बदमाश डायरी — Gourang

Gourang “कौन हो तुम?””वही तो खुद से पूछ रही हूँ।””मतलब?” “मतलब! क्या मतलब?” “क्या क्या मतलब? शक्ल से तो मेंटल नहीं लगते, कपड़े भी तो दुरस्त ही हैं।””चलो, यही सवाल मैं तुमसे करती हूँ, कौन हो तुम?” “मैं! मैं शरत हूँ।” “तो महज एक नाम हो बस?” “क्या नाम? पढ़ा लिखा हूँ, नौकरी करता हूँ, अच्छा कमाता हूँ, इसी शहर का हूँ, यार दोस्त हैं, मौज मस्ती करता हूँ। इसी से तो पहचान है।” “बस इतनी… Continue reading

कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

Gourang [tcb-script async=”” src=”//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js”][/tcb-script][tcb-script](adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});[/tcb-script] अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने… Continue reading