जाणे मेरा जीवड़ा — Vijendra Diwach

Vijendra Diwach मैं बेटीइस धरती पर आई,मेरी मां मुझे इस संसार में लेकर आई,लेकिन मेरी मां नारी होकर भी मुझे नहीं समझ पायी,मेरे लड़की रूप में पैदा होने परनारी ने ही रो-रोकर आंखें सुजाई।कहते हो मिश्र की सभ्यता में नारी का सम्मान था,राजा की कुर्सी के उत्तराधिकार पर बेटी का हक था,लेकिन बताओभाई की बहन से शादी,यहां यह कौनसा मेल था?यह तो सब पुरुषों काबहन के हाथों से सत्ता पाने… Continue reading

भंगण मां — Vijendra Diwach

Vijendra Diwach मैं एक औरत हूँमेरी जाति मुझे भंगी बतायी गयी है,घर वालों ने बचपन से ही मुझेहाथों में झाड़ू पकड़ाई है,मेरी कमर में आभूषण केरूप में झाड़ू ही सजायी है।कोई मौसम नहीं देखते हैंबस निकल पड़ते हैं,कथित विद्वान चौक-रास्ते तो साफ करवाते हैं,लेकिन अपनी सामन्ती सोच पर कभी झाड़ू नहीं मारते हैं।गलियारे बुहारने पर मिल जाती हैकुछ रोटियां और थोड़ा अनाज,कभी कोई बुलाकर पड़ोसियों कोदेता है पुराने कपड़ो का… Continue reading

लोकतंत्र बिकता है – Vijendra Diwach

[tcb-script async=”” src=”//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js”][/tcb-script][tcb-script](adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});[/tcb-script] पांच साल में एक बार तमाशा लगता है,नेता वोट के लिये घर घर झांकता है,ना भाषा का होश ना मर्यादा का तोलगुंडे मव्वाली ओढ लेते हैं नेता का रोलजनता बजाती ताली हैजनता ही ऐसे गुंडे खङे करती है।तभी तो लोकतंत्र बिकता है। वोट के लियेलोगों के गले में देशी ठर्रा डाला जाता है,थाली में कुत्तों की बोटी,जेब में दो चार सौ रुपये की गड्डी,इस… Continue reading

ईमानदारी से जीना मुश्किल

Vijendra Diwach [tcb-script async=”” src=”//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js”][/tcb-script][tcb-script](adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});[/tcb-script] गरीब आदमी की गरीबी भी उसका मजाक उङाती,उसकी रूखी सूखी रोटी भी कहती है मुझे खा के दिखा,मन कहता है रोटी तु रूखी सूखी है तेरे को कैसे खाऊंगा,आमाश्य कहता है आने दे मै भूखे पेट में तो पत्थर भी पचा लूंगा।गरीब रूखा सुखा खाकर इसे ही संतुलित आहार मान लेते हैं,बस अपने परिश्रम के बल पर जो मिल जाये उसे… Continue reading

लोहार

Vijendra Diwach[divider style=’right’] आज का जमाना मुझे कम ही जानता है कम ही पहचानता है, आज मेरे पास लोहे का सामान कम ही खरीदा जाता है, क्योंकि जमाना आधुनिक है और अब कांच तथा स्टील ही मन को भाता है। नहीं  मेरे कोई ठौर-ठिकाने, गाता हूँ महाराणा प्रताप के गाने, एक पल यहाँ ठहरना, फिर कहींओर जाना, ना मैने कभी खुद को जाना, पूर्वजों ने लोहा कूटा मैने भी लोहा… Continue reading