एक लक्ष्य: मानसिक उन्नति के निहितार्थ

Dr. Anita Chauhan[divider style=’right’]

जिधर देखो उधर समाज में आर्थिक उन्नति की होड़ तो लगी हुई है लेकिन मानसिक उन्नति की प्रतियोगिता कहीं नहीं, किसी के पास ये सोचने का वक्त नहीं है कि हम किस दिषा में जा रहे हैं। हम ये हर पल सोचते हैं कि हम फलां-फलां से समृद्ध कैसे हों लेकिन ये नहीं सोचते कि हम अमुक व्यक्ति से अधिक उदार, विनम्र, सहिश्णु, दयावान, परोपकारी एवं गुणवान कैसे हों आर्थिक धु्रवीकरण ने हमें दिनों दिन मानसिक दिवालिया बना दिया है। सद्गुणों के अभाव में कोरी आर्थिक उन्नति हमें नितान्त अहंकारी बनाती है, उसका परिणाम ये होता है कि हमें अपने आसपास रहने वाले लोगों के अच्छे गुण भी दिखाई नहीं देते। यदि कोई व्यक्ति सच्चा एवं सरल है तो हम उसे भी मूर्ख समझ लेते हैं उसकी विनम्रता को कायरता निस्वार्थ सेवा भावना को कुटिलता की दृश्टि से देखना प्रारम्भ कर देते हैं। इस तरह की सोच हमें और भी तुच्छ एवं विशैला बनाती है जो कि न सिर्फ हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है बल्कि समाज के लिए भी घातक है। जिस तरह से हम अतीत में किए हुए भौतिक समृद्धिपूर्ण कार्यों को अपनी उपलब्धियों के रूप में देखते हैं और भविश्य में किए जाने वाले कार्यों की योजना बनाते हैं। उसी तरह यदि हम अपनी मानसिक उन्नति के लिए भी एक योजना बनाकर कार्य करें तो हम भी अपने अन्दर एक श्रेश्ठ मानवता की नींव रख सकते हैं ऐसा मेरा पूर्ण विष्वास है।

जीवन में जब भी हमारा सामना स्वार्थी, कुटिल, असत्यभाशी, छल-प्रवच्छना से भरे हुए क्षुद्र मानसिकता वाले लोगों से होता है, वो हमारे भीतर के सद्गुणों को बुरी तरह से झकझोरते हैं। सच में देखा जाए तो वही पल हमारे अन्दर की अच्छाइयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करता है। जब हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उनसे कमजोर पड़ रहे हैं और अन्दर से टूटने लगते हैं किन्तु सावधान ऐसे लोग पहले अपनी कुटिलता से आपको अपने स्तर पर लाएंगे बाद में अपने अनुभव से आपको हरा देंगे। पर यदि हम थोड़ा आत्म मन्थन करें कि यदि वह अपने अन्दर की बुराइयों को हमारी अच्छाइयों के लिए नहीं त्याग सकता तो हम उसके लिए वर्शों से सतत् साधना से अर्जित की हुई अच्छाइयां कैसे छोड़ सकते हैं।

Dr. Anita Chauhan

रेगिस्तान मं जब तूफान आता है तो सब कुछ अपने साथ उड़ा ले जाता है। सिर्फ वही लोग बच पाते हैं जो किसी खूंटे या पत्थर को मजबूती से पकड़ लेते हैं। हमारी जिन्दगी में भी कई बार ऐसे तूफान आते हैं लेकिन यदि हम अपनी पूरी आत्मषक्ति के साथ अपने अन्दर के सद्गुणों के सम्भल को मजबूती से थामे रहते हैं तो हम विकृत होने से बच जाते हैं।
महान षायर इकबाल ने कहा था कि ‘‘यूनान, रोम, मिस्र सब मिट गए जहां से। किन्तु उन्होंने उनके मिटने का कारण नहीं बताया। जहां तक मैं समझती हूं कि इन संस्कृतियों ने आर्थिक उन्नति तो बहुत की, भोग्य वस्तुओं के निर्माण में तो महारथ हासिल की किन्तु भोग करने वाले चरित्रों का निर्माण करने से चूक गए। भारत की विष्ववारा भूमि ने अमर चरित्रों को जना है। भारत का इतिहास ऐसे महापुरूशों के सद्गुणों से देदीप्यमान है। यही कारण है कि हमारी हस्ती नहीं मिट पाई। हमारे समाज एवं देष को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए हमें आर्थिक उन्नति के साथ-साथ मानसिक उन्नति पर भी पूरा ध्यान देना होगा। क्योंकि स्वस्थ एवं सुखी मन से ही स्वस्थ एवं सुखी समाज की कल्पना की जा सकती है।

अच्छे विचारों एवं अच्छी भावनाओं का एक उदाहरण हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे ही हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना आती है वैसे ही आप एक अंधेरे में घिर जाते हैं, मन क्रोधवष जलने लगता है। पूरा का पूरा षरीर उत्तप्त हो उठता है, यह वो सजा है जो हमारी अन्तर्रात्मा हमें देती है, इसके विपरीत जब भी हम दूसरों की मदद करते हैं कुछ भला करने का सोचते हैं तो यह सकारात्मक भावना मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हमारा मन षीतल हो उठता है, मन का कोई कुसुम पूर्णतः पल्लवित होकर खिल जाता है। ये वो पुरस्कार है जो हमारी आत्मा हमें हमारी अच्छाइयों के बदले देती है। जिसके सामने संसार के सारे वैभव व्यर्थ हैं।

इन्हीं सद्गुणों की सुद्वीर्घ यात्रा करके कितने ही मानव साधारण से असाधारण और असाधारण से महात्म्य और महात्म्य से देवत्व को प्राप्त कर चुके हैं।

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