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  • फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    फ़िल्म समीक्षा: “आर्टीकल 15” — Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe 

    आर्टिकल 15 एक अच्छी फिल्म है, सभी मित्रों को जरुर देखनी चाहिए. इसमें कई खूबियाँ और कई कमियाँ है. यहाँ जब मैं इसे अच्छी फिल्म कह रहा हूँ तो इसका यही अर्थ है कि यह बहुत सारी दिशाओं में विचार करने को विवश करती है. कोई भी फिल्म या रचना एक आयाम में ही अपने निर्णयों को री-इन्फोर्स करती है तो वह अच्छी रचना या फिल्म नहीं कही जा सकती. समाज, और विशेष रूप से भारत का समाज एसा नहीं है जिसमे कोई एक आयाम में सोचकर किसी विश्लेषण या निर्णय तक पहुंचा जा सकता हो. एक ‘डायनेमिक कोम्प्लेक्सिटी’ है जिसके बीच हर अच्छी और बुरी चीज पनपती और चलती आई है. इस कारण किसी भी अच्छी या बुरी चीज का न तो एक सरल सा कारण है न एक सरल सा परिणाम ही है. इसीलिये इन चीजों या समस्याओं से मुक्त होने का कोई ‘एक स्वर्णिम सूत्र’ भी नहीं हो सकता.


    कुल मिलाकर इस फिल्म में जो मुख्य स्वर है वह है ‘भारत की हजारों साल पुरानी सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने की तीव्र इच्छा’. अब ये इच्छा किसके दिल में और क्यों जन्म ले रही है ये बात अधिक महत्वपूर्ण है. ये इच्छा सबसे पहले तो अतिशूद्रों या दलितों के दिल में जन्म ले रही है जो इस व्यवस्था से केवल नुकसान ही उठाते आये हैं. लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था में बीच के पायदान पर बैठे लोगों शुद्र या ओबीसी में ये इच्छा बिलकुल नहीं है. ये वो लोग हैं जिन्हें इससे कुछ फायदा है और कुछ नुक्सान है, ये लोग सबसे ज्यादा असमंजस में हैं. ये असल में ओबीसी तबका है. इन बीच के लोगों को इस व्यवस्था से फायदा हो रहा है उन्हें इस व्यवस्था में बदलाव की नहीं बल्कि उतने सुधार की जरूरत है जितने से उनका खुद का शोषण रुक जाए लेकिन वे दूसरों का शोषण करना बदस्तूर जारी रखें. यही ‘ग्रेडेड इन-इक्वालिटी’ का चमत्कार है जिस पर बाबा साहेब अंबेडकर के अनुसार भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है. बाबा साहेब के इस वक्तव्य को आगे बढायें तो समझ में आता है कि यही भारत का धर्म और राजनीति भी है, इसीलिये उन्होंने राजनीति बदलने की भरसक कोशिशें करने के बाद अंत में धर्म बदलने की सलाह दी थी जिस पर दुर्भाग्य से आज भी दलित वंचित समुदाय अमल नहीं कर पा रहे हैं.फिल्म में इस जाति व्यवस्था की सडांध को बदलने की तीव्र इच्छा एक दूसरे तबके में भी दिख रही है. ये तबका वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा हुआ है. उसी तबके से नायक और नायक की प्रेयसी आती है. ये नायक ब्राह्मण है और यूरोप में उच्च शिक्षा हासिल किया हुआ है, दिल्ली के सुरक्षित महलों से निकलकर यूरोप के सभ्य समाज में पढने जाता है और अचानक भारत के बर्बर और असभ्य समाज के गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता है.
    ऐसे में स्थिति बदलने की जो तीव्र इच्छा पैदा होती है उसके दो कारण हैं. 


    पहला कारण ये कि वो अभी तक जिस देश समाज और धर्म को अपना समझकर उसमे सम्मान का अनुभव करता था वो देश, समाज और धर्म कुछ और ही शक्ल लेकर सामने आ रहा है. इस देश, समाज और धर्म की जब वो यूरोप के सभ्य समाज से तुलना करता है तो उसे ग्लानि होती है, नायक का अहंकार चोटिल होता है. इसी अवस्था में उसकी प्रेयसी भी है वह भी दलित वंचित समुदाय से नहीं आती बल्कि एक सवर्ण प्रष्ठभूमि से आती है और लिबरल वाम तबके की नारीवादी है. इन दोनों के लिए विकास और सभ्यता की परिभाषाएं भारत के बाहर से आई हुई हैं. ये बड़ी अच्छी बात है. इसी अन्दर बाहर की तुलना ने उपनिवेश काल में भारत के समाज को सभ्य बनाने की शुरुआत की थी. दूसरा कारण ये कि जिस सभ्य यूरोपीय समाज से नायक आ रहा है उससे तुलना करने के लिए या उससे अपने देश की नैतिकता की बराबरी करने के लिए उसे सुदूर अतीत या परम्परा के कोई चीज नहीं मिलती. उसे सभ्यता और नैतिकता का आश्वासन देने वाली जो एकमात्र चीज मिलती है वह है भारत का संविधान. इसी को आधार बनाने के लिए वह तैयार हो जाता है और आगे की लड़ाई लड़ता है. अब ये गजब की बात है ये दोनों कारण असल में यूरोप से आ रहे हैं. यहाँ नोट किया जाये कि संविधान भी यूरोपीय लिबरल मूल्यों से प्रेरित है और उसमे हर कदम पर बर्बर भारतीय समाज की प्राचीन परम्पराओं और नियमों से दूर जाने कि स्पष्ट पृवृत्ति है.


    फिल्म का नायक भारत में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में जब अपने राष्ट्र और धर्म पर ‘पौरुष भरे गर्व’ को चूर-चूर होता देख रहा होता है तभी उसकी प्रेयसी उसके गर्व को एक अन्य कोमल और नारीवादी आयाम से चोट मारती है. यूरोप के सभ्य समाज से भारत की तुलना कर रहा यह नायक ठीक इसी समय बारी बारी से उन लोगों से मुखातिब होता है जो पूरे शोषक हैं, जो आधे शोषक आधे शोषित हैं और अंत मे वो उन लोगों से भी मुखातिब होता है जो सौ प्रतिशत शोषित हैं.

    कहानी आगे बढती है. पित्रसत्ता, पुरुषसत्ता, जातीय दंभ को परम्परा और पवित्र शास्त्रों, भगवानों के उद्धरण से जायज ठहराते हुए यह स्थापित किया जाता है कि ये शोषण जो हो रहा है वह असल में आ कहाँ से रहा है.

    इसके बाद शोषित लोगों की बुरी हालत को भी समझाया जाता है. ‘औकात’ शब्द बार-बार आता है जो असल में भारत के धार्मिक राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धुरी है. शोषण का मूल आधार ‘औकात’ का होना या न होना ही है लेकिन ये जब अभिव्यक्त होता है तो आर्थिक आधार पर होता है. ‘औकात’ भारत के धर्म और शास्त्रों ने पहले ही तय कर दी है और औकात तय करने के बाद स्वाभाविक रूप से उभरने वाली सामाजिक व्यवस्था का पालन करना और करवाना हर जाति की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन जाति है.

    इस जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने से नीची जाति का अपमान करना, मजदूरी कम देना, पिटाई करना, बलात्कार करना, गंदे कामों में लगाए रखना, भयभीत कुपोषित बनाए रखना इत्यादि इत्यादि धर्म और शास्त्रों के अनुसार जायज काम हैं जो कि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए स्वयं इश्वर या ब्रह्म ने बताये हैं.

    अपने देश, समाज या धर्म को इस नायक ने गलती से जिस रूमानियत में कुछ और ही समझ लिया था, वो जमीन पर हकीकत में कुछ और ही निकलता है. इससे उसे और उसकी प्रेयसी को चोट लगती है. पूरी फिल्म में यह चोट बार बार शोर मचाती है. साथ ही अछूत या अस्पृश्य जातियों से आने वाले गरीब और असहाय लोगों का रुदन और विलाप भी इसमें बहुत कलाकारी और सावधानी से उभारा गया है. 

    इस फिल्म में कई सारे उल्लेख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आते हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण, रोहित वेमुला प्रकरण, खैरलांजी काण्ड, अतीत के महाकाव्यों से उभर रहे पात्र और इन सबके साथ ही उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीती के कई सारे बिंब एकसाथ समानांतर बहते हैं और इस देश और इसके समाज के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं.

    इन समानांतर बह रहे बिंबों के बीच यूरोप के सभ्य समाज से सभ्यता और ज्ञान की सुगंध लेकर अचानक भारतीय समाज की सडांध में आ गिरने वाले नायक को अपने गर्व और नैतिकता को बचाने के लिए एकमात्र उम्मीद भारत के संविधान में नजर आती है. मेरे लिए यही इस फिल्म का केन्द्रीय बिंदु है जहाँ से फिल्म में और फिल्म के बाहर भी सब कुछ बदल जाता है.

    इस फिल्म में कुछ कमजोरियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं. एक सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी में है. शोषित वर्ग के अर्थात दलितों वंचितों के नायकों और मुक्तिकामियों को यहाँ कमजोर और असहाय बताया गया है. वे हमेशा रोते सिसकते रहते हैं जैसे कि यूरोप अमेरिका से आने वाले किसी सवर्ण द्विज मसीहा का इंतज़ार कर रहे हैं. उनके अपने संघर्ष का कोई परिणाम तभी निकल सकता है जब कि शोषक अर्थात सवर्ण द्विज तबके या जातियों में ही जन्मा कोई मसीहा यूरोप से सभ्य होकर भारत आएगा और उनकी मदद करेगा. एक तरह से दलितों वंचितों की मुक्ति की संभावना सवर्ण द्विजों के प्रयासों और सदिच्छा पर ही निर्भर है.

    ये निर्भरता पीड़ित करती है. इसका कारण समझना भी आसान है. असल में यह फिल्म उन लोगों के लिए बनाई गयी है जो स्वयं जातिगत शोषण की इस डिजाइन में फायदा उठा रहे हैं. ये फिल्म उनके ह्रदय परिवर्तन कि दृष्टी से बनाई गयी है. इसीलिये शोषकों के जातीय अहंकार को इतनी भी चोट न लगे जाए कि हृदयाघात ही हो जाए. हृदय परिवर्तन के लिए सच्चाई को उजागर करते हुए उसे सुरक्षित सीमाओं में रखना होता है ताकि हृदयाघात ही न हो जाए. शोषकों के ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद और इंतज़ार करने का यह आग्रह इस फिल्म की कहानी में एक ऐसी मजबूरी बनकर उभरता है जो बहुत निराश करती है. इतिहास में जाकर अगर हम गांधी और अंबेडकर की अप्रोच के बीच के तनाव को देखें तो यह वाही तनाव है. गांधी ह्रदय परिवर्तन चाहते हैं और अंबेडकर व्यवस्था- परिवर्तन और धर्म परिवर्तन चाहते हैं.

    ये सुरक्षित सीमा बनाये रखना बिजनेस और मार्केटिंग के नजरिये से भी जरुरी है. सीधी सी बात है आपके प्रोडक्ट को खरीदने वाले लोगों की नैतिकता और धर्म पर बेरहम चोट नहीं पहुंचाई जा सकती. एक सुरक्षित सी ‘चपत’ लगाकर प्यार से आग्रह करना फायदेमंद है. यही इस फिल्म में भी किया गया है. अंत में इस फिल्म को देखने वाला ‘कास्ट ब्लाइंड’ तबका अगर अपनी विरासत धर्म और समाज पर रत्ती भर भी गर्व न कर सके तो वो सिनेमा हाल में बैठे बैठे ही टूट जायेगा. नायक और नायिका तो संविधान में गर्व करते हुए स्वयं को बचा लेते हैं लेकिन आम सवर्ण भारतीयों से इतनी उम्मीद नहीं की जा सकती. उन्हें अंतिम रूप से गर्व करने के लिए संविधान नहीं दिया जा सकता. वे जिस एकमात्र चीज में गर्व कर सकते हैं वो बात ये है कि “चलो अतीत में हमने जो भी गलत किया लेकिन वर्तमान में या भविष्य में इसे ठीक भी हम ही करेंगे”.

    यही वो केन्द्रीय बात है जो मुझे पीड़ित करती है. शोषित की ‘एजेंसी’ या ‘कर्ता होने की संभावना’ को व्यवस्था या ‘स्ट्रक्चर’ फिर से निगल लेता है. यहाँ दलितों शोषितों को सन्देश ये दिया जा रहा है कि शोषण भी हम ही करेंगे और तुम्हे मुक्त भी हम ही करेंगे. तुम बैठकर रामलीला देखते रहो.

    अभी भी भारत का समाज इतना सभ्य नहीं हो सका है कि वो स्त्रीयों की आजादी का श्रेय किसी स्त्री को दे सके. या दलितों- ट्राइबल्स की मुक्ति का श्रेय खुद दलितों या ट्राइबल नेताओं को दे सके. भारत का सवर्ण द्विज पुरुष आज भी स्त्रीयों का मुक्तिदाता खुद बनना चाहता है, साथ अवर्णों, दलितों और वंचितों को मुक्त करने का श्रेय स्वयं ही लेना चाहता है. इसका एक गहरा कारण है. जब शोषक तबके से आने वाले लिबरल नायक वंचितों को मुक्त करने वाली इबारत लिखते हैं तो वे व्यवस्था में कोस्मेटिक बदलाव कर आपद धर्म निभाते हैं.

    वे शोषण के कील मुहांसों का फौरी इलाज करके निकल जाते हैं ताकि इस समाज की शिराओं में बह रहा जहरीला और दूषित रक्त ही पूरी तरह न बदल जाए. स्मृति शास्त्रों में दी गयी व्यवस्था कोई पूरी तरह न उखाड़ दे, इसके लिए पहले ही आगे दौड़कर चलताऊ बदलाव कर दीजिये. इस तरह महान बनने का श्रेय भी मिल जाएगा और प्राचीन व्यवस्था भी जस की जस बनी रहेगी. फिर जब समय अनुकूल होगा तो स्मृतियों को कानून की तरह लागू करने का कोई रास्ता निकाल लेंगे.

    इस तरह ये चलताऊ सुधार असल में शोषण की पीड़ा से भी अधिक खतरनाक होता है. कील मुहांसों का इलाज करके सामाजिक व्यवस्था के मूल आधार, उसके रक्त अर्थात उसके धर्म और नैतिकता को न बदलते हुए चलताऊ सुधार ले आना एक षड्यंत्र है. इसके जरिये धर्म, शास्त्र और नैतिकता की मूल प्रस्तावनाओं को तात्कालिक चोटों से बचाया जाता है. ये भारतीय द्विजों का सबसे बड़ा षड्यंत्र है.

    राजा राममोहन रॉय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशव चन्द्र या गांधी जैसे सुधारकों ने आज तक भारत में यही किया है. वे इस देश के धर्म दर्शन और नैतिकता पर उतनी ही चोट लगाते हैं जितनी कि यूरोपीय सभ्यता को एकोमोडेट करने के लिए जरुरी हो. वे उससे एक इंच भी आगे नहीं जाते. इसके विपरीत अंबेडकर, कबीर, फूले, पेरियार और ललई सिंह यादव जैसे क्रांतिकारी इससे कहीं आगे जाकर इस धर्म और इसकी नैतिकता पर ही चोट करते हैं ताकि जहरीले पेड़ की जड़ ही सूख जाए. द्विज क्रांतिकारी जहरीले पेड़ के पत्ते और फल नष्ट करते हैं लेकिन उसकी जड़ पर प्रहार नहीं करते.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    Sanjay Shramanjothe

    भारतीय इतिहास या संस्कृति के किसी भी मुद्दे पर बात करिए, एक बात भयानक रूप से चौंकाती है. सामान्य ढंग के भक्त और कम शिक्षित लोगों में जानकारी का अभाव होता है, इसलिए उनकी बातें बस प्रचलित नारों की प्रतिध्वनी भर होती है. खैर ये बात कम पीड़ित करती है. ज्यादा दुःख होता है रजनीश भक्तों से, इसमें श्री श्री और जग्गी वासुदेव के शिष्य भी जोड़े का सकते हैं. ये लोग एकदम दिशाहीन होते हैं.

    बात बात में ध्यान या समाधि के अनुभव की बात करते हैं. सीधे जाकर ध्यान करने की सलाह देते हैं, सलाह देते हुए जताते जाते हैं कि ये तो बुद्धपुरुष बन ही चुके हैं। कोई भी मुद्दा हो उसकी ऐसी व्याख्या बताएँगे कि बस हंसने और रोने के आलावा कोई रास्ता ही नहीं बचता.

    अभी नास्तिकता और बुद्ध पर बात निकली, दो रजनीश भक्त कहीं से निकल आये और कहने लगे कि शब्दों को छोड़कर अनुभव में जाइए बुद्ध आस्तिक और नास्तिक का अतिक्रमण हैं. ठीक है भाई. मान लिया भाई. अब इसका अर्थ आप ही समझाइये, अर्थ से ज्यादा इसके इम्प्लिकेशन पर भी आइये. ये लोग स्वयंसिद्ध बुद्ध पुरुष हैं. रजनीश ने ऐसे स्वयंसिद्ध लोगों की फ़ौज खड़ी की है और इसी फ़ौज की मूर्खता में वे खुद भी दब मरे. अमेरिका में उनकी जो गत हुई वो बाहरी षड्यंत्र से कम भीतरी षड्यंत्र से ज्यादा हुई.

    इस झटके में जो बुद्धि आई उसके बाद उनका अंदाज ही बदल गया. लेकिन उसके पहले उन्होंने जो सैकड़ों किताबें रंग डालीं थीं उनकी मूर्खताओं से लोगों को निकालना मुश्किल है. ओशो बनकर उन्होंने खुद ही इन किताबों को नकारने का पूरा प्रयास किया था लेकिन भक्त क्यों सुनेंगे?और जो सुन ले वो फिर भक्त ही किस काम का.

    अब बुद्ध और शून्य की बात करते हैं. रजनीश जिन्दगी भर समझाते रहे शून्य और पूर्ण एक ही हैं. उनकी भी बीमारी वही है जो उनके भक्तों की है. फल से पता चलता है पेड़ कैसा था. शुन्य और पूर्ण उनके लिए एक हैं. इसका मतलब हुआ कि जिस अनुशासन या अंतर्दृष्टि से शून्य का अनुभव होता है वो औपनिषदिक या ब्राह्मणी दृष्टि के समान ही है.

    अगर ये बात सच है तो बुद्ध ने नाहक श्रम किया. रजनीश अगर सही हैं तो महावीर और बुद्ध दोनों मूर्ख हैं जो इतने साल तक वेदों और परमात्मा को नकारते रहे. भगवान रजनीश दर्शन की जलेबियाँ बनाते हुए कहते हैं कि जिस तरह शंकर प्रच्छन्न बौद्ध हैं उसी तरह बुद्ध प्रच्छन्न वेदांती हैं.

    ये रजनीश के पाखण्ड की अंतिम उंचाई है. इसके बाद वे सीधे नीचे लुढकते हैं और रजनीशपुरम की राख में औंधे मुंह गिरते हैं. और ऐसे गिरते हैं कि उनकी तैयार की हुई फौज में से एक भी ऐसा आदमी आज तक खड़ा न हो सका जो उनके अंतिम समय की समझ को थोड़ा सा आगे बढा सके. सब के सब कॉपीराइट और सम्पत्ति के नाम पर लड़ रहे हैं।

    जितने भक्त हैं वे सब दाढ़ी बढ़ाकर चोगा पानकर आँखें चौड़ी कर करके फोटो खिंचाते रहते हैं. कुछ अन्य हैं जो नोंनवेज जोक्स सुनाकर ही समाधि लाभ करते रहते हैं. अभी हरियाणा में एक आश्रम खुला है ओशो के नाम पर वे चौरासी दिनों में चौरासी लाख योनियों से शर्तिया छुटकारा दिलाते हैं. ये रजनीश की कन्फ्यूज्ड शिक्षाओं का स्वाभाविक परिणाम है. ये न हो तो आश्चर्य होगा. ये हो रहा है तो एकदम सही हो रहा है. कई सूरमा यहीं फेसबुक पर हैं, खुद के नाम के आगे ओशो लगाकर लोगों की कुंडलिनी जगा रहे हैं. मतलब खुद की तो जग गयी अब जगत का कल्याण कर रहे हैं.

    एक अजीब सी प्रवृत्ति है इन वेद वेदान्त के प्रेमियों में वे किसी मुद्दे को उसके तर्क और उसके इम्प्लिकेशन के संदर्भ में देखते ही नहीं. कभी नहीं सोचते कि उनकी जलेबिदार व्याख्या का फलित क्या होगा. अब रजनीश को देखिये वे शून्य और पूर्ण को एक ही बताते हैं. इस व्याख्या में वे तर्क कम और आंतरिक अनुभव की ज्यादा बात करते हैं. इसे वे कहते हैं आंतरिक अनुभव की परिपक्वता और उससे जन्मी स्थित्प्रग्यता और तटस्थता. खुद तो इसे भांज ही रहे हैं औरों को भी ये जहरीली भांग तैयार करने का प्रशिक्षण दे जाते हैं.

    अब उनके मूर्खता का आलम देखिये शून्य और पूर्ण एक ही हैं, भक्ति और ज्ञान एक ही है, कर्म और अकर्म एक ही है. तर्क और कुतर्क एक ही है. जय और पराजय एक ही है. तो फिर वही होना है जो आज तक हुआ है. फिर ये भी मान लीजिये कि रजनीशपुरम का होना और मिटना भी एक ही है. लेकिन जब रजनीशपुरम को बुलडोजरों से तोड़ा गया तब रजनीश बहुत क्रोधित हुए. जमाने भर में प्रेस कान्फ्रेरेंस करते रहे.

    कुछ विडिओ तो ऐसे हैं जिनमे रजनीश पत्रकारों पर क्रोधित हो रहे हैं. अब कहाँ गयी तटस्थता?भक्त भी गजब हैं. कुछ फोटो हैं जिनमे रजनीश हथकड़ी लगाये खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं. भक्त इसे शेयर करके कहते हैं कि ये है स्थितप्रज्ञ समाधिस्थ व्यक्ति जो दुःख में भी मुस्कुरा रहा है.

    इन्ही भक्तों की वाल पर रजनीश का चीखता हुआ वीडियो भी मिलेगा उसके परिचय में लिखा मिलेगा – ओशो का रौद्र रूप. गजब है भाई. अब मुस्कुराहट और रौद्र रूप अलग क्यों हो गये? ये क्यों नहीं कहते कि ओशो संतुलन खो चुके हैं.

    बस भक्त जन ऐसी ही जलेबियाँ बनाते हैं. भक्त किसी राजनेता के हों या धर्मगुरु के उनकी लीला ही न्यारी है. वो जो न करें सो कम है. दुर्भाग्य ये कि इन सभी भक्तों में अचानक भाईचारा जाग उठा है. कुम्भ मेलों के बिछड़े इन सभी भक्तों का अचानक से भारत मिलाप हो गया है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    Sanjay Shramanjothe

    एक दिन पश्चिम का विज्ञान भारत घूमने आया. भारत के ज्ञानपुर में आते ही उसने भारत की “संस्कृति देवी” और भारत के “इतिहास बाबू” को कुश आसन पर पद्मासन में बैठे गहन धार्मिक (गधा) विमर्श करते हुए देखा. ये दोनों जुड़वा भाई बहन थे.

    थोड़ी देर उसने उनकी बातें सुनने की कोशिश की लेकिन संस्कृत भाषा के सूत्रों और मन्त्रों से भरी बातचीत वो समझ न सका. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने नवागंतुक को देखकर नमस्कार किया और उनका आपस में परिचय हुआ.

    विज्ञान से पूछा गया कि आप कहाँ से आये हैं आपका वर्ण कुल गोत्र और जाति क्या है?

    विज्ञान ये प्रश्न समझ नहीं सका… वर्ण जाति कुल गोत्र आदि के महान भारतीय आविष्कारों से परिचित न था।

    लेकिन संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने जिद पकड़ ली उन्होंने कहा कि “भद्रपुरुष जब तक हम वर्ण गोत्र और जाति न जान लें तब तक हमारी धमनियों में रक्त जमा रहता है, हमारा भोजन नहीं पचता हमारा मल मूत्र विसर्जन भी रुक जाता है”

    ऐसी भीषण अवस्था देखकर विज्ञान को दया आई, वो बोला “मैं पश्चिम देश से आया हूँ मेरे पिता का नाम प्रयोग और माता का नाम जिज्ञासा है. मैं असल में वर्ण संकर हूँ मेरे माता पिता के अन्य कई मित्र सहयोगी हैं जो एकसाथ रहते हैं, कौशल, साहस, सहकार, सभ्यता और खोज और आविष्कार ये सब हमारे परिवार में इकट्ठे रहते हैं, आप समझ लें मैं इन सबको माता पिता समान समझता हूँ”

    अब वर्ण संकर शब्द सुनते ही भारतीय संस्कृति और इतिहास ने नाक भौं सिकोड़ ली लेकिन ऊपर ऊपर सभ्य बने रहे, भारतीय मेजबानों को ये बात समझ न आई कि ये “प्रयोग” क्या होता है और “जिज्ञासा” क्या होती है, साहस, सहकार सभ्यता भी उनके लिए बिल्कुल नए नाम थे. फिर भी वे मूढ़ नजर नहीं आना चाहते थे इसलिए बनावटी हसी हंसते हुए बोले “अच्छा अच्छा हम इन्हें जानते हैं, खूब जानते हैं”.

    विज्ञान ने साहस बटोरते हुए मेजबानों के माता पिता का नाम पूछा तो दोनों मेजबान बोले “हमारे माता पिता दोनों एक ही हैं, न सिर्फ माता पिता बल्कि वे ही हमारे दादा दादी पितामह महापितामह इत्यादि भी हैं, वे ही हमारे अतीत हैं और वे ही हमारे भविष्य भी हैं.”

    अब विज्ञान चक्कर खाकर गिरने को हुआ. उसने पूछा ये क्या गजब की बात कर रह हैं आप ऐसा कैसे हो सकता है?

    संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बड़ी सयानी हंसी हँसते हुए बोले “महाशय आप इस पुण्यभूमि पर नए नए आये हैं अभी तो चमत्कारों की शुरुआत भर है”. विज्ञान हाँफते हुए बोला कि ठीक है मैं सदैव नए ज्ञान को सीखने का प्रयास करता हूँ अब कृपया अपने माता पिता का नाम तो बताइये. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने दोनों हाथों से अपने कान छूते हुए आँख बंद करके एक स्वर में कहा “पुराण हमारी माता है और पुराण ही हमारा पिता है, वही अतीत है वही भविष्य भी है”

    विज्ञान ने ये “पुराण” शब्द पहली बार सुना था, वो सहज जिज्ञासा करते हुए पूछने लगा कि ये उभयलिंगि प्राणी हमारे देश में नहीं होता ये प्राणी, मतलब अपने माता पिता करते क्या हैं? मेजबान बोले “ वे स्वयं कुछ नहीं करते बल्कि जो कुछ भी दूसरों का किया धरा है उसे अपने श्रीमुख से संस्कृत सुभाषित बनाकर बोल देते हैं. वे जो बोलते हैं उसी को हम वचनामृत समझकर गृहण करते हैं और उसी का चरणामृत इस पुण्यभूमि पर बांटते निकल पड़ते हैं”

    विज्ञान की उत्सुकता बढती गयी. उसने कहा कि ये तो गजब की बात है क्या आप मुझे पुराण जी से मिलवा सकते हैं? संस्कृति देवी और इतिहास बाबु बोले “हाँ-हाँ क्यों नहीं वे अभी लोटा लेकर जंगल मैदान गए हैं निपट के आ जाएँ फिर यहीं बैठकर तत्वचर्चा करते हैं”

    पांच मिनट बाद ही पुराण महाशय ढीली धोती, खडाऊ, लोटा और जनेऊ संभाले हुए और संस्कृत मन्त्र बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे. उनके आज्ञाकारी पुत्र-पुत्री ने उनके चरण स्पर्श किये. विज्ञान ने उनसे हाथ मिलाना चाहा

    लेकिन मंत्रपाठी पुराण जी ने दूर से ही नमस्कार किया और जींस टीशर्ट पहने खड़े इस गौर वर्ण युवक को घूरने लगे. इतिहास बाबू ने परिचय दिया “ये विज्ञान महाशय हैं, पश्चिम देश से आये हैं. सौभाग्यवती जिज्ञासा देवी और चिरंजीव प्रयोग बाबु के सुपुत्र हैं यहाँ पुण्यभूमि पर आपसे तत्वचर्चा कर धर्मलाभ लेने आये हैं”

    जिज्ञासा और प्रयोग का नाम सुनकर पुराण जी भी कुछ समझ न पाए लेकिन विश्वगुरु की गर्वीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले “अच्छा अच्छा … जिज्ञासा और प्रयोग … जानते हैं … खूब जानते हैं इन्हें … ये पहले भारत वर्ष में ही रहते थे, यहीं अपने सत्यनारायण महाराज के मंदिर के पीछे वाली गली में. हमने इन्हें अपनी गोद में खिलाया है” …

    विज्ञान बाबु ये सुनकर गदगद हो गये कि चलो परिचय का कोई तो सूत्र निकल आया, लेकिन वे इस चमत्कार को समझ न सके. वहीँ संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने अपने पिता के दुबारा चरण छुए और अपने चमत्कारी पिता पर गर्व से फूल बरसाए…

    क्रमशः…

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    Sanjay Shramanjothe

    भारत की सँस्कृति में ‘उर्ध्वमूल अश्वत्थ’ की धारणा है, जो कहती है कि जगत परमात्मा का पतन है, इसलिए जागतिक ज्ञान भी ईश्वरीय ज्ञान का पतन है, ईश्वरीय ज्ञान सब कुछ है.

    अब ईश्वरीय ज्ञान इतना हवा हवाई और सब्जेक्टिव है कि उसे किसी भी दिशा में किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इतिहास बताता है कि धर्म-धूर्तों ने उसे कैसे इस्तेमाल किया है. उनके पास एक कर्मकांड या यहाँ तक कि एक मन्त्र पढ़कर भी इस ईश्वरीय ज्ञान को घोटकर पी जाने के उपाय हैं. वहीं वे धूर्त ये भी कहते हैं कि ये तो जन्मो जन्मों की साधना से मिलता है.

    जन्मों जन्मों के पुरुषार्थ के परिणाम में ये ज्ञान मिलता है तो लोग इस बात से डर जायेंगे, लेकिन उनके पास ईश्वरीय ज्ञान का क्रेश-कोर्स भी है. चार पुडिया खाकर भी आप परम स्वास्थय का लाभ ले सकते हैं. सिर्फ एक मन्त्र, एक दीक्षा एक कान फुन्कवाई या तीसरे नेत्र पर एक छूवन और आप इश्वरी ज्ञान के महल में अंदर!

    तब असल खेल शुरू होता है. अगर ईश्वरीय ज्ञान चुटकी बजाते मिल सकता है तो ‘नीच’ जागतिक ज्ञान की किसे और क्यों जरूरत है? वे ईश्वरीय ज्ञान का ढोल बजाकर लौकिक या भौतिक जगत के ज्ञान को दुत्कारते रहे हैं. ये एक भयानक पैरालिसिस है भारतीय मन का, इसने भारत मे सभ्यता के विकास को रोक रखा है.

    प्राचीन यूरोप में भी यही बीमारी थी, ज्ञान का फल चखना हव्वा और आदम का सबसे बड़ा अपराध माना गया है. लेकिन बाद में उस फल की फसल बोना, काटना और उसका अचार मुरब्बा जेली इत्यादि बनाना उन्होंने ठीक से सीख लिया और जिस इश्वर ने उन्हें अदन के बगीचे से निकाला था उसी इश्वर को उन्होंने अब अपने इंसानी बगीचे से धक्के देकर बाहर निकाल दिया है. नतीजा सामने है. अब ईश्वरीय ज्ञान के ठेकेदार जागतिक और भौतिक ज्ञान में अपने लिए समर्थन खोजते फिरते हैं.

    भारत में भी बाबाजी लोग क्वांटम फिजिक्स बखानते रहते हैं. वेद वेदान्त में घुसने से ठीक पहले क्वांटम फिजिक्स उनका अनिवार्य पड़ाव है. उन्हें पता है कि अब भौतिकशास्त्र इस स्तर पर आ गया है कि जगत और जीवन की उत्पत्ति सहित परम निर्वात पर भी बहुत ठोस जानकारी दे पा रहा है. वे इसी जानकारी का पूरा इस्तेमाल अपनी जहरीली इबारत लिखने में करते हैं. और आधुनिक विज्ञान जहां बात खत्म करता है या जिन प्रश्नों को भविष्य के लिए छोड़ देता है उन्ही प्रश्नों को आधार बनाते हुए हमारे जगतगुरु लोग भौतिक ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान से जोड़ देते हैं. पश्चिम के वैज्ञानिक ही नहीं पूरा पश्चिमी समाज इन पर हंसता है लेकिन इन्हें ज़रा शर्म नहीं आती.

    यूरोप के विपरीत भारत में इश्वर लगातार मजबूत हो रहा है. पूरब पश्चिम को एक करने की बात करने वाले अरबिंदो घोष से लेकर जोरबा दी बुद्धा की अजीब बहस चलाने वाले ओशो रजनीश और उनके बाद न जाने कहाँ कहाँ के सद्गुरु और विश्वगुरु अभी भी बहुत प्रभावशाली बने हुए हैं. इसका सीधा परिणाम भारत की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि शिक्षा और ज्ञान की मूलभूत अवधारणा के पतन में ही साफ़ नजर आता है.

    भारत के उपनिषद् ही नहीं बल्कि धार्मिक कानून (धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ) ब्रह्म और ब्रह्मज्ञान की इस व्यर्थ की बहस से भरे पड़े हैं. उपनिषद् काल में एक ही ढंग का आदमी हुआ है जिसने इस पूरी परम्परा को कड़ी टक्कर दी थी.

    छान्दोग्य उपनिषद् के उद्दालक ने कार्य कारण और जीवंत प्रेक्षण के आधार पर जगत और जागतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या का पहला वैज्ञानिक प्रयास किया था, जिसे पोंगा पुराण रचने वालों ने बर्बाद कर दिया. भारतीय दार्शनिक साहित्य में उस समय में और उसके बाद भी उद्दालक और याज्ञवल्क्य का आपसी विरोध बहुत महत्वपूर्ण है.

    उद्दालक ने हवा हवाई ज्ञान के खिलाफ कार्य कारण आधारित ज्ञान का पक्ष लिया था. लेकिन बाद के वर्षों में उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु के एक संवाद को इस तरह से रचा गया की उद्दालक के मुंह से ही ईश्वरीय ज्ञान की महिमा बुलवा ली गयी. यह कबीर के मुह से रामानन्द बुलवाने जैसी चाल है. ये कथा रची गयी की श्वेतकेतु जब गुरुकुल से घर लौटता है तो उसका पिता उद्दालक उसे ब्रह्मज्ञान सीखने को प्रेरित करता है. इस कथा को ओशो रजनीश ने बड़ी कुशलता से इस्तेमाल करते हुए हवा हवाई ब्रह्मज्ञान की महिमा को फिर से स्थापित किया है.

    यही उद्दालक, आधुनिक भारत के महान दार्शनिक देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की नजरों में भारतीय भौतिकवाद के आदि पुरुष बन जाते हैं.और इन्ही को ओशो रजनीश जैसे पोंगा पंडित ब्रह्मज्ञानी बना डालते हैं. देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय ज्ञान के जिस फल की पूरी फसल को संरक्षित करके भारत के गरीबों में बाँट देना चाहते हैं उसे ओशो रजनीश जैसे लोग फिर से ईश्वरीय लोक के अदृश्य समन्दर में फेंक आते हैं.

    अभी भारत में शिक्षा ही नहीं बल्कि ज्ञान मात्र का जो तिरस्कार हो रहा है उसे समझना इतना आसान नहीं है. आपको ये समझने के लिए याज्ञवल्क्य जैसे ब्राह्मणवाद के पुराने चैम्पियंस को और ओशो रजनीश जैसे नये ब्राह्मणवादी चैम्पियंस को भी ठीक से समझना होगा.

    ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का ये एक सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह है. ये जहरीली नदी अगर बहती रहती है तो भारत की शिक्षा व्यवस्था याज्ञवल्क्य और ओशो रजनीश के मानस पुत्रों द्वारा बार बार बर्बाद की जायेगी. जब तक इस ईश्वरीय ज्ञान की बकवास को बंद नहीं किया जाता तब तक भारत सभ्य नहीं हो सकेगा.

    भारत की शिक्षा की दुर्दशा स्वयं में बड़ा विषय है लेकिन ये खुद भी अपने आपमें कहीं बड़ी बीमारी का लक्षण भर है.

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध की परम्परा, उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत गहराई से चाल चली गयी थी. पिछली सदी में डॉ. अंबेडकर सहित आज के इंडोलोजिस्ट्स भी यह बात सिद्ध कर चुके हैं कि एक धीमा और बहुत बारीक षड्यंत्र ब्राह्मणों के द्वारा फैलाया गया. श्रमण बौद्ध परम्परा जो कि इस शरीर और मन सहित इन दोनों के सम्मिलित परिणाम – व्यक्तित्व को अस्थाई मानती थी उस परम्परा में ऐसी मिलावट की गयी जो बाद में सनातन आत्मा को सही सिद्ध करने लगी.

    गौतम बुद्ध सनातन आत्मा के सिद्धांत को नकारते हैं. सनातन आत्मा असल में वेदान्त और ब्राह्मणवाद का केन्द्रीय सिद्धांत है. इसी से पुनर्जन्म और विस्तारित कर्म का सिद्धांत निकलता है. यह सिद्धांत यह बताता है कि कोई आदमी मरकर एक से दुसरे जन्म में अपने मन, व्यक्तित्व, प्रवृत्तियों इत्यादि को लेकर जाता है और दुसरे शरीर या जन्म में फिर से अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है.

    इसके विपरीत गौतम बुद्ध सिखाते हैं कि ऐसी कोई आत्मा नहीं होती जो एक से दुसरे जन्म में अपने पूरे व्यक्तित्व और संस्कारों को लेकर जाती हो. बुद्ध तो यहाँ तक कहते हैं कि अभी इसी जिन्दगी में आप अपने शरीर और व्यक्तित्व को कई बार बदलते हैं वह शरीर और वह स्व पल पल बदलता है.

    यही बुद्ध का केन्द्रीय सिद्धांत – अनित्यता है. इस अनित्यता के सिद्धांत के अनुसार पूरी प्रकृति कम्पायमान है. भौतिक पदार्थ, चार महाभूत (धरती, जल,वायु, अग्नि) सब निरंतर कम्पायमान हैं और शरीर और मन भी निरंतर बदलता रहता है. ऐसे में हमारे सामने नजर आ रहे किसी एक व्यक्ति का कोई ठोस व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती. वह व्यक्ति कोई नयी भाषा नया व्यवहार सीखकर अपने आपको पूरी तरह बदल सकता है. अभी वह व्यक्ति सामान्य बातचीत कर रहा है और दो मिनट में वह क्रोधी और हत्यारा बन सकता है. उसका शरीर भी रोज किये जा रहे भोजन से निरंतर बदल रहा है.

    ऐसे में बदलते शरीर और बदलते मन के परिणाम में जन्मा यह स्व या यह आत्म या यह व्यक्तित्व सनातन कैसे हो सकता है?

    वेदान्त इसके विपरीत जाते हुए कहता है कि आत्मा सनातन होती है. जो कुछ पिछले जन्म में किया गया वह उस आत्मा के साथ पूरी तरह जुड़ जाता है इसीलिये पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम भुगतना होता है. इसीलिये आज जो गरीब बीमार और शोषित है उसे अपने कर्म ठीक करने चाहिए. उसने किसी पिछले जन्म में कोई पाप कर्म किया होगा इसलिए वह गरीब और दुखी है. वेदांती यह भी बताते हैं कि पूर्व जन्मों की अनंत श्रंखला में किये गए महापाप के कारण ही कोई व्यक्ति शूद्र या चांडाल बनता है और पूर्व जन्मों के दान पुण्य वृत तप इत्यादि के कारण ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण बनता है.

    यह सिद्धांत भारत में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता आया है. ऐसे सिद्धान्तकारों से पूछना चाहिए कि पिछले जन्म में पुण्यकर्म करने वाले लोग ही अगर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य बनते रहे हैं तो उनके सैकड़ों जन्मों में किये गये दान, तप और पुण्य के बावजूद इस वर्तमान जन्म में आकर वे छुआछूत,घृणा, शोषण और दमन क्यों करने लगते हैं? उनकी अपनी सनातन आत्मा के पूर्व जन्म के सभी अच्छे संस्कार इस जन्म में अचानक निरस्त क्यों हो जा रहे हैं? उनका दान पुण्य उनका सदाचरण अचानक इस जन्म में घृणा और जातीय हत्याओं और बलात्कारों में क्यों बदल जा रहा है?

    ऐसे सवालों के जवाब आज तक कोई वेदांती बाबा नहीं दे पाया है.

    दुर्भाग्य से ऐसे वेदांती बाबा बहुत पुराने समय से ही दलितों बहुजनों और आदिवासी समाज में भी घुसकर सनातन आत्मा का सिद्धांत सिखाते रहे हैं. पहले वे अनपढ़ लोगों को कर्मकांड व्रत उपवास मान मनौती सिखाते हैं. और इन्ही में से शिक्षित हो रहे और जागरूक हो रहे लोगों को वे ध्यान समाधि साधना के जाल में फसाते आये हैं. दलित बहुजन और आदिवासी समाज के शिक्षित सम्पन्न वर्ग को अध्यात्म और ध्यान समाधी के नाम पर फिर से वाही सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखाया जा रहा है. यह बहुत पुरानी चाल है. यह आज फिर से सफल होती नजर आ रही है.

    अभी हमारे समय में भी कई बाबा और आचार्य सक्रीय हैं. आजकल कुछ लोग विपस्सना के नाम पर फिर से सनातन आत्मा का वेदांती सिद्धांत दलितों बहुजनों को सिखा रहे हैं. कई किस्म के सद्गुरु और बाबा दलितों बहुजनों के शिक्षित युवाओं को ध्यान समाधि सिखाने के लिए बुला रहे हैं और आजकल बुद्ध के नाम का और विपस्सना के नाम का भी भारी उपयोग कर रहे हैं. ऐसे विपस्सना सिखाने वाले गुरु असल में बुद्ध और डॉ अंबेडकर ज्योतिबा फूले के आन्दोलन को बहुत गहराई से कमजोर कर रहे हैं.

    आजकल के ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव सहित कुछ विपस्सना गुरु और उनके हजारों विपस्सी साधक दावा कर रहे हैं कि बुध्द पूर्व जन्म के ब्राह्मण थे। वे कह रहे हैं कि सिर्फ बुध्द ही नहीं बल्कि डॉ. अंबेडकर और आप, मैं भी कई जन्मों में ब्राह्मण रह चुके हैं। इस पूरी चर्चा में जो केंद्रीय प्रश्न उभरता है वो ये कि जब बुध्द और डॉ अंबेडकर सहित ज्योतिबा फूले और पेरियार आदि ने स्व के अस्तित्व और स्व के पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकार दिया है तो ये विपस्सी लोग किसके समर्थन में खड़े हैं? क्या ये बुध्द, डॉ आंबेडकर और फूले के समर्थक हैं? क्या ये उनके मिशन के सहयोगी हैं?

    आज तक एक भी विपस्सी साधक ने अभी तक यह व्याख्या नही की है कि जब आत्म या स्व है ही नहीं तो उसका पुनर्जन्म कैसे होता है? इधर उधर की बात करके समय बर्बाद करते हैं। ये विशुध्द ब्राह्मणवादी तकनीक है जो बुद्ध और अंबेडकर के आंदोलन को कमजोर करने के लिए बुनी गयी है।

    डॉ आंबेडकर के अपने आंदोलन में उनके अपने लोगों के बीच वेदांती और ब्राह्मणवादी गुरुओ की शिक्षा का असर नजर आने लगा है। ये लोग बुध्द के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं और डॉ आंबेडकर की स्थापनाओं का विरोध कर रहे हैं। आप लोग अपनी आंखों के सामने देख सकते हैं कि किस तरह दलित बहुजन समाज के भीतर के अंधविश्वास लोग अपने ही हाथों से अंबेडकरी आंदोलन को बर्बाद कर रहै है।

    आज बाबा साहेब अंबेडकर और भगवान बुद्ध के आन्दोलन को इन्हें “अंदरूनी” दुश्मनों से खतरा है जो विपस्सना के नाम पर सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखा रहे हैं. और सबसे बड़ी दुःख की बात ये है कि इस षड्यंत्र की कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    विज्ञान के टॉपर बच्चे और बारिश के लिए हवन करता देश –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    पिछले साल की बात है, एक मित्र के घर बारहवीं क्लास में टॉप किये एक बच्चे से बात हो रही थी. वो अपना कुत्ता लेकर उसके साथ खेल रहा था, अचानक उसका पैर एक किताब पर लगा और उसने “किताब के पैर छुए” कान भी पकड़े. खेलते हुए उसका पैर कुत्ते को भी लगा, उसने फिर कुत्ते के प्रति भी क्षमा व्यक्त की, मैंने पूछा कि ये क्यों? उसने कहा कि ये कुत्ता नहीं भेरू महाराज है. मैंने एक टीवी सीरियल में देखा था, एक देवता की तस्वीर में भी मैंने कुत्ते देखें हैं.

    मैंने उसकी किताब को गौर से देखा उसकी किताब पर नेम चिट में एक हवा में उड़ने वाले देवता की तस्वीर के बगल से उसका नाम लिखा हुआ था.

    मैंने पूछा ये किस तरह का जीव है? उसने कहा ये जीव नहीं भगवान् है जो हवा में उड़ सकते हैं.

    मैंने इस बात को इग्नोर करके उससे गुरुत्वाकर्षण के बारे में पूछा. उसने गुरुत्वाकर्षण का पूरा नियम एक सांस में बोलकर सुना दिया, फिर मैंने उससे पलायन वेग (एस्केप वेलोसिटी) और प्लेनेटरी मोशन पर कुछ पूछा उसने तुरंत दुसरी सांस में इनसे संबंधित सिद्धांत सुना दिए.

    ये सुनाते हुए वह बहुत प्रसन्न था, मैंने फिर पूछा कि एक राकेट को उड़ने और जमीन के गुरुत्व क्षेत्र से बाहर जाने में कितना समय और ऊर्जा लगती है? क्या यह ऊर्जा एक इंसान या जानवर में हो सकती है? उसने कहा नहीं इतनी ऊर्जा एक बड़ी मशीन में ही हो सकती है जैसे कि हवाई जहाज या राकेट.

    मैंने उससे फिर पूछा कि ये उड़ने वाले देवता कैसे उड़ते होंगे? उसे ये प्रश्न सुनकर बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ. उसने बड़ी सहजता से उत्तर दिया कि वे भगवान हैं और भगवान कुछ भी कर सकते हैं.

    मैंने फिर आखिर में पूछा कि क्या भगवान प्रकृति के नियम से भी बड़ा होता है? उसने कहा मुझे ये सब नहीं पता लेकिन भगवान जो चाहे वो कर सकते हैं.

    अभी देश भर में परीक्षा में टॉप कर रहे बच्चों की खबरें आ रही हैं और हर शहर में जश्न हो रहा है. जिन बच्चों ने टॉप किया है निश्चित ही वे बधाई के पात्र हैं. उन्होंने वास्तव में कड़ी मेहनत की है और जैसी भी शिक्षा उन्हें दी गयी उसमे वे ज्यादा अंक लाकर सफल हुए.

    लेकिन इन बच्चों की सफलता का वास्तविक मूल्य क्या है? क्या ये वास्तव में अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक बन पाते हैं? क्या इनकी शिक्षा – जो अधिकाँश अवसर पर विज्ञान विषयों के साथ होती है – इन्हें वैज्ञानिक चित्त और सोचने समझने की ताकत देती है?

    ये टॉपर बच्चे अक्सर ही रट्टू तोते होते हैं जिन्हें मौलिक चिंतन और विचार नहीं बल्कि विश्वास सिखाये जाते हैं, ये पश्चिमी बॉसेस के लिए अच्छे बाबू, टेक्नीशियनऔर मैनेजर साबित होते हैं ये खुद कुछ मौलिक नही कर पाते।

    परीक्षा परिणामों का यह जश्न मैं 20 सालों से देख रहा हूँ, और दावे से कह सकता हूँ कि इन टॉपर्स में से अधिकांश बच्चों को IIT, JEE, AIIMS इत्यादि की स्पेशल कोचिंग वाले भयानक दबाव वाले रट्टू और प्रतियोगी वातावरण में तैयार किया जाता है।

    ये बच्चे किसी ख़ास परीक्षा में पास होने के लिए तैयार किये जाते हैं, इनमे ज्ञान के प्रति, सीखने और समझने के प्रति कितना लगाव है ये एक अन्य तथ्य है जिसका कोई सीधा संबंध इन बच्चों की उपलब्धियों से नहीं है. ऐसे अधिकांश बच्चे धर्मभीरु, विचार की क्षमता से हींन, आलोचनात्मक चिंतन से अनजान और समाज, सँस्कृति और धर्म के ज्ञान से शून्य होते हैं।

    अधिकतर इन्हें प्रतियोगिता परीक्षाओं की स्पेशल कोचिंग में उच्चतर विज्ञान और गणित इत्यादि घोट घोटकर पिलाये जाते हैं और घर लौटते ही इन्हें मिथकशास्त्र और महाकाव्यों की तोता मैना की कहानियां पिलाई जाती हैं।

    न केवल ये मिथकों और महाकाव्यों में श्रद्धा रखते हैं बल्कि स्कूल कालेज या परिक्षा के लिए जाते समय प्रसाद चढाकर या मन्नत मांगकर भी जाते हैं. ये बच्चे एक तरफ ग्रेविटी, एस्केप वेलोसिटी इत्यादि रटते हैं और दुसरीं तरफ आसमान में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवताओं की पूजा भी करते हैं।

    ये एक भयानक किस्म का सामूहिक स्कीजोफेनिया है जिसमे एक ही तथ्य के प्रति कई विरोधाभासी जानकारियाँ और विश्वास लेकर बच्चे जी रहे हैं, वे ज्ञान के किसी भी आयाम में कुछ मौलिक नहीं खोज पाते. वे सिर्फ पहले से ही खोज ली गयी चीजों के अच्छे प्रबंधक या तकनीशियन या बाबू हो सकते हैं लेकिन विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन इत्यादि में कुछ नया नहीं दे पाते हैं.

    इन बच्चों का एक ही लक्ष्य होता है कि किस तरह से कोई परिक्षा पास करके जीवन भर के लिए कोई बड़ी डिग्री हासिल कर ली जाए और एक बड़ी कमाई तय कर ली जाए. इसके आगे पीछे जो कुछ है उससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता. अधिकाँश बच्चों में आरंभ में इस तरह की जिज्ञासा होती है लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे परिवारों के अंधविश्वास पूजा पाठ और कर्मकांड इन जिज्ञासाओं को मार डालते हैं.

    आप कल्पना कीजिये जिस परिवार में पहाड़ लेकर उड़ जाने वाले देवता की पूजा होती है उस घर का कोई बच्चा गुरुत्वाकर्षण के वर्तमान सिद्धांत में कोई कमी निकालकर उसे कभी चुनौती दे सकेगा? जो बच्चा मन्त्र की शक्ति से विराट रूप धर लिए किसी अवतार की पूजा करता आया है क्या वह जेनेटिक्स या जीव विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के कमियाँ खोजकर कुछ नया और मौलिक प्रपोज कर सकता है?

    निश्चित ही ऐसे बच्चे इस दिशा में अधिक सफल नहीं हो सकते. यह संभव भी नहीं है. जो मन आलोचनात्मक चिंतन कर सकता है वह परीलोक की कहानी को जीवन भर धोकर उसकी पूजा नहीं कर सकता. ये दो विपरीत बातें हैं.

    इसीलिये भारत के करोड़ों करोड़ बच्चे, जो किसी न किसी परिक्षा में पास होकर या टॉप करके निकलते रहे हैं उन्होंने ही मिलकर उस भारत को बनाया है जिसमे मंत्री नेता और अधिकारी लोग बारिश लाने के लिए हवन कर रहे हैं.

    उन्ही बच्चो ने ये भारत बनाया है जिसमे आज सीमाओं की रक्षा के लिए राष्ट्र रक्षा महायज्ञ हो रहा है और डिफेंस की टेक्नोलोजी फ्रांस और इजराइल से खरीदी जा रही है. उन्ही बच्चों के बावजूद आज वह भारत सामने है जिसमे गाय के नाम पर या लव जिहाद के नाम पर सरेआम लिंचिंग हो रही है.

    टॉपर बच्चो के जश्न के बीच इन बातो पर एक बार जरुर गौर कीजियेगा.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    भारत की एकमात्र समस्या – भारत का अध्यात्म –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक ख़ास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है.

    कई लोगों ने भारत में सामाजिक क्रान्ति की संभावना के नष्ट होते रहने के संबंध में जो विश्लेषण दिया है वो कहता है कि भारत का धर्म इसके लिए जिम्मेदार है. निश्चित ही भारत का धर्म प्रतिक्रान्ति का हथियार है लेकिन सर उपर उपर नजर आने वाले इस धर्म को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह ठीक नहीं है.

    धर्म मोटे अर्थों में कर्मकांड, विश्वास और पूजा पद्धति इत्यादि इत्यादि का जमघट होता है, ये स्वयं अपना स्त्रोत नहीं है बल्कि ये भी किसी अन्य गहरी विधा के गर्भ से जन्मता है. ठीक से कहें तो भारतीय धर्म का मूल उसके भाववादी दर्शन में है.

    इस लोक के शोषण और सच्चाइयों से भाग कर परलोक में परम शान्ति या मोक्ष को खोजते हुए जन्म मरण (भवचक्र) से बाहर निकलना इस दर्शन का इसका मूल लक्ष्य है. ऐसे लक्ष्य असल में इस जमीन पर चल रहे जीवन को सम्मान नहीं देते बल्कि किसी आसमानी लोक या हवा हवाई स्वर्ग में या मोक्ष या बैकुंठ को सम्मान देते हैं.

    जो लोग ये कहते हैं की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना इस जमीन पर घट रहे जीवन के खिलाफ है वे बहुत हद तक सही हैं. इसके बावजूद ये वक्तव्य अधूरा है. मेरा गहरा अनुभव ये है की स्वर्ग या मोक्ष की कल्पना भी तभी उठती है जबकि आपके समाज में जमीनी जीवन के खिलाफ एक निर्णायक मनोवृत्ति बन चुकी हो.

    उदाहरण के लिए भारत में सामाजिक और लौकिक जीवन की जमीनी सच्चाइयों को छुपाते हुए उनमे पल रही सडांध और बीमारी को लगातार दबाते हुए समाज में यथास्थिति बनाये रखना ही भारत की परम्परा रही है. भारत में पुरोहित वर्ग, शासक वर्ग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा से एक ख़ास तरह की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाया है.

    इस संरचना में अस्सी प्रतिशत कामगारों मजदूरों, स्त्रीयों और अछूतों को पूरी व्यवस्था के लाभों से वंचित रखने का काम किया है. यह काम सैनिक बल से या लठैतों के जरिये नहीं किया जा सकता. इसे सामाजिक धार्मिक विश्वास के जरिये ही किया जा सकता है. इस ख़ास तरह की अमानवीय सामाजिक संरचना को बनाये रखने के लिए धर्म ने बड़ी चतुराई से हजारों साल तक बढिया काम किया है.

    भारत के धर्म ने कर्मकांडों और त्योहारों के जरिये इन अस्सी प्रतिशत बहुजनों के बीच निश्चित ही एक ख़ास तरह की गुलामी, कायरता और भाग्यवाद को फैलाया है. विशेष रूप से बहुजनों की स्त्रीयों को इस धर्म ने व्रत उपवासों, त्योहारों आदि के जरिये एकदम गुलाम और कायर बनाया हुआ है.

    ये गुलाम और डरपोक स्त्रीयां एक डरपोक कौम को जन्म देती हैं जो किसी भी बदलाव या तर्क की बात से डरते हैं. ये अस्सी प्रतिशत डरपोक और दिशाहीन लोग वही हैं जिन्हें सामाजिक क्रान्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन ये खुद उस क्रान्ति को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.

    भारतीय धर्म को और उसके स्वाभाविक परिणाम को इस तरह देखना बहुत आसान है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा अनुभव ये बताता है कि हमें धर्म के बाह्य कर्मकांडीय स्वरूप पर प्रश्न उठाने से या उसे ध्वस्त कर देने भर से कोई स्थाई समाधान नहीं मिलने वाला है. बाहरी कर्मकांड रुक भी जाएँ तो यह जहरीली अमरबेल फिर से पनप जायेगी.

    इसका जीवन स्त्रोत कहीं और छुपा हुआ है. आप गौर कीजिये इस समाज के पढ़े लिखे तबके पर, ये शहरी मध्यमवर्ग तबका धर्म के बाहरी कर्मकांड जैसे कि यज्ञ, हवन, बलि, श्राद्ध, तीर्थयात्रा, दान दक्षिणा, ब्राह्मण भोज आदि नहीं करता है. ये तबका – जिसमे सुशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, प्रबन्धक, और हर तरह के पेशेवर और नई पीढी के युवा या अप्रवासी भारतीय आते हैं – वे ग्रामीण या कस्बाई कर्मकांड नहीं करते हैं. वे लोग बहुत मौकों पर प्रगतिशील भी नजर आते हैं.

    अक्सर वे पार्टी इत्यादि में शराब और मांस का सेवन करते हुए मिल जाते हैं. यही लोग शहरों में लिव इन रिलेशन और समलैंगिक शादियों सहित लोकतंत्र, साम्यवाद, क्रान्ति आदि के झंडे भी लहराता हुआ मिल जायेंगे. ऐसा करते हुए वे खुद की और दूसरों की नजरों में स्वयं को “गैर-रुढ़िवादी” सिद्ध कर देते हैं. लेकिन आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म में इनका विश्वास कभी कम नहीं होता.

    सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब ये हुआ कि ये प्रगतिशील युवा वर्ग सिगरेट शराब और मांस सहित फ्री सेक्स के बावजूद पूरी ठसक के साथ अंदर से धार्मिक बना रहता है और इस सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है. ये एक विचित्र लेकिन परेशान करने वाला तथ्य है.

    इसका ये अर्थ हुआ कि बाहरी आडंबरों से भारत के इस धर्म का या इस धर्म के वास्तविक जहर का कोई अधिक सम्बन्ध नहीं है. बल्कि बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों से भी कहीं अधिक गहराई में छुपा इसका जहरीला अध्यात्म या रहस्यवाद ही इसका असली जीवन स्त्रोत है.

    उसी स्त्रोत से जहर का वो फव्वारा फूटता है जो हर दौर में हर पीढ़ी में पूरे भारत को पागल बनाये रखता है. इस बात को गहराई से समझना होगा, ये थोड़ी उलझी हुई बात है.

    असल में भारत का धर्म कोई एकरूप बात नहीं है इसके हजारों विभिन्न रंग और चेहरे हैं. इसी को विविधता कहके महिमंडित किया जाता है. लेकिन इन विविध रूपों के भीतर एक सा जहर लहू बनके बहता है. वह लहू है इसकी ‘आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की मान्यता’. इसी जहरीली त्रिमूर्ति के गर्भ से परलोक की महिमा और इस लोक की निंदा जन्म लेती है.

    बाहरी आडंबर, कर्मकांड कुछ भी हों अंदर ही अंदर इनमे कर्म का विस्तारित सिद्धांत (इस जन्म का कर्म अगले जन्म को तय करेगा) चलता रहता है. इसी में लपेट कर दान दक्षिणा, पुण्य, पाप आदि की सलाहकारी भी चलती रहती है, इसी से ध्यान साधना के तरीके बनाये जाते हैं और लोगों को व्यर्थ के तन्त्र मन्त्र ध्यान भजन में उलझाया जाता है.

    बाहर के कर्मकांड बदल भी जाएँ तो थोड़े दिनों बाद इस जहरीले कुँए से नई जहरीली बेल पनप कर समाज पर फ़ैल जाती है. उदाहरण के आजकल के पूजा पंडाल जगराते जुलूस, सामूहिक भोज आदि भारत में बहुत पुराने नहीं हैं.

    जब स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों में आजादी के आन्दोलन के लिए या तथाकथित हिन्दू जीवन दर्शन को प्रचारित करने के लिए हिन्दुओं सहित बहुजन जातियों को संगठित करने की आवश्यकता हुई तब पुराने दर्शन और कर्म के सिद्धांत पर आधारित कर्मकांडों को नये रूप में ढाल दिया गया और नये देवी देवताओं सहित नई आरती, नये पूजा विधान, जुलूस, जगराते, डांडिया, सामूहिक भोज आदि निर्मित कर दिए गये.

    इनमे शामिल होने वाले लोगों के मौलिक मनोविज्ञान अभी भी आत्मा, परमात्मा और कर्म के विस्तारित सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा से ही नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ये इनोवेशन किया गया था. इन नये कर्मकांडों से इन्हें आजाद करवा भी दिया जाए तो कोई बदलाव नहीं होने वाला. उस अमरबेल में से फिर नये अंकुर अपने आप निकल आयेंगे.

    यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले दलितों बहुजनों में भी इसी कारण कोई ख़ास बदलाव नहीं आता है. उनके मन में गहराई में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष या स्वर्ग या जन्नत जैसे अंधविश्वास भरे ही रहते हैं. इन जहरीले बीजों को अपने साथ ले जाकर वे ध्यान समाधी मोक्ष जन्नत आदि के लिए नये कर्मकांड खुद ही बना लेते हैं.

    वे भी पुराने देवी देवता छोड़कर नये देवी देवता और तीर्थ, मन्दिर ध्यान केंद्र आदि बना लेते हैं और नये धर्म में भी पुराने भारतीय धर्म की जहरीली खुराक फैला देते हैं. ये एक लाइलाज बीमारी नजर आती है.
    अब बड़ा सवाल ये है कि इसका इलाज कैसे हो?
    मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है.

    हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी. इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

    ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं.

    ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं कि कई पीढियां इसमें से बाहर नहीं निकल पाती.

    आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाये रखते हुए उसके ऊपर ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

    ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है.

    इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं. पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं.

    युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है. अपने परिवारों, गाँवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है.

    इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है. इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

    इसलिए सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों आदिवासियों को मेरी यही सलाह होती है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएँ. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें.

    ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही प्रगतिशील एजेंट हैं. आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता पौराणिक बकवास का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं.

    ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं. अगर धोती कुर्ता या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक न होगा.

    लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते.

    यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

    Sanjay Shramanjothe

  • बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध को पता चल चुका था कि उनकी मृत्यु तय हो चुकी है. एक गरीब लोहार के घर जहरीला भोजन खाने से उनके शरीर में जहर फैलने लगा था. गौतम बुद्ध जहर को अपने शरीर में फैलता हुआ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत घोषणा करवाइ कि वे अब विलीन होने वाले हैं और यह गरीब लोहार भाग्यशाली है कि इसके घर अंतिम भोजन करके मैं विलीन हो रहा हूँ.

    यह बात सुनकर वो गरीब लोहार ग्लानी और पश्चाताप से रोने लगा, बुद्ध ने उसे प्यार से समझाते हुए उसकी सुरक्षा के इन्तेजाम किये. साथ में बुद्ध के जो शिष्य थे वे अपने गुरु की इस करुणा और महानता से प्रभावित हुए. जहरीला भोजन कराने वाले व्यक्ति के प्रति भी उनमे इतनी करुणा थी.

    इसी तरह एक बार और बुद्ध अपनी सुरक्षा की चिंता किये बिना एक खूंखार हत्यारे अंगुलिमाल के पास जाते हैं. उन्हें पता है कि वह डाकू उनकी ह्त्या कर सकता है लेकिन वे फिर भी उसे समझाने जाते हैं और अपने प्रेम और करुणा से उसे प्रभावित करके अपने साथ लेकर ही लौटते हैं.

    बुद्ध की मृत्यु के बाद इन जैसी हजारों घटनाओं का पता चलते ही बुद्ध के शिष्यों का नैतिक साहस नई बुलंदी पर पहुँच गया. जो गुरु करुणा की मुद्रा में मौत को गले लगा सकता है उसके शिष्यों में एक ख़ास किस्म की नैतिकता आ ही जाती है. यही नैतिक साहस एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक धर्म को जन्म देता है.

    सदियों बाद डाक्टर अंबेडकर के जीवन में भी इस तरह की चुनौतियाँ और दुःख आते हैं. वे बहुजनों (ओबीसी, SC/ST और स्त्रीयों) की मुक्ति के लिए अकेले लड़ रहे हैं. उनके नवजात बच्चे गरीबी, बीमारी के कारण एक के बाद एक मरते जाते हैं. हालत ये होती है कि अपने बच्चों के कफ़न खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं होते हैं. उनकी पत्नी अपनी साडी के टुकड़े से अपने पुत्र का कफन बनाती हैं.

    डॉ. अंबेडकर और उनकी पत्नी इतनी विपन्नता, अपमान और दुःख के बावजूद न तो झुकते हैं न रुकते हैं और न कोई समझौता करते हैं. वे चाहते तो एक वकील या स्टॉक एक्सचेंज सलाहकार की तरह चुपचाप प्रेक्टिस करके मजे से सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे.

    एक अन्य अवसर पर महाराष्ट्र में कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान डॉ. अंबेडकर अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ खुद भी लाठी खाते हैं, उन पर जानलेवा हमला किया जाता है. इस सबके बीच वे अपने मित्रों अनुयायियों को छोड़कर भागते नहीं हैं. अपने मिशन में एक विराट नैतिक बल और नैतिक साहस लिए आगे बढ़ते हैं. उनके बाद हजारों बहुजन आन्दोलनकारियों को इन कहानियों ने प्रभावित किया और तैयार किया है.

    इसी तरह ओबीसी माली समाज से आने वाले ज्योतिबा फुले हैं, उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले हैं जिन पर हमले होते हैं वे भी भयानक गरीबी में बहुजन मुक्ति के लिए और शुद्रातिशुद्रों और स्त्रीयों की मुक्ति के लिए काम करते थे. वे कभी अपने लोगों को छोड़कर नहीं भागे न ही किसी के आगे झुके.

    * * *

    वहीं दुसरी तरफ अपने शरीर में बुद्ध के अवतरण की घोषणा करने वाले ओशो रजनीश को देखिये.

    ओशो रजनीश एक गाल पर चांटा पड़ने पर के बदले दोनों गाल नोच लेने की शिक्षा देते हैं. भारत की सरकार को आँख दिखाते हैं. अमेरिका को “फक यू” “गो टू हेल” कहकर चुनौती देते हैं. लेकिन जब भारत सरकार और अमेरिकी सरकार से निर्णायक लड़ाई का क्षण आता है तो पहले भारत में रातोरात अपने शिष्यों को अकेला छोड़कर भाग जाते हैं और दुसरी बार अमेरिका में अपने शिष्यों को अकेला मरने के लिए एक रात चुपचाप प्लेन में बैठकर उड़ जाते हैं.

    इस भयानक अंतर पर गौर कीजिये. श्रमण परम्परा के, बहुजन परम्परा के महापुरुष एक नैतिक साहस और इमानदारी के साथ अपने शिष्यों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं. और दुसरी तरफ व्यापारी बुद्धि के ब्राह्मणवादी बाबा लोग सिद्धांतों की जलेबी बनाते हुए अपने ही शिष्यों का शोषण करते हैं और जरूरत पड़ने पर छोड़कर भाग जाते हैं.

    इसीलिये उनके शिष्यों में कोई नैतिक साहस और कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं पैदा होता.

    इस विस्तार में देखने के बाद आप समझ सकेंगे कि क्यों बुद्ध, फूले और अंबेडकर के शिष्यों में एक नैतिक साहस और स्पष्टता होती है और वे सब कुछ सहकर भी अपना आन्दोलन आगे बढाए जाते हैं.

    इससे ये भी समझ में आयेगा कि क्यों साबुन तेल शेम्पू या ध्यान, समाधि बेचने वाले भगोड़े बाबाओं के शिष्यों में एक अवसरवादिता, कायरता और अस्पष्टता होती है, और ऐसे भगोड़े बाबाओं के शिष्य क्यों कुछ नहीं कर पाते हैं. 

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश और भारत के बहुजनों का भविष्य –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    ओशो रजनीश पर जो नयी डॉक्युमेंट्री आई है उसे गौर से देखिये. शीला एक नादान किशोरी की तरह रजनीश से मिलती है. शीला के पिता रजनीश से प्रभावित हैं. शीला को उनके पिता कहते हैं कि ये व्यक्ति अगर लंबा जी सका तो ये दुसरा बुद्ध साबित होगा.

    हर किशोरी लड़की की तरह शीला भी अपने पिता के इन बाबाजी के प्रति समर्पण से स्वयं भी प्रभावित होती हैं. कुछ मुलाकातों के बाद वो स्वयं भी रजनीश को अपना सर्वस्व समर्पित करके उनके लिए काम करने लगती हैं. बाद में शीला एक नए एम्पायर को खड़ा करने के लिए एक शातिर संगठन की रचना और संचालन करती हैं. ये संगठन अमेरिका में स्थानीय नागरिकों और कानून व्यवस्था के लिए भारी चुनौतियाँ खड़ी करता है.

    अंत में रजनीश को भी कहना पड़ता है कि शीला एक अपराधी हैं और ईर्ष्यालु महिला है, शीला ने जो कुछ किया वह शीला की जिम्मेदारी है मेरी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है. फिर ओशो रजनीश शीला पर लाखों डालर्स के गबन का और हत्याओं के षड्यंत्र का आरोप लगाते हैं और फिर शीला कानूनी पचड़ों से बचने के लिए जर्मनी के जंगलों में शरण लेती हैं.

    आज भी वे स्विट्जरलैंड में ज्यूरिख के पास किसी गाँव में गुमनाम और अपमानित सा जीवन जी रही हैं और ओशो रजनीश के कारनामों का खुलासा करती रहती हैं. अगर ये बाबाजी इनके जीवन में न आये होते तो इनका जीवन अधिक शांतिपूर्ण और सम्मानित हो सकता था.

    यहाँ इस प्रसंग में दो बातों पर गौर कीजियेगा.

    सबसे पहली और बड़ी बात ये कि शीला के पिता और शीला स्वयं ओशो रजनीश को “दुसरे बुद्ध” के रूप में देख रहे हैं. वे असल में ओशो रजनीश से नहीं बल्कि बुद्ध की महिमा से प्रभावित हैं और इसीलिये वे बुद्ध की तरह होने का दावा करने वाले ओशो के निकट आ रहे हैं. बाद में शीला जब ओशो रजनीश की हकीकत जानतीे हैं तब वे आश्चर्यचकित रह जाती हैं.

    दुसरी बात इस उदाहरण में यह दिखाई देती है कि ओशो रजनीश जैसे वेदांती धूर्त बाबा लोग किस तरह देश और दुनिया के प्रतिभाशाली लोगों को पहले बुद्ध और महावीर के निरीश्वरवादी श्रमण दर्शन की व्याख्या करके प्रभावित करते हैं और किस तरह बाद में उनसे पैसे बटोरने और अपराध करवाने का काम लेते हैं. बाद में इन्ही लोगों को दूध में गिरी मक्खी की तरह उठाकर फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कुछ संगठन आजकल भारत के युवाओं को दंगों में इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं.

    ये अध्यात्म बेचने वाले गुरु आजकल के जातीय और राजनीतिक दंगा करवाले वाले सांस्कृतिक संगठनों की चालबाजी से बहुत कुछ मिलते जुलते है. दोनों का तरीका बिलकुल एक जैसा है. किशोर और युवा लड़कों को धर्म संस्कृति और राष्ट्रवाद इत्यादि की बहस से प्रभावित करके उनसे दंगे करवाए जाते हैं शहर जलवाए जाते हैं और चुनाव जीते जाते हैं.

    इन दो बातों का बहुजन समाज के लिए और भारत की स्त्रीयों के लिए विशेष अर्थ है,

    अगर बुद्ध, आंबेडकर और लोहिया की प्रस्तावनाओं को आप अपना भविष्य बनाने के लिए या समाज और देश का भविष्य बनाने के लिए उचित समझते हैं तो आपको ओशो रजनीश जैसे बाबाओं और दंगा करवाने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों से बहुत सावधान रहना चाहिए, आप यहीं फेसबुक पर देख सकते हैं, ओशो रजनीश के अधिकाँश सन्यासी पक्के हिन्दुत्ववादी और ब्राह्मणवादी हैं.

    आजकल के दंगाई जिस तरह मासूम बच्चों को दंगों में झोंकते हैं उसी तरह ये बाबा लोग भी सरल मन के स्त्री पुरुषों को शातिर अपराधियों में बदल डालते हैं. शीला का उदाहरण एकदम आजकल के दंगों में बर्बाद हुए युवकों के उदाहरण से मिलता है.

    ये न सिर्फ व्यक्ति के मनोविज्ञान को तहस नहस कर देते हैं बल्कि एक समाज की नैतिकता और नागरिकता बोध को भी बर्बाद कर डालते हैं.

    एक अन्य बात आप गौर से देखिये, अभी इस देश में कितना शोषण दमन अपराध और षड्यंत्र चला रहा है. और इन जैसे बाबाओं के करोडो “अध्यात्मिक” और “ध्यानी” शिष्य इस देश में हैं. वे इस समाज में हो रहे इन बलात्कारों अपराधों और दंगों के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाते. वे दंगाइयों और बलात्कारियों के साथ खड़े हैं.

    ये “व्यक्तिगत मोक्ष” साधने वाले और ध्यान समाधि और बुद्धत्व का ढोल पीटने वाले लोग भारत के सबसे घिनौने और शातिर लोग हैं. ये अपने गुरुओं और राजनीतिक दलों की ही तरह अवसरवादी धूर्त होते हैं.

    भारत के ओबीसी, दलितों, आदिवासियों और स्त्रीयों (सभी बहुजनों) को इनसे दूर ही रहना चाहिए.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    “भारत की घृणा आधारित संस्कृति” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली कांफ्रेंस के लिए आये थे. मैं उनका मेहमान था. कुछ समय बाद भोजन पर बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा कि आप सब पहले से ही इतने स्वस्थ और संतुलित शरीर वाले हैं आज ही आप यात्रा करके पहुंचे हैं आज कसरत न करते तो क्या हो जाएगा?

    स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में मानवशास्त्र और समाजशास्त्र कांफ्रेंस के दौरान इन मित्रों से मुलाक़ात हुई और कांफ्रेंस के दौरान कुछ एक गजब की बातचीत हुई, आज अपने भारतीय मित्रों के लिए यहाँ रख रहा हूँ.

    मेरा प्रश्न सुनकर अफगान प्रोफेसर हंसने लगीं, मैंने मजाक में कहा कि अब आपको इस हंसी के बारे में और अपनी कसरत के औचित्य के बारे में कोई गंभीर एंथ्रोपोलोजिकल या समाजशास्त्रीय व्याख्या देनी ही पड़ेगी. सभी मित्र हंसने लगे सभी मित्र मजाक के मूड में थे, आगे इस मुद्दे पर वे अफ़ग़ान प्रोफेसर बोलने लगीं कि पहले मैं भी ऐसे ही सोचती थी कि एक दो दिन कसरत न की जाए तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन बाद में समझ में आया कि अच्छी आदतों का एक अपना प्रवाह होता है एक सातत्य होता है जो बनाकर रखना जरुरी होता है. न केवल अच्छी या बुरी बातों का व्यक्तिगत चुनाव से रिश्ता होता है बल्कि उनका आपके समाज संस्कृति और धर्म से भी सीधा रिश्ता होता है. 

    ये बात अफगानिस्तान में रहते हुए समझ नहीं आई थी. लेकिन जब अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और यहाँ यूरोप में आकर बसी तब पता चला कि एशिया और यूरोप की संस्कृति और समाज में बुनियादी फर्क क्या है और इस फर्क का इंसानों के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य से क्या रिश्ता है.

    आगे उन्होंने बताया कि असल में अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत नेपाल जैसे मुल्कों में शरीर और मन के स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए कोई इंसेंटिव और कोई व्यवस्था ही नहीं है. वहां सब कुछ मुर्दा और जड़ व्यवस्था में बंधा हुआ है. इसीलिये लोगों के शरीर और मन भी मुर्दा हो गये हैं. व्यक्तिगत जीवन में सृजन और प्रेम न होने के कारण ये मुल्क अपनी सेहत भी ठीक नहीं रख पाते. इसीलिये अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में डाइबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत तो पूरी दुनिया में डाइबिटीज के मामले में पहले नम्बर पर है. 

    पाकिस्तान अफगानिस्तान के नीम हकीमों के इश्तिहार देखिये वे दो ही चीजों को बीमारिया समझते हैं तीसरी कोई बीमारी नहीं उनकी नजर में. ये दो बीमारियाँ हैं – कब्ज और नपुंसकता. ये दोनों  चीजें सीधे सीधे लाइफस्टाइल और समाज के मनोविज्ञान से जुडी हुई हैं. ये कब्ज और नपुंसकता न केवल इन समाजों के इंसानों के शरीर में है बल्कि इनकी संस्कृति में भी है. ये समाज न कुछ पैदा कर पा रहे हैं न पुरानी गंदगी को शरीर से बाहर निकाल पा रहे हैं. ये कहकर वे हंसने लगीं.

    ये बात सुनकर मैं चौंका, मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा विस्तार से बताइए.

    वे आगे बताने लगीं कि वे पेशावर, कराची और दिल्ली में भी रह चुकी हैं, काबुल में पैदा हुई हैं. उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के समाज धर्म और संस्कृति को बहुत करीब से देखा है. भारत और पाकिस्तान में बचपन से ही लोगों को अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कोई प्रेरणा या कारण नहीं दिया जाता. 

    इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहाँ प्रेम करने, दोस्ती, खेलकूद, और औरत मर्द के बीच रिश्ते बनाने की कोई आजादी नहीं है. कबीलों और अमीर गरीब के झगड़े इतने ज्यादा हैं कि आप अपने लिए दोस्त या लड़की या लड़का चुनकर उसे प्रभावित करके अपना दोस्त या जीवनसाथी बनाने की कल्पना ही नहीं कर सकते. आप अपने पडौसी, सहकर्मी, बॉस, या अधीनस्थ को उसकी कबीले वंश इलाके या जाति के गणित लगाये बिना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते.

    भारत पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसे समाजों में लड़का लड़की अपनी मर्जी से अपने साथी नहीं चुन सकते. लेकिन यूरोप में वे अपनी मर्जी से ही जीवन साथी और मित्र चुनते हैं. इसीलिये यूरोपियन लड़के लडकियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और बूढ़े बूढियां भी अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं. मन को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि बेहतर भाषा, बातचीत के ढंग, नये विषयों का ज्ञान, नए हुनर, नई कलाएं संगीत, नृत्य, काव्य इत्यादि सीखकर अपने मित्रों और गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड आदि को प्रभावित कर सकें. 

    इस तरह न केवल वे व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक और मानसिक स्तर पर अनुशासित, स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं बल्कि इसी कारण से वे सामूहिक रूप से एक स्वस्थ, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज का निर्माण भी करते हैं. इसीलिये वे विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, खेलकूद, साहस और शौर्य आदि में बेहतर प्रदर्शन करके दुनिया पे राज करते हैं.

    आगे उन्होंने बताया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत जैसे देशों में मामला एकदम उलटा है. यहाँ लड़की को उसका पति और लडके को उसकी पत्नी, उसके माँ बाप खोजकर देते हैं. उन्हें खुद अपने लिए जीवनसाथी की तलाश का कोई अधिकार नहीं है. इन बदनसीब मुल्कों में अगर कोई लडकी अपने लिए खुद कोई लडका चुन ले तो या तो परिवार और कबीले की नाक कट जाती है या जाति और कुल की नाक कट जाती है. ये लडके लडकियाँ अपनी योग्यता या अपनी खूबियों का प्रदर्शन करके अपने लिए बेहतर जीवनसाथी नहीं चुन सकते. इसीलिये उनके जीवन में अपने शरीर, मन, कैरियर को बेहतरीन हालत में बनाये रखने के लिए एक बहुत स्वाभाविक सी प्राकृतिक प्रेरणा ही जन्म नहीं ले पाती.

    ऐसे में इन मुल्कों के लडके लड़कियों को अच्छी भाषा, बातचीत का ढंग, कला, नृत्य, काव्य, संगीत इत्यादि सीखने की प्रेरणा ही नहीं होती. अगर आप इन सब कलाओं से अपने संभावित जीवनसाथी को प्रभावित और आकर्षित ही न कर सकें तो आपके व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन से सभ्य होने की, संवेदनशील या सृजनात्मक होने की सारी प्रेरणा ही खत्म हो जायेगी.

    पूरे जीव जगत और पेड़ पौधों को देखिये. वहां भी सारी सृजनात्मकता, कला, कौशल, शौर्य, क्षमता और सौन्दर्य का सीधा संबंध अपने लिए बेहतर जीवनसाथी के चुनाव से जुडा हुआ है. जिन समाजों ने इस सच्चाई का सम्मान किया है वे आगे बढ़े हैं और इस सच्चाई को नहीं समझ सके हैं वे बर्बाद हुए हैं.

    अब एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़की के बारे में सोचिये. उसे उसके माँ बाप उसका पति खोजकर देंगे. वो लडकी खुद अपनी मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकती. ऐसे में वो अपने आसपास के हजारों लड़कों में से अपनी पसंद के लडके को प्रभावित या आकर्षित करने के लिए न गीत संगीत या नृत्य सीखना चाहेगी, न कविता या शायरी सीखेगी न अच्छा भोजन बनाना सीखना चाहेगी न ज्ञान विज्ञान सीखेगी, वो सिर्फ और सिर्फ अपने चेहरे को खुबसुरत बनाने पर ध्यान देगी. 

    वो लडकी उतना ही सीखेगी या करेगी जितना कि उसके माँ बाप द्वारा खोजे गये नये परिवार और पति को खुश करने के लिए न्यूनतम रूप से आवश्यक होगा. यही चीज सेक्स और रोमांस के संबंध में उसकी क्षमता या पसंद को भी नियंत्रित करेगी वो कभी भी सेक्स या और्गाज्म का पूरा सुख नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि ऐसा करते ही वो अपने पति की नजर में “गंदी औरत” बन जाएगी.

    इसी तरह एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़का भी अपने संभावित जीवन साथी को चुन नहीं सकता इसलिए वो अपने शरीर को स्वस्थ रखने, मन को सृजनात्मक बनाने, नयी कला, गीत संगीत, काव्य, हुनर आदि सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं होता.

    अन्य मित्र भी इन बातों का समर्थन कर रहे थे. वे भी समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के प्रोफेसर और रिसर्चर थे. किसी एक ने भी इन बातों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अलग अलग अनुभवों से इन बातों का समर्थन ही किया.

    इन बातों के प्रकाश में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समाज संस्कृति और धर्म को ठीक से देखिये.

    इन मुल्कों में शादियाँ, रिश्तेदारी और संबंध प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि घृणा के आधार पर होते हैं. शादी ब्याह में अधिक जोर इस बात पर होता है कि किन जातियों कबीलों या समुदायों को “नहीं” लाना है. किन लोगों जातियों या समुदायों को “लाना” है इस पर जोर लगभग नहीं ही होता है. वहीं यूरोप अमेरिका में अपने जीवन या परिवार में किसे “लाना” है इस बात पर सर्वाधिक जोर होता है. एक बार वे अपनी उम्र, विचार, और समान क्षमता के लोग पसंद कर लेते हैं और हर हालत में उनकी अमीरी गरीबी या कबीले वंश आदि को नकारते हुए उन्हें अपने जीवन या परिवार या समूह में शामिल कर लेते हैं.

    इस तरह यूरोप के प्रेम आधारित समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर मेलजोल और सभ्यता का विकास तेजी से होता है और भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान के घृणा आधारित समाज में सब तरह की सृजनात्मक प्रेरणाओं पर धर्म संस्कृति और भेदभाव का एक बड़ा भारी ताला लगा रहता है.

    भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में “किन लोगों” को “शामिल नहीं करना है”, किन लोगों को “जीने नहीं देना है” किन लोगों को “पढने लिखने नहीं देना है” या “रोजगार नहीं करने देना है” – इसकी बहुत साफ़ साफ़ प्रस्तावनाएँ लिखी गईं हैं. ये प्रस्तावनाएँ ही इन मुल्कों का धर्म और संस्कृति है. मनुस्मृति में तो साफ़ लिखा ही है कि किन वर्णों जातियों को शिक्षा और सम्पत्ति का अधिकार नहीं है. इसीलिये भारत पाकिस्तान जैसे समाज कभी भी प्रेम, बंधुत्व, मित्रता, सहकार, समता, सृजन, आदि के आधार पर न तो व्यक्तिगत जीवन जी पाते हैं न सामाजिक या सामूहिक जीवन का निर्माण ही कर पाते हैं.

    भारत की घृणा आधारित संस्कृति और यूरोप की प्रेम आधारित संस्कृति का विभाजन इसमें देखिए, आप देख सकेंगे कि आज का पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत ऐसा क्यों बन गया है. इन मुल्कों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेलकूद में प्रदर्शन, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डीपन, गरीबी और जहालत इत्यादि को देखिये और आज के यूरोप की बुलंदियों को देखिये. अगर आप वर्तमान यूरोप की संस्कृति और समाज की तुलना भारती पाकिस्तानी समाज से नहीं कर पा रहे हैं तो आप भारत को समर्थ बनाने के संभावित मार्ग की कल्पना भी नहीं कर पायेंगे.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।