शब्द, शब्द की तरह नही आये
वह आये थोड़ा सकुचाते हुए
और, मैंने पूछा कैसे हैं आप!
शब्द जो प्रत्यक्ष थे, स्वतः प्रमाणित थे
आश्चर्य से भरे हुए, वह दुबारा आये तो अपने कपड़े उतारे हुए
और, मैंने फिर पूछा मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ
लौट गए शब्द इस बार आये, तो करुणा से भरे हुए थे
दुख की छाया उनकी और बढ़ गयी थी जब मैंने उनसे पूछा नही
सिर्फ बताया, मैं आपके लिए कर ही क्या सकता हूँ
इस बार शब्द आये तो
अपमान और गुस्से से जले हुए
आधे गले मे फसे, और कुछ हिचकी के साथ बाहर निकले हुए
उन्हें एक निशब्द और निर्विकार चेहरा मिला
वह लौट गए!
शब्द, जो शब्द की तरह नही आये थे
चुभते रहे, एक चुप्पे मनुष्य के भीतर बहुत देर तक
इस बार वह आये तो मैं कह दूँगा उनसे
मैं करूँगा कुछ न कुछ आपके लिए
पर शब्द नही आये, उनकी आहटे आती रही
पदचाप बजते रहे कानो में
कि एक सुबह मैंने देखा!
एक देश को, ‘शब्द’ जिसकी पीठ पर शहरों-गाँवो और मुहल्ले के घरों की तरह उँग आये थे
मैंने देखा, मेरे कपड़े हवा में उड़ गए हैं
एकदम नग्न/लालभभुका चेहरा लिए हुए
मैं किसी शब्द की तरह नही
किसी उत्तराकुल प्रश्न की तरह!
एक चुप्पे मनुष्य की ओर दौड़ जाना चाहता था
उस धूर्त मनुष्य की ओर,
जिसके बारे में माना जाता है कि उसका चेहरा बुद्ध से मिलता है
जो अपनी कविता में एक ‘निर्दोष व्यक्ति’ है

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