हमारे दौर के बच्चे

हमारे दौर के बच्चों की पतंग कट गई है
उनकी दौड़ कहीं गुम है आसमानों में
वे ताक रहे हैं दुख के उस आसमान को, जिसने खा लिया है उनकी पतंग को
और उगल दिया है मौसमी बमवर्षक विमानों की चहल-पहल को

हर पेड़ ने उनके ‘लंगड़ो’ के जवाब में
अपनी खाली जेबें दिखा दी है
मकानों की छतों पर भी नही मिल रही उनकी पतंग
कुओं में लगाई गई उनकी पुकार भी खाली हाथ लौटी है

उनकी पतंगों की शिनाख्त में अब एक पूरी दुनिया लगी हुई है
पर यह हमारे दौर बच्चे ही हैं जिन्हें पता है
अब उनकी पतंग धरती पर नही गिरेगी

हमारे दौर के बच्चे भूल रहे हैं
बम से प्रदूषित हुई हवा के पेच कैसे काटते हैं

अब लोरियां उनके सोने का नही, जागते रहने का आह्वान है.
वे कभी आते थे निश्चल-कौतूहल के साम्राज्य से
अब उनकी आंखों से एक वयस्क-भय झाँकता है

हमारे दौर के बच्चे आश्चर्य में हैं
वो इतनी जल्दी कैसे बड़े हो गए

हमारे दौर के बच्चे पढ़ते हैं ‘पूरी दुनिया के मजदूरों एक हो’
और बुदबुदाते हैं दबी सी आवाज में

पूरी दुनिया के बच्चों एक हो!