंबे समय से गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है और पिछले कुछ वर्षों में यह अपने चरम पर पहुंच गया है। वहां के युवा गुस्से में हैं। उनके मन में अलगाव का भाव है। कश्मीर के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर आतंकी, घाटी में शांति का वातावरण नहीं बने रहने दे रहे हैं तो दूसरी ओर सशस्त्र बलों द्वारा लोगों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। राज्य में लागू सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना के कर्मी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं और कई मामलों में निर्दोष नागरिकों को जबरन परेशान किया जा रहा है।
कश्मीर के हालात पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रपट बताती है कि घाटी में मानवाधिकारों का उल्लंघन कितना आम है। बैंगलोर में जारी इस रपट में कहा गया है कि 1990 से 2011 तक राज्य सरकार के अनुसार राज्य में 43,000 लोग मारे गए। उनमें से 21,323 ‘अतिवादी’ और 13,226 ‘नागरिक’ (अर्थात जो हिंसा में सीधे शामिल नहीं थे) थे। हथियारबंद समूहों द्वारा 5,369 सुरक्षाकर्मियों को मार डाला गया और इस अवधि में सुरक्षाबलों ने 3,642 ‘नागरिकों’को मौत के हवाले कर दिया।
सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण बिना किसी जांच या मुकदमे के आरोपियों की जान ली जा रही है और मानवाधिकार उल्लंघन की अन्य घटनाएं हो रही हैं। इस अधिनियम की धारा 7 के अनुसार नागरिक अदालतों में सुरक्षाबलों के किसी सदस्य पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्रीय और राज्य शासन की अनुमति आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुरक्षाबलों की ज्यादतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है। सेना के खिलाफ जम्मू और कश्मीर में जो शिकायतें की गईं, उनमें से 96 प्रतिशत को ‘झूठा और आधारहीन’ या ‘सैन्यबलों की छवि को खराब करने के इरादे से किया गया’ बताकर खारिज कर दिया गया। इन परिस्थितियों में कश्मीर में हर घटना पर बवाल खड़ा हो जाता है और युवा विरोध करने सड़कों पर उतर आते हैं। नागरिकों में राज्य के प्रति जो गहरा असंतोष व्याप्त है, वह बहुत दुःखद है। नागरिक इलाके व्यवहारिक रूप से सेना के कब्जे में हैं। कई वर्षों से घाटी में लगभग 6 लाख सैनिक तैनात हैं। वहां के लोगों को ऐसा लगता ही नहीं है कि वहां प्रजातंत्र है। जाहिर है इन परिस्थितियों में असंतोष और गहरा होता जा रहा है। इस पूरी समस्या के लिए केवल पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा, यद्यपि पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।
आखिर रास्ता क्या है? यूपीए-2 सरकार ने वार्ताकारों की एक तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की थी जिसने यह सिफारिश की थी कि कश्मीर की विधानसभा की स्वायत्तता पुनर्स्थापित की जाए और अतिवादियों व पाकिस्तान के साथ बातचीत की जाए। यह मांग भी लंबे समय से की जा रही है कि सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम को समाप्त किया जाए और क्षेत्र में तैनात सैन्यबलों की संख्या घटाई जाए।
कश्मीर में शासन कर रही पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार, असंतुष्टों से बात करने तक को तैयार नहीं है। इससे घाटी में बेचैनी और असंतोष बढ़ रहा है। उरी और उससे पहले पठानकोठ पर हमले में पाकिस्तान की भूमिका ने वातावरण को और विषाक्त कर दिया है।
हम सब को याद है कि चुनाव अभियान के दौरान भाजपा यह घोषणा करते नहीं थकती थी कि मोदी के सरकार में आने के बाद आतंकवादियों की हमला करने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी। यह दावा खोखला सिद्ध हो चुका है।
आज आवश्यकता यह है कि पूरे क्षेत्र में शांति की स्थापना की जाए। कश्मीर के लोगों के घावों पर मलहम लगाई जानी चाहिए और उन्हें चैन से अपना जीवन गुज़रबसर करने का मौका मिलना चाहिए। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत भी आवश्यक है। कश्मीर के साथ 1948 में विलय की जो संधि की गई थी, उसके स्वायत्तता संबंधी प्रावधानों का सम्मान किया जाना चाहिए। वार्ताकारों की समिति की रपट इस मुद्दे पर संतुलित रूख अपनाने की सिफारिश करती है। इस रपट पर गंभीरता से विचार होना चाहिए ताकि घाटी में शांति स्थापित हो सके।
एक बहुत पुरानी कहावत है। बुज़ुर्ग कहते आए हैं। अगर अपने वस्त्र उघाड़ेंगे तो अपनी ही नग्नता दिखाई देगी। हर चीज़ का न सुबूत होता है और न यह ज़रूरी कि हर चीज़ दिखाई ही जाए। सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं, पूरे मीडिया में जो बहस चल रही है, वह हमारे देश की जगहंसाई कराने के लिए काफ़ी है। दुनिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रराज्य की विदाई का समय आ चुका है और हम अभी तक पूरी तरह राष्ट्र ही नहीं हो सके हैं।
हमारे देश में या तो राष्ट्रवाद के स्वयंभू ठेकेदार हैं और वे अपने अलावा किसी दूसरे को राष्ट्रवादी मानना ही नहीं चाहते या ऐसे लोग जिनके लिए राष्ट्र से पहले व्यक्तियों की जमात है। ऐसे लोगों के लिए उनके अपने अलावा सब देशद्रोहीनुमा चीज़ हैं। एक वर्ग ऐसे लोगों का है, जो लोकतांत्रिक ढंग से पांच साल के लिए चुने हुए लोगों की किसी भी बात को गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं हैं। ये सब वे लोग हैं, जिन्होंने चुनाव में और उससे पहले कभी इस देश के पीड़ित लोगों के अांसू पौंछने का कोई काम नहीं किया। ये सब विचारधारा के कड़ाहों में उबलते रहे हैं।
मुझे तो कई बार लगता है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए उतनी मेहनत की ही नहीं, जितना परिश्रम सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहनसिंह, दिग्विजयसिंह, पी चिदंबरम्, कपिल सिब्बल आदि ने नरेंद्र मोदी की राह आसान बनाने के लिए किया। उनकी सरकार के पहले तीन साल का रिकॉर्ड मुखर होकर कह रहा था कि सीटें ज्यादा नहीं आएंगी, लेकिन सुनता कौन था? नरेंद्र मोदी के बारे में मैंने सबसे पहले वामपंथी अभियानों के दौरान बांटे जाने साहित्य के माध्यम से सुना था। वामपंथियों को मोदी को राष्ट्रव्यापी हिन्दू हृदयसम्राट बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।
इस बात के कि वे गुजरात में उनके धत्कर्मों पर फोकस करके गुजरात में उन्हें रोकते। यह एक लोकतांत्रिक तरीका होता। लेकिन आज जो मोदी को लेकर अरण्यरोदन हो रहा है, वह अप्रासंगिक होता जा रहा है। आज सर्जिकल स्ट्राइक पर बहस करने वाले तीन साल बाद चुनावों के आते-आते इतने थक जाएंगे कि बोल ही नहीं निकाल पाएंगे, जबकि वही उचित समय होगा। अभी तो बच्चे की जान मत लीजिए, उसे फस्ट टेस्ट, सैकिंड टेस्ट, थर्ड टेस्ट, कॉपी चेक, हाफ़ इयरली आदि देने दीजिए। फ़ाइनल आए तो फिर ख़बर जरा कस कर लीजिएगा। जैसे लोगों ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिग्गी राजा, चिदंबरम, सिब्बल आदि की ली। लेेकिन मुझे लगता है, तब आपके तेवर ऐसे नहीं रहेंगे।
लेकिन आप संवैधानिक ढंग से सत्ता में आ जाते हैं तो इसका मतलब यह भी नहीं होता कि आपकी आलोचना नहीं की जा सकती। इस देश की लोकशाही को अधिकार है कि वह ख़राब प्रश्नपत्र करने वाले बच्चे को दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़ा कर दे या मुर्गा बना दे। मुर्गा वुर्गा आजकल लोगबाग कम बनाते हैं, क्योंकि बच्चों की माएं बहुत हल्ला मचाने लगती हैं। फिर भी अापकी ग़लती पर आपको ग्राउंड के चार चक्कर तो लगवाए ही जा सकते हैं।
खैर, एक खेमा है, जो पहले सत्ता में रही अपने विरोधी दलों की सरकारों की हर अच्छाई की तो आलाेचना करता ही था, उन बुराइयाें पर तो कोहराम मचाता था, जिन्हें आज उन्होंने अपना प्रिय कंठहार बना रखा है। एफडीआई, पाकिस्तान को सबक सिखाना, चीन की चीं बुला देना, स्वदेशी आदि ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन पर पूरा संघ परिवार पहले दिन से शीर्षासन की मुद्रा में है। पुराने ऑडियो और विडियो सामने आए तो मारे शर्म के ऐसे-ऐसे कदम उठाने पड़े, जिनसे किसी भी जिम्मेदार नेता को बचना ही चाहिए। आख़िर यह कौन-सा आत्मसम्मान है, जो आज चीन की हर चीज़ के बहिष्कार का नारा लगाता है, लेकिन हमारे प्राणप्रिय नेता सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की बारी आती है तो आप भारतीय हस्त लाघव वाले शिल्पकारों को भूल कर चीन की शरण में चले जाते हैं। आप अगर किसी ऐसी चीज़ का सहारा लेंगे, जो उचित नहीं है तो अनुचित प्रश्न भी आपके सामने जीभें लपलपाएंगे।
इसलिए एक जिम्मेदार और सुसंस्कृत देश के नागरिक होने के नाते जिम्मेदार और सुसंस्कृत अाचरण ही करना चाहिए। आप अपने अहंकारों के लिए देश के दर्प को दांव पर मत लगाइए। अगर आपका उपहास उड़ता है तो अपनी पुरानी ग़लतियों पर अफ़सोस कीजिए, न कि उन पर गर्वीला पर्दा डालिए। यही पश्चाताप है। अगर इस देश ने किसी को संवैधानिक तौर पर चुना है तो बर्दाश्त कीजिए, क्योंकि करोड़ों लोग अपने नापसंद नेताओं को सत्तासीन होते मन ही मन कुढ़ते रहे हैं। उनके मन में 68 साल की दबी हुई कुंठा अगर उबाल नहीं खाएगी तो किसकी खाएगी? इसलिए देश को देश रहने दें। अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।
राजा –
मरवाता रहा सैनिक
प्रजा –
देती रही श्रद्धांजलियाँ
रह रह कर
उठता रहा ज्वार
राष्ट्रभक्ति का ..
चलती रही गोलियां
मरते रहे इन्सान
बहता रहा लहू
चीखते रहे चेनल्स
प्रजा
मनाती रही जश्न
शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प
राजा
करता रहा राज
इसके अलावा वह
कर भी क्या सकता था बेचारा
युद्ध चलता रहा
सैनिक मरते रहे
राष्ट्र बहुत खुश था
जब युद्ध का उन्माद
फैल गया पूरे राष्ट्र में
तब राजा ने
राष्ट्र को संबोधित किया
राष्ट्र के नाम सन्देश दिया
राष्ट्र से की
अपने मन की बात
राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
राष्ट्र के नाम पर लड़ा चुनाव
राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी
राजा बड़ा नेक था
और राष्ट्रभक्त भी
उसने सब कुछ
राष्ट्र के नाम पर किया
तब से राष्ट्र और राजा में
कोई फर्क ही नहीं बचा
राजा ही राष्ट्र हो गया
और राष्ट्र ही राजा
इस तरह अवतरित हुआ
" राष्ट्र राज्य ."
उसके बाद
फिर वहां
न चुनाव की जरुरत पड़ी
न लोकतंत्र की,
और न ही संविधान की
सारे झमेलों से
मुक्त हो गया राष्ट्र
इस तरह राष्ट्र के लिए
बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 26 सितंबर, 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को लिखा ‘‘आपको तो यह पता ही होगा कि अखलाक नामक एक व्यक्ति को दादरी में कथित गौरक्षकों ने पीट-पीटकर मार डाला। इस भयावह अपराध को अंजाम देने वालों को सज़ा देने की बजाए,पुलिस और स्थानीय जज, अखलाक के परिवार के खिलाफ ही कार्यवाही कर रहे हैं…क्या पुलिस पागल हो गई है?’’
दादरी, उत्तर प्रदेश
चांद खान उर्फ शान खान को अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमले के मामले में सन 2002 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसे 11 वर्ष जेल में बिताने के बाद,बिना किसी मुआवजे के रिहा कर दिया गया क्योंकि एक अदालत ने उसे बरी कर दिया। परंतु अब उसे गौहत्या के एक मामले में मुजरिम बना दिया गया है।
मुफ्ती अब्दुल कय्यूम अब्दुल हुसैन की एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक है ‘‘इलेविन इयर्स बिहाइन्ड द बार्स-आई एम ए मुफ्ती, नॉट ए टेरोरिस्ट’’ (सींखचों के पीछे ग्यारह साल-मैं एक मुफ्ती हूं, मैं आतंकवादी नहीं हूं)। यह पुस्तक मुफ्ती साहब के आतंकी हिंसा में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तारी, उनको शारीरिक यंत्रणाएं दिए जाने और उसके बाद, इतने लंबे अरसे तक जेल में रखे जाने की करूण गाथा कहती है। आमिर खान नाम के एक मुस्लिम लड़के को आतंकियों का साथ देने के आरोप में जब गिरफ्तार किया गया था, तब वह मेट्रिक की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। चैदह साल जेल में काटने के बाद जब वह रिहा हुआ, तब तक उसके पिता गुज़र चुके थे और उसकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं। उनकी पुस्तक ‘‘फ्रेम्ड एज़ ए टेरेरिस्ट’’ (आतंकी बताकर फंसाया गया) को पढ़ने से यह अंदाज़ा होता है कि हमारी व्यवस्था एक निर्दोष व्यक्ति के प्रति कितनी क्रूर हो सकती है।
ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। ऐसे मुसलमान युवकों की एक लंबी सूची है जिन्हें आतंकवाद से संबंधित आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया, उनकी जिंदगी थम गई और उनके करियर व परिवार तबाह हो गए। हाजी उमरजी को गोधरा ट्रेन आगजनी मामले का मास्टरमाइंड होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कई साल जेल में बिताने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला। मक्का मस्जिद (हैदराबाद), मालेगांव समझौता एक्सप्रेस और अजमेर धमाकों के मामलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया और बाद में कोई विश्वसनीय सुबूत न पाए जाने पर रिहा कर दिया गया। इन सभी मामलों में पुलिस की जांच पूर्वाहग्रहपूर्ण और गलत थी। यह स्पष्ट है कि पुलिस, अल्पसंख्यकों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। भारत में सांप्रदायिक हिंसा के अध्येता हमें बताते हैं कि ब्रिटिश काल में पुलिस की चाहे जो कमियां रही हों, सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में वह निष्पक्षता से काम करती थी। पुलिस के अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त होने की शुरूआत, स्वाधीनता के बाद हुई और स्वतंत्र भारत में जबलपुर में 1961 में हुए पहले सांप्रदायिक दंगे के बाद से लेकर आज तक पुलिस का अल्पसंख्यक-विरोधी दृष्टिकोण और मानसिकता हम सबके सामने है। कई मौकों पर पुलिस के अलावा, राज्य तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व ने भी निष्पक्षता नहीं दिखलाई। अधिकांश जांच आयोगों की रपटें, फिल्में और डोक्युमेंट्रियां इस तथ्य को रेखांकित करती हैं। सरकारी सेवाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है और जो चंद मुसलमान उच्च पदों पर हैं, वे भी या तो धारा के साथ बहने लगते हैं या चुप्पी साध लेते हैं। अक्सर उन्हें ऐसे क्षेत्रों में पदस्थ किया जाता है जहां वे सांप्रदायिक हिंसा को रोकने या उसे करने वालों को सज़ा दिलवाने में सक्षम ही नहीं होते।
मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों पर श्रीकृष्ण न्यायिक जांच आयोग की रपट बताती है कि किस तरह पुलिस अधिकारियों ने दंगाईयों की हरकतों को नजरअंदाज किया और कई मामलों में उनका साथ दिया। दिल्ली में 1984 में हुई सिक्ख-विरोधी हिंसा और सन 2002 के गुजरात दंगों में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। महाराष्ट्र के धुले में सन 2013 में पुलिस वाले स्वयं दंगाईयों की भूमिका में थे। हाशिमपुरा घटना पर अपनी पुस्तक में पूर्व पुलिस महानिदेशक वीएन राय ने बताया है कि किस प्रकार पुलिस ने एक ट्रक में मुस्लिम युवकों को भरा, उन्हें दूर ले जाकर गोलियों से भून दिया और फिर उनकी लाशें एक नहर में फेंक दीं। जो लोग जिंदा बच गए, वे इस भयावह घटनाक्रम को दुनिया के सामने लाए।
अमरीकी मीडिया ने 9/11/2001 को डब्ल्यूटीसी पर आतंकी हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इस शब्द से ऐसा प्रतीत होता है मानो दुनिया में आतंकवाद के लिए केवल इस्लाम और मुसलमान ज़िम्मेदार हैं। मीडिया ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि अल्कायदा को इतना शक्तिशाली बनाने वाला अमरीका ही था। तब से हालात और खराब हुए हैं। न केवल समाज बल्कि राज्यतंत्र भी मुसलमानों को आतंकी बतौर देखने लगा है। पूरे विश्व में इस्लाम के प्रति इस तरह का घृणा का वातावरण बनाने में मीडिया और निहित स्वार्थी तत्वों की भूमिका रही है।
जाहिर है, निर्दोष युवाओं और अन्यों को पुलिस और राज्य तंत्र की मनमानी से बचाए जाने की आवश्यकता है। पुलिस सुधारों के लिए कई आयोग गठित किए गए जिन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए कई सुझाव दिए। परंतु अधिकांश सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पुलिसकर्मियों को अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की ज़रूरत है। जिन अकादमियों और संस्थानों में पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, उनके पाठ्यक्रमों में पूर्वाग्रहों और टकसाली धारणाओं के पीछे के सच को उजागर करने वाली सामग्री शामिल की जानी चाहिए। पुलिसकर्मियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि भावनाओं में बहने की बजाए उन्हें संविधान और कानून के प्रति वफादार रहना चाहिए।
कई नागरिक समाज संगठन इन मुद्दों पर काम कर रहे हैं। वे ऐसे लोगों के मामले उठाते हैं जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसा दिया गया है परंतु इस तरह के संगठनों की क्षमता सीमित है। ऐसे संगठनों को मज़बूत किया जाना ज़रूरी है। जो लोग झूठे प्रकरणों में लंबी अवधि तक जेलों में पड़े रहते हैं उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए और उन्हें फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों को सज़ा दी जानी चाहिए। प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उन लोगों द्वारा लिखी पुस्तकें अनिवार्य रूप से पढ़वाई जानी चाहिए जिन्हें झूठे प्रकरणों में फंसाया गया हो। वे राजनैतिक दल, जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी हैं, उन्हें सांप्रदायिक संगठनों को अलग-थलग करने के प्रयास करने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सांप्रदायिक दलों के हाथों में सत्ता न आए। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जिसमें न्याय और शांति दोनों हों। किसी धर्म विशेष के व्यक्तियों के साथ इस तरह के घोर अन्याय को कोई समाज और देश स्वीकार नहीं कर सकता। कोई समाज कैसा है, इसका एक मानक यह है कि वह कमज़ोर वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ न्याय करता है अथवा नहीं। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि जस्टिस काटजू के पत्र को गंभीरता से लिया जाएगा।
स्वर्ण भारत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय सोनवणी ने स्वच्छ शासन प्रणाली को स्थापित कराने के लिए, लगभग 100 लोगों के साथ दिल्ली में राज घाट से लेकर आई टी ओ तक पद यात्रा करके राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन छेड़ दिया है। इस पद यात्रा में पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता जैसे कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आलोक कुमार, राष्ट्रीय सह-महासचिव विद्युत जैन और राष्ट्र प्रवक्ता श्री राहुल पंडित भी शामिल हुए।
श्री सोनवणी ने कहा कि आज महात्मा गाँधी अपने जन्मदिवस पर भ्रष्टाचार को सरकारी तंत्र के स्तर पर महामारी के रूप में बढ़ा हुआ देखकर अत्यंत दुखी होते। लचर और बीमार शासन प्रणाली से हर नागरिक कदम दर कदम प्रतिदिन ग्रसित है।
श्री सोनवणी ने कहा कि स्वर्ण भारत पार्टी(एस बी पी ) द्वारा 26 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री श्री मोदी को एक खुला पत्र भेजा गया था जिसमें पार्टी ने पुलिस की दुगुनी और न्यायतंत्र की दस गुनी फंडिंग बढाने के लिए अनुरोध किया था। एस बी पी ने बहुत विस्तार से उपयुक्त कारणों और उद्देश्यों के साथ यह समझाया था कि उक्त तंत्रों में फंडिंग को बढ़ाना क्यों जरूरी है। पार्टी ने पत्र में भारतीय पुलिस और न्याय तंत्र की बदहाल तस्वीरें भी भेजी थी।
एस बी पी ने प्रधान मंत्री जी को यह भी बताया कि जरूरतमंद अतिरिक्त फंड पब्लिक सेक्टर उपक्रमों के विनिवेश से आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। सरकार को व्यापार करने और बैंकों को चलाकर भारी नुकसान उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
महात्मा गाँधी जी ने कहा था “आदर्श सरकार को कम से कम शासन करने की जरूरत होती है। वह स्वराज खोखला है जिसमें सरकार आम लोगों को करने के लिए किसी व्यापार को करने का मौका ही नहीं छोड़े। ” जब लोग व्यापार को खुद चला सकते हैं तो सरकार को व्यापार में फसने की क्या आवश्यकता है। यदि जरूरी समझा जाए तो लोगों के सुचारू रूप से व्यापार को चलानें के लिए सरकार नियंत्रण करे परन्तु सरकार स्वयं सीधे व्यवसाय नहीं करे।
श्री मोदी ने यह दावा किया है कि वो “मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस ” और “सरकार का व्यापार करने का कोई बिज़नेस नहीं है” नारों पर अमल चाहते हैं। इसके बावजूद मोदी सरकार ड्यूटी फ्री शराब और सिगरेट के धंधों में इतनी व्यस्त है की उसके पास शासन करने के लिए कोई वक़्त नहीं है। हाल ही में आई टी डी सी ने अपनी 10 वीं ड्यूटी फ्री दुकान खोली है।
एस बी पी ने मोदीजी को लिखे पत्र में बेहद जरूरी शासन सुधारों को लागू करने के लिए निवेदन किया था, जिसमे ईमानदार लोगों को चुनाव लड़नें का मौका देने के लिए चुनावों का फंडिंग प्रति वोट के आधार पर सरकार द्वारा किये जाने और वरिष्ठ नौकरशाहों के लिए उनके नौकरी में कार्यकाल की गारंटी को समाप्त करने की बात कही गयी थी। लोक सेवकों को परिणाम देने के लिए जवाबदेही की व्यवस्था बनानी जरूरी है। भारतीय रक्षा प्रणाली को बेहद सुद्रढ़ बनाने की आवश्यकता है।
अपनें पत्र में स्वर्ण भारत पार्टी ने यह भी कहा था “यदि आप पार्टी के निवेदनों को लागू कराने मे इच्छुक नही हैं, तब हम यह निष्कर्ष निकालेंगे कि आपकी अत्यंत आवश्यक शासन के सुधारों को लागू करने की मनसा नहीं है और आप भारत के विकास के लिए चिंतित नहीं हैं। ” सच तो यह है कि मोदीजी ने पार्टी के पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझा।
इस कारण से पार्टी ने राष्ट्र स्तर पर भारत के लोगों के पक्ष में इन जरूरी शासन सुधारों को लागू करवानें के लिए आंदोलन छेड़ दिया है। श्री सोनवणी नें कहा कि पार्टी इस आंदोलन को तब तक चलाएगी जब तक सभी जरूरी सुधार लागू नहीं किये जाते और सभी भारतवर्ष के लोगों से आंदोलन में शामिल होने की गुज़ारिश की।जब ये सुधार लागू हो जाएँगे केवल तब भारत पुनः सोने की चिड़िया बन सकेगा : सबसे आज़ाद, सबसे समृद्ध और सबसे ताकतवर दुनियां का राष्ट्र ।