ओमप्रकाश बंसल :: जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा, देश का संभवत: ऐसा अकेला पत्रकार, जिसने बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया

त्रिभुवन


ओमप्रकाश बंसल  नहीं रहे। वे प्रशांत ज्योति के संपादक थे। उनके नाम से नेता, अफ़सर और बड़े-बड़े लोग ख़ौफ़ खाते थे। किसी के भी ख़िलाफ़ ख़बर हो, रोकने का प्रश्न ही नहीं। इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि उनके पिता को एक बार पुलिस ने सट्टा करते हुए गिरफ़्तार कर लिया तो उन्होंने क्राइम रिपोर्टर के रूप में अपने पिता के भी ख़िलाफ़ ख़बर लिखी। उनके एक भाई सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे, उनके बारे में भी कई बार ख़बरें छपीं। किसी का कितना भी बड़ा विज्ञापन उनके अख़बार में छप रहा हो, ख़बर न रुकती थी और न डायल्यूट होती थी। फ़्रंट की है तो फ़्रंट पर छपेगी और अंदर की है तो अंदर। विज्ञप्ति को पहले पेज पर तो क्या, भीतर के किसी पेज पर भी जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। वे देश के संभवत: ऐसे अकेले पत्रकार थे, जिसने के बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया।

मैंने अपनी पत्रकारिता प्रशांत ज्योति से शुरू की थी। यानी वह मेरे लिए पहली तनख़्वाह वाला अख़बार था। औम जी के किस्से कहीं से भी शुरू करो, ख़त्म नहीं होंगे। वे अनूठे जीवंत कैरेक्टर थे। क्राइम का वैसा रिपोर्टर मैंने कहीं नहीं देखा। किसी जगह पर पेड़ कटने की ख़बर आज भी हम लोगों के लिए कोई बड़ी ख़बर नहीं होती, लेकिन उन्होंने कुछ पेड़ कटे तो सिंचाई विभाग के तीन इंजीनियरों को जेल दिखाकर दम लिया। एक डाॅक्टर थीं कृष्णा गेदर। कलेक्टर थे आरएस गलूंडिया। गेदर से आंख में दर्द की दवा लाए तो 120 रुपए का बिल पास करवा लिया। उन दिनों आरटीआई वारटीआई नहीं हुआ करती थी। बंसल जी ने डोक्यूमेंट्स लिये, ख़बर छापी और कार्रवाई शुरू कर दी। गलूंडिया जी ने बंसल जी से आख़िरी क्षणों में माफ़ी न मांगी होती तो वे जेल में हाेते। लेकिन भाई रेवतीरमण ने उनका जितना साथ दिया और जिस दौर में दिया, वह कोई और नहीं दे सकता था।

उनके कुछ किस्से तो ग़ज़ब ही हैं।  जैसे :

  • कहां जा रहा है?
    फ़ोन करने।
    तो ये फ़ोन है या बेरिये की…।
    अरे, वो बाहर करना था।
    एसटीडी?
    नहीं, आईएसडी।
    तो क्या हुआ? इसमें आईएसडी भी है, मिस्टर।
    मेरी तनख्वाह है छह सौ और आईएसडी का बिल आएगा 900 का।
    फ़ुकरिया समझा है क्या? आेए, बाहर नहीं जाएगा। ले पकड़ फ़ोन। कर यहीं से। बाहर कभी आईएसडी करने गया तो ये रही बंदूक, गोली मार दूंगा!
  • एक माननीया : बंसल जी, मुझे आज अापके …ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं बैठने दिया।
    क्यूं?
    बोला, तू कहां की पत्रकार है? तू तो विज्ञापन का काम करती है।
    हम्मममम ….कौन है रे अंदर। अरे सक्सेना!
    ..आज से संपादक सुदर्शना शर्मा….और डिक्लेयरेशन क्लियर होने से पहले प्रेसलाइन में उसी दिन से संपादक का नाम बदल गया।
  • नगर परिषद के चुनाव थे। एक बहुत बड़े ट्रांस्पोर्टर चुनाव में उतरे। चुनाव कार्यालय पुरानी धानमंडी में खोला। ठीक प्रशांत ज्योति के सामने। सुबह-सुबह लाउड स्पीकर शुरू। बंसल जी को सिरदर्द की पुरानी प्रॉब्लम थी। दोपहर दो बजे आए।
    बोले : ये क्या है? दो-चार बार सेठ जी से अनुरोध किया कि स्पीकर हटा लें। नहीं माने तो उन्होंने कलेक्टर को फ़ोन लगाया। बोले : कलेक्टर साहब, दो घंटे में या तो ये लाउडस्पीकर हटा दो। नहीं तो मैं तुम्हारी ….में लगा दूंगा!जिला कलेक्टर ने कोतवाली पुलिस को भेजा कि जाओ इस जाहिल को गिरफ़्तार करके लाओ। कोतवाल माफ़ी मांगते हुए आए और इस बीच किसी ने कलेक्टर को समझा दिया कि आप अपमान का घूंट व्हिस्की समझकर पी जाओ। नहीं तो कल आपके दिक्कत हो सकती है। उन्होंने कहा : मैंने ऐसा क्या किया है? सामने अॉफ़िसर ने समझाया : सर, वो आपकी घड़साना वाली ज़मीन के काग़ज़ उनके ही पास हैं! उसी दिन शाम को कलेक्टर का संदेशवाहक प्रशांत ज्योति कार्यालय में था और कलेक्टर साहब विनयावनत मुद्रा में। लाउडस्पीकर तो कभी का उतर चुका था।

प्रशांत ज्योति का पुराना कार्यालय धानक धर्मशाला में एक ऊंचे चबूतरे पर हुआ करता था। उसे बंसल जी अधिकारपूर्वक "मेरा थड़ा" कहा करते थे। उन्हें छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाया करता था तो सामने बैठे रिपोर्टर हो या कोई बड़े सेठ जी, बोलते थे : उतर मेरै थड़ै ऊं!!! और उनका यह तकियाकलाम तब भी था जब वे धानमंडी के भूतल में अपनी मित्र के साथ बैठे रहते थे!

इतिहास और धर्म से संबंधित पुस्तकों के वे बेहद शौकीन थे। उन्होंने एक बार मेरे पास एक ऐटलस देखा।
बोले : कितने का है?
मैंने कहा : 9000 का।
बोले : ले चेक। दे दे।
मैंने मना किया तो बोले : पता बता। मंगवा के दे। ये ले चेक।
किताब चाहे कम्युनिज्म की हो या कौटिल्य की, खूबी बता दो तो बंदे से भले 50,000 रुपए ले लो।

वे एक नेकदिल इनसान थे। फक्कड़ थे। भावुक थे। कोई चाहे उन्हें किसी अपराधी के पक्ष में मोड़ दे या साधु के। कई लाेगों ने उन्हें झूठे अत्याचारों के किस्से सुनाकर कई बार गलत ख़बरें भी छपवाईं और बाद में मैंने बंसल जी को रोते हुए भी देखा।

कई बार वे 360 डिग्री घूम जाया करते थे। अगर कोई तथ्य ला दे तो। इस तरह की उनकी आदतों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका भी। लेकिन वे जिस पर भरोसा करते थे उस पर इतना करते थे कि वह चाहे उन्हें कुछ भी कह दे और कर दे, लेकिन अगर किसी ने उन्हें कुछ भर दिया तो आज का सोना कल की राख भी हाे सकता था। वे विचलनों और विद्रोहों के बीच संतुलन साधने की चालाकी नहीं जानते थे। वे किसी एक व्यक्ति के साथ अत्याचार होने पर पूरी कम्युनिटी से भिड़ जाते थे और इसीलिए वे औमप्रकाश बंसल थे। वे अफ़सरों से भिड़ते भी थे, लेकिन उनके साथ खड़े भी हो जाते थे। राजस्थान के टॉप ब्यूरोक्रैट रामलुभाया जिन दिनों कलेक्टर थे, उन्होंने अस्पताल को सुधारने का बीड़ा उठाया तो सब अख़बार वाले डॉक्टरों के साथ थे, लेकिन बंसल अकेले रामलुभाया के साथ।

 

गंगानगर में पुरी के जगदगुरु शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ आए थे। उन दिनों सती विवाद चल रहा था। निरंजन देव सती समर्थक थे और कह रहे थे कि वेदों में सती का समर्थन है। बंसल जी ने मुझे बुलवाया। बोले : आपके पिताजी से पूछो कि वेदों में सती का समर्थन है क्या? मैंने बताया कि वे कह रहे हैं नहीं है। बोले : इस शंकराचार्य के खिलाफ केस भी करवाना है और इसे भगाना भी है। करीब दस हमने खबरें लिखीं। शंकराचार्य से प्रश्न पूछते। वे रात को जवाब देते। लेकिन पांच दिन बाद ही हमारी खबरों को लेकर पुलिस ने केस दर्ज किया और शंकराचार्य रातोरात भाग गए। उस दौर में पूरा मीडिया एक साथ था और शंकराचार्य अकेले पड़ गए।

 

ख़बरों में वे किसी को नहीं बख्शते थे। किसी समय कम्युनिस्ट उनके दोस्त हुआ करते थे। आज भी हैं। लेकिन उन्होंने एक ख़बर निकाली जब सीपीएम नेता हेतराम बेनीवाल सीटू के नेता हुआ करते थे और जेसीटी मैनेजमेंट ने उनके बेटे की शादी में 51000 रुपए का बान दिया था।

कानून की वैसी बारीकियां मैंने किसी संपादक में नहीं देखीं। क्राइम इन्वेस्टिगेशन की वैसी हूक शायद ही किसी में हो। पुलिस से आगे और ज्यादा तथ्यों के साथ। कई उलझे हुए मर्डर केसों में उन्होंने जांच की धारा बदल दी। कानून और पत्रकारिता मिलकर किसी का कितना फ़ायदा कर सकते हैं, यह चीज़ उन्होंने बार-बार साबित की।

एक बार एक दोस्त को उन्होंने पूरा अख़बार संभालने को दे दिया। कुछ दिन बाद दोस्त दिखाई नहीं दिए। मैंने पूछा : ….कहां हैं? वे इधर-उधर देखने लगे। फिर भीतर आवाज़ दी : …कहां है? जल्दी लाओ कहां है? ….कुछ देर बाद अंदर से एक कंपोजीटर ब्लेड लेकर बाहर आया। मैं हंसा। गुस्से से बोले : हंसता क्याें है? मैंने कहा : ये तो ब्लेड है। बोले : नहीं, ये ब्लेड नहीं है। ये तो …..है! बाद में उन्होंने एक्सप्लेन किया कि वो आपका बंदा दिन भर इस ब्लेड से दूसरे अखबारों की खबरें काटकर यहां दिया करता था तो मैंने उस दिन से उन्हें कहा, तुम जाओ और आज से ये ब्लेड प्रशांत ज्योति का न्यूज एडिटर!

वे बच्चे की तरह सरल स्वभाव भी थे। एक बार उनका अपने एक पुराने मित्र से झगड़ा हो गया और ऐसा हुआ कि बस पूछो मत। मैंने उनसे पूछा : आप तो दोस्त थे। ये गिरावट कैसे? बोले : उसने मेरी कपड़े की दुकान बंद करवाकर पान का खोखा शुरू करवा दिया। इसलिए। मैंने कहा : आप पहले कपड़े की दुकान करते थे? वे बोले : नहीं। मैं डेली अख़बार निकालता था। ये बोला : देख बंसल, विज्ञापन तो डेली मैं भी इत्ता ई आवैगा और वीकली मैं भी इत्ता ई। क्यूं खरचो करै? तो मैंने उसकी सलाह मानकर अखबार को डेली से वीकली कर दिया। यानी कपड़े की दुकान को पान के खोखे में बदल दिया। मैंने कहा : ये तो आपकी गलती है। आपने उनकी बात क्यों मानी? बोले : यार ये तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं। मैं तो जो कोई आता है। उसी की मान लेता हूं! मैंने कहा : आपका दोस्त कहता है : आप रात को पेटीकोट पहनकर घूमते हो! वे बहुत हंसे। बोले : यार पुराना दोस्त है। वही अंदर की बात जान सकता है! मुझे लगा, वे गुस्से से भर उठेंगे। लेकिन उन्होंने जोर से हंसते हुए बताया : यार, मैं लुंगी बांधता था। मेरा पेट बड़ा था। लुंगी खुल जाती थी। ये चौधरी ने सलाह दी : यार बंसल, तेरी ये लुंगी बार-बार खुल जाती है। तू इसे आगे से सिलवा ले। मैंने सिलवा ली। ये फिर भी गिरती रही। वो बोला : यार तू इसका नेफ़ा बनवा और नाला डाल ले। मैंने उसकी वो बात भी मान ली। …फिर कई दिन बाद साला मजाक करने लगा : यार ये तेरा पेटीकोट!!! अब देख…तू फिर मुझे कहेगा कि ये भी ग़लती मेरी ही ही है। चल उतर मेरे थड़े से!!!

साहित्य को वे बहुत सम्मान से देखते थे। उन्होंने रविवार का पूरा अख़बार ही साहित्य को समर्पित कर रखा था। ऐसे कई मौके आए जब हमने पहले पन्ने पर हिन्दी की बेहतरीन रचनाएं छापीं।

उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। लेकिन एक पहलू ऐसा है, जो शायद औमप्रकाश बंसल ही कर सकते थे। इन विषयों पर फ़िल्मों में काल्पनिक पात्रों को जीने वाले हीरो तो करते रहे हैं, लेकिन आम जीवन में वैसा दुस्साहस करना हर किसी के बस की बात नहीं। अपने जीवन में उठाया उनका यह कदम उनमें लाख अवगुण हों तो भी उन्हें ढांप लेता है और उन्हें मेरी नज़र में उन्हें एक नायक की छवि प्रदान करता है।

आज बंसल नहीं रहे, बात इतनी सी नहीं है। वह अनगढ़ और अनचीन्हा व्यक्तित्व नहीं रहा। एक अदभुत चरित्र नहीं रहा। एक असाधारण व्यक्ति नहीं रहा। उनके साथ ही मेरे शहर की जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा चला गया, जिसमें दसों रस समान वेग से बहते थे।

 


त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

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