Rajneesh Sachan
Founder, MadhyaMarg
Editor, Ground Report India (Hindi)
जब हम मानव (human) के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में मानव के अतिरिक्त धरती पर बसने वाले अन्य जीवनों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।
जब हम अपने देश के बारे में बात करते हैं तब धरती पर बसे अन्य तमाम देशों के हित और उनमे बसने वाले तमाम लोगों के हित हमारी सोच का कितना बड़ा हिस्सा होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।
जब हम अपने राज्य के बारे में सोचते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी राज्यों और उनमे बसने वाले लोगों के हित कितने शामिल हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।
जब हम अपने क्षेत्र/भाषा/संस्कृति आदि के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी क्षेत्रों/भाषाओँ/संस्कृतियों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।
अपने को केंद्र मानकर अपने हित दूसरों पर थोपना, अपने आप को केंद्र में रख कर अपने सही गलत को बाकी सबका सही-गलत मान लेना, अपने को केंद्र मानकर अपनी विकास की परिभाषा को बाकी सब की विकास की परिभाषा समझ लेना आदि-आदि मानवता नहीं है. सामंतवाद है, जाहिलियत है ।
अपनी बहुचर्चित किताब ‘सेपियन्स’ में युवाल नोआ हरारी ने एक बात कही है, जो बहुत महत्वपूर्ण है – “विलुप्त होने की कगार पर खड़ी गैंडों की एक प्रजाति का आखिरी गैंडा जंगल में अपनी स्वतंत्रता के साथ कहीं ज़्यादा खुश होगा, बजाय उन लाखों-करोड़ों बछड़ों के जो अपना जीवन एक बाड़े में काट देते हैं और आखिर में काट दिए जाते हैं “
भारत के गृह मंत्री ने राज्य सभा में जो भाषण पिलाया उसका लब्बो लुआब यह है कि कश्मीर के लोग खुश नहीं हैं, वहां विकास नहीं हो रहा है, वहां शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल बदहाल है। और ख़ुशी, विकास और शिक्षा स्वास्थ्य की परिभाषा भी अमित शाह वाली, भाजपा वाली, पूंजीपतियों वाली।
एक कश्मीरी अपनी ख़ुशी और विकास को कैसे परिभाषित करता है यह मायने नहीं रखता।
विकास की यह परिभाषा यहीं नहीं रुकेगी। विकास की यह परिभाषा समूचे उतर-पूर्व और सारे आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी ही तबाही मचाएगी। देश में एक ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ लोग हर साल भूख से न मरते हों, ठण्ड से न मरते हों,लू से न मरते हों, बाढ़ से न मरते हों ,हत्याएं बलात्कार लूट न होती हो। लेकिन कश्मीर का विकास नहीं हो पा रहा यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
अधिकांश भारतीय समाज ने कश्मीर के साथ हुई ज्यादिती पर जैसी प्रतिक्रिया दी है उसे देख कर मैं इस बात से पूरी तरह मुतमईन हूँ कि भारतीय समाज सामंती है और घोर अलोकतांत्रिक है।
यह समाज इसी लायक है कि भारत आर्थिक और सामरिक रूप से हमेशा कमज़ोर रहे। यह समाज जिस तरह की अमानवीय, कट्टर सामंती सोच के साथ आज है ऐसी स्थिति में अगर भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत हुआ तो हम बांग्लादेश,पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि पडोसी देशों के लोगों का जीना हराम कर देंगे।

He is an engineer, social thinker, writer and journalist.
He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).


Leave a Reply to vp.sangau Cancel reply