भारतीय राजनीति का मायालोक

Sanjiv Kumar Sharma

[content_container max_width=’500′ align=’center’]स्वीकारोक्ति (डिस्क्लेमर)

लेखक को राजनीति का कोई जमीनी ज्ञान नहीं है, जो भी राजनैतिक समझ विकसित की है वह कमरे में बैठ कर किताबें पढ़ते, सूचना तकनीकी का इस्तेमाल करते और विचारते हुए की है|[/content_container]

भारत की जनता मायालोक, जादू और तिलिस्म में हमेशा से दिलचस्पी रखती है| एक चमत्कारिक अंगूठी से सारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं, एक सुपर फ़ूड एकदम स्वस्थ कर देता है और हठ योग की एक मुद्रा कैंसर ठीक कर देती है| घर को स्वच्छ व पवित्र करने के लिए भी कोई खास प्रयास करने की जरूरत नहीं है, बस किसी ख़ास नदी के पानी की पानी की कुछ बूँदें छिड़क दीजिए या उस घर में बैठ कर लीलावती-कलावती की ‘कथा’ सुन लीजिए, आपका घर फटाफट साफ़-सुथरा और पवित्र हो जाएगा| इसी मानसिकता के साथ यहाँ की जनता मतदान में भाग लेती है, किसी को वोट देती है और लोकतंत्र के इस कर्मकांड (रिचुअल) को करके अपने घर में बैठ कर जादू शुरू होने का इंतेजार करती है|

मनों में कूट-कूट कर भरा जातिवाद, सामंतवादी (फ्यूडल) सोच, बिना किसी जवाबदेही (एकाउंटेबिलिटी) के ताकतवर नौकरशाही और उसके साथ राजनीतिज्ञों के करतब; इस सब के बीच लोकतंत्र इस तरह फंस गया है कि समझ नहीं आता कैसे निकालें! बेंगलुरु, दिल्ली वगैरह के जाम में फंसी बस तो फिर भी से तो देर सबेर निकल ही जाती है लेकिन ये जाम तो ऐसा हो गया कि छह दशकों में भी छंटने का नाम नहीं ले रहा| ऊपर से मजा ये कि भ्रष्टाचार, दुराचार का सारा इल्जाम अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक किसी खास राजनैतिक दल या पार्टी को देकर हम बरी हो जाते हैं|

इसी जादू-तमाशे के बीच गुजरात चुनाव के परिणाम लोग ऐसे देख रहें है जैसे लोकसभा के चुनावों का परिणाम हो| भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य हिमाचल में चुनाव थे लेकिन जनता और मीडिया सब भूल कर गुजरात के चुनावों में इस तरह खोयी थी जैसे गुजरात के चुनावों पर भारत का भविष्य टिका हो और किसी विशेष पार्टी या दल के हारने-जीतने से सब कुछ तय होने वाला हो|

यदि बहुत ज्यादा धूम-धड़ाका पैदा नहीं किया जाता और जरा नरमी और शांति से चुनावों में उतरा जाता तो भाजपा का छोटे अंतर से चुनाव जीतना भी मायने रखता है| 2002 से लेकर अभी तक, लगभग पन्द्रह सालों से लगातार सत्ता में रहने के बावजूद अभी भी वे सत्ता में बने रहते हैं और अगर हम चुनावी व्यवस्था में विश्वास रखते हैं तो यह उपलब्धि तो है ही| लेकिन शायद नम्रता के अभाव और बडबोलेपन के कारण छोटी जीत भी हार की तरह लगती है|

भाजपा की जीत के बाद इस चुनाव में सबसे बड़ी उपलब्धि है कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश, राहुल गाँधी जैसे नेताओं का सामने आना| इनमें से कौन लम्बी रेस का घोड़ा है, कौन भारतीय राजनीति के आसमान में चमकेगा कौन भुला दिया जाएगा यह कहना कठिन है लेकिन यदि भारत की जनता थोड़ी परिपक्वता दिखाए तो शायद कुछ नम्र नेता सामने आ सकते हैं और हमें कुछ शालीन राजनीति देखने को मिल सकती है|

लेकिन असल समस्या कुछ और है| मनोरंजन की तलाश हमें कभी धर्म की गलियों में भटकाती है तो कभी सिनेमा और पोर्न के बीच में झुलाती है और यही तलाश जब राजनीति में भी मनोरंजन तलाशने लगती है तो फिर राजनैतिक सर्कस की शुरुआत होती है| एक ही किस्म के मनोरंजन से जब ऊब हो जाती है और फिर किसी नए मनोरंजन के तलाश में निकल पड़ती है| जब वर्तमान राजनीति और उसके नेताओं से जनता ऊबने लगेगी तो फिर किसी नए नेता की तलाश होगी और फिर से इतिहास को दोहराया जाएगा|

किसी को एक चमत्कारिक नेता की तरह पेश किया जाएगा, जो गद्दी पर बैठेगा और पलक झपकते ही सभी समस्याएं उड़न छू हो जाएंगी| नारे गढ़े जाएंगे – फलानां! ढिकाना! फलानां आएगा, देश को बढ़ाएगा! देश का नेता कैसा हो, ढिकाना जैसा हो! और ऐसे ही असंख्य नारे भीड़ द्वारा दोहराएंगे जाएंगे| भांडों की जमात आगे आ जाएगी और सबको बताएगी कि बस सांस रोक बैठ जाइए देश बदलने वाला है, सूरत स्विट्ज़रलैंड हो जाएगा और दिल्ली नोर्वे! गंगा तो ऐसे बहेगी जैसे शिव की जटाओं से निकलते समय थी और रेल ऐसे चलेंगी कि जापान पता करने आएगा कि इतनी जल्दी भारत हमसे आगे कैसे निकल गया|

प्रवक्ताओं की नयी फ़ौज तैयार की जाएगी, जिनके शब्दों में तलवार की धार होगी और तर्कों में डायनामाइट जैसी दम होगी, कैमरा चालू होते ही वे विरोधियों के छक्के छुड़ा देंगे और जमीन पर कुछ काम हो या न हो लेकिन चैनल के सामने सब कुछ चाक-चोबंद दिखाई देगा| सरकार सब जानती होगी कि देश का भला कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा, देश का पर्यावरण कैसे बचेगा, उसे किसी से पूछने, किसी से सलाह लेने, किसी से चर्चा करने की जरूरत नहीं होगी| वह खुद ही सब चीजें तय कर लेगी और खुद ही उनको लागू भी कर देगी|

विपक्षी दल ईवीएम पर आरोप लगाएंगे और सरकार कहेगी कि ईवीएम अभेद्य है! धरती में छेद करके दूसरी और निकला जा सकता है, चन्द्रमा को रस्सी से बाँध कर नीचे खींचा जा सकता है लेकिन ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती| यह पवित्र है और सभी सात्विक गुणों से भरपूर है, इसका पतन असम्भव है|

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कुछ और नए नियम लाए जाएंगे, कुछ क़ानून रचे जाएंगे जिसमे जनता को अपनी जबरदस्त भागीदारी करनी होगी, कभी अपने पैसों के लिए भागना होगा तो कभी नए टैक्स के लिए मारा-मारी करनी होगी| ऐसा करने से जनता की सेहत खूब अच्छी होगी, उसकी देशभक्ति का भी लगे हाथों टेस्ट हो जाएगा लेकिन नौकरशाह और सरकारी अमला, बड़े कॉर्पोरेट और धन कुबेर ज्यों का त्यों अपना काम उतनी ही मेहनत, लगन और ईमानदारी से करते रहेंगे जैसे पहले करते थे और अभी भी करते हैं|

नियमों का उल्लंघन करने पर सडकों के किनारे लगे कुछ और ठेले तोड़ दिए जाएंगे, बैंक में चोरी होने पर कुछ और गार्ड थानों में धुन दिए जाएंगे, कुछ और रेशमा, माला हारमोन का इंजेक्शन लगवाने को तैयार हो जाएंगी ताकि ग्राहक बच्ची के शरीर में औरत का मजा ले सकें, सड़कों से कुछ और लड़के उठा लिए जाएंगे ताकि कुछ लोग सेक्स के नए स्वाद को चख सकें, मामूली बीमारियों से कुछ लोग और दम तोड़ देंगे| ये महा यज्ञ है चलता रहेगा, जो बेसहारा है, जिसके पास न पैसे की शक्ति है न सत्ता कि उसे इस यज्ञ में आहुति बनना होगा ताकि लोकतंत्र का ये महायज्ञ चलता रहे|

कुछ पुराने बाबा कुछ नए बाबाओं के साथ आपस में मिल कर ज्ञान बांटते रहेंगे और लोगों को तमाम तरह का भ्रष्टाचार और दुराचार करने के बाद अपराध बोध से बचने के नुस्खे सिखाते रहेंगे| तरह-तरह के मोटिवेशनल स्पीकर आते रहेंगे और हमारे भीतर के भिखारी को गुदगुदाते रहेंगे, सफलता कैसे हासिल करें, सफल बनो, जीतो दुनिया को, जो चाहो वही पाओ…|

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क्या हम वाकई नहीं चाहते कि यह लोकतंत्र थोड़ी बहुत सांस ले? इसकी पक्षाघात (पैरालिसिस) से पीड़ित नस-नाड़ियों में कुछ जीवन का संचार हो? कब वो दिन आएगा जब सूखता जल, मरती नदी, जहरीली हवा, विषाक्त (टॉक्सिक) भोजन, दिमाग कुंद करती शिक्षा, भयंकर ट्रैफिक, तबाह होती हरियाली, कूड़ों के ढेर हमें बेचैन करेंगे और हम मतदान या वोटिंग का कर्मकांड करके जादू के इंतेजार में घर पर नहीं बैठ जाएंगे बल्कि अधिकारियों को खटखटाएंगे, नेताओं को हिलाएंगे, भाग-दौड़ करेंगे, कोशिश करेंगे और साबित करेगे कि हम मुर्दा और भांड नहीं हैं|

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4 Responses to भारतीय राजनीति का मायालोक

  1. Sunil Kumar says:

    बहुत बढ़िया

  2. Aarti Valia says:

    Sanjiv Sharma has elaborated today’s political scenario in a satire. His style of writing is bold and exceptionally insightful.. Politics is a farce and will continue to remain a comedy of errors in India. My congratulations to the writer!

  3. Your writing is very bold and fearless.

  4. Rahul jain says:

    हमें सबसे पहले खुद को ही बदलना होगा क्योंकि कहीं ना कहीं इन सारी अव्यवस्थाओं के लिए हम जिम्मेदार हैं

    बहुत ही शानदार लेखन है संजीव जी का

    सत्यमेव जयते

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