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  • शाम ए गम की कसम, आज  ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    शाम ए गम की कसम, आज ग़मगीन है हम.. : दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि — Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    1922-12-11 to 2021-07-07

    दिलीप कुमार हिनुद्स्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा नाम जिसे देख कर हम बड़े हुए और सिनेमा के रुपहले परदे पर जो नायको का नायक था. दिलीप कुमार उस युग का प्रतीक भी है जिसकी नीव आज़ादी के आन्दोलन के दौरान पडी और जिसे अपनी वैचारिक निष्ठा से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सींचा. किसी भी देश काल का सिनेमा उस देश की समकालीन राजनैतिक परिद्रश्य से प्रभावित होता है. भारत के लिए ये एक बड़ी बात थी के देश का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति के हाथो में था जो वैज्ञानिक चिंतन, मानववाद, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक था. वो दौर था जब हिन्दुस्तानी सिनेमा हमारे रास्ट्रीय मूल्यों से प्रेरणा लेकर लोगो के दिलो में अपनी जगह बना रहा था. ये वो दौर है जब दिलीप कुमार के साथ राज कपूर और देव आनंद ने सिनेमा के रुपहले परदे पर देश को एकता और सकारात्मकता का सन्देश देना शुरू किया. शैलेन्द्र, साहिर और मजरूह ने अपनी लेखनी से एक से बढ़ कर एक गीत लिख डाले जो साहित्य और कविता के किसाब से भी उत्कृष्ट दर्जे का माना जा सकता है. ये वो दौर था जब तलत महमूद, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, हेमंत कुमार, गीता दत्त, नूरजहां, लता मंगेशकर, मन्ना डे, आशा भोंसले और किशोरकुमार की कर्णप्रिय आवाज ने लोगो को अपना दीवाना बना दिया था. नौशाद, शंकर जयकिशन, गुलाम मोहम्मद, सी रामचंद्र, सचिन देव बर्मन, ओ पी नैय्यर, मदन मोहन आदि के संगीत ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी धूम मचा दी थी.

    धर्म के नाम पर पाकिस्तान बनने के बावजूद भी भारतीय राजनैतिक नेतृत्व ने भारत में पनप रही घृणा का मुकाबला वैचारिक तौर पर ही किया और इस दौर में सिनेमा ने प्रधानमंत्री नेहरु के उस धर्मनिरपेक्ष विचार को आत्मसात कर लिया इसलिए रोमांस में बदलाव की झलक दिखाई देती है. बम्बई सिनेमा की नगरी थी और आज इसे बॉलीवुड कहते है और कुछ लोग इसे ‘हिंदी’ सिनेमा भी कहते है लेकिन जिनलोगो ने इस सिनेमा की नीव का पत्थर रखा और इसे आज घर घर तक पहुंचाया, इसकी सबसे बेहतरीन क्लासिकल फिल्मे दी उनमे से अधिकाँश की मातृभाषा हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार ११ दिसंबर १९२२, देवानंद, २६ सितम्बर १९२३ और राज कपूर १४ दिसंबर १९२४ की पैदाइश है और सभी की पैत्रिक गांव आज के पाकिस्तान में है. दिलीप कुमार और राज कपूर की दोस्ती सिनेमा में व्यक्तिगत रिश्तो की महत्ता का सबसे बड़ा उदाहरण है. आम तौर पर राज कपूर और दिलीप कुमार को उस दौर का प्रतिद्वंदी माना जाता था. एक रोमांस का बादशाह था तो दूसरा दर्द का. देवानंद की छवि इन दोनों से भिन्न थी क्योंकि उन्होंने अपनी छवि को शहरी ही बना के रखा. इन तीनो महान कलाकारों की प्रथम भाषा भी हिंदी नहीं थी. दिलीप कुमार और राज कपूर के परिवार पेशावर के प्रख्यात किस्सा खिवानी बाजार के निवासी थे जहा पर २३ अप्रेल १९३० को देश के जाबांज वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और गढ़वाल राइफल्स के ७२ जवानो ने खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदाई खिद्म्गर आन्दोलन के लोगो पर गोली चलने के ब्रिटिश हुकूमत के आदेश को मानने से इंकार कर दिया. उसी पेशावर की क्रांतिकारी धरती से कपूर परिवार ओर खान परिवार बम्बई आ चुका था. राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर थिएटर में काम करते थे और दिलीप कुमार के पिटा फलो का ब्यापार करते थे. राज कपूर और दिलीप कुमार दोनों बम्बई के खालसा कालेज के छात्र रहे और दोनों की दोस्ती बेहद मजबूत थी.

    १९४४ में युसूफ खान को प्रक्यात नायिका देविका रानी ने जब ज्वार भाटा फिल्म के लिए ब्रेक दिया तो उन्हें दो नाम सुझाए गए : एक नाम था जहाँगीर और दूसरा था दिलीप कुमार. युसूफ खान को दिलीप कुमार नाम ज्यादा पसंद आया और उन्होंने सिनेमा के लिए इसे अपना लिया. धीरे धीरे उनकी शक्शियत ऐसे बनी के सारी दुनिया उन्हें दिलीप कुमार के नाम से ही जाने लगी. लेकिन कई बार लोग इन बातो की बारीकी नहीं समझते और अपनी अपनी सुविधाओं के हिसाब से लोगो का मूल्याङ्कन करते है. बहुत से लोग ये कहते है उस दौर में किसी भी फिल्म स्टार की सफलता के लिए ‘हिन्दू’ नाम होना जरुरी था इसलिए बहुत से मुस्लिम कलाकारों ने हिन्दू नाम अपनाया और इनमे दिलीप कुमार, मधुबाला और मीना कुमारी का नाम बहुत जोर शोर से लिया जाता है. लोग उदहारण देके कहते है आज सलमान खान, शाहरुख और आमीर को अपना नाम बदलने की जरुरत नहीं है लेकिन ये सब मात्र भ्रान्तिया और कपोल कल्पनाये है. आखिर नर्गिस, वहीदा रहमान, नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, खुर्शीद, सुरैय्या, नूरजहा, महबूब खान, कमाल अमरोही, साहिर लुधियानवी आदि को अपना नाम बदलने की जरुरत पड़ती. दिलीप साहेब ने इन बातो को पहले ही खारिज कर दिया था.

    दिलीप कुमार को देखना मतलब कला को देखना था. उनकी डायलोग डिलीवरी, उनके हाव भाव , शब्दों का उच्चारण सभी कमाल का था. इसलिए उनके यदि कला का साहित्यकार कहा जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. क्योंकि सिनेमा जिस स्वर्णिम दौर में वह थे उसमे सभी ने अपनी कलात्मक स्वायतत्ता को बचा के रखा और नतीजा हुआ के देश को बेहतरीन सिनेमा मिला. जब राज कपूर ने आवारा, श्री चारसौ बीस, आह, आग, जिस देश में गंगा बहती है बनाई तो दिलीप साहेब ने आन, मेला, नयादौर, मधुमति, तराना, आजाद, यहूदी, लीडर, गोपी, बैराग, आदि फिल्मे दी. कोई भी फिल्म अज भी उतनी ही जवा है जितनी उस दौर में थी. जहा रात की तन्हाई में तलत महमूद की मखमली आवाज में दिलीप कुमार को ‘ए मेरे दिल कही और चल हो या शाम ए गम की कसम आज ग़मगीन है हम, सीने में सुलगते है अरमान, आँखों में उदासी छाई है, ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहा कोई न हो, गाते सुनते है तो लगता है वो हमारे दिल की बात कह रहे है. एक दौर था उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ का टाइटल दे दिया गया और उनकी फिल्मो को देखकर बाहर आते समय लोगो की आँखों में आंसू और सिसकिया ही होती थी. इस प्रकार के गंभीर रोल करते करते उन्होंने अपने को नए सांचे में भी ढाला और वो था नेहरूवियन भारत का सपना. नया दौर( १९५७) ने उनके और हम सबको एक नयी दिशा दे दी. वो उम्मीद की किरण जो आज भी ज़िंदा है. साहिर ने कलम का कमाल किया तो ओई पी नैयर ने अपने संगीत से ऐसा समा बंधा के आज भी नया दौर और उसके गीत हम सबके के दिलो की धड़कन हैं और फिल्म का विषय तो ऐसा के ‘निजीकरण’ ओर मशीनीकरण के खतरों को सबसे बेहतरीन तरीके से यही फिल्म समझा सकती है. जिन्होंने दिलीप साहब का ‘दर्द’ देखा, नया दौर में एक बिलकुल नया रूप देखा. आज भी शादी विवाह में जो गीत सबसे ज्यादा बजता है वो है ‘ ये देश है वीर जवानो का, अलबेलो का मस्तानो का’…. मै समझता हूँ के कोई भी देशभक्ति गीत इतना पोपुलर नहीं हुआ के वो शादियों में सबसे ज्यादा बजे. इस फ़िल्म में दिलीप कुमार वैजयंतीमाला पर फिल्माया ‘ मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार’ और ‘उड़े जब जब जुल्फे तेरी’ आज भी किसी भी नए गाने से ज्यादा रोमांटिक और जवान है. आज जिस प्रकार से हमारे अधिकारों पर अतिक्रमण है उसके विरुद्ध कैसे संघर्ष करे और जीते ये ‘साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाना’ से समझा जा सकता. एक फ्रेम में दिलीप कुमार और वैजयन्तीमाला को देखना बेहद सुखद अनुभूति है.

    नया दौर के बाद आई ‘मधुमति’ ने भी अपने झंडे गाड़े. सलिल चौधरी के कर्णप्रिय संगीत और मुकेश की बेहद खूबसूरत आवाज ने दिलीप कुमार वैजयन्तीमाला की जोड़ी को फिर सिरमाथे लिया. ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं’ या दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा, आजा रे परदेशी, मै तो कब से खडी इस पार ने इस फिल्म की ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा दिए थे.

    दरअसल वो दौर हिन्दुस्तानी सिनेमा का स्वर्णिम युग ऐसे ही नहीं बन गया था. हर एक लीड स्टार की पूरी एक टीम थी जिसके साथ मिलकर पूरी फिल्म को ‘बुना’ जाता था. हर एक किरदार महत्वपूर्ण होता था और फिल्म में कहानीकार, गीतकार और संगीतकार की बेहद अहम् भूमिका होती थी. राजकपूर शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, लता मंगेशकर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मुकेश एक बड़ी टीम थी और राज कपूर अभी भी अपने इन ‘संगी साथियो’ के बिना कोई भी बात नहीं रखते थे. हालांकि दिलीप कुमार इस मामले में अपने मित्र राजकपूर की तरह नहीं थे और उन्होंने अपने को केवल अभिनय तक सीमित रखा था लेकिन उनकी फिल्मो में नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, शकील बदायुनी, साहिर लुधियानवी भी लगभग मज़बूत हिससा थे लेकिन दिलीप साहेब के लिए केवल रफ़ी साहब ने खूबसूरत गाने दिए ऐसा नहीं है. वर्षो तक तलत महमूद ने उनकी ट्रेजेडी किंग की छवि को मज़बूत किया तो मुखेस ने फ्निल्म यहूदी में ‘ ये मेरा दीवानापन है या, मेला में गाये जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है गाकर उसे और मज़बूत किया. रफ़ी साहेब की आवाज तो ऐसा लगता है दिलीप साहेब के लिए बनी थी. ‘आज पुरानी राहो से कोई मुझे आवाज न दे’.. पूरी फिल्म देखकर और दिलीप कुमार को परदे पर गाता देखकर आपका कलेजा मुंह पर आ जाता है. मुझे नहीं लगता के इतना इंटेंस सीन करने के क्षमता अभी किसी में दिखाई देती है.

    पहले सिनेमा एक पैकेज था जिसमे सबके रोल थे और इसलिए कभी स्टोरी तो कभी संगीत फिल्मो को हिट बना देते थे और सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह से ढल जाते थे. एक एक फिल्मे बनाने में सालो लगते थे लेकिन जो अंतिम प्रोडक्ट आता था वो अविश्मर्नीयं होता था. मुग़ले आज़म में दिलीप साहेब की भूमिका लाजवाब थी लेकिन क्या अकबर के रोल में पृथ्वीराज कपूर कही कम नज़र आये. मधुबाला ने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और मुहोब्बत की झूठी कहानी पे रोये में जो अभिनय किया वो बेहतरीन था. नौशाद के संगीत, लता मंगेशकर की बेहद हृदयस्पर्शी आवाज ने इस फिल्म को एक सम्पूर्ण फिल्म बनाया. निर्माता के आसिफ ने पैसो की चिंता किये बिना बड़े बड़े सेट तैयार किये और पूरी फिल्म को बनने में तीन वर्ष के करीब लगे. आज किसी के पास इतना समय नहीं है के इतना समय लगाए. नौशाद ने एक बार बताया के प्यार किया तो डरना क्या गाने को कंपोज़ करने में उन्हें पूरी रात लग गयी. आज एक गायक एक दिन में कई गाने का देते है. किसी भी पुरानी क्लासिकल फिल्म को देख लीजिये तो आपको पूरा टीम वर्क दिखाई देता है और हर एक किरदार की अपनी अहमियत है.

    आज ‘क्षेत्रीय’ सिनेमा का दौर भी है. उत्तर प्रदेश बिहार की अवधी- भोजपुरी फिल्मो की खूब कमाई हो रही है, गाने भी अश्लील और भोंडे आ रहे है लेकिन भारत के दो महान कलाकारों के जो सबसे अच्छे दोस्त भी थे, की दो फिल्मे हर एक कला प्रेमी को देखनी चाहिए तो पता चलेगा के वैसे फिल्मे और गीत क्यों नहीं लिखे जाते. दिलीप कुमार वैजयंतीमाला की गंगा जमुना १९६१ में आई और राज कपूर वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी कसम १९६६ में आई. दोनों फिल्म में उत्तर प्रदेश-बिहार के ग्रामीण पृष्ठभूमि बेहद संजीदा तरीके से दिखाई गयी है. मोहम्मद रफ़ी के ‘नैन लड़ जाई है, मनवा माँ कसक होइबे करी पर दिलीप कुमार का डांस आपको बिलकुल पूर्वांचल की उस दुनिया में ले चलता है जहा मिठास है, मेहनत है और प्यार भी है. दूसरी और मुकेश के गाये गीत ‘सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बांचे, करम न बांचे कोई, पर राज कपूर जिस प्रकार से गा रहे है वो हमें बिहार के उन इलाको में ले चलते है जो हम फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों में पढ़ते है. हालांकि तीसरी कसम रेणु की कहानी पर आधारित शैलेन्द्र की फिल्म थी जिसे जनता न पसंद नहीं किया हालांकि आलोचकों की पसंद बनी रही और आज भी एक क्लासिक फिल्म मानी जाती है. सवाल ये है के ऐसी फिल्मो के लिए आपको न केवल दिलीप कुमार या राज कपूर चाहिए अपितु रेणु, शैलेन्द्र, रफ़ी, मुकेश, नौशाद , शंकर जय किशन जैसे दिल से काम करने वाले लोग भी चाहिए.

    दिलीप कुमार आज के दौर में उस स्वर्णिम युग से हमारा साक्षात्कार कराने वाले अंतिम अभिनेता है. उनके प्यारे दोस्त राज कपूर २ जून १९८८ को और देव आनंद ३ सितम्बर २०११ को दिवंगत हो चुके है. शैलेन्द्र, साहिर, नौशाद, शंकर जयकिशन भी नहीं है. दिलीप साहब उस काल की महानतम तिकड़ी के अंतिम लिंक थे.

    आज दिलीप साहेब की मौत के बाद भारतीय मीडिया के पास वैसे लोग नहीं थे जो उनकी उप्लाभ्दियो और विचारधारा पर ईमानदारी से चर्चा कर सके. मीडिया ने उनके जाने की खबर से ज्यादा ताबज्जोह मोदी के मंत्री परिषद् के फेर बदल को दिया. इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती है जब आप एक ऐसे अदाकार की मौत पर भी चार ढंग के आलोचकों या कलाकारो को लेकर बात नहीं कर सकते. मुझे इसमें भी साजिश नज़र आती है और वो ये के दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर आपको हमारी गंगा जमुनी संस्कृति पर चर्चा करनी पड़ेगी. उनको फिल्मो और संगीत पर बात करेंगे तो के आसिफ, महबूब खान, नौशाद, साहिर, शकील बदायुनी और मोहम्मद रफ़ी का जिक्र भी आयेगा. उनकी विचारधारा को पढेंगे तो नेहरु को याद करना पडेगा और समाजवाद का जिक्र करना पडेगा. दिलीप कुमार भारतीया सामाजिक परिवेश को समझते थे इसलिए डाक्टर आंबेडकर को भी जानते थे. महाराष्ट्र के भीतर उन्होंने ओ बी सी यानी पसमांदा मुसलमानों के सवाल पर बड़ी बड़े सभाओं में हिस्सा लिया और सरकार से उनके लिए आरक्षण व्यवस्था की मांग की. दिलीप कुमार पर चर्चा के बहाने पर उर्दू और मुस्लिम समुदाय का भारतीया सिनेमा में योगदान पर चर्चा करनी पड़ती जो राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटने वालो के लिए पचाना मुश्किल था. जो अपने धर्म और संस्कृति की बात करते हैं उन्हें भी ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’, सुख के सब साथी दुःख में ना कोय’ , आना है तो आरह में कुछ देर नहीं है या राम चन्द्र कह गए सिया से ‘ में दिलीप कुमार ने किस प्रकार का सधा हुआ अभिनय किया है के कोई उनके नज़दीक में नहीं फटक सकता.

    दिलीप कुमार का अभिनय और व्यक्तित्व हमें ये बात भी याद दिलाएगा के कला तभी खिलती है जब वह समाज की सड़ी गली परम्पराओं को चुनौती दे सके, जब वह विचार में देश काल की सीमाओं को पार करे और जब उसका लक्ष्य बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय हो. दिलीप कुमार के अपने समकालीन कलाकारों और उनकी वैचारिक निष्ठाओ को छोड़ दे बाद के दौर में वैचारिक निष्ठा का वो दौर ख़त्म हो गया फिर भी गुरुदत्त, संजीव कुमार, बलराज साहनी , नर्गिस दत्त, सुनील दत्त, मीना कुमारी, नूतन, वहीदा रहमान जैसे कलाकार अपनी कला और सामजिक संदेशो के चलते हमेशा ज़िंदा रहेंगे. दिलीप कुमार को ईमानदारी से याद करने का मतलब होगा आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी पृष्ठभूमि को भी याद करना जिसकी नीव डाक्टर बाबा साहेब आंबेडकर और जवाहर लाल नेहरु ने रखी जहा सबके लिए आगे बढ़ने के अवसर हों और किसी को भी उसकी धार्मिक या जातीय पहचान के आधार पर किसी भी प्रकार के अधिकारों से वंचित न किया जाये.

    दिलीप साहेब की महान विरासत को हमारा सलाम

    Vidya Bhushan Rawat

  • फ्रैंक हुजूर का सामान सड़क पर फेंका जाना

    फ्रैंक हुजूर का सामान सड़क पर फेंका जाना

    Vidya Bhushan Rawat

    हमारे प्रिय मित्र फ्रैंक हुजूर ने अपनी आखिरी रात किताबों के ढेर और उनकी प्यारी बिल्लियों के साथ खुले में बिताई क्योंकि शहरी विभाग के अधिकारियों ने उन्हें जबरन बाहर निकाल दिया था।

    यह देखकर दुख हुआ कि लखनऊ के दिलकुशा कॉलोनी स्थित घर से फ्रैंक को बाहर निकालने के लिए अधिकारी किस तरह से हड़बड़ी में थे। यह घर शायद तब आवंटित किया गया था जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। फ्रैंक ने वहां समाजवादी फैक्टर पत्रिका शुरू की और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति के बारे में नियमित रूप से लिखते और रिपोर्ट करते रहे हैं।

    हम नहीं जानते कि इन मकानों के आवंटन और रद्द करने के नियम और नियम क्या हैं। मुझे पता है कि लखनऊ के पॉश इलाकों में कई ‘पत्रकारों’ को घर मिल चुके हैं। बहुत से ‘कागजात’ भी मौजूद नहीं हैं, लेकिन सरकार की दया पर ‘पितृकार’ हैं। फ्रैंक प्रति माह बिजली के बिलों के अतिरिक्त तेईस हजार रुपये की बाजार दर का भुगतान कर रहे थे। जब वह आपको बाजार किराए पर दे रहे थे, तब उसे बेदखल करने का कोई कारण नहीं था क्योंकि सभी पत्रकार और पत्रकार ऐसे ही रहते थे। फ्रैंक कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। एक पत्रकार से अधिक, वह एक लेखक हैं और दिल्ली में हिंदू कॉलेज में अपने छात्र दिनों के दौरान एक थिएटर कार्यकर्ता थे। उनका पहला नाटक ‘हिटलर और मैडोना “काफी लोकप्रिय था क्योंकि इसने सांप्रदायिक मुद्दे को उठाया था जब लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी नफरत भरी रथ (रथ) यात्रा शुरू की थी, जिसके परिणाम आज भी देखे जा रहे हैं।

    कीमती किताबों और पत्रिकाओं को सड़कों पर पड़ा देखना एक परेशान और दर्दनाक था। इन ‘कर्मचारियों’ के साथ समस्या यह है कि वे यह भी नहीं समझते हैं कि विचारों की दुनिया कितनी कीमती है। आदमी के पास विचार नहीं हैं तो क्या है। फ्रैंक के घर में कई अद्वितीय गुण थे। जब भी मैं लखनऊ में था, मैंने उनसे कई बार मुलाकात की थी और यह हमेशा वहाँ बैठे रहने और कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने और अपनी जमीनी रिपोर्ट साझा करने में एक खुशी थी।

    फ्रैंक एक अद्भुत मेजबान है और शायद उन सभी लोगों को जिन्होंने उसके आतिथ्य को देखा है वे इसे अच्छी तरह से जानते हैं। उनका घर हमेशा लखनऊ शहर आने वाले आगंतुकों और कार्यकर्ताओं के लिए खोला जाता था। फ्रैंक के परिवार का सबसे आश्चर्यजनक हिस्सा, उनकी पत्नी फेमिना मुक्ता सिंह और बेटे मार्कोस के अलावा, लगभग 40 + बिल्लियाँ हैं। इन बिल्लियों में से प्रत्येक को फ्रैंक द्वारा एक अलग नाम दिया गया है और मैंने फ्रैंक की तरह किसी अन्य बिल्ली प्रेमी को नहीं देखा है जहां बिल्लियों की स्थिति और कुछ समय से अधिक है, इंसान। वे सोफे पर बैठते थे और सभी आगंतुकों का अभिवादन करते थे। जब वे डाइनिंग टेबल पर बैठते तो वे घूमते रहते। मुझे इन बिल्लियों से प्यार मिला, जिन्हें उन्होंने अपना समाजवादी परिवार कहा, बस अद्भुत। पालतू जानवरों को संभालने के लिए आपको बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है और फ्रैंक ने ऐसा किया है।

    लखनऊ में अधिकारियों ने कभी भी नहीं सोचा कि व्यक्ति अपने सामान के साथ कहां जाएगा। 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार के सत्ता संभालने के बाद, फ्रैंक नियमित रूप से उनके बारे में कहानियां बनाते हुए भाजपा के हमदर्द मीडिया का निशाना बन गए। उनकी बिल्लियों को पड़ोसियों के लिए उपद्रव पैदा करने के लिए दोषी ठहराया गया था, जिसे हम सभी जानते हैं कि इन बिल्लियों की देखभाल के लिए फ्रैंक के धन का एक बड़ा हिस्सा निवेश किया गया था।

    सरकार को पत्रकारों और लेखकों को मकान आवंटित करने की इन नीतियों पर ध्यान देने की जरूरत है। पता करें, इन आवंटित मकानों में कितने ‘असली’ पत्रकार और लेखक रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार को ‘सरकार सेवा’ के लिए जाना जाता है, ताकि पाटीदार प्रशासन के भक्त बन जाएं। उनकी ओर से, मुझे लगता है कि अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को फ्रैंक का समर्थन करना चाहिए और स्थायी समाधान की तलाश करके इस मुद्दे को हल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह राजनीतिक दलों के लिए अपने स्वयं के पेशेवर मीडिया सेल बनाने का समय है, बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का समर्थन करना है और सबसे अच्छा तरीका है कि अपने कार्यालयों का निर्माण किया जाए जहां कुछ लेखकों और लेखकों के लिए भी आवासीय कॉलोनियां विकसित की जा सकती हैं। जो उन्हें इस तरह के अपमान से बचाएगा। नेता, विधायक, सांसद के लिए, हमारे पास फ्लैट हैं और उनकी निजी संपत्तियां हैं, यह समय है कि वे इन मुद्दों पर गंभीरता से गौर करें।

    फ्रैंक के साथ हमारी एकजुटता और आशा है कि वह ऐसा करना जारी रखेगा जो वह इन वर्षों में कर रहा है। यह समय बाबा साहेब अम्बेडकर, ज्योति बा फुले और ईवीआर पेरियार के उच्चं के अनुसार बहुजन समाज के सांस्कृतिक कथानक के निर्माण का है। ये चुनौतियाँ न्याय और गरिमा के संघर्ष का हिस्सा हैं। जुल्म और दमन से लड़ाई नहीं रुकती। सामाजिक परिवर्तन का संकल्प मजबूत और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। हमें अपना सिर ऊंचा रखने पर मार्च करना चाहिए।

    Vidya Bhushan Rawat


  • अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट मिशन को समर्पित व्यक्तित्व : डॉ धरम कीर्ति –by Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    अगले माह वह अपना अस्सी वा जन्मदिवस मना रहे होते लेकिन प्रकति के नियमो के आगे हम सभी मजबूर है. बाबा साहेब आंबेडकर के विचारो को समर्पित और बौध साहित्य के विद्वान डॉ धर्म कीर्ति का कल रात को नयी दिल्ली के एक अस्पताल में  देहांत हो गया. वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. उनकी प्रमुख पुस्तकों में कुछ इस प्रकार से हैं: महान बौद्ध दार्शनिक, बुद्ध का समाज शास्त्र, बुद्ध का निति शास्त्र, बुद्ध कालीन वर्णव्यवस्था और जाति, महान मनोचिकिस्तक बुद्ध, जाति विध्वंसक भगवान बुद्ध, मै नास्तिक क्यों, बौध धर्म हिन्दू धर्म की शाखा नहीं, गाँधी और गांधीवाद की दार्शनिक समीक्षा, मानवाधिकारों के पुरौधा डॉ बी आर आंबेडकर, महान बुद्धिवादी दार्शनिक डॉ अम्बेडकर आदि. विभिन्न बौध विद्वानों और दार्शनिको पर तो उन्होंने तमाम पुस्तके लिखी. बाबा साहेब के शिक्षा और वैचारिक क्रांति को उन्होंने अपने जीवन में जैसे उतार ही दिया था इसलिए तमाम बौध साहित्य न केवल पढ़ डाला अपितु उसमे महारत भी हासिल की.

    आगरा की ऐतिहासिक धरती में पैदा हुए डॉ धर्मकीर्ति के परिवार के लोग आर्य समाज से प्रभावित थे और बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बौध धर्म में आने की कॉल को सबसे पहले स्वीकारने वाले लोगो में थे. १९५६ में जब बाबा साहेब आंबेडकर आगरा के प्रसिद्ध रामलीला मैदान में आये तो उन्होंने लोगो को बुद्ध धर्म ग्रहण करने की बात कही थे. उसी समय बाबा साहेब आंबेडकर ने डॉ धर्मकीर्ति के घर के पास एक बुद्ध विहार का उद्घाटन भी किया. उस समय तक गाँव में एक शिव मंदिर था लेकिन आर्य समाज का असर होने से बहुत से गाँव-वासी वैसे भी मूर्ति पूजा नहीं करते थे इसलिए जब बाबा साहेब ने बौध धम्म दीक्षा की बात कही तो लोग तैयार हो गए लेकिन कुछ एक लोग इसके विरोध में थे लेकिन अंत में गाँव में लोगो ने शिव मंदिर को हटा बुद्ध विहार की स्थापना की ताकि बाबा साहेब के आह्वाहान का सही अर्थो में स्वागत हो सके.

    डॉ धर्म कीर्ति ने बाबा साहेब की ऐतहासिक रैली में भाग लिया और उनके जीवन में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के विचारो का अत्यधिक प्रभाव पड़ा. पिछले वर्ष दिसंबर में मैंने उनका एक बेहद बड़ा साक्षात्कार लिया तो उन्होंने अपने जीवन के अनछुए पहलुओ के बारे में विस्तार से जानकारी दी.वह बताते है के जब बाबा साहेब ने प्रबुद्ध भारत की बात कही तो ये केवल दलितों के लिए ही नहीं थी वह चाहते थे के सवर्ण हिन्दू से भी कह रहे थे के यदि वे मानवता की सेवा और कल्याण चाहते है तो बुद्ध धम्म में आकर अपने में बदलाव लाये. बुध विहार में जहा पूरे मार्ग में बाबा साहेब के स्वागत में गुलाब के पंखुड़िया बिछी हुई थी, बाबा साहेब ने कहा के हिन्दुओ की तरह बुद्ध की पूजा मत करो. धम्म में मार्ग में मत आओ यदि आप बुद्ध को ढंग से समझे नहीं हो .यदि आप बुद्ध के मार्ग पर नहीं चल सकते तो विश्व्-व्यापी परिवर्तन नहीं ला पाओगे.

    आगरा के इसी रामलीला मैदान में बाबा साहेब की आँखों में आंसू छलके थे जब उन्होंने कहा था समाज के  पढ़े लिखे लोगो ने उनकी उम्मीद के अनुसार काम नहीं किया. डॉ धर्मकीर्ति बताते है के हां ये बात सही है के बाबा साहेब ने ये बात कही के मेरे समाज के पढ़े लिखे लोगो ने मुझे धोखा दिया क्योंकि वे सत्ता के साथ समझौता करते थे और सफल होने के बाद समाज से नहीं जुड़े. सफलता के बाद व्यक्ति हमारे संघर्षो को नहीं पहचानता इसलिए आत्मगौरव कभी भी अहंकार में बदल सकता है. बाबा साहेब आत्मसम्मान चाहते थे लेकिन उसके अहंकार में बदल जाने के खतरे के बारे में लोगो को हमेशा आगाह करते रहते थे.

    वे कहते है: ‘मै शिक्षा विभाग में एडिशनल डायरेक्टर पद से रिटायर हुआ. मेरा बेटा एक बड़ा एक आर्टिस्ट है. मेरी बेटी ने शोध किया और वो एक सम्मानित पद पर है. यदि मै गाँव में होता तो केवल खेती कर रहा होता. आज मै जो कुछ हूँ बाबा साहेब के कारण हूँ. लेकिन इसी हकीकत को स्वीकार करने में लोग हिचकते है’.

    Dr Dharmkirti

    ‘मैंने तीन विषयो में पी एच डी की, एक विषय में डी लिट् किया और एक में डी लिट् फिर से कर रहा हूँ, कोई विश्विद्यालयो और शोध संस्थानों में में लेक्चर दिए है. करीब ९० से अधिक पुस्तके लिखी है. क्योंकि मेरे मन में ये बात घर कर गयी के मुझे बाबा साहेब के मार्ग पर चलना है, ज्ञान का मार्ग. इसलिए मै हमेशा ऐसी कोशिश करता रहा’.

    जब मैंने उनसे पूछा के तीन पी एच डी करने के पीछे क्या कारण था तो उन्होंने इससे सम्बंधित मज़ेदार वाकिया बताया . वह कहते है : “ मैंने आगरा विश्वविद्यालय से अपनी पहली पी एच डी की थी. एक दिन मै दिल्ली विश्विद्यालय के बुद्धिस्ट डिपार्टमेंट में बैठा था. एक मित्र ने पूछा तो मैंने बताया के मैंने आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की है तो उन्होंने मजाक में मेरी बात को लिया और कहा के अगर असल पी एच डी करनी है तो यहाँ से करके दिखाओ. अब उन दिनों दिल्ली में पी एच डी करने के लिए पहले एम् फिल करनी होती थी जो मैंने नहीं की थी इसलिए मैंने एम् फिल का फार्म भरा और उसे पूरा किया. अगले वर्ष मैंने पी एच डी के लिए एनरोल किया और उसे एक वर्ष के अन्दर ही करके दे दिया. थीसिस लिखना मेरे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी इसलिए आसानी से लिख दी. कुछ वर्षो बाद किसी सज्जन ने मुझे ताना मारा के मेरा विषय तो दर्शन है लेकिन उसमे कोई शोध नहीं है तो मैंने मेरठ विश्विद्यालय से उसे भी कर लिया.

    1963  से डॉ धर्म कीर्ति ने आगरा के प्रसिद्ध बलवंत सिंह राजपूत कालेज में दर्शन शास्त्र विभाग में पढ़ाना शुरू किया जो के उस दौर में बहुत बड़ी बात थी. मैंने उनसे पुछा के क्या कभी उन्हें कालेज में जातिवाद नजर आया तो उन्होंने बताया के नहीं. हाँ एक घटना का जिक्र करके उन्होंने बताया के ‘कालेज के ऑफिस के सामने पानी पीने का एक घड़ा रखा रहता था जिससे सभी अध्यापक लोग पानी पीते थे लेकिन कालेज के क्लर्क ने मुझे वहा पानी पीने से साफ़ मना कर दिया. मैंने इसकी शिकायत वह के प्रचानाचार्य डाक्टर आर के सिंह से की जिन्होंने उस क्लर्क को बहुत बुरी तरह से झाड लगाईं के उसके बाद से वह प्रश्न ही ख़त्म हो गया’.

    प्रारंभिक दौर के अम्बेडकरवादी विचारो से परिपक्व और कार्य प्रणाली में व्यवहारिक थे. वे किसी भी किस्म के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं थे. मैंने भगवान् दास जी, एल आर बाली आदि के साक्षत्कार भी किये और सभी से पता चला के उनका झुकाव बे सभी शुरूआती दौर में आर्य समाजी थे और अपने अन्दर प्रगतिशील विचारो के लिए बहुत हद तक आर्य समाज को भी जिम्मेवार बताते है. उसके अलावा सभी अपना झुकाव वामपंथ की और मानते थे हालाँकि सभी ने भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों में जातिगत भेदभाव के विषय में व्यापक तौर पर लिखा और उसकी आलोचना भी की.

    आगरा में राहुल संकृत्यायन जी का भी आना जाना लगा रहता था. डॉ धर्म कीर्ति जी बताते हैं के उनके राहुल जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे. वो कहते है राहुल जी ने एक बार कहा के जिसे मूर्ख बनना हो तो संस्कृत पढ़ सकता है. मैंने तो वो उम्र पार कर ली जब लोगो को मुर्ख बनाया जा सकता है. उनका कहना था का लिपि का कोई मूल्य नहीं होता. मुख्य महत्त्व तो उसमे मौजूद विचारों का है. सारे वेद , उपनिषद, पुराण, स्मृतिया संस्कृत में हैं इसलिए कोई मनुष्य इन्हें पढ़ेगा तो विचारों को पढने के लिए ही जाएगा लिपि नहीं और जो इन्हें पढ़ेगा वो तो पागल हो जाएगा.”

    राहुल जी के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए वह कहते हैं : राहुल जी आगरा में किसी ऋषिकेश चतुर्वेदी के घर पे आया जाया करते थे और वहीँ से वह हमारे बुद्ध विहार में आते थे. एक दिन ऋषिकेश जी ने उनसे पूछ लिया के कहा जा रहे हो तो उन्होंने बताया के मैं बुद्ध विहार जा रहा हूँ तो चतुर्वेदी जी ने शायद कोई जातिसूचक टिपण्णी कर दी . राहुल जी से रहा नहीं गया बोले ‘ पांच हज़ार साल से तुम उनको मारते आये हो, अपमानित किये हो तो कुछ नहीं और आज यदि वो तुमको गाली भी दे दे, या तुम्हारी गर्दन भी काट दे तो भी ये बहुत कम होगा. उसके बाद वह हमेशा ही हमारे बुद्ध विहार में ही ठहरे’.

    डाक्टर धर्म कीर्ति ने मुझे भदंत आनंद कौत्यल्यायन के साथ भी अपने संस्मरण सुनाये. ऐसा लगता था के वह अम्बेडकरी आन्दोलन के महतवपूर्ण इतिहास को अपने में समेंटे हुए थे इसलिए मेरे लिए यह जरुरी था के सबको दस्तावेजीकरण कर सकू.

    डॉ धर्मकीर्ति को बौध दार्शिनिक धर्मकीर्ति ने बहुत प्रभावित किया और इसी कारण उन्होंने अपना नाम धर्म कीर्ति रखा. दरअसल उनके बचपन का नाम कालीचरण था. इस विषय में चर्चा करते हुए वह बताते हैं :

    “मेरा नाम कालीचरण था. मेरे पिता जी आर्य समाजी थे. पंडित काली चरण शास्त्री नामक एक आर्य समाजी विद्वान थे जो संस्कृत, फ़ारसी और अरबी के विद्वान थे. मेरे पिता भी मुझे उन जैसा बनाना चाहते थे इसलिए मेरा नाम कालीचरण रख दिया. जब मैंने एम् ए और पी एच डी कर ली तो बी पी मौर्या ने मुझे सलाह दी के मैं अपना नाम बदल दूं. वो कहते थे के तुमने तो १९५६ में ही बुद्धिस्ट हो गए लेकिन नाम अभी भी वही चल रहा है इसलिए तुम्हे इसे बदलना चाहिए. मुझे भी ये नाम पसंद नहीं था. सवाल यह था का नया नाम क्या हो ? धर्म कीर्ति छटवी शताब्दी में नालंदा में एक बौध दार्शनिक थे. वह मूलतः केरला के रहने वाले ब्राह्मण थे जिन्होंने बुद्ध धर्म में आकर अपना नाम धर्मकीर्ति रखा. मैंने भी उनसे प्रभवित होकर अपना नाम आधिकारिक तौर पर १९९६ में धर्म कीर्ति रख दिया.”

    मैंने पूछा आचार्य धर्मकीर्ति ने उनको कैसे प्रभावित किया तो डॉ धर्म कीर्ति उनका एक प्रमुख बात बताते है: यदि कोई वेदों को प्रमाण मानता है, और फिर उनके आधार पर ये मानता है के ईश्वर ने पृथ्वी की रचना की है, स्नान करके धर्म की पूर्ती होती है, कोई जातिवाद को मानते हुए छुआछूत करता है के ये ईश्वर की देन है, और पाप को नष्ट करने के लिए शरीर को कोई कष्ट देता है, तो इन लोगो की प्रज्ञा नष्ट हो गयी है. ये पांच चिन्ह मूर्खो की पहचान है.

    डॉ धर्मकीर्ति का बौध धर्म और दर्शन पर गहन अध्ययन था. उनके विचारों पर राहुल संकृत्यायन और भदंत आनंद कौत्स्य्लायान का भी असर दिखाई देता है. वह मानते थे के बौध धर्म को भी ब्राह्मणों ने घेर लिया और ऐसी बातो को इसमें डालने की कोशिश की जो बुद्ध ने कभी कही ही नहीं.

    मजेदार बात यह के डॉ धर्म कीर्ति ने भूदान आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी की. मैंने उनसे पुछा आखिर विनोबा के अध्यात्म को उन्होंने कैसे स्वीकार कर लिया जब वह अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़े हुए हैं तो उनका जवाब साफ़ था. वह बोले के मैं विनोबा के साथ उनके अध्यात्म के कारण नहीं अपितु भूदान आन्दोलन के कारण जुडा. मुझे लगा के हमारे लोगो को जमीन की जरुरत है और ऐसे में यदि कोई व्यक्ति आन्दोलन कर रहा हो जिससे हमारे समाज को लाभ होता हो तो क्या बुराई है. और इस आन्दोलन के चलते उन्होंने बहुत से लोगो को भूमि आवंटन करवाने में सहयोग किया.

    डॉ धर्मकीर्ति ने जीवन पर्यंत अपने सिद्धांतो से समझौता नहीं किया. वह बी पी मौर्या के बहुत करीब थे लेकिन जब मौर्या ने भाजपा का दामन थामा तो उन्होंने साथ देने से इनकार कर दिया. भाजपा के लोगो ने उन्हें अपने पास बुलाने के बहुत प्रयास किये. वह कहते है के दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री श्री साहेब सिंह वर्मा ने उन्हें अपने यहाँ चाय पर बुलाया और उन्हें भाजपा में शामिल होने के दावत दी और राज्य सभा की सद्स्त्यता, या किसी कमीशन का पदभार या किसी राज्य का राज्यपाल आदि का प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया.

    Dr Dharmkirti and Vidya Bhushan Rawat

    डाक्टर धर्मकीर्ति के पास विचारों और अनुभव का खजाना था. उनके जाने से अम्बेडकरी मिशन को बहुत अधिक हानि हुई है क्योंकि इस उम्र में भी उनमे मैंने पूरी ऊर्जा पाई. वह लगातार अध्ययन कर रहे थे और लिख भी रहे थे , इसलिए अचानक से उनका चले  जाना बहुत दुखदायी है. ऐसे समय में जब देश में दलितों के उपर हमले हैं और मनुवादी ताकते भिन्न भिन्न तरीको से सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और दलितों और अन्य प्रगतिशील मानववादी ताकतों पर हमला कर रही है, डॉ धर्मकीर्ति के ओजस्वी बाते उनको ताकत और उर्जा प्रदान करती. मुझे ख़ुशी है के मैं उनसे मिल पाया और लम्बी बात हो सकी.

    Vidya Bhushan Rawat

  • रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक होने का महत्त्व –Vidya Bhushan Rawat

    Vidya Bhushan Rawat

    रजनी तिलक जी का अचानक चले जाना अम्बेडकरवादी महिलावादी आन्दोलन के लिए गहन धक्का है क्योंकि उन्होंने जीवन प्रयत्न इन सवालों पर कोई समझौता नहीं किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए वह संघर्षरत रही. आज ये कठिन दौर में साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरुद्ध सीधे खड़े होने के लिए बहुत वैचारिक निष्ठां चाहिए होती है . रजनी तिलक उन गिने चुने लोगो में थी जो बिना किसी ईगो के ऐसे किसी भी प्लेटफार्म पर जाने के लिए तैयार रहती थी जहा जनता के प्रश्नों पर लोग लड़ रहे थे. इसलिए दिल्ली के जंतर मंतर पर हम उन्हें भगाना उत्पीडित लोगो के साथ खड़े देखते थे तो निर्भया आन्दोलन के वक्त भी उन्होंने औरो के साथ जुड़ने में कोताही नहीं की लेकिन समय समय पर लोगो को चेताते रहना के दलित महिलाओं के उत्पीडन के प्रश्नों पर तथाकथित प्रगतिशील और जनवादी लोगो को उतना ही बेचेन दिखना पड़ेगा जैसे वो निर्भया के लिए कर रहे थे लेकिन उनकी उन लोगो से कोई हमदर्दी नहीं थी जो इन आंदोलनों में न शामिल होने के लिए अलग अलग तर्क गढ़ रहे थे. वह कहती थी के बदलाव और न्याय के लिए संघर्ष करना जरुरी है और मात्र सोशल मीडिया में ही क्रांति करने से बदलाव नहीं आएगा जब तक हम अपने प्रश्नों के लिए जन संवाद नहीं करेंगे और संघर्षरत लोगो के साथ नहीं जुड़ेंगे.

    रजनी तिलक जोड़ने वाली महिला थी. वो ऐसी अम्बेडकरवादी संघर्षशील महिला थी जो किसी भी संन्घर्ष में तत्पर थी. वैचारिक रूप से सशक्त अम्बेडकरवादी होने के बावजूद संघर्षो में उन्होंने बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया. इस समय भी उनका येही कहना था के हिंदुत्व की कट्टरपंथी ताकतों को हराने के लिए हमें सभी प्रगतिशील शक्तियों के साथ आना पड़ेगा. यही कारण था वह हर जगह मौजूद रहती ताकि कोई ये न कहे के अम्बेडकरवादी अन्य आन्दोलनों और मुद्दों पर दूसरो के साथ खड़े नहीं होते. उन्होंने वामपंथी साथियो के साथ भी अपने को जोड़े रखा लेकिन जाति के प्रश्नों को गौण करने के लिए उनकी आलोचना भी की. समाज के लिए काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ वह आसानी से जुड़ जाती थी. रजनी जी को मै पिछले वीस से अधिक वर्षो से जानता था और हमने कई प्रश्नों पर साथ साथ कार्य किया. दरअसल दलित महिलाओं के प्रश्नों पर वह ग्रामीण क्षेत्रो की महिलाओं को वैचारिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए साथ साथ कई बातो पर विचार कर रही थी. इतने वर्षो में उनको समझने के बाद ही मेरा उनके प्रति सम्मान बहुत गहरा था क्योंकि उन्होने सुलझे हुए साथियो को आगे बढाया और केवल जुमले बाजी की राजनीती नहीं की. वह एक नयी पौध को तैयार कर रही थी और शायद यही बात उन्होंने मुझमे देखी के उत्तर प्रदेश के अलग अलग इलाको में हमने कैसे अम्बेदार्वादी नौजवानों को राईट बेस्ड काम करने से जोड़ा.

    रजनी जी के लेखन में उनके संघर्षो का प्रभाव है. उनका लेखन केवल किताबी पाठशाला का ज्ञान नहीं था जो उनके जीवन संघर्षो और आन्दोलनों में भाग लेने के बाद पैनी हुई समझ से बनता है. हालाँकि एक कवियित्री और लेखिका के तौर पर वह अच्छे से स्थापित हो चुकी थी लेकिन उन्होंने कभी इस बात का पाखंड नहीं किया और हमेशा से संघरशील साथियो के साथ ही जुडी रही. क्योंकि वह सामाजिक आन्दोलनों से जुडी रही और नैक्डोर और कदम जैसी संगठनों के साथ लगकर काम कर रही थी तो बहुत से लोगो को नाराज भी की लेकिन उनकी निष्ठां काम में थी इसलिए उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कोई क्या कहता है. हालाँकि ये भी हकीकत है के वह अपने को अन्दोलानात्मक संगठनो से जोड़े रखना चाहती थी और पिछले दो वर्षो से उन्होंने राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन को मजबूत करने का प्रयास किया और इस सिलसिले में वह देश के विभिन्न भागो में दलित महिलाओं के प्रश्नों पर नए युवा साथियो को जोड़ रही थी और उन्हें अम्बेडकरवादी विचारधारा, सावित्रीबाई फुले और ज्योति बा फुले के संघर्षो से भी रूबरू करा रही थी.

    संघर्ष के पथ पर कार्यकरते कई युवा साथियो के व्यक्तिगत प्रश्नों को भी बहुत ध्यान और गंभीरता से उन्होंने देखा. मुझे ऐसे कई मौको पर उनके साथ जाने और सीखने का मौका मिला जब साथी अपने रिश्तो के कारण परेशान होते है, जब समाज में अपने ही लोग आपके साथ नहीं होते. वो बहुत मुश्किल क्षण होते है. हकीकत ये है के हम सभी जो समाज बदलाव की लड़ाई लड़ते है तो व्यक्तिगत जिन्दगी में अक्सर स्वयम से भी संघर्ष कर रहे होते है. ऐसे वक़्त में बहुत की कम लोग होते है जो साथ खड़े होते है. मनुवाद या ब्राह्मणवाद को फेसबुक या किताबो में लेख लिखकर ख़त्म करदेना तो बहुत आसान होता है लेकिन ये हमारे अन्दर से निकलना तब तक नहीं हो सकता जब तक स्त्री पुरुष संबंधो पर हमारा नजरिया खुला हुआ न हो और यदि हम  वैयक्तिक स्वतंत्रता का समर्थक न हो तो हमारा मनुवाद विरोधी भाषण मात्र जुमला रहेगा. बाबा साहेब आंबेडकर ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था कि हमारा समाज अभी समाज ही नहीं बना क्योंकि यहाँ वैयक्तिक रिश्तो का कोई सम्मान नहीं है. रजनी जी दूसरो की तो पूरी मदद की लेकिन स्वयं की जिंदगी में वह इन संघर्षो से झूझती रही. कई बार अपने विषय में सुनी सुनाई बातो का अपमान भी झेला लेकिन इसके बावजूद भी उनके चेहरे पे हमेशा मुस्कान होना और फिर भी समाज के लिए सोचना उनकी असीमित ताकत को दर्शाता है.

    वह ग्रामीण महिलाओं के संघर्षो की कहानी लिखना चाहिती थी. पिछले बीस वर्षो में मैंने जैसे जैसे अम्बेद्कर्वादियो के अनुभवों को विडियो रिकॉर्ड किया और लिपिबद्ध किया उससे वह बहुत प्रभावित थी और बार बार मुझे लोगो के पास जाने के लिए कहती. आर पी आई के सबसे पुराने साथी ब्रह्मदेव जी के साक्षात्कार के लिए वह मुझे शाहदरा में उनके निवास स्थान के ले के गयी. उनका कहना था के ये सभी आन्दोलनों के लोग है जिन्होंने अपनी जिंदगी बाबा साहेब के मिशन के लिए लगा दी इसलिए उनके जीवन के अंशो को जानना जरुरी है. उन्होंने स्वयं एक छोटी से पुस्तिका ब्रह्मदेव जी के ऊपर भी लिखी. फिर उन्होंने श्री महरोल जी से बातचीत की व्यवस्था की और वजीराबाद स्थित उनके निवास स्थान पर ही इसकी व्यवस्था की. दोनों की स्थानों पर मेरे पास कोई कैमरा हैंडल करने वाला नहीं था और उन्होंने ही इसे हैंडल किया ताकि मै आराम से इंटरव्यू कर सकू. नागपुर में कुमुद पावडे जी से उन्होंने मेरा संपर्क करवाया और नतीजा यह हुआ के अम्बेडकरी आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण महिला से हमने साक्षात्कार किया. हमारे लिए संतुष्टि के बात ये होती है के उनके जीवन के बेहद महत्वपूर्ण सवाल लोगो के सामने आते है. महिलाओ के अपने संघर्षो की कहानिया और फिर बाबा साहेब का उनके जीवन में प्रभाव भी समाज में चेतना जगाने के लिए जरुरी है इसलिए के ये पहले की पीढ़ी है जिसके पास अपने को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया नहीं था, न ही खुद को प्रमोट करने वाली बाते. उन्होंने संघर्ष किया और समाज के साथ जुडी रही इसलिए हमारे लिए ये आवश्यक है ऐसे लोगो की कहानियो को कलमबद्ध किया जाए या उनको विडियो रिकॉर्ड किया जाए. रजनी जी इस सन्दर्भ में मुझसे बिलकुल सहमत थी और इसलिए उन्होंने इतने प्रयास किये. मेरे जीवन में ये दर्द हमेशा रहेगा के सबके इंटरव्यू करते वक़्त उनकी बाते रिकॉर्ड नहीं कर पाया. इसका कारण यही था के वह हमेशा टालती रही के पहले बुजुर्ग लोगो के इंटरव्यू कर लो, हमारा तो हो जाएगा. जिंदगी कितनी अनिश्चित है ये साफ जाहिर हो जाता है. दिसंबर के महीने में मैंने एक प्रश्नावली भेजी थी जो उनकी नयी पुस्तक सावित्री बाई फुले रचना समग्र के बारे मे और अम्बेदारकरवाड़ी आन्दोलन के समक्ष चुनातियो के लेकर था लेकिन उसके उत्तर नहीं आ पाए हालाँकि लगभग दो हफ्ते पूर्व जब मैंने उनसे बात की थी तो उनका कहना था के उन्होंने उस पर काम कर लिया है और और वह उसे भेज देंगी क्योंकि वह टाइप करने की स्थिति में नहीं थी. मार्च आखिर में उन्होंने अम्बेद्कर्वादियो के साथ मेरे साक्षात्कारो पर आधारित पुस्तक पर परिचर्चा करने की बात कही. अकसर वह मुझसे कहती के हिंदी में लिखो ज्यादा लोगो तक पहुंचोगे.. मैंने कहा मै समय समय पर हिंदी में लिख भी रहा हूँ और अब ज्यादा लिखूंगा.

    रजनी जी के साहित्य को मैंने पढ़ा. उनकी कविताओं के पहली पुस्तक पदचाप की कई प्रतियों के मैंने नौजवान साथियो में वितरित भी किया और उनकी कई कविताओं के हमने अपने आन्दोलन में महिलाओं को प्रेरित करने के लिए बैनर पर भी छपवाया. आज भी उन बैनरों को हम अपने विभिन्न कार्यक्रमों में इस्तेमाल करते है. उनकी आत्मकथा ‘अपनी जमी अपना आसमा’ की पहली प्रति उन्होंने मुझे दी. पिछले वर्ष तीन जनवरी को हम दोनों सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस से सम्बंधित कार्यक्रम में भाग लेने हरियाणा राज्य के मेवात क्षेत्र में स्थित स्थान नुहू गए थे और वहा से लौटने पर जब  हम स्वराज प्रकाशन में गए तो पता चला के पुस्तक आ चुकी है. उनके चहरे की मुस्कराहट दिखा रही थी के उन्हें इसका इतना इंतज़ार था लेकिन उन्होंने कहा के ये तो भाग १ है और अभी अन्य भागो की तैय्यारी कर रही थी. इस भाग में उनके जीवन सघर्ष की वह कहानी थी जिसमे परिवार में साधारणतः होता है के महिलाओं को पारंपरिक कार्यो में ही उत्तम समझा जाता है. उनकी जीवटता को सलाम करना पड़ेगा के कैसे उन्होंने इतने संघर्ष किये और अपनी शर्तो पर जिन्दगी जी जो बेहद मुश्किल काम है क्योंकि अधिकांशतः छोटी सुविधाओं की खातिर, संघर्षो से डरकर हम समझौता कर लेते है.

    उनकी पुस्तक ‘बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ’ में उन्होंने हमारे समाज में व्याप्त दोगलेपन का पर्दाफाश किया है. मुझे उन छोटी छोटी कहानियो को पढने में इतना मज़ा आया के पुस्तक शीघ्र ख़त्म कर मैंने तुरंत उसका रिव्यु भी लिख दिया जिसका शीर्षक मैंने ‘कामरेड का करवाचौथ’ दिया क्योंकि कहानिया दिखा रही थी के कैसे बड़े बड़े कामरेड भी समय पड़ने पर अपनी पत्नियों से करवाचौथ की अपेक्षा रखते है. ब्राह्मणवाद की यही बड़ी ताकत है के उसके सामने बड़े बड़े विचारशील और क्रन्तिकारी लोग भी घुटने टेक देते है. शायद ब्राह्मणवाद में जो पित्र-सत्ता है उसको कोई सुविधाभोगी नहीं छोड़ना चाहता चाहे वह राजनैतिक तौर पर कोई भी विचारधारा की बात कहता हो.

    रजनी जी के जाने की ये उम्र नहीं थी क्योंकि बहुत से कार्यो के लिए वह स्वयं को तैयार कर रही थी. जिस फुर्ती से उन्होंने पिछले एक वर्षो में सामाजिक कार्यो के अलावा साहित्य सृजन किया वह बेहद महत्वपूर्ण है और मेरा सर इस बात के लिए उनके समक्ष झुकेगा. आज उनकी और शेकर पवार जी की मेहनत के कारण सावित्री बाई फुले रचना समग्र निकालने में कामयाब हुई जो इस दौर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है. मै तो सामाजिक संघर्षो के सभी अम्बेडकरवादी, बहुजन साथियो से अनुरोध करूँगा के वे इस पुस्तक को जरुर पढ़े और इमानदारी से अगर वे चले तो सामाजिक बदलाव अवश्यम्भावी है. बदलाव तो होना ही है लेकिन वो कैसा हो इसे समझने के लिए माँ सवित्ग्री बाई फुले के संघर्षो को और उनकी कविताओं, भाषणों और ज्योति बा को लिखी उनकी चिट्ठियों को पढ़ लेंगे तो पता चल जाएगा के हमारी सामाजिक सरकार कैसे होने चाहिए. ज्योति बा और सावित्री बाई इस सन्दर्भ में एक क्रांतिकारी युगल है जिनसे इस समाज के सोचने की दिशा बदल सकती है.

    एक सन्दर्भ में रजनी जी भी सावित्री बाई के सच्ची उत्तराधिकारी थी क्योंकि उनकी साहित्य सृजन में कोई दंभ नहीं था. भाषा बिलकुल आप बोलचाल वाली और संघर्षो से निकले अनुभव की थी. वह सावित्री बाई के साहित्य को मराठी से निकालकर हिंदी की विशाल जनता के समक्ष लाने वाली महिला थी और कम से कम उन गिने चुने लोगो में थी जिन्होंने ३ जनवरी को सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को शिक्षक दिवस में मनाने वाली परंपरा का निर्वहन लगातार किया. ये कैसा अजीब संयोग के उनकी मेरी अंतिम मुलाकात आन्ध्र भवन में सावित्रीबाई फुले रचना समग्र के विमोचन के समय पर २७ जनवरी को हुइ हालाँकि फ़ोन पर उनसे लगातार बात होती रही. मुझे दुःख है के पूरे मार्च में दिल्ली से बहुत दूर था और २९ मार्च को शाम जब में सिलीगुड़ी दार्जीलिंग क्षेत्र में था तब अनीता भारती जी की फेसबुक पोस्ट से पता चला के उनकी तबियत बिगड़ गयी है. मुझे रात भर नींद नहीं आये क्योंकि एक भय सा मन में आ गया. लगभग तीन बजे रात मेरी नींद खुले तो अपने मोबाइल पर फेसबुक अपडेट जानने लगा तो शबनम हाश्मी जी की पोस्ट से इस दुखद खबर की जानकारी मिली. यकीं नहीं हुआ, बहुत कोशिश की भरोषा न करने का. ये ऐसी घटना थी जिसने एक प्रकार से तोड़ के रख दिया क्योंकि रजनी जी के साथ जिसने भी काम किया उसे उन पर भरोषा था, वो हमारी एक मज़बूत स्तम्भ थी जो हर जगह हर उस व्यक्ति का साथ देने के लिए तैयार खड़ी थी जो समाज के लिए लड़ रहा था या जिसके अधिकारों का हनन हुआ हो. दिल्ली की विषाक्त हवा में बहुत की कम ऐसे साथी है जिनसे मिलकर आपको ताकत मिलती हो और मेरा ये मानना है के रजनी जी वो शक्शियत थी जिसने आपको गलती पर डांटने में कोई परहेज नहीं किया लेकिन आपकी जरूरतों के समय पर वह मजबूती के साथ खड़ी रही .

    रजनी तिलक के असमय जाने से सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे अम्बेडकरवादी साथियो का तो बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है. मेरे लिए यह एक व्यक्तिगत क्षति है क्योंकि मैं तो उनसे लगातार बात करता रहता था और बहुत सी बातो में उनकी आवश्यकता महसूस होती थी तो वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहती. उनके निधन पर जिस प्रकार से देश भर से अम्बेडकरवादी, मानवाधिकारवाड़ी, महिलावादियों और वामपंथी साथीयो के शोक सन्देश आये है उससे जाहिर होता है के उनका दायरा कितना विस्तृत था और किस प्रकार इन संपर्को को उन्होंने सींचा. मुझे उम्मीद है के रजनी तिलक जी के संघर्ष और उनके विचारों को सभी साथी लोग आगे बढ़ाएंगे. ख़ुशी की बात यह है के वह अपने जीवन से हम सबको प्रेरणा देकर गयी है, वह लड़ी तो एक योद्धा बनकर. उनका साहित्य और उनके समर्पित सामाजिक कार्य हमेशा हमें मजबूती प्रदान करते रहेंगे.

    Vidya Bhushan Rawat

  • पुस्तक समीक्षा : सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज  –विद्या भूषण रावत

    पुस्तक समीक्षा : सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज –विद्या भूषण रावत

    Vidya Bhushan Rawat

    सावित्री बाई ज्योति बा फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के कार्यो को भली प्रकार से समझ लिया और अपना लिया तो अहिंसात्मक  क्रांति अवस्यम्भावी है. पिछले कुछ वर्षो में ज्योति बा फुले के विचारो के विषय में विभिन्न लोगो ने लिखा है लेकिन सावित्री बाई फुले के विचारो और कार्यो के बारे में बहुत कम जानकारी है. अधिकांशतः लोग उन्हें ज्योतिबा फुले की पत्नी के तौर पर जानते है हालाँकि ये उनके विशाल व्यक्तित्व के साथ अन्याय है. 

    सामाजिक आन्दोलनों को समर्पित हमारी अम्बेडकरवादी साथी रजनी तिलक को इस बात के लिए धन्यवाद देना पड़ेगा के उन्होंने सावित्री बाई फुले की रचनाओं, लेखो और ज्योति बा फुले को लिखे उनके पत्रों को संकलित कर ‘सावित्रीबाई फुले रचना समग्र’ नमक पुस्तक के तौर पर प्रकाशित की है जो हिंदी के पाठको के लिए बहुत ही अनमोल है. इस संकलन में सावित्रीबाई फुले द्वारा रचित कवितायें है, फिर उनके ज्योतिबा को लिखे तीन पत्र और उनके पांच महत्वपूर्ण भाषणों की शामिल किया गया है.

    इस संकलन को पढ़कर सावित्रीबाई फुले की बहादुरी और उनकी सैधान्तिक ताकत की जिसने उन्हें भारत की सबसे क्रन्तिकारी सामाजिक कार्यकर्त्ता बनाया. उनकी कविताएं हमें उनके विचारो की विशालता का दर्शन कराते है जिनमे न केवल अन्धविश्वास के विरुद्ध उनकी लड़ाई है अपितु लोगो से उसको मुक्त करने हेतु उनके सुझाव भी हैं. शुद्रो को अन्ध्विशाश छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए और उसके लिए आवश्यक है अंग्रेजी भाषा का ज्ञान . उस ज़माने में भी एक साधारण शिक्षा प्राप्त महिला ये समझ चुकी थी के भारतीय शिक्षा शुद्रो को शोषित रखने का एक षड़यंत्र है. उनकी कविताओं को पढ़कर हम उनकी वैचारिक क्षमता और उनके चिंतन की दिशा को समझ सकते है . अपनी कविता अज्ञानता में वह कहती है:

    ‘ एक ही दुश्मन अपना,

    खदेड़ दे उसे हम, सब मिल कर,

    उससे ज्यादा खतरनाक न कोई,

    खोजो खोजो मन की भीतर झांको,

    बताओ तो खोजा क्या अपना दुश्मन,

    खोजो तो कहाँ है वह हमारा दुश्मन,

    सोचो सोचो बताओ बच्चो,

    क्या नाम है उसका ?

    नहीं पता कौन है दुश्मन ?

    क्या तुमने प्रयास किया,

    क्या तुम्हारा प्रयास विफल हुआ,

    क्या तुमने खुद ही मान ली हार,

    चलो चलो मैं बताती हूँ,

    उस दुष्ट खतरनाक दुश्मन की पहचान,

    ध्यान से सुनो उस दुश्मन का नाम,

    उस दुश्मन को कहते हैं अज्ञान’

    मैं समझता हूँ को आज के दौर में जब दुश्मन शब्द पर इतना जोर है, जब दुश्मन के माने पाकिस्तान, मुसलमान, दलित, आदिवासी बना दिए गए हो तो सावित्रीबाई फुले ये शब्द क्रांति से कम नहीं है और आज भी इसको दोबारा से हमारे बच्चो और बुजुर्गो के दिमाग में डालने की जरुरत है. ऐसी कितनी ही कविताएं इस संकलन में हैं जो आज के समाज को दिशा देने में बहुत सहायंक हो सकती है और शायद फुले दम्पति को भी भली प्रकार से समझने में काम आये.

    अपने पति, मित्र, गुरु ज्योति बा फुले को सावित्री बाई के तीन पत्र इस संग्रह में शामिल किये गए है उनको प्रेम के अप्रतिम भेंट कह सकता हूँ. उनके पत्रों में केवल और केवल समाज की चर्चा है. वो इतने भावविभोर कर देने वाले है के आप अंदाजा लगा सकते है के दोनों के मध्य कितना मधुर सम्बन्ध था और कैसे सावित्री बाई ने अपने पति का कर कदम पर साथ दिया और कैसे ज्योति बा उनके साथ खड़े रहे. दूसरो को बदलने से पहले अपने घर में वो परिवर्तन नज़र आना चाहिए और वो कार्य ज्योतिबा फुले ने किया और सावित्री बाई फुले ने उस महान कार्य को आगे बढ़ाया. बेहद की खुबसूरत इन पत्रों में आप उन भावनाओं को समझिये जो सावित्रीबाई व्यक्त कर रही है.

    २९ अगस्त १८६८ को नाथ् गाँव खंडाला, जिला सतारा से ज्योतिबा को लिखे अपने पत्र में सावित्री बाई गाँव की एक घटना का जिक्र करते हुए कहती है :

    गांव में गणेश नाम का पुरोहित अक्सर आता था. वह गाँव गाँव क़स्बा कस्बा घूम घूम कर ग्रामीणों को पंचांग पढ़ कर सुनाता था, भविश्यवाणी करता था, नक्षत्र देखकर अनपढ़ लोगो को उनकी किस्मत देखता था और अच्छे बुरे बता कर दक्षिणा लेकर, पूजा पाठ करके उनसे पैसे लेकर अपना पेट पालन का काम करता था.

    हमारे गाँव की हाल ही में युवा अवस्था में कदम रखने वाली सारजा नाम की युवती उससे आकर्षित हो गयी और उसकी बातो में आकर उससे प्रेम कर बैठी. न केवल दोनों प्रेम कर बैठे बल्कि उन दोनों ने शारीरिक सम्बन्ध बना लिए जिसके चलते लड़की छः माह की गर्भवती हो गयी.  सारजा के शारीरिक बदलाव को देखकर लोगो के बीच कानाफूसी होने लगी. दोनों के बीच सम्बन्ध का आभास होते ही गाँव के दुष्ट किस्म के मनचलों ने दोनों पर हमला बोल दिया. सरे आम दोनों को घेर कर उनकी अव्नामानना की उनकी निर्दयता से पिटाई की. गाँव की सडको पर दौड़ा दौड़ा कर उनकी दुर्गति कर डाली यहाँ तक कि उन लोगो ने जान से मार डालने की कोशिश की. जैसे ही मुझे इस घटना का पता चला मैं सब काम छोड़ कर उधर ही दौड़ कर पहुंची. मार काट पर उतारू लोगो के बीच मैं खड़ी हो गयी और उन्हें अंग्रेजो के शासन और कानून के बारे में बताया . मैंने उन्हें डराया के इनकी हत्या करने पर तुम्हे सजा मिलेगी. तरह तरह से समझाते हुए  मैंने क्रूर भीड़ को हत्या करने से रोका. इस कुक्र्त्य से उनका मन शांत करके उधर से ध्यान हटाया . मेरे बीच बचाव के बाद गाव के सदु भाई ने दोनों को धमकाते हुए अपना फैसला सुनाया के , ‘ सरजा ने इस पुरोहित वामन की बातो में आकर ने केवल अपनी इज्जत मिटटी में मिला दी बल्कि इसने गाँव की इज्जत भी मिटटी में मिला दी. अतः हमारा ये फैसला है के दोनों हमारा गाँव छोड़ कही भी चले जाएँ . उसके इस फैसले को स्वीकार कर लिया गया . हालाँकि गाँव वालो ने उन दोनों की जान बचा लेने के मेरे प्रयास पर हैरानी जताई.

    सरजा और पुरोहित अपनी रक्षक, काल के मुंह से निकालने वाली आदि माता समझ कर मेरे पांवो पर गिर कर बहुत रोये. उनका रुदन थम नहीं रहा था. मेरे समझाने पर दोनों थोड़े संयत हुए. मैंने दोनों को आपकी शरण में भेज दिया है.उम्मीद है इस घटना की जानकारी मिलने के बाद आप उनकी कही रहने की व्यवस्था कर देंगे. अंत में बस इतना ही मैं आपको बताना चाहती थी.”

    ये पत्र पढ़ कर आप अंदाज लगा सकते हैं के सावित्री बाई और ज्योति बा का रिश्ता कैसा था और किस प्रकार से दोनों की इंसानी रिश्तो और उनके मानवाधिकारों के प्रति गहन निष्ठां थी. सावित्रीबाई और ज्योति बा ने ब्राह्मणवाद के पुरे तंत्र का पर्दाफास किया लेकिन अपनी मानवीय मर्यादाओं में उन्होंने गरीब और उत्पीडित ब्राह्मणों की रक्षा करने में कोई कोताही नहीं की. इस पत्र में ब्राह्मण युवक के खिलाफ वह कोई जहर नहीं उगलती अपितु उसकी करतूतों की आलोचना करते हुए भी दोनों लोगो को ज्योति बा के पास भेज देती है. आज से करीब १५० वर्ष पूर्व एक महिला दो व्यक्तियों के चाहत के लिए समाज के सामने खड़ी हो गयी और उसके पति ने उसका पूरा साथ दिया, ये दिखाता है के दोनों के मध्य कितना प्रेम और विश्वास था तथा भीड़ के न्याय देने की कोशिश का सावित्रीबाई ने कैसे विरोध किया . आज जब प्रेम विवाहों पर हमारी खाप पंचायतो के फतवे चल जाते है और लोग अपने ही बच्चो को जान से मार देने में कोई शर्म और अपराध नहीं महसूस करते, उन्हें सावित्री बाई से सीखना चाहिए के लोगो का जीवन बचाने के लिए क्या किया जाए. ऐसा विश्वास केवल उन लोगो में हो सकता है जो ईमानदारी से अपने कार्य कर रहे है और जिन पर लोगो का भरोषा होता है. आज समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी है क्योंकि वैचारिक ताकत नहीं है और छोटे छोटे पद, पैसे के लालच में हम वो ताकत नहीं ला सकते जो सावित्रीबाई ने दिखाई. इस महत्वपूर्ण प्रत्र से ये भी पता चलता है के सावित्री बाई मात्र गाँव में स्कूल नहीं चलाती थी अपितु समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थे और उनकी राजनैतिक और सामाजिक समझ बहुत परिपक्व थी.  

    एक अन्य पत्र में सावित्री बाई अपने मायके का जिक्र करती है के कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है और बताता है के अछूतों के लिए कार्य करने का कारण समाज ने आपका बहिष्कार किया क्योंकि आप पाप कर्म कर रहे हो.’ साधारणतः ऐसे वाकये हमारे घरो में आते है जब हमारे नाते रिश्तेदार हमारी सोच का विरोध करते है लेकिन आपका अपना भाई या पिता विरोध करे तो बेहद दुःख होता है. सावित्री बाई इस पत्र में ज्योति बा को बता रही है कैसे उन्होंने अपने भाई को बदला. अपने भाई के लिए वो लिखती है , ‘ आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार हो गयी है . उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी करान आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है, एक तरफ आप इतने दयालु बनते है के बकरी गाय को खूब प्यार करते है, उन्हें दुलारते है, नागपंचमी के त्यौहार में विषैले सांपो को दूध पिलाते है, ये कृत्य आपके लिए धर्म सम्मत है और महार मांग अपने जैसे इंसानों को तुम इंसान नहीं समझते. उनसे तुम परहेज करते हो, उन्हें अछूत, अस्पर्श्य समझ कर दुत्कारते हो. क्यों करते हो ऐसा. क्या तुम नहीं जानते के ब्राह्मण लोग तुम्हे भी अछूत ही समझते है. हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफरत है.’

    ये पत्र पढ़कर आप समझ जाईये के ज्योतिबा की एक एक बात सावित्री बाई ने अपने मनमस्तिष्क में रख ली और उन्हें अपने पति को अपने कार्य को बताते हुए असीमित ख़ुशी और कौतुहल है . कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इन पत्रों के अन्दर छुपी भावनाओ को समझेगा तो बदलाव आएगा. और ये सब पूरे १५० वर्ष पूर्व और वह महिला जिसने ने विद्यालय देखा था न कुछ और.

    इस पत्र में वह आगे लिखती है :  ‘ मैंने अपने भाई से यह भी कहा के मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगो में से नहीं है, जो धर्म यात्रा के नाम पर पंढरपुर तक पैदल हरी नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे. वे असली और सच्चा काम करते है, मानवता को जिन्दा रखते है, अनपढो को पढ़ा लिखाकर, उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रौशनी भरते है, उनमे स्वाभिमान जगा कर जीने की राह दिखाते है . यही सच्चा रास्ता है. उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है . लोगो को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे खुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन और उर्जा मिलती है . यह काम मुझे ख़ुशी देता है . इससे मुझे सुख शांति, आत्मतृप्ति मिलती है . ये ही वो काम है जिसमे इंसानियत और मानवता दीख पड़ती है’.

    इस पत्र से साफ़ दीखता है के सावित्री बाई पर ज्योतिबा का कितना प्रभाव है और विश्वास है. ये भरोषा सबसे बड़ी चीज है किसी रिश्ते को मज़बूत करने में जब आपके रिश्तेदार, आपका अपना भाई भी आपका विरोधी हो जाए और आपके सामाजिक सरोकारों का मजाक उडाये लेकिन अगर सावित्री बाई के उत्तर देखे तो वो हरेक को निरुत्तर कर देती है. उनके में ज्ञान देने के लिए बड़ी बड़ी बाते नहीं है अपितु नैतिकता, ईमानदारी की वो बाते है जो हम सब जानते है लेकिन करते नहीं है. दूसरी बड़ी बात ये के दोनों आन्दोलन के साथी है इसलिए वो जो देखे उसी आधार पर बात रख रहे है. जिस प्रेम पूर्वक वह अपनी पूरी बातो को ज्योति बा के सामने रख रही है वो दिखाता है उन्हें अपने पति पर कितना गर्व है और उससे भी जरुरी के उनकी समझ कितनी पैनी और साफ़ हो चुकी है. आज अगर हर परिवार में पहले स्वयं को बदलने की चाहत होती तो हमारा समाज बहुत बदल गया होता.

    इस पुस्तक में सावित्री बाई फुले के पांच भाषणों को भी शामिल किया गया है जो नितांत जरुरी है. ये बहुत साधारण भाषा में, जो गाँव के किसान, मजदुर, महिलाओं की समझ आ सकती है. अगर हम उनकी पूरी सोच को देखे तो वह निहायत ही व्यवहारिक है. उनके विचारो में ब्राह्मणवाद पर कुठारघात है तो अपने समाज को बदलने के लिए भी तैयार कर रही है. वो लोगो की पूजा विधि पर हमला नहीं करती लेकिन अन्धविश्वास को लेकर लोगो को समझाती है और धर्म के नाम पर पाखंड को वह बहुत साधारण भाषा में लोगो को समझा देते है. वह लोगो को मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है :

    काम धंधे, उद्यमशीलता ज्ञान व् प्रगति का प्रतीक है. इस कार्य में सामूहिक श्रम का महत्व है तो आलस्य, भाग्य विधाता, किस्मत, प्रारब्ध का निशेध उद्योगी इन्सान अपने सुख सुविधा  में बढ़ोतरी करते हुए, अन्य लोगो को भी सुखी करने का प्रयास करता है. ठीक इसके विपरीत देव देवतावादी, भाग्यवादी, किस्मत और भगवान के भरोसे जीने वाला व्यक्ति आलसी व् मुफ्तखोर होने के कारण हमेशा के लिए दुखी रहता है तथा वह अन्य लोगो की सुख शांति को मिटटी में मिलाने का काम करता है. आलस्य ही गरीबी का पर्याय है. ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन होता है. आलसी आदमी को कभी भी  धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता. लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच बल पर ही सफलता मिलेगी, निश्चित रूप से मिलेगी, ऐसा मेरा यकीन है .

    अपने एक भाषण विद्या दान में वह  कहती है :

    परम्पराओं और पुरखो से मिले ज्ञान को अर्जित कर जिन कारीगरों ने श्रमजीवी मेहनतकश जनता ने, अपने कार्य में महारत हासिल कर भारत देश को समृद्ध बनाया है, उन लोगो की कुशलता, वास्तु निर्माण का ज्ञान एवं कलात्मकता आदि गुणों की अनदेखी कर  राजाओं ने राज किया, अपनी तिजोरी भरी किन्तु शुद्र अतिशुद्र जनता की उन्नति की और कतई ध्यान नहीं दिया. शुद्र अतिशुद्र जाति के लोग स्वाभाव से सीधे सादे एवं अनपढ़ होने की वजह से वे निहायत मुर्ख बने हुए है. उन्हें यदि न समझाया जाए और उपदेश न दिया जाए तो  वे आप होकर आगे बढ़कर खुद के दिमाग, हिम्मत एवं होसले से कोई भी उद्योग करने से कतराते है. उनका स्वाभाव भी मिलनसार न होकर बुरा होता है. . उन्हें अपने व्यक्तित्व में किस प्रकार सकारात्मक सुधार किया जाये, किस तरह अपनी प्रगति एवं विकास योजना बनाकर उस पर अमल करे , इस बात का ज्ञान जानकारी एवं प्रशिक्षण न होने के कारणों से  वे अज्ञानता की वजह से आधे भूखे रहने हेतु तो कभी कभी पूर्ण रूप से भूखे रहने के लिए विवश है. शुद्र अति शुद्र जनता हेतु सम्मानजनक आजीविका का रास्ता सरकार को पहल लेकर खोजना होगा.  

    सावित्री बाई फुले ने ज्ञान, उद्योग, कर्म, व्यसन, नेक आचरण आदि सभी बातो पर लोगो को आगाह किया. जहाँ उन्होंने सरकार से अपने अधिकारों को लेने की बात कही वही समाज में भी बदलाव की बात की. किसानो को वो कर्जदारी से दूर रहने की सलाह देती है और कहती है के कर्ज लेना सभी अनर्थो का मूल है और कर्ज अच्छे भले इंसान को समग्र रूप से दिवालिया बना देता है.’

    क्या हम कभी सोच सकते है के ग्रामीण परिवेश में बढ़ी हुई महिला जिसने स्कूल भी न देखा हो इतनी परिपक्वता से बात करते हो और वो भी आज से पूरे १५० वर्ष पूर्व. फूले दम्पति हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा आदर्श है के कैसे पति पत्नी मिलकर समाज बदलाव में सबसे बड़ा योगदान दे सकते है. मैं समझता हूँ सावित्री-ज्योति बा के प्रेम की कहानी शायद किसी भी सीरी-फरहाद या लैला मजनूँ से बड़ी प्रेम कहानी है क्योंकि उनकी प्रेम कहानी में रोमांस सामाजिक क्रांति से है. वो किसी सरकार का तख्ता उलट देने की कहानी नहीं कह रहे, वो किसी के प्रति घृणा और नफ़रत नहीं फैला रहे अपितु वो अज्ञानता को दूर करने के लिए साथ मिलकर लड़ रहे है. दोनों आपस में इतने बड़े विश्वास और प्रेम से जुड़े है के समाज के हर कटाक्ष या चुनौती को सीधे से झेलने को तैयार है.

    फुले दम्पति ने समाज के हर तबके तो छुआ क्योंकि वे जानते है के समाज का विकास सबके बदले विना हो नहीं सकता. जहाँ सावित्री बाई फुले ने उस्मान शेख की बहिन् फातिमा शेख को शिक्षा प्रचार प्रसार में शामिल किया वही काशीबाई नामक एक ब्राह्मण विधवा महिला के बच्चे को गोद लिया और बड़ा कर समाज में सम्मान दिलवाया. इन सभी कार्यो में जो महत्वपूर्ण बात है वह है सकारात्मक सोच और समाज से जुड़ने के लिए रचनात्मक कार्यो में पहल. आज के दौर में रचानात्मक कार्यो को भुलाकर जो जुमलेवाजी चल रही है वो समाज को कही भी आगे नहीं ले जायेगी. लोग समाज तक नहीं पहुँच रहे है और केवल इवेंट मैनेजमेंट से प्रसिधी पाने का जरिया ढूंढ रहे है. समाज बदलाव से प्रसिधी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है. सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की जिंदगी हम सब के लिए एक बहुत बड़ा उदहारण है.

    रजनी तिलक ने सावित्रीबाई फुले के जीवन के इन उनछुये पहलुओ को हमारे सामने लाकर एक बहुत बड़ा काम किया है. बहुत सी बाते केवल मराठी तक सीमित थी और उनका हिंदी अनुवाद श्री शेखर पवार ने किया है इसलिए उनका बहुत आभार. पुस्तक को द मर्जिनलाइज्द पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. सामाजिक आन्दोलनों के सभी साथियो को जिनकी सामाजिक न्याय और बदलाव में गहन निष्ठां है उन्हें ये पुस्तक पढनी चाहिए क्योंकि ये बहुत विशाल काय ग्रन्थ नहीं है अपितु बहुत ठोस है और सावित्री बाई की कविताएं, उनके पत्र और उनके भाषण आपके दिलो को छू जाते है. ये सभी दस्तावेज हमारी बहुत बड़ी धरोहर है जिनका इस्तेमाल हमें अपने सामाजिक आन्दोलनों में लोगो में चेतना जगाने हेतु करना चाहिए. पुनः पुस्तक प्रकाशन से जुड़े सभी साथियो को बहुत शुभकामनायें .

    पुस्तक का नाम : सावित्रीबाई फुले रचना समग्र

    संपादक : रजनी तिलक

    प्रकाशक : द मर्जिनलाइजद पब्लिकेशन, वर्धा

    मूल्य : रुपैया १६०

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    Vidya Bhushan​ Rawat

  • प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    Vidya Bhushan Rawat

    कल अंकित सक्सेना के पिता को टी वी पर देखा जहा एंकर महाशय उनको प्रणाम कर रहे थे लेकिन गुस्सा हो गए के केजरीवाल ने मुसलमानों को तो मौत पर अधिक पैसा दिया और हिन्दुओ के नहीं. सर्व प्रथम बात ये के अंकित को मार डाला गया और ये एक अपराध है और कानून के अनुसार अपराधियों के साथ जो होना चाहिए वो होने चाहिए. पुलिस ईमानदारी से काम करे और चार्ज शीट दाखिल करे ताकि न्याय हो सके.

    अंकित सक्सेना की मौत पर साप्रदायिक राजनीती की कोशिशे हो रही है और एंगल निकालने की कोशिशे भी जारी है. अभी तक नहीं मिल पाया है लेकिन बना दिया जाएगा क्योंकि चैनल इसी लिए है के अगर संप्रदायीकरण का मटेरियल नहीं मिल रहा तो उसे तैयार कर दिया जाना चाहिए.

    कुछ दिनों पूर्व मुझसे ये पुछा गया गया था के अंकित सक्सेना के पिता ने बहुत संयम से काम लिया है और उसकी सराहना की जानी चाहिए. मैं तो ये कहता हो को ऐसे मौके पर मीडिया को माँ बाप के मुंह में माइक लगाने के बजाये निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए. हमें ये पता होना चाहिए के जिस किसी के घर में कोई असामयिक मौत होगी तो उसके घर वाले बहुत बिरले ही होंगे जो इमोशनल न हो और इन हालातो में वे अगर कुछ कह भी दे तो बहुत आश्चयर्य नहीं होना चाहिए.

    Vidya Bhushan Rawat

    अंतर जातीय या अंतर्धार्मिक रिश्तो में बहुत आवश्यक है के कुछ बाते समझी जाए. हम इन्हें लोकतान्त्रिक रिश्ते भी कह सकते है और ये तभी कामयाब हो पाएंगे जब हम एक दूसरे के ऊपर अपनी धार्मिक और भाषाई श्रेष्ठता न लादे. ये रिश्ते इसलिए मज़बूत होते है क्योंकि आप धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इसे बनाते है इसलिए आप ये नए विचार की नीव रख रहे है जो संगठित धर्मो और जातियों से निकलकर बनता है जहा इंसान की श्रेष्ठता होती है, उसकी आज़ादी का सम्मान है और थोडा जगह विचारभिन्नता के लिए भी बची रहती है. कोई भी प्रेम सम्बन्ध तब तक नहीं चल सकता जब तक उसमे स्वतंत्रता को गुंजाइश न हो और कोई भी सम्बन्ध अनंत काल तक चलता रहे इसकी सम्भावना भी नहीं होती इसलिए संबंधो के बन्ने और बिगड़ने में जो कडुवाहट आती है उसका कारण यही है के हम कही लुटा हुआ महसूस करते है. कोई कहता है प्यार में डूब जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है किसी को डूबने की जरुरत नहीं. अपने होश हवाश में रहिये और एक दूसरे की स्वयत्तता का सम्मान करेंगे तो अलग होने में कोई कडुवाहट नहीं होगी.

    जो लोग इसे लव् जिहाद का नाम दे रहे है वही लोग खाप पंचायतो के जातिगत फैसलों को संस्कृति और परंपरा के नाम पर सही ठहराते है. हकीकत ये है के प्रेम करना हमारे समाज में अपराध है और इसलिए प्रेम के अभाव में हमारा समाज हिंसक बन चूका है. ये हिंसा क्रूरता और बर्बरता में बदल चुकी है क्योंकि ये प्यार नहीं, ये प्यार में औरत को एक वस्तू समझ रहा है और जिस समाज की महिला प्यार में दूसरी और जाती है वह अपने को लुटा हुआ महसूस करता है. इसलिए अंकित के प्यार में उसकी प्रेमिका के माँ बाप की उनकी इज्जत खतरे में दिखाई दी. हम सब जानते है के प्रेम विवाह कितने मुश्किल है खासकर जब लड़का और लड़की दोनों का आर्थिक रुतबा बहुत बड़ा नहीं होता और वे दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन पाते और उनको अपने परिवार की मदद की लगातार जरुरत होती है. दो सफल व्यक्ति अपने समाज से दूर रहकर अपने रस्ते पर चल सकते है लेकिन जहाँ व्यक्ति समाज के रीति रिवाजो के अनुसार चलेंगे तो वे तो प्यार के रस्ते में रोड़ा अटकाएंगे ही.

    भारत में शादी की पवित्रता का सिद्धांत जाति से जुड़ा हुआ है और प्रेम विवाह जाति की सर्वोच्चता और शुद्धता के सिद्धांतो में सबसे बड़ी बाधा है. जैसे जैसे लोग जाति धर्म के बन्धनों से ऊपर उठकर निकलेंगे तो इनके नाम पर चलने वाली घृणा और नफ़रत की दुकानों के बंद होने की संभावनाए भी बढ़ जाएँगी. देश के युवा की उर्जा समाज निर्माण में लगनी चाहिए न के जाति धर्म की अँधेरी दीवारों को मज़बूत करने में. शायद धर्म के धंधेबाजो को इस बात का पता है के प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए.

    अंकित के दोस्तों ने एक विडियो बनाया और कहा के प्रेम किसी सेस भी हो सकता है. प्रेम कोई योजना बनाकर नहीं होता. योजना से तो दंगे करवाए जाते है या किसी की जासूसी करवाई जाति है और प्रेमी जोड़ो का क़त्ल और वो सब वो लोग करते है जिनकी जिंदगी से प्रेम गायब है. जिनकी जिंदगी में प्रेम है वो तो बस प्रेम की गंगा बहाते रहेंगे. अंकित की दोस्त शह्जादी ने लगातार ये बात कही के उसके माँ बाप गुनाहगार है. प्यार करने वालो को मजबूती से अपने विचारों पर खडा होना होगा क्योंकि प्यार भी एक विचारधारा है वैसे ही जैसे घृणा और नफरत भी एक नकारात्मक विचार है जो जातीय और धार्मिक सर्वोच्चता के अहंकार से पनपती है. इसलिए प्यार के विचार की जीत के लिए हमें कौशल्या जैसी प्रेमिकाओं की और देखना होगा जिसने जातिगत अहंकार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखी है और अपने पति शंकर के हत्यारों को जेल के सीखचों तक पंहुचाने के लिए अपने जद्दो जहद जारी रखी है. कौशल्या का मामला भी भी अंकित जैसा है वो तथाकथित ऊँची जाति से आती थी जिसका शंकर से प्रेम हो गया जो दलित था और ये बात कौशल्या के माँ बाप को पसंद नहीं थी और एक दिन कोयम्बतूर के बिजी चौराहे में शंकर की बेरहमी से हत्या कर दी गयी बिलकुल उसी तरह जैसे हम अंकित की हत्या देख रहे हैं. सड़क चलते लोग अपने काम में लगे रहे, कोइ विडियो बनाता रहा और कोई चुप देखता रहा लेकिन भीड़ निर्दोष को बचा नहीं पायी. शहजादी को कौशल्या से सीखना होगा और हत्यारों को जेल तक पहुचना होगा, अपने लिए न्याय की लड़ाई लडनी होगी और घृणा फ़ैलाने वाली मानसिकता से लड़ना होगा.

    भारत के भविष्य के लिए जरुरी है के जातियों का समूल विनाश नो क्योंकि ये देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. ये जातीय फर्जी गौरवो के सिद्धांत पर चल रही है. अभी इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की नृशंश हत्या केवल इसलिए कर दी गयी के उसका पैर किसी दबंग सवर्ण से टकरा गया. जाति के आधार पर भारत में विभाजन साफ़ दिखाई दे रहा है और पचासों उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर या बड़ी बड़ी फौजे बनाकर और हथियार बेचकर भी देश कभी मज़बूत नहीं बन सकता जब तक जाति के किले बचे रहेंगे. रोहित वेमुला से लेकर दिलीप सरोज तक सैंकड़ो छात्रो और युवाओं की बलि चढ़ चुकी है केवल इसलिए क्योंकि आपको अपनी जातीय सर्वोच्चता बनाये रखनी है. देश के बहुजन समाज को अशक्त करके कभी देश आगे नहीं बढ़ सकता. हिंसा हमारे समाज का एक नया नॉर्म बन चुकी है जो किसी भी समाज को मंदबुद्धि बनाएगी और हिंसा का प्रतिकार केवल हिंसा से करने को उत्प्रेरित करेगी.

    आज देश के युवाओं को देखना है के वे प्रेम की दुनिया को आगे बढ़ाना चाहते है या जातियों के दमघोटू ढांचे में कैद रहना चाहेगे. प्रेम में बहुत बड़ी ताकत है उन सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने की जिन्हें जाति की ढांचों ने बनाये है. आजदी के ७० वर्षो के बाद भी आज हम उन्ही पुराथान्पंथी जकडन में फंसे है तो कही न कही विचारात्मक द्वन्द है. जाति के नाम पर दूकान चलाने वालो और अपनी प्रभुत्व बनाये रखने वालो की साजिश को केवल युवा तभी तोड़ पायेंगे जब विवाह जैसी संस्था का लोकतान्त्रिककरण हो और वो तभी संभव होगा जब चाहत पर किसी का पहरा न हो. जिस दिन भारत में समाज का लोकतंत्रीकरण हो गया जैसा बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे, उसी दिन भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतंत्र होगा और सबसे बड़ा देश भी. समाज में लोकतंत्र के अभाव में हम अपनी ही औलादों को इज्जत के नाम पर मारते रहेंगे और तमाशा देखते रहेंगे. अभी भी समय है, चेतने का, समाज के नव निर्माण का और देश को बचाने का. जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा. जातियों का उन्मूलन तभी हो पायेगा जब हमारे युवाओं को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता होगी नहीं तो उदंडता और जबरदस्ती ही हमारे समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखेंगे और कानून का पालन करने वाले केवल देखते रहेंगे क्योंकि संविधान केवल बहस करने का एक दस्तावेज होगा, हमारे जीवन मूल्यों को निर्धारित करने का नहीं. ये अंतर्द्वंद अंतत उन ताकतों को मज़बूत बना रहा है जो चाहते ही नहीं के समाज लोकतान्त्रिक हो क्योंकि इस प्रक्रिया में उनकी बहुत से जातीय विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे लेकिन बदले में सबको जो मिलेगा वो अप्रतिम होगा, एक लोकतान्त्रिक समाज ही देश को मज़बूत और एकजुट रख पायेगा जिसके लिए हमें बड़ी तोपों और टैंको की जरुरत नहीं होगी.

  • अमन और मुहोब्बत का पैगाम देता ‘मिया बीवी और वाघा’

    अमन और मुहोब्बत का पैगाम देता ‘मिया बीवी और वाघा’

    Vidya Bhushan Rawat

    आज बहुत दिनों बाद लाइव परफॉरमेंस देखी. इंडिया हैबिटैट सेण्टर में दुबई से आई गूँज की प्रस्तुति मिया बीवी और वाघा ने हम सभी को एक आइना भी दिखाया जो आजकी मशीनी दुनिया में रिश्तो को मात्र पैसो से जोड़कर देखती है, जहाँ ‘सफलता’ के लिए हम सब जगह जाते हैं, सब प्राप्त करते है लेकिन प्यार से बातचीत के लिए समय नहीं है. आमना खैशगी और एहतेशाम शाहिद के प्यार में सरहदों की नकली दीवार टूट गयी लेकिन दोनों को सरहद के दोनों और जो दिखाई दिया उसका साधारण मतलब यही के अगर वाघा की लाइन न हो तो भारत और पाकिस्तान के लोगो की आदतों से लेकर रहन सहन खान पान के तौर तरीके एक जैसे है, लेकिन आज दोनों देशो में जो जंग का माहौल है वो ये ही दिखाने की कोशिश करता है के जैसे बॉर्डर के उस पार सभी आतंकवादी है, दुश्मन है और जंग चाहते है. मतलब ये के तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा कूट कूट कर पैदा की गयी नहीं दीवारों को ढहाना असंभव तो नहीं है लेकिन मुश्किल तो जरुर है हालाँकि दो मुल्क जिनका एक इतिहास रहा हो, उनके हुक्मरानों की लाखो कोशिशो के बावजूद भी ऐसा शायद नहीं हो पायेगा और लोगो को आखिरकार समझ आएगी लेकिन कब ?

    Vidya Bhushan Rawat

    मैं भी उन लोगो में शामिल हूँ जिन्होंने बहुत चिट्ठिया लिखी और उनका इंतज़ार भी किया. मैंने भी प्रेम किया और शायद उस दौर में हर दिन एक पत्र भी लिखा होगा और फिर इंतज़ार भी किया होगा. उनकी संख्या बहुत है. पत्रों में एक गर्माहट होती थी जो शायद रुखी सुखी इ मेल में नहीं होती. शायद ईमेल अब आपके अन्दर की भावनाओं को उतना नहीं निकाल पाती जितना खतो के लिखने में होता था. कारण साफ़ था, एक चिट्ठी में व्यक्ति अपना दिल उड़ेल देता था क्योंकि सूचनाओं के साधन कम थे , और इसमे डाकिये भी ख़ास रोल अदा करते थे. गाँवों में जहाँ पढने वाला न हो तो वो चिट्ठी पढ़कर सुनाते भी और गाँव में अन्य खबरों की भी खबर रखते थे. आज सूचना तंत्र के दौर में बड़ी क्रांति ने सूचनाओं के आदान प्रदान को तो मजबूती प्रदान कर दी लेकिन दिलो के रिश्ते शायद कही न कही सूख रहे है, भावनाए शायद व्यक्त नहीं हो पा रही है या हो सकता है के उनके लिए सबके पास समय न हो. इसकी खूबसूरत अभिव्यक्ति भी इस नाटक में हुई है.

    भारत और पाकिस्तान के रिश्तो में सरकारी तौर पर चाहे जो कुछ हो लेकिन आम लोगो के रिश्ते बने हुए है हालाँकि पिछले कुछ वर्षो में ये दूरिया बढ़ चुकी है और अमन के लिए काम करने वाले लोगो को ‘देशभक्त’ लोग देश के दुश्मन बता रहे है. आमना और एहतेशाम जिस दौर में अपने प्यार को एक मुकाम तक पहुचाने की कोशिश कर रहे थे उस वक़्त भी हालत बहुत अच्छे नहीं थे परन्तु ये कह सकते है के आज से बेहतर थे. ये वो दौर था जब हम पांच या छः साथियो ने जो कभी एक दुसरे को शायद ही मिले हों दक्षिण एशिया में शांति और भाई चारगी के लिए कुछ साथ करने का प्रयास किया जो हमारी सीमाओं में रहकर था क्योंकि सभी युवा थे और बिना किसी ‘खानदानी’ बैकग्राउंड के और वो इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि भारत पाकिस्तान के रिश्तो में इन खानदानी बैकग्राउंड के बहुत मायने है. वो ही सेकुलरिज्म की बात कर सकते है जो खानदानी है और सरहद के दोनों और मीडिया में जिन्हें खानदानी वारिश बैठे हो. मतलब ये नहीं के दोस्ती के हिमायती वे ही लोग नहीं है जिन्हें आप टीवी या अखबारों में पधते है या देखते है, उनके अलावा भी बहुत लोग है जो मुहब्बत का पैगाम देना जानते है और चाहते भी है.

    आमना और एहतेशाम ने अपने खतो के जरिये व्यवस्था, संकीर्णताओ पर कटाक्ष किया है और दिखाया के कैसे हमारे समाज में दूसरो के बारे में स्टीरियोटाइप किया जाता है. जब शादी के बाद वो भारत आये और बिहार गयी तो ऐसा लगा के पूरा गाँव उसको देखने आया के ‘पाकिस्तानी’ बहु कैसे है. और सब उसको ये कहते के बहुत तो तुम्हारे जैसे ही चाहिए लेकिन पाकिस्तानी नहीं. कराची में उनके यहाँ पे भी ऐसे ही हालात थे जो उसको कहते के पाकिस्तान में लडको की कमी हो गयी थी जो हिन्दुस्तानी से शादी कर रही हो. अपने ससुराल में आमना ने अपनी मम्मी को लिखे ख़त में कहा के ‘यहाँ तो सुबह शाम सब्जिया ही बनती रही है और मैं तो ‘बोटी’ खाने को तरस गयी हूँ.’

    आमना की दादी लखनऊ से थी और शायद विभाजन के बाद भी, वर्षो कराची में रहते हुए भी उनकी जुबान से लखनऊ शब्द कभी नहीं गया और घर के अपने ड्राईवर को भी वह चन्दन नाम से पुकारती और उसे कभी भूल नहीं पायी. एहतेशाम का अपनी मम्मी को लिखा पत्र बहुत मर्म था क्योंकि ये हम सबकी कहानी है. कैसे हम तरक्की के वास्ते घरो से दूर चले जाते है, हमारे माँ, हमारे लिए सब कुछ छोड़ देती हैं और जब हम इस लायक होते हैं के उन्हें कुछ ख़ुशी दे पायें तो वो हमें छोड़ कर चले जाते हैं.

    इस नाटक के अंत में वाघा का सांकेतिक इस्तेमाल किया गया है जो बहुत बेहतरीन है. वाघा भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाला भी है लेकिन दूर करने वाला भी है. वाघा की परेड अब असल में भारत पाकिस्तान का वन डे मैच बन चूका है. पाकिस्तान पैन्दाबाद और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे अपने अपने और लगते रहते है. दोनों और के फौजी जोर जोर से बूट बजाते है. ये समझ नहीं आया के ये नाटक क्यों ? इस नाटक में क्या आनंद है ? क्या ये एक दुसरे को नीचा दिखाने के लिए है या एक दुसरे का मनोरंजन करने के लिए है ? मुझे तो नहीं लगता के वाघा से किसी का मनोरजन होता है ओर सरहद के दोनों और हम किस प्रकार के नागरिक पैदा करेंगे वो तो अब दिखाई दे रहा है.

    आज माँ बाप बच्चो को भी ये ‘मैच’ दिखाने ले जाते है. दरअसल, आज वाघा हर गाँव और कसबे में बन गया है. देशभक्ति के जरिये हम अब वाघा पैदा कर रहे हैं . कासगंज से लेकर और कोई जगह, ये देशभक्ति का नया संस्करण है जब देशभक्ति के नारे किसी को चिढाने के लिए बनेंगे. शान्ति और सौहार्द की बात करने वाले दोनों देशो में ‘देशभक्तों’ के निशाने पे होंगे.

    अभी दो दिन पहले ही पाकिस्तान के एक साथी ने बताया के उनके यहाँ भारत पाकिस्तान की शांति और सौहार्द की बात करने वालो को उठवा लिया जाने की सम्भावना रहती है. भारत में भी हम अब ‘तरक्की’ कर रहे है’, हमारे पास अब केवल पुलिस ही नहीं है, अब तो थर्ड डिग्री के लिए हमें एक लोकतान्त्रिक माहौल मिल चूका है. अर्नब गोस्वामी केवल एक व्यक्ति नहीं है, एक विचार बन चूका है जिसके थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट ने पुलिस का काम आसान कर दिया है.

    इस नाटक की खूबसूरती इस बात में है के ये एक तिलिस्ल्मी कहानी नहीं है हकीकत है. इसके पात्रो ने इन बातो को देखा और झेला. उनकी संजीदगी है के ये ख़त हम सबके लिए सोचने समझने के लिए बहुत कुछ छोड़ते है. अपने देश से दूर रहकर जुबान को जिन्दा रखने की इस कोशिश का स्वागत होना चाहिए. मेरे लिए ये देखकर बहुत से यादे ताज़ा हो गयी क्योंकि वही दौर था जब हम लोग बहुत बाते करते और भारत पाकिस्तान के मौजूदा हालत पर कुछ नया करने की सोचते और यही से आमना मेरी छोटी बहिन बनी जिसके साथ मैंने शायद अपनी हर बात शेयर की हो. ये रिश्ता इतना मज़बूत हो गया के महसूस हो गया के दिल के रिश्ते खून के रिश्तो और सरहदों से बड़े होते है. पहली बात ये शो दुबई से बाहर आया और उर्दू के शहर दिल्ली में. हालाँकि आज के दौर में जब उर्दू को विभाजन की और मुसलमानों की जुबान कहकर आग बबूला होने वालो की तादाद बहुत ज्यादा है लेकिन हकीकत ये है के उर्दू अदब ने हिन्द को बेहद मिठास थी. कल्चर का कोई मज़हब नहीं अपितु ये हमारी जुबान, खान पान, रहन सहन होता है और अगर वाघा की लाइन को हटा दे तो क्या फर्क है दोनों मुल्को में.

    मैं जानता हूँ के शादी के वक्त दोनों को बहुत दिक्कत हुई लेकिन ये दिक्कत केवल इस बात से नहीं थी के भारत और पाकिस्तान का मसला था. शायद, इस हिस्से को उन्होंने छोड़ दिया के एक पठान लड़की बिहारी लड़के से कैसे शादी करेगी का जाति और वर्ग इस सवाल भी उनके परिवारों में था. इसलिए मैंने कहाँ, जहां दोनों जगह पर उर्दू की मिठास है वही सामंतशाही दोनों जगहों पर ज़िंदा है, शायद पाकिस्तान में हम से ज्यादा .मैंने कल लिखा था के हमारे मुल्को में साथ चलने और काम करने के बहुत उदाहरण है लेकिन हामारे एब भी एक जैसे ही हैं और उन सब को हम तभी ख़त्म कर पाएंगे जब इन सवालों पर लगातार गुफ्तुगू करें और बातचीत जारी रखे. बातो को दिल के अन्दर रख देने से केवल शक बढ़ता है जो दूरिया बढ़ता है. तरकी के वास्ते दिलो की सरहद को तोडना पड़ेगा और हर गली मुहल्ले में बन रहे वाघाओ को भी हटाना पड़ेगा, वो वाघा नहीं बाधा बन रहे है.

    मिया, बीवी और वाघा के ये शो जगह जगह होना चाहिए. दिल से की गयी एक बेहद खूबसूरत प्रस्तुति और इसके लिए पूरी टीम को बहुत बहुत शुभकामनायें. ये कह सकता हूँ के जहाँ मिया और बीवी के रोल में एहतेशाम और आमना ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया वही वाघा के रोल में माजिद मुहोम्मद ने बहुत बेहतरीन भूमिका निभायी और सबको अंत तक कहानी से जोड़े रखा. पोस्टमैन के छोटे से रोल में फ़राज़ वकार ने बहुत प्रभावी भूमिका निभाई. एक बार फिर सभी को एक अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई और उम्मीद करते है के ये टीम नए नए आइडियाज लेकर आज के खुश्क माहौल में उम्मीद का परचम लहराएगी ताकि तैयार हो रहे वाघाओ को कम किया जा सके.


  • अन्धविश्वास का राजनीतिक कुचक्र

    अन्धविश्वास का राजनीतिक कुचक्र

    Vidya Bhushan Rawat

    डार्विन के सिद्धांतो को माननीय मंत्री जी के ख़ारिज करने के बाद से मानो भूचाल आ गया है. देश के वैज्ञानिको ने कहा के सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए और मंत्री जी के वक्तव्य पर तरह तरह की प्रतिक्रियाये आ रही है लेकिन फिर एक बात कहना चाहता हूँ के क्या मंत्री ने जो कुछ कहा वो अचानक मुंह से निकली कोई बात थी या ये सब बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है, इस पर चर्चा करने की जरुरत है. ये बिलकुल तैयार की गयी साजिश के तहत हो रहा है और इसलिए इस युद्ध में सबको उतरना चाहिए क्योंकि ये भारत के भविष्य का प्रश्न भी है क्योंकि संघ और उनके दस्ते भारत को मनुवाद के गर्त में धकेलना चाहते है. शायद जैसे जैसे सत्ता ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकलने के प्रयास करेगी, वापस उस ‘स्वर्णिम’ अतीत की तरफ हमें धकेलने की कोशिश होगी जो किसी के लिए स्वर्णिम था और बहुसंख्य लोगो के लिए अतातातियो का हिंसक और भेद्जनित राज्य. ये केवल डार्विन का सिद्धांत नहीं है असल में इसको ख़ारिज करने की आड़ में मनुवाद को लादने के प्रयास भी है. मंत्री जी संघ के आदेश के बगैर कुछ बोल भी नहीं सकते और नागपुरी महंतो को ही खुश करने के लिए कह रहे थे. आज कल अपनी निष्ठां दिखाने का समय भी है इसलिए ऐसे पापड़ भी बेलने पड़ते है.

    मत भूलिए के आप उस दौर में हैं जहा भारत के युवाओं को भविष्य की तैय्यारी नहीं अपितु भूत के आगोश में समेटने की कोशिश है. तीन हज़ार साल पुराणी संस्कृति की बाते हो रही है और रोज रोज कोई न कोई महापुरुष या महिला हमें प्रवचन दिए जा रहे है. अब मुंबई में रिलायंस के बड़े अस्पताल के उद्घाटन अवसर पर ये भाषण किस ने दिया, ‘ महाभारत का कहना है कर्ण माँ की गोद से पैदा नहीं हुआ था. इसका मतलब ये है के उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद था. हम गणेश जी की पूजा करते है कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस ज़माने में जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का शरीर रख कर प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा.’ मुझे बताने की जरुरत नहीं है के ये महान वक्तव्य किनका है ये अक्टूबर २०१४ में दिया गया और इसका प्रचार भी हुआ क्योंकि संघियों ने इस पर कहा के हमारे यहाँ तो सब कुछ मौजूद था. वैसे भी संघ की पाठशालाओ में आपको भारत की महान वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में हमेशा से ही पढाया जाता है.

    वैसे पिछले तीन चार वर्षो में भारत की महानता का बखान करने की बीमारी लाइलाज हो चुकी है. अपनी संस्कृति और सभ्यता पर हम सभी को गर्व होना चाहिए और ये अभिप्राय भी नहीं होना चाहिए के हमारे पूर्वज सभी गधे थे लेकिन केवल आत्ममुग्धता में अपने भूत की सभी बातो को स्वर्णिम सोचना भी उतना ही बेवकूफी वाला है जितना के सबको ख़ारिज कर देना .

    Vidya Bhushan Rawat

    अब डार्विन के सिद्धांतो को तो अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी के नेताओं और चर्च ने पुर्णतः ख़ारिज कर दिया और टर्की में एंड्रोजन के आने के बाद वह के इस्लामिक कट्टरपंथी ‘चिंतको’ ने भी ख़ारिज कर दिया तो भारत के हिन्दू कट्टरपंथी क्यों कम हो. वो तो मुस्लिम और ईसाई बड़बोलो से कम्पटीशन कर रहे है . लेकिन जहा अमेरिका में लोग अपने जीवन में विज्ञानं के महत्व को जानते है और बीमार होने पर डाक्टर के ही पास जायेंगे हमारे देश के महान बाबा जो खुद थोडा सा बीमार होने पर अलोपथिक डाक्टर के पास जाते है वे अपने चेलो को संस्कृति के नाम पर झोला छाप डाक्टर की गोद में धकेलते है.

    खतरा ये नहीं के मोदी या उनके मंत्री क्या कह रहे है. सबसे बड़ा खतरा है के मीडिया क्या कह रहा है. वो राम, रावण,सीता, सुपर्न्खा के घर गुफाये ढूंढ रहा है. साहित्यकार हमारे प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों का महिमामंडन कर रहे है और माननीय न्यायमूर्ति लोग मोर के आंसुओ से मोरनी को गर्भवती करेंगे तो हमारे चिंतन का स्तर पता चल जाता है.

    वैसे मोदी जी ने जो प्लास्टिक सर्जरी की बात की वो तो वाकई में सच है. आखिर हमारे सभी देवी देवता तो साधारण मनुष्यों की तरह नहीं दीखते. विचार में चाहे वे बिलकुल साधारण हो लेकिन चाल ढाल रंग रूप में तो वे असाधारण ही है. आखिर अभी तो पसीने से गर्भवती होने के कही वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है लेकिन हमारे ग्रंथो में तो है. आदमी के सर पर हाथी का सर ही एकमात्र सर्जरी नहीं है. गाय के शरीर पर औरत का सर भी है. दस सर किसी के नहीं हो सकते है क्योंकि एक ही संभालना मुश्किल है तो दस कैसे संभलेंगे लेकिन हमारे यहाँ तो है. भारी भरकम देव भी पतले से चूहे को अपना वहां बनता है और उल्लू भी वाहन है. तो जो दुनिया में कही नहीं हो सकता वो भारत में हुआ है और आगे भी होता रहेगा . आखिर धर्म का इतना बड़ा फलता फूलता धंधा भला दुसरे किसी देश में मिलेगा. इस्लामिक मुल्ले आग उगलते है हेयर और जन्नत में हूरो के इन्तेजार में लोगो को धर्म के नाम पर आग उगलवाते है लेकिन हमारे बाबाओं ने तो अपने विशाल साम्राज्यों को ही ‘जन्नत’ बना दिया है. लोग लुटते है, पिटते है लेकिन फिर भी उनके साम्राज्यों पर असर नहीं. एक अगर किसी आरोप में बहुत मुश्किल से जेल भी जाता है तो दर्जनों नए पैदा हो रहे है और अब तो महिलाए भी इस ‘क्षेत्र’ में आगे आ रही है.

    भाइयो और बहिनों, डार्विन के सिद्धांतो को मंत्री महोदय के ख़ारिज करने से परेशान मत होइए क्योंकि आपके कहने से वे रुकने वाले नहीं. देश में मानववाद ख़त्म करके मनुवादी व्यवस्था लाने के लिए तो वो सब करना पड़ेगा जिससे आदमी के सोचने समझने की शक्ति ख़त्म हो जाए. आखिर जब इतनी बड़ी संख्या में सोचने वाले लोग हैं तो सवासौ करोड़ लोगो को सोचने की जरुरत क्या है. अगर वो सोचना शुरू कर देंगे तो बॉलीवुड, मीडिया, क्रिकेट सब का धंधा चौपट हो जाएगा. इसलिए सोचना नहीं है. सोचोगे तो फिल्म, क्रिकेट, बाबा, टीवी, अख़बार सबसे छुट्टी लेनी पड़ेगी और ये तो बहुत दुखदायी है न. माँ, बाप, दोस्त, किताबे, विचार सब छोड़ देना पर टीवी, सिनेमा, क्रिकेट न छोड़ना, कही ज्यादा सोच लेगे तो मानवीय सोच आ जायेगी. मनुवादी येही चाहते है के आप सोचे नहीं बस व्यस्त रहे और उनकी सूचनाओं के तंत्र पर चर्चाये करते रहे. वो फेंकते रहेंगे और हम हांकते रहेंगे. उनकी क्रियाओं पर प्रतिक्रियाये देते रहेंगे . ये ही सनातन है. आप उलझे रहो और जब बहुत उलझन बढ़ जाए तो अपने हाथ की रेखाओं को दिखवा लीजिये या कोई ताबीज पहन लीजिये. डार्विन वार्विन हमारे बाबाओं के आगे कहा है. वो अब बाबागिरी से आगे बढ़ चुके है अब तो खुली दादागिरी कर रहे है. टीवी उनका, न्यूज़ उनकी, सरकार उनकी, जमीन उनकी, आपका क्या..

    बहुत बड़ा संकट है और जब तक लोग समझेंगे नहीं हम इन बातो को केवल उतने तक ही सीमित करेंगे के एक मंत्री ने कुछ कह दिया. ये मंत्री जी ने न गलती में कुछ बोला और न ही अचानक. पूरा प्लान है आपको धर्म और अन्धविश्वास के जाल में फंसाने का ताके बुद्धा,आंबेडकर, फुले, पेरियार, भगत सिंह, राहुल संकृत्यायन आदि की जो परम्परा है उससे आपको भटका दे क्योंकि इन्होने तो सवाल किये और न केवल सवाल किये बल्कि अपना विकल्प भी दे दिया..मनुवादी चालबाजी यही है के आपकी समस्याओं का समाधान भी वो स्वयं ही देना चाहता है इसलिए वैज्ञानिक चिंतन और तर्कपूर्ण संस्कृति विकसित करने की जिम्मेवारी हमारी है ताकि हमारे भावी पीढ़ी संस्कृति के नाम पर जातिवादी कूपमंडूकता में न फंसी रहे. याद रहे धार्मिक अन्ध्विशास केवल मात्र अन्ध्विशास नहीं ये राजनीती और कूटनीति है जो लोगो को उनके साथ हुए अन्याय को भाग्य मानकर चुप रहने को मजबूर करती है, उनको व्यस्था से सवाल करने से रोकती है. हमें उम्मीद है भारत की महान तार्किक विरासत के वारिश हम लोग न केवल शिक्षा व्यवस्था अपितु सामाजिक और सार्वजानिक जीवन में अंधविश्वास के जरिये देश के वंचित तबको को और शोषित करने की चालो को समझेंगे और उनका जवाब केवल और केवल बुद्धा बाबा साहेब और अन्य लोगो की तार्किक विरासत पर चल कर और उसे आगे बढ़ाकर ही दिया जा सकता है.


  • चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

    विद्या भूषण रावत

    अक्टूबर १ को पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि थी लेकिन सतही तौर पर याद करने के अलावा उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी न तो उपलब्ध है और न ही उनके जीते जी उन्हें सत्ताधारी इज्जत दे पाए क्योंकि चन्द्र सिंह हमेशा ही सत्ताधारियो से टकराए. वह आर्य समाजी थे और  गाँधी से भी बहुत प्रभावित थे लेकिन उनके विचार और एक्शन में वह इन दोनों ही विचारो से बहुत आगे थे . चन्द्र सिंह का जन्म १८९१ में गढ़वाल में हुआ था और २१ वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए. पहाड़ो में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे . चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वयुध में ब्रिटिश सेना के की और से भाग लिया. चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है जिसे बार बार पढना और सुनाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर कर दिया . आज जब हमारी सेनाओं और पुलिस प्रशाशन का सम्प्रदयिककरण हो रहा है तब देश के सैनिक, प्रशासक और पत्रकार भी ये पढ़े के क्यों इस देश की एकता और मजबूती के लिए चन्द्र सिंह की कहानी पढना जरुरी है और ये भी के पेशावर का विद्रोह केवल एक झटके में किया गया सैन्य विद्रोह नहीं था अपितु इसके पीछे चन्द्र सिंह की राजनैतिक समझ थी जो यह मानती थी के अंग्रेजी राज भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन कर हमेशा के लिए शाशन करना चाहता था .

    दुःख इस बात का है के इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया . उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो/ चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियो ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे. इस सन्दर्भ में हमें भारतीय साहित्य के पुरोधा राहुल संकृत्यायन का ऋणी होना पड़ेगा जिन्होंने १९५५ में चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा लिखी जो किताबमहल प्रकाशन ने छपी. महत्वपूर्ण बात यह के इस पुस्तक में जिस बारीकी से राहुल जी ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के जीवन के बारे में बात की है वो बहुत महत्वपूर्ण है खासकर इस सन्दर्भ में जब तथाकथित इतिहासकारों की नज़र से इतिहास गायब हो तो हमें ओरल हिस्ट्री का सहारा लेना पड़ेगा .

    मैंने बचपन में चन्द्र सिंह गढ़वाली के बारे में सुना था क्योंकि वो मेरे ननिहाल के पास के थे . लेकिन मुझे उनकी महत्ता या महानता का अंदाज केवल तब हुआ जब मैंने राहुल जी द्वारा लिखित उनकी जीवनी पढ़ी और यही से मेरा ये गहन सोच है के घुम्म्क्कड़ लोग अगर चाहे तो न केवल बहुत बड़े साहित्य की रचना कर सकते हैं अपितु इतिहास को भी खोज निकालेंगे जिन्हें भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी साहित्यकारों और नेताओं ने छुपाया है.

    क्या यह शर्मनाक नहीं के गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे नेताओं ने जीवन पर्यंत चन्द्र सिंह गढ़वाली को न तो सम्मान दिया और न ही उन्हें उनके योगदान के लिए कोई आधिकारिक मदद. आज़ादी के बाद भी कुछ सालो तक उनको अपराधी ही माना जाता रहा .  चन्द्र सिंह आर्य समाज से प्रभावित थे और गाँधी जी की सभाओं में भी जाते थे लेकिन वो सेना में होने के बावजूद भी लोकतान्त्रिक थे.

    चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें ये समझना पड़ेगा के पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे . पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और ये बात सब जगह पता चल चुकी थी के अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे और उसके लिए उन्हें ऐसी बहादुर सैन्य टुकड़ी चाहिए थी जो बिलकुल उस इलाके न हो ताकि  सैनिक बिना किसी चिंता के बेशर्मी से विद्रोह को कुचल सके. ये निति तो अंग्रेजो के बाद भी सभी सरकारे करते हैं के किसी भी स्थान पर जन विद्रोह को दबाने के लिए वहा से दूर के सैनिको को बुलाया जाता है ताकि उनका कोई सहानुभूति स्थानीय लोगो के साथ न हो  और वो निर्दयिता से अपना काम करें . गढ़वालियो को पहाड़ से पेशावर या एबोटाबाद भेजने के पीछे अंग्रेजो की यही रणनीति थी के वे पठान विद्रोह को बेरहमी से कुचल देंगे लेकिन चन्द्र सिंह की जाति धर्म से ऊपर उठकर जन असंतोष को राजनितिक समझ आज के दौर में और भी प्रासंगिक है .

    १९३० में पेशावर की उस घटना का चिंत्रण जो राहुल जी की पुस्तक में विस्तार पूर्वक है :

    “२३ अप्रेल १९३० को कंपनी के ओहदेदारों और सिपाहियों को हुक्म हुआ : ‘ पांच मिनट के अन्दर फालिन हो जाए’. राइफ़ले, दूसरे सामान, और फौजी मोटरे सामने तैयार रखी गयी थी. रसौइयो को एक घंटे के अन्दर रोटी पका देने का हुकुम दिया गया था . ७ बजे से ८ बजे तक यह काम होते रहे. ‘ सुबह कप्तान रिकेट ने आदेश दिया : गढ़वाली बटालियन एडवांस’. गढ़वाली बटालियन आगे बढ़ो.

    राष्ट्रीय झंडे के चारो और वीर पठान खड़े थे . मंच पर खड़े होकर एक सिख नेता ने कभी पश्तो में और कभी उर्दू में जोशीला व्याख्यान देना शुरू किया . लोगो से आवाज आती..नारे तकबीर : अल्लाह हो अकबर, महात्मा गाँधी की जय.

    कप्तान रिकेट ने कहाँ , ‘ तुम लोग गोली से मारे जाओगे , नहीं तो गोली से मारे जाओगे. पठान जनता टस से मस नहीं हुई . गोली से खेलना वह नहीं भूली थी. अब कप्तान रिकेट ने हुक्म दिया : गढ़वाली तीन राउंड फायर. चन्द्र सिंह रिकेट के बाएं खड़े थे . उन्होंने जोर से बोला : गढ़वाली सीज फायर. गढ़वाली गोली मत चलाओ . हुकुम को सुनते ही गढ़वालियो ने अपनी अपनी राइफ़ले जमीन पर कड़ी कर दी . इसे कहने के आवश्यकता नहीं के गढ़वालियो ने देश के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखला दी . एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बन्दूक को एक पठान के हाथ में देकर कहा : लो भाई, अब आप लोग हमको गोली मार दे .

    जिस वक़्त पलटन १ और २ के सभी सिपाहियों ने अपने अपनी राइफ़ले जमीन पर रख दी, उसी समय नंबर ३ पलटन के कमांडर लुथी सिंह को यह सब नहीं देखा गया और उसने आगे बढ़कर फायर करने का हुकुम दिया और स्वयं से गोली भी चलाई. लेकिन पलटन ३ के लोग भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए . कप्तान रिकेट ने लाल लाल आंखे करके चन्द्र सिंह की और देख कर कहा : क्यों, यह क्या बात है ? चन्द्र सिंह ने कहा : ये सारे लोग निहत्थे हैं . निहत्थो पर गोली कैसे चलाये

    इसके बाद वहा अंग्रेजो ने अपनी प्लाटून को भेजा जिसने लोगो पर फायरिंग कर दी जिसमे कई लोग मारे गए. सब जगह अफरा तफरी हो गयी और कप्तान रिकेट की भी मौत हो गयी . चन्द्र सिंह और उनके साथियो ने भी खुद को किसी तरह से बचाया क्योंकि अव्यवस्था में तो किसी को पता नहीं होता के कौन दोस्त हे ओर कौन दुश्मन.

    ( चन्द्र सिंह गढ़वाली : राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से )

    पेशावर में अफरातफरी मच गयी . किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया . चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया. वह लगभग १४ वर्षो तक जेल में रहे . पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पुर्णतः विचारिक था, देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिको पर गोली चलाने को गलत मानता था. चन्द्र सिंह और उनके साथियो के लिए पेशावर जैसे जगह बिलकुल नयी थे, न ही उनके पास भागने के कोई रस्ते थे क्योंकि सभी पहाड़ो से आये थे इसलिए न तो भाषा और न ही खान पान उनके पसंद. वे सभी फौज के सिपाही थे और उस वक़्त अधिकांश लोग जो पढ़ लिख नहीं पाते थे फौज में ही जाते थे . लेकिन इन सबके बावजूद वे सांप्रदायिक सौहार्द के लिए इतनी बड़ी मिशाल पैदा करेंगे इसको समझना चाहिए. इससे भी अधिक ये चिंता के हमे ‘निहत्थो’ पर गोली नहीं चलानी है . आज के फौज और पुलिस के अधिकारियों और निति निर्माताओं के लिए ये बहुत बड़ा सबक है जो मुसलमानों को दुश्मन समझते हैं . जब पहाड़ो से आये लोग जहाँ मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और जहाँ ब्रिटिश भी नहीं पहुँच पाए वो लोग सेना में जाकर समय मिलने पर अपने देश के लोगो पे गोली चलाने से इनकार कर दे और वो भी उस स्थान पर जो कही से भी उनका नहीं था, न ही उनके समर्थन में प्रदर्शन करने वाले लोग वहा होते, ये बात इतिहास में बहुत कम मिलेगी लेकिन चालाक इतिहासकारों ने इस बात को हाशिये पे डाला.

    आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे . सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुयी वे न्याय की आश में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला.  चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए . कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकेट पर वो चुनाव लडे परन्तु जनता का भरोषा नहीं जीत पाए आखिर जनता उन्हें चाहे क्यों ? उनके क्रन्तिकारी विचारो को अगर सुनेंगे तो पता चलेगा के जातिवादी जनता क्यों उन्हें चाहेगी ? उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न पर उन्होंने जो कहा वो समझने वाला है और शायद जातिवादी पार्टियों और नेताओं को वो रास नहीं आया .

    सह्श्रब्दियो से जिस जाति व्यवस्था ने हमारे देश की चौथाई मानवता को इस हीन् अवस्था में पहुँचाया, वह तब तक उन्हें उठने नहीं देगी जब तक उस व्यवस्था में भीतर आग नहीं लगा दी जाती और यह आग शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से ही लगाईं जा सकती है .

     

    उत्तराखंड के अन्दर दलितों के अधिकारों के विषय में चन्द्र सिंह गढ़वाली के विचार

    जमींदारी प्रथा ख़त्म कर बंजर और जंगलो के जमीन उनको देनी चाहिए

    नौकरियो में अनुपात के मुताबिक उनको जगह मिले

    उनकी पढाई के लिए शिक्षा निशुल्क हो

    अस्सेम्बलियो और कौंसिलो में उनके लिए अनुपात के मुताबिक सीटे दी जाए

    उद्योगों में उन्हें प्रथम स्थान मिले

    (राहुल जी की पुस्तक वीर चन्द्र सिंह गड्वाली) से साभार.

    अब आप समझ सकते हैं इतने क्रन्तिकारी व्यक्ति को उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ में दलितों के अधिकार की बात करेगा तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या उसके बाद के सवर्ण नेता क्यों सम्मान करेंगे ? चन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्दगी भर आर्थिक बदहाली में रहे . उनका ये दर्द हमेशा था के पेशावर काण्ड के क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया .

    २० सितम्बर १९५४ को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का विवरण दिया था . उनकी झोपड़ी वर्षा से टूट चुकी थी और आमदनी के नाम पर उन्हें १६ रुपैये पेंशन मिलती थी. उनके ऊपर १४००० रुपैये का कर्ज था. खाने पीने के बर्तन भी नहीं थे . उन्होंने सरकार से अपनी मदद की अपील की . लगभग एक वर्ष बाद २५ जुलाई १९५५ को प्रदेश सरकार ने एक पत्र भेजकर ‘ख़ुशी’ जाहिर की के उन्हें आजीवन १४ रुपैये महीने पेंशन मिला करेगी.

    ( राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से )

    शर्म की बात  यह के ६५ वर्ष की उम्र में देश के लिए इतनी कुर्बानियों के बाद भी और व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखने पर भी सरकार ने उन्हें १४ रुपैये लायक ही समझा ये दर्शाता है के भारत में स्वाधीनता के बाद गैर गांधीवादी विद्रोह के नायको के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया .अक्टूबर १, १९७९ में उनका निधन हो गया . आज अस्मिताओ के इस युग में चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेकर उनको स्मारकों में सीमित करने का प्रयास है लेकिन उनके विचारों से तो सामंतवादी जातिवादी सांप्रदायिक नेताओं और पार्टियों को कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि उनके विचारो और पेशावर कांड में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए वो आज भी याद किये जाने चाहिए . साप्रदायिक सौहार्द की मजबूती के लिए पेशावर के उनके विद्रोह को आज भी याद करना जरुरी है .

     

  • अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    Vidya Bhushan Rawat

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए. ये भी हकीकत है के ऐसे हमले सीमा पार की शह के बिना पे नहीं हो सकते हैं लेकिन भारत सरकार की कश्मीर निति पूर्णतः असफल हो चुकी है. हम जानते है के इस वक़्त भक्त पत्रकार मामले को सांप्रदायिक रूप देने में व्यस्त होंगे और कई ने ट्वीट करना शुरू किया है के क्या #नोटइनमायनेम का कोई प्रदर्शन भी होगा . ये शर्मनाक है क्योंकि देश पर किसी भी संकट पर हम सभी लोग साथ होते हैं लेकिन अगर उस संकट का संप्रदायी करण करने की कोशिश होगी तो स्थिती बेहद गंभीर होगी .

    हम जानते है के आतंक की इस वारदात का देश के सभी लोग चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, दलित हो या आदिवासी या अन्य कोई कड़े शब्दों में निंदा करते है . हम लोग आतंक के खिलाफ है लेकिन हर किस्म के . उस आतंक के भी जो गौरक्षा के नाम पर निरपराध लोगो को मार रहा है . आखिर आतंक की किसी भी घटना में मारने वाले लोग तो निरपराध ही होते हैं .

    हम जानते हैं के कश्मीर में भारत के जवान लड़ रहे है और अपने जान की क़ुरबानी भी दे रहे हैं . सवाल यह नहीं के फौज या जवान कार्य नहीं कर रहे . सवाल इस बात का है के इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद ऐसी घटना घटती है तो किसे दोष दे. आतंकवादी तो चाहते हैं के निरपराध लोगो को मारकर कश्मीर और देश में अफरा तफरी का माहौल पैदा कर दे. लोगो को एक दुसरे के खिलाफ खड़ा कर दे. कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार है और इसके नेताओं ने अपनी पूरी मर्जी कश्मीर पर चलाई है. न केवल सरकार ने अपितु टी वी पर भडुआ भोम्पुओ की फौज भी माहौल को साम्प्रदायिक बनाने में जुटी है लेकिन सवाल इस बात का है के कश्मीर में जो राजनैतिक पहल होनी चाहिए थी वो क्यों नहीं हो रही . क्यों ये सरकार हर एक मसले का हल सेना के जरिये चाहती है. अगर सेना हल होती तो हर देश में समस्याओ का समाधान सेना के जरिये हो जाता. सेना देश की सुरक्षा के लिए है और सैनिक उसके लिए अपनी जान भी लगा देता है . आज सिक्किम में भी भारतीय जवान अपनी जान पे खेलकर हमारी सीमा को सुरक्षित कर रहे है लेकिन सवाल यह है के बात कब होगी . क्या युद्ध किसी बात का समाधान है ?

    हम राजनैतिक दलों और सरकार से अनुरोध करते हैं के कश्मीर के प्रश्न को गंभीरता से ले और उस पर सर्वदलीय बैठकर बुलाकर एक विशेष कमिटी का गठन करे . आतंकवादियों से कोई बात नहीं होनी चाहिए लेकिन कश्मीर के अन्दर जो लोग राजनैतिक समाधान चाहते हैं उनके साथ तो बात हो सकती है .

    सरकार का काम होना चाहिए के सभी से अनुरोध करे के जहाँ इस घटना पर उसे दुःख होना चाहिए और इस कृत्य को करने वाले लोगो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए वही अपने चाहने वालो को देश के दुसरे हिस्से में आग उगलने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश से बचना चाहिए. अपने चुनाव जीतने के चक्कर में देश को विभाजित न करे . घटना की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए लेकिन सरकार की कश्मीर निति पर सवाल भी पूछे जाने चाहिए .