Tag: Veeru Sonker

  • कुछ छोटी कविताएँ

    कुछ छोटी कविताएँ

    Veeru Sonker[divider style=’right’]

    [१]

    ‘निरुत्तर’

    मैंने गंभीरता ओढ़ कर
    एक हलकी सी मुस्कुराहट के सहारे
    वह कई प्रश्न,
    जो मुझे फसा सकते थे
    उन्हें वापस प्रश्नकर्ताओ की ओर लौटा दिया.

    अब वह फसे थे और मैं गंभीर था

    मुस्कुराहट के निहितार्थों में
    वह एक जायज उत्तर तलाश रहे थे.

    और मैं तैयार था
    उन उत्तरो पर एक बार फिर
    गंभीर मुद्रा में मुस्कुराने को.

    [२]

    ‘तरीका’

    मैंने सोचा
    मेरा तरीका सबसे सही है.
    अपनी मूर्खता के हर जिक्र पर
    मेरा ठठा कर हँस देना
    या
    बेबाकी से हर बात को स्वीकार करना.

    मैं उनसे बेहतर था
    जो सोच कर हँसते थे
    नकारने की तमाम कोशिशो के बाद स्वीकारते थे.

    खुद को हर बार सही न ठहराने का
    मेरा तरीका सही था!

    [३]

    ‘उबालना’

    इससे पहले जब
    मैं उबलते पानी सा बिलबिलाया था

    तब जाना था
    पतीले से बाहर आने का मतलब
    बिखर कर दुबारा उबलने के लायक न बचना.

    इसके बाद मैंने
    पतीले में बने रह कर उबालना सीखा.

    [४]

    ‘अजीब’

    वह अजीब लोग थे
    वह अजीब से सवालो के साथ थे
    और अपने हिसाब से
    वह अजीब लोगो के बीच थे.

    उनकी दुनिया
    एक सरसरी नजर में बेहद सामान्य थी.

    कुछ लोग चुप थे
    यह चुप लोगो के हिसाब से अच्छा ही था.
    चुप रहने से वह मानते थे
    कि
    उनकी वह दुनिया
    एक सरसरी नजर में बेहद सामान्य थी.

    अजीब लोगो के लिए
    यह बेहद अजीब बात थी!

    Veeru Sonker

    [५]

    ‘लोग’

    उन्होंने पूछा!

    वह कौन थे
    और उन्होंने ने क्यों खोजी भाषा
    व्याकरण और बोलने की विभिन्न स्वर-लहरियाँ.

    वह कौन थे
    जिन्होंने संकेतो को अपर्याप्त माना.

    वह कौन थे
    जिन्हें मौन रहना पसंद नहीं आया.

    उन्होंने पूछा
    क्या वह लोग अब भी मौजूद है ?

    जिन्होंने पूछा
    वह आईने के सामने रो रहे थे!

  • यूँ बनता है एक आदमी

    यूँ बनता है एक आदमी

    Veeru Sonker[divider style=’right’]

    यूँ बनता है एक आदमी
    थोड़ा सा डर बटोरे हुए जो कहता है
    मैं नही डरता.

    चलने से पहले बहुत बार ठिठकता है
    और जेब मे पड़ी भाषा की गिन्नियां टटोलता है
    उसके बाद आदमी नही
    उसका जोड़-घटाव चलता है.

    जैसे नफरत चलती है जैसे सत्ता के पैर नाचते हैं
    जैसे लड़खड़ा जाती है एक उम्र
    बिना पिये ही.

    आदमी ही बताता है सबसे जोरदार नशा होता है समय के प्याले में
    वह जितनी बार तौला जाता है जितनी बार गिना जाता है
    मायूस होता है जितनी बार
    वह उतनी बार ही अपनी खाल छोड़ता है
    और एक नई खाल ओढ़ता है.

    वह स्त्री से बोलता है दुनिया की सुन लेता है
    और टिकाएं रहता है स्मृतियों के पैर
    बेमतलब के पूर्वजो के पास वह आता जाता है

    बहुत बीमार हो कर भी कहता है अपनी देह से
    मैं ठीक हूँ एकदम.

    इतना सब होने के बाद भी वह एक आदमी गिरता है
    एक लंगड़ी सभ्यता की गोद मे
    और कहता है
    मैं तुम्हारा सबसे जरूरी पुर्जा हूँ

    एक लड़की ढांपती है अपने सीने को
    और देखती हैं नजर कैसे बदल गयी
    एक आदमी में,

    एक औरत चुपचाप देखती है
    आहिस्ता-आहिस्ता पुत्र के भीतर से बाहर आते पिता/पति के चेहरे को.

    जगहों के सिमटने का मौसम कितना क्रूर होता है
    देखता है एक बूढ़ा पिता
    ढूंढता है अपने खेत मे बटती हुई जमीन के भीतर ठहरने की कोई जगह.

    उचक कर देखता हुआ बच्चा
    कंधे से उतरता है आहिस्ता
    एक कदम तेज़ चल कर निकलता है अपनी उम्र से बाहर
    हो जाता है एक आदमी.

    एक बच्चा चढ़ता है घोड़े पर
    और बन जाता है आदमी.

    एक बच्चा देखता है स्त्री को
    देखते देखते
    उसके हाथ से कट जाती है बचपन की पतंग
    वह दुख से रोता नही,
    वह सड़क पर दौड़ता है और लूट लेता है मौके से भरी एक पतंग

    ‘मौका’ उसे बदलता है एक आदमी में!

    बहुत बार मरता है एक जल्दबाज पिता
    और बन जाता है
    बारह साल का एक लड़का
    तेज़तर्रार आदमी.

    कॉलेज से बाहर धकेल देती है
    उच्च प्रतिभा-प्रतिशत के शेयरों सी उछलती एक मार्कशीट बहुत बार
    बहुत बार आदमी बनते ही दौड़ लगती है बाजार की ओर
    बाजार सिद्धस्त है
    वह अधबने कच्चे रह गए बच्चों को बदल देता है आदमी में.

    एक बच्चा गिरता है एक सुनसान सड़क पर
    आसपास कोई नही होता
    अचानक वहीँ चढ़ता है बड़े होने का बुखार पहली बार एक बच्चे पर.

    एक बच्चा बुखार को छोड़ता है
    बिस्तर में,
    घर की ऊबी बंद दीवारों के पार ले जाता है
    कौतूहल से जगमग अपनी आंखों को
    और झांकता है
    सभ्यता की उदास आंखों में

    छोड़ता है ढेर सारा भरोसा
    और कहता है मैं चलता हूँ अब!

    वह लौटता है बड़ा होकर
    मांगता है वापस
    उस सभ्यता से अपनी उम्र

    सभ्यता प्रेमिका की तरह तड़पती है
    सभ्यता बारिश की तरह गिरती है

    और

    बूढ़े पत्थरों को चाट कर कहती है
    उम्र का स्वाद लिया है तुमने
    तुम्हारे हाथों से अब कागज की नाव नही बन सकती
    जिस पर ढोते हुए मैं ला सकूँ
    बचपन बोने का बीज

    सभ्यता बड़ी बहन सा दे देती है जमा किया अपना सारा हिस्सा

    आदमी तब टूटता है
    और एक ऐड लेता है समझदारी से भरी हुई

    साथ-साथ चलते हुए दोनों समय के दरवाजे को ठोंकते हैं
    आदमी चुप रहता है सभ्यता बोलती है
    बात करती है और भरोसा देती है!

    दरवाजा खुलता है-
    और एक आदमी कविता से निकल कर
    औंधे मुंह गिरता है
    किसी कहानी में

    यूँ बनता है एक आदमी
    जैसे घुसता है व्याकरण, एक भाषा के भीतर
    आदमी घुसता है कहानी के कपड़े पहन कर
    एक बच्चे के भीतर

    और ला कर पटक देता है
    पकती हुई उम्र के खड़ी कगार वाले एक टीले पर
    बहुत बार उस टीले से उतरता है एक बच्चा
    और फुदक फुदक कर चलता है

    वह तारीखों के/देशों के/पेड़ो के/पूर्वजो की तस्वीर के
    और तमाम असमय घट रही घटनाओं के गाल चूम-चूम कर लाल कर देता है

    नदी, आकाश और मौसम का हाथ पकड़ कर
    चढ़ जाता है फिर उसी टीले पर

    आदमियत की अपनी उतारी हुई खाल को देखता है
    उसे फिर से ओढ़ता है

    थोड़ा रुआंसा होता है
    और कहता है

    मैं बचा लूंगा सब!

  • शब्द नही, एक पूरा देश है

    शब्द नही, एक पूरा देश है

    शब्द, शब्द की तरह नही आये

    वह आये थोड़ा सकुचाते हुए
    और, मैंने पूछा कैसे हैं आप!

    शब्द जो प्रत्यक्ष थे, स्वतः प्रमाणित थे
    आश्चर्य से भरे हुए, वह दुबारा आये तो अपने कपड़े उतारे हुए
    और, मैंने फिर पूछा मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ

    लौट गए शब्द इस बार आये, तो करुणा से भरे हुए थे
    दुख की छाया उनकी और बढ़ गयी थी जब मैंने उनसे पूछा नही

    सिर्फ बताया, मैं आपके लिए कर ही क्या सकता हूँ

    इस बार शब्द आये तो
    अपमान और गुस्से से जले हुए
    आधे गले मे फसे, और कुछ हिचकी के साथ बाहर निकले हुए
    उन्हें एक निशब्द और निर्विकार चेहरा मिला

    वह लौट गए!

    शब्द, जो शब्द की तरह नही आये थे
    चुभते रहे, एक चुप्पे मनुष्य के भीतर बहुत देर तक

    इस बार वह आये तो मैं कह दूँगा उनसे
    मैं करूँगा कुछ न कुछ आपके लिए

    पर शब्द नही आये, उनकी आहटे आती रही
    पदचाप बजते रहे कानो में

    कि एक सुबह मैंने देखा!

    एक देश को, ‘शब्द’ जिसकी पीठ पर शहरों-गाँवो और मुहल्ले के घरों की तरह उँग आये थे

    मैंने देखा, मेरे कपड़े हवा में उड़ गए हैं
    एकदम नग्न/लालभभुका चेहरा लिए हुए

    मैं किसी शब्द की तरह नही
    किसी उत्तराकुल प्रश्न की तरह!

    एक चुप्पे मनुष्य की ओर दौड़ जाना चाहता था

    उस धूर्त मनुष्य की ओर,
    जिसके बारे में माना जाता है कि उसका चेहरा बुद्ध से मिलता है

    जो अपनी कविता में एक ‘निर्दोष व्यक्ति’ है

  • हमारे दौर के बच्चे

    हमारे दौर के बच्चे

    हमारे दौर के बच्चों की पतंग कट गई है
    उनकी दौड़ कहीं गुम है आसमानों में
    वे ताक रहे हैं दुख के उस आसमान को, जिसने खा लिया है उनकी पतंग को
    और उगल दिया है मौसमी बमवर्षक विमानों की चहल-पहल को

    हर पेड़ ने उनके ‘लंगड़ो’ के जवाब में
    अपनी खाली जेबें दिखा दी है
    मकानों की छतों पर भी नही मिल रही उनकी पतंग
    कुओं में लगाई गई उनकी पुकार भी खाली हाथ लौटी है

    उनकी पतंगों की शिनाख्त में अब एक पूरी दुनिया लगी हुई है
    पर यह हमारे दौर बच्चे ही हैं जिन्हें पता है
    अब उनकी पतंग धरती पर नही गिरेगी

    हमारे दौर के बच्चे भूल रहे हैं
    बम से प्रदूषित हुई हवा के पेच कैसे काटते हैं

    अब लोरियां उनके सोने का नही, जागते रहने का आह्वान है.
    वे कभी आते थे निश्चल-कौतूहल के साम्राज्य से
    अब उनकी आंखों से एक वयस्क-भय झाँकता है

    हमारे दौर के बच्चे आश्चर्य में हैं
    वो इतनी जल्दी कैसे बड़े हो गए

    हमारे दौर के बच्चे पढ़ते हैं ‘पूरी दुनिया के मजदूरों एक हो’
    और बुदबुदाते हैं दबी सी आवाज में

    पूरी दुनिया के बच्चों एक हो!