हर आदमी अधिक से अधिक भय मुक्त अभाव मुक्त सुख शांतिपूर्ण सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीना चाहता है लेकिन हर आदमी की यही इच्छा उनमें परस्पर टकराव पैदा करती है इस टकराव पर अंकुश रखने के लिए ही हमें एक व्यापक समझोते की ज़रूरत पड़ती है जिसे हम सामाजिक व्यवस्था कहते हैं।
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अपनी सीमाहीन व अनंत इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरे लोगों से होने वाला टकराव ही मुख्य है और इसके समाधान का एक ही मार्ग है एक व्यक्ति की इच्छाओं की अधिकतम न्याय पूर्व सीमा निर्धारित करना।
वैसे तो हर आदमी की सुखी जीवन की जरूरतें बहुत कम होती हैं परंतु मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य कभी भी संतुष्ट नहीं होता और भविष्य की अनिश्चितता के भय और लोभ लालच के चलते सीमाहीन संपत्ति का मालिक बनना चाहता है जो कभी भी पूरी नहीं हो सकती।
एक व्यक्ति के संपत्ति अधिकार की सीमा ताकत या बुद्धि के आधार पर कभी निर्धारित नहीं की जा सकती बल्कि यह समानता और स्वतंत्रता मैं समन्वय करके ही स्थापित की जा सकती है जिसे हम बोलचाल की भाषा में न्याय कहते हैं व्यावहारिक दृष्टि से यह सीमा औसत संपत्ति अधिकार ही हो सकती है और किसी से समाज में स्थाई शांति की स्थापना भी संभव हो सकती है इसी से समानता और स्वतंत्रता में परस्पर कोई टकराव नहीं होगा।
हर व्यक्ति के ओसत सीमा तक मूलभूत संपत्ति अधिकार की रक्षा करने के लिए उससे अधिक संपत्ति रखने पर रोक नहीं होनी चाहिए बल्कि उससे अधिक संपत्ति का व्यक्ति को मालिक नहीं माना जाना चाहिए बल्कि उसे समाज का कर्ज़दार माना जाना चाहिए और उससे ब्याज की दर से संपत्ति कर लिया जाना चाहिए।
इसलिए किसी भी व्यक्ति को सीमाहीन संपत्ति का स्वामी मानकर समाज में कभी भी शांति की स्थापना नहीं नहीं की जा सकती अर्थात अमीरी रेखा का निर्माण समाज की अनिवार्य आवश्यकता है जिससे कोई समझोता नहीं किया जा सकता।
ओसत सीमा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाकर उससे होने वाली आए हो सामूहिक आए होना ही चाहिए और इससे व्यक्ति की लोग लालच की प्रवृत्ति पर न्याय पूर्ण अंकुश लग जाने से लोगों में टकराव को खत्म करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था मैं भी निरंतर गतिशीलता आ जाएगी जिससे यह बहुत टिकाऊ और संतुलित बनी रहेगी।
मनुष्य प्रारंभ काल से ही शांति की स्थापना का सूत्र तलाशता रहा है और अनेक प्रकार की विचारधाराएं इसका प्रमाण है लेकिन आप देख सकते हैं कि यह विचारधाराएं स्वतंत्रता और समानता के बीच न्याय पूर्ण समन्वय स्थापित नहीं कर पाई और इसीलिए अपने मूल उद्देश्य में सफल भी नहीं हो सकी।
मुझे तो लगता है कि पूंजीवाद मार्क्सवाद समाजवाद ही नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था से भी अधिक अच्छी व्यवस्था समाज में स्थापित हो सकती है।
इसलिए मेरा निवेदन है कि अपने अपने दुराग्रहों से मुक्त हो कर विद्वानों को इस परिकल्पना का गहरा परीक्षण करना चाहिए। समानता और स्वतंत्रता में समन्वय होने के कारण यह सोच किसी के भी विरुद्ध नहीं हो सकती।
श्री सोनवणी, भारत की एकमात्र लिबरल पार्टी, स्वर्ण भारत पार्टी के अध्यक्ष ने चिंता व्यक्त की, कि भारत के छोटे उद्योग कारोबार शासन प्रणाली की गम्भीर दुष्क्रिया/अराजकता से ग्रसित है ।
भारत में जटिल नियामक व्यवस्था है जिसमें अधूरी और गैर विद्यमान इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवस्था है। इंस्पेक्टर राज आज भी पूर्ण रूप से जीवित है और कार्य कर रहा है । हर स्तर पर भ्रस्टाचार विद्यमान है । बैंकों का राष्ट्रीयकरण समस्या का बड़ा हिस्सा हैं। जबकि राष्ट्रीय बैंकों में पूर्ण रूप से जवाबदेही का आभाव है तब भी ये बैंक छोटे उद्योगों को फण्ड के बजाय बड़ी कंपनियों को फण्ड करनें के लिए दौड़ लगातें हैं जिससे भ्रष्ट नेताओं के साथ मिलकर करदाता के फण्ड को निगल लिया जाता है । देश के करदाता के आज तक लगभग 5 लाख करोड़ अनर्जक परिसंपत्ति (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) के नाम पर सरकारी बैंकों द्वारा डकार दिए गए हैं ।
कदम कदम पर नए कारोबार को शुरू करनें में और उसे चलानें में अड़चनें, विकट मुश्किलें खड़ी कर देती हैं । भारत आज भी दुनियां में उद्योग लगानें और व्यापार करनें में सबसे कठिन देशों में से एक है। "मेक इन इंडिया " जैसे नारों का कोई वजूद नहीं रह जाता यदि भारतीयों को भारत में उद्योग लगानें और व्यापार करनें में प्रतिबन्ध लगाया जाय। सभी सफल देशों में लघु उद्योग छेत्र ही विकास के इंजन होते हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत में इस छेत्र को बढनें ही नहीं दिया जाता है । जरूरत है भारतीय युवा के सशक्तिकरण करनें की, जिससे वह कारोबार को शुरू करके उसका विकास भी कर सके । लेकिन दुर्भाग्य है कि युवाओं को हर कदम पर रोका जा रहा है ।
सफल होनें के लिए उद्योगों को सरकार से बहुत कुछ नहीं चाहिए। सरकार से उन्हें केवल उतना ही चाहिए जोकि सरकार का दायित्व है जिसमें सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था का भरोसा हो, और संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा का प्रावधान हो । इसके साथ ही सरकार जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करनें की सुविधा करे । साथ ही सरकार कीमत संकेतों को प्रशासित मूल्यों द्वारा नहीं बिगाड़े। ठीक इसी प्रकार वस्तुओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य भी समाप्त हो जाना चाहिए । व्यापार को अपनी चीज़ की कीमत रखने का अधिकार भी होना चाहिए जिससे खुले बाजार में ये व्यवसाय स्वस्थ रूप से प्रतिस्पर्धा भी कर सकें।
लेकिन भारत में, सरकार अपनें मूलभूत जरूरी दायित्वों को पूरा नहीं करती । सच्चाई तो यह है कि सरकार छोटेव्यवसायों के साथ प्रतिस्पर्धा करती है जैसे की सिगरेट और शराब को ड्यूटी फ्री दुकानों में बेचना और होटलों को चलानें का कारोबार करना । और शायद अपनी कमियों को छुपानें के लिए एक विकृत रूप में , सरकार रियायतों और आरक्षण को छोटेव्यवसायों के लिए बाटती है । लेकिन रियायतें सचमुच में प्रोत्साहन को नष्ट करती हैं और भ्रष्टाचार को बढाती हैं।
व्यवसाय की आज़ादी ही समृद्धि की चाबी है। श्री सोनवणी ने बताया कि जबतक भारत की शासन प्रणाली का पूर्ण रूप से सुधार नहीं हो जाता और जबतब भारत आज़ादी की नीतियों को अपनाता नहीं है तबतक भारत का विकास नहीं हो सकता है ।श्री सोनवणी ने कहा कि स्वर्ण भारत पार्टी की नीतियाँ भारत के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शासन प्रणाली का सर्जन करती हैं जिससे सभी देशवासियों के लिए अभूतपूर्व समृद्धि हो सके ।
छोटे व्यवसायों के सम्बन्ध में, स्वर्ण भारत पार्टी नौकरशाही की पूर्ण जवाबदेही को सुनिश्चित करेगी जिससे छोटे व्यवसायों को इंस्पेक्टरों की फ़ौज द्वारा परेशान नहीं किया जाए, लाल फीताशाही पर पूरी तरह नकेल कसी जाए , और कर्मचारियों को लेने और फायरिंग करने के अनुचित प्रतिबन्ध को हटाया जाए । इसके साथ ही हम ESIS नामांकन स्वैच्छिक बनायेगें और कर्मचारियों को निजी कंपनियों से स्वास्थ बिमा लेने की भी छूट होगी जबतक स्वर्ण भारत पार्टी की सामान्य स्वास्थ्य नीति प्रभाव में नहीं आती है ।
श्री सोनवणी ने छोटे व्यवसायों को स्वर्ण भारत पार्टी के मैनिफेस्टो की समीक्षा करनें और सुधार के लिए सुझावों को भी आमंत्रित किया ।
एक हैं आलोक सागर, जिनका जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ। उच्च शिक्षा हासिल की। समाज के लिए आदिवासी बन गए। परिवार भी संपन्न और उच्चशिक्षित है, जिंदगी में कोई तनाव भी नहीं था, सफलता कदम चूम रही थी परंतु पूरी जिंदगी आदिवासियों के नाम कर दी। पैरों में रबड़ की चप्पलें, हाथ में झोला, उलझे हुए बाल, कोई कह ही नहीं सकता कि ये वही व्यक्ति है जिसे अंग्रेजी सहित कई विदेशी भाषाएं आतीं हैं। हजारों-लाखों आदिवासियों का जीवन संवार चुके हैं।
डा० आलोक सागर, PhD अमेरिका पोस्ट डाक्टरेट, अमेरिका पूर्व प्रोफेसर, IIT दिल्ली
प्रोफेसर आलोक सागर ने आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की। 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए।
आलोक सागर के पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है। एक बहन अमेरिका कनाडा में तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थी। सागर बहुभाषी है और कई विदेशी भाषाओं के साथ ही वे आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आलोक सागर 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। उनका पहनावा भी आदिवासियों की तरह ही है।
आलोक सागर ने 1990 से अपनी तमाम डिग्रियां संदूक में बंदकर रख दी थीं। बैतूल जिले में वे सालों से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। अब हजारों फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं।
आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। कोचमहू आने के पहले वे उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में भी रहे हैं। इसके बाद 1990 से वे कोचमहू गांव में आए और यहीं बस गए।
पिछले दो वर्षों में दलितों और मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा की कई घटनाएं समाचारपत्रों की सुर्खियां बनीं। इनमें से कुछ, जिनमें उना, गुजरात में जुलाई 2016 का घटनाक्रम शामिल है, ने देश के संवेदनशील नागरिकों की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। इसके पहले, जून 2015 में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की इस झूठे आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी कि उसके घर गौमांस रखा था।
आज नरेन्द्र मोदी यह कह रहे हैं कि 80 प्रतिशत गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं परंतु इन्हीं मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान इस मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया था। इसे जानने के लिए हमें केवल उनके भाषणों को याद करने की ज़रूरत है। श्री मोदी ने कहा था कि, ‘‘राणा प्रताप ने अपना जीवन गौरक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने गाय की रक्षा के लिए युद्ध लड़े और युवाओं के जीवन की कुर्बानी दी…’’। उन्होंने देश से बीफ के निर्यात को ‘‘पिंक रेवोल्यूशन’’ बताया था और उसकी कड़ी निंदा की थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो बीफ के निर्यात के लिए गायों का वध किया जाएगा।
इसी सिलसिले में दो अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। भाजपा-शासित राजस्थान में ‘‘गौ विभाग’’ का गठन किया गया है और इसका ज़िम्मा एक मंत्री को सौंपा गया है। इसी राज्य में हिंगोनिया में स्थित एक गौशाला में उचित देखभाल न होने के कारण सैंकड़ों गायों के मरने की खबर है। यह बताया जाता है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से गौशालाओं के लिए दिए जाने वाले अनुदान में भारी कमी की गई है।
इन सब तथ्यों से यह स्पष्ट है कि गौभक्ति, दरअसल, एक समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा फैलाने का बहाना भर है। गाय से जुड़े मुद्दों पर हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी इसलिए हुई है क्योंकि कथित गौरक्षक यह जानते हैं कि केंद्र सरकार और भाजपा-शासित अनेक राज्य सरकारें उनकी गैर-कानूनी हरकतों को नज़रअंदाज करेंगी।
यह सही है कि संविधान में गौवंश की रक्षा के लिए प्रावधान है। संविधानसभा में ‘‘काफी लंबी बहस और चर्चा, जिसके दौरान कई सदस्यों ने गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध को संविधान के मूल अधिकारों में शामिल करने की मांग की, के बाद एक समझौते पर पहुंचा गया, जिसके अन्तर्गत गाय की रक्षा को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया गया। यह अनमने ढंग और हिचकिचाहट के साथ हिन्दुओं की भावनाओं को संविधान में जगह देने का प्रयास था।’’
इस प्रावधान को भी धार्मिक रंग न देते हुए उसे कृषि और विज्ञान से जोड़ा गया। ‘‘राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिशेध करने के लिए कदम उठाएगा।’’
देश के 28 में से 24 राज्यों में गायों और अन्य मवेशियों के वध को प्रतिबंधित करने वाले या उन पर किसी न किसी तरह की रोक लगाने वाले कानून लागू हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में गौवध को गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया है और इसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान किया गया है। इन कानूनों की संवैधानिक वैधता की जांच की जानी आवश्यक है और यह पता लगाया जाना ज़रूरी है कि कहीं वे देश के कुछ समूहों या समुदायों के मूल अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करते और भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा के खिलाफ तो नहीं हैं।
बहरहाल, जहां एक ओर गौशालाओं के लिए बजट में कमी की गई है और गौ विभागों के बाद भी गौशालाओं में रह रही गायों की देखभाल में घोर लापरवाही बरती जा रही है, वहीं गाय के नाम पर मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हिंसा भी भड़काई जा रही है। गौमाता की रक्षा के मुद्दे पर हिन्दू संप्रदायवादी 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक कई तरह के आंदोलन चलाते आए हैं। स्वाधीनता के पहले तक मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, सूअर को घृणा का पात्र बताकर इस आग को भड़काने का काम करते रहे थे।
ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जिनमें बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मंदिरों में गौमांस फेंका। जहां समाज के सामूहिक अवचेतन में गौमांस के मुद्दे को हमेशा जीवित रखा गया वहीं अब इसका खुलकर इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए किया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गाय, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण व उपयोगी पशु है। जहां गाय दूध देती है वहीं बैल का इस्तेमाल खेती में किया जाता है। परंतु बूढ़े और अनुपयोगी बैलों और गायों का भोजन के रूप में इस्तेमाल भी हमेशा से होता आया है। आदिवासियों के अतिरिक्त, दलितों, मुसलमानों और ईसाईयों और यहां तक कि उच्च जातियों के हिन्दुओं के कुछ तबके भी बीफ का प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत के रूप में सेवन करते आए हैं।
अगर हम इतिहास की दृष्टि से देखें तो बीफ, वैदिक काल से ही खानपान का भाग था। गाय को गौमाता का दर्जा काफी बाद में दिया गया और धीरे-धीरे उसे पहचान की राजनीति का उपकरण बना दिया गया। भीमराव अंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘‘डिड हिन्दूज़ नेवर ईट बीफ?’’ में इसका खुलासा किया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘‘आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि पुरानी प्रथाओं के अनुसार, वो हिन्दू एक अच्छा हिन्दू नहीं था जो बीफ नहीं खाता था। कुछ मौकों पर उसे बैल की बलि देकर उसे खाना होता था।’’
किसी भी बहुसांस्कृतिक समाज में खानपान की विविधता अपरिहार्य है। इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है। गांधी इस मामले में हमें राह दिखाते हैं। गौमांस के मुद्दे पर उन्होंने कहा था, ‘‘…गौमांस उनका (मुसलमान) रोजाना का सामान्य भोजन नहीं है, उनका रोजाना का सामान्य भोजन तो वही है जो देश के अन्य करोड़ों बाशिन्दों का है। यह सही है कि ऐसे मुसलमान बहुत कम हैं जो धार्मिक कारण से शाकाहारी हों। अगर उन्हें मांस, जिसमें गौमांस शामिल है, उपलब्ध होगा तो वे उसे खाएंगे। परंतु एक लंबे समय से गरीबी के कारण करोड़ों मुसलमान किसी भी प्रकार का मांस नहीं खा पाते हैं। ये तो तथ्य हैं। परंतु सैद्धांतिक प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देना आवश्यक है…मेरी यह मान्यता है कि मुसलमानों को गौवध करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए…’’
परंतु अब सांप्रदायिक ताकतों द्वारा मुसलमानों की छवि गौवध करने वालों के रूप में इस हद तक प्रचारित कर दी गई है कि जो लोग शांति, सहिष्णुता और बहुवाद के हामी हैं, उन्हें इस मुद्दे पर मुसलमानों के प्रति घृणा के भाव को समाप्त करने के लिए बहुत मेहनत और प्रयास करने होंगे।
महेश गौतम
जिला प्रभारी अलीगढ
भारतीय समन्वय संगठन (लक्ष्य)
दिनांक 21 अगस्त 2016 को भारतीय समन्वय संग़ठन (लक्ष्य) की जिला अलीगढ उत्तर प्रदेश की टीम ने गाँव बस्तौली (अलीगढ) में एक दिवसीय कैडर कैंप का आयोजन किया। कैडर को बहुत ही सुलझे हुए मास्टर एन.सी.आर. प्रभारी श्री गंगालाल गौतम ने कैडर में उपस्थित बहुजन समाज के लोगों को उनके इतिहास से लेकर आज लोकतंत्र में उनके अधिकारों की जानकारी दी। कैडर के मुख्य अतिथि श्री तेजपाल सिंह ने कैडर में उपस्थित महिलाओं को अन्धविश्वास से बचने की सलाह दी। जिला अलीगढ के प्रभारी श्री महेश गौतम ने लोगों को बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया एवं जिला बरेली के कमांडर श्री अरविन्द सिंह ने लोगों को बताया की इस देश की ईंट- ईंट में आप लोगों की भागेदारी है जो की परमपूज्य बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की देन है। इसलिए हमें बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर के बताये हुए रास्ते पैर ही चलना चाहिए। कैडर कैंप की आयोजक बहन अनीता मौर्या ने महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा की हमें अपनी बेटियों की शिक्षा पर जोर देना होगा ताकि एक नये समाज की रचना की जा सके।
महाशिवरात्रि के अवसर पर हर शख्स अपने भीतर छुपे अपराधितत्व की गीता महायज्ञ के माध्यम से आहूति दे इसके लिये पखवारे का आयोजन किया गया है. इस पखवारे का शंखनाद ७ मार्च २०१६ को सोमनाथ से होगा. गीता के जरिये तमाम तनावों से मुक्ति पाई जा सकती है. शान्ति प्राप्त की जा सकती है. जिसके लिये सर्वप्रथम हमें अपने भीतर छिपे अपराधितत्व से मुक्ति पानी होगी जिसके उपाय गीता में स्पष्ट बताए गये हैं. बस जरूरत है हमें उन उपायों का आत्मसात करने की. हर सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत शिक्षण संस्थानों से होती है. इस आत्मावलोकन और आत्मउद्धार के गीता महायज्ञ की शुरुआत भी सौराष्ट्र विश्वविद्यालय से होगी।
सोमनाथ से ७ मार्च को भक्त कवि नरसी मेहता विश्व विद्यालय से होने वाली शुरुआत ८ को पोरबन्दर में आहूति देते हुए आगे बढ़ेगी, द्वारका मे नौ मार्च को महायज्ञ का अगला चरण होगा, राजकोट में सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में १० मार्च को इसका प्रमुख चरण प्रारम्भ होगा. १२ मार्च को अहमदाबाद साबरमती जेल में अपराधमुक्ति का संकल्प लिये जायगा. १४ मार्च को यह यात्रा उदयपुर होते हुए जयपुर पहुंचेगी,१८ मार्च को दिल्ली में अगला चरण पूरा होगा, २०-२१ मार्च को यह वाराणसी में आकर विश्वनाथ जी के समक्ष संपन्न होगी।
समाज को अपराधमुक्त बनाकर रोजमर्रा के तनावों से मुक्ति पाकर शान्ति की स्थापना की जा सकती है. बशर्ते हम श्रीमद भगवद्गीता में बताय गये रास्ते का आत्मसात करके इस लक्ष्य को पाने के प्रबल आकांक्षी हों. गीता महायज्ञ पखवारे का आयोजन भारतीय चरित्र निर्माण संस्थान के तत्वावधान में किया जा रहा है. जिसका नेतृत्व संस्थान के संस्थापक श्री राम कृष्णा गोस्वामी करेंगे. श्री गोस्वामी ने सत्चरित्र विकसित करके समाज को अपराधमुक्त बनाने के इक्षुक लोगों से इस महायज्ञ में शामिल होने का आह्वान किया।
हम सही नहीं है। मगर आपकी सलामती की कामना करते हैं। हे राष्ट्रपति जी, पिछले ग्यारह (11) वर्षों से हर रोज आपके नाम हम पत्र लिख रहे हैं और यह हमारा 4100वां पत्र है। हर पत्र में मैंने लिखा है कि- “प्लीज हमें आपसे मिलने के लिए थोड़ा – सा वक्त दिया जाय तथा हमारे गाँव के उन गरीबों की सहायता की जाय जिनके परिवार के लोग बीमारी के कारण असमय मर चुके हैं।” मगर आज तक आपने हमें मिलने का वक्त नहीं दिया है।
लिहाजा, हम अपने दिल की दरिया में उठ रहे इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं कि क्या हिंदुस्तान की झोपड़ी में रहने वाले नागरिक तथा हिंदुस्तान के राष्ट्रपति का दिल अलग-अलग धड़कता है? अगर ‘हाँ,’ तो क्या हम सभी एक साथ जम्हूरियत की जमीन पे खड़े नहीं हैं? और अगर ‘नहीं ‘ तो फिर आज तक हमें आपसे मिलने का वक्त क्यूँ नहीं मिला है?
हे राजन, आप केवल दिल्ली स्थित रायसीना के सीने पे खड़े आलिशान और अज्जिमुस्सान राष्ट्रपति भवन के हिस्से नहीं हैं बल्कि आप 32 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले भारतवर्ष के हिस्से हैं। इस समूचे क्षेत्र में बसर करने वाले 125 करोड़ नागरिकों के जीवन मूल्यों के हिस्से हैं। लिहाजा, आप इस बात को समझें कि आप इस लाल हवेली के अंदर तख्तो – ताज पर बैठने वाले केवल मूरत नहीं है बल्कि आप हर भारतीय नागरिक का रक्षक हैं।
हे मेरे पिता तुल्य सम्राट, जिस तरह बालुओं के ढेंर में सर छुपाकर गिरते हुए आसमान के कहर से हम नहीं बच सकते हैं, ठीक उसी तरह आप अपनी व्यस्तता तथा प्रोटोकॉल की ओट में अपने संवैधानिक कर्तव्यों तथा लोकतान्त्रिक जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते हैँ क्योंकि व्यस्तता तथा प्रोटोकॉल आपकी समस्या हो सकती है हमारी नहीं। हमारी समस्या तो भूख, गरीबी, बीमारी और अशिक्षा है। इसलिए आप प्रोटोकॉल की जंजीर में जकड़े अपने हाथ और पांव को खोलिए ताकि आप बाहर की वेदना भरी क्रंदन और पुकार को सुन सकें।
माफ़ कीजियेगा, हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद नहीं है बल्कि हम परिवर्तन चाहते हैं क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदुस्तान के हर नागरिक को यह अधिकार होनी चाहिए कि वह समानता की जमीन पर बैठकर अपने सम्राट से बातें कर सके और उसी समानता की जमीन पर बैठकर मैं आपसे बातें करना चाहता हूँ क्योंकि जब – जब भूख, बीमारी और आपकी अनदेखी से किसी नागरिक की मौत होती है तब- तब मेरे दिल की धड़कन की एक डोर टूट जाती है।
लिहाजा, आज हिन्द सल्तनत के सुल्तान से मैं यह प्रश्न कर रहा हूँ कि जब लोकतंत्र के तराजू पर हर नागरिक की कीमत बराबर होती है तो फिर मेरे साथ यह अन्याय क्यों हो रहा है? इतने पत्र लिखने के बावजूद मुझे मिलने का वक्त क्यों नहीं दिया जा रहा है? आखिर अपने सम्राट का दीदार करने के लिए मुझे अभी और कितने पत्र लिखने पड़ेंगे?
यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है- आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।
Haji Ali Dargah Mumbai, Maharashtra
शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात‘ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रम्हचारी भगवान का मन भटकेगा।
मस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।
चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।
हमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।
Trupti Desai Bhumata Brigade
अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागत योग्य हैं।
Bhumata Brigade
लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम – ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।
बाहर पढाई कर के हिन्दुस्तान वालो को लूटना ठीक नही है। मजा तो तब है जब हिन्दुस्तान में पढकर बाहर लूटो। भारत में तो एक जेएनयू है और एक बीएचयू है, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और आठ दस है। बाकी बौचट लोग है। जेतना पैसा हमारे गोरखपुर जिला के गार्जियन दिल्ली में भेजते है लडको की पढाई के लिए उतने पैसे में जेएनयू का बाप गोरखपुर में तैयार किया जा सकता है।
बिहार से जितना पैसा दिल्ली में भेजा जाता है पढाई के नाम पर जिसमे की लडके गलीज पानी पी-पीकर और सडा हुवा खाना खा खाकर आईएएस की तैयारी करने को मजबूर है। बेचारे मैगी का टिकिया पानी में उबाल कर पूरा दोपहर काट देते है। उतना पैसा अगर बिहार में कालेज यूनिवर्सिटी में लगाया जाय तो दो ढाई सौ जेएनयू बिहार में बन जाएगा, जिसमे हारवार्ड से प्रोफेसर पढाने भी आयेंगे। जब आस्ट्रेलिया का खिलाडी पैसा पर यहाँ क्रिकेट खेल सकता है तब यहाँ ऑक्सफ़ोर्ड से मास्टर पढाने नही आ सकता।
पढो, हमको का करना है, हम तो गदहिया छाप ला कालेज से भी पढकर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े अदालत में वकील है। क्युकी हम को मालूम था यह जेएनयू और फलाना ढीमाका बकवास है, असली काम की चीज अपना मन और अपनी किताब है वही साथी है। लेकिन ताज्जुब होता है जब देखते है पढाई करने लड़का लोग घर बार छोड़ कर इतना दूर आता है। अरे नाशपीटो तनिक इज्जत पानी का तो ख्याल करो। ऐसे नगर पढने क्या आना जहा आप कहकर लोग बुलाना भी नही जानते। बाते तुम तडाक से स्टार्ट होती है।
खैर तुमलोगों के बस का नही है। शिक्षा को खरीद लेना है चाहे जेएनयू में मिले चाहे कहीं। ईहे मेंटेलिटी से नालंदा बिश्वबिद्यालय का नाश हो गया, और एक दिन यही बीचारधारा सबका नाश करेगी। अभी भी चेत जाओ दिल्ली पैसा भेजना छोडो और अपने शहर में सब मिल जुलकर जेएनयू का बाप बनाइए। जहा से पैदावार निकले तो दुनिया में धूम मचाए। जेएनयू तो गया गुजरा बिद्यालय है जो आज तक ना मिर्जा ग़ालिब पैदा किया ना कबीर।
सर्वदलीय गौरक्षा मंच के राष्ट्रिय अध्यक्ष ठाकुर जयपाल सिंह ”नयाल सनातनी” ने आज प्रेस विज्ञप्ति में बताया की देव भूमि उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिल्ले में पहली बार भव्य राम लीला, कृष्ण लीला का मंचन वृन्दावन के रासलीला मण्डली द्वारा 8 अप्रेल चैत्र नवरात्र प्रतिपदा से 16 अप्रेल 2016 महा दश्मी तक होगा। जिसमे ब्रह्मचारी संत श्री ज्ञानानन्द जी महाराज व्यास पीठ पर विराजमान होकर भगवती माता एवं गौ माता की मानव को मुक्त कर देने वाली दिव्य कतः का रसपान कराएँगे। संत श्री ज्ञानानन्द जी महाराज लगभग 14 वर्ष तक पथमेड़ा में स्वामी दत्त शरणानन्द जी महाराज के महान गौ कार्य में अपनी सेवा दिए है, अब हल्दी घाटी की पुण्य भुमि ”श्रीनाथद्वारा ” मे एक कुटीया बना कर तपश्या रत हैं। सिर्फ भगवती जगतजननी गौमाता और श्रीमद भागवत की कथा हेतु ही बहार निकलते है।
सनद रहे श्रीनाथद्वारा पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रधान (प्रमुख) पीठ है। इस 9 दिवसीय देव कार्य में हल्द्वानी नैनीताल स्थित कार्यकर्म की मुख्य प्रायोजक ‘श्री गिरधर गोपाल गौशाला समिति’ अल्मोड़ा जिल्ले में भी एक नये गौशाला का भूमि पूजन ( शिलान्यास ) वरिष्ठ संतों के पावन सानिंध्य में रखा गया है। जिसमे देश भर के अनेक संतों का आगमन सुनिश्चित है। नित्य ही 9 दिनों तक यज्ञं-हवन, रुद्रा अभिषेक और संतों के आशीष वचनों का कार्यकर्म भी है। इस पूरे देव कार्य का आयोजन स्थानीय 14 गावों की समिति ‘देव भूमि उत्तराखण्ड रामलीला कमेटी’ है। इस अवसर पर भव्य गौ-जनजागरण यात्रा, कलश यात्रा एवं नित्य भव्य झांकी का आयोजन भी है। कथा की पूर्णाहुति के अगले दिन से 3 दिवसीय देव भूमि के 5 शक्ति पीठो के दर्शन, सरयू तट पर श्री बागेश्वर नाथ के दर्शन, जमीन के निचे पाताल भुवनेशवर के दिव्य दर्शन, कौशानी से नगाधिराज के दर्शन ,गरुड़,बैजनाथ,एवं ज्योतिर्लिंग जागेश्वर नाथ के दर्शन पूजन भी मुख्य है।
इस कार्यकर्म हेतु स्थानीय रामलीला कमेटी एवं मुख्य संयोजक ठाकुर जयपाल सिंह ”नयाल सनातनी” ने देश भर के गौ-गोपाल प्रेमियों को एक बार सेवा का अवसर देने की प्रार्थना की है।