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  • अनुशासन कि आड़ में कहीं शोषण तो नहीं

    डा० नीलम महेंद्र


     

    भ्रष्टाचार जिसकी जड़ें इस देश को भीतर से खोखला कर रही हैं उससे यह देश कैसे लड़ेगा? यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काफी अरसे बाद इस देश के बच्चे बूढ़े जवान तक में एक उम्मीद जगाई है। इस देश का आम आदमी भ्रष्टाचार और सिस्टम के आगे हार कर उसे अपनी नियति स्वीकार करने के लिए मजबूर हो चुका था,उसे ऐसी कोई जगह नहीं दिखती थी जहाँ वह न्याय की अपेक्षा भी कर सके। लेकिन  आज वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा रहा है।

    सोशल मीडिया नाम की जो ताकत उसके हाथ आई है उसका उपयोग वह सफलतापूर्वक अपनी आवाज प्रधानमंत्री तक ही नहीं, पूरे देश तक पहुँचाने के लिए कर रहा है। देखा जाए तो देश में इस समय यह एक आदर्श स्थिति चल रही है जिसमें एक तरफ प्रधानमंत्री अपनी मन की बात देशवासियों तक पहुंचा रहे हैं तो दूसरी ओर देशवासियों के पास भी इस तरह के साधन हैं कि वे अपनी मन की बात न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि पूरे देश तक पहुंचा पा रहे हैं।

    शायद आम आदमी के हाथ आए सोशल मीडिया नामक इस हथियार के सहारे ही प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर काबू कर पांए  क्योंकि सिस्टम तो करप्ट है ही और जो लोग सिस्टम का हिस्सा हैं वे अपनी आदतों से मजबूर हैं तो कोई मजबूरी ही उन्हें अपनी सालों पुरानी आदतों से मुक्त कर पाएगी!

    हाल ही में बी.एस.एफ  के जवान तेज बहादुर यादव जो ऐच्छिक सेवा निवृत्ति के तहत 31 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं  जाते जाते देश के सामने सेना में सैनिकों की दशा पर प्रश्नचिन्ह लगा गए। कटघड़े में न सिर्फ  वह सेना है  पर जिस पर पूरा देश गर्व करता है बल्कि सरकार के साथ साथ पूरा विपक्ष भी है क्योंकि आज जो विपक्ष में हैं कल वे ही तो सरकार में थे।

    तो 2010 में ही जब कैग ने अपनी रिपोर्ट में पाक और चीन सीमा पर तैनात जवानों को मिलने वाले  भोजन, उसकी  गुणवत्ता  और  मात्रा में भी निम्न स्तर के होने की  जानकार दी थी तो तब की सरकार ने, या फिर आज की सरकार ने 2016 की कैग की रिपोर्ट पर क्या एक्शन लिया?

    कटघड़े में तो सभी खड़े हैं।

    खैर उन्होंने अपनी और अपने साथियों की आवाज को प्रधानमंत्री तथा देशवासियों तक पहुंचाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया।
    ‘भूखे भजन न होए गोपाला, यह रही तेरी घंटी माला’ की तर्ज पर उन्होंने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई। उनका वीडियोसोशल मीडिया पर इतना  वाइरल  हुआ कि उनकी जो आवाज उनके सीनियर अधिकारी नहीं सुन पा रहे थे या सुनना नहीं चाह रहे थे उस आवाज को आज पूरा देश सुन रहा है।

    वह आवाज अखबारों की हेडलाइन और चैनलों की प्राइम टाइम कवरेज बन गई है। जो काम 6 सालों से कैग की रिपोर्ट नहीं कर पाई वो एक सैनिक की आवाज कर गई क्योंकि इसे सुनने वाले वो नेता या अधिकारी नहीं थे जिन्हें एक जवान के दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि इसे सुनने वाला था वो आम आदमी जो एक दूसरे के दर्द को न सिर्फ समझता है बल्कि महसूस भी करता है। और चूँकि लोकतंत्र में सत्ता की चाबी इसी आम आदमी के हाथ है तो जो दर्द इस आदमी ने महसूस किया है उसका इलाज शायद सत्ताधारियों को अब ढूँढना होगा। खबर के वाइरल होते ही सरकार हरकत में आई जांच के आदेश दिए गए, सरकार अपनी जांच कर रही है और बी.एस.एफ. अपनी। जांच शुरू हो चुकी है और साथ ही आरोप प्रत्यारोंपों का दौर भी। कुछ ‘राष्ट्रवादियों’ का कहना है कि इस प्रकार सेना की बदनामी देश के हित में नहीं है और जो सैनिक दाल पर सवाल उठा रहा है पहले उसका इलाज जरूरी है। उन सभी से एक सवाल।

    देश क्या है? हम सब ही तो देश बनाते हैं। सेना क्या है? यह सैनिक ही तो सेना बनाते हैं। जिस देश की सेना अपने सैनिक के मूल भूत अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती वह सैनिक उस देश की सीमओं की रक्षा कैसे करेगा? जिस देश की सेना में उसके सैनिक की रोटी तक भ्रष्टाचार के दानव की भेंट चढ़ जाती हो वह भी अपने ही उच्च पद के अधिकारियों के कारण उस देश में हम  किस राष्ट्रवाद की बातें करते हैं ?
    जो लोग सैनिक की इस हरकत को अनुशासनहीनता मान रहे हैं वे स्वयं दिल पर हाथ रखकर कहें कि ऐसे दुर्गम स्थान पर जहाँ जीवित रहने के लिए ही प्रकृति से पल पल संघर्ष  पड़ता है,  वहाँ जो भोजन वीडियो में दिखाया गया है उस भोजन के साथ वे 11 घंटे की ड्यूटी दे सकते हैं।
    जवान द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच जरूर की जानी चाहिए। अगर आरोप सही हैं तो दोषी अधिकारियों को सजा मिले और सैनिकों को न्याय। लेकिन अगर आरोप झूठे हैं तो सेना के कानून के तहत उस जवान पर कार्यवाही निश्चित ही होगी।

    दरअसल भ्रष्टाचार केवल सरकार के सिविल डिपार्टमेंट तक सीमित हो, ऐसा नहीं है, सेना भी इससे अछूती नहीं है। आपको शायद यह जानकार  आश्चर्य हो कि आजाद भारत में  जो सबसे पहला घोटाला सामने आया था वो 1955 में सेना का ही जीप घोटाला था। उसके बाद 1987 में बोफोर्स घोटाला, 1999 ताबूत घोटाला, 2007 राशन आपूर्ति घोटाला, 2009 आदर्श घोटाला, 2013अगस्तावेस्टलैंड घोटाला, यह सभी घोटाले सेना में हुए हैं। रिटायर्ड एयर चीफ एस पी  त्यागी को हाल ही में सीबीआई द्वारा अगस्तावेस्टलैंड घोटाले की जांच के अन्तर्गत  हिरासत में लिया गया है।

    इसके अलावा अभी कुछ समय पहले सेना में प्रोमोशन के सिलसिले में एक नया स्कैम भी सामने आया था जिसके लिए आर्म्ड फोर्स  ट्रिब्यूनल ने रक्षा मंत्रालय और सेना को सिस्टम में वायरस की तरह घुसते भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए कहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक लेफ्टानेंट जनरल का प्रोमोशन भी रद्द कर दिया था।

    अगर हम वाकई में राष्ट्र हित के विषय मे सोचते हैं तो हमें कुछ ख़ास लोगों द्वारा उनके स्वार्थ पूर्ति के उद्देश्य से बनाए गए स्वघोषित आदर्शों और कुछ भारी भरकम शब्दों के साये से बाहर निकल कर स्वतंत्र रूप से सही और गलत के बीच के अंतर को समझना होगा। एक तथ्य यह भी है कि सेना में डिसिप्लिन सर्वोपरि होता है। हर सैनिक को ट्रेनिंग का पहला पाठ यही पढ़ाया जाता है कि अपने सीनियर की हर बात हर औडर को बिना कोई सवाल पूछे मानना है और यह सही भी है। बिना डिसिप्लिन के आर्मी की कल्पना भी असम्भव है। आप सोच कर सकते हैं कि युद्ध की स्थिति में कोई जवान अपने सीनियर की बात मानने से मना कर दे तो ऐसी इनडिसिप्लिनड  सेना  के कारण उस देश का क्या हश्र होगा। लेकिन एक सत्य यह भी है कि इसी अनुशासन की आड़ में काफी बातें जवान न तो बोलने की हिम्मत जुटा पाते हैं न विरोध कर पाते हैं।

    तो अनुशासन अपनी जगह है लेकिन डिसिप्लिन की आड़ में शोषण न तो  सैनिक के लिए अच्छा है न सेना के लिए।

  • क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले?

    त्रिभुवन


    क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले? बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने बाकायदा विडियो डालकर बुरे खाने पर जो प्रश्न उठाए हैं, उन्होंने बीएसएफ के अफ़सरों और केंद्रीय गृह मंत्रालय की उस व्यवस्था के रुपहले झूठ की कलई खोल दी है।

    अब बीएसएफ के आईजी और डीआईजी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय तक ने खाने-पीने की चीज़ों को दुरुस्त करने के बजाय खुले तौर पर असलियत सामने लाने वाले तेज बहादुर को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। यह भारतीय बलों की अंदरूनी हक़ीक़त है।

    बीएसएफ के एक जवान की हूक और तड़प ने पूरी व्यवस्था के भीतरी कोढ़ को सामने ला दिया है। यह सच मैंने सीमा की रिपोर्टिंग करते हुए बहुत नज़दीक से देखा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों के आला अफ़सर किन रंगीनियों और रानाइयों में रहते और मौज-मज़ा करते हैं और आम सैनिक किस तरह हाथों को खंजर बनाकर सेना या बीएसएफ के ताज़ को दमकाते हैं।

    मैंने स्वयं देखा है कि साधुवाली, सूरतगढ़ और लालगढ़ छावनी से सेना के अधिकारी किस तरह ट्रकों को सुनसान इलाकों में ले जाकर डीजल बेचा करते थे। मैं जिन दिनों एक साप्ताहिक अख़बार निकाला करता था, उन दिन जहां से कागज़ खरीदता था, वहां से सेना के अधिकारी एक पचास पैसे वाले स्कैच पैन को दस रुपए में खरीदने का बिल लिया करते थे। बीएसएफ के बटालियनों में जब कभी किसी कार्यक्रम के लिए गए, अफ़सर माैज-मजा करते थे और सिपाही तेज बहादुर की तरह ही कलपते थे, लेकिन उनकी सुनता कौन है?

    आपने बीएसएफ के डीअाईजी मान का तर्क तो सुना ही होगा कि तेज बहादुर निजी कारणों से नाराज है। तेज बहादुर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। इस देश में जो भी व्यक्ति सच कहता है या किसी ताकतवर संस्था के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसे पागल ही करार दिया जाता है। इस देश का यही ऐतिहासिक सच है। आप सेना के, सुप्रीम कोर्ट के और प्रधानमंत्री सहित किसी अन्य ताकतवर संस्था के खिलाफ़ कुछ बोलेंगे तो कह दिया जाएगा कि आप अमेरिका के या किसी पाकिस्तान एजेंसी के एजेंट हैं!

    तेज बहादुर पागल ही तो है, जिसने यह जानते हुए कि उसका और उस जैसे लाखों जवानों का हर रोज़ जिन चंगेज़ों और नादिरशाहों से वास्ता पड़ता है, वे हेलिकॉप्टरों और युद्धक विमानों की खरीद का सौदा करते हुए तीन-चार सौ करोड़ रुपए से यों ही गिफ्ट में कमा लेते हैं। ऐसे लोगों के पास किसी तेज बहादुर की दाल का पानी मापने और उसमें कितने दाने हैं, यह गिनने की भला फ़ुर्सत होगी? तेज बहादुर पागल नहीं तो क्या है, जो यह जानते बूझतेऔर देखते हुए एक विडियो वायरल करता है कि उसका सामना कितने ही सुल्ताने-ज़ाबिर से हर रोज़ होगा।

    तेज बहादुर तो बीएसएफ का जवान है और वह जब बीएसएफ के अफ़सरों पर प्रश्न भर उठाता है। बीएसएफ के आला अफ़सर उसे मनोरोगी भी साबित कर सकते हैं, लेकिन उस मीडिया को क्या कहेंगे, जिसमें सुधीर चौधरी जैसे वज्रमूर्ख और सरेआम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोग ऐसे राजनीतिक दलों को पाकिस्तानी एजेंट घोषित करने लगते हैं, जो केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री के खि़लाफ़ एक होने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार रखते हैं।

    ऐसा ही दौर 1975 से 1977 के दौरान आया था जब इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा का नारा सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े सुधीर चौधरी लगाया करते थे। भारत में सुलतानों से मुहब्बत का दौर आज का नहीं है। यह बहुत पुराना रोग है। सुलतानों के इश्क में पागल हुए लोग ऐसे होते हैं, जो स्वतंत्रता के नूर और अभिव्यक्तियों के चंद्रमा को फेंककर सुलतान के जूते झाड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।

    अब तो क्या मीडिया और क्या सेना, सभी एक ही धारा में बह रहे हैं। क्या संत और क्या मतिमंत। भारत में कभी एक दौर था जब कुंभनदास जैसे संत हुए थे। जिस समय बड़े बड़े राजे-महाराजे अक़बर बादशाह के दरबार में हाजिर हो चुके थे तो कुंभनदास को अक़बर बादशाह ने अपनी राजधानी सीकरी में बुलाया और एक पद सुनाने को कहा तो बाबा कुंभनदास ने टिकट या सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी। वे बोले : ‘संतन को कहा सिकरी सो काम। आवत जात पनहियाँ टूटी। बिसरि गयो हरि नाम। जिनको मुख देखे दु:ख उपजत। तिनको करिबे परी सलाम!’ अरे ओ अक़बर बादहशाह, मुझ संत को तेरी सीकरी से क्या लेना देना।यहां आया और यहां से पैदल जाऊंगा, क्योंकि मैं हाथी घोड़े तो चढ़ता नहीं, मेरी पन्हैयां यानी जूतियां टूट गई हैं। जो आने-जाने में देर हुई, उतने समय में मैं ईश्वर चिंतन करता। और बादशाह की तो शक्ल देखकर तो दिन खराब हो जाता है और देख मेरा दुर्भाग्य कि तुझे सलाम करना पड़ रहा है। और एक आज के संत हैं। निकृष्टता और पतन के चरम पर।

    लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर आम आदमी तक जब इंदिरा सरकार के लौहावरण के खिलाफ जनयुद्ध में उतरा तो सत्ता प्रतिष्ठानों ने उन सबको विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करने वाला घोषित करके जेलों में डाल दिया। ये आरोप कम्युनिस्टों के एक खेमे पर भी लगे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं पर भी। ये आरोप भारतीय जनता पार्टी के पुराने संस्करण भारतीय जन संघ पर भी मंढे़ गए और लोहियावादियों-समाजवादियों पर भी। इंदिरा गांधी और उनके मूर्ख और आत्मघाती प्रशंसकों ने विरोधियों को क्या-क्या नहीं कहा। लेकिन अफ़सोस आज नरेंद्र मोदी के भक्त और राष्ट्रीय स्वयं सेवक के अनुयायी उस इंदिरा मार्ग का अनुसरण बड़े गर्व से कर रहे हैं।आज उन्हें उन अंधेरों में नूर ही नूर नज़र आ रहा है, जिनके लिए वे कभी जेल गए थे।

    लिहाजा, बीएसएफ के जिस साहसी जवान ने विडियो डालकर जिस सच को देश के सामने ला दिया है, वह बीएसएफ ही नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय तक को पच नहीं रहा है। बेहतर ये है कि बीएसएफ और गृह मंत्रालय सेना और बीएसएफ के जवानों की जमीनी खबर ले और सच को सच माने। ऐसे साहसी सैनिक को दंडित करने के बजाय भ्रष्टाचार से सड़ती व्यवस्था को दुरुस्त करे। यह ऐसा ही समय है जब सेना के अफ़सरों के खिलाफ जवानों को अपनी बात रखने का हक़ और अधिकार हो और सुप्रीम कोर्ट अपनी पवित्रता से बाहर आकर आंख में आंख डालने का साहस करे। क्या इस बहादुर देश को सवालों से डरा हुआ सुप्रीम कोर्ट चाहिए? क्या इस देश को ऐसी सेना चाहिए, जो प्रश्नों से डरे? alprazolam for sleep online https://www.veterinary-practice.com/ अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट साहस दिखाए और कंटेप्ट ऑव कोर्ट जैसे दकियानूसी, अलोकतांत्रिक और बेसिरपैर के कानून को अब तिरोहित कर दे। अब तूफ़ाने तरब का वक्त गया सत्ता की शक्तियो!

    पवित्रता यही है कि पवित्रता के अलावा कुछ भी पवित्र नहीं है। न सेना, न अर्धसेना, न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति, न सुप्रीम कोर्ट और न प्रभु स्वयं। अब वह दौर बीत चुका है जब सेना, अदालतें और बादशाहतें खलीफा थीं। अब खलीफा है तो वह जनता है। लोक है। इस लोक से ऊपर कुछ नहीं है। आप जिस लोक के लिए हैं, आप जिस जनता के लिए हैं, आप जिस नागरिक के लिए हैं, उसे यह अधिकार है कि वह आप पर सवाल उठाए। सवालों से बचने की कोशिश करेंगे तो किसी से नहीं बच पाएंगे। जो सवाल से बचने की कोशिश करेगा, वह भ्रष्ट ही होगा। वह निकृष्ट ही होगा। तेज बहादुर ने अर्ध सैनिक बल की रसाेई की बदहाली का सवाल उठाया है, लेकिन यह सवाल बता रहा है कि देश और व्यवस्था के चूल्हे पर ज़ुल्म, झूठ और निकृष्ट पतन किस तरह पक रहे हैं। मैं बहादुर जवान तेज बहादुर के साहस को प्रणाम करता हूं। वह ज़ुल्मत-कदे में शम्म-ए-फ़रोज़ां लेकर दाखिल हुआ एक साहसी व्यक्ति है। हमें उसके साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।


    credits : Tribhuvan's facebook wall

  • नेता जी ने शायद ऐसा अन्त तो नहीं सोचा होगा

    डा० नीलम महेंद्र


    देश के सबसे बड़े प्रदेश  उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली राजनैतिक परिवार में कुछ समय से चल रहा राजनैतिक ड्रामा लगभग अपने क्लाइमैक्स पर पहुंच ही गया ( कुछ कुछ फेरबदल के साथ )। दरअसल यू पी के  होने वाले चुनावों और मुलायम सिंह की छवि को देखते हुए  केवल उनके राजनैतिक विरोधी ही नहीं बल्कि लगभग हर किसी को उनकी यह पारिवारिक उथल पुथल महज एक ड्रामा ही दिखाई दे रहा था , वो क्या कहते हैं  न महज एक पोलीटिकल स्टंट आखिर वो पटकथा ही क्या जिसके केंद्र में कोई रोमांच न हो  !

    सबकुछ ठीक ही चल रहा था। एक पात्र था  अखिलेश , तो दूसरा  शिवपाल और जिस  को वो दोनों ही पाना चाहते थे , वह थी सत्ता की शक्ति। पटकथा भी बेहद सधी हुई , एक को नायक बनाने के लिए घटनाक्रम लिखे गए तो दूसरा खुदबखुद ही दर्शकों की नजरों में खलनायक बनता गया । 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर आज तक पार्टी पर नेताजी का पूरा कंट्रोल था ।भले ही अपने भाईयों के साथ उन्होंने इसे सींचा था लेकिन ‘नेताजी  ‘ तो एक ही थे जिनके बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता था। यह उन्हीं की पटकथा का कमाल था कि आज अखिलेश को पार्टी से निकाले जाने के बाद पार्टी के 200 से भी अधिक लगभग 90%  विधायक मुलायम शिवपाल नहीं अखिलेश के साथ हैं 2012 के चुनावी दंगल  में उन्होंने अखिलेश को पहली बार जनता के सामने रखा।

    मुलायम की कूटनीति और अखिलेश की मेहनत से समाजवादी पार्टी की साइकिल ने वो स्पीड पकड़ी कि सबको पछाड़ती हुई आगे निकल गई। शिवपाल की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं के विपरीत अखिलेश को न सिर्फ सी एम की कुर्सी मिली बल्कि जनता को उनका युवराज मिल गया। उनके पूरे कार्यकाल में जनता को यही संदेश गया कि वे एक ऐसे नई पीढ़ी के युवा नेता हैं जो एक नई सोच और जोश के रथ पर यूपी को विकास की राह पर आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं। वे ईमानदारी और मेहनत से प्रदेश के बुनियादी ढांचे में सुधार से  लाकर आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध  हैं  और अपनी इस  छवि निर्माण में  वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं।
    जिस रिकॉर्ड समय में आगरा लखनऊ एकस्प्रेस हाईवे बनकर तैयार हुआ है वह यूपी की नौकरशाही के इतिहास को देखते हुए अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। आज लखनऊ मेट्रो केवल अखिलेश का  ड्रीम प्रोजेक्ट नहीं रह गया है बल्कि उसने यूपी के हर आमोखास की आँखों में भविष्य के सपने और दिल को उम्मीदों की रोशनी से भर दिया है। अखिलेश के सम्पूर्ण कार्यकाल में मुलायम सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि  अखिलेश की यही छवि निर्माण रही।

    किसी भी नेता को जनता का इससे अधिक प्यार क्या मिलेगा कि विकास का जो भी काम हो रहा है उसका क्रेडिट लेने वाला वह अकेला हो लेकिन जो असफलताएं एवं अनुपलब्धियाँ हों वह किसी और के कारण हों । मसलन प्रदेश में गुंडा राज हो या भू माफिया हो अथवा कानून व्यवस्था पर कमजोर पकड़ हो सब अपने चाचा और अपने पिता के आगे एक आज्ञाकारी पुत्र के कुछ बोल न पाने के कारण हो। सार्वजनिक मंचों पर पिता द्वारा अपमानित होकर भी हंसते रहना और कहना कि वो कौन सा बेटा है जो पिता की डाँट खाए बगैर बड़ा हुआ है या फिर चाचा के सामने बेबस हो जाना। यह सभी उस पटकथा का हिस्सा था जिसके पात्रों को यह सब जी रहे थे।

    असली कहानी तब शुरू होती है जब शिवपाल के कहने पर मुलायम ,आजम खान और अमर सिंह से हाथ मिलाते  हैं तो अखिलेश विद्रोह करते हैं। जनता के दिल में अखिलेश के लिए सहानुभूति की लहर दौड़ जाती है और उनकी साफ सुथरी छवि पर जनता की मुहर लग जाती है। फिर  एक दिन मुलायम सपा के उम्मीदवारों की लिस्ट शिवपाल के ‘दबाव ‘ में घोषित करते हैं जिनमें अखिलेश समर्थकों की कोई जगह नहीं है तो दूसरे ही दिन अखिलेश अपनी लिस्ट घोषित करते हैं। लोगों तक स्पष्ट संदेश जाता है कि मुलायम  शिवपाल के ‘दबाव ‘ में हैं न भाई को छोड़ पा रहे हैं न बेटे को । और चूँकि वह लिस्ट अपराधिक तत्वों तथा बाहुबलियों से भरी थी, अखिलेश को मंजूर नहीं थी और ‘साफ सुथरी राजनीति ‘ के लिए वे ‘परिवार ‘ से ऊपर ‘पार्टी ‘ को रखते हैं । यह  अलग बात है कि जो लिस्ट अखिलेश ने जारी की बाहुबली  उसमें भी कम नहीं थे।

    शिवपाल भले ही न जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं  (अखिलेश की छवि निर्माण में उनकी बलि ली जा रही है) ) लेकिन मुलायम भली भाँति जानते थे वे क्या कर रहे हैं । 2014 में उन्होंने जब अखिलेश को सी एम की कुर्सी दी थी तो कहा था कि प्रदेश बेटे के हाथों सौंप कर अब वह केंद्र में अपना ध्यान और शक्ति दोनों लगाएंगे। इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी किए , लालू के साथ मिलकर महागठबन्धन भी बनाया जो कालांतर में महाठगबन्धन ही साबित हुआ।

    2014 के चुनावों में जनता ने जब सब कुछ कीचड़ कर दिया और पूरे देश में कमल खिला दिया तो वे समझ गए कि केंद्र में उनके पास तो क्या पूरे विपक्ष के पास आज करने के लिए कुछ ख़ास नहीं है तो वापस प्रदेश में ध्यान लगाया लेकिन अब तक लगभग दो साल बीत चुके थे और समय के साथ उन्हीं की दी साइकिल पर बैठ कर बेटा काफी आगे निकल चुका था। जबकि वो प्रदेश से निकल कर केंद्र में जाने की चाह में बहुत पीछे जा चुके थे , हवा के बहाव में वे वहाँ भी खड़े नहीं रह पाए जहाँ पर वह थे।

    दिल्ली तो शुरू से ही दूर थी लेकिन सैफई भी छूट जाएगी इसे जब तक मुलायम समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। मुलायम सोचते थे कि आखिर तक कहानी में पटकथा वो ही चलती है जो लेखक लिखता है लेकिन शायद यह भूल गए कि फिल्म हो या कहानी उसकी पटकथा बेशक लेखक लिखता है लेकिन जिंदगी की पटकथा लिखने वाला तो एक ही है वो परमपिता परमेश्वर और उसके आगे अच्छे अच्छों की पटकथा फेल हो जाती है। जिन पात्रों और जिस पटकथा को ये सभी जी रहे थे उसके कैरेक्टर में सभी इतने इन्वोल्व हो गए कि कलाइमैक्स आते आते वे सभी अपने मूल व्यक्तित्व को भूल कर कैरेक्टर के रंग में रंग चुके थे। शिवपाल अब तक समझ चुके थे कि कुर्सी की डोर उनके हाथों से छूट चुकी है किन्तु हार नहीं मान रहे थे, अपने वफादारों को टिकट दिलवा कर हारी हुई लड़ाई जीतने की कोशिश रहे थे। अखिलेश को अब सत्ता पर किसी और का नियंत्रण  स्वीकार कतई नहीं था  और टिकट देने में स्वतंत्र हाथ चाहते थे।

    मुलायम जिन्होंने पटकथा लिखी थी और कहानी की शुरुआत में जो पात्र उनके हाथों की कथपुतली थे  आज अपनी अपनी डोर से मुक्त हो चुके थे। परदे के पीछे  अखिलेश और शिवपाल को यह याद दिलाने की उनकी हर कोशिश नाकाम होती गई कि वे सिर्फ कहानी के पात्र हैं डायरेक्टर तो स्वयं मुलायम हैं।  लेकिन न तो शिवपाल सुनने को तैयार थे और न ही अखिलेश। पार्टी परिवार और कहानी तीनों ही उनके हाथ से फिसल चुके थे  । जिस पटकथा के अन्त में अखिलेश शिवपाल को चारों खाने चित्त करके विजेता बनकर और मुलायम  एक बेबस भाई और पिता के बीच फंसे ‘ नेताजी ‘बन कर उभरते  जिन्हें जनता की सहानुभूति प्राप्त होती उसका अन्त अब बदल चुका था । बात चुनाव आयोग तक पहुँच गई । जिस अखिलेश ने यू पी के लोगों के दिलों के सहारे सत्ता तक की अपनी राह लगभग पक्की कर ली थी , आज उनका मुकाबला न सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद बदले हुए परिदृश्य से है बल्कि चुनाव आयोग तक पहुँच चुकी सपा की ही अन्दरूनी फूट से भी है । वो चिंगारी कब खेलते  खेलते लौ बन गई खुद मुलायम भी नहीं समझपाए । जो समाजवादी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने का माद्दा रखती थी आज कांग्रेस के साथ गठबंधन की ओर अग्रसर है।

    जिस राजनीति को मुलायम शतरंज कि बिसात समझ कर खेल रहे थे वे स्वयं उसका मोहरा बन जायेंगे यह तो शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा ।

  • आईए, करीना-सैफ के पुत्र तैमूर का स्वागत करें

    राम पुनियानी
    Rtd Prof, IIT Bombay

    हमारे समाज पर सांप्रदायिक मानसिकता की जकड़न भयावह है। हमारा समाज इतिहास को राजाओं के धर्म के चश्मे से देखता है। सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास की चुनिंदा घटनाओं और व्यक्तित्वों का इस्तेमाल, इतिहास का अपना संस्करण गढ़ने के लिए कर रही है। यही विचारधारा दोनों समुदायों के बीच घृणा के बीज बो रही है। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाते हैं तो हिन्दू संप्रदायवादी हमसे कहते हैं कि मुसलमानों से नफरत करो। इसी घृणा से उपजती है सांप्रदायिक हिंसा, जो कि अधिकांश मामलों में सोची-समझी साजिश के तहत भड़काई जाती है। इस हिंसा में मासूम लोग मारे जाते हैं और समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है, जिसका लाभ सांप्रदायिक ताकतें उठाती हैं। सांप्रदायिक शक्तियां अंतर्धामिक विवाहों और ऐसे सांस्कृतिक आचरणों की विरोधी हैं, जो विभिन्न धर्मों के लोगों को एक करते हैं। इन दिनों मुस्लिम पुरूष और हिन्दू महिला के बीच विवाह को ‘लव जिहाद’ कहा जाता है और यहां तक कि इस तरह के विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

    गत 20 सितंबर, 2016 को करीना कपूर और सैफ अली खान के पुत्र ने जन्म लिया। उन्होंने उसका नाम तैमूर (जिसे तिमूर भी उच्चारित किया जाता है) रखा। इसके बाद सोशल मीडिया पर बवाल मच गया। कई सांप्रदायिक तत्वों ने नवजात शिशु को कोसा। उनकी शिकायत यह थी कि बच्चे का नाम तैमूर क्यों रखा गया। तैमूर ने सन 1398 में दिल्ली पर आक्रमण कर लूटपाट की थी और बड़ी संख्या में आम लोगों की हत्या कर दी थी। यह दिलचस्प है कि उन दिनों दिल्ली पर तुर्की मुसलमान बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक का शासन था।

    तैमूर, चंगेज़ खान और औरंगजे़ब को भारत के मध्यकालीन इतिहास का खलनायक बताया जाता है और उन्हें आज के भारतीय मुसलमानों से जोड़ा जाता है। चंगेज़ खान मंगोल था और उसने मंगोल साम्राज्य की स्थापना की थी। वह मुसलमान नहीं वरन शेमनिस्ट था। उसने भी उत्तर भारत में लूटपाट और मारकाट की थी। औरंगजे़ब को एक ऐसे तानाशाह के रूप में देखा जाता है जिसने जज़िया लगाया, लोगों को ज़बरन मुसलमान बनाया और हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया। इन राजाओं का दानवीकरण तो किया ही जाता है, उनकी क्रूरताओं के लिए आज के भारतीय मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। यह नितांत हास्यास्पद है। आज के भारतीय मुसलमानों का तैमूर, औरंगजे़ब या चंगेज़ खान से कोई लेना-देना नहीं है। ये राजा अलग-अलग धर्मों के थे और उन्होंने अपने धर्म के लिए लड़ाईयां नहीं लड़ी थीं।

    सभी विजयी राजा, चाहे वे किसी भी धर्म या क्षेत्र के रहे हों, विजित इलाके में लूटपाट और मारकाट करते थे। इस लूटपाट को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए कई बार उनके दरबारी उसे धर्म से जोड़ देते थे। परंतु यह मानना भूल होगी कि किसी एक धर्म के राजा ही खूनखराबा और लूटमार करते थे। जिस युग की हम बात कर रहे हैं, उस युग में न तो कोई अंतर्राष्ट्रीय कानून था और ना ही राष्ट्रवाद की वह अवधारणा थी, जिससे हम आज परिचित हैं। राजा अपने साम्राज्य के मालिक हुआ करते थे और उनसे कोई प्रश्न पूछने की इजाजत किसी को नहीं थी। सभी धर्मों का पुरोहित वर्ग यह सिद्ध करने में लगा रहता था कि उनका राजा जो भी करता है, वह धर्म के अनुरूप है और उसे ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त है। उस समय भारत जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं थी और हर राज्य एक अलग देश था। हम सब जानते हैं कि बाबर को राणा सांगा ने आमंत्रित किया था ताकि वह बाबर के साथ मिलकर इब्राहिम लोधी को हरा सके। मुस्लिम राजाओं के दरबारों में उच्च पदों पर हिन्दू हुआ करते थे और यही बात हिन्दू राजाओं के बारे में भी सही थी।

    आज भारत में मुस्लिम राजाओं और ऐसे राजाओं, जो अपने नाम से मुसलमान लगते हैं, को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी ओर, शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह जैसे नायकों को हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का कहना था कि शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह के सामने एक राष्ट्रवादी बतौर गांधीजी बौने थे। जहां आज शिवाजी को एक महान राष्ट्रीय नायक के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है वहीं यह दिलचस्प है कि शुरूआत में देश के कुछ इलाकों, विशेषकर गुजरात व बंगाल में, शिवाजी को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्वीकार करने का खासा प्रतिरोध हुआ था। ये वे दो इलाके हैं जहां शिवाजी की सेनाओं ने लूटमार की थी और बेगुनाहों को कत्ल किया था। आज हालत यह हो गई है कि अगर कोई कहे कि शिवाजी की सेना भी लूटमार और मारकाट करती थी तो उसे ‘राष्ट्रीय नायक’ का अपमान बताया जाता है। बाल सामंत नामक एक सज्जन, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय बाल ठाकरे के नज़दीकी थे, ने अपनी पुस्तक ‘शिवकल्याण राजा’ में करीब 21 पृष्ठों के अध्याय में केवल शिवाजी की सेनाओं द्वारा की गई लूटमार का वर्णन किया है। उन्होंने डच व ब्रिटिश स्त्रोतों के हवाले से शिवाजी की सेना द्वारा बड़े पैमाने पर की गई लूटमार और हत्याओं का वर्णन किया है। अशोक ने कलिंग में किस तरह का कत्लेआम किया था और खून की नदियां बहाई थीं, यह हम सबको ज्ञात है। अधिकांश राजाओं ने या तो अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अथवा अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए युद्ध किए।

    सांप्रदायिक विचारधारा का बोलबाला बढ़ने के साथ ही इतिहास की विवेचना करने का तरीका भी बदल गया है। शिवाजी की सेना द्वारा की गई लूट को नरेन्द्र मोदी औरंगजे़ब की खज़ाने की लूट बता रहे हैं! मराठा सेनाओं द्वारा श्रीरंगपट्टनम के हिन्दू मंदिर को नष्ट किए जाने की घटना को सांप्रदायिक इतिहासकारों द्वारा छुपाया जाता है। सन 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम भी इतिहास को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने वालों की कारगुज़ारियों का शिकार हुआ है। जहां हिन्दुत्व चिंतक सावरकर उसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम बताते हैं वहीं इसी विचारधारा के एक अन्य बड़े झंडाबरदार गोलवलकर का कहना है कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसका नेतृत्व एक मुसलमान, बहादुरशाह ज़फर के हाथों में था, जो हिन्दू सिपाहियों को लड़ने के लिए प्रेरित न कर सका। हम सब जानते हैं कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि पंजाबियों और गोरखाओं ने अंग्रेज़ों का साथ दिया।

    सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास को तोड़नेमरोड़ने और उसके चुनिंदा हिस्सों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर अपना उल्लू सीधा करती है। कुछ लोगों ने तो सभी हदें पार करते हुए, सैफ अली खान और करीना कपूर के नवजात पुत्र को आतंकवादी और जिहादी तक बता डाला। सभी बच्चों का इस दुनिया में स्वागत किया जाना चाहिए। सैफ अली खान ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि किस तरह उनके विवाह को लव जिहाद बताया गया था और उसका विरोध हुआ था। एक ट्वीट में हिन्दू लड़कियों को यह चेतावनी दी गई है कि वे मुसलमान लड़कों से विवाह न करें क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगी तो वे किसी चंगेज़ खान या किसी तैमूर या किसी औरंगजे़ब को जन्म दे सकती हैं। विघटनकारी विचारधारा आखिर हमारी सोच को कितना नीचे गिराएगी।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • किसका दोष है यह

    डॉ नीलम महेंद्र


    पता नहीं यह दुर्भाग्य केवल उस नौजवान का है या पूरे देश का जिसके झोले में डिग्री , जेब में कलम लेकिन हाथ में झाड़ू और फावड़ा हो ।
    कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में चपरासी अथवा सफाई कर्मचारी के पद के लिए सरकार द्वारा आवेदन मांगें गए थे जिसमें आवश्यकता  368 पदों की थी और योग्यता , प्राथमिक शिक्षा तथा साइकिल चलाना थी। इन पदों के लिए जो आवेदन प्राप्त हुए उनकी संख्या  23 लाख थी जिनमें से 25000 पोस्ट ग्रैजुएट , 255 पीएचडी   , इसके अलावा डाक्टर इंजीनियर और कामर्स विज्ञान जैसे विषयों से ग्रौजुएट शामिल थे।

    आइये अब चलते हैं   मध्यप्रदेश ,जहाँ  हवलदार के  पद के लिए भी कमोबेश इसी प्रकार की स्थिति से देश का सामना होता है, आवश्यकता  14000 पदों की है  ।शैक्षणिक योग्यता  हायर सेकन्डरी लेकिन आवेदक  9.24 लाख के ऊपर  जिनमें  1. www.oldhouseonline.com 19 लाख ग्रैजुएट हैं, 14562 पोस्ट ग्रैजुएट हैं  9629 इंजीनियर हैं 12 पीएचडी हैं ।

    ऐसी ही एक और परिस्थिति, जिसमें  माली के पद के लिए सरकार को लगभग 2000 पीएचडी धारकों के आवेदन प्राप्त हुए।
    जब सम्बन्धित अधिकारियों का ध्यान  पद के लिए आवश्यक योग्यता और आवेदकों की शैक्षणिक योग्यता के बीच इस विसंगति की ओर दिलाया गया   तो उनका कहना था कि हमारा काम परीक्षा कराना है आवेदकों की प्रोफाइल का निरीक्षण करना नहीं।

    इस सबके विपरीत, एक रिपोर्ट जिसके केंद्र में मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के सरकारी विद्यालयों के  शिक्षक हैं।
    इनकी योग्यता  : देश के प्रधानमंत्री का नाम हो या राष्ट्रपति का नाम , किसी प्रदेश की राजधानी का नाम हो या सामान्य ज्ञान से जुड़ा कोई प्रश्न  , हर प्रश्न  अनुत्तरित  ! किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में असक्षम ।

    कोई आश्चर्य नहीं कि इन प्रदेशों की परीक्षाओं के परिणाम  का उदाहरण बिहार माध्यमिक बोर्ड  ( दसवीं की परीक्षा ) में  दिखाई दिया जब बोर्ड को टॉप करने वाले विद्यार्थियों को उन विषयों तक के नाम नहीं पता जिनमें उन्होंने टाप किया है  ।

    लेकिन क्या यह घटनाएँ  हम सभी के लिए  , पूरे देश के लिए  , हमारी सरकारों के लिए एक चिंता का विषय नहीं होना चाहिए  ?
    न केवल समाज का हिस्सा होने के नाते अपितु स्वयं पालक होने के नाते , क्या यह हमारे बच्चों ही नहीं बल्कि इस देश के भी भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?

    दोष किसे दिया जाए  ! उन्हें जो अयोग्य होते हुए भी अपना स्वयं का वर्तमान सुधारने के लिए शिक्षक के पद पर आसीन तो हैं किन्तु उन बच्चों के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं जो कि कालांतर में स्वयं इस देश के भविष्य पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह बन जाएगा। या फिर उस सिस्टम को जिसमें प्रेतिभावन  युवा  अपने लिए अयोग्य पदों पर भी आवेदन करने के लिए मजबूर हैं और प्रतिभाहीन  व्यक्ति उन जिम्मेदार पदों पर काबिज है जिन पर देश के वर्तमान एवं भविष्य की जिम्मेदारी है।

    दोष उस बच्चे का है जिसे अपने विषय अथवा अपने पाठ्यक्रम का ज्ञान नहीं है अथवा उस शिक्षक का है जिस पर उसे पढ़ाने का जिम्मा है लेकिन स्वयं की अज्ञानता  के कारण उसे पढ़ा नहीं पाता। दोष उस शिक्षक का है जिसने  ‘ कुछ ले दे कर ‘ अथवा  ‘ जुगाड  ‘ से अपनी अयोग्यता के बावजूद किसी योग्य का हक मार कर नौकरी हासिल कर ली या फिर उस अधिकारी का जिसने आवेदक की योग्यता को ज्ञान के बजाय सिक्कों के तराज़ू में तोला! दोष उस अधिकारी का है जिसने अपने कर्तव्य का पालन करने के बजाय उस भ्रष्ट तंत्र के आगे हथियार डाल दिए या फिर उस भ्रष्ट तंत्र का जिसके बने बनाए सिस्टम में उस अधिकारी के पास एक ही रास्ता  होता है या तो सिस्टम में शामिल हो जाओ या फिर बाहर हो जाओ ।

    दोष आखिर किसका है हर उस पुरुष अथवा महिला का जिस पर अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी है जिसके लिए वह येन केन प्रकारेण कोई भी नौकरी पाने  की जुगत लगा लेता है और जो जीतता है वो सिकन्दर बन जाता है या फिर सदियों से चले आ रहे इस तथ्यात्मक सत्य की  कि जिसके पास लाठी होती है भैंस वही ले जाता है  ।

    डारविन ने अपनी “थियोरी आफ इवोल्यूशन ” में ‘सरवाइवल आफ द फिट्टेस्ट ‘ का उल्लेख किया है  अर्थात् जो सबसे ताकतवर होगा वही परिस्थितियों के सामने टिक पाएगा  किन्तु  ‘ताकत ‘ की परिभाषा ही जो समाज अपने लिए एक नई गढ़ ले  ! जहाँ ताकत बौद्धिक शारीरिक मानसिक अथवा आध्यात्मिक से इतर सर्वशक्तिमान ताकत केवल ‘धन’ की अथवा  ‘जुगाड़’ की हो तो दोष किसे दिया जाए  समाज को या  ‘ताकत ‘ को ! दोष किसे दिया जाए उस समाज को जिसमें यह विसंगतियाँ पनप रही हैं और सब खामोश हैं या फिर उस सरकार को जिसका पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो चुका है  ।

    दरअसल हमारे देश में न तो हुनर की कमी है न योग्यता की लेकिन नौकरी के लिए इन दोनों में से किसी को भी प्राथमिकता नहीं दी जाती  । यहाँ नौकरी मिलती है डिग्री से लेकिन डिग्री कैसे मिली यह पूछा नहीं जाता। इस देश और उसके युवा को उस सूर्योदय का इंतजार है जो उसके भविष्य के अंधकार को अपने प्रकाश से दूर करेगा, उसे उस दिन का इंतजार है जब देश अपनी प्रतिभाओं को पहचान कर उनका उचित उपयोग करेगा शोषण नहीं, जिस देश में अपने प्राकृतिक संसाधनों का और मानव संसाधनों दोनों का ही दुरुपयोग होता हो वह देश आगे कैसे जा सकता है  ?

    जहाँ प्रतिभा प्रभाव के आगे हार जाती हो वहाँ प्रभाव जीत तो जाता है लेकिन देश हार जाता है । इस देश के युवा को  उस दिन का इंतजार है जब योग्यता को उसका उचित स्थान एवं सम्मान मिलेगा। नौकरी और पद प्रभाव नहीं प्रतिभा से मिलेंगे  । न तो कोई पढ़ा लिखा बेरोजगार युवा मजबूर होगा अपनी कलम छोड़ कर झाड़ू पकड़ने के लिए न कोई अयोग्य व्यक्ति मजबूर होगा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा  करने के लिए किसी योग्य व्यक्ति का हक मारने के लिए, न कोई बच्चा मजबूर होगा किसी अयोग्य शिक्षक से पढ़ने के लिए न कोई अधिकारी मजबूर होगा किसी अपात्र को पात्रता देने के लिए,जहाँ इस देश का युवा सिस्टम से हारने के बजाय सिस्टम को हरा दे जहाँ सिस्टम हार जाए और देश जीत जाए।

  • स्वराज यूनिवर्सिटी व स्वपथगामी नेटवर्क द्वारा आयोजित उदयपुर, राजस्थान में जीवन विद्या शिविर 5 – 12 मार्च 2017

    Swaraj University

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    शिविर के बारे में:

    जीवन विद्या शिविर (करीब 40 घंटे की अवधि की) एक गहरे अध्ययन की प्रक्रिया है, जिसमे जीवन के मौलिक परन्तु प्रायः उपेक्षित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। आपसी सम्बन्ध, शिक्षा, समाज, प्रकृति, लक्ष्य, सफलता आदि पर एक गहरा संवाद होता है जिसके द्वारा प्रतिभागियों को ज़िन्दगी के भिन्न प्रतीत होने वाले पहलुओं के बीच की कड़ियाँ पहचानने व समझने का अवसर मिलता है। कोई प्रवचन या उपदेश नही होता। प्रबोधक द्वारा कुछ प्रस्ताव प्रस्तुत किये जाते हैं, और प्रतिभागियों को उनके आतंरिक विचारों, भयों, सम्भ्राँतियों, आकांक्षाओं आदि को जांचने में सहयोग किया जाता है।  क्रमशः ढेर सारी छिपी मान्यताएं उजागर होने लगती हैं और व्यक्ति को ज़िन्दगी के सूक्ष्म ताने बाने का एक नयी स्पष्टता से दर्शन होने लगता है; मानव में सकारात्मक सृजनशक्ति की नयी संभावनाओं का बोध होने लगता है।  एक सशक्त चिंतन-यात्रा का शिविर में प्रारम्भ तो होता है पर अंत नही …

    यह 8-दिवसीय पूर्णकालिक आवासीय शिविर है। उदयपुर, राजस्थान में आयोजित इस शिविर में कुल 30 प्रतिभागियों के लिए स्थान हैं, इस लिए पूर्व पंजीकरण करें।  शिविर में पूर्णकालिक प्रतिभागिता अनिवार्य है, आंशिक प्रतिभागिता की अनुमति नही है। शिविर के दौरान स्वैच्छिक श्रमदान करने का व व्यक्तिगत हुनरों के आदान-प्रदान का भी अवसर रहेगा।

    प्रबोधक:

    Vinish Gupta

    इस शिविर में प्रबोधन श्री विनीश गुप्ता करेंगे। वे लम्बे समय से विभिन्न सामाजिक व पर्यावरणीय अभियानों से जुड़े रहे हैं। करीब दस वर्ष तक वे बौद्ध परंपरा में भिक्षु भी रहे, जिस दौरान उन्हें भारतीय विचारधाराओं व तौर तरीकों को समझने का अवसर मिला। विनीश को उनके कार्यों में सहयोग मिलता है उनकी पत्नी करुणा मुरारजी से। शिक्षा का मानव संभावनाओं व विकास के साथ सम्बन्ध समझने में लम्बे समय से करुणा की रूचि रही है। अन्य विषय जिनके अध्ययन में वे रूचि रखती हैं: आहार, फ़िल्में, प्रक्रिया/इतिहास विश्लेषण, और सीखने-सिखाने व जीने के सामूहिक तौर तरीके।

    साथ लाएं:

    ओढ़ने व बिछाने की चादरें, तकिये का गिलाफ, कंबल/स्लीपिंग-बैग, निजी वस्त्र, पानी की बोतल, टॉर्च, तौलिया, साबुन आदि निजी उपयोग का सामान, आपके संस्था / कार्य से सम्बंधित सामग्री, व कुछ भी रचनात्मक जो आप को दूसरों के साथ करना / बांटना अच्छा लगता है।

    यह शिविर ‘उपहार संस्कृति’ पर आधारित है। यानि इस शिविर के लिए कोई निश्चित अनिवार्य शुल्क नही है।  हर प्रतिभागी पर करीब रुपए 3700 का खर्च आता है।  जिन्हे आवश्यकता हो उनके लिए छात्रवृत्तियां/सहयोग उपलब्ध हैं।  आप अधिक योगदान का सामर्थ्य रखते हों तो आपके योगदान से अन्य लोगों की प्रतिभागिता सुनिश्चित होने में सहयोग रहेगा।

    आर्थिक असमर्थता के कारण किसी की प्रतिभागिता बाधित नही होने दी जाएगी।  इस शिविर में भाग लेने के लिए यह ऑनलाइन फॉर्म भरें। या हमसे संपर्क करें <swarajuni.events@gmail.com>

  • दलित चेतना 

    आलोक नंदन


    वेदों-शास्त्रों के खिलाफ
    विषवमन करके मुटाती है
    दलित चेतना

    मनुस्मृति को मुंह में डालकर
    पघुराती है
    दलित चेतना

    अपने पूर्वजों के खिलाफ
    वर्णवादी व्यवहार पर
    कसमसाती है
    दलित चेतना

    एकलव्य के कटे हुये अंगूठे
    में अपना अक्स निहारती
    तर्कों का फन फैलाकर
    कभी राम पर कभी कृष्ण पर
    फुंफकारती है
    दलित चेतना।

    बाबा साहेब के कंधों पर सवार हो
    संविधान में जगह पाती है
    फिर भी प्रतिशोध की आग में
    धधकती है
    दलित चेतना

    मनु की खींची रेखाओं से
    बाहर निकलने की चाह में
    अकुलाती है
    दलित चेतना

    सदियों की दूरी तय करने के बावजूद
    वर्ण की दीवार पर
    अपना सिर मारकर
    पछाड़ खाती है
    दलित चेतना।

  • एक लंबी कविता

    आलोक नंदन


    झाड़ियों में उगती है,
    कंटीली झाड़ियों में
    और उनके संग खुद भी
    कंटीली हो जाती है
    चुभे तो लहू टपक पड़े,
    ऐसी है
    लंबी कविता।

    धरती के कोख में उस
    जगह पलती है
    जहां होता है
    पानी का अभाव ।

    पुस की रात में
    सड़क पर
    ठिठुरते हुये
    बुढ़े के नींद में ऊंघती है
    लंबी कविता !

    गंगा की मौजों पर
    सुबह कि सुर्खीली किरणों
    के फैलाव में अटखेलियां करती है
    लंबी कविता

    दुल्हन के अंग-प्रत्यंग पर
    सोलहों श्रृंगार में
    लजाती, सकुजाती
    और कसमसाती है
    लंबी कविता

    सेल में बंद
    किसी कैदी की बेड़ियों की
    खनखनाहट में
    आजादी के नगमें सुनाती है
    लंबी कविता।

    ध्यानमग्न साधक की बंद आंखों के बीच
    रश्मियों की तरह नजर आती है
    लंबी कविता।

    लंबी कविता उगती है
    बढ़ती है
    और फैलती है
    अमरलता मानिंद।

    मंत्रों व आयातों में
    उतरती है लंबी कविता।

    सुकरात, अरस्तु और मार्क्स की
    दाढ़ियों में
    युगों-युगो तक बढ़ती है
    लंबी कविता।

    पहली बारिश के बाद
    धरती की मटैली सोंधी महक बन कर
    सांसों में घुल जाती है
    लंबी कविता।

     

  • मेरे प्रिय मुख्यमंत्री : नृपेन दा

    P. K. Siddharth

    राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
    www.pksiddharth.in
    www.suraajdal.org

    [themify_hr color=”red”]

    1981 में मेरी नियुक्ति भारतीय पुलिस सेवा में हुई. प्रशिक्षण के बाद मुझे त्रिपुरा काडर मिला जहां एक वामपंथी सरकार थी और उसके शीर्ष पर थे एक 78 वर्षीय मुख्यमंत्री श्री नृपेन चक्रवर्ती

    Late Nirpen Chakraborty

    मैंने सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर के तौर पर अपना काम शुरू किया, लेकिन मुझे इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि मैं जिस मुख्यमंत्री के अधीन काम कर रहा था वह न केवल देश के बल्कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं में से एक था, और सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों में से भी एक। मुझे भी इसका भी ज़रा भी भान नहीं था कि यह एक व्यक्ति मेरे जीवन को आकार देने में अप्रत्यक्ष रुप से एक बड़ी भूमिका अदा करेगा। मुझे राजनीति की कोई समझ नहीं थी, सिर्फ प्रशासकीय बुद्धि थी। मगर आने वाले दिनों में टुकड़ों-टुकड़ों में मैंने इस महान व्यक्तित्व से सीखना शुरू किया।

    त्रिपुरा एक छोटा-सा राज्य है, उस समय जिसकी जान-संख्या थी केवल 28 लाख। पश्चिम बंगाल के एक बड़-से जिले के बराबर था। अपने प्रशासकीय उत्साह में एक दिन मैंने अधीनस्थों को आदेश दिया कि एक सड़क के किनारे जो छोटी दुकानें और गुमटियां लगी थीं, उन्हें हटा दिया जाए। हुक्म तामील हुई। एक हफ्ते के बाद मुख्यमंत्री का कार्यक्रम मेरे क्षेत्र में था। जाहिर है कि मुझे उपस्थित रहना था, सो हुआ।  नृपेन दा ने मुझे बुलाया और हल्के से मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा। केमोन आछेन?’,  उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने कहा, ‘भालो आछी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी मासिक तनख्वाह क्या थी। मैंने कहा 1200 रुपए। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे पता है कि जिन छोटी दुकानों को मैंने उजाड़ दिया, उन  दुकान चलाने वालों की मासिक आय क्या थी? मैं हतप्रभ हुआ! मैंने कहा, ‘नहीं

    नृपेंद्र दा ने मुझे धीमे स्वर में समझाया ताकि आस-पास के लोग सुन न पाएं। उन्होंने कहा, ‘आपने कानून लागू कर बड़ा अच्छा किया, लेकिन एक बात याद रखिएगा। हम इन्हें रोजगार नहीं दे सकते तो जो रोजगार वह अपने लिए स्वयं जुटा रहे हैं, क्या हमें उसे नष्ट कर देना चाहिए? यह प्रश्न पूछ कर वे आगे बढ़ गए। मैं पीछे ठिठक कर खड़ा रह गया। अगले कई दिनों तक नृपेन दा की बातों ने मेरी नींद में हलचल पैदा की, और तभी अंकुरित हुई मेरे ह्रदय में गरीब के लिए करुणा, जो तब तक मेरे धर्मग्रंथ भी मेरे अंदर अंकुरित नहीं कर पाए थे। मैंने उसके बाद के प्रशासकीय जीवन में दुकानें सिर्फ उन्हीं जगहों से हटवाईं जहाँ वे ट्रैफिक को गंभीर रूप से बाधित करती थीं। उन्हें भी वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान करने की कोशिश की।

    मुख्यमंत्री जब मेरे क्षेत्र से गुजरते थे तो नियम के अनुसार मैं अपने अनुमंडल की सीमा पर पुलिस बल के साथ उनकी अगवाई करने के लिए खड़ा होता था। मैंने लक्ष्य करना शुरू किया कि मैं अपनी घड़ी उनके मूवमेंट के हिसाब से ठीक कर सकता थाक्योंकि वे कभी एक मिनट भी लेट नहीं होते थे। इस मामले में तो उन्होंने बिना एक शब्द कहे अपना संदेश सदा के लिए छोड़ दिया।

    जब मैं एस पी बना दो तो कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े पुलिस अधिकारी यूनियन के एक अनुशासहीन सब-इंस्पेक्टर को विभागीय कार्रवाई कर नौकरी से बर्खास्त कर दिया। परिणाम वही हुआ जो होता है। 8महीने में मेरा तबादला सीपीएम पार्टी के दबाव में नृपेन दा को करना पड़ा। उनका कद बहुत बड़ा था लेकिन वे पार्टी से बड़े नहीं थे। मेरे स्थानांतरण के पहले वे  मेरे जिले में आए, मुझे डिनर पर बुलाया, और दार्शनिक बातें कीं।  मुझे तब तक नहीं पता था कि वे इतने पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। मुझे उस दिन समझ में नहीं आया दर्शनशास्त्र और राजनीति शास्त्र के प्रसंग वे क्यों उठा रहे थे। लेकिन जब स्थानांतरण का आदेश मेरे हाथ में दो-चार दिनों के बाद आया तब मेरी समझ में कुछ बात आई। राजनीति में रहने वाले एक महापुरुष को भी कभी-कभी समझौते करने पड़ते हैं। उनके लिए मेरा स्थानांतरण एक समझौता था। अपनी पार्टी के साथ।

    जब तक नृपेन दा मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने एयर-कंडिशनर का प्रयोग नहीं किया। उनके चेंबर में एक सीलिंग फैन और एक पेडस्टल फैन रहा करते थे। जब मुख्यमंत्री ए सी का प्रयोग नहीं कर रहा हो तो मंत्री कैसे करतेचीफ सेक्रेटरी और डी जी पी कैसे करते? और जब चीफ सेक्रेटरी और डी जी पी नहीं लगाते तो कलेक्टर और एस पी  कैसे लगाते? कुछ ऐसी संस्कृति बनाकर रखी उन्होंने त्रिपुरा में। बाद में जब कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तब हर मंत्री और हर अधिकारी के चेंबर में एयर-कंडीशनर की बहारआई।

    एक बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु महोदय त्रिपुरा आए। उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे सर्किट हाउस में नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री- निवास में रुकेंगे। ऐसा ही हुआ। सुबह-सुबह ज्योति बसु महोदय बाथरूम में स्नान करने गए तो उन्होंने टॉवेल की मांग की। उन्हें टॉवेल की जगह गमछादिया गया – वही लाल गमछा जो आप मजदूर के कंधे पर पाते हैं। अब भला ज्योति बाबू उस गमछे से कैसे शरीर कैसे पोछते? ‘भद्र लोगथे! उन्होंने गमछा लेने से मना कर दिया!  तुरंत प्रशासन हरकत में आ गया, और गाड़ी सर्किट हाउस में भेज कर वहां से ज्योति बाबू के लिए टॉवल की व्यवस्था की गई। ऐसे सरल व्यक्ति से हमारे नृपेन दा!

    1978 से 1988 तक दस वर्षों तक लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहने के बाद एक दिन आया जब वही हुआ जो एक लोकतंत्र में होता है। जनता ने परिवर्तन की मांग की, और कांग्रेस सत्ता में आ गई। नृपेन दा मुख्यमंत्री नहीं रहे। जब इस अविवाहित मुख्य मंत्री ने अपना सरकारी निवास छोड़ा तो सरकारी गाड़ी में नहीं छोड़ा। एक रिक्शे पर दो संदुकें रखीं और सौ रूपए किराए वाले एक कमरे में चले गए। एक संदूक में उनके कपड़े थे और दूसरे संदूक में उनकी किताबें! उनके पास और कुछ नहीं था!

     

  • स्वर्ण भारत पार्टी प्रधानमंत्रीजी से राज्य वित्तपोषण द्वारा प्रति वोट के आधार पर चुनावों की फंडिंग का आग्रह करती है 

    [themify_hr color=”red”]

    Sanjay Sonawani

    श्री संजय सोनवणी, अध्यक्ष स्वर्ण भारत पार्टी (भारत की एकमात्र लिबरल पार्टी), ने श्री मोदी के राज्य वित्तपोषण आधार पर चुनावों कीफंडिंग के प्रस्ताव का स्वागत किया। स्वर्ण भारत पार्टी (एस बी पी) के घोषणापत्र में पूर्ण विस्तार से राज्य वित्तपोषण आधार पर प्रति वोटसे चुनावों की फंडिंग के प्रस्ताव को – जोकि अच्छी शासन प्रणाली स्थापित करनें के लिए आवश्यक है – समझाया गया है ।

    यह समाज और देश के हित में है कि ईमानदार और सक्षम उम्मीदवार चुनावों में लड़नें के लिए आगे आएं। अच्छे और बेदाग उम्मीदवार जनताकी जायदाद हैं, किसी भी अन्य जनहित कल्याण से भी ज्यादा। हम देश के नागरिकों को ऐसी छवि के उम्मीदवारों को चुनावों में उतारनें केलिए प्रोत्साहित करने के प्रस्ताव का स्वागत करना चाहिए।

    जबकि चुनावों की सफलता केवल चुनावी खर्च पर निर्धारित नहीं होती, त्रासदी यह है कि आज की व्यवस्था में अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारशुरू करनें से पहले ही वर्तमान प्रणाली द्वारा एक तरफ बैठा दिए जाते हैं। ईमानदार व शक्षम मध्य श्रेणी के उम्मीदवार या गरीब उम्मीदवारचुनाव लड़नें से पहले ही मना कर देतें हैं क्योंकि चुनाव को हारने पर, चुनाव लड़नें में लगी हुई ईमानदारी से कमाई हुई रकम का पूरा नुकसान होसकता है। हालाँकि पार्टियां ईमानदार उम्मीदवारों की फंडिंग कर सकती हैं, पर जो पार्टी अपना ज़मीर भ्रष्ट पूंजीपतियों को नहीं बेचती, ऐसीपार्टी को फंडिंग ही कहाँ मिलती है?

    राज्य वित्तपोषण आधार पर प्रति वोट चुनावों की फंडिंग एक सरल और पारदर्शी उपाय है। यह प्रस्ताव पारदर्शी और प्रोत्साहन-संगत है। उक्तव्यवस्था को सफलतापूर्वक कई देशों में कार्यान्वित किया है। स्वर्ण भारत पार्टी का सुझाव है की उम्मीदवार को प्रति मिली हुई वोट पर रु 20की भरपाई सरकार की ओर से करी जाये जिसकी अधिकतम सीमा रु 70 लाख तक प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र तक सीमित हो। यह आकलनसुधारा जा सकता है।

    साथ ही चुनाव में उम्मीदवार की जमानत के लिए जमा धनराशि को प्रभावित रूप से बढाना होगा जिससे केवल गंभीर उम्मीदवार ही चुनाव मेंलडें। विधायकों और सांसदों की आय को प्रभावित रूप से बढ़ाना होगा तथा सभी भत्तों और पेंशन को पूरी तरह समाप्त करना होगा।

    कुछ लोग राज्य वित्तपोषण का विरोध यह तर्क देते हुए करतें हैं की राजनीति एक समाज सेवा का कार्य है।यह सुझाव देना – कि चुनावीप्रतिनिधियों को अपनी जीवन भर की कमाई को “देश की खातिर” कुर्बान कर देना चाहिए – बिलकुल बेतुकी बात है। मूलभूत रूप से वर्तमानव्यवस्था पथभ्रस्ट है, जिसके परिणाम के साक्षी हम सभी हैं। वर्तमान व्यवस्था में जो भी सत्ता के मुकाम तक पहुँच जाता है वह गारंटी के साथभ्रस्ट बन जाता है ।

    सुधरी हुई व्यवस्था में, जबकि भ्रष्ट उम्मीदवार शायद ईमानदार उम्मीदवारों से काफी ज्यादा पैसा चुनाव में खर्च करेंगी, तब भी ईमानदारउम्मीदवार चुनावों में लड़नें का साहस जुटा पाएंगे क्योंकि नई चुनाव व्यवस्था में उनके दिवालियापन का खतरा निश्चित ही प्रभावित रूप से घटजायेगा। व्यवस्था के सम्पूर्ण परिवर्तन के लिए यह शुरुआत सक्षम होगी। करदाताओं द्वारा दिए गए कर का प्रति वोट के लिए भुगतानकरदाताओं के लिए उत्कृष्ट मूल्य है क्योंकि भ्रस्टाचार और अयोग्यता के कारण देश पर लाखों करोड़ों का भार पड़ता है जोकि देश की जी डी पीका दस गुने से भी ज्यादा नुकसान करता है। पिछले 70 वर्षों से आम तौर पर भ्रष्ट और अयोग्य उम्मीदवारों द्वारा देश को धोखा दिया गया है।आइये, भारतवर्ष के ईमानदार लोगों को मौका दें।

    श्री सोनवणी ने कहा की एस बी पी दृढ़ रूप से श्री मोदी के राज्य वित्तपोषण के सुझाव का समर्थन करती है – परन्तु केवल प्रति मत के आधारपर फंडिंग के लिए। यहाँ यह ज़ोर देना जरूरी है कि केवल उक्त चुनाव के सुधार को स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। एस बी पी केघोषणापत्र में विस्तार से प्रेषित सभी मूलभूत सुधारों को स्थापित करनें की आवश्यकता है, तभी देश पुनः सोने की चिड़िया बन सकता हैं।