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  • एक लक्ष्य: मानसिक उन्नति के निहितार्थ

    एक लक्ष्य: मानसिक उन्नति के निहितार्थ

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    जिधर देखो उधर समाज में आर्थिक उन्नति की होड़ तो लगी हुई है लेकिन मानसिक उन्नति की प्रतियोगिता कहीं नहीं, किसी के पास ये सोचने का वक्त नहीं है कि हम किस दिषा में जा रहे हैं। हम ये हर पल सोचते हैं कि हम फलां-फलां से समृद्ध कैसे हों लेकिन ये नहीं सोचते कि हम अमुक व्यक्ति से अधिक उदार, विनम्र, सहिश्णु, दयावान, परोपकारी एवं गुणवान कैसे हों आर्थिक धु्रवीकरण ने हमें दिनों दिन मानसिक दिवालिया बना दिया है। सद्गुणों के अभाव में कोरी आर्थिक उन्नति हमें नितान्त अहंकारी बनाती है, उसका परिणाम ये होता है कि हमें अपने आसपास रहने वाले लोगों के अच्छे गुण भी दिखाई नहीं देते। यदि कोई व्यक्ति सच्चा एवं सरल है तो हम उसे भी मूर्ख समझ लेते हैं उसकी विनम्रता को कायरता निस्वार्थ सेवा भावना को कुटिलता की दृश्टि से देखना प्रारम्भ कर देते हैं। इस तरह की सोच हमें और भी तुच्छ एवं विशैला बनाती है जो कि न सिर्फ हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है बल्कि समाज के लिए भी घातक है। जिस तरह से हम अतीत में किए हुए भौतिक समृद्धिपूर्ण कार्यों को अपनी उपलब्धियों के रूप में देखते हैं और भविश्य में किए जाने वाले कार्यों की योजना बनाते हैं। उसी तरह यदि हम अपनी मानसिक उन्नति के लिए भी एक योजना बनाकर कार्य करें तो हम भी अपने अन्दर एक श्रेश्ठ मानवता की नींव रख सकते हैं ऐसा मेरा पूर्ण विष्वास है।

    जीवन में जब भी हमारा सामना स्वार्थी, कुटिल, असत्यभाशी, छल-प्रवच्छना से भरे हुए क्षुद्र मानसिकता वाले लोगों से होता है, वो हमारे भीतर के सद्गुणों को बुरी तरह से झकझोरते हैं। सच में देखा जाए तो वही पल हमारे अन्दर की अच्छाइयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करता है। जब हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उनसे कमजोर पड़ रहे हैं और अन्दर से टूटने लगते हैं किन्तु सावधान ऐसे लोग पहले अपनी कुटिलता से आपको अपने स्तर पर लाएंगे बाद में अपने अनुभव से आपको हरा देंगे। पर यदि हम थोड़ा आत्म मन्थन करें कि यदि वह अपने अन्दर की बुराइयों को हमारी अच्छाइयों के लिए नहीं त्याग सकता तो हम उसके लिए वर्शों से सतत् साधना से अर्जित की हुई अच्छाइयां कैसे छोड़ सकते हैं।

    Dr. Anita Chauhan

    रेगिस्तान मं जब तूफान आता है तो सब कुछ अपने साथ उड़ा ले जाता है। सिर्फ वही लोग बच पाते हैं जो किसी खूंटे या पत्थर को मजबूती से पकड़ लेते हैं। हमारी जिन्दगी में भी कई बार ऐसे तूफान आते हैं लेकिन यदि हम अपनी पूरी आत्मषक्ति के साथ अपने अन्दर के सद्गुणों के सम्भल को मजबूती से थामे रहते हैं तो हम विकृत होने से बच जाते हैं।
    महान षायर इकबाल ने कहा था कि ‘‘यूनान, रोम, मिस्र सब मिट गए जहां से। किन्तु उन्होंने उनके मिटने का कारण नहीं बताया। जहां तक मैं समझती हूं कि इन संस्कृतियों ने आर्थिक उन्नति तो बहुत की, भोग्य वस्तुओं के निर्माण में तो महारथ हासिल की किन्तु भोग करने वाले चरित्रों का निर्माण करने से चूक गए। भारत की विष्ववारा भूमि ने अमर चरित्रों को जना है। भारत का इतिहास ऐसे महापुरूशों के सद्गुणों से देदीप्यमान है। यही कारण है कि हमारी हस्ती नहीं मिट पाई। हमारे समाज एवं देष को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए हमें आर्थिक उन्नति के साथ-साथ मानसिक उन्नति पर भी पूरा ध्यान देना होगा। क्योंकि स्वस्थ एवं सुखी मन से ही स्वस्थ एवं सुखी समाज की कल्पना की जा सकती है।

    अच्छे विचारों एवं अच्छी भावनाओं का एक उदाहरण हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे ही हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना आती है वैसे ही आप एक अंधेरे में घिर जाते हैं, मन क्रोधवष जलने लगता है। पूरा का पूरा षरीर उत्तप्त हो उठता है, यह वो सजा है जो हमारी अन्तर्रात्मा हमें देती है, इसके विपरीत जब भी हम दूसरों की मदद करते हैं कुछ भला करने का सोचते हैं तो यह सकारात्मक भावना मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हमारा मन षीतल हो उठता है, मन का कोई कुसुम पूर्णतः पल्लवित होकर खिल जाता है। ये वो पुरस्कार है जो हमारी आत्मा हमें हमारी अच्छाइयों के बदले देती है। जिसके सामने संसार के सारे वैभव व्यर्थ हैं।

    इन्हीं सद्गुणों की सुद्वीर्घ यात्रा करके कितने ही मानव साधारण से असाधारण और असाधारण से महात्म्य और महात्म्य से देवत्व को प्राप्त कर चुके हैं।

  • नारी तू न हुई नारायणी

    नारी तू न हुई नारायणी

    Dr. Anita Chauhan

    हम समाज से कुरीतियां एवं बुराइयां खत्म करने का उपदेश तो बहुत जोर-शोर से देते हैं लेकिन खुद हम भी उन्हीं बुराइयों का हिस्सा हैं कभी जानबूझकर तो भी अनजाने में। समाज की हर एक बुराई एक-दूसरे से जुड़ी है। जैसे कि दहेज मूल कारण है, भू्रण हत्या का जब किसी के पास एक-दो बेटियां हो जाती हैं तो वह यह सोच कर गर्भ में आई हुई एक और बेटी की हत्या कर देता है कि इससे ज्यादा बेटियों की शादीकरने की उसकी हैसियत नहीं है। यही भू्रण हत्या आगे चलकर स्त्री-पुरूष अनुपात में असमानता पैदा करती है। यही असमानता बलात्कार जैसी दुर्घटनाओं का कारण बनती है। उदाहरण हमारे सामने है। हरियाणा और केरल जहां केरल में महिला अनुपात पुरूषों के बराबर है वहां महिलाओं की स्थिति पारिवारिक, सामाजिक एवं आर्थिक हर क्षेत्र में बेहतर है जबकि हरियाणा जैसे विकसित राज्य में महिलाओं की स्थिति आज भी बद से बदतर बनी हुई है।

    Dr. Anita Chauhan

    ये सच है कि शिक्षा ने महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाया है, लेकिन शिक्षित एवं कामकाजी महिलाओं को भी दहेज जैसी बुराइयों से गुजरना पड़ रहा है। हमारे समाज में सभी तरह के व्यवसायों से जुड़े हुए पुरूषों का दहेज ग्राफ तैयार है जैसे शिक्षक का मूल्य 15 लाख, पुलिस-आर्मी वाले का 10 लाख, प्राइवेट नौकरी में लड़का ठीक-ठाक कमा रहा है तो 10 लाख से 20 लाख तक लेकिन अगर इन्हीं पदों पर महिलाएं कार्यरत हैं तो यही दहेज उनके माता-पिता को क्यों नहीं मिलता?  इस मामले में देखा जाए तो लड़की के माता-पिता को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है उन्हें कमाऊँ एवं योग्य बेटी के लिए दहेज भी देना होता है और बेटी की कमाई में अधिकार भी नहीं मिलता वहीं दूसरी ओर बेटे के माता-पिता अपने निकम्मे बेटे के लिए उससे ज्यादा योग्य बहू पाकर भी दहेज की अपेक्षा करते हैं। ऐसा नहीं है कि दहेज लड़की के भरण-पोषण का एक मूल्य है, जो लड़की के माता-पिता वर-पक्ष को विवाह के समय देते हैं। दहेज की मांग तो उन लड़कियों के माता-पिता से भी की जाती है जो स्वयं अपने होने वाले वर से कई गुना योग्य एवं आर्थिक रूप से सबल होती है। जबकि लड़का जो कुछ भी कमाता है उसका कोई भी लाभ उसके ससुराल पक्ष को नहीं मिलता इसके विपरीत महिला की पूरी आमदनी उसके ससुराल वालों को ही होती है।

    तब भी यदि विवाह के समय वह दहेज (वर पक्ष के मुताबिक) नहीं ला पाती तो उसके रूप, गुण, संस्कार, योग्यता एवं जीवन भर लाखों रूपए कमाने के बावजूद भी समय-समय पर अपमान एवं पीड़ा का सामना करना पड़ता है और उसे वो आदर एवं स्थान नहीं दिया जाता जो दहेज लाने वाली बहू को मिलता है। दूसरी तरफ लड़की के माता-पिता भी उसे पुत्र के बराबर शिक्षा देने से इसीलिए हिचक जाते हैं कि जितना खर्च वो बेटी की शिक्षा-दीक्षा में करेंगे उतने में विवाह का व्यय निपट जाएगा। सोचिए महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने की मुहिम दहेज कितनी बड़ी रूकावट है ?

    इस वक्त मुझे आज की  उभरती हुई कवियित्री कविता तिवारी की ये कविता याद आती हैं-

    जिम्मेदारियों का बोझ परिवार पे पड़ा तो
    आॅटो, रिक्शा ट्रेन को चलाने लगीं बेटियां
    साहस के साथ अंतरिक्ष तक भेद डाला
    सुना वायुयान भी उड़ाने लगीं बेटियां
    और कितने उदाहरण ढूंढकर लाऊँ
    हर क्षेत्र में शक्ति आजमाने लगी बेटियां
    वीर की शहादत पे अर्थी को कान्धा देने
    अब शमशान तक जाने लगी बेटियां
    कष्ट सहके भी धैर्य धरती हैं बेटियां
    प्रश्न ये ज्वलनशील सबके लिए है आज
     नित्य प्रति कोख में क्यों मरती हैं बेटियां

    महिलाओं की स्थिति परिवार एवं समाज में ही दोयम दर्जे की है। ये स्थिति तो साहब हर क्षेत्र में आपको देखने में आएगी। जहां एक ओर 70 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार वहीं हर महिला कहीं न कहीं हर रोज शारीरिक एवं मानसिक शोषण झेल रही है। अगर राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी पर एक नजर डाली जाए तो वहां भी परिणाम कुछ ज्यादा सुखद नहीं हैं। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनीतिक दल आज भी महिलाओं को टिकट देने से हिचकिचाते हैं। आप उम्मीदवारों को आधी आबादी होने के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति राजनीति में कुछ खास मकान नहीं रखती। जिताऊ महिला उम्मीदवारों में अधिकांश किसी न किसी राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखती हैं। इन्हें तो बस इसलिए चुनाव लड़ाया जाता है ताकि परिवार के हिस्से में एक और सीट आ सके।

    उत्तर प्रदेश के तमाम गांवों में जहां महिला प्रधान हैं वहां कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जो अपना परिचय प्रधानपति के तौर पर देते हैं। ये वो लोग हैं जो आरक्षण की वजह से खुद चुनाव नहीं लड़ सके, तो खानापूर्ती के लिए पत्नी के नाम पर परचा भरवा देते हैं। ये लोग अभी भी अपनी पत्नी को घर की चहार दीवारी में कैद किए हुए हैं। जिसको ये भी नहीं पता कि वास्तव में उसके पद का क्या औचित्य है वो सिर्फ एक स्टाम्प मात्र हैं। आज भी हम संसद सत्र पर नजर डालें तो महिलाओं की उपस्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है।

    मैं ये कतई नहीं कहती कि जिस तरह अब तक समाज में पुरूषवादी सोच हावी रही है अब आगे महिलाओं का सर्वोच्च वर्चस्व हो जाए। दरअसल जब तक एक का स्थान ऊपर और दूसरा द्वितीय पायदान पर रहेगा तब तक हम सुन्दर समाज एवं राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते। हमारा परिवार, हमारा समाज एवं हमारी दुनियां सुन्दर, सबल एवं सफल कहलाएगी। जब स्त्री-पुरूष एक-दूसरे के पूरक बन हर क्षेत्र में कदम से कदम मिलाकर बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ेंगे। अब वक्त आ गया है कि हम अपने परिवार से ही इसकी शुरूआत करें जो स्थान परिवार में बेटे को प्राप्त है वही बहू एवं बेटी को भी दिया जाए। जब हमारी दृष्टि में समानता का भाव आ जाएगा समाज खुद व खुद सुन्दर एवं सामर्थ्यवान बन जाएगा।