मेरे शहर के हिस्ट्रीशीटर

Tribhuvan

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उन दिनों एसपी हुआ करते थे बीजू जॉर्ज जोसेफ़। क्या हिम्मती बंदा था। खूब पढ़ाकू और खूब लड़ाकू। थानेदार थर-थर कांपते थे और बंदे को देखो तो हर समय पसीने से लथपथ। एसपी जैसा एसपी।

मज़ाल कि कानून और व्यवस्था को कोई धता बता दे। थानेदार भले ढीले पड़ जाएं, सीआई चाहे कहीं छुप जाएं और डीवाईएसपी चाहे किसी कंदरा में ओझल हो जाएं, अपराधियों को खुद ही धर लेता था। कमज़ोर एसपीज के समय में जो कानून अपराधियों के सामने साए की तरह ज़मीन पर रेंगता है, उसमें अच्छे एसपी सूरमे सांप की सी जुंबिश और फुफकार भर देते हैं। बीजू ने उन दिनों यही किया था।

एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मैं थाने में थानेदार के सामने था तो एक कॉल आई और थानेदार सावधान की मुद्रा में आ गया कुर्सी से कूदकर। पता चला, बीजू का फ़ोन है। मज़ा आया।

बीजू के साथ मैंने कई पुस्तकें एक्सचेंज करके पढ़ीं। अरुंधति रॉय की “दॅ गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स” उन्हीं दिनों आई थी और मुझे मिल नहीं रही थी। यह उपन्यास मैंने उन्हीं से लेकर पढ़ा। बीजू के आग्रह पर मैंने शायद उन्हें नीरद सी चौधरी की “दॅ ऑटोबायोग्रैफी ऑव अन अननॉन इंडियन” पढ़ने को दी थी। यह सिलसिला काफ़ी चला। लेकिन ज़ल्द ही उनका तबादला हो गया और वे चले गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन बहुत यादगार।

तो ख़ैर, शहर के एक बहुत नामी उद्योगपति की उनके अपने ही सगे भाई ने जेल से पैरोल पर आए एक ख़तरनाक अपराधी से दिन दहाड़े हत्या करवा दी थी। इस हत्याकांड से शहर में सनसनी फैल गई थी, लेकिन बीजू ने इसे कुछ घंटे बाद ही पंजाब बॉर्डर क्रॉस करते हुए धर दबोचा था।

इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग बहुत रोमांचकारी रही। गर्भनाल के रिश्ते खून से आलूदा हो चुके थे। जिस समय अदालत से फैसला आया, मारे गए व्यक्ति की पत्नी हत्या के असली अभियुक्त को सज़ा दिलाने से पीछे हट गई और एक नेपाली नौकर के बयानों के अाधार पर अदालत ने अपराधियों को सख़्त सजा सुनाई। औरत का पतन देखो, पैसा मिल गया; पति के असली हत्यारे को बख्श दिया। शहर में चर्चा थी कि देवर और भाभी में भारी डील हुई है।

इस घटनाक्रम ने मन उचाट कर दिया। क्या कोई सगा भाई पैसे के लालच में इतना नीचे गिर सकता है? क्या कोई पत्नी इतना पतित हो सकती है? लेकिन उस समय और भी शर्म आई, जब पता चला कि पूरे शहर ने उस शख्स को सिर पर बिठा लिया है, जिसने मर्डर करवाया था।

खैर, हत्यारे की गिरफ्तारी की जिस समय खबरें की जा रही थीं, मेरे पास जेल से नंबरदार का फोन आया। वह बोला : एक बात करनी है आओ। मैं जेल पहुंचा। जेल में नंबरदार सबसे सीनियर और लीडर बंदे को कहते हैं। इसने कोई न कोई खतरनाक अपराध किया होता है।

मैं गया तो वह बोला : यार, इससे मिलो। ये हैं करतारसिंह। मैं बोला : तो हुआ क्या?

करतारसिंह बोला : वो सेठ के मर्डर में जिस संजय को पकड़ा है। पुलिस ने 302 की जगह 303 लगाई है। ये ग़लत है। रोंग है। बिलकुल रोंग। मैंने इस धारा के बारे में पहली बार उसी समय सुना था।

दरअसल, आईपीसी की एक धारा है 303, जो ऐसे मर्डरर पर लगाई जाती है, जो पहले से आजीवन कारावास की सजा काट रहा हो। इसमें फांसी के अलावा और कोई सजा नहीं है।

करतारसिंह, जिस पर कई लाेगों के मर्डर का आराेप था और जो एक ठेठ देसी किसान था, बोला : हू एवर बीइंड अंडर सेंटेंस ओफ इंप्रीजनमेंट फोर लाइफ, कमिट्स मर्डर, शैल बी पनिश्ड विद डैथ।

वह बोला : ध्यान देणा भाई साब। शैल बी पनिश्ड विद डैथ। लेकन गल ये है कि मिट्‌ठूसिंह और भगवान बख्श सिंह के केसों में भाई साहब सुप्रीम कोर्ट ने एटीफोर से पहले ही आईपीसी के इस सेक्शन को स्ट्रक डाउन कर दिया था। इसे वोइड और अनकंस्टीट्यूशनल भी करार दिया था जी।

अब पूरी कहानी समझ आई कि पुलिस ने जिस मर्डर मामले में ये सेक्शन लगाया है, उसमें तो कोर्ट ने भी पीसी रिमांड दिया है। मैंने कहा तो करतारसिंह बोला : देखो, अजकल, कनून दे बारे न जजां नूं पता, न पुलिस अफसरां नूं। कनून दा पता हुंदा तां अज्ज ऐने लोक बेकसूर ही जेलां विच नहीं सड़दे।

मैंने कहा : यार तुमने तो खुद मर्डर किया है। तुम सजा काट रहो, सड़ नहीं रहे हो!

वह बोला : बताओ किसका किया?
मैं बोला : अब तुम्हीं बता दो।
करतार ने कहा : मेरे घर की एक लड़की को कोई बुरी नजर से देख रहा था। वह हद पार होने लगा तो समझाया। नहीं माना तो दो चार बार और समझाया। नहीं माना और अपनी हद से गुजरा तो उसकी गर्दन उतारकर मैंने उसके चबूतरे पर रख दी। …. की मैं गलत कीता? देख वीरा, मेरे दिल विच देख। मेरी बहन प्रसन्न है और मेरे दिल से इनसाफ़ की महक आ रही है।

……वह बोला : मैं कोई कमीना कातिल नहीं हूं!

मैं अनुत्तरित था।


फेसबुक वाल से साभार

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