Tag: Rajneesh Sachan

  • नया राष्ट्रगान

    नया राष्ट्रगान

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    अपने अतीत की महानता के मिथ्या गर्व में डूबा एक देश था
    किसी दूसरी आकाशगंगा में
    किसी और ग्रह पर
    किसी और प्रजाति के लोगों का

    उनकी भाषा से हिंदी में भावानुवाद किया जाए तो कुछ यूँ होगा कि-
    वे खुद को विश्व गुरु मानते थे

    ख़ैर
    उनकी भाषा में उनका भी हमारी तरह एक राष्ट्रगान था
    जैसे हमारा अपना ‘जन गण मन’
    उनका संविधान था
    संसद थी समूचे लोकतंत्र जैसी कोई व्यवस्था थी

    तो वाक़या वहाँ का है
    दूर किसी और आकाशगंगा के किसी ग्रह के किसी एलियन समाज का
    सहूलियत के लिए हम हिंदी भावानुवाद कर लेते हैं
    सहूलियत के लिए हम अपने देश के तंत्र के चश्मे से उनके तंत्र और उस लोक को देख लेते हैं
    अंत में फिर यह तो याद रखना ही है कि यह कहीं और की बात है..

    ~~~

    नए राष्ट्र में जनता सारी राष्ट्रभक्त हो
    राष्ट्र्गान भी नया हो
    इसके साथ प्रधानमंत्री ने रखी
    और एक इच्छा –
    ‘चारण-भाषा ‘
    गूंज रही थीं दोनो सदनों
    में मेज़ों की
    थपथपाहटें

    जन-गण-मन के
    अधिनायक
    विजयी रहे हैं हर मोर्चे पर
    नए राष्ट्र के भाग्य विधाता तो हम हैं ही
    इस पर नहीं
    किसी को अब संदेह
    लिहाज़ा
    बेमतलब हैं ऐसी बातें
    अश्वमेघ को थामे
    चक्रवर्ती गृहमंत्री
    ने ललकारा

    फिर
    विदेश मंत्री ने रखा
    जान मारू सुझाव-हम विश्वगुरू हैं
    क्यों हो फिर हमको मंज़ूर
    वसुधैव कुटुम्बकम से
    एक बालिश्त कम
    राष्ट्र्गान में नाम हों अपने सभी पड़ोसी
    मुल्क़ों के
    आख़िर
    गौरवशाली अतीत में वे सब इसी राष्ट्र का
    हिस्सा थे और
    सम्पूर्ण विश्व को एक दिन इसी राष्ट्र का हिस्सा होना ही है

    खड़े हुए तब जाने-माने
    पर्यावरणविद्
    राज्यसभा की मिली थी कुर्सी
    जिनको
    पिछले साल
    इन्होंने प्रदूषण में किसान और
    मज़दूरों की साज़िश का पर्दाफ़ाश किया था
    एक और पर्दाफ़ाश उन्होंने किया –
    कि
    नदियों का विकास में योगदान अब नहीं रहा
    सो
    नदियों के नाम न रखे जाएँ
    राष्ट्र्गान में

    रक्षा मंत्री ने समंदरों और पर्वतों की
    घनघोर आलोचना कर डाली
    वित्तमंत्री ने की
    ताक़ीद कहीं नोटबंदी और जीएसटी
    धोखे से भी छूट न जाएँ

    सभी सदस्यों ने बारी बारी से
    रखे अपने सुझाव
    और
    सबसे अंत में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव
    महामहिम राष्ट्रपति ने भिजवाया –
    राष्ट्रगान में केवल मंगलवार नहीं सातो दिन रखवाए जाएँ.

    राष्ट्रगान फिर लिखा गया कवियों की भीड़ में
    और हज़ारों पत्रकार एंकर
    टेलीवीजन
    और अख़बारों में बता रहे थे
    दुनिया में सबसे बेहतर
    अपना राष्ट्रगान है
    अनगिनत कट्टर राष्ट्रभक्त नायक नायिकाओं ने फिर
    भव्य राममंदिर के विशाल प्रांगण में
    इस नए राष्ट्र के नए राष्ट्रगान को
    पंचम स्वर में गाया

    ~~~

    मगर यह तो भूलने वाली बात नहीं है कि
    यह तो करोड़ों अरबों प्रकाश वर्ष दूर की बात है

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    उद्योगपतियों की नौटंकी, मानव विकास सूचकांक और हमारा वाला विकास — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    लोगों की जिस सोच, इच्छा, उम्मीद और मांग के साथ भाजपा सत्ता में आई थी, भाजपा सरकार वही कर रही है। लोगों ने भाजपा को वोट न तो नौकरियों के लिए दिया था, न जीवन स्तर बेहतर करने के लिए दिया था, और न ही भारत को कोई आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए दिया था।

    हमने भाजपा को वोट दिया था देश को विश्वगुरु बनाने के लिए, देश को हिन्दूराष्ट्र बनाने के लिए, मुल्लों को औक़ात में रखने के लिए, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन वाला विकास करने लिए, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे छोटे पड़ोसियों पर धौंस जमाकर रखने के लिए (ताकि अमेरिका और चीन की चाटुकारिता करने में अहम् को जो चोट पहुँचती है उसकी भरपाई की जा सके), पुराने गौरवशाली भारतवर्ष की पुनर्थापना के लिए, राम राज के लिए …. आदि आदि। असली कारण यही और इसी तरह के थे। बाकी बोला और सुना बहुत कुछ गया है मगर वह सब सिर्फ बोलने और सुनने के लिए था। बोलने वाला भी और सुनने वाला भी दोनों जानते हैं इसमें सच क्या है और लफ़्फ़ाज़ी कितनी है।

    लोकसभा चुनावों में विभिन्न दलों को कुल कॉर्पोरेट फंडिंग लगभग 1100 करोड़ हुई। इसमें 1000 करोड़ के आसपास भाजपा के लिए हुई और 100 करोड़ में बाकी सारी पार्टियां। तो जाहिर है व्यापारियों और पूंजीपतियों ने इकतरफा भाजपा को चुना था। आगे फिर चुनेंगे इसलिए जो दो- चार बिज़नेसमैन हल्ला मचा रहे हैं वह सब नौटंकी है। जिसे सीधा नुकसान हुआ है सिर्फ उसी को तकलीफ है बाकी सब खुश हैं। लेकिन ऐसा तो पूरे समाज का ही हाल है। जिसने सीधा सीधा कोई नुकसान झेला है बस वही विरोध कर रहा है बाकी सब खुश हैं। परोक्ष नुकसान के लिए दूसरे कई कारण उन्हें समझा दिए गए हैं या खुद उन्होंने गढ़ लिए हैं।

    सरकारी आंकड़ों में कश्मीर, मानव विकास सूचकांक के हर मामले में गुजरात से कहीं आगे है। आखिर फिर कौन सा विकास हम कश्मीर में देखना, करना चाहते हैं? तो असली बात यह है कि भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ मानव विकास सूचकांक जैसा कोई भी विकास कभी रहा ही नहीं है। भारतीय समाज के लिए विकास का अर्थ है गाड़ियां,  बंगले, पुल, मॉल, ऊँची ऊँची बिल्डिंगें, बड़े बड़े उद्योगपति जो दुनिया के टॉप 10 में आते हों…. आदि ।

    भले ही यह सब भोगने वाले 2-4 % लोग ही हों। बाकी इस उम्मीद में इस विकास का समर्थन करते जाते हैं कि कभी कोई चमत्कार होगा और हम नहीं तो हमारे बच्चे इन गाड़ियों में घूमेंगे, ऐसे उद्योगपति बनेंगे, ऐसे बंगलों में रहेंगे ..आदि आदि। इसीलिए बचपन से हम अपने बच्चों के दिमाग में यही सब भरते जाते हैं।

    तो कश्मीर में भी अब यही विकास होगा। मानव विकास सूचकांक में तो बांग्लादेश और श्रीलंका ने भी हाल फ़िलहाल हमें पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कुछ अपवाद को छोड़कर किसी भारतीय को इससे कोई समस्या हुई क्या? हमें तो चीन बनना है, अमेरिका बनना है यहाँ तक कि इज़राइल बनना है … वह भी कोरी लफ़्फ़ाजी और ढकोसले के बूते ।भूटान के बारे में आप सर्वे करा लीजिए, कुछ अपवाद छोड़कर हर भारतीय उसे बहुत गरीब और पिछड़ा देश कहेगा।

    इसका सीधा अर्थ है कि हम इंसानों के जीवन और जीवन स्तर को कतई प्राथमिकता नहीं देते। और जो समाज जीवन स्तर को प्राथमिकता नहीं देता वह निहायत ढोंगी,क्रूर,सामंती और अलोकतांत्रिक होता है। और ये सारे गुण हममे हैं। और एक ढोंगी, क्रूर और सामंती समाज अपने में से सबसे बड़े ढोंगी, सबसे ज़्यादा क्रूर और सबसे अधिक सामंती प्रवृत्ति के व्यक्तियों को ही अपने नेता के रूप में चुनेगा।

    यह सच है कि कोई सरकार, कोई नेता जादू करके देश में सब कुछ अचानक ठीक नहीं कर सकता वैसे ही सच यह भी है कि कोई नेता या सरकार अचानक जादू से सबकुछ बरबाद भी नहीं कर सकती। मोदी या भाजपा पर ही सारा दोष मढ़ देना देना असली समस्याओं से मुँह चुराना है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि ये लक्षण समाज के अंदर कहीं गहरे बैठे हुए थे जो माकूल वातावरण पाकर मुखर रूप में बाहर आ गए। यह देश यह समाज सही अर्थों में विकास तभी कर सकेगा जब लोग ढोंग की बजाय ईमानदारी से जीवन मूल्यों को अहमियत देना शुरू करेंगे। वर्ना हम जिधर जा रहे हैं वहां आगे ब्राज़ील है अफगानिस्तान है सीरिया है।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    आत्म मुग्ध, सामंती भारतीय समाज और कश्मीर — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जब हम मानव (human) के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में मानव के अतिरिक्त धरती पर बसने वाले अन्य जीवनों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने देश के बारे में बात करते हैं तब धरती पर बसे अन्य तमाम देशों के हित और उनमे बसने वाले तमाम लोगों के हित हमारी सोच का कितना बड़ा हिस्सा होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने राज्य के बारे में सोचते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी राज्यों और उनमे बसने वाले लोगों के हित कितने शामिल हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    जब हम अपने क्षेत्र/भाषा/संस्कृति आदि के बारे में बात करते हैं तब हमारी सोच में अन्य सभी क्षेत्रों/भाषाओँ/संस्कृतियों के हित कितने शामिल होते हैं इससे हमारी मानवता तय होती है।

    अपने को केंद्र मानकर अपने हित दूसरों पर थोपना, अपने आप को केंद्र में रख कर अपने सही गलत को बाकी सबका सही-गलत मान लेना, अपने को केंद्र मानकर अपनी विकास की परिभाषा को बाकी सब की विकास की परिभाषा समझ लेना आदि-आदि मानवता नहीं है. सामंतवाद है, जाहिलियत है ।

    अपनी बहुचर्चित किताब ‘सेपियन्स’ में युवाल नोआ हरारी ने एक बात कही है, जो बहुत महत्वपूर्ण है – “विलुप्त होने की कगार पर खड़ी गैंडों की एक प्रजाति का आखिरी गैंडा जंगल में अपनी स्वतंत्रता के साथ कहीं ज़्यादा खुश होगा, बजाय उन लाखों-करोड़ों बछड़ों के जो अपना जीवन एक बाड़े में काट देते हैं और आखिर में काट दिए जाते हैं “

    भारत के गृह मंत्री ने राज्य सभा में जो भाषण पिलाया उसका लब्बो लुआब यह है कि कश्मीर के लोग खुश नहीं हैं, वहां विकास नहीं हो रहा है, वहां शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल बदहाल है। और ख़ुशी, विकास और शिक्षा स्वास्थ्य की परिभाषा भी अमित शाह वाली, भाजपा वाली, पूंजीपतियों वाली।

    एक कश्मीरी अपनी ख़ुशी और विकास को कैसे परिभाषित करता है यह मायने नहीं रखता।

    विकास की यह परिभाषा यहीं नहीं रुकेगी। विकास की यह परिभाषा समूचे उतर-पूर्व और सारे आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी ही तबाही मचाएगी। देश में एक ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ लोग हर साल भूख से न मरते हों, ठण्ड से न मरते हों,लू से न मरते हों, बाढ़ से न मरते हों ,हत्याएं बलात्कार लूट न होती हो। लेकिन कश्मीर का विकास नहीं हो पा रहा यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

    अधिकांश भारतीय समाज ने कश्मीर के साथ हुई ज्यादिती पर जैसी प्रतिक्रिया दी है उसे देख कर मैं इस बात से पूरी तरह मुतमईन हूँ कि भारतीय समाज सामंती है और घोर अलोकतांत्रिक है।

    यह समाज इसी लायक है कि भारत आर्थिक और सामरिक रूप से हमेशा कमज़ोर रहे। यह समाज जिस तरह की अमानवीय, कट्टर सामंती सोच के साथ आज है ऐसी स्थिति में अगर भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत हुआ तो हम बांग्लादेश,पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि पडोसी देशों के लोगों का जीना हराम कर देंगे।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    समाज, देश, सामूहिक स्वामित्व की परिकल्पना और हम — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    जिन दो किसानों के खेत एक दूसरे से लगे हुए होते हैं उन दोनों किसानों के खेतों के बीच में एक मेढ़ होती है, जो दोनों के लिए साझी होती है,और वह पतला सा ज़मीन का टुकड़ा दोनों का साझा होता है । कुछ अपवाद मामलों को छोड़कर अधिकतर किसान खेत जोतते समय हर बार थोड़ी थोड़ी मेढ़ खुरचते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है कि मेढ़ के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है। फिर दोनों किसान आपसी सहमति से दोबारा मेढ़ बनाते हैं। जो खेत सड़क किनारे होते हैं या नहर किनारे होते हैं उन खेतों के मालिक किसान हर बार जुताई करते हुए थोड़ी सड़क या नहर की तरफ की ज़मीन या खेत से लगी कोई भी सार्वजनिक ज़मीन खुरचते जाते हैं।

    ऐसा नहीं है कि दो चार इंच ज़मीन से पैदावार में कोई अंतर आता है। लेकिन मामला मानसिकता का है।

    कस्बों में शहरों में लोग जब अपने घर बनाते हैं तो जो ज़मीन उन्होंने खरीदी होती है, उस ज़मीन के बिलकुल बाहरी छोर पर दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं। कोशश तो यह होती है कि जहाँ तक संभव हो दीवार बाहर खड़ी कर लो। पार्कों और गलियों में कब्ज़ा कर लेना बहुत सामान्य घटना है। घर के आगे सड़क तक की ज़मीन तो अपनी ही होती है उसपर कोई शक नहीं होता किसी को।

    बेचारे फ़्लैट वाले ज़मीन कब्ज़ा नहीं पाते तो हवा में जितना संभव हो स्ट्रक्चर बढ़ा कर कुछ नहीं तो गमले ही रख लेते हैं।

    कुल मिलाकर कहना यह है कि हम लोग; सार्वजनिक ज़मीन या साझे की ज़मीन या वह ज़मीन जो किसी भी तरह से विवादित है या जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं है या जिसकी है वह कमज़ोर है मजबूती से अपना दावा नहीं कर पा रहा; ऐसी हर उस ज़मीन पर कब्ज़ा ज़माना अपना अधिकार समझते हैं। और यह सच सिर्फ ज़मीन तक सीमित नहीं है, यह हर तरह की चल अचल संपत्ति, वस्तुओं, लोगों आदि सब के लिए उतना ही सच है।

    हम अभी तक एक समाज के तौर पर सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक जिम्मेदारी की सोच का विकास नहीं कर पाए हैं। एक देश की तरह सोचना तो बहुत दूर की बात है। हमारे लिए देश/प्रदेश/जिले आदि ज़मीन का टुकड़ा मात्र हैं।

    Rajneesh Sachan

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist.

    He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).



  • दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान, जीडीपी, भ्रष्टाचार और हमारा समाज — Rajneesh Sachan

    Rajneesh Sachan

    Founder, MadhyaMarg
    Editor,
    Ground Report India (Hindi)

    समाज दो तरह के नियमों से चलता है एक लिखित नियम और दूसरे अलिखित नियम। दुनिया में अलिखित नियम पहले आए और लिखित नियम (संविधान के रूप में या किन्ही अन्य रूप में) बहुत बाद में आए।

    किसी भी समाज की सामूहिक चेतना, विवेक,संवेदनशीलता,लोकतांत्रिक सोच आदि को जांचने के कई पैमाने होंगे लेकिन लिखित और अलिखित कानूनों के बीच का अनुपात और उनका प्रकार मेरी नज़र में सबसे प्रभावी तरीका है।

    जो समाज जितना परिपक्व होता है उसे उतने कम और उदार लिखित नियमों की ज़रुरत पड़ती है। जो समाज जितना अपरिपक्व और अराजक होता है उसके लिए उतने ज़्यादा और कठोर लिखित नियमों की आवश्यकता होती है। एक परिपक्व समाज के अलिखित कानून संवेदनात्मक/लोकतांत्रिक/तार्किक होते हैं और उनका पालन भी बहुत ही सहजता के साथ होता है।

    ‘जॉर्ज सेबिलिस’ और ‘डोमिनिक जे. नार्डी’ ने OECD (आर्गेनाईजेशन फॉर इकनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेन्ट) देशों के संविधानों की लम्बाई (शब्द संख्या के आधार पर ) और GDP एवं भ्रष्टाचार के बीच संबंधों को दर्शाने वाले अपने तथ्यात्मक और तार्किक लेख में दो निष्कर्ष मोटे तौर पर स्थापित किये हैं। ( A Long Constitution is a (Positively) Bad Constitution: Evidence from OECD Countries)

    1. बड़े संविधान वाले देशों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का स्तर नीचे रहने और भ्रष्टाचार ज्यादा होने की प्रवृत्ति होती है। प्रति व्यक्ति जीडीपी पर संवैधानिक लंबाई का प्रभाव जारी रहता है, भले ही भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो।
    2. लम्बे संविधानों में संशोधन करना अधिक कठिन होता है फिर भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि छोटे संविधानों की तुलना में इन्हे अधिक बार संशोधित किया जाता है।

    संविधान की लंबाई और संशोधनों के बीच संबंध के बारे में लुत्ज़ ने शंका जताई थी कि बड़े संविधानों को अधिक बार संशोधित किया जाएगा, क्योंकि उनमें विस्तृत प्रावधान शामिल होने की संभावना है जो समय के साथ अप्रचलित होने का जोखिम रखते हैं। जब ऐसे प्रावधान सत्ताधारी बहुमत के कार्यों को प्रतिबंधित करते हैं, तो उन्हें या तो संशोधित किया जाएगा या पूरी तरह से हटा दिया जाएगा। नेग्रेट्टो ने लैटिन अमेरिका के लिए लुत्ज की भविष्यवाणियों की पुष्टि की।

    समाज जैसे-जैसे परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे लिखित कानूनों की आवश्यकता कम होती जाती है। कई कानून तो सिर्फ कागज़ में रह जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए सरकार या सत्ता को कोई प्रयास नहीं करना होता है। समाज को नियंत्रित करने वाले नए कानूनों की आवश्यकता नहीं होती यानी व्यवहारिक रूप में अलिखित कानूनों का अनुपात बढ़ता जाता है। नए कानून या नियम उन्ही क्षेत्रों में बनाने पड़ते हैं जो क्षेत्र नए विकसित हुए होते हैं, उदाहरण के लिए साइबर क़ानून।

    इसके उलट अगर समाज अपरिपक्व हो रहा है तो आये दिन सरकार या सत्ता द्वारा नए नए क़ानून बनाये जाते हैं या अदालतों द्वारा बार बार परिभाषित किए जाते हैं और उनके अनुपालन के लिए तमाम तरह की संस्थाएं खड़ी की जाती हैं और कठोर दंड के प्रावधान करने पड़ते हैं। अर्थात लिखित कानूनों/ नियमों का अनुपात बढ़ता जाता है और दंड की कठोरता भी उसी अनुपात में बढ़ती है। साथ ही साथ कई नियम और कानून जो अर्से से निष्क्रिय पड़े थे उन्हें भी पुनर्जीवित किया जाता है।

    किसी भी देश में अविश्वास का स्तर जितना ज़्यादा होता है उस देश में आर्थिक विकास की दर उसी अनुपात में कम होती है। ऐसे देश संविधान की लम्बाई का उपयोग अविश्वास की राजनीतिक संस्कृति के लिए एक प्रॉक्सी के तौर पर करते हैं। चूंकि संविधान बनाने वाले लोग या समिति अविश्वास के चलते दूसरे राजनीतिक दलों या सदस्यों को विवश रखना चाहते हैं इसलिए अधिक अविश्वास वाले देश अधिक विस्तृत कानून लिखने की संभावना रखते हैं।

    भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है यानी जब संविधान बना तब हम दुनिया के कुछ सबसे अपरिपक्व और अविश्वास से भरपूर समाज में से एक थे इसलिए इतने बड़े संविधान की आवश्यकता हुई। लेकिन इससे भी भयावह पहलू यह है कि संविधान बनने के बाद से नियमों और कानूनों की संख्या और सज़ाओं की कठोरता में बढ़ोतरी ही हुई है। यानी हम एक समाज के तौर पर कतई परिपक्व नहीं हुए हैं।

    एक उदाहरण के साथ मैं अपनी बात ख़त्म करूँगा। मैं नॉएडा में रहता हूँ और यहाँ अभी तक चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल तो हैं लेकिन उसे तोड़ने पर चालान करने के लिए ट्रैफिक पुलिस नहीं है ,इसके उलट दिल्ली में हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस तैनात रहती है। आपने सिग्नल ब्रेक किया नहीं कि तुरंत आपको दंड मिलेगा। तो वही लोग जो दिल्ली में हर ट्रैफिक रूल फॉलो करते हैं, नॉएडा में घुसने के बाद बड़े इत्मीनान से सिग्नल ब्रेक करते हुए चलते हैं। जिससे अराजकता फैलती है।

    यानी लिखित नियम भी समाज कितना मानता है यह भी एक बड़ा पहलू है। जो समाज लिखित नियम भी सिर्फ दंड मिलने के डर से मानता है वह अलिखित नियम कितना मानता होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

    Rajneesh Sachan

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  • मेरी कितनी दुनियाएँ हैं

    Rajneesh

    [themify_hr color=”red”]

    मेरी कितनी दुनियाएँ हैं
    मैं कितनी ज़िंदगियाँ जीता हूँ एक साथ
    और कितने किरदारों में ख़ुद को समेटने की कोशिश करता हूँ
    मैं नहीं जानता
    ठीक-ठीक तो नहीं जानता
    या जानना नहीं चाहता
    पर कुछ के बारे में निश्चित तौर पर बता सकता हूँ

    कमरे के अन्दर और बाहर अलग हूँ मैं
    और यह बात दुनिया के हर कमरे पर लागू होती है
    सड़क के इस पार और उस पार अलग-अलग हूँ
    दुनिया की हर सड़क पर…..
    किसी के पास से गुज़रते हुए-
    गुज़रने के पहले और गुजरने के बाद अलग अलग हूँ मैं

    प्यार करते हुए-
    प्यार किये जाने के पहले और प्यार किये जाने के बाद
    तुमसे मिलने के पहले और तुमसे बिछड़ने के बाद
    हारकर रोने से पहले और उसके बाद
    हर रोज़ सोने से पहले और उठने के बाद
    एक गीत सुनने के पहले और सुनने के बाद
    पैदा होने के तुरंत बाद के तुरंत पहले और मरने के ऐन पहले के ऐन बाद
    अलग-अलग हूँ मैं……
    अलबत्ता मेरी समूची ज़िंदगी –
    हर पहले और हर बाद के बीच फैली हुई है ….

    तुम्हारी बेईमानियों वादाखिलाफियों और क्रूरताओं के बाद
    मैं वो नहीं रहूँगा जो पहले था
    तुम्हारी धूर्ततायें षड्यंत्र और अनंत शोषण कुछ न कुछ ज़रूर बदल देंगे मुझे
    यह बदलाव तुम्हारे हक़ में नहीं होगा
    तुम्हारी सनातन खून चूसने की लालसा जो भी योजनायें बनाएगी
    जितने भी प्रपंच रचेगी जितनी भी यंत्रणाएं देगी
    वो सब मेरे लोगों में कुछ न कुछ बदलाव लायेगा
    और
    निश्चय ही यह बदलाव तुम्हारे हक में नहीं होगा….