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  • सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान – ज़बरिया देशभक्ति

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2016 में यह आदेश जारी किया कि सभी सिनेमा हॉलों में ‘‘मातृभूमि के प्रति प्रेम की खातिर’’ हर फिल्म शो के पहले राष्ट्रगान बजाया जाए। इस आदेश से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी बाध्यताओं के परस्पर संबंधों पर बहस शुरू हो गई है। यह आदेश देश में बढ़ती असहिष्णुता की पृष्ठभूमि में आया है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की कानूनी बाध्यताओं से लोगों में राष्ट्रपे्रम जगाया जा सकता है। कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि यह आदेश नागरिक अधिकारों पर हमला है। कुछ दशकों पहले तक, सिनेमा हॉलों में फिल्म की समाप्ति के बाद राष्ट्रगान बजाया जाता था। उस समय यह देखा गया था कि राष्ट्रगान के समय लोग थियेटर से बाहर निकलने लगते थे। अब महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने यह निर्देश दिया है कि देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाए और इस दौरान थियेटर के दरवाजे बंद रखे जाएं।

    राष्ट्रीय ध्वज और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की रक्षा की लिए देश में पहले से ही कई कानून लागू हैं। कुछ मामलों में कानूनों व नियमों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव के उदाहरण सामने आए हैं। केरल में जेहनोवास विटनेस नामक एक पंथ के विद्यार्थियों ने अपने स्कूल में यह कहकर राष्ट्रगान गाने से इंकार कर दिया था कि ऐसा करना मूर्ति पूजा होगी, जो कि उनकी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप नहीं है। इन विद्यार्थियों को स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। मामला उच्चतम न्यायालय तक गया, जिसने विद्यार्थियों के पक्ष में फैसला दिया और उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया।

    प्रजातंत्र में नागरिकों के अधिकारों और राज्य के प्रति उनके कर्तव्यों में संतुलन आवश्यक है। इसीलिए संविधान सभी नागरिकों को कुछ मूलाधिकार देता है और उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी भी उपलब्ध करवाता है। एक दशक पहले, उच्चतम न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में अपना निर्णय दिया था। ऐसा लगता है कि अब गंगा उलटी बह रही है। बात-बात पर ‘‘राष्ट्रवाद, मातृभूमि के प्रति प्रेम और देशभक्ति’’ जैसे जुमलों को उछाला जा रहा है। जो लोग सत्ताधारी दल या सरकार की नीतियों से असहमत हैं, उन्हें राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि वे ‘‘देशभक्त’’ नहीं हैं। यहां तक कि एटीएम या बैंकों के बाहर अपने ही खातों से पैसा निकालने के लिए घंटों कतार में खड़े रहने का भी महिमामंडन किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि यह देशभक्ति है और राष्ट्र की खातिर लोग लाईनों में घंटों खड़े हैं। ये कतारें मोदी सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी के निर्णय का परिणाम हैं और इन्हें देशभक्ति से जोड़ा जाना हास्यास्पद प्रतीत होता है। उच्चतम न्यायालय का यह आदेश एक ऐसे समय आया है जब देशभक्ति और राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाओं का इस्तेमाल, असहमति और विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा है।

    जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह अपने विरोधियों की राष्ट्रभक्ति/राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की गतिविधियों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बताया गया और तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के दबाव में विश्वविद्यालय के कुलपति ने रोहित वेम्युला को होस्टल से निकाल दिया और उसकी शिष्यवृत्ति बंद कर दी। इसके बाद, रोहित ने आत्महत्या कर ली। ऐसा ही कुछ दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ, जहां जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए एक नकली सीडी कुछ टेलिवीजन न्यूज़ चैनलों पर चलाई गई। कन्हैया कुमार को देशद्रोही करार दे दिया गया। बाद में यह सामने आया कि कन्हैया कुमार ने तथाकथित देशद्रोही नारे लगाए ही नहीं थे। वैसे भी, संवैधानिक स्थिति यह है कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है।  देशभक्ति और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर भड़काए जा रहे जुनून के नतीजे में गोवा में राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर एक ऐसे व्यक्ति की पिटाई कर दी गई जो व्हीलचेयर से उठ भी नहीं सकता था। मुंबई में एक युवा पटकथा लेखक को राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर सिनेमा हॉल से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।

    राष्ट्रवाद के मुद्दे पर इस तरह की ज़ोर-जबरदस्ती, चिंता का विषय है। देशभक्ति क्या है और देशभक्त कौन है, इसे परिभाषित करना आसान नहीं है। जब देश में राजाओं और नवाबों का शासन था, उस समय वे अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे उनके प्रति पूरी तरह वफादार रहें। राजा के प्रति वफादार न रहने की सज़ा बहुत कड़ी थी जिसमें हाथ काट देने से लेकर मृत्युदंड तक शामिल था।

    ब्रिटिश राज में देश में दो तरह के राष्ट्रवाद एक साथ अस्तित्व में थे। एक ओर उद्योगपतियों, श्रमिकों और शिक्षित लोगों का उभरता हुआ वर्ग था, जो धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के लिए साम्राज्यवाद व औपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा था। सरकार की निगाह में ये लोग देशभक्त नहीं थे। धर्म के नाम पर राष्ट्रवाद की शुरूआत, राजाओं और ज़मींदारों ने की। वे अंग्रेज़ों के प्रति वफादार थे। ब्रिटिश साम्राज्य इन वर्गों को देशभक्त मानता था। उनकी संस्था यूनाईटेड इंडिया पेट्रिऑटिक एसोसिएशन, धार्मिक राष्ट्रवाद की जनक बनी। मुस्लिम राष्ट्रवादी और हिन्दू राष्ट्रवादी दोनों ब्रिटिश शासकों के प्रति वफादार थे और तत्कालीन सरकार की निगाहों में देशभक्त थे। ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध जो राष्ट्रवाद संघर्षरत था, वह व्यापक और समावेशी था और किसी एक जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं था। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस का राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान के आसपास बुना गया था। इसके विपरीत, महात्मा गांधी के नेतृत्व वाला राष्ट्रवाद, प्रजातांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित था और उदारवादी था। स्वाधीनता के बाद, सांप्रदायिक संगठनों ने राज्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा को राष्ट्रवाद का पर्यायवाची मान लिया। जो भी लोग सरकार या राज्य से सहमत नहीं हैं, वे देशभक्त नहीं हैं। यह ठीक वही अवधारणा है जो राजाओं और नवाबों की थी। यह ठीक वही अवधारणा है जो दुनिया के सभी तानाशाहों की थी और है।

    संघ व भाजपा इस समय देश में जो वातावरण बना रहे हैं, उससे एकाधिकारवाद और तानाशाही की पदचाप सुनाई दे रही है। राजाओं-नवाबों के शासनकाल में शासक सर्वोच्च था और सभी प्रजाजन उसके अधीन थे। राजा के प्रति वफादारी ही देशभक्ति थी। तानाशाह भी जनता से अपने प्रति पूर्ण समर्पण और वफादारी चाहते हैं और इसे ही देशभक्ति बताते हैं। आरएसएस-भाजपा का यह मानना है कि राज्य सर्वोच्च है और नागरिकों को केवल उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय का यह आदेश, इसी तरह की मानसिकता की उपज है।

    इस तरह का अतिराष्ट्रवाद, प्रजातंत्र को तानाशाही में बदल सकता है। हमें उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय को इस तथ्य का अहसास होगा और वह अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • पाखण्डी जातिवाद

    भंवर मेघवंशी


    मुझे कुछ कहना है
    जाति विरोधी
    मगर घनघोर
    जातिवादी एक्टिविस्टों से !

    जातिवादी गटर के
    घृणित कीड़ों
    तुमसे यह भी
    ना हुआ बर्दाश्त
    कि कोई दलित
    पहन ले
    तुमसे अच्छे
    कपड़े
    रहे तुमसे
    बड़े मकान में .

    तुम साईकिलो के
    मारते रहो पैडल
    या घसीटते रहो
    पग पैदल पैदल
    और तुम्हारा ही
    साथी दलित
    बैठने लगे
    गाड़ियों में .

    भले ही तुम
    सामाजिक कार्यकर्ता की
    खाल ओढ़ चुके हो
    पर हो जातिवादी भेड़िये
    तुमसे यह कैसे
    सहन हो सकता है
    कि कोई दलित
    डालकर
    तुम्हारी आँखों में
    आँखें
    करने लगे
    तुमसे तीखे सवाल.

    तुम बातें न्याय की
    मंत्र समानता के
    दोहराते रहते हो
    भले ही मंचो पर
    लेकिन
    असल जिन्दगी में
    तुमने कब जिया
    इन शब्दों को ?

    सिखाये शब्द
    दोहराना
    उन्हें जीना
    नहीं होता
    उधार के तोतों .

    जब कोई दलित
    करने लगता है
    तुमसे बराबरी
    बढ़ जाता है
    तुमसे आगे .

    तब तुम्हारा
    सारा लोकतंत्र
    हवा हो जाता है
    सारी महानता
    का उतरने लगता है
    अचानक आवरण.

    तब जातिवाद के
    विषैले सांपों
    तुम्हारी केंचुली
    उतरने लगती है
    यकबयक.

    तुम कितने भी
    संगठन बना लो
    या कर लो
    विपश्यना के ढोंग
    सतसंगों में गा लो
    भजन मीठे मीठे
    तुम कितनी ही
    कर लो बातों से
    अपनी काया को
    कंचन
    पर तुम्हारे भीतर
    जातिवाद का कीडा
    रेंगता ही रहता है
    हरदम ,हरवक्त.

    तुम्हारी धमनियों में
    जातिवाद बहता है
    रक्त बनकर
    समाजसेवा के
    नाम पर
    अपना पेट भर रहे
    निर्लज्ज निकम्मे
    जातिवादी रोटेडों,
    तुम सब कुछ
    हो सकते हो
    पर कभी भी
    नहीं बन सकते
    इंसान.

    तुम्हारी
    रग रग में
    भरा है जातिवाद
    जिससे आती
    सड़ान्ध अब
    असह्य
    हो चुकी है.

    इसलिये हे
    सिविल सोसायटी के
    स्वयम्भूं
    नैतिक पवित्रों ,
    हे एक्टिविस्ट
    प्रजाति के
    परम पाखण्डियों ,
    आज से मैं
    खारिज करता हूं तुमको
    तुम भी कर देना
    खारिज मुझको.

    मैं पूरे होशो हवाश में
    यह करता हूं दावा
    कि तुमसे कुछ भी
    नहीं बदला
    ना ही कुछ बदलेगा
    हरी घास के
    ग्रीन स्नेंकों .

    हम जो आज
    वंचित है ,दलित है
    पीडि़त है
    हम वक्त के
    सपेरे है ..
    बजायेंगे बीन
    ढूंढ़ लेंगे तुमको
    एक न एक दिन
    और कुचल देंगे
    तुम्हारा फन
    पूरी निर्ममता से…
    जाति की गहन गुफाओं
    को लगा देंगे आग
    वर्ण और जाति के
    बिलों में भर देंगे पानी
    हवा को कर देंगे
    धुंआ धुंआ .

    पक्का यकीं है
    हमको ,कि
    हम हर कीमत पर
    हरा देंगे
    तुम्हारे इस
    घृणित जातिवाद को.

     

  • मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा

    Shayak Alok

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    उस घर की दीवारों में दरारें थीं तो पिस्त्रा मोरी सूई और मोटे ऊन से उन दरारों को सिलने लगी .. रोज वह घर के जरुरी काम निपटाती .. पति को कलेवा दे काम करने भेजती और फिर दोपहर से शाम एक एक दरार को ढूंढती और उसे सिलने लगती .. दीवारों में नए दरार फिर उभर आते तो वह ऊन और वक़्त का अनुमान करती और फिर उन्हें सिलने में लग जाती .. रात को कभी चौंक के उठती तो दीया जलाती और महीन दरारों की महीन सिलाई शुरू कर देती ..

    उसका पति उसे थका देने वाला प्यार कर रहा होता और वह छत की दरारों को देखती उन्हें सिलने का उपाय सोच रही होती ..

    अलग अलग दरारों में अलग रंग ढंग के ऊन..

    पिस्त्रा मोरी का पति खुश था .. उसे लगता एक एक दरारें मिट रही हैं .. उसे लगता उनके बीच की दूरियां भी मिट रही हैं ..

    आजकल पिस्त्रा से संतुष्ट उसका पति पूछता कि बोलो कितना प्रेम है मुझसे तो तुरंत वह जवाब देती ‘उतना जितना प्रेम है मुझे मेरे दरारों के सिलने के काम से ‘ ..

    वह फिर पूछता और पिस्त्रा फिर दरारों के रूपक में जवाब देती – ‘ इतना प्रेम जितनी गहरी वह नई दरार ‘ ..

    काम से जल्दी लौटे पिस्त्रा के पति ने उस नई दरार की चिर्री से एक रोज देखा पिस्त्रा को उस ऊन वाले सौदागर के साथ ऊन का हिसाब किताब करते .. पिस्त्रा हंसती और नए ऊन का गोला उठाती फिर मोलभाव करती ..

    पति को गुस्सा आया .. पिस्त्रा रोती चिल्लाती रही पर न सुना उसने .. सब दरारें उघाड़ दी और बडबडाता पैर पटकता चला गया ..

    देर रात लौटा पिस्त्रा मोरी का पति तो दरारों भरी दीवारें गिर चुकी थी.. दीवारों के नीचे दबी पिस्त्रा मोरी के शरीर पर दरारें उभर आई थीं.. पिस्त्रा की मृत उँगलियों में रंगीन ऊन का घेरा था..

  • मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ

    नीलम बसंत नंदिनी


    दुनियां पूरब चलती थी
    तो मैं पश्चिम
    लडकियों को लंबे बाल पंसद थे
    मैंने मान्यताओं पर कैंची चलवायी
    लड़कियां दुपट्टों के कलेक्शन करतीं
    मैं थान से कपड़ा काट
    विद्रोह सिलवाती थी

    मैंने ज़िद की वो सब करने की
    जो लडकियों के लिए हेय था
    पापा हौसला देते रहे
    मैं उडती रही…

    परकटी, गंजी, लडकों जैसी लडकी..
    जैसे संबोधनों को
    स्कूटर के पहिए से कुचल
    आगे बढती रही..

    मैं खराब लड़की थी
    पर मुझे वही होना पसंद था!

    दसवीं में
    मेरी सहपाठिनों ने
    विवाह का पिंजरा चुना..
    मुझे अकेले जाकर
    शहर में किताबों से यारी करनी थी..

    मेरी हमउम्रों को माता पिता की मोहर लगा
    सुंदर-सा खूंटा चाहिए था
    मुझे अपनी ही पंसद के सोलमेट के साथ जीना था..

    मेरी पलकों में था वो अनंत व्योम
    जिसमें जब जी चाहूँ
    पंख फैलाए उड़ सकूं..

    मैं मुक्त थी.. मुक्त हूँ..
    सामाजिक बंधन वाली मोटी सांकल से
    पर…
    अभी और मुक्त होना बाकी है..
    फ्रीडम जैसी सहज
    पर अमूल्य चीज
    सरलता से नहीं मिलती..

    लड़ना पड़ता है
    गालियां खानी पड़ती हैं
    तथाकथित समाज की
    जीभ और दिमाग से..

    और जंग लगी जंजीर खोल
    मुक्त होना पड़ता है
    रिश्तों के मकडजाल से..

    सो कॉल्ड अच्छी बेटी,
    संस्कारी बहू,
    पतिव्रता पत्नि
    मैं बन जाती तो क्या जीवित कहलाती
    खुद से संवाद में हार नहीं नहीं जाती..

    मुझे आया ही नहीं कभी
    उस तरह जीना
    एक ही जीवन मिला है
    अपनी तरह जीने के लिए…

    असंख्य स्वप्न अपूर्ण हैं अभी
    असंख्य ख्वाहिशें बाकी हैं…

    फेफड़ो में भर ढेर सारी
    ऑक्सीजन..
    डुबकी लगानी है
    चाहतों की मछलियों संग तैरना है..

    अपनी ही बाहों का जैकेट ओढ़
    खुद को शाबाशी दे
    पार करना है
    सामने खड़ा एवरेस्ट…

    चोटी पर पहुँच
    गला फाड़ चीखना है..
    अभी मुझे जीना है
    ढ़ेर सारा जीना है….!

     

  • महज इंसान

    भवंर मेघवंशी


    पैदा होना
    तुम्हारी जाति
    धर्म व देश में
    मेरे वश की
    बात ही कहां थी ?

    मेरा चयन
    नहीं था ये
    जानता हूं
    यह सिर्फ
    संयोगवश ही
    हुआ होगा
    फिर इन पर
    गर्व कैसा ?

    जाति की जकड़न
    धर्म की अकड़न
    देश की सिकुड़न
    सुहाती नहीं मुझको.

    स्वदेश
    स्वधर्म
    स्वजाति जैसे
    भारी भरकम शब्द
    लगते है
    बोझ से.

    मैं दिल से
    चाहता हूं कि
    खुद को मुक्त
    कर लूं इनसे.

    कृपया
    आप भी
    काट दे नाम मेरा
    अपनी जाति
    धर्म और देश की
    लिस्ट से.

    मैं रहना
    चाहता हूं
    महज एक
    इंसान बनकर .

     

  • जब मुसलमान हिन्दू हो गए और हिन्दू मुसलमान होते चले गए!

    त्रिभुवन


    प्राचीन भारत में कभी मूर्तिपूजा नहीं होती थी। पूर्व वैदिक काल में लोग मंदिर नहीं बनाते थे। उनके लिए कण-कण में ईश्वर था। मानव-मानव बराबर था। इसका प्रमाण है मनुस्मृति और अन्य ग्रंथ। किसी प्राचीन भारतीय ग्रंथ में मूर्ति का जिक्र तक नहीं है। न चारों वेदों में, न छहों दर्शन में। न उपनिषदों में। किसी स्मृति में भी किसी मूर्ति का उल्लेख नहीं है। प्राचीन भारत के लोग ईश्वर के सर्वव्यापक, निराकार और अमूर्त स्वरूप में विश्वास करते थे। वे इसे दयालु और न्यायकारी भी मानते थे।

    और मुसलमान लोग या कहें कि अरब देशों के वासी, जहां यह धर्म पनपा, मुहम्मद साहब और कुरआन के अार्विभाव होने से पहले हमसे कहीं ज्यादा मूर्तिपूजक थे। उनके यहां बड़े-बड़े मंदिर और विशालकाय मूर्तियां थीं। प्रतिमा पूजन के कारण वे बहुदेववादी हो गए थे और आपस में बुरी तरह लड़ते थे। कत्लोगारत मची रहती थी। शांति और बंधुता उनके लिए जैसे स्वप्न था।

    अगर ऋषि इब्राहिम पैदा नहीं हुए होते और उन्होने प्रतिमा पूजन के ख़िलाफ़ अलख नहीं जगाई होती तो अरब देशों में ऐसे ताकतवर लोग पैदा नहीं होते, जिन्होंने शांति और बंधुता के लिए संघर्ष किया। इब्राहीम ने ही दुनिया में पहली मस्ज़िद स्थापित की, जो मक्का में थी। ऋषि मुहम्मद ने उनके काम को अंतिम रूप दिया और एक नया धर्म इस पृथिवी पर पनपा, जिसमें मूर्तिपूजा अपराध घोषित की गई। ऋषि मुहम्मद ने मदीना की मस्ज़िद स्थापित की। आप अगर ऋषि इब्राहीम का जीवन पढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा, मानो आप भक्त प्रह्लाद, भगवान् क़ृष्ण और स्वामी दयानंद के जीवन का कोई पार्ट पढ़ रहे हैं।

    लेकिन कालांतर में समय ने ऐसी करवट ली कि मुसलमानों के अरब में तो हमारा निराकार, दयालु और सर्वशक्तिमान ईश्वरीय और मानव-मानव बंधु का दर्शन पहुंच गया और मुसलमानों के अरब की बुतपरस्ती हमारे यहां आ बैठी। अब यह भी समय का फेर है कि इस्लाम, जिसका अर्थ है शांति है, हिंसा और अशांति का पर्याय बना दिया गया है और सनातन धर्म, जो बिलकुल वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाला था, इस्लाम के उत्कर्ष के कारण वहां से भाग कर भारत में आए रूढ़वादियों, अंधविश्वासपरस्तों और पोंगापंथियों के कारण प्रतिगामिता की राह पर चल पड़ा, जहां ऊंचनीच, जातिगोत्र और न जाने क्या-क्या नहीं पनपाया गया।

    आप पूछेंगे : क्यों? ऐसा क्यों हुआ और क्या ऐसा हो सकता है कि अरब से कोई चीज़ यहां आए और हम उसे मान लें? यह तो असंभव बात है!

    लेकिन यह सच है। हैरान कर देने वाला सच। भारत सदा से ही पराए और पश्चिमी देशों की चीज़ों के प्रति सम्मोहन का शिकार रहा है। पश्चिम-परस्त भारतीयों ने पहले अपने सनातन धर्म का नाम छोड़ा और पर्शियाई लोगाें के दिए विदेशी और घृणासूचक नाम हिन्दू तक को अपनाया। इसके बाद अंग़रेज़ आए तो इंडियन हो गए और देश का नाम बदलकर इंडिया कर लिया। यही नहीं, आज भी हम न्यू ईयर मनाते हैं। बर्थ डे पर केक काटते हैं!

    आज भी हमारे प्रधानमंत्री किसी भारतीय पत्रकार को इंटरव्यू देने में आनाकानी करते हैं और विदेशी बबलू टाइप स्ट्रिंगर को बुलाकर साक्षात्कार करते हैं। फिर भले वे पंडित नेहरू हों या अब के अपने प्रिय मोदी।

    टाइम पत्रिका किसी को पर्सन ऑव द ईयर घोषित करने का संकेत देती है तो हमारे लोग कलाबाजियां खाने लगते हैं और अगर हमारे यहां की कोई पत्रिका या अखबार क्रिटिसाइज कर दे तो हमारे सत्तापुरुष तमतमाने लगते हैं।

    धोती-कुर्ता भले कहीं टंगा रहे, लेकिन विदेशी हैट लगाकर मैं आज भी विदेशी संस्कृति पर प्राण निछावर करता हूं। क्या आपने कभी मुझे धोती-कुर्ते में देखा? नहीं न!

    और अंत में : मेरा विचार वह नहीं है, जो अभी यहां प्रस्तुत है। मेरा विचार होगा, जो आप सबकी प्रतिक्रियाओं और तर्कों के बाद बनेगा। हमें इतना विवेकी और विनम्र होना चाहिए कि हम एक-दूसरे के तर्कों को ससम्मान आत्मसात कर सकें।


    credits : Tribhuvan's facebook wall

  • राष्ट्र गान देशभक्ती की चेतना अवश्य जगाएगा

    डॉ नीलम महेंद्र


    ” एक बालक को देशभक्त नागरिक बनाना आसान है बनिस्बत एक वयस्क के क्योंकि हमारे बचपन के संस्कार ही भविष्य में हमारा व्यक्तित्व बनते हैं।”

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सिनेमा हॉल में हर शो से पहले राष्ट्र गान बजाना अनिवार्य होगा। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और चूँकि हम लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है तो हम हर मुद्दे पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और किसी भी फैसले अथवा वक्तव्य को विवाद बना देते हैं, यही हमारे समाज की विशेषता बन गई है।

    किसी सभ्य समाज को अगर यह महसूस होने लगे कि उसके देश का राष्ट्र गान उस पर थोपा जा रहा है और इसके विरोध में स्वर उठने लगें तो यह उस देश के भविष्य के लिए वाकई चिंताजनक विषय है। “राष्ट्र गान” देश प्रेम से परिपूर्ण एक ऐसी संगीत रचना जो उस देश के इतिहास सभ्यता संस्कृति एवं उसके पूर्वजों के संघर्ष की कहानी अपने नागरिकों को याद दिलाती है। “राष्ट्र गान ” जिसे हम सभी ने बचपन से एक साथ मिलकर गाया है, स्कूल में हर रोज़ और 26 जनवरी 15 अगस्त को हर साल। इसके एक एक शब्द के उच्चारण में हम सभी ने एक गर्व, एक अभिमान इस देश पर अपने अधिकार एवं उसके प्रति अपने कर्तव्य, ऐसे अनेकों मिश्रित भावों से युक्त एक स्फूर्ति की लहर अपने भीतर से उठती हुई सी महसूस की है।

    हमारा राष्ट्र गान ‘जन गण मन ‘ जो मूलतः गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में लिखा था, भारत सरकार ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्र गान के रूप में अंगीकृत किया था। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर विश्व के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनकी रचना को एक से अधिक देशों में राष्ट्र गान का दर्जा प्राप्त है। बांग्लादेश का राष्ट्र गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उन्हीं की रचना है।

    विश्व के हर देश का अपना राष्ट्र गान है और उसके सम्मान से जुड़े कानून। जैसे यूनाइटेड स्टेट्स में जब भी राष्ट्र गान बजता है, सभी को सावधान की मुद्रा में अपना दांयाँ हाथ अपने सीने (दिल ) पर रखकर अपने राष्ट्रीय ध्वज की ओर मुख करके खड़ा रहना होता है और अगर राष्ट्रीय ध्वज मौजूद न हो तो राष्ट्र गान के स्रोत की ओर मुख करके खड़ा होना आवश्यक है। थाइलैंड में हर रोज राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रात: 8 बजे और संध्या 6 बजे उनके राष्ट्र गान का प्रसारण होता है तथा स्कूलों में रोज बच्चे सुबह 8 बजे अपने राष्ट्रीय ध्वज के सामने राष्ट्र गान गाते हैं। इतना ही नहीं सरकारी कार्यालयों एवं सिनेमाघरों में भी इसे नियमित रूप से बजाया जाता है।

    रशिया में भी अपने राष्ट्र गान का अनादर करने पर आर्थिक दंड के साथ साथ जेल में डाल देने का प्रावधान है। अफ्रीका के एक देश ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ काँगो’ का राष्ट्र गान अपने नागरिकों से पूछता है “एंड इफ वी हैव टू डाई , डज़ इट रीयली मैटर?” अर्थात् अगर हमें अपनी जान भी देनी पड़े तो भी क्या फर्क पड़ता है?

    यहाँ पर इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए नहीं किया गया है कि चूँकि अन्य देशों में ऐसा होता है तो हमारे देश में भी होना चाहिए और ऐसा भी नहीं है कि अगर अन्य देशों में ऐसा कुछ नहीं है तो फिर हमारे देश में क्यों?

    दरअसल इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए कि हम इस भावना के मूल को समझें कि जितना यह सत्य है कि दुनिया के हर देश के नागरिक अपने देश से प्रेम करते हैं और उनके ह्रदय में अपने देश के लिए अभूतपूर्व सम्मान की भावना होती है उतना ही बड़ा एक सत्य यह भी है कि जिस देश के नागरिक अपने देश से प्रेम एवं उसका सम्मान नहीं करते वह देश गुलामी की राह पर अग्रसर होने लगता है। हम सभी अपने माता पिता से प्रेम करते हैं उनका सम्मान करते हैं। हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि अपने दिन की शुरुआत हम अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेकर करें और उनका स्मरण उनका आशीर्वाद लेने का कोई दिन अथवा समय निश्चित नहीं है हम जब भी चाहें ले सकते हैं किसी विशेष दिन का इंतजार नहीं करते कि अपने जन्मदिन पर ही लेंगे या फिर नए साल पर ही लेंगे तो फिर यह देश जो हम सबकी शान है हमारा पालनहार है उसके आदर उसके सम्मान के दिन सीमित क्यों हों उसके लिए केवल कुछ विशेष दिन ही निश्चित क्यों हों?

    एक तथ्य यह भी है कि आज के इस दौर में कोई भी व्यक्ति फिल्म देखने सप्ताह अथवा महीने में एक बार या अधिक से अधिक दो बार ही जाता होगा रोज रोज दिन में तीनों चारों शो तो शायद ही कोई देखता हो तो सप्ताह अथवा महीने में एक या दो बार भी हमें अपने राष्ट्र गान को सम्मान देने में कठिनाई हो रही है, यह एक विचारणीय विषय है।

    कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि जब हम फिल्म देखने जाते हैं तो हम मनोरंजन के लिए जाते हैं तो ऐसे में राष्ट्र गान और मनोरंजन दोनों मानसिक स्थितियाँ मेल नहीं खातीं तो एक उदाहरण का उल्लेख यहाँ उचित होगा।

    स्कूल के दिनों में बच्चे फ्री पीरियड या फिर गेम्स पीरीयड के लिए लालायित रहते हैं और इन पीरियड में वे निश्चिंत होकर खेलते हैं लेकिन अगर उस समय उनके सामने प्राचार्य या अध्यापक कोई भी आ जाता है तो वे अपना खेल रोककर उनका अभिवादन करना नहीं भूलते। वे यह नहीं कहते कि अभी तो हम खेल रहे हैं हम अपने मनोरंजन में बाधा नहीं डाल सकते इसलिए आपका अभिवादन बाद में करेंगे आखिर स्वतंत्रता और स्वछन्दता में एक महीन सा अन्तर होता है । वही पतंग आकाश में ऊँची उड़ान भर पाती है जो अपनी डोर से बंधी हो इसलिए नियमों के बन्धन ऊँची उड़ान के लिए आवश्यक होते हैं। आप मनोरंजन के लिए लाँग ड्राइव पर जा रहे हैं तो गाड़ी की स्पीड रोमांच और मनोरंजन दोनों देती है लेकिन आपकी कुशलता के लिए आपका अपनी गाड़ी की गति पर नियंत्रण आवश्यक है । अगर आपकी गाड़ी कहे कि इस समय तो मैं ऊँची उड़ान और तेज रफतार की मानसिक स्थिति में हूँ मैं ब्रेक नहीं लगने दूंगी तो आप अंदाज लगा सकते हैं आपकी क्या दशा होगी। तो आप मनोरंजन के लिए जाएं लेकिन फिल्म से पहले राष्ट्र गान के रूप में अपने राष्ट्र के गौरव को याद करने एवं उसके प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने से आपके मनोरंजन में कोई कमी नहीं आएगी अपितु एक राष्ट्र प्रेम की चेतना अवश्य आ जाएगी।

    यहाँ कुछ व्यवहारिक परेशानी विकलांगों के साथ अवश्य हो सकती है तो सरकार एवं सिनेमाघर यह सुनिश्चित करें कि विकलांगों के बैठने की व्यवस्था अलग से की जाए ताकि राष्ट्र गान के समय न तो इन्हें असुविधा हो और न ही इनके खड़े न होने की स्थिति में वहाँ के वातावरण में अराजकता अथवा असंतोष की कोई अप्रिय स्थिति निर्मित हो।

    यहाँ पर यह जानकारी रोचक होगी कि चीन से युद्ध के बाद भारत के सिनेमाघरों में फिल्म खत्म होने के बाद राष्ट्र गान बजाने की परंपरा थी लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद लोगों के बाहर निकलने की जल्दी में राष्ट्र गान का अनादर होने की स्थिति में इस परम्परा को कालांतर में बन्द कर दिया गया था हालांकि एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के मनोरंजन कर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सिनेमाघरों को सरकार की ओर से कभी भी यह आदेश नहीं दिया गया कि राष्ट्र गान बन्द कर दिया जाए।

    तो 30 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देश निश्चित ही सराहनीय हैं न सिर्फ देश के वर्तमान के लिए बल्कि उसके भविष्य के लिए भी लेकिन हर बात को विवाद बना देना न तो देश के वर्तमान के लिए अच्छा है न भविष्य के लिए।

  • मेरी संसद में

    संजीबा


    मेरी संसद में बैठे हैं –
    काठ की
    कुर्सियों पर
    काठ के उल्लू ,
    वे जब लौटेंगे दिल्ली से
    तो झूठ पर
    नये सपनों/ नारों
    वादों का मुल्लमा चढ़ाके
    हाय ! री कमबख्त सरकार
    तेरे विश्वास पर
    मर गया
    इंतजारी में
    अपनी ही देहरी पर
    हाड़ का उल्लू ,
    सचमुच हम कब तक
    मरेंगे – जियेंगे
    इस हुकूमत की इस
    व्यवस्था में
    अफ़सोस
    मैं उनसे लड़-के क्यों नही
    मरता –
    उफ़ !!
    मैं भी इस बात का उल्लू……..

    .

  • यह सब एक दिन में नहीं हुआ

    हयात सिंह


    यह सब एक दिन में नहीं हुआ
    अनगिनत सूर्योदय और सूर्यास्त
    गवाह बने और मिट गए
    नाटक का पर्दा उठने और गिरने में
    समय लगता हो भले चंद सेकण्ड का
    मगर मंचन घंटों चलता है
    मंचन के लिए कथा और कथानक को तो और भी अधिक
    कई बार बरसों लग जाते हैं
    एक आम दर्शक पर्दा उठने और गिरने के सिवा
    कहाँ कुछ सहेज पाता है स्मृति में
    बस, आम की इसी कमजोरी का फ़ायदा
    उठाता है, निर्देशक
    समय के सापेक्ष
    कभी साप्ताहिक, कभी मासिक अंतराल में
    जरुरत पड़ने पर शहर और पात्र बदलकर
    एक ही नाटक के मंचन से
    अर्जित कर लेता है कहीं अधिक
    हर एक दशक के बाद बदल जाता है
    नाटक लिखने वाला
    मंचन करने वाला
    पर्दा उठाने वाला, गिराने वाला
    यहाँ तक कि बदल जाता है निर्देशक
    मगर, निर्देशन युगों-युगों से
    जैसे का तैसा ही, चलता आ रहा है
    प्रकृति प्रद्दत सभी रंग और ध्वनियों से अनभिज्ञ
    आम, एक बार पुनः ठगा जाता है
    कला के बहाने
    संगीत के बहाने
    इसीलिए, इस सबके पूर्णरूपेण
    समाप्त होने की आशा और उम्मीद,बहुत
    बड़ी बेईमानी है
    जीवन की एक अदद जरुरत है मनोरंजन
    हाँ, मनोरंजन में कटौती की जा सकती है
    कब, कैसे और कितने का निर्धारण
    स्वयं करना होगा
    और स्वयं निर्धारण करने योग्य विवेक के लिए
    जरुरी है एक और नाटक
    एक और मंचन
    एक और शहर
    एक और नायक
    एक और नायिका
    एक और खलनायक
    एक और पर्दा
    इन सब में एक से अधिक अगर कुछ चाहिए, तो
    वह है आम दर्शक
    जिसकी हाल-फिलहाल कोई कमी नहीं
    यह बात निर्देशक के अलावा
    नाटक के पात्रों को भी पड़ गयी है मालूम
    इसीलिए, सबके सब निर्देशक बनकर
    नए-नए पात्रों के साथ
    नए-नए तरीके से नए-नए नाटक रच रहे हैं
    भीड़ कभी इधर, कभी उधर

    इस भीड़ को आदत पड़ गयी है नाटकों की
    हाँ, किरदार निभाने वाला
    हर बार नए होना चाहिए
    नया किरदार एक दिन में नहीं पैदा हो जाता
    बल्कि इसके लिए
    सैकड़ों- हजारों साँझ
    अपना यौवन लुटा समय से पहले रात बन जाती हैं।

    .

  • डंडा-झंडा

    आलोक नंदन


    हाथ में होना चाहिए
    डंडा-झंडा
    और जुबां पर नारा
    फिर कियादत की
    कतारों में हो गये शामिल।

    भ्रम पैदा करके
    यदि दूर तक चल सकते हैं।
    और फिर अपने औलादों को भी
    उसी राह पर ढाल कर
    आगे निकल बढ़ना ही
    आपकी बेहतर सेवा
    में शुमार होती है।


    जम्हूरियत के गहवारों में
    पुश्त-दर-पुश्त
    पैबैंद हो जाते हैं।
    बस शर्त एक है
    हाथ से झंडा-डंडा
    नहीं छूटना चाहिए।


    जम्हूरियत पताकों पर चलती है
    जिसका पताका जितना ऊंचा
    उसके हिस्से में जम्हूरियत
    का उतना ही बड़ा हिस्सा।

    .