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  • एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

    Sanjiv Kumar Sharma

    (सिगरेट, शराब या असुरक्षित सेक्स प्राणघाती भी हो सकता है)

    जहां इंटरव्यू होना था वह एक आलीशान कमरा था। फर्श पर बेहतरीन कार्पेट, दीवारों पर नायाब पेटिंग्स, छत पर टंगा भव्य झाड़फानूस और अनेक खूबसूरत लाइटें; साथ में भव्य सोफे और देवदार की कांच लगी नक्काशीदार दर्शनीय मेज। दीवार पर बनी लकड़ी की अल्मारियों में किताबें, शोपीस और खूबसूरत मूर्तियां।

    जब अनीता जी इंटरव्यू के लिए आकर बैठी तो लगा कोई महारानी बैठी है। मैरून रंग की बेशकीमती सिल्क की साड़ी, मैचिंग स्लीवलेस ब्लाउज, गले में छोटा सा लेकिन रत्नजडि़त हार और एक हाथ में राडो की घड़ी तो दूसरे हाथ में सिर्फ एक हीरे का कंगन। तीखे नाक-नक्श और संतुलित मेकअप, करीने से कटे कंधों पर बिखरे घने बाल, व्यायाम से साधा हुआ सुगठित शरीर और साथ में इतनी गहरी मुस्कान कि पता लगाना मुश्किल, बनावटी है या असली।

    देखिए जरा समय के पाबंद रहिए और समय से अपना इंटरव्यू खत्म कीजिए। मैं समय की भारतीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखती, मेरे लिए एक-एक मिनट कीमती है। – अनीता जी ने घड़ी देखते हुए कहा। मुस्कराहट के साथ स्वर में ऐसी सख्ती दुर्लभ होती है।

    मैंने पैड संभाला और मोबाइल का रेकॉर्डर चालू करके मेज पर रख दिया। मेज पर रखा कॉफी का कप उठा कर एक सिप लिया और पहला सवाल पूछा।

    जी बिलकुल! तो मेरा पहला सवाल है कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आयीं?

    देखिए मेरा इस प्रोफेशन में आना कोई बड़ी घटना नहीं है। जब दुनिया मुद्रा, आई मीन करेंसी, के चारों ओर घूम रही है तो हर इंसान की ये मजबूरी है कि वह कोई ऐसा काम करे जिसके बदले में उसे पैसे मिलें वर्ना वो चाहे आईन्स्टीन हो या मोजार्ट उसे धकिया कर हाशिए पर फैंक दिया जाएगा। मुद्रा एक प्रतीक थी, सुविधा के लिए बनायी गयी थी। लेकिन प्रतीक की जगह वह खुद ही सब कुछ बन बैठी, जैसे आप अपने पिता की मूर्ति बना लें और उसे ही अपने बाप समझें। और पैसे मिलने का एक ही तरीका है कि हम अपना कुछ बेचें। जब हम बाजार में बेचने निकलते हैं तो ज्यादातर दुकानें कबाडि़यों की नजर आती है जो ’क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘रंगीली रातों’ को एक ही भाव खरीदते हैं। ऐसे में फिर आपके पास यही रास्ता बचता है कि आप धूर्त हो जाएं और वो बेचें जो आपके पास है ही नहीं या किसी और का छीनें। इसलिए मुझे लगा अपना जमीर बेचने से अच्छा है कि हम अपना जिस्म बेचें। कम से कम अपने खुद के सामने तो नजर उठा कर बात कर सकेंगे। मैंने इस प्रोफेशन में आने का डिसीजन लिया और मुझे इस पर गर्व है।

    आपको गर्व है?? आपको किसी तरह का शर्म का अहसास नहीं होता?

    क्या बकवास कर रहे हैं आप? इसमें शर्म की क्या बात है? शर्म की बात तो तब होती जब मैं किसी सरकारी नौकरी में जाकर देश की बर्बादी में हाथ बंटाती या लुटेरे कारपोरेट के समूह में शामिल हो जाती। मल्टी नैशनल कंपनी में अपना दिमाग बेचकर जिंदगी होम करने वाले हाइली पेड बंधुआ मजदूरों से मैं लाख गुना बेहतर हूं। अपनी मर्जी से काम करती हूं, अपनी शर्तों पर काम करती हूं। किसी को धोखा नहीं देती। मैं एक एन्ट्रप्रेन्योर हूं, इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है। कानूनी काम करती हूं और पूरा टैक्स भरती हूं।

    कानूनी?

    जी हां कानूनी! अगर आपकों कानूनों की जानकारी नहीं है तो पहले थोड़ा पढ़ कर आएं फिर इस पर बात करेंगे।

    अच्छा ये बताइए आपकी धर्म और ईश्वर के बारे में क्या धारणा है? आप किसे मानती हैं?

    निहायत वाफियात सवाल है। इससे बेहतर सवाल होता कि आप ये पूछते कि मैं कौन-सा सेनेटरी नैपकिन या किस कंपनी की हेयर रिमूविंग क्रीम इस्तेमाल करती हूं। देखिए, धर्म एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और उसका कोई छोटे-से-छोटा भाग भी प्रकट हो रहा है तो वह अश्लीलता है।

    आपने कभी शादी, परिवार के बारे में सोचा है?

    जी हां कई बार सोचा है लेकिन हर बार मन नकारात्मक भावों से भर गया है। देखिए जिस ढंग से हमारे यहां शादियां होती हैं वो बड़ा घिनौना है। जाति, धर्म, लालच और अन्याय उसमें इस तरह भरा है कि किसी जागरुक व्यक्ति के लिए शादी करना आसान नहीं है। सामाजिक मान्यता प्राप्त और थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा और पेंशन वगैरह की सुविधा प्राप्त वेश्याओं को पत्नी कहा जाता है। लेकिन उनके पास कॉल गर्ल्स जैसे अधिकार नहीं होते। रही परिवार की बात, तो मेरा परिवार बहुत बड़ा है और उसमें ज्यादातर सदस्य जैनेटिक रूप से नहीं जुड़े हैं। जैनेटिक परिवार तो मजबूरी और स्वार्थ की डोर से बंधे होते हैं।

    देश के हालात पर आपकी राय?

    देखिए इस सवाल की इतनी बेइज्जती हो चुकी है कि मैं इसका जवाब नहीं देना चाहूंगी। हर आदमी चाहे वो कितना ही जाहिल और निकम्मा क्यों न हो इस सवाल का जवाब एक्सपर्ट की तरह देता है।

    समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?

    हमारे समाज के ऊपर दो सबसे बड़े घाव हैं – मौत और सेक्स। इन्हीं दो से भागता है और इन्हीं दोनों के फोबिया और मेनिया के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पूरी जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। शायद इसे ही कबीर ने ‘दुई पाटन के बीच साझा बचा न कोय’ कहा है| जो इलाज किए गए वो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक निकले। लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म ने सेक्स का सहारा लिया और खाने, पीने, सोने जैसी साधारण और सहज चीज को टैबू करके उसे असाधारण ताकत दे दी और ‘फ्रैंकस्टीन’ बना दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी गालियों से लेकर विज्ञापनों या फिल्मों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक हर चीज सेक्स से सन गयी। कभी आपने चूहों के स्ट्रिप शोज़ देखें हैं? हमारी पूरी पीढ़ी ही इन्टरनेट के सामने बैठ गयी दूसरों को सेक्स करता हुआ देखने के लिए। उससे भी तृप्ति नहीं मिली तो आज वीभत्स से वीभत्स तरीके खोज रही है सेक्स के। इन्टरनेट के लिए सैक्स कर रही है! मौत के लिए तो मैं कुछ नहीं कर सकती लेकिन सेक्स को लेकर बने इस कैंसर के लिए मैं कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करती हूं। एक हीलर की तरह काम करती हूं। कई लोगों को मैंने ठीक किया है। सीनियर सिटीजन्स और डिफरेन्टली एबल्ड लोगों के साथ भी मैंने कई बार बिना किसी फीस के काम किया है।

    बलात्कार के मामलों पर आपका क्या कहना है?

    ये सवाल भी अपनी गरिमा खो चुका है। सब के सब या तो बलात्कार कर रहे हैं या बलात्कार पर अपनी राय दे रहे हैं। एक बीमार समाज का सबसे खास लक्षण बलात्कार होता है। जब बीमारी है तो लक्षण भी रहेंगे। फिलहाल बीमारी को दूर करने की मंशा मुझे तो कहीं दिखती नहीं।

    अच्छा इंटरव्यू के लिए आपका धन्यवाद। मेरा किसी से अपायंटमेंट है, मुझे अब जाना होगा। आप कॉफी और लेंगे? – अनीता जी अचानक घड़ी देखते हुए बोलीं।

    नहीं कॉफी तो नहीं! लेकिन मैडम कुछ सवाल रह गए हैं।

    कोई बात नहीं! उन्हें अगली बार के लिए रखिए। नमस्ते। हैव अ नाइस डे।

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    सॉरी बेटा मैं आपको प्यार नहीं करता

    Sanjiv Kumar Sharma

    (एक बाप का बेटे को आखिरी खत)

    उम्मीद है तुम खुश होगे और अपनी नयी नौकरी में आराम से होगे। मेरी पोती तान्या और बहु कैसे हैं? तान्या तो अब काफी बड़ी हो गयी होगी बहुत दिन हो गए उसे देखे हुए भी। जब से तुम मुंबई गए हो उससे मिलना ही नहीं हुआ।

    मेरी तबियत काफी बिगड़ चुकी है और किडनी के साथ अब दिल भी जवाब दे रहा है। कुछ दवाएं और नलियां मुझे किसी तरह जिन्दा रखे हुए हैं। हॉस्पिट्ल में लेटे हुए रोज मौत, दर्द और हताशा से दो-चार होते हुए मेरी जिंदगी के समझ बहुत गहरी हो गयी है। मुझे अहसास हो रहा है की जिन चीजो को जरूरी समझ कर भागता रहा उनकी असलियत में कोई कीमत नहीं थी। और जो जरूरी चीजें थी उनको भुला दिया। तुम्हारी माँ मर भी गयी और मैं कभी उसके साथ प्यार को ठीक से जी भी नहीं सका।

    हो सकता है मैं शायद अब ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहूँ इसलिए तुमको ये खत लिख रहा हूँ। फ़ोन पर ये बातें नहीं कर सकता इसलिए मैंने ये तरीका अपनाया है। मेरी विनती है कि इसे पढ़ना जरूर भले ही तुम्हारे पास समय हो या नहीं हो। ये मेरी असली पूँजी है जो मैं तुम्हारे नाम छोड़ना चाहता हूँ।

    सबसे पहले मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि ये खत मैं खुद नहीं लिख पा रहा हूँ। मैं लिख ही नहीं सकता। इसे बोल कर लिखवा रहा हूँ। और जो इसे लिख रहा है वो एक नवयुवक है। मुझे मालुम है कि वो मेरी बात से असहज होगा फिर भी उसके बारे में बताना बहुत जरूरी है। वो शायद किसी ऐतिहासिक इमारत में फोटो खींचने का काम करता है ज्यादा नहीं कमाता लेकिन गुजर-बसर हो जाती है। फिर भी जब उसे समय मिलता है तो यहाँ सरकारी हॉस्पिटल में आ जाता है। किसी से दो बातें कर लेता है, किसी को ढांढस बंधा देता है, किसी की हाथ पैरों से मदद हो जाती है तो कर देता है। लेकिन सब कुछ यूँ ही बिना किसी फायदे के, बस यूँ ही अपनी मौज में।

    इससे मिल कर मुझे पता चला कि एक बाप के तौर पर मैं तुमको एक बहुत बड़ी बात सिखाना भूल गया कि जिंदगी की महक, उसकी ख़ूबसूरती उन चीजों में समाई है जो यूँ ही की जाती हैं, बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी सौदेबाजी के; सिर्फ उस क्षण को जीने के लिए न कि ललचाई हुई निगाहों से भविष्य की और ताकते हुए। सच तो ये है कि मैंने तुम्हारी शुरुआत ही गलत कर दी। पढाई की शुरआत ही कराई इस शर्त पर कि डांट से बचना हो तो पढ़ो, फिर इनाम चाहिए तो पढ़ो, नंबर के लिए पढ़ो, फलानी चीज के लिए पढ़ो, ढिमका चीज के लिए पढ़ो। हर चीज इसलिए करो क्योंकि कुछ हासिल करना है, कुछ पाना है। हर काम इसलिए करो कि किसी से से तुलना करनी है या किसी को दिखाना है।

    तुम्हारे मन की जमीन तो खाली थी उस पर महत्वाकांक्षा के बीज मैंने ही बिखेरे। बच्चों के मन की जमीन बड़ी उपजाऊ होती है और उस पर बिखेरे हुए बीज बड़ी आसानी से उगते हैं। सोचा था जब ये फसल पकेगी उसे काट लूँगा। लेकिन मैं भूल गया था कि मैं जहरीली नागफनी बो रहा हूँ। नागफनी बड़ी आसानी से उगती है, फसल खूब होती है लेकिन उसमे कभी फूल नहीं खिलते और जो भी उसके पास आता है उसे जहर और काँटों के सिवा कुछ नहीं मिलता। महत्वाकांक्षा अकेली ही इंसान को खत्म करके उसे एक खतरनाक रोबोट में बदल देने के लिए काफी है, उसे किसी साथ की जरूरत नहीं है। महत्वाकांक्षा के विष से भरा इंसान भष्मासुर होता है वह जिस चीज को हाथ लगाता है राख कर देता। उसके रिश्ते छीना-झपटी से ज्यादा नहीं होते। उसके लिए जीविका जीवन चलाने का साधन या अपने शौक की पूर्ति नहीं होती बल्कि अपने भीतर लगातार टीस देती अपने कुछ न होने की खरोंचों से भागने का जरिया होती हैं और जब किसी तरह उसकी बेचैनी कम नहीं होती तो वह दूसरे को भी खरोंच मारने से बाज नहीं आता।

    मैं ये सारी बातें तुम्हें इसलिए नहीं बता रहा हूँ कि मैं तुमसे कुछ चाहता हूँ बल्कि इसलिए बता रहा हूँ कि तुम मेरी वाली गलती न दोहराओ। मैंने साफ़-साफ़ देख लिया है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता था बल्कि तुम्हे अपनी सम्पत्ति समझता था। जो कुछ और तरीकों से नहीं मिल रहा था उसे तुम्हारे जरिए हासिल करना चाहता था। अपने सभी डर मैंने जाने-अनजाने तुम्हारे अंदर डाल दिए। शायद चाहता था कि तुम मेरे जैसे बन जाओ ताकि मैं तुम्हारे साथ चैन से जिंदगी काट सकूँ। मेरा ऐशो-आराम बुढ़ापे में भी चलता रहे, ये शरीर ज्यादा से ज्यादा समय तक बना रहे, भोग करता रहे। लेकिन तुम अपनी बेटी तान्या को सच में प्यार करने की कोशिश करना। ये मत समझना कि वो तुम्हारे किसी भी तरह के मानसिक या शारीरिक इस्तेमाल की कोई चीज है। बल्कि वो एक उपहार है जो तुमने खुद अपनी इच्छा से माँगा है। उसे मौका देना कि वो खिल सके, अपनी तरह से बढ़ सके। तुम बस उसे जीवन को महसूस करने देना, बिना किसी डर के अपनी समग्रता में। कोशिश करना कि वो हमारे अंदर भरे हुए डरों के जाल में कम से कम फंसे। धर्म, ईश्वर और मौत बहुत डर फैलाते हैं, इनके डर से उसे यथासंभव बचाना। तथाकथित धर्म और ईश्वर से उसके पवित्र मन को दूर रखना जब वह वयस्क होगी अपने आप समझ लेगी। मौत से उसका परिचय कराना डराना नही। उसे बताना मौत बड़ी मामूली चीज है जो हर पल घट रही है। उसे शमशान या कब्रिस्तान ले जाया करना और दिखाना कि वहां डरने के लिए कुछ है ही नहीं।

    और सबसे बड़ी बात उसे बताना कि वो यूनिक है उसे न किसी से प्रतिस्पर्धा करनी है न किसी को कुछ साबित करना और न ही वो कोई शो पीस है जो तुम्हारी या किसी और की शान के लिए इस्तेमाल होना है। वो बस पता लगाए कि उसे क्या करना अच्छा लगता है और फिर उसी में डूब जाए। उसे मौका देना कि वो जिंदगी को वर्तमान में जीना सीखे। चीजों को मौज में करना सीखे, इंसानो से, पेड़ों से, परिंदों से, बारिश की बूंदो से, फूलों पर मंडराती तितलियों से उसका रिश्ता बना रहे।

    बस अब विदा !
    अपना ख्याल रखना।
    तुम्हारा अभागा पिता

    Sanjiv Kumar Sharma

    Editor, Ground Report India

    An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

    Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

  • भारतीय राजनीति का मायालोक

    भारतीय राजनीति का मायालोक

    Sanjiv Kumar Sharma

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]स्वीकारोक्ति (डिस्क्लेमर)

    लेखक को राजनीति का कोई जमीनी ज्ञान नहीं है, जो भी राजनैतिक समझ विकसित की है वह कमरे में बैठ कर किताबें पढ़ते, सूचना तकनीकी का इस्तेमाल करते और विचारते हुए की है|[/content_container]

    भारत की जनता मायालोक, जादू और तिलिस्म में हमेशा से दिलचस्पी रखती है| एक चमत्कारिक अंगूठी से सारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं, एक सुपर फ़ूड एकदम स्वस्थ कर देता है और हठ योग की एक मुद्रा कैंसर ठीक कर देती है| घर को स्वच्छ व पवित्र करने के लिए भी कोई खास प्रयास करने की जरूरत नहीं है, बस किसी ख़ास नदी के पानी की पानी की कुछ बूँदें छिड़क दीजिए या उस घर में बैठ कर लीलावती-कलावती की ‘कथा’ सुन लीजिए, आपका घर फटाफट साफ़-सुथरा और पवित्र हो जाएगा| इसी मानसिकता के साथ यहाँ की जनता मतदान में भाग लेती है, किसी को वोट देती है और लोकतंत्र के इस कर्मकांड (रिचुअल) को करके अपने घर में बैठ कर जादू शुरू होने का इंतेजार करती है|

    मनों में कूट-कूट कर भरा जातिवाद, सामंतवादी (फ्यूडल) सोच, बिना किसी जवाबदेही (एकाउंटेबिलिटी) के ताकतवर नौकरशाही और उसके साथ राजनीतिज्ञों के करतब; इस सब के बीच लोकतंत्र इस तरह फंस गया है कि समझ नहीं आता कैसे निकालें! बेंगलुरु, दिल्ली वगैरह के जाम में फंसी बस तो फिर भी से तो देर सबेर निकल ही जाती है लेकिन ये जाम तो ऐसा हो गया कि छह दशकों में भी छंटने का नाम नहीं ले रहा| ऊपर से मजा ये कि भ्रष्टाचार, दुराचार का सारा इल्जाम अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक किसी खास राजनैतिक दल या पार्टी को देकर हम बरी हो जाते हैं|

    इसी जादू-तमाशे के बीच गुजरात चुनाव के परिणाम लोग ऐसे देख रहें है जैसे लोकसभा के चुनावों का परिणाम हो| भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य हिमाचल में चुनाव थे लेकिन जनता और मीडिया सब भूल कर गुजरात के चुनावों में इस तरह खोयी थी जैसे गुजरात के चुनावों पर भारत का भविष्य टिका हो और किसी विशेष पार्टी या दल के हारने-जीतने से सब कुछ तय होने वाला हो|

    यदि बहुत ज्यादा धूम-धड़ाका पैदा नहीं किया जाता और जरा नरमी और शांति से चुनावों में उतरा जाता तो भाजपा का छोटे अंतर से चुनाव जीतना भी मायने रखता है| 2002 से लेकर अभी तक, लगभग पन्द्रह सालों से लगातार सत्ता में रहने के बावजूद अभी भी वे सत्ता में बने रहते हैं और अगर हम चुनावी व्यवस्था में विश्वास रखते हैं तो यह उपलब्धि तो है ही| लेकिन शायद नम्रता के अभाव और बडबोलेपन के कारण छोटी जीत भी हार की तरह लगती है|

    भाजपा की जीत के बाद इस चुनाव में सबसे बड़ी उपलब्धि है कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश, राहुल गाँधी जैसे नेताओं का सामने आना| इनमें से कौन लम्बी रेस का घोड़ा है, कौन भारतीय राजनीति के आसमान में चमकेगा कौन भुला दिया जाएगा यह कहना कठिन है लेकिन यदि भारत की जनता थोड़ी परिपक्वता दिखाए तो शायद कुछ नम्र नेता सामने आ सकते हैं और हमें कुछ शालीन राजनीति देखने को मिल सकती है|

    लेकिन असल समस्या कुछ और है| मनोरंजन की तलाश हमें कभी धर्म की गलियों में भटकाती है तो कभी सिनेमा और पोर्न के बीच में झुलाती है और यही तलाश जब राजनीति में भी मनोरंजन तलाशने लगती है तो फिर राजनैतिक सर्कस की शुरुआत होती है| एक ही किस्म के मनोरंजन से जब ऊब हो जाती है और फिर किसी नए मनोरंजन के तलाश में निकल पड़ती है| जब वर्तमान राजनीति और उसके नेताओं से जनता ऊबने लगेगी तो फिर किसी नए नेता की तलाश होगी और फिर से इतिहास को दोहराया जाएगा|

    किसी को एक चमत्कारिक नेता की तरह पेश किया जाएगा, जो गद्दी पर बैठेगा और पलक झपकते ही सभी समस्याएं उड़न छू हो जाएंगी| नारे गढ़े जाएंगे – फलानां! ढिकाना! फलानां आएगा, देश को बढ़ाएगा! देश का नेता कैसा हो, ढिकाना जैसा हो! और ऐसे ही असंख्य नारे भीड़ द्वारा दोहराएंगे जाएंगे| भांडों की जमात आगे आ जाएगी और सबको बताएगी कि बस सांस रोक बैठ जाइए देश बदलने वाला है, सूरत स्विट्ज़रलैंड हो जाएगा और दिल्ली नोर्वे! गंगा तो ऐसे बहेगी जैसे शिव की जटाओं से निकलते समय थी और रेल ऐसे चलेंगी कि जापान पता करने आएगा कि इतनी जल्दी भारत हमसे आगे कैसे निकल गया|

    प्रवक्ताओं की नयी फ़ौज तैयार की जाएगी, जिनके शब्दों में तलवार की धार होगी और तर्कों में डायनामाइट जैसी दम होगी, कैमरा चालू होते ही वे विरोधियों के छक्के छुड़ा देंगे और जमीन पर कुछ काम हो या न हो लेकिन चैनल के सामने सब कुछ चाक-चोबंद दिखाई देगा| सरकार सब जानती होगी कि देश का भला कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा, देश का पर्यावरण कैसे बचेगा, उसे किसी से पूछने, किसी से सलाह लेने, किसी से चर्चा करने की जरूरत नहीं होगी| वह खुद ही सब चीजें तय कर लेगी और खुद ही उनको लागू भी कर देगी|

    विपक्षी दल ईवीएम पर आरोप लगाएंगे और सरकार कहेगी कि ईवीएम अभेद्य है! धरती में छेद करके दूसरी और निकला जा सकता है, चन्द्रमा को रस्सी से बाँध कर नीचे खींचा जा सकता है लेकिन ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती| यह पवित्र है और सभी सात्विक गुणों से भरपूर है, इसका पतन असम्भव है|

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    कुछ और नए नियम लाए जाएंगे, कुछ क़ानून रचे जाएंगे जिसमे जनता को अपनी जबरदस्त भागीदारी करनी होगी, कभी अपने पैसों के लिए भागना होगा तो कभी नए टैक्स के लिए मारा-मारी करनी होगी| ऐसा करने से जनता की सेहत खूब अच्छी होगी, उसकी देशभक्ति का भी लगे हाथों टेस्ट हो जाएगा लेकिन नौकरशाह और सरकारी अमला, बड़े कॉर्पोरेट और धन कुबेर ज्यों का त्यों अपना काम उतनी ही मेहनत, लगन और ईमानदारी से करते रहेंगे जैसे पहले करते थे और अभी भी करते हैं|

    नियमों का उल्लंघन करने पर सडकों के किनारे लगे कुछ और ठेले तोड़ दिए जाएंगे, बैंक में चोरी होने पर कुछ और गार्ड थानों में धुन दिए जाएंगे, कुछ और रेशमा, माला हारमोन का इंजेक्शन लगवाने को तैयार हो जाएंगी ताकि ग्राहक बच्ची के शरीर में औरत का मजा ले सकें, सड़कों से कुछ और लड़के उठा लिए जाएंगे ताकि कुछ लोग सेक्स के नए स्वाद को चख सकें, मामूली बीमारियों से कुछ लोग और दम तोड़ देंगे| ये महा यज्ञ है चलता रहेगा, जो बेसहारा है, जिसके पास न पैसे की शक्ति है न सत्ता कि उसे इस यज्ञ में आहुति बनना होगा ताकि लोकतंत्र का ये महायज्ञ चलता रहे|

    कुछ पुराने बाबा कुछ नए बाबाओं के साथ आपस में मिल कर ज्ञान बांटते रहेंगे और लोगों को तमाम तरह का भ्रष्टाचार और दुराचार करने के बाद अपराध बोध से बचने के नुस्खे सिखाते रहेंगे| तरह-तरह के मोटिवेशनल स्पीकर आते रहेंगे और हमारे भीतर के भिखारी को गुदगुदाते रहेंगे, सफलता कैसे हासिल करें, सफल बनो, जीतो दुनिया को, जो चाहो वही पाओ…|

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    क्या हम वाकई नहीं चाहते कि यह लोकतंत्र थोड़ी बहुत सांस ले? इसकी पक्षाघात (पैरालिसिस) से पीड़ित नस-नाड़ियों में कुछ जीवन का संचार हो? कब वो दिन आएगा जब सूखता जल, मरती नदी, जहरीली हवा, विषाक्त (टॉक्सिक) भोजन, दिमाग कुंद करती शिक्षा, भयंकर ट्रैफिक, तबाह होती हरियाली, कूड़ों के ढेर हमें बेचैन करेंगे और हम मतदान या वोटिंग का कर्मकांड करके जादू के इंतेजार में घर पर नहीं बैठ जाएंगे बल्कि अधिकारियों को खटखटाएंगे, नेताओं को हिलाएंगे, भाग-दौड़ करेंगे, कोशिश करेंगे और साबित करेगे कि हम मुर्दा और भांड नहीं हैं|

  • हिंसा के घेरे में शिक्षा

    मनुष्य की विकास यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण चीज शिक्षा ही रही है| अनेक चुनौतियों से गुजरती, नए-नए पायदान चढ़ती, कभी आगे बढ़ती, कभी भटकती शिक्षा आज एक खास मुकाम पर पहुंची है| लेकिन आज भी बहुत बड़ी आबादी के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ कुछ तथ्यों को रट लेना या कुछ धनराशि कमा लेने का जुगाड़ कर लेना ही है| शिक्षा क्या है, इसका उद्देश्य क्या है, इसके तौर-तरीके क्या हैं इस बारे में नई सोच, नए प्रयोग और नई दृष्टि का नितांत अभाव है| इस कारण से शिक्षा से जुड़ी एक बहुत गंभीर समस्या पैदा होती है कि विद्यार्थियों को अनुशासित कैसे किया जाए| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| धमकी, शारीरिक दंड और लालच को लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है बिना यह जाने और सोचे कि उसका मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे हम एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं|

    सबसे पहली बात तो यह है कि जब शिक्षा को जीवन से काटा गया तभी उसमें हिंसा और जोर-जबरदस्ती की नींव पड़ गयी| बच्चे के लिए जीवन और शिक्षा अलग नहीं होते, दोनों साथ-साथ चलते हैं| अपने पर्यावरण को जानते-समझते, सीखते उसके मस्तिष्क का विकास होता है और उसके परिवार का कर्तव्य होता है कि ऐसा माहौल उपलब्ध कराए जहाँ वह सुरक्षा, सरलता और सहजता से चीजों को सीखे| इसमें कहीं भी हिंसा या जोर-जबरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं है| लेकिन इसका मतलब यह नहीं है बच्चे को फूलों पर रखना है और उसे जीवन का सामना करने लायक ही नहीं छोड़ा जाए|

    कम्युनिकेशन के सभी आयामों से बच्चे का परिचय जरूरी है जिसमें किसी खतरे के आने पर जोर से की गयी आवाजें भी शामिल हैं| कुत्ते, बिल्ली तक खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं तो बिजली के सॉकेट के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाजों का मतलब समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे आग के पास से हटाकर उसके रोने को धैर्यपूर्वक बर्दाश्त करना क्रूरता है| जरूरत इस बात है कि हम कोई अथॉरिटी पैदा नहीं करें जिसके सामने बच्चे को झुकना हो| हम बच्चे के साथ-साथ सीखते हैं और दोनों जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ते हैं| हमारे पास कुछ ऐसा नहीं है जो स्पेशल हो और हमें बच्चे को देना हो, उलटे हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि हमारी कंडीशनिंग, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उसमें ट्रान्सफर न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ तकनीकी जानकारी है जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से समय-समय पर देते रहनी है|

    अगर अभिभावक अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभाते और बच्चे के अंदर समस्याएं घर करती रहें तो ऐसा रूप ले लेती हैं कि बड़ी कक्षा तक आते-आते अध्यापक को उन्हें सम्भालना ही मुश्किल हो जाता है और उसके पास एक ही विकल्प रहता है वह है शारीरिक दंड| विद्यार्थी को मार-पीट कर वह काबू कर लेता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| लेकिन अगर वह शारीरिक दंड का प्रयोग न करे तो यह विद्यार्थी पूरी कक्षा में अराजकता फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा| इसका वास्तविक हल तो इन परिस्थितियों का सामना कर रहे शिक्षक को अपनी समझ, ज्ञान, सहनशीलता और प्रेम से खोजना होगा; यहाँ इस संबंध में सिर्फ कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला जा रहा है|

    हमारे ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, उनमें न तो शिक्षण की समझ होती है और न अपने काम के लिए पैशन| जैसे-तैसे बला टाल कर उनको अपनी नौकरी निभानी होती है उनसे किसी रचनात्मकता, नए प्रयोग और विद्यार्थी और शिक्षण से प्रेम जैसी चीजों की उम्मीद करना रेत से तेल निकलने की आशा करने जैसा है|

    अगर हमारे देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| रेडिओ से हम स्मार्ट एलसीडी टीवी तक पहुँच गए लेकिन पढाई के वही तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो पास, कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली वह सब भाड़ में| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| इन हालात में अगर किसी विद्यार्थी को पढ़ने में रूचि नहीं है तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है? इतने उबाऊ, घिसे-पिटे तरीकों से सिर्फ इंसान को कमाने की मशीन बनाने के लिए की जा रही पढ़ाई में सिर्फ औसत विद्यार्थी को ही रूचि हो सकती है| जो भी किसी तरह कि समस्या से ग्रस्त होगा या वाकई में पढ़ना चाहता होगा वह अगर पढ़ाई से भागे तो इसमें आश्चर्य कैसा?

    विद्यार्थी सिर्फ कुछ घंटों के लिए अध्यापक के साथ रहता है, उससे ज्यादा समय वही अपने घर-परिवार के साथ बिताता है| अगर घर के सदस्य साथ न दें तो शिक्षक के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वह किस तरह विद्यार्थी को प्रेरित करे और सकारात्मकता से भर सही मार्ग पर लाए| लेकिन फिर भी वह कुछ उपायों पर विचार कर सकता है, जैसे :-

    काउन्सलिंग – यह सब से प्रभावी तरीका है| इसके लिए विशेषज्ञ की जरूरत होती है लेकिन अगर विशेषज्ञ न हो तो शिक्षक खुद ही मनोविज्ञान, मानव व्यवहार और असामान्य मनोविज्ञान का अध्ययन करके उन बच्चों कि काउंसिलिंग करे| इसके लिए प्रतिदिन कुछ समय निश्चित करे जबकि वह समस्याग्रस्त बच्चों से बात करेगा| विद्यार्थी के ऐसे व्यवहार का कारण पता लगाना फिर उसका हल खोजना काउन्सलिंग का मूल उद्देश्य है|

    संवाद – समस्या से पीड़ित और अनुशासनहीन बच्चों से संवाद टूट जाता है और वे सुनते ही नहीं इसलिए उनसे संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों को अलग-अलग कई सारे अध्यापकों के साथ उनसे संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए|

    खेल – ऐसे बच्चों को खेल में लगाना उपयोगी सिद्ध हो सकता है| उनकी दिलचस्पी का पता लगा कर उनको उस खेल में लगाना उनको अनुशासित करने में सहायक होता है|

    योग और ध्यान – योग और ध्यान काफी लाभदायक हो सकता है|

    जिम्मेदारी देना – सावधानी से ऐसे बच्चों को थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी देना उनको अनुशासित करने में मददगार होता है| पढ़ाई के बाहर की जिम्मेदारी देना भी अच्छा प्रभाव डालता है|

    विशेष प्रयोग – कुछ मनो-शारीरिक क्रियाएं इन बच्चो की ऊर्जा खर्च करने और फिर उनको शिक्षा देने में सहायक होती है| चीखने, नाचने, रस्साकसी, उछलने, कूदने, रस्सी कूदने, लटके हुए बैग पर घूंसे मारने वगैरह की प्रतियोगिता, अपनी पसंद का कुछ काम करने की प्रतियोगिता वगैरह|

    घर-परिवार के सदस्यों से बात|

    पढ़ाने के आधुनिक तरीकों का ज्ञान प्राप्त करना और फिर उस ढंग से पढ़ाने के कोशिश|

    ग्रुप से टीम की प्रेरित करना – ऐसे विद्यार्थी अक्सर ग्रुप बना लेते हैं इसलिए उनकी ग्रुप से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखी जाए और उनको ग्रुप की भावना की बजाय टीम की भावना सिखाने की कोशिश कि जाए|

    कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाना भी लाभकारी होता है|

    ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| असली काम तो खुद अध्यापक को करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह यह जानता है उनके इस तरह के व्यवहार का कुछ कारण है और उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका है बस उस तरीके का पता लगाना है| जब एक स्पेशल एजुकेटर आक्रामक मानसिक विकलांग बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| ये कोई आसान काम नहीं लेकिन सिर्फ आसान काम ही किए जाते तो दुनिया में कुछ भी नया, खूबसूरत और बढ़िया नहीं होता|

  • जामनगर बंगलुरु : घुटता, अटकता शहर

    संजीव कुमार शर्मा


    जामनगर भले ही गुजरात में हो लेकिन असली जामनगर तो बेंगलुरु है| वैसे बेंगलुरु का जिक्र आते ही आँखों के सामने एक मनोहारी नजारा घूम जाता है| आँखों को लुभाती हरियाली, देह गुदगुदाती ठंडी हवाएं और शहर से बाहर निकलते ही एक-से-एक नयनाभिराम दृश्य| एक तरफ सिलिकॉन क्रांति का परचम लहराती इलेक्ट्रॉनिक सिटी तो दूसरी तरफ जगह-जगह पर झीलें, बाग़, बगीचे, पेड़ों की कतारों की बीच बनी साफ़-सुथरी सड़कें मानो किसी शौक़ीन चित्रकार ने बड़े मनोयोग से इस शहर के कैनवास को अपने नायब स्ट्रोकों से गढ़ा हो|

    लेकिन हकीकत की कठोर जमीन से टकरा कर ख्वाब के शीशों पर रची गयी ये कल्पनाएँ सहज ही चकनाचूर हो जाती हैं| जैसे ही आप बेंगलरु की सडकों पर उतरते हैं ऐसा महसूस होता है जैसे पूरा शहर भयंकर दमे का शिकार है| ज्यादातर चौराहे, सड़कें, मोड़ सब जाम रहते हैं, कहीं ट्रैफिक रेंग रहा है तो कहीं ओलिंपिक में भारत की उम्मीदों की तरह एक ही जगह पर फंसा है| एक-दो घंटे किसी जाम में बिलकुल एक जगह पर ही फंसे रहना सामान्य बात है, बेहतर होगा आप अपना लंच बॉक्स, काम करने के रजिस्टर या टैब व मोबाइल में कुछ पसंदीदा मूवीज रखें ताकि इस समय में आपका मानसिक संतुलन बना रहे और आप बाल नोचते या कपड़े फाड़ते हुए अपने वाहन से बाहर न आ जाएँ|

    हाल ही में भारत के प्रमुख शहरों के वाहनों की औसत रफ़्तार का आकलन करने के लिए विभिन्न टैक्सी चलाने वाली कंपनियों के साथ एक सर्वे किया गया| उसमें जहाँ पुणे और दिल्ली ने 23 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया वहीं कोलकाता और बेंगुलुर ने क्रमशः 17 और 18 किलोमीटर प्रतिघंटा की औसत रफ़्तार के साथ अपने हालात खुद ही बयां कर दिए|

    बहुत जल्द चिकित्सा विज्ञान में एक नयी विधा का सूत्रपात होगा – ट्रैफिक जाम में फंसने से होनी वाली बीमारियाँ और उनके उपचार| नए तरह के विशेषज्ञ पैदा होंगे – ट्रैफिक सिकनेस एक्सपर्ट| अलग हॉस्पिटल खोले जाएंगे – ट्रैफिक जाम डिजीज मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल्स| योग वाले भी पीछे नहीं रहेंगे और ट्रैफिक जाम में फंसने पर करने वाली विशेष यौगिक क्रियाएं बताएंगे वह भी साक्षात पतंजलि के हवाले से| विशेष ध्यान पद्धितियां और विपासना भी बाजार में आ जाएगी, खास तौर ट्रैफिक जाम के शिकार लोगों के लिए| वह दिन दूर नहीं जब बेंगलुरु इन सब का अंतरराष्ट्रीय हब बन जाएगा, सूचना तकनीकी से भी बड़ा|

    उच्चस्तरीय नीति निर्माता, बेहतरीन इंजीनियर और वास्तुविद, अधिकारीयों की फ़ौज और राजधानी होने के कारण राजनैतिक व्यक्तित्वों का जमावड़ा, इसके बावजूद ऐसा क्या हो गया कि पिछले दस वर्षों के अंदर बेंगलुरु के फेफड़े जाम हो गए और उसके लिए सांस लेना दूभर हो गया| दमे का तो फिर भी स्प्रे हैं जिसे सूंघ कर कुछ राहत की उम्मीद होती है लेकिन यहाँ की सडकों का जो दमा है उसका तो कोई स्प्रे भी नहीं है|

    मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर हैं| एक अनुमान के मुताबिक बेंगलुरु की आबादी हर साल 10% की वृद्धि के साथ 11.5 करोड़ पार कर चुकी है| और इसके साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों को ले कर दीवानगी| मार्च 31, 2015 तक करीब 60 लाख वाहन बंगलुरु की सड़कों पर दौड़ रहे हैं| इनमे से लगभग पांच लाख वाहन महज एक साल में बढे थे| इसके बाद कितने वाहन और बढ़ गए होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है|

    यह सच है कि बाहर से आने वाले लोगों का ज्यादा होता दवाब, लगातार बढ़ती आबादी और उसकी निरंतर फैलती जरूरतों ने इस शहर पर बहुत बोझ बढ़ा दिया है लेकिन यह कोई अनपेक्षित नहीं था| यहाँ सूचना क्रांति की शुरुआत अस्सी के दशक में ही हो गयी थी नब्बे के बाद आर्थिक सुधार लागू होने बाद तो जैसे इसे पर लग गए| जब इसे सिलिकॉन वैली के रूप में विकसित किया जा रहा तभी यह स्पष्ट हो गया था कि आने वाले समय में यहाँ की आबादी बहुत अधिक बढ़ने वाली है| लेकिन उससे निबटने के लिए जो उपाय किए गए वे विस्तृत और उपयुक्त विज़न के अभाव में बोने साबित हुए| बस फौरी तौर पर किसी तरह से समस्यों से निबटने के प्रयास किए गए|

    इसी का परिणाम है कि आज सड़कें जाम हो गयीं और पर्यावरण को नुकसान हुआ वो अलग| ट्रैफिक की समस्या तो सुलझी नहीं लेकिन आधी से ज्यादा झीलें सूख गयीं, बेशकीमती पुराने पेड़ कट गए और उनकी जगह लगाए थोड़े-बहुत बाहरी पेड़ों पर घोंसला बनाते हुए परिंदे भी हिचकने लगे| सीएनजी वगैरह के बारे में कोई जागरूकता नहीं होने के कारण बेहताशा धुंआ उगलते वाहनों की कतारें बढ़ती हीं गयीं|

    मेट्रो ट्रेन यहाँ की ट्रैफिक समस्या से निबटने का एक प्रभावी उपाय हो सकती थी लेकिन घोंघे की रफ़्तार से चलती मेट्रो योजना कयामत के दिन से एक दिन पहले पूरी होगी या उसी दिन पूरी होगी कहना कठिन है| मेट्रो का काम राज्य सरकार और केंद्र सरकार के सम्मिलित उपक्रम के रूप में विधिवत रूप से अक्टूबर 2011 को शुरू हुआ| पहला चरण जुलाई 2016 को खत्म हुआ और अभी लगभग कई चरण बचे हैं| जो चरण पूरा हो चुका है उसमें भी अभी सीमित यात्री हैं क्योंकि या तो वह रूट उपयोगी नहीं है या लोगों को जानकारी नहीं है और कई लोगों को बस की तुलना में वह महँगा भी लग रहा है| अगर मेट्रो का काम युद्धस्तर पर चले, सुनियोजित ढंग से चलाया जाए, लोगों को पर्याप्त जानकारी दी जाए और किराया उपयुक्त रखा जाए तो ट्रैफिक में काफी राहत मिल सकती है| लेकिन यह मृग तृष्णा है या हकीकत ये तो आने वाला समय ही बताएगा|

    सबसे चमत्कारी रवैया इस उच्चशिक्षित, सूचना क्रांति के उद्गम और साधन-सम्पन्न शहर के नागरिकों का है| चाहे बाहर से आकर यहाँ बस गए लोग हों या यहाँ के मूल निवासी, लगता है प्रकृति के उपहार इस खूबसूरत शहर की किसी को परवाह ही नहीं है| ढेरों झीलों, खूबसूरत पहाड़ियों, अद्भुत हरियाली और मनोहारी जलवायु वाले इस शहर के नागरिकों की उदासीनता अपराध की सीमा को छूती है| ट्रैफिक का रोना रोएंगे, रोज यंत्रणा भुगतेंगे, अपने जीवन के कीमती घंटे सड़कों पर गुजार देंगे लेकिन कहीं कोई पहल नहीं करेगा, कहीं कोई कदम नहीं उठाएगा| यहाँ तक कॉलोनियों की समितियों में इस बात पर कोई चर्चा तक नहीं होती|

    चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सामूहिक, लगातार कम्प्लेन मोड पर रहना लेकिन हकीकत में कुछ नहीं करना ये हमारे जीवन की एक बड़ी महामारी बन कर आयी है| इस बात में आलोचना जैसा कुछ नहीं है बल्कि यह हम लोगों की हकीकत है| अगर हम इस महामारी से निजात पा सकें तो शायद बंगलुरु के ट्रैफिक के लिए कुछ किया जा सकता है वरना जिन्दगी तो बेशरम है ही, येन केन प्रकारेण चलती ही रहती है|

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