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  • समकालीन वैश्विक संकट के पीछे धर्म है या राजनीति?

    प्रो० राम पुनियानी


    वैश्विक स्तर पर ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द बहुप्रचलित हो गया है और इस्लाम के आंतरिक ‘संकट’ की कई तरह से विवेचना की जा रही है। कुछ लोगों की राय है कि इस्लाम एक बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है और इस संकट से निपटने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि इसके पूर्व इस्लाम एक बहुत बड़े संकट से उबर चुका है। वह था क्रूसेड्स। वह एक बाहरी संकट था। इस्लाम का वर्तमान संकट उसका आंतरिक संकट है,जिसमें मुसलमान एक-दूसरे को ही मार रहे हैं। यहां तक कि एक ही पंथ के मुसलमान भी अपने साथियों का खून बहा रहे हैं। यह संकट पिछले कुछ दशकों में इस्लाम पर हावी हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमान, स्वयं इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हैं और इस्लाम अब अपने ही अनुयायियों को निगल रहा है। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में ‘अच्छा मुसलमान, बुरा मुसलमान’ शब्द ईजाद कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस्लाम पर अतिवादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है। सुन्नी इस्लाम अतिवादी हो गया है और शिया इस्लाम का खोमैनीकरण हो गया है। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस्लाम में अंदर से सुधार लाए जाने की ज़रूरत है।

     

    यह तर्क मध्यमार्गी मुसलमानों की व्यथा को प्रदर्शित करता है, जो अलकायदा से शुरू होकर आईएस और उसके कई अवतारों में फैल गया है। सच यह है कि यह विवेचना उथली है। ज़रूरत इस बात पर विचार करने की है कि इस्लाम से आतंकवाद के जुड़ाव की यह प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों में ही क्यों शुरू हुई। यह मानना अनुचित होगा कि केवल इस्लाम के मानने वाले ही हिंसा करते हैं। साध्वी प्रज्ञा और गोडसे जैसे हिन्दू, असिन विराथू जैसे बौद्ध और एण्डर्स बर्लिन ब्रेविक जैसे ईसाई भी आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि आतंकवाद से जुड़े अधिकांश व्यक्ति मुसलमान हैं परंतु हमें यह समझना होगा कि कबजब राजनीति भी धर्म का भेस धर लेती है। और यह बात सभी धर्मों के बारे में सही है।

     

    वर्तमान समय की बात करने से पहले हमें धर्मों की नैतिकता और उनके आदर्शों और धर्म के पहचान से जुड़े पहलुओं के बीच अंतर करना होगा। पहचान से जुड़े पहलुओं का सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह, समाज पर अपना दबदबा कायम करने के लिए करते हैं। अधिकांश धर्मों के पुरोहित वर्ग ने सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूहों के साथ मिलकर सामाजिक ऊँचनीच को धार्मिक पवित्रता का चोला पहनाया। चर्च और मौलाना दोनों सामंती व्यवस्था के समर्थक रहे हैं और ब्राह्मणों ने जाति और लिंग पर आधारित पदक्रम को समाज पर लादा। यह सब समाज के श्रेष्ठी वर्ग द्वारा अपना राज कायम करने की कवायद का हिस्सा था।

     

    हमें यह भी समझना होगा कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजाओं ने जिहाद, क्रूसेड्स और धर्मयुद्ध जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों को विस्तार देने के लिए किया। धर्म तो मात्र एक बहाना था, असल में वे सत्ता के भूखे थे। सभी धर्मों के राजाओं के लक्ष्य एक से थे। उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना नहीं वरन धर्म के नाम पर अपनी सत्ता को मज़बूती और अपने साम्राज्य को विस्तार देना था। ऐसे में हम केवल जिहाद की बात कैसे कर सकते हैं?हम अन्य धर्मों के शासकों द्वारा धर्म के दुरूपयोग को कैसे भुला सकते हैं?

     

    जहां तक भारत का संबंध है, 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप अस्त होते ज़मींदारों और सामंतों के वर्ग ने अपनी उच्च सामाजिक स्थिति को बनाए रखने और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को संरक्षित रखने के लिए धर्म की भाषा बोलनी शुरू कर दी। उदित होते राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध करने के लिए इस्लाम के नाम पर राजनीति करने के लिए मुस्लिम लीग जैसी संस्थाएं बनीं तो हिन्दू धर्म के नाम पर सत्ता का खेल खेलने के लिए हिन्दू महासभा और आरएसएस का गठन हुआ। एक ओर थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गांधी जैसे लोग, जो भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार थे तो दूसरी ओर थे जिन्ना, सावरकर, गोलवलकर और गोडसे जैसे व्यक्ति जो धार्मिक राष्ट्रवाद के हामी थे। गोडसे ने अपने समय के महानतम हिन्दू की हत्या की और उसके अनुसार ऐसा उसने ‘हिन्दू समाज’ की खातिर किया। बौद्ध धर्म के भेस में ऐसा ही राष्ट्रवाद म्यांमार और श्रीलंका में भी फलफूल रहा है।

    पिछले कुछ दशकों में अमरीका, अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम का खलनायकीकरण करता आ रहा है। अमरीका का असली उद्देश्य कच्चे तेल के कुंओं पर कब्ज़ा करना है। अपनी इसी लिप्सा के चलते अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी संस्करण को प्रोत्साहन दिया। यह सर्वज्ञात है कि अमरीका ने पाकिस्तान के मदरसों में युवकों को इस्लाम के कट्टरवादी सऊदी संस्करण में प्रशिक्षित किया और उन्हें करोड़ों डॉलर और सैंकड़ों टन हथियार मुहैय्या करवाए। अमरीका तब इन युवकों के ज़रिए अफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करना चाहता था। बाद में ये लोग अमरीका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। इसके पहले अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडिक सरकार को अपदस्थ किया था। इसके नतीजे में अंततः अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए और इस्लामिक कट्टरता का बोलबाला बढ़ा। खोमैनी के सत्तासीन होने के बाद पश्चिमी मीडिया ने यह कहा था कि अब इस्लाम, दुनिया के लिए एक ‘नया खतरा’ बन गया है और 9/11 के आतंकी हमले के बाद, इसी मीडिया ने ‘इस्लामिक आंतकवाद’ शब्द गढ़ा।

     

    ऐसा बताया जा रहा है मानो आतंकवाद के कैंसर का कारण इस्लाम है। परंतु गहराई से देखने पर हमें यह समझ आएगा कि हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। कुछ प्रेम का प्रचार करती हैं तो कुछ नफरत फैलाती हैं। कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे लोग गरीबों के साथ खड़े हुए और उन्होंने सत्ताधारी पुरोहित वर्ग का विरोध किया। पुरोहित वर्ग, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करता आया है। गांधी भी हिन्दू थे और गोडसे भी। किसी धर्म की कौनसी धारा मज़बूत होती है और कौनसी कमज़ोर, यह अक्सर तत्कालीन राजनैतिक शक्तियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

     

    यह सचमुच चिंता की बात है कि इस्लाम कई तरह की आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है परंतु यदि इस्लाम के अतिवादी पंथ शक्तिशाली बन गए हैं तो इसका कारण धर्म है या राजनीति। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के लिए हिन्दू धर्म समावेशी था तो गोडसे जैसों के लिए वह अन्यों से घृणा करना सिखाने वाला था। अतः, ज़रूरत इस बात की है कि हम धर्म का लबादा ओढ़े उस राजनीति को पहचानें, जो अतिवाद को बढ़ावा दे रही है और इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने नहीं आने दे रही है। हमारे समय में भी मौलाना वहीदउद्दीन और असगर अली इंजीनियर जैसी शख्सियतें हुईं जिन्होंने इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने रखा। परंतु सत्ता के समीकरणों के चलते, वे हाशिए पर पटक दिए गए और आईएस जैसी संस्थाएं केन्द्र में आ गईं। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि जो शक्तियां अतिवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं वे दरअसल तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति में संलग्न हैं। धर्म का आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • क्रांतिकारी बदलाव

    भंवर मेघवंशी


    बैलगाड़ी से जाते हुये
    उन्होंने मेरे दादा से
    गांव की ही बोली में
    पूछी थी उनकी "जात"
    उन्होंने विनीत भाव से
    बता दी.

    वे नाराज हुये
    और चले गये
    उतार कर गाड़ी से उनको
    दादा ने इसको
    अपनी नियती माना.

    फिर एक दिन
    रेलयात्रा के दौरान
    उन्होंने मीठे स्वर में
    खड़ी बोली में जाननी चाही
    मेरे पिता से उनकी "जाति"
    पिता थोड़ा रूष्ट हुये
    फिर भी उन्होंने दे दी
    अपनी जाति की जानकारी.

    सुनकर वो खिन्न हो गये
    पर क्या कर सकते थे.
    रेल से नीचे
    उतरने से तो रहे
    सो रह गये
    मन मसोस कर .
    बैठे रहे साथ में चुपचाप.
    बात नहीं की फिर
    थोड़ा दूर खिसक लिये.

    हाल में उन्होंने
    धरती से मीलों उपर
    उड़ते हुये
    बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में
    सभ्य अंग्रेजी में
    'एक्सक्यूज मी' कहते हुये
    पूछ ही ली मुझसे मेरी ' कास्ट '

    मेैने जवाब में घूरा उनको
    मेरी आँखों का ताप
    असहज कर गया उन्हें
    खामोशी ओढ़े
    बुत बन कर बैठे रहे वे
    धरती पर आने तक.

    मैं सोचता रहा
    आखिर क्या बदला
    तीन पीढ़ी के इस सफर में ?
    बदले है सिर्फ
    मॉड ऑफ ट्रांसपोर्टेशन
    भाषा और वेशभूषा .
    पर दिमाग में भरा भूसा
    तो जस का तस रहा.

    और अब वे कहते है
    कहां है जातिवाद आजकल ?
    कौन मानता है इस
    कालबाह्य चीज को .
    हालांकि वे जान लेना चाहते है
    किसी भी तरह जाति
    क्योंकि जाति जाने बिना
    कहां चैन पड़़ता है उनको ?

    इन दिनों
    वे चाह रहे है कि
    समाज में आये इस
    " क्रांतिकारी बदलाव" पर
    सहमति जताऊं
    और तालियां बजाऊं !
    क्या वाकई बजाऊं ?

    .

  • क्या टीपू सुल्तान स्वाधीनता संग्राम सैनानी थे? 

    प्रो० राम पुनियानी


    कर्नाटक सरकार द्वारा गत 10 नवंबर, 2016 को टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने के मुद्दे पर जमकर विवाद और हंगामा हुआ। पिछले वर्ष, इसी कार्यक्रम का विरोध करते हुए तीन लोग मारे गए थे। टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने का विरोध मुख्यतः आरएसएस-भाजपा और कुछ अन्य संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इनका कहना है कि टीपू एक तानाशाह था, जिसने कोडवाओं का कत्लेआम किया, कैथोलिक ईसाईयों का धर्मपरिवर्तन करवाया और उनकी हत्याएं कीं, कई ब्राह्मणों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया और अनेक मंदिरों को तोड़ा। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कन्नड़ की बजाए फारसी भाषा को प्रोत्साहन दिया। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि टीपू एक अत्यंत लोकप्रिय राजा थे और उनकी वीरता के किस्से अब भी नाटकों और लोकगीतों का विषय हैं। वे एकमात्र ऐसे भारतीय राजा थे जो ब्रिटिश शासकों से लड़ते हुए मारे गए। प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने तो यहां तक मांग की है कि बैंगलोर के नए हवाईअड्डे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाना चाहिए। कर्नाड ने यह भी कहा है कि अगर टीपू हिन्दू होते तो उन्हें कर्नाटक में उतने ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता, जितने सम्मान से महाराष्ट्र में शिवाजी को देखा जाता है।

    यह दिलचस्प है कि कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने जब 2010 में भाजपा को छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी, तब उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए टीपू सुल्तान जैसी टोपी पहनी थी और तलवार हाथ में उठाई थी। आज वे ही टीपू सुल्तान का जन्मदिन मनाए जाने के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि आरएसएस द्वारा 1970 के दशक में प्रकाशित भारत-भारती पुस्तक श्रृंखला में टीपू को एक देशभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। आज वे ही लोग टीपू सुल्तान को एक धर्मांध शासक बता रहे हैं। संघ परिवार द्वारा एक ट्रेन का नाम टीपू पर रखे जाने का भी विरोध किया गया था। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि टीपू सुल्तान ने अपने सेनापतियों को पत्र लिखकर यह कहा था कि काफिरों का सफाया कर दिया जाना चाहिए। यह कहा जाता है कि ये पत्र अब ब्रिटिश सरकार के कब्ज़े में हैं। जब विजय माल्या ने लंदन में आयोजित एक नीलामी में टीपू की 42 इंच लंबी तलवार खरीदी थी तब भी बहुत बवाल मचा था। टीपू को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं।

    टीपू सुल्तान कौन थे? उनका स्वाधीनता संग्राम में क्या योगदान था? टीपू ने अपना राज्य अपने पिता हैदर अली से उत्तराधिकार में पाया था। युद्ध लड़ने की तकनीकी के विकास में हैदर और टीपू का योगदान सर्वज्ञात है। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरूद्ध अपने युद्धों में मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। अंग्रेज़ों के साथ हुए उनके युद्ध बहुत प्रसिद्ध हैं। हैदर और टीपू ने ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में विस्तार को रोकने में महती भूमिका अदा की थी। टीपू की राजनीति, धर्म पर आधारित नहीं थी। उलटे इतिहास में यह दर्ज है कि उन्होंने हिन्दू मठों को दान दिया था, यद्यपि इसके पीछे भी हिन्दुओं का समर्थन हासिल करने की राजनैतिक मंशा थी। सच यह है कि चूंकि टीपू ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी इसलिए उन्होंने उसका दानवीकरण किया।

    टीपू ने मराठाओं और हैदराबाद के निज़ाम से पत्रव्यवहार कर उनसे यह अनुरोध किया था कि वे अंग्रेज़ों का साथ न दें क्योंकि अंग्रेज़, उस क्षेत्र के अन्य राजाओं से बिलकुल भिन्न हैं और यदि उनका राज कायम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी आपदा होगी। उनकी इसी सोच ने उन्हें अंग्रेज़ों के खिलाफ अनवरत युद्ध करने की प्रेरणा दी। ऐसे ही एक युद्ध में उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। परंतु वे आज भी कर्नाटक के लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। उन पर केन्द्रित कई नाटक और गीत (लावणी) हैं। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता के कारण ही वे आज भी कर्नाटक के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बने हुए हैं।

    जहां तक कन्नड़ और मराठी के साथ-साथ फारसी भाषा का इस्तेमाल करने की उनकी नीति का प्रश्न है, हमें यह समझना होगा कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी ही राजदरबारों की भाषा थी। टीपू कतई धर्मांध नहीं थे। कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य को लिखे एक पत्र में उन्होंने शंकराचार्य को ‘जगतगुरू’ (विश्व का शिक्षक) कहकर संबोधित किया और उनके मठ को बड़ी राशि दान के रूप में दी। इसके विपरीत, रघुनाथ राव पटवर्धन की मराठा सेना ने मैसूर के बेदानूर पर हमला कर श्रंगेरी मठ में लूटपाट की। मराठा सेना ने मठ को अपवित्र किया। शंकराचार्य ने इस बारे में टीपू को लिखा। टीपू ने पूरे सम्मान के साथ मठ की पुनर्प्रतिष्ठा की। उन्होंने श्रीरंगपट्नम के मंदिर को दान भी दिया। उनके राज में मैसूर में दस दिन तक दशहरा बड़े जोरशोर से मनाया जाता था और वाडियार परिवार का कोई सदस्य इस आयोजन का नेतृत्व करता था। ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता, मध्य कर्नाटक के चित्रदुर्गा के एक सूफी संत थिप्पेरूद्रस्वामी के अनन्य भक्त थे।

    टीपू के महामंत्री एक ब्राह्मण थे जिनका नाम पुरनैया था। उनके कई मंत्री भी ब्राह्मण थे। उन्होंने जो भी गठबंधन किए उसके पीछे धर्म नहीं बल्कि अपनी ताकत में इज़ाफा करने का प्रयास था। अपनी पुस्तक ‘सुल्तान-ए-खुदाद’ में सरफराज़ शैख ने ‘टीपू सुल्तान का घोषणापत्र’ प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की है कि वे धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे, अपनी आखिरी सांस तक अपने साम्राज्य की रक्षा करेंगे और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकेंगे। यह सही है कि कुछ विशिष्ट समुदाय उनके निशाने पर थे। इस संबंध में टिप्पणी करते हुए इतिहासविद केट ब्रिटलबैंक लिखती हैं कि ‘‘उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि उन समुदायों को सज़ा देने के लिए किया था’’। उन्होंने जिन समुदायों को निशाना बनाया, वे वह थे जो उनकी दृष्टि में साम्राज्य के प्रति वफादार नहीं थे। तथ्य यह है कि उन्होंने  माहदेवी जैसे कई मुस्लिम समुदायों को भी निशाना बनाया। ये समुदाय वे थे जो अंग्रेज़ों के साथ थे और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के घुड़सवार दस्ते के सदस्य थे। एक अन्य इतिहासविद सूसान बैले लिखती हैं कि अगर टीपू ने अपने राज्य के बाहर हिन्दुओं और ईसाईयों पर हमले किए तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अपने राज्य में रहने वाले इन्हीं समुदायों के सदस्यों के साथ उनके मधुर रिश्ते थे।

    Tipu Sultan
    Tipu Sultan

    टीपू को मुस्लिम कट्टरपंथी के रूप में प्रस्तुत करना अंग्रेज़ों के हित में था। उन्होंने यह प्रचार किया कि वे टीपू की तानाशाही से त्रस्त गैर-मुसलमानों की रक्षा के लिए टीपू के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं। यह मात्र एक बहाना था। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के ज़माने में हम राजाओं और नवाबों का महिमामंडन नहीं कर सकते। वे हमारे राष्ट्रीय नायक नहीं हो सकते। परंतु इसके बाद भी, टीपू, भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में तत्समय राज कर रहे भारतीय राजाओं से इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अंग्रेज़ों के भारत में अपना राज कायम करने के खतरों को पहले से भांप सके। वे अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में सबसे पहले अपनी जान न्यौछावर करने वालों में से थे। भारत में स्वाधीनता आंदोलन, टीपू के बहुत बाद पनपना शुरू हुआ और इसमें आमजनों की भागीदारी थी। टीपू के बलिदान को मान्यता दी जाना ज़रूरी है। आज साम्प्रदायिक विचारधारा के बोलबाले के चलते टीपू जैसे नायकों का दानवीकरण किया जा रहा है। अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में टीपू की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • हाथी के दांत…

    धीरज


    हाथी के दांत…
    खाने के अलग
    और दिखाने के लिए
    अलग होते है

    पर यह …..
    सही नही है जनाब !

    ये जो बाहर वाले
    चमकीले और नुकीले
    दांत होते है,वो
    डराने के लिए
    और जो….
    भीतर वाले चौडे एवं काले दांत
    होते है न…..
    भोजन के देखकर
    गुपचुप गुपचुप
    मुस्कराने के लिए होते है

    सच तो यह है कि….
    हाथी के असली दांत
    उसके पेट मे होता है
    जिसके बारे मे
    लोगबाग कुछ भी
    नही जानते ……

     

  • भ्रूण नहीं होते है अवैध

    भंवर मेघवंशी


    वैध या अवैध
    नहीं होते है भ्रूण
    वे तो सिर्फ भ्रूण होते है.

    नहीं होती है संतानें
    कभी भी नाज़ायज
    रिश्ते भी नहीं होते अवैध
    जुड़ना भला
    कैसे हो सकता है अवैध !

    जब जुड़ते है दो जन
    तब ही तो बनते है रिश्ते.
    धर्म,कानून,समाज
    प्रथाएं और खांपें होती है
    अवैध.

    भ्रूण तो कुदरती है
    और रिश्ते रूहानी होते है
    भ्रूण सजीवन होते है
    प्रारम्भ से,
    वे कभी नहीं होते है शून्य.

    भ्रूण ही तो थे हम सब
    पैदा होने से पहले
    नहीं जन्म पाते तो
    कैसे बनते स्त्री या पुरूष ?

    इसलिये हे शरीफ लोगो
    मत मारों भ्रूणों को,
    उनको पनपने दो
    जन्मने दो उनको.
    मत फैंको उनको
    नालियों,झाड़ियों
    सड़को और कचरा पात्रों में.

    जीवन का आरम्भ है भ्रूण
    सभ्यता का अवलम्ब है भ्रूण
    जीने दो उनको
    जन्मने के लिये.

    मत करो
    भ्रूणों की भ्रूण हत्या
    क्योॆकि
    भ्रूण नहीं होते है
    कभी भी अवैध.

    -भँवर मेघवंशी
    (स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता )

  • खूबसूरत यादें लिए लौट चले शताब्दियों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे अपनी दुनिया की ओर (फोटो लेख)

    खूबसूरत यादें लिए लौट चले शताब्दियों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़, बस्तर के बच्चे अपनी दुनिया की ओर (फोटो लेख)

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मेरे देश के सैकड़ों सालों से अछूते रहे आदिवासी क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चे बाहरी दुनिया को देखने जानने समझने आए। यदि मैं भारत में होता तो किसी भी कोने से इन बच्चों के स्वागत के लिए पहुंचता भले ही असुविधा का सामना करना पड़ता क्योंकि मामला बच्चों के स्वागत का था। उन बच्चों के स्वागत का जिनको हमारी दुनिया के बारे में पूर्वाग्रह से भर कर विद्रोही बना दिया जाता है।

    बस्तर के बारे में झूठी सच्ची व प्रायोजित खबरों को सुनकर मानवाधिकारों को बचाने के नाम पर सोशल साइट्स में सरकार, पुलिस व प्रशासन को कोसने व गरियाने वाले हम लोगों की वास्तविक संवेदनशीलता व सामाजिक जागरूकता का भी पता चलता है, जब हममें से अधिकतर लोग अपने दरवाजे पर आए अबुझमाड़ जैसे क्षेत्र के बच्चों से मिलते भी नहीं हैं। अचानक हम बीमार हो जाते हैं, अचानक हमें अपने खुद के बच्चों की चिंता अधिक होने लगती है हम अपने बच्चों के जिम्मेदार अभिभावक बन जाते हैं, अचानक हम मातृ व पितृ भक्त हो जाते हैं, अचानक हमें बहुत जरूरी काम करने पड़ जाते हैं।

    इतने सारे अचानक वाले अचानकों में हम यह बिलकुल ही भूल जाते हैं कि ये बच्चे उस क्षेत्र से आए हैं जहां जीवन व विकास का कोई मायने नहीं। लेकिन हममें से अधिकतर लोग अपनी छटाक भर असुविधा से बचने के लिए स्वयं के असंवेदनशील हो जाने को प्राथमिकता देते हैं। अपनी सेलेक्टिव जागरूकता, संवेदनशीलता व क्रांतिकारिता के दंभ में सरकार व प्रशासन को कोसने व गरियाने वाले हम लोगों से इतना भी न बन पड़ा कि हम इन बच्चों से मिलकर जमीनी हकीकत का कुछ अंदाजा लगा लेते। ये बच्चे जिस इलाके से आए थे वहां जाना असंभव रहा है। यदि आप इन बच्चों से मिलते तो पता चलता कि स्थितयां कितनी बदल रही हैं इनकी दुनिया के बारे में बिना प्रायोजित जमीनी हकीकत से रूबरू होते।

    दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों के जिन आदरणीयों ने इन बच्चों से गुफ्तगूं की उनकी संवेदनशीलता को तहेदिल से कोटि-कोटि धन्यवाद। तहेदिल से विशेष धन्यवाद बड़े भ्राता पंकज चतुर्वेदी दा जी को, जिन्होंने मेरे भावों को बिना कहे स्नेह व स्वेच्छा से प्रेम व मान दिया। आभारी हूं।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति के साथ

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे खूबसूरत यादें लेकर अपनी दुनिया में लौट रहे हैं। बच्चों ने भारत के राष्ट्रपति के साथ समय गुजारा, राष्ट्रपति भवन में विशिष्ट स्नेह के साथ भोजन प्राप्त किया, देश की संसद को देखा, भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली समझी, विज्ञान भवन को देखा, नेशनल बुक ट्रस्ट को देखा, दिल्ली की मेट्रो तथा ऐतिहासिक इमारतों व अन्य विशिष्ट सरकारी प्रतिष्ठानों को देखा समझा।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति भवन में

    मैं धन्यवाद देता हूं डा० संतोष देवांगन, ADM नारायणपुर, जी को उनके जज्बे व मेहनत के लिए तथा बच्चों को एक पिता के रूप में देखभाल करने के लिए। मैं धन्यवाद देता हूं टामन सिंह सोनावनी, DM नारायणपुर, जी को इतना बड़ा निर्णय लेने व डा० संतोष देवांगन जी कर्मठ महानभाव पर विश्वास करने व उनको उचित दिशा निर्देश देते रहने के लिए। मैं धन्यवाद देता हूं नारायणपुर जिले की जिला प्रशासन टोली को जिनके सहयोग के बिना यह संभव नहीं हो पाता।

    मैं धन्यवाद देता हूं बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी जी को। मैं धन्यवाद देता हूं नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक मीणा जी को। जिनके प्रयासों से ऐसा वातावरण बन पा रहा है कि अबुझमाड़ के बच्चे व प्रशासन स्वयं को सुरक्षित महसूस कर पा रहे हैं, संपर्क मार्ग बन पा रहे हैं जिससे शिक्षा, विकास आदि के लिए तनावरहित वातावरण बन पा रहा है।

    मैं धन्यवाद देता हूं CRPF के महानिदेशक व अन्य आला अधिकारियों को जिन्होंने बच्चों को दिल्ली में बहुत बेहतरीन आवास, भोजन व यातायात सुविधाएं व पारिवारिक वातावरण दिया। बच्चों को सिखाया कि हमारी दुनिया में विशिष्ट स्थानों में कैसे रहा जाता है, कैसे भोजन किया जाता है, कैसे बातचीत की जाती है। आदि आदि।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे -CRPF

    Abujhmarh Tribal Students - CRPF Academy
    Abujhmarh Tribal Students - CRPF Mess

    मैं धन्यवाद देता हूं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, उनकी सलाहकार टोली, प्रमुख सचिव, सचिवों व निदेशकों को। जो आलोचनाएं झेलते हुए भी बस्तर क्षेत्र में रचनात्मक समाधान के लिए समन्वय व तालमेल के साथ प्रयासरत हैं। नारायणपुर प्रशासन को प्रोत्साहित करने के लिए अतिरिक्त धन्यवाद।

    मेरी प्रसन्नता का कारण सिर्फ यह है कि मैं बस्तर की जमीनी हकीकत को समझता हूं। मैं जानता हूं कि मुख्यधारा की दुनिया के लिए भले ही यह एक सामान्य घटना हो लेकिन बस्तर के लिए यह उन ऐतिहासिक घटनाओं में से एक है जो बस्तर में रचनात्मक समाधान की स्थिति, गति व दिशा तय करती हैं।


    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – चुनाव आयोग

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – नेशनल बुक ट्रस्ट

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – उच्चतम न्यायालय

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – विज्ञान भवन

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – विज्ञान भवन

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – लाल किला

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे – इंडिया गेट

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    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • आजाद भारत का अनोखा दिन – सैकड़ों वर्षों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चों से भारत के राष्ट्रपति मिले और विशिष्ट अतिथियों जैसा आदर व स्नेह देते हुए स्वादिष्ट भोजन कराया

    आजाद भारत का अनोखा दिन – सैकड़ों वर्षों तक परित्यक्त रहे क्षेत्र अबुझमाड़ के बच्चों से भारत के राष्ट्रपति मिले और विशिष्ट अतिथियों जैसा आदर व स्नेह देते हुए स्वादिष्ट भोजन कराया

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    ढंके की चोट पर पूरी ताकत से कहना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह जी के दिशा निर्देशन में बस्तर में चल रहे कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन की दिशा में किए जाने वाले दूरदर्शी व जमीनी रचनात्मक कार्यों ने बस्तर का वास्तविक चेहरा बहुत ही अधिक बदला है। इसी कड़ी में अबुझमाड़ जैसे सैकड़ों वर्षों से परित्यक्त क्षेत्र का विकास का युगकालीन इतिहास रचने वाली टामन सिंह सोनवानी की टोली ने भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में एक अनोखा दिन रच दिया।

    अबुझमाड़ के बच्चे कल राष्ट्रपति से मिले, राष्ट्रपति भवन में कई घंटे रहे, राष्ट्रपति जी के व्यक्तिगत पुस्तकालय व दरबार हाल सहित पूरा राष्ट्रपति भवन तसल्ली से देखा। राष्ट्रपति महोदय ने बच्चों के स्वागत सत्कार के लिए विशेष अधिकारी को उत्तरदायित्व दिया।

    अबुझमाड़ के आदिवासी बच्चे भारत के राष्ट्रपति भवन में

    आस्ट्रेलिया से मेरी बच्चों से टेलीफोन के माध्यम से बात हुई, बच्चे इतने अधिक खुश थे कि मैं उनकी खुशी को किन शब्दों में बयान करूं समझ नहीं आ रहा। बच्चों ने बताया कि उन्होंने कितने प्रकार के व्यंजन खाए, कैसे राष्ट्रपति भवन घूमे, राष्ट्रपति भवन में क्या-क्या देखा, राष्ट्रपति महोदय से किस प्रकार बात की, आदि-आदि।

    भारत के राष्ट्रपति के साथ टामन सिंह सोनवानी, डा० संतोष कुमार देवांगन, अबुझमाड़ के बच्चे व अन्य अधिकारी गण।

    बच्चों के लिए स्वादिष्ट व्यंजनों के स्वाद से बड़ी खुशी इस बात की थी कि उनके अपने देश के राष्ट्रपति ने उनको उस विशिष्ट स्थान पर भोजन कराया जहां विदेशों से आने वाले राष्ट्राध्यक्ष जैसे विशिष्ट अतिथिगण भोजन करते हैं। अपने देश के राष्ट्रपति से इतना आदर व स्नेह प्राप्त कर बच्चे गदगद हैं।

    मुझे आशा है कि इस यात्रा से इन बच्चों में इतना आत्मविश्वास व उत्साह भर जाएगा कि वे अपने जीवन में महान कार्य करेंगें और अपने क्षेत्र का विकास करने व लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना अकल्पनीय योगदान देंगें।

    इस अनोखे दिन व घटना के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह व उनकी सलाहकार टोली, बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी, नारायणपुर के पूर्व पुलिस अधीक्षक अमित तुकाराम कांबले, वर्तमान पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा व वर्तमान अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी डा० संतोष कुमार देवांगन को बधाई व शुभकामनाएं। नारायणपुर के जिलाधिकारी टामन सिंह सोनवानी व उनकी टोली को विशेष बधाई।

    भारत के राष्ट्रपति महोदय को भारत के लोगों की ओर से आभार व बच्चों को उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • 500 और 1000 के नोट समाप्त करने से अधिकतम 3% काला धन आ सकता है बाहर

    के० एन० गोविंदाचार्य


    प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़, निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

    अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलु उत्पाद (GDP) के लगभग 20% अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी। वहीँ 2000 के समय वह 40% तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20% तक पहुंची है। 2015 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना। इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है।

    रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86% था। अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3% होता है!

    प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहाँ है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु (अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं। इसके आलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चूका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फरक नहीं पड़ेगा।

    अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है, इन्हें काला धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सीखाने वाले मिल जाते हैं। इसीप्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे। 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3% है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य ।

     

    अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3% ही बाहर आ पायेगा और 1% से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं। केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आँख में धूल झोंकना है। उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग।

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  • आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ

    त्रिभुवन


    आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ।

    महाभारत में एक एक श्लोक है : श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्ममें मरना भी कल्याणकारक है, पर परधर्म तो भय उपजानेवाला है।

    आखिरी ऐसा क्या होता है कि पूंजा गोकुलदास मेघजी का गुजराती परिवार इस्लाम अपना लेता है और भारत का खंडित करके एक नया देश पाकिस्तान बना लेता है। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, इस पाकिस्तान से एक बांग्लादेश भी निकलता है। यह इतिहास की बात है। अभी समीचीन भी नहीं है, लेकिन बहुत गंभीरता से साेचने की बात है। आप जिन्ना या पूंजा परिवार को विभीषण या जयचंद कुछ भी कहें, लेकिन इस बदलाव ने भारत को बहुत क्षति पहुंचाई है।

    देश में जिस तरह की चर्चा इन दिनों चल रही है और जैसे नारेबाजियां और किलेबंदियां हो रही हैं, उनमें क्या यह आत्मविश्लेषण का विषय नहीं है कि एक सुशिक्षित व्यापारिक परिवार ने महाभारत और श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को छोड़कर कुरआन की शिक्षा को अपनाया। यह प्रश्न परेशान करने वाला है। आप यह पोस्ट लिखने के लिए मुझे या धर्म बदलने के लिए जिन्ना परिवार को गाली दे सकते हैं। लेकिन मेरा विनम्र अनुराध है कि कई बार आत्मविश्लेषण और आत्मावलोकन संभवत: बहुत उपयुक्त और समीचीन होता है। आख़िर कुछ तो कारण रहा होगा कि पूंजा जैसा गौरवशाली नाम बदल गया। मीठी बाई जैसा शुद्ध भारतीय संस्कारशील नाम तिरोहित हो गया।

     


    credits : Tribhuvan's facebook wall

  • जीएसटी में तंबाकू पर 26 प्रतिशत की प्रस्तावित सिन रेट राजस्व और जन स्वास्थ्य पर डालेगी नकारात्मक असर : 40 प्रतिशत से कम की सिन रेट से तंबाकू उपयोगकर्ताअेां की संख्या में होगी बढ़ोतरी

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    मुंबई, 1 नवंबर।

    विश्व भर में तंबाकू उपभोक्ताओं की संख्या के मामले भारत दूसरे स्थान (27.5 करोड या भारत के 35 प्रतिशत व्यस्क) पर है। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हर साल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर जाते हैं। जिसमें 72 हजार नागरिक राजस्थान के भी शामिल है। तंबाकू सेवन के कारण देश को स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक आर्थिक खर्च वहन करना पडता है। हाल ही में दिल्ली में हुई जीएसटी की बैठक में 26 प्रतिशत की सिन रेट (तंबाकू इत्यादि उत्पादों पर लगने वाला कर)  का प्रस्ताव दिया गया है, जबकि राजस्थान में सभी तंबाकू उत्पादों पर 65 प्रतिशत टैक्स है।

    इस बात पर निश्चित तौर पर एक अहम आम सहमति है कि तंबाकू जैसी जो चीजें समाज के लिए हानिकारक हैं और “सिन” के रूप में वर्गीकृत की गई हैं, उनपर जीएसटी के तहत उच्च दर पर कर लगाया जाना चाहिए। प्रमुख आर्थिक सलाहकार रिपोर्ट में ऐसी सिफारिश की गई है। उसमें सिगरेट, बीडी और चबाने वाले तंबाकू समेत सभी तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत जीएसटी सिन रेट लगाने की बात कही गई है।

    20 अक्तूबर को संपन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में इससे कहीं कम यानी 26 प्रतिशत की सिन रेट का प्रस्ताव दिया गया है, जिसका देश के राजस्व के साथसाथ उसके जन स्वास्थ्य पर भी बड़ा असर पडेगा। इन दोनों पर ही गंभीरता से गौर किया जाना जरूरी है। सिन टैक्स के पीछे के दो तार्किक कारण हैं। पहला तार्किक कारण तंबाकू जैसे उत्पादों के कारण समाज को होने वाले नुकसान के लिए भरपाई है और दूसरा कारण इन उत्पादों की कीमत बढाना और इनका इस्तेमाल घटाना है। 26 प्रतिशत की दर इन दोनों ही उद्देश्यों को विफल कर देगी। यह तंबाकू से मिलने वाले मौजूदा राजस्व को कम कर देगी और असल में तंबाकू उत्पादों को खास तौर पर बच्चों एवं युवाओं समेत कमजोर वर्ग के लोगों को आदतन बना देगी, जिससे इन उत्पादों के सेवन को बढावा मिलेगा।

    आईआईटी जोधपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ.रीजो जॉन के अनुसार, “यदि सरकार जीएसटी के बाद तंबाकू उत्पादों पर मौजूदा आबकारी शुल्क को बनाए भीरखती है तो भी 40 प्रतिशत की जीएसटी सिन रेट की तुलना में 26 प्रतिशत की सिन रेट लगाना तंबाकू कर के कुल राजस्व को लगभग पांचवें हिस्से (17प्रतिशत या मोटे तौर पर 10,510 करोड रूपए) तक घटा देगा। स्पष्ट तौर पर, 26 प्रतिशत की सिन रेट तंबाकू के लिए राजस्व निरपेक्ष स्थिति बनाए रखने केलिए जरूरी दर से कहीं कम होगी। चूंकि अधिकतर तंबाकू उत्पादों पर औसत वैट की दरें खुद ही 26 प्रतिशत से ज्यादा हैं, ऐसे में 26 प्रतिशत की सिन रेट सभी तंबाकू उत्पादों पर कर का बोझ महत्वपूर्ण तरीके से कम कर देंगी।” उन्होने बताया कि तंबाकू का सेवन देश पर भारी स्वास्थ्य एवं आर्थिक खर्च डालता है। तंबाकू के सेवन के कारण होने वाली बीमारियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्च वर्ष 2011 में 1.04 लाख करोड रूपए या भारत की जीडीपी का 1. https://www.caasimada.net 16 प्रतिशत था।

    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्रोफेसर और कैंसर सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी के अनुसार, “जीएसटी की कहीं कम दर सभी तंबाकू उत्पादों को युवाओं और अन्य कमजोर तबकों के लोगों के लिए कहीं ज्यादा आदतन बना देगी। इसके परिणामस्वरूप तंबाकू का प्रकोप और ज्यादा बढ जाएगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बहुत बढ जाएगा और उत्पादकता में गिरावट आएगी। इससे निश्चित तौर पर प्रति वर्ष कैंसर से मरने वालों की संख्या बढेगी, जो किसी भी देश के लिए अच्छी खबर नहीं है। डा.चतुर्वेदी ने अपील है कि सरकार को तंबाकू उत्पादों पर उच्च् दर पर कर लगाना चाहिए ताकि लोगों को इसके सेवन के लिए हतोत्साहित किया जा सके।”

    लगभग 48 प्रतिशत पुरूष और 20 प्रतिशत महिलाएं (व्यस्क जनसंख्या का 35 प्रतिशत) तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें से कम से कम 10 लाख लोग हरसाल तंबाकू से जुडी बीमारियों से मर रहे हैं। तंबाकू के बाजार में 48 प्रतिशत हिस्सेदारी बीडी की, 38 प्रतिशत चबाने वाले तंबाकू की और 14 प्रतिशत हिस्सेदारी सिगरेट की है। इसलिए यह बात स्पष्ट है कि इन मौतों के लिए बीड़ीं बडी जिम्मेदार हैं।

    “मौजूदा तंबाकू कर तंबाकू उत्पादों की विभिन्न किस्मों (जैसे बीड़ीें, धुंआरहित तंबाकू और सिगरेटों) के बीच भेद करता है। नई जीएसटी प्रणाली में भी कमजोर लोगों को एक तरह से कर मुक्त बीड़ी बेचना जारी रखने से यह सुनिश्चित होगा कि गरीब लोग गरीबी और खराब स्वास्थ्य के दुष्चक्र में फंसे रहें। इसकी नियमित लत के कारण वह तंबाकू पर ज्यादा खर्च करने के लिए प्रेरित होते हैं और भोजन, स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा पर कम खर्च करते हैं। हम केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करतें है कि बीडी समेत तंबाकू की सभी किस्मों पर जीएसटी प्रणाली के तहत 40 प्रतिशत का कर लगाया जाए ताकि लोगों को इसके बुरे प्रभाव से बचाया जा सके।”

    “धुंए वाले 85 प्रतिशत तंबाकू का सेवन बीड़ी के रूप में किया जाता है, तंबाकू संबंधी 10 लाख मौतों का एक बडा प्रतिशत(5.8 लाख लोग) बीडी के सेवन के कारण है। इसलिए अधिकतम कर लगाने के लिए सिन प्रोडक्ट्स की उच्चतम श्रेणी में बीड़ी को रखकर न सिर्फ लाखों गरीब भारतीयों की जिंदगी ही बचाई जा सकती है बल्कि यह समाज के विभिन्न तबकों के बीच स्वास्थ्य के भारी अंतर को भी कम करने में मदद मिल सकती है। सरकार को इन मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर देखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तंबाकू की विभिन्न किस्मों के बीच कोई अंतर न किया जाए और उन पर उच्चतम संभावित दरों का कर लगाया जाए ताकि हमारे सबसे कमजोर तबकों के लोगों को इसका शिकार बनने से बचाया जा सके।”

    करीब 27.5 करोड़ भारतीय तंबाकू का सेवन करते हैं और इनमें एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें बचपन में ही इसकी लत लग जाती है। ग्लोबल एडल्टटोबेको के सर्वे के अनुसार तंबाकू शुरु करने की उम्र 17 साल है वहीं किशोरियों में यह आयु महज 13 साल है। ग्लोबल यूथ टोबेको के सर्वे में सामने आया किभारत के 20 प्रतिशत बच्चे तंबाकू के उत्पादों का प्रयोग करते हैं। 5500 बच्चे, किशोर प्रति दिन तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। राज्य में हर रोज औसतन350 नए बच्चे तंबाकू का सेवन प्रारंभ करते हैं। प्रदेश में तंबाकू की लत 32 प्रतिशत लोगों में है तथा राजस्थान में करीब 72 हजार लोग इसी कारण दम तोड़ देते है।

    मुख के कैंसर के कारण मौत का ग्रास बने महाराष्ट्र के पूर्व गृह एवं श्रम मंत्री सतीश पेडनेकर की पत्नी श्रीमति सुमित्रा पेडनेकर ने कहा, मैंने तंबाकू के कारण अपने पति को एक छोटी उम्र में खो दिया। मैं उनकी एक गलत निजी पसंद के कारण कष्ट उठा रही हूं। मुझे और मेरी दो बेटियों को न सिर्फ भावनात्मक कष्ट उठाना पडा बल्कि हम आर्थिक तौर पर भी टूट गए थे। कोई भी विधवा और अनाथ बनाने वाले इस कारखाने को सब्सिडी देने की सोच भी कैसे सकता है? सरकार ऐसे उद्योग को सहायता देती नहीं दिखाई देनी चाहिए कि , जो भारी मुनाफा जुटाने के लिए हर साल 10 लाख परिवारों को तबाह कर देता है।”

    मौजूदा परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान आबकारी कर के साथ 40 प्रतिशत की सिन रेट और तंबाकू उत्पादों पर कर लगाने के राज्य के अधिकार जनस्वास्थ्य एवं राजस्व के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति हैं। इससे हमें न सिर्फ तंबाकू पर मौजूदा कर के बोझ के प्रबंधन में मदद मिलेगी बल्कि यह और अधिक भारतीयों को जिंदगी पर खतरा पैदा करने वाली बीमारियों का शिकार बनने एवं गरीबी के अनवरत चक्र में फंसने से भी बचाएगा।