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  • बदमाश डायरी — Gourang

    बदमाश डायरी — Gourang

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    “कौन हो तुम?”
    “वही तो खुद से पूछ रही हूँ।”
    “मतलब?” 
    “मतलब! क्या मतलब?” 
    “क्या क्या मतलब? शक्ल से तो मेंटल नहीं लगते, कपड़े भी तो दुरस्त ही हैं।”
    “चलो, यही सवाल मैं तुमसे करती हूँ, कौन हो तुम?” 
    “मैं! मैं शरत हूँ।” 
    “तो महज एक नाम हो बस?” 
    “क्या नाम? पढ़ा लिखा हूँ, नौकरी करता हूँ, अच्छा कमाता हूँ, इसी शहर का हूँ, यार दोस्त हैं, मौज मस्ती करता हूँ। इसी से तो पहचान है।” 
    “बस इतनी सी ही तो पहचान है। एक नाम, एक ठिकाना, कमाते हो। फिर एक अदद घर, बैंक बैलेन्स, समाजिकता, रुतबा, रसूख। ये ही तो?” 
    “और क्या होना होता है?” 
    “बताया न, वही खुद से पूछ रही हूँ। यह सब तो दूसरों के लिए है। खुद के लिए मैं क्या हूँ?”

    ………… ………… …………

    जैसा कि अक्सर होता है, खुद से बातें किए बिन मुझे नींद नहीं आती। डायरी हँसती है। दसियों बार मैंने खुद से पूछा, ये दस्तावेज़ किसलिए? किसके लिए? पर, जैसे होते हैं न कुछ बे सिर पैर की बातें, जिसके माने तब समझ नहीं आते, शायद बाद में आए। हँसती डायरी को देख मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ, साली चिढ़ाती बहुत है। 
    आज एक शरत नाम का लड़का मिल गया। मिल क्या गया, बस टकरा गया। अच्छा है, हैंडसम भी। मैं वर्कशॉप गई थी, शांतनुदा से मिलने। वही बुलाये थे अपने वर्कशॉप पर। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ गपशप होती है, फिर संगीत पर चर्चा होती है, कुछ सुर ताल भी हो जाता है। पर वे तो मिले नहीं, ये मिल गया। मैं वायोलिन के तार को अनमने ढंग से छेड़ रही थी, बेसुरा। शायद यही उसे चुभा होगा, बड़ी कर्कश आवाज में पूछ लिया, ‘कौन हो तुम?’ मेरे मन का बाहर निकल आया। क्या पता क्यों, मैंने उससे शास्त्रार्थ कर लिया। 
    मैं उकता रही थी। उसे वहीं वैसा ही छोड़ बाहर निकल आई।

    ……….. ……….. …………

    “आप तो बहुत अच्छा बंसी बजाते है!!” 
    “अरे रहस्यमयी जी? आप कब आई?” 
    “रहस्यमयी?” 
    “और नहीं तो क्या? उस दिन आपका नाम भी जान न पाया। पर आपसे मिलकर मैं भी रात भर सोचता रहा, खुद के लिए कौन हूँ मैं?” 
    “कुछ हल मिला?”
    “कहाँ? ले दे के यही बंसी ही मिला। मन बोला, मुरलीधर का मुरली ही बोलेगा।” 
    “वही। आपकी बंसी में जादू है।” 
    “और आप बहुत सेंसिबल हैं। पता है न, एक सेंसिबल लड़की इस दुनिया में बहुत दुर्लभ है।” 
    “ऐसा क्या?” 
    “और नहीं तो क्या? अपने आस पास ही देखिये, कितनी लड़कियाँ खुद से यह सवाल करती हैं?” 
    “शरत बाबू, अफसोस तो इसी का है। दुनिया यही सोचती है, चाहे वो कुछ भी करे, आखिर में उसे तो रोटियाँ ही सेकनी है।” 
    “नहीं, नहीं। सारी दुनिया बदल रही है। कुछ भी अब आखिर में नहीं हैं। आगे भी बहुत कुछ है, एक बहुत ही सार्थक कंट्रिब्यूशन है। और हाँ, सिकता, वारा, गार्गी, लोपामुद्रा केवल चूल्हा-चपाती तो न करते थे, अन्यथा आज भी याद न किए जाते।”

    …….. ………… …………

    शांतनुदा भले आदमी हैं। गुणग्राही हैं, संगीत से अटूट प्रेम करते हैं, संगीत चाहने वालों से भी। अभी शरत बाबू से बात ही कर रही थी कि अंदर आए। मुझे देखते ही चहके, ‘अरे इमन तुम उस दिन भाग क्यों गई? चलो, चलो आज और देर नहीं।’ कहते ही मुझे वायोलिन पकड़ा दिया। शरत बाबू के आगे थोड़ी झिझक हो रही थी पर शांतनुदा के आग्रह को टालना मुश्किल ही था। मन फिर खुद ही तैयार हो गया। मैं लम्बाडा के धुन बजाने लगी। धीरे धीरे आँखें बंद हो गई। अंतरयात्रा में उतर गई। मेरे दिमाग में सिर्फ लम्बाडा के धुन ही थे। बाकी सब से तो मैं कट ही गई। 
    आखिर में जब धुन समाप्त हुआ, मैंने आँखें खोली। आँखें खोलते ही शरत बाबू पर ही दृष्टि पड़ी। कितनी अनुराग भरी दृष्टि थी। मेरा दिल धडक गया। मैं नजर मिलाये न रह सकी। मुझे ठीक पता है, मेरे गाल अब भी गुलाबी हो रहे हैं। 
    डायरी फिर हँस रही है। पूछ रही है, ‘तुम’ से ‘आप’ का सफर? इमन में मध्यम तो तीव्र होता है न! षड़ज भी अवरोह में ही लगता है। घूम के लगता है, आखिर लगता ही है। 
    अब उसकी बंसी इमन ही बजाये तो फिर न कहना।

    डायरी बड़ी बदमाश है। सब कुछ जान लेती है……..

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  • रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

    रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

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    रामभरोसे कई दिनों से उसे नोटिस कर रहा था। वह सवेरे ही आकर एक बेंच कब्जा लेता और जाने क्या अपने में सोचता रहता। उसके पीठ पीछे हरे रंग का एक झोला टंगा होता। झोला भी क्या मानो खूब इस्तेमाल किया हुआ। रंग बिलकुल उजड़ा हुआ था, मगर मजबूत था और कुछ वजनी भी था। कई दिनों से उसे देखते रहने से रामभरोसे को पता था कि उस बैग में एक लैपटाप था, जिसे वह निकालता और गोद में रख लेता। फिर कुछ टाईप भी करने लगता। मगर हमेशा नहीं। अमूमन तो वह अपने बेतरतीब बालों और दाढ़ी में हाथ फेरेते हुए कुछ सोचता ही रहता। रामभरोसे कुछ कौतुहुल से ही उस पर नजर रखता। वैसे रामभरोसे अकेला नहीं था, आस-पास के रेगुलर कस्टमर की भी उस पर नजर थी। वे आपस में छुपकर खुसुर-पुसुर से बतियाते। रामभरोसे के कान खूब तेज थे। हाथ काम करते मगर वह आस-पास के बातों पर कान रखता। उस दिन उसने सुना।
    एक ने कहा – “कोई रिसर्च वाला लगता है।” 
    दूसरे ने कहा – “मुझे तो कोई जासूस लगता है, ये लोग स्वांग धरने में माहिर होते हैं।”
    तीसरे को जासूस वाली आईडिया कुछ जमने लगी तो वह भी बात आगे बढ़ा दिया – “ठीक कह रहे हो भाई, आजकल इधर बहुत हलचल बढ़ गई है।”
    पहले को अपनी थ्योरी पिटती नजर आई। वह प्रोटेस्ट के सुर में बोला – “खामख्वाह? इसके बेतरतीब बाल, बढ़ी दाढ़ी, खद्दर के कुर्ते और उजड़े जींस, खोई-खोई आँखें देखो। फिर, खाने का भी कोई ठिकाना नहीं। अरे, मैं तो बोलूँ जिसे रामभरोसे के गरम-गरम दूध-जलेबी भी खींच न सके, वह दार्शनिक नहीं तो और क्या?” वह रामभरोसे को अपने पाले में खींचने की कोशिश में बोला। 
    रामभरोसे को उसके बात में कुछ दम भी नजर आया। आम कस्टमर से इसका एक बुनियादी फर्क था, वह कुछ खाता-पीता न था। कोई आर्डर भी नहीं। पहले दिन तो रामभरोसे को इस सरफिरे पर बड़ा गुस्सा आया, कोई आर्डर नहीं, बस बेंच कब्जाये बैठा है। मगर शाम को जाते-जाते वह रामभरोसे को पचास का एक नोट पकड़ाया और बड़े मुलायम स्वर में कह गया – “इस बेंच को मेरे लिए रिजर्व रख दीजिये।” तो एक एग्रीमेंट सा ही हो गया, दिहाड़ी का पचास रुपया। लोग भी उस बेंच पर बैठने से परहेज करते। जो हो, रामभरोसे ने पहले को देख हामी में सर हिलाया और फिर गरम जलेबियों को चीनी के चासनी में डुबोया।
    दूसरा अब भी जासूसी के दलील पर कायम था। फिर उसे दार्शनिक की थ्योरी में कोई थ्रिल भी अनुभव नहीं हुआ। वह कदरन ऊँचे आवाज में बोला – “यही तो करिश्मा है। जैसा मेक-अप वैसा ही एक्टिंग, अगर धर ही लिए तो जासूस क्या?”
    तीसरे ने भी दुक्की लगाई – “बिलकुल सही कहे, फिल्म में भी तो ऐसा ही दिखाता है।”
    पहला अच्छा तर्कवीर था। झट दूसरे को काट दिया – “मगर यहाँ जासूसी के लिए रखा क्या है? आधा गाँव आधा शहर में कौन सा तेल का कूँआ निकला है जो जासूस पग धरेगा? यहाँ तो बस एक हमारा रामभरोसे ही है दूध-जलेबी लेकर। फिर तो ये जलेबी जासूस ही है।” मौज हो गई। सब हँसने लगे। दूसरे की भद पिट गई। तीसरा भी मूँह छुपाने लगा। 
    बात कुछ तभी के लिए खत्म हो गई। मगर रामभरोसे के लिए खत्म न थी। आखिर यह आदमी सप्ताह भर से आकर यहाँ पड़ा क्यों है? कोई जवाब तो होना चाहिए। वह मन ही मन स्थिर कर लिया। शाम को जब परदेशी जाने को हुआ तो उससे रुपये लेने के बाद आखिर रामभरोसे ने पूछ ही लिया – “साहेब, यहाँ रहे कहाँ हैं?” 
    परदेशी मुस्कुराया। अपनी बैक-पैक को पीठ में एडजेस्ट करते हुए बोला – “नदी के उस पार।“ 
    “उस पार? अरे उधर तो जंगल है।” रामभरोसे अचकचाया। 
    “वहीं कुछ मछुआरे भी रहते हैं। वहीं रह रहा हूँ। हर दिन वे नाव से इस पार छोड़ देते हैं। फिर शाम ढले ले जाते हैं।” परदेशी का शांत मीठा आवाज भी रामभरोसे के हैरानी को कम न कर सका। 
    “अरे साहेब, आप इतना बड़ा आदमी, उस गंदी बस्ती में रहने की क्या जरूरत है? हमसे कहिए, हम यहाँ आपकी रहने की व्यवस्था कर देंगे। वैसे भी लोग न जाने क्या-क्या कह रहे हैं।” रामभरोसे को परदेशी से सहानुभूति हो गई थी। 
    परदेशी ने फिर मुसकुराते हुए जवाब दिया – “पता है। मगर मैं वहीं ठीक हूँ।” 
    रामभरोसे फिर फेर में पड़ गया। वह असमंजस में पूछा – “तो लोग सही कह रहे हैं?” 
    परदेशी बोला – “आधा सच। एक लेखक किसी जासूस से कुछ कम नहीं होता। वह किरदारों की जासूसी करता रहता है, फिर उसे कहानी में ढाल लेता है। मैं भी तो यही कर रहा हूँ।” 
    ब्रीफिंग पर रातों रात स्टोरी मुकम्मल हो गई। उस छोटे से शहर में हर जुबान पर एक ही कहानी थी – कोई परदेशी लेखक आया है जो राम भरोसे पर स्टोरी लिख रहा है। वह हर दिन घंटों आकर रामभरोसे को वाच करता रहता है।
    फिर अगले दिन रामभरोसे किसी हीरो से कम नहीं लग रहा था। खास हो गया था। दूध-जलेबी की बिक्री भी अचानक बढ़ गई। लोग जलेबी जासूस को देखने आने लगे। यही अब परदेशी का उपनाम हो गया। 
    उस दिन फिर एक कस्टमर ने रामभरोसे को छेड़ा – “तो रामभरोसे जी शूटिंग कब से शुरू है?” 
    “कैसा शूटिंग?” रामभरोसे आसमान से गिरा। 
    “अरे! आप छुपाएंगे और समझते है कि हमको कुच्छों पता नहीं चलेगा? अब हीरो बन ही गए हैं तो फिर इतना सीक्रेट वाला गेम काहे खेल रहे हैं?” 
    “कौन हीरो और कैसा सीक्रेट? ” रामभरोसे छटपटाया। 
    “अब हम ही से कहलवाना चाहते हैं? अब तो सारा शहर जान गया। आपका फिल्म बन रहा है, आप ही हीरो हैं। जलेबी जासूस यहाँ शूटिंग का लोकेशन तलाशने आया है। देखिये, हमारे लिए भी कोई छोटा-मोटा रोल निकलवाईए न, साईड वाला।” वह एक एक्टिंग का पोज लेते हुए बोला। 
    “अरे भंगी हो क्या? ई बे सिर पैर वाला बात कौन उड़ाया?” रामभरोसे बौखलाया। 
    मगर कौन सुने रामभरोसे की। लोग रामभरोसे को बधाई देने लगे। फिर कुछ ने जलेबी की आर्डर भी दे दिये और कहने लगे – “अपना राम भरोसे तो अब बंबई चला जाएगा, क्या पता फिर कभी उसके हाथों की बनी जलेबी मिले न मिले।”
    उलझन में भी खुशी तारी थी। धंधा जो चमक गया था। रामभरोसे दूकानदारी में पनाह खोजने लगा। मगर शाम को फिर बात और आगे निकल गई। कुछ लोगों ने परदेशी को घेर लिया। फिर खुशामद करने लगे – “एकाध रोल हमारे लिए भी निकालिए महाराज।“ कुछ तो बाकायदा पोज भी देने लगे। कुछ ने एक कदम आगे निकलकर दो चार फिल्म के हिट डायलाग भी सुना दिया। 
    परदेशी मुस्कुराया फिर मीठी आवाज में बोला – “वैसे तो ठीक है, मगर एक माईनोर सी टेंशन है। हिरोईन राजी नहीं हो रही। जो होगा हिरोईन का मामला सुलझने के बाद ही होगा। तब तक देखते हैं।” कहकर वह मुस्कुराकर निकल गया। लोगों ने खुशी से तालियाँ बजाई, शोर भी हुआ। 
    एक ने सुनते ही चुटकी लिया – “अरे हमसे कहे न, हम हिरोईन वाला रोल भी कर लेंगे। रामलीला में सीता वाला रोल तो किए ही हैं। फिर कौन मुश्किल काम है!” 
    शहर में अब कोई किन्तु, परंतु वाली बात ही न रही। अब रामभरोसे का दर्जा अब किसी स्टार से कम न था। लोग हीरोईन पर कयास लगाने लगे। रामभरोसे के भाग्य पर भी कुछ को ईर्ष्या हुई। रामभरोसे ने भी अगले दिन कुछ साफ और चमकदार कपड़े पहने, आखिर इतनी बातों से असर तो होता ही है। वह भी कुछ जोश में था, मगर उसे अपने बारे में परदेशी बाबू से पूछने में शर्म सी हो रही थी। वह कभी-कभी शरमाकर उसे देख लेता। कस्टमर छेड़ रहे थे, मगर आज उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, वह कुछ लाजुक सा हँसते-हँसते ही दूकानदारी कर रहा था। 
    इसी तरह दिन बीता। जलेबी जासूस जाने को हुआ तो कुछ लोगों ने फिर घेर लिया – “हीरोईन का मामला सुलझा?” 
    परदेशी हँसते हुए बोला – “करीब-करीब।” 
    “फिर कब से शुरू कर रहे हैं?” एक आवाज आई। 
    “बस, अब कल फ़ाईनल हो जाएगा।” वह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन बोला। 
    “हमारा ख्याल तो रखिएगा न!” कई आवाजें एक साथ आई। 
    “जरूर, जरूर।” कहता हुआ वह निकाल गया। 
    शहर भर में अब एक ही चर्चा थी। लोगों ने फिल्म का नाम भी दे डाला था – ‘रामभरोसे जलेबी जासूस’, वैसे तो यह दोनों के जुगलबंदी की बावद टाईटल बनी थी, मगर शहर वालों को भा गई थी। अगले दिन रामभरोसे के दुकान के आगे अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग उत्सुक थे, उन्हे भरपूर तमाशा की उम्मीद थी, कुछ को इसमें मौके भी नजर आ रहे थे। 
    मगर परदेशी न आया। रामभरोसे भी नदारद था। लोगों ने स्वाभाविक अनुमान लगाया कि फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। काफी देर लोग खड़े रहे। अपनी-अपनी राय जाहिर करने लगे। किसी ने कहा – मुहूर्त किसी मंदिर में रखा होगा, वहीं होंगे दोनों। दूसरे ने कहा – शूटिंग से पहले रिहर्सल करना पड़ता है, वही चल रहा होगा। तीसरे ने रोस प्रकट किया – हमारा तो ख्याल न रखा। किसी और ने कहा – जो हो, शहर का नाम रौशन हो गया। हर मुँह नए-नए कयास थे। दिन निकलता रहा, बातें जारी रही। मगर काफी देर तक कोई न आया। दोपहर हो गया। अब भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कोई कितना धीरज धरे। इसी तरह शाम होने को आया। 
    आखिर रामभरोसे आया। वह काफी थका हुआ था। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी, रंग उजड़ा हुआ था। वह भारी कदम जाकर परदेशी के बेंच पर ही बैठ गया, और ऊपर की ओर देखने लगा। उसे चन्दन राय की दुमंजिला साफ दिखने लगी। दुमंजिला इमारत की खिड़की अमूमन खुली रहती थी मगर आज बंद थी। इने-गिने लोग वहाँ फिर भी थे। उन्होंने उसे घेर लिया। वे भी पास बैठ गए। एक ने धीरे से पूछा – “शूटिंग बहुत मेहनत वाला काम है न!” 
    रामभरोसे कुछ न बोला। वह एकटक खिड़की को देखने लगा। 
    एक दूसरा आदमी बोला – “डिस्टार्ब मत करो इसको अभी, कल के शूटिंग का रिहर्सल कर रहा है।” 
    रामभरोसे से रहा न गया। वह क्रोध में फट पड़ा और बोला – “फराड है वह। चन्दन राय के लड़की को भगा के ले गया है। यहीं से हर दिन उससे लैपटॉप में चैट करता था। बंद खिड़की देख रहे हो, वहीं से इशारेबाजी होती थी।” सबने बंद खिड़की को देखा। 
    रामभरोसे फिर रूआंसे बोला – “अभी हम थाना से आ रहे है। सवेरे से बहुत खिंचाई हुई हमारी। बहुत हाथ-पैर धर कर छूटे हैं हम।“ 
    सब अवाक होकर कभी रामभरोसे कभी बंद खिड़की को देख रहे थे।

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  • कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

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    अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने लगा। अजीब स्टेशन है, इस वक्त भी भीड़ बेशुमार है। लोग जगह बनाते हुए तेजी से गुजर रहे हैं। एक उम्र दराज औरत मुझसे तेज निकलकर आगे चली गई। जाते जाते बड़बड़ाई – ‘स्टेशन कोई टुरिस्ट प्लेस नहीं कि आराम से चलो, लोग समझते नहीं।’ इससे पहले कि मैं समझता यह डायलॉग किसके लिए गिफ्ट है, एक चालीस के करीब औरत ने ट्राली बैग से मुझे धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बचा। वो बड़बड़ाई – ‘लगता है मैं स्टेशन में चलने का कोचिंग सेंटर खोल दूँ, खूब चलेगा।’ मैं अभी इस सदमें गोता खा ही रहा था कि टिकट कलेक्टर ने मुझे टोक दिया – “ए जरा टिकट दिखाईये।” 
    मैं और हड़बड़ाया। चालीस के करीब औरत ने फिर कहा – “टिकट बाबू, जरा ठीक से टाइट करियेगा, बहुत स्मार्ट बन रहा है।” 
    टिकट कलेक्टर मुझ पर और ज़ोर देकर देखा और बोला – ‘निकालो, निकालो।’ 
    मैं हकलाया फिर बोला – “मैं तो धन्य हो गया, इतने दिनों में पहली बार किसी ने टिकट देखने की मर्जी दिखाई।”
    वो बोला – “साईड में आओ।” 
    मैं उसके साथ किनारे पर आ गया। फिर मोबाइल निकालकर एम-टिकट दिखाया। वह चिढ़ गया और बोला – “टिकट है तो इतना नाटक क्यों किया?” 
    “कितना नाटक?” मैंने मजा लेते हुए कहा। 
    वह घूर कर मुझे देखा। मैंने उसकी परवाह न करते हुए बोला – “उस लड़की के पास टिकट नहीं थी, तुम गलत चुनाव कर बैठे।” फिर मैं लंबे डग भरते निकल आया। मुझे खूब अंदाजा था कि मेरे पीठ पीछे टिकट कलेक्टर के आँखों से अंगार निकल रहे होंगे।

    स्टेशन के बाहर आकर मैंने प्री पैड टैक्सी के काउंटर पर लाईन लगाई। पर कोई भी टैक्सी मौजूद नहीं थी। काउंटर बॉय बोला – “इंतजार करिए।” 
    मैंने आसमान की ओर देखा। बादलों ने तारों को छुपा लिया था। टैक्सी के न मिलने की वजह समझ आई। एक तो रात फिर बारिश के अंदेशे ने शहर को थमा दिया था। 
    कुछ सोचने के बाद मैंने मोबाइल निकाला, उबेर पर लोकेशन टाइप कर रिक्वेस्ट डाल दिया। आस पास कोई भी टैक्सी न दिखी ऐप्प में। समय कोई बीस मिनट। खैर, वही सही। मैंने कन्फ़र्म कर दिया। कोई आठ मिनट में सुमन नाम दिख गया, टैक्सी नंबर भी उभर आया। मैंने कॉल नंबर ढूंढ कॉल कर दिया। रिंग होता रहा पर उधर से उठाया नहीं। ऐसा ही होता है, शहर को अभी न्यूयार्क होने में बरसों देरी है। फिर मैंने आसमान की ओर देखा, बिजली चमकने शुरू हो गए थे। भीड़ बारिश देख स्टेशन कॉम्प्लेक्स पर ही ठहर गई थी। अभी मैं दुबारा रिंग करने ही वाला था कि बूँदा बाँदी शुरू हो गई। फिर बादल भी गरजने लगे। कुछ देर मैं ठिठका। अभी वापस स्टेशन कॉम्प्लेक्स में लौट जाऊँ कि नहीं सोच ही रहा था, ठीक तभी टैक्सी वाले ने कॉल बैक किया। क्या आश्चर्य !! यह तो पहली बार हुआ। मैंने कॉल रिसीव किया और कड़कते हुए पूछा – “कहाँ पर हैं?” इनसे कड़क व्यवहार ही काम आता है। 
    उधर से एक घरघराती सी आवाज आई – “ऐप्प आपसे दस मिनट की दूरी दिखा रहा है। उधर बारिश शुरू हो गई?” आवाज कुछ पतली सी थी। बारिश की आवाज में सुनने में तकलीफ हो रही थी। 
    मैंने रूखा सा जवाब दिया – “हाँ। मैं इधर शेड पर खड़ा हूँ।” मैं शेड की ओर बढ़ता हुआ बोला। 
    उधर से फिर आवाज आई – “दस मिनट।” और कॉल कट गई। 
    बारिश ज़ोरों से शुरू हो गई थी। इंतजार के अलावा और कुछ बचा न था। मैं मोबाइल पर मेसेज स्क्रोल करता हुआ वक्त काटने लगा। कुछ देर बाद एक टैक्सी थमने की आवाज आई। मैंने सर उठाया। नंबर वही था। किसी तरह दौड़कर बारिश में भींगते हुए मैं टैक्सी में बैठा। ड्राइवर ने कन्फ़र्म किया – “गौरांग? लोकेशन गड़िया? 
    मैं चौंककर सर उठाया। अब पतली आवाज का रहस्य खुला। वो कोई तीस साल की औरत थी। मेरा मुँह खुला रह गया। मैं बस पूछा – “आप?”
    “कोई तकलीफ?” आवाज आई। 
    मैं संभला और बोला – “नहीं।” चलिये।” अब मेरी आवाज नरम और मीठी थी। 
    मैंने बैक मिरर पर नजर डाली। वो भी मुझे ही देख रही थी। अच्छी सूरत थी। पर सूखी सी थी। शायद रात को खाया न हो, मैंने सोचा। मुझे याद आया, खाया तो मैं भी नहीं था।। मैंने गौर किया, बारिश में वो दक्षता से ड्राइव कर रही थी। मैं मुस्कुराया। वो नहीं मुस्कुराई। मुझे तकलीफ हुई। 
    मैं धीरे से बोला – “सॉरी।” 
    “किस बात का?” वो पूछी। 
    “मेरी आवाज बहुत रूखी थी। दरअसल किसी और का गुस्सा आप पर निकल आया।” मैंने संजीदगी से कहा। अब वो मुस्कुराई। तभी गाड़ी रेड सिग्नल पर खड़ी हो गई।
    “इतनी रात गए गाड़ी चलाते आपको………” 
    उसने बात बीच में ही काट दिया – “लड़की हूँ, टैक्सी ड्राइवर हूँ, मर्दाना काम है। देर रात के झमेले हैं। अच्छे बुरे पसिंजर भी मिलते हैं। ऑड लोकेशन्स भी होते हैं। सब है। पर मेरा पेशा मेरा चुना हुआ है, चैलेंज है तो है। सबको बार बार जवाब देते देते थक जाती हूँ।” मैं हड़बड़ाया। मैं फिर मुस्कुराया। मगर वो फिर नहीं मुस्कुराई। 
    सिग्नल हरा हो गया। उसने गियर बदला, ऐक्सिलेटर पर दबाव डाला। गाड़ी सड़क पर फिसलने लगी। खामोशी ने पाँव पसार दिये। 

    कुछ दूर जाते ही मुझे दूर से वह डॉमिनो का काउंटर दिख गया। मुझे पता था, यह देर रात तक खुला रहता है। मैं चिल्लाया – रोको, रोको। गाड़ी बाएँ रोको।” 
    वो हड़बड़ाते हुए कस कर ब्रेक मार गाडी साईड में खड़ी कर पूछी – “क्या हुआ?” 
    मैं डॉमिनो की ओर इशारा कर बोला – “बस एक मिनट। बहुत भूख लगी है।” वो कुछ गुस्सा, कुछ निराशा भाव लिए देखी। मगर कुछ बोली नहीं। मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए उसे देखा, वो अपने होठों पर जीभ फिरा रही थी। 
    बारिश घट गई थी। बस कुछ बूँदा बाँदी ही चल रही थी। कोई दस मिनट में मैं लौटा। वो बहुत गुस्से में दिखी। इसके पहले कि कुछ कहती मैं उसे एक पैकेट और कोक के बोतल पकड़ाते हुये कहा – “बस दो मिनट ही लगेंगे। ये उन्होंने गर्म कर दिये हैं।” वो अब मुझे आश्चर्य से देखने लगी। 
    मैं अब पूरे अधिकार से कहा – “जल्द खा लीजिये। लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही भूख लगती है।” उसने अब थाम लिया। उसके चेहरे की शिकन अब मिट चुकी थी। मैं अंदर बैठ खाने लगा और उसे मिरर में देखा। वो संतोष से खाने लगी, आँखें पनियाई हुई थी। वो भी सचमुच बहुत भूखी थी।

    कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी। मैं बाहर रात के शहर को देखने लगा। अधिकतर दुकानें बंद ही थी। बत्तियों से रोशन सड़कें, बड़े बड़े होर्डिंग्स सब तेजी से गुजरने लगे। अचानक मैंने महसूस किया, वो मुझे मिरर से देख रही थी। मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराई। मैं मुस्कुराया। फिर मैं रात के शहर को देखने लगा। कुछ देर बाद मेरा डेस्टिनेशन आ जाएगा। 

    यूँ ही सोचते सोचते ओवर ब्रीज क्रॉस हो गया। अचानक मैंने देखा वो मुझे फिर मिरर से देख रही थी। मैंने भी उसे फिर मिरर में देखा। मैं मुस्कुराया। वो झेंप कर मुस्कुराई जैसे चोरी पकड़ी गई हो। मैं भी मुस्कुराया। अब हम दोनों मुस्कुराते हुए मिरर में ही देखने लगे। वो कभी सड़क तो कभी मिरर पर देख रही थी। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
    कुछ देर बाद अचानक गाड़ी रुक गई। मैंने मिरर में सवालिया निगाहों से देखा। वो हँसी और बोली – “कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं।” 
    मैंने देखा, मेरा डेस्टिनेशन आ चुका था। टैक्सी से निकल उसके पैसे चुकाए। फिर उसकी आँखों में झाँक उसे कहा – “थैंक्यू।” वो भी मेरी नजरों से नजर मिलाई और सर हिलाई। 
    मैं घूमकर अपने कैंपस की ओर जाने लगा। कुछ दूर जा अचानक मुझे सुनाई दिया – “सुनिए!” 
    मैं सुन घूम खड़ा हुआ। वो पूछी – “आपकी शादी हो गई है?”
    मैं मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया। थोड़ी देर मुझे देखने के बाद वो भी मुस्कुराई और सर हिलाई। मैं खड़ा रहा।

    टैक्सी स्टार्ट हुई और तेजी से निकल गई।

    Gourang


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  • तेल और पानी – कहानी

    तेल और पानी – कहानी

    Gourang

    रेहाना अपनी अम्मी को लेकर तहसील के अस्पताल पर गई। कोई नया डाक्टर आया है। कुछ लोगों ने बड़ी तारीफ की, लगभग जबरन ही भेजा पड़ोस के आबिदा खाला ने। गोया, ‘बड़ा नेक बंदा है, बातें तो इतनी मुहब्बत से करता है कि आधा मर्ज तो वहीं काफ़ुर हो जाता है। जाने किस घर का रौशन चिराग है। दिल से दुआ निकलती है ऐसे बच्चे के लिए। काश कि ये अपना बेटा होता।’ आबिदा खाला के जोड़ों की दर्द को अब बहुत आराम था। फिर रुककर कहती, ‘वहीदा तेरी बेटी से बोल, कम-अज-कम एक बार दिखा तो ले, शाम को भी अस्पताल में बैठता है। आखिर हर्ज क्या है! नहीं तो फिर बड़े शहर के बड़े अस्पताल तो हैं ही।’

    एक तो सरकारी अस्पताल, रेहाना को क्या भरोसा होता। पर तारीफ के इतने लंबे पूल बांधे कि रेहाना के लिए टालना मुश्किल ही हो गया। फिर अम्मी को खाँसी रह रह कर हो रही थी। अब्बू के गुजर जाने के बाद बस अम्मी ही थी, इक सहारा। आखिर आज जल्द ही स्कूल से लौट अम्मी को लेकर निकल पड़ी। रास्ते में वहीदा ने फिर वही पुराना राग अलापना शुरू किया – “निकाह कर लेती तो जिंदगी का सहारा होता।”। “छोड़ो भी अम्मी, फिर वही पुरानी रिकार्ड न बजाया करो।” रेहाना का वही एक ही जवाब होता। “क्यों न बजाऊँ? दुनिया के हर इंसान एक से तो नहीं होते। इरफान से तलाक हो गया तो जिंदगी खत्म तो न हो गई।” वहीदा के समझाने की कोशिश में कोई फर्क न आता। “समझ लो तुम्हारी बेटी में ही ऐब हैं। फिर किस्मत भी एक चीज है। वैसे अगर तुम मुझसे आजिज़ आ गई तो जुदा बात है।” अनमने से रेहाना जवाब देती। यह रोजाना का सबब था। दिन भर में एक बहस इस पर होनी ही थी। दोनों जानते थे, निकल कर कुछ नहीं आता, पर होनी थी। रेहाना ने दूसरी बार निकाह करने से इंकार कर दिया था और अपनी जिद्द पर कायम थी। आबिदा अभिमान से रेहाना को देखी फिर चुप हो गई।

    Gourang

    रेहाना को अफसोस हुआ, पर बात तो जुबान से निकल गई थी, वापस क्या होना था। धीरे से बोली – “नाराज न हो अम्मी। मैं कोई बच्ची तो नहीं। हो सकता है, तुम सही हो, हर शख्स इरफान नहीं। पर एक दूसरा इरफान मेरी ज़िंदगी में नहीं आयेगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। फिर तुम भी जानती हो, तलाक़शुदा औरतों को मर्दों से वह इज्जत हासिल नहीं होती। बस चैरिटी के लिहाज से ये शादियाँ होती हैं, जैसे कोई खैरात की बात हो। रुतबा गालिब के खातिर किसी लाचार पर जैसे इमदाद की बात हो। फिर सौ बातों की एक बात, मेरी अम्मी को इस उम्र में अकेली छोड़ मैं कहाँ जाऊँ? अल्लाह बड़ा कारसाज़ है कि जिंदगी गुजर की जुगाड़ में टीचरी थमा दिया। इतना ही काफी है। माफ करो, अब मैं यह जुआ खेलने को तैयार नहीं।” “बेटी, कुछ तजुर्बा मेरी भी कहती है कि तू अब भी उस गैर मजहबी को भूल नहीं पाई है। इसलिए अब भी ऐसी दलीलें रखती है। पर जिंदगी को आगे देखना चाहिए, पीछे में कुछ नहीं रखा है।” आबिदा ने फिर समझाया।

    रेहाना अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि रिक्सा थम गया। अस्पताल आ गया। ओ पी डी में काफी चहल पहल थी। बीस-पच्चीस लोग कतार में बैठे थे। रिक्सा वाले ने ही बताया, यह नया डाक्टर शाम को भी ओ पी डी में आता है। रेहाना को बड़ा ताज्जुब हुआ, कुछ खुशी भी। रेहाना किसी तरह अम्मी को एक जगह बैठा, नाम लिखाने गई। कंपाउंडर ने बाईस नंबर दिया और कहा, मैडम, आधा घंटा से ऊपर लग जाएगा। पर निराश होने की जरूरत नहीं,वे जरूर देखेंगे।

    रेहाना की बड़ी इच्छा हुई कि वह डाक्टर को एक झलक देखे। आगे आ डाक्टर के कमरे में झाँकी। रेहाना का दिल बैठ गया। अल्लाह, इतने दिनों बाद इस तरह फिर वह दिखा!! या रब्बा, तेरी मर्जी क्या है!! बरसों पहले की बात रेहना के दिमाग में घूम गई। उफ, जैसे यादों का सैलाब आ गया। रेहाना लौट गई उन पुराने दिनों में……..

    “अम्मी, बस एक दिन की ही तो बात है।” रेहाना मनाती हुई अपनी अम्मी से बोली। 
    “दिन नहीं, रात की बात है। और फिर अगर बात बन गई तो शहर से बाहर चार-पाँच साल अकेले दिन रात रहने की भी बात है।” वहीदा बोली। 
    “सो तो है। कोई यूं ही तो कामयाबी पैरों में पड़ी नहीं मिलती।” रेहाना अपनी अम्मी को पीछे से दोनों हाथों जकड़ती बोली। 
    “रहने दे यह लाड़, मुझसे न हो सकेगा।” वहीदा ने सब्जियों को धोते हुए कहा। 
    “अम्मी, मेरा वादा है, मैं कामयाब बनकर दिखाऊँगी।” रेहाना अम्मी के पीठ में मुँह रगड़ती बोली। 
    “वह लड़का कौन है?” अचानक कुछ खामोशी के बाद ओवेन पर रखी कड़ाही में तेल डालती वहीदा पूछी। 
    “कौन?” रेहाना शरमाकर उल्टे पूछी। वहीदा के नजरों में राज उजागर हो गया। वहीदा सोचने लगी और मसाले डाल भूनने लगी। 
    “कहीं वही तो नहीं, जिससे उस दिन परीक्षा के टिफिन में मुलाक़ात हुई थी?” कुछ सोचती सी वहीदा पूछी। 
    “बहुत ज़हीन है। मंसूबे भी बहुत ऊँचे। मुझे यकीन है, एक दिन बहुत कामयाब होगा।” चहकती हुई रेहाना बोली। 
    “तो इसी के सदके तू भी कामयाबी के मंसूबे पाल रही है। भले ज़हीन है पर गैरमजहबी है।” 
    “गैरमजहबी होना कोई ऐब है?” 
    “ऐब तो नहीं पर बन्दिशें भी जाहिर है।”
    “अब तुम्हें कैसे समझाऊँ अम्मी।”
    “समझाना क्या? तू समझ ले।” 
    “फिर कहने को क्या रह गया। मैं सोचती थी, बचपन में पढ़ने लिखने की बात बस कहने भर को नहीं कही गई थी।” 
    “तुझे नहीं लगता कि तेरे अब्बा की मंजूरी भी उतनी ही जरूरी है?” वहीदा पूछी। 
    “अम्मी, उस लॉक गेट को ही खोलना है।” 
    “कौन सा? पढ़ने जाने का या उसके आगे आने वाले अंजामों का? वहीदा ने सब्जियों को कड़ाही में डाल दिया। 
    “एक अच्छी नौकरी। एक मनचाहा जिंदगी। अम्मी, तेरी लाडो के लिए तेरे दिल में ये ख्वाब नहीं पलते?” 
    “पलते हैं, पलते है मेरी रानी बिटिया। पर तू मुझे जिस तरफ इशारा कर रही है, वह मुझे खौफ का मंजर दिखाता है।” वहीदा ने सब्जी में नमक डाला। 
    “मैं यकीन दिलाती हूँ अम्मी कि हम इतने कामयाब होंगे कि तुम्हारे इज्जत पर कोई हर्फ न आयेगा, और यह डर बेतुका साबित होगा।” वहीदा ने रेहाना के आँखों में चमक देखी। उसे डराया। 
    “यह हिंदुस्तान है। यहाँ बातों का बताना बनने में पल भी नहीं लगता। अब इस किस्सा को बंद कर।”
    “अम्मी!” 
    “बंद कर।” 
    “क्या क्या बंद करूँ अम्मी? लड़की हूँ इसलिए? अगर लड़का होती तो यही फख्र की बात हो जाती।”
    “तो फिर सुन। मेरी रजा नहीं मिलती। तू दीवार फाँद ले, गर हिम्मत है तो। ताला न खुले।” कलछुल चलाती अम्मी बोली। 
    “सिर्फ इसलिए न, कि वह गैर मजहबी है। पर सच तो यह है कि वह ज्यादा भरोसेमंद है।” 
    “तुझसे सर्टिफिकेट किसने मांगी?” 
    “सर्टिफिकेट? सर्टिफिकेट का क्या? ये जो सब्जी से भीनी खुशबू आ रही है, इसकी कोई सर्टिफिकेट है? खुशबू ही खुद में सर्टिफिकेट है।” 
    “और यह खुशबू अभी कितनी दूर तक फैली है?” पैनी नजर रेहाना पर गड़ गई। 
    गमगीन हो गई रेहाना। बोल न फूटे। दरवाजा पर पीठ टिकाये खड़ी रही। 
    आखिर सब्जी में थोड़ी सी पानी मिला अम्मी बोली – “जिंदगी फिल्म नहीं है, जज़्बातों से नहीं चलती। ऐसे अहमकाना फैसलों को अपने दिमाग से दरकिनार करो।” 
    “जिस जिंदगी की दुहाई दे रही हैं, आप वही मुझसे मांग भी रही हैं।” रेहाना अपने पैरों के अँगूठों को देखती धीरे से बुदबुदाई। 
    “तकाजा यही है। शरीफ लड़कियाँ अपने वालदैन के लिए दुश्वारी नहीं बनते।” 
    “शरीफ? सच में शरीफ?” 
    “कहना क्या चाहती हो?” 
    “शरीफ बनकर फरेबी बन जाती हैं लड़कियाँ। खुद की नजरों में गिरकर कीमत चुकाती हैं लड़कियाँ। जिंदगी भर ढोती रहती हैं अपने दिल के बोझ को।” 
    “बंद कर तेरा किताबी फलसफा। इससे हकीकत की जिंदगी नहीं चलती।” 
    “अम्मी मान भी जाओ। आँखें बंद कर लेने से दुनिया बंद नहीं हो जाती।” 
    “यह नामुमकिन है।” 
    “सोच का फर्क है। समझ का फर्क है। दो जमाना में बड़ा फर्क आ गया है। अब लड़कियाँ खुदमुख्तारी की हिमायती हैं। हद है, आप हमें खुद सोचने कहती हैं, फिर अपने तई फैसले लेने को सीखने के पैरोकार भी हैं और फिर इतनी भी आजादी देने की मंशा नहीं। न पढ़ाया होता को-एड स्कूलों में, मदरसों में निपटा लिया होता।” 
    “इसके मतलब ये तो नहीं थे कि अपने दायरे भूल जाओ। मनमानी करने लगो।” वहीदा ने फिर से ढक्कन खोला और कुछ बारीक धनिया पत्तों को खौलते सब्जी में डाल ओवेन बंद कर दिया। 
    “अम्मी यह इतना संगीन मसला नहीं है। हजारों लड़कियाँ घर से बाहर पढ़ने के लिए जाती हैं। उनमें से भले कम गिनती के हो पर हममजहब भी जाती ही हैं।” रेहाना ने फिर कोशिश की।
    “पढ़ने जाना एक बात है और किसी गैरमजहाबी के साथ बसर के मंसूबे पालना एक जुदा मसला है। तेरे अब्बू इसकी इजाजत कतई नहीं देंगे। फिर दुनियादारी है, रिश्तेदारी है। कुछ समझती भी है?”
    “अम्मी!!” 
    “देख सब्जी में, तेल अलग तैर रहे हैं, लाख कलछुल चलाने पर भी पानी से नहीं मिलते। मैं महज नहीं कह रही, तजुर्बा कहता है।” वहीदा ने फिर ढक्कन खोल सब्जी में एक बार कलछुल चलाया और कहा। 
    “अम्मी यह तेल पानी वाली मिसाल मेरी अक्ल नहीं मानती। मजहब तो दुनिया में बहुत बाद में आया, इंसान का वजूद तो बहुत पहले से ही था। फिर इस रास्ते पर हम दुनिया के पहले इंसान नहीं है और न आखरी होंगे।” रेहाना के आवाज में कुछ तल्खी थी। 
    “ऐसी बातें जुबानदराज़ी के मिसाल में आती हैं, इतनी समझ की काबिलियत तो है तेरी।” उससे ज्यादा ही तल्खी से वहीदा ने जवाब दिया। 
    रेहाना खामोश तो हो गई पर नाखुशी भी पूरी जाहिर थी। आखिर चंद पल के खामोशी के बाद रेहाना पलटकर चली गई।

    तभी रेहाना ने देखा, अम्मी बुला रही थी – “चल नंबर आ गया। कहाँ खो गई?” 
    खुद को किसी तरह तैयार कर रेहाना बोली – “हाँ, चलो।” 
    अंदर घुसते ही डाक्टर ने सर उठाकर देखा और वह चौंक गया – “तुम?” 
    खुद को संभालती मुस्कुराकर ठंडी सी रेहाना बोली – “नमस्ते। अम्मी को खूब खाँसी हुई है।” 
    डाक्टर संयत हो गया। इतनी समझ की उम्र थी ही। वहीदा को देखा मुस्कुराया। फिर धीरे और मीठी बातों से डाक्टरी में लग गया।

    उधर रेहाना के दिल में तूफान उठे थे। बेचैनी का आलम अंदर में था, बस बाहर जो शांत दिख रही थी। फिर एक बार अम्मी को देखी। अम्मी डाक्टर से बड़ी मुतास्सिर दिखी। वह नब्ज टटोल कर कह रहा था – “इतनी भी गंभीर नहीं है, मेडिसीन दे रहा हूँ। दो तीन दिन में आराम हो जाएगा। फिर पखवाड़ा भर में आप पूरी तरह ठीक हो जाएंगी। मगर इसके बाद मनमानी मत करने लगिएगा। थोड़ा संभलकर रहिएगा, एकदम फिट रहेंगी आप।” कहकर दराज से कुछ दवाईयाँ निकाल कर दिया।

    वहीदा खुश होकर बोली – “बेटा आबिदा ठीक ही कहती है, आधी बीमारी तो तुमसे बातें करके ही दूर हो गई। हमारी दुआ है, खुश रहो तुम। तुम्हारे बाल बच्चे भी तुम्हारे ही जैसे हों।”
    डाक्टर हँसा। फिर बोला – “बाल बच्चे? वो कैसे हो? हमारी तो शादी ही नहीं हुई।” 
    “अरे? आखिर ऐसा क्या हो गया? अच्छा खासा कमाते हो, जवान हो।” वहीदा अचरज से पूछी। 
    डाक्टर चोर नजर से एक बार रेहाना को देखा, फिर बोला – “अपनी अपनी किस्मत है। लड़की तो बहुत मिलती है पर मर्जी नहीं होती शादी की।” 
    “अरे, तुम नौजवानों को आखिर क्या हो गया है समझ नहीं आता। एक मेरी बेटी है, वह भी शादी से इंकार करती है। तलाक हो गया तो क्या हुआ? लाखों लोग दूसरी जिंदगी शुरू करते हैं, पर ये है कि मानती ही नहीं। अल्लाह जाने, क्या मंसूबे हैं।” आबिदा बड़बड़ाई। 
    डाक्टर से रेहाना की नजरें फिर मिली। रेहाना की आँखें डबडबाई। किसी तरह खुद को संभाल वह बोली – “बहुत शुक्रिया आपका। अम्मी ठीक तो हो जाएंगी न! अम्मी के अलावा हमारा और कोई नहीं।” 
    “बिलकुल।” डाक्टर बोला। फिर अम्मी की तरफ देख बोला – “आप निश्चिंत रहिए। ईश्वर की इच्छा से आप जल्द ही स्वस्थ हो उठेंगी।”

    वापस घर लौट वहीदा चहक रही थी। मुँह से फुलझड़ी झड़ रहे थे। बोली – “क्या हुनरमंद लड़का है! जैसे फरिश्ता है। आबिदा सही कहती थी बेटी, भले घर का रौशन चिराग है। अल्लाह करे उसे ढेरों खुशियाँ मिले। उसकी हर मुरादें पूरी हों।”
    धीरे से बिस्तर पर बैठती रेहाना बोली – “इतनी भी खुश मत हो जाओ अम्मी, वह गैर मजहबी है।” 
    वहीदा अचरज से रेहाना को देखने लगी।