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  • विकास का अर्थ कृत्रिमता बनाम सहज प्रकृति

    Apoorva Pratap Singh


    पिछले साल एक न्यूज़ थी कि घर में आग लगने पर पालतू कुत्ता और मालिक का दुधमुंहा बच्चा जल के मर गए । जब उनकी लाश निकाली गयी तो कुत्ते की पूरी जली बॉडी उस बच्चे के ऊपर झुकी हुई हालत में मिली। अर्थ यह है कि वो कुत्ता उस बच्चे को आग से बचाने की कोशिश में उस बच्चे के ऊपर झुका रहा, क्यूंकी उसे लगा कि वो ऐसे बच्चे तक आग नहीं पहुँचने देगा!!! क्या इतना समर्पण इंसान दे पाएगा!! अब आप कहेंगे कि यह तो प्रेक्टिकल ही नहीं है, मूर्खता है? पर कोई सोसाइटी कितनी तरक्की कर चुकी है इसका मानक यह क्यूँ नहीं होना चाहिए कि वहाँ का प्राणी कितना प्रेम कर सकता है!! यह क्यूँ मानक है कि वो दूसरे ग्रह पर पहुँच उस को भी बर्बाद करने के लिए कितनी जोड़-तोड़ कर रहा है!!

    मनुष्य को कैसे पता कि वो ही समस्त प्राणियों में सर्वोच्च है ? मतलब कैसे ? उसने घर बनाए हैं, गाड़ी – मोटर वगैरह, मतलब एक पूरी कृत्रिम व्यवस्था जो कि प्राकृतिक व्यवस्था के समानान्तर है, उसने खड़ी की है ! आप कहेंगे उसके पास भाषा है, इमोशन्स हैं ! पर हाऊ डू यू नो कि आपके अलावा किसी और प्राणी के पास आपसे बेहतर लिंबिक सिस्टम नहीं है ? लिंबिक सिस्टम मस्तिष्क की वो संरचनाएं जो यादों व भावों जैसी ही कई एब्स्त्रेक्त चीजों को संचालित करती हैं।

    मसलन डोलफ़िन और व्हेल दिमाग के साइज़ से ले कर इंटेलिजेंस में भी मानव से ज़्यादा होशियार होती हैं। वो अपनी एनेटोमी को भी मनुष्य से रिलेट करती हैं, जैसे कि अगर आप बार बार अपना दायां हाथ उसके समक्ष उठाएंगे तो वो भी अपना दायाँ फिन वैसे ही हिलाना शुरू हो जाएंगी। वो शीशे में भी खुद को पहचानती हैं और अब तो यह भी पता चल रहा है कि वो अपने समूह में डोल्फ़िंस को भी अलग अलग नाम देती हैं और वैसे ही स्वर में उन्हें बुलाती भी हैं । मानव की अपेक्षा व्हेल्स और डोलफ़िन लगभग 20 गुना ज़्यादा तेज़ी से सुन के प्रोसेस कर सकती हैं। यहाँ तक कि पूरी संभावना है कि वो जब आवाज़ देती हैं तो जो वो अपने आसपास देख रही होती है तो उस आवाज़ के संग ही वो डेटा भी दूसरी डोलफ़िन को देती हो । मतलब मनुष्य जहां यह काम दो ऑर्गन से करता है वहीं वो बस अपने एक ही सेंस यानि औडिओ से कर देतीं हैं!

    ऐसे ही सारस या सियार, साथी के मरने पर वो फिर से जोड़ा नहीं बनाते, यह तो परम मानव के गुण हैं !! बस एक से लौ लग गई तो बस लग गई !! वो यह साबित करते हैं कि सब कुछ मन में होता है, शारीरिक जरूरतें सेकेन्डरी हैं ! जीवन हॉर्मोन्स-लिपिड्स से भी पहले भावनाओं से संचालित होता है।

    एक और बात यह भी कि कुत्ता और भेड़िया में से भेड़िया ज़्यादा स्ट्रॉंग है लेकिन सदियों पहले कुत्ता भी भेड़िया ही था, लेकिन वो भेड़िये कुत्ते बन गए जो अपनी से अलग प्रजाति यानि मनुष्य से भी प्रेम करने लगे। मनुष्य के मानकों के अनुसार तो कुत्ते ने मनुष्य के अनुसार खुद को ढाल अपने को कमजोर ही किया किन्तु अगर विकास प्रेम करने कि क्षमता से नापा जाये तो कुत्ता बहुत आगे हो जाएगा।

    ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि डोलफ़िन जैसे अति विकसित प्राणी भी विकास के उस चरम पर पहुंचे हों कभी पर उसके आगे उन्होने विकास चुना ही नहीं, जीवन चुना, प्रेम चुना, शारीरिक विकास भी चुना पर जिसे मनुष्य तरक्की मानता है वो नहीं चुना, वो उस एज पे पहुँच के रुक गए और वापिस लौटे! क्या पता उनकी प्रकृति की समझ हमसे बेहतर हो इसलिए उन्हें पता हो कि इस चूहा दौड़ का कोई हासिल नहीं है।

    मैं सोचती हूं कि इंसान पहले फैसले दिमाग से करता है, फिर खुद को भोला और प्योर भी फील करने को अपने दिल से अपने फेवर में तर्क गढ़वाता है जबकि यहीं जानवर इसका उलट करते हैं, दिल से फैसले ले के उनका दिमाग उन के तर्क गढ़ता है।

    यह बेहतर ही तो है शायद !!!

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  • सेलेब्रिटी एक्टिविज़्म : फेमिनिज़्म का सेफ्टी वाल्व –Apoorva Pratap Singh

    Apoorva Pratap Singh

    एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर से पूछा गया कि कास्टिंग काउच होता है या नहीं ? वो ढीठ की तरह मुस्कुराते हुए बात को घुमाती रही पर उत्तर नहीं दिया पूछने वाले ने कहा कि सिर्फ यस या नो में उत्तर दे दीजिए पर स्वरा भास्कर जो लम्बी चिट्ठी पत्री या सो कॉल्ड एक्टिविज़्म आउट्रेज करने का समय निकाल लेती हैं उनसे हां या ना, वो भी न हुआ बोलीं कि मेरी फिल्म के बारे में बात कीजिये !!! भंसाली को चिट्ठी लिखना जल में रह कर मगर से बैर नहीं होता लेकिन कास्टिंग काउच पर कुछ कहना यकीनन उनके इंडस्ट्री में निजी हितों को प्रभावित करता !!

    स्वरा हिपोक्रेट हैं यह पिछले दो साल से सबको पता है इस तथ्य से जिसको दिक्कत हो उस पर सिर्फ तरस खा सकते हैं । 

    ट्रेलर में एक जगह सोनम बॉयफ्रेंड से कह रही है कि “जाके अपनी माँ से ही शादी कर ले, मदर लवर” !!! ये साफ़ साफ़ गालियों का यूफेमिज़्म हैं !! माँ से शादी करने का अर्थ क्या होता है ? 
    करीना कपूर एक जगह ‘मिस पुरी’ से मिसेज़ मल्होत्रा बनने को ले कर घबराई हुईं है जो कि खुद ही करीना कपूर ‘खान’ बनी बैठी हैं ! इवन इन लोगों की इंटर रिलिजियस शादियों में भी बच्चे का नाम पति के धर्म से ही होता है जैसे कि ‘तैमूर’ या खुद ‘सैफ’ ही !!

    स्वरा जो 3 महीने पहले योनि मात्र महसूस कर रही थीं अब चूत शब्द गाली की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं !! कंगना जो रजत शर्मा के शो में सलमान की बजरंगी भाईजान ठुकराने के दावे ठोंक रहीं, उन्होंने सलमान की ही ‘रेडी’ में दो मिनट का ही रोल किया था !!

    कंगना ने जब अपनी निजी खुन्नस निकाली थी जिसे यहां लोग क्रांतिकारी और फेमिनिज़्म बता रहे थे तब मैंने अपना पॉइंट उनके एंटी रखा तब कहीं किसी ने मुझे या मेरी जैसी लड़कियों (जो प्रो कंगना नहीं थी) को कहा कि यह औरतें मर्दवादी हैं, आदमियों की जी हुजूरी करती हैं, शातिर हैं वगैरह !!

    तो मुझे यह कहना है कि आप लोग इतनी ढिठाई लाते कहां से हैं और आपको किसी को भी झंडाबरदार बनाने की इतनी जल्दी क्यों है ?? आपको आपके पॉइंट या जिसे आप फेमिनिज़्म कहते हैं उस पर/का किसी स्वरा या कंगना को ठप्पा लगवाने की ज़रूरत ही क्या है ? आप को इतना इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स क्यों है ? आप को अपने में आत्म विश्वास क्यों नहीं है ? आप के पास खुद का कोई एंगल क्यों नहीं होता ? आप गुटों में ‘सोचना’ इतना क्यों भाता है ?

    समझती हूं कि पोस्ट लिखना ख़ब्त है आपकी और कोई भी सतही मुद्दा जिस पर पोस्ट लिख कर कुछ ऑर्गेज़्म टाइप का मज़ा आ जाता है उस पे आप लिख देते हैं पर इतनी भड़भड़ाहट क्यों हैं तमगे देने की !!! 

    शेहला राशिद मत बनिये, वो लिवइन पर du में रैली निकालते हैं जैसे कि यही औरतों की सबसे बड़ी दिक्कत है, इस पर काम हो गया तो औरतें पिटना बन्द हो जाएंगी, उनकी वेजेज़ बराबर हो जाएंगी, वो साक्षर हो जाएंगी वगैरह !!
    इस तरह की रैलियां और यह सेलेब्रिटी टाइप एक्टिविस्ट केवल सेफ्टी वाल्व होते हैं जो असल मुद्दे तक पहुंचने नहीं देते न ही इनके लिए इनका कोई मोल है !! पर यहां फेसबुकिये किरान्तिकारियों की आरती उतारनी चाहिए !!

    मैं शायद आपसे भी बड़ी मूर्ख हूं क्या पता आपसे भी बड़ी शातिर हूं !! मैं जो भी हूं लेकिन काम की बात यह है कि आप एक नम्बर के मूर्ख हैं या शातिर !!

    मुझे स्वरा और कंगनाओं से कोई मतलब नहीं हैं ! लेकिन यहां के जो मसखरे हैं, (स्वरा की भाषा में कहें तो चूतियों से कह सकती हूं लेकिन अभी नहीं कहूँगी)उनसे दो बातें कभी कभी ज़रूरी हो जाती हैं और मैं इन की अपने जैसे लोगों पर लगाये आरोपों को बिलकुल पर्सनली लेती हूं !! आप लोगों को डिमोटिवेट करना इसलिए जरूरी समझती हूं क्योंकि अगर नहीं किया तो आपसे अलग राय रखने वालों का तो आप जनाज़ा निकाल देंगे !

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  • तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

    तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

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    खूँटे में एक औरत एड़ियों से बंधी पड़ी है। उसके पति ने पैर से उसका गला दबा रखा है और डंडे से पीट रहा है। वो दोनों हाथों से अपना गला छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही है। जब-जब उसके शरीर पर डंडा पड़ता है , उसका शरीर ऐंठ जाता है। गला दबा है तो चीख नहीं पा रही। यही उसका प्रतिरोध है और यही उसकी प्रतिक्रिया।

    वहाँ वो अकेली नहीं है। खूँटे के किनारे लोग खाट लगाकर बैठे हैं। तमाशा चल रहा है। हर उम्र के लोग हैं। देख कर लगता है जैसे कोई एडल्ट्री का मामला है। छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह में हैं औरहाथ मे डंडियाँ लिए हुए हैं। औरत का पति पूरी ताकत से वार कर रहा है। जैसे ये उसकी मर्दानगी का इम्तिहान हो। ज़ाहिर करना चाहता है कि वो मजबूत और स्वस्थ है…. तेज ‘वार’ करता है वो।

    Apoorva Pratap Singh

    आस-पड़ोस की औरतें मार खा रही औरत को उलाहना दे रही हैं । बाकी लोग उसके पति को उत्साहित कर रहे हैं। अब उस आदमी ने कमर से बेल्ट निकाल ली है। औरत के मुँह पर लगातार बेल्ट मार रहा है। मारते-मारते थक चुका है पर स्वीकार नहीं करना चाहता कि वो ‘थकता’ भी है।

    इसके आगे नहीं देखा। मन नहीं हुआ। पर इतना जरूर समझ आया कि उस तमाशे में सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं से बंधे थे। जितना कठिन उस औरत के लिए पिटाई से बच पाना था , उतना ही कठिन उसके पति के लिए उसको पीटने से बच पाना था। पिटती औरत को उलाहना देने वाली औरतें भी उसको उलाहना देने से नहीं बच सकती थीं।

    इस तमाशे की स्क्रिप्ट तैयार होने में हज़ारों साल लगे हैं।

  • महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    Apoorva Pratap Singh

    मेरा दोस्त है पारीक, उसने पिछले साल मुझे कहा था कि विडम्बना है कि सैनेटरी पैड की कम्पनी अपना नाम व्हिस्पर (फुसफुसाहट) रखती है ! मतलब टैबू मॉडर्निटी के संग संग चल रहा है । कुछ कुछ वैसी ही अक्षय की फिल्म है । अच्छी कोशिश है इससे इंकार नहीं ! खैर ! जब हम एड देखते हैं किसी sanitary पैड्स ब्रांड का उसमें कपड़े की कई प्रॉब्लम्स दिखाई जाती हैं और उनके प्रोडक्ट को बढ़िया दिखाया जाता है । जबकि इन सब ब्रांड्स की manufacturing यूनिट्स में कई स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन किया होता है । एक नैपकिन में 80 प्रतिशत सामान प्रदूषित या संक्रमित होता है । उसकी खुशबू और सफा सफेदी देख कर हम उसे साफ़ मानते हैं । इन सबको हटा भी लें तो कुछ भी recyclable नही होता।

    भारत में माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता की कमी है, उसे भरने हेतु सैनेट्री नैपकिन्स की पहुँच बढ़ाने की मुहिम चल रही है। पर असल में हम सब धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं । हर महीने अकेले हमारे देश में ही 60 लाख बिलियन से ऊपर माहवारी सम्बन्धी कचरा पैदा होता है जो कि सैनिटरी पैड्स और टैम्पून्स की देन है । सभी को देश के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हाल मालूम है, यह इस्तेमाल किये हुए प्रोडक्ट्स बीमारियां बढाने में अभूतपूर्व योगदान देते हैं। इन कन्वेंशनल पैड्स के जन्मदाता अमेरिका और यूरोप इस प्रदूषण से बचने के लिए महिलाओं को कपड़े के पैड्स के लिए उत्साहित कर रहे हैं। जहां हम सैनिटरी नैपकिन रिवोल्यूशन की बात कर रहे हैं, वही वे इससे मुक्ति के लिये मुहीम चला रहे हैं क्योंकि उन्हें इसके हानिकारक परिणाम डरा रहे हैं।

    Apoorva Pratap Singh

    अभी बाजार मे Biodegredable पैड्स आ रहे हैं जो सस्ते हैं। रीयूजेबल भी हैं लेकिन इनकी सफाई अच्छे से सम्भव नहीं है क्योंकि ये कई परतों में सिले हुए होते हैं जिससे उनको धूप नही मिलती । इसीलिए सिर्फ एक बिना सिला सूती कपड़ा सबसे अच्छा ऑप्शन है, जिसके सारे फोल्ड्स को खोल कर में सुखाया जा सकता है या मेंस्ट्रुअल कप्स हैं। आप शायद कहेंगे कि यह आपकी दिनचर्या से मैच नही करता लेकिन अगर आप सोशल मीडिया इस्तेमाल कर रहे हैं तो अधिकतर बार सम्भव है कि आप के घर ऑफिस में टॉयलेट्स भी होंगे और जब ऐसा नही हो तो भी कई उपाय निकाले जा सकते हैं।

    मेरा यह सब लिखने का कारण है जो सबसे प्रमुख वो है पर्यावरण का दूषित होना और आँखे मूंद कर बाजार की हर बात को सही मान लेना. दूसरा यह सोचिये कि हम अपने दूसरे टैबूज़ में से निकल कर एक नए टैबू, (कपड़ा इस्तेमाल करने से परहेज या योनि में कप फिक्स करने में हिचकिचाहट ) में तो नहीं घुस रहे । जैसे WASH जो एक NGO है एक रेड हट नामक पहल कर रहा है जिसमें वो औरते रहेंगी जो माहवारी से हैं !!! यह उस पुराने नियम से अलग कैसे हुआ, क्या यह अब पितृसत्तात्मकता को मॉड तरीके से सहलाना नही होगा !!! क्या हमारी जरूरतें बाजार तय कर रहा है? क्या पैड्स इकोनॉमिकली गरीब तबका अफोर्ड कर पायेगा और अगर फ्री में मुहैया करा भी दें तब भी वो हानिकारक है।

    हमें खुद और दूसरों को, संग पढ़ने, काम करने वालियों को प्रेरित और जागरूक करना चाहिए ।

  • धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    धर्म रक्षा के नाम पर धार्मिक भीरूपन और मानसिक संकीर्णताएं

    Apoorva Pratap Singh

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    जब मैं पैदा हुई थी उससे कुछ समय पहले बाबरी तोड़ी गयी थी । राम एक नारा बन चुके थे । फिर भी घर के वातवरण के कारण मैं एक लंबे समय तक इस बात गर्व करती रही कि मेरे पास हजारों भगवान हैं फिर पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में अपने आप आया कि राम इन सबके बॉस हैं । यकीनन माहौल से आया, 5-7 साल की उम्र से मुझे समझ आ गया कि मेरी पार्टी बीजेपी है ।
    यह इसलिए बता रही हूँ कि घर में स्वस्थ माहौल होते हुए भी मस्तिष्क पर धर्माधारित राजनीति का कितना प्रभाव पड़ता है !

    अब आगे चलते हैं,
    मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें मैंने कहा कि राम के लिए पज़ेसिव होने की ज़रूरत नहीं है ! कई आरोप लगे मेरे ऊपर, किसी मूर्ख ने कहा कि “मैं लड़की नहीं होती तो वो मुझको मेरी ही भाषा में समझाते” वामपंथी से ले के शातिर तक कहा गया !

    मैंने कहा कि हिन्दू धर्म जैसा कुछ भी नहीं बस यह हमको एक नाम देने की अवधारणा के अंतर्गत किया गया, ज्ञानियों को बहुत आपत्ति हुई ! अब यह पोस्ट इसलिए नहीं लिख रही हूं कि सफाई देनी है इसलिए लिख रही हूँ कि आप कुछ और नहीं सोच पा रहे हैं !

    सबसे पहली बात यह कि हमारी कई लोकसंस्कृतियाँ हैं, जिनमें कोई किसी को मानता है तो कोई किसी को । जब आप शादी के समय अपने घरों में दीवार पर कपड़े से ढक के देवता बनाते हैं तो वो आपके पित्रों होते हैं । जो सबके अलग हैं । यही से हमारी शुरुआत होती है कि हमारे सबसे बड़े शुभ काम हमारे पूर्वजों के बिना अधूरे हैं । यही हमारा बेस था । हम मूलत चमत्कार में विश्वास न करने वाले लोग हैं । हम अपने घर तक के अलग अलग देव रखने वाले लोग!

    हास्यास्पद है कि इसे हिंदुओं को ईश्वरविहीन करने कि साजिश बोल दिये लोग, मतलब बोलने से पहले सोचते भी है कि नहीं कि बस बोल देते हैं !
    आप चमत्कार को ही ईश्वर मानने लगे हैं क्या ? माफ कीजिये आप खुद के पतन को आमन्त्रित
    कर रहे हैं ।

    हम इसीलिए अलग लोग हैं कि हमारी कोई किताब हमको नहीं सिखाती कि क्या करने से हिन्दू है और क्या कर देंगे तो नहीं रहेंगे । हिन्दू सिर्फ एक टर्मिनोलोजी है जो हमको बांधने को इस्तेमाल हुई । हम श्रुतियों द्वारा परंपरा निभाने वाले लोग हैं । हम नास्तिकता को जगह देने वाले लोग ! हम अपने ही भिन्न दर्शनों में वाद स्थापित कर भेद बताने वाले लोग ! क्या बन गए हैं ? भगवा गमछादधारी भीरु !
    जब शिव के कंपटीशन में ब्रह्मा और विष्णु उतारे गए वहीं से बहुत कुछ बदल गया ।

    हम राजा को भगवान मानने वाले लोग !
    शैव यानि काशी और वैष्णव यानि अवध ! इनके जो भी राजा हुए उन्हें हमने साकार ईश्वर बना लिया ।

    बाद में राजारविवर्मा ने अपनी कल्पना शक्ति अनुसार चित्र बनाए ।

    हमें स्वतन्त्रता संग्राम में एकजुट करने के लिए तिलक ने गणेश पूजा पंडाल की शुरुआत की जिससे धर्म के आधार पर सही, लोग एक जगह एकजुट हों । तिलक के उस मंतव्य का परिस्थिति अनुसार जो कारण रहे वही आज हिन्दू कट्टरता के कारक की तरह गलत इस्तेमाल हो रहे हैं ।

    राम का जिस चालाकी से राजनीतिकरण कर दिया गया और जनता खुश हो गयी वो दुखद है । आप तर्क देंगे कि हमें धर्म बचाने को एकनिष्ठ आस्था की आवश्यकता है और राम उस के ध्व्जवाहक । अगर एक ध्वज नहीं हुआ तो कोई भी मुसलमान-ईसाई बना दिया जाएगा ।

    लेकिन धर्म है कहाँ आपका ? आस्था क्या होती है ? मूल क्या था आपका और आज आप क्या कर रहे हैं ? आप सत्यनारायन कथा के प्रचार मात्र को अपनी आस्था बनाए बैठे हैं ! उस कथा में कथा कहाँ है ? आप तो खुद ही अपनी मूल संस्कृति को क्षीण कर रहे हैं उसके बाद बक़ौल आपके आप संस्कृति भी बचाने की कोशिश करते हैं !!

    आस्था के नाम पर मुहम्मद साहब गधे पर बैठ चाँद के टुकड़े कर देते हैं और यीशु जिंदा हो उठते हैं । उपनिषदों, अध्यात्म पर विश्वास करने वाले हम, अब ऐसी ही कई आस्थाएं पाले बैठे हैं ।

    आपकी आस्था हर बार घायल हो जाती है जब भारत के किसी कोने में आपके मान्यता प्राप्त ईश्वर से उलट किसी को पूजा जाता है । जब बंगलोर में हिन्दी को साइन बोर्ड से हटाने की मांग आपको देश की संप्रभुता पर खतरा लगती है । मेरा प्रश्न इतना है कि पूरे देश की संप्रभुता आपके अनुसार क्यों तय होनी चाहिये ! जवाब बड़ा आसान है आपकी आस्था !!!

    आस्था व्यक्तिगत हो तभी तक ठीक है लेकिन जब इस आस्था का इस्तेमाल संस्कृति के विरुद्ध ही हो तब ? यहाँ की लोक संस्कृतियों को आपकी ही आस्था कुचलने लगे इतनी चालाकी से कि खुद हलाल होने वाले को ही समझ न आए तब ?

    मेरी आस्था इंसान को कुत्ता मानती हो और उसको पट्टे में बंद कर के रखना चाहे तो ? किसी की आस्था अनुसार सारा हिसाब महरला में अल्लाह करेंगे तो यहाँ अदालत बनाने का औचित्य ही क्या है ?

    आप कहते हैं कि कोई भी एक भगवान न हुआ तो कोई भी कलमा पढ़ा के अल्लाह हु अकबर बुलवा के गोलियां चलवा देगा ! अब इसका उत्तर आपका ही प्रिय शब्द आस्था देगा ! क्या ऐसा ही कहीं लिखा हुआ है कि जब कोई एक ईश्वर को माने तभी वो बचेगा ? क्या यह आप नकल नहीं कर रहे ?

    मेरे लिए आस्था जो सशंकित, भयभीत हो वो आस्था नही है । आपकी आस्था इतनी डरी हुई क्यूँ है ? क्या हम आज एक स्वतंत्र चेतना वाला समाज जिसकी शुरुआत हमारे संस्कृति पुरोधाओं ने की थी, उससे भटक नहीं गए । अगर आस्था इतनी बड़ी चीज़ है जो भटकने नहीं देती तो यह आस्था ‘स्वचेतना’ पर क्यूँ नहीं रखनी चाहिए ! स्वचेतना केवल नास्तिक हो जाना नही होता यह आस्तिकों में भी भरपूर होती है ।

    जब आप कहते हैं कि षडयंत्र के तहत हमको इंफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से भरा गया तो अब आप क्या कर रहे हैं सिवाय एक भयभीत समाज बनाने के । आपका पुनरुत्थान इतना सिमटा संकीर्ण क्यों है !

    जब मैं कहती हूँ कि उपनिषद हर बात पर सवाल करते हैं तो आपको यह क्यों लगता है कि आपका ईश्वर और आस्था खतरे में है और मैं आपको मूर्ख कह रही हूँ !! जबकि मैंने तो कुछ कहा ही नहीं, आप इतने डरे हुए क्यू हैं !
    आप खुद समझ लीजिये कि आप अपनी जड़ से दूर निकल आए हैं !

    हम पर आक्रमण हुए, हम हारते रहे फिर भी हम बचे हुए हैं । आपके अनुसार हमारी धार्मिकता के कारण, पर जहां तक मैं देख पाती हूँ वहाँ तक हमारी आध्यात्मिक चेतना ने हमें बचाए रखा ।

    उस चेतना का ह्रास आपकी यह पज़ेसिवनेस कर रही है, जो आपके ईश्वर के राजनीतिकरण से निकली है ! अनुयायी ही धर्म के संहारक होते हैं और भक्त ही ईश्वर के हत्यारे, आप इन्हीं में से कुछ है !

    संस्कृति विशाल है धर्म मात्र उसका एक बिन्दु ! लेकिन आप उस बिन्दु को इतना बड़ा कर चुके हैं कि आप अपनी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को खुद ही वैचारिक रूप से पंगु बना रहे हैं, पश्चिम की नकल उसका ही एक हिस्सा !
    आप स्वतंत्र है किसी को भी ईश्वर मानो, हमारी संस्कृति किसी को अल्लाह तक नहीं रोकती ! किन्तु आपकी आस्था कब फेसबुक पर किसी को गरिया दे इसलिए उसकी नाक में पगहैया बांध के रखिए !

    सबसे अंतिम बात जब सुप्रीम कोर्ट अपने तमाम फैसलों में हिन्दू को धर्म नहीं शैली कहती है तो आपको कोई दिक्कत नहीं । जैसे हाल में एक फैसले में कहा था कि धर्म का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में नहीं हो सकता लेकिन हिन्दू इसमें अपवाद है क्योंकि वो धर्म नहीं शैली है !! तब आपने हल्ला क्यों नहीं काटा कि यह हमको धर्म मानने से इंकार क्यों कर रहे हैं, हमारी आस्था से खेल रहे हैं !!! हमारी स्वनाम्धन्य हिन्दू पार्टी क्यों नहीं कहती कि हमारे ईश्वर खतरे में है अब !!

    अंतिम बात यह कि मैंने किसी को मूर्ख नहीं कहा, भटका हुआ अब जा के कह रही हूँ कि आप इतने भटक गए हैं कि आपको सब कुछ खुद के खिलाफ साजिश दिखने लगी है। जबकि साज़िश आपकी खुद की रचाई हुई है।

  • अब तक आपने आईने से धूल साफ क्यों नहीं की है?

    Apoorva Pratap Singh

    मैंने उनको बचपन से देखा । उनकी और मेरी उम्र में बड़ा फासला होते हुए भी उन्होंने उनके दिल में आई हर बात पहले मुझे बताई ।
    जब वो नवी में थी तब से उनको शादी करनी थी, फिर बारहवी करते हुए भी उनको शादी करनी थी । जिन जिन से उनकी बात चल सकती थी उनके बारे में भी बताती थी मुझे ।
    मैंने उनको तब भी देखा जब जून की दोपहर में लहंगा पहन के घूंघट मार के वो और उनकी सहेली एक दूसरे की फोटो खींचते ।

    उनके घर में लड़का लड़की कोई भेद नहीं था । वो, वो सब करती थी जो उनका जी चाहता, मेकअप- शॉपिंग । घर वालों के समझाने के बावजूद उनसे पढाई नही होती ।

    कभी उनके पिता जी ने खुद चल के आये रिश्ते को नकार दिया था तो वो झगड़ा कर बैठी और बहुत रोई थी । पिता ने एक बडे कोर्स जिसमें एडमिशन ही लाखों में होता है, जॉइन करवाया तो उसमें दन्न से पहले सेमेस्टर में फेल हो गईं ।

    वो अपनी शादी में कैसा फर्नीचर लेंगी, कौन सी गाड़ी लेंगी सब खुद उन्होंने लड़का तय होने से पहले से सोचा हुआ था ।
    उनके पास सारा प्लान था कि कैसे उनकी हजारों की पचिया को सास को न देना पड़े और कैसे वो पचिया को सस्ती साड़ी से रीप्लेस कर सास को देंगी ।

    मतलब यह कि वो हर तरीके से प्रवीणा-सुशीला थीं । 22 की होते होते उन्होंने आखिरकार शादी कर ली । हनीमून गईं, सास को नाक चने चबवा दिए, ऐसी कम ही जगह हैं जहां उन्होंने पति के ऊपर सवार होकर भ्रमण नहीं किया । बच्चे हो गए । 4-5 जन्मदिन मन गए ।

    पिछले साल से अचानक उन्होंने फिर रोना शुरू कर दिया, मायके आके । उनके अनुसार, उन्होंने जीवन में अपने पेरेंट्स और समाज की वजह से कुछ नहीं कर पाया । घर वालों ने उन्हें ‘गाइड’ नहीं किया । उनकी सम्भावनाओं को तिलांजलि दे दी ! तब से उनका बाजा चालू है । उनके पेरेंट्स उनका फोन आता देख घबरा जाते हैं ।

    सबसे बड़ा काम होता है खुद के निर्णयों की जिम्मेदारी लेना।

    लड़कियां ही नहीं लड़के भी आपके जितने ही नालायक होते हैं पर बस वो लड़के होते हैं तो उनको यह शादी कर के दूसरे की कमाई खर्च करने और उन्ही पर ठीकरा फोड़ने की सहूलियत नही मिलती, इस कारण उनको कुछ भी छोटा मोटा करना पड़ जाता है ।

    आपको ऐसी सहूलियत प्राप्त है इसलिए आप अपने कीमती साल बिना सोचे, आत्मावलोकन किये गुजार देती हैं फिर अचानक से किसी दिन होश आता है और आगे की और आशावान न हो के पीछे अटकी रहती हैं ।

    आपको अटकना है अटकते रहो पर दूसरों को क्यों कोसना !!
    बीती ताहि बिसारि दे , आगे की सुधि ले

    वैसे प्रश्न यह भी है कि अब तक आपने आईने से धूल साफ क्यों नहीं की है ?